बयालीस लीला
Bayalis Leela (Forty-Two Playful Pastimes) is a foundational text of the RadhaVallabh sampradaya, composed by the 17th-century saint Shri Hit Dhruvdas Ji. Written in elegant Braj Bhasha poetry, it beautifully details forty-two distinct spiritual pastimes (leelas) highlighting the divine, intimate love (Nikunj Rasa) of Radha and Krishna.
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बयालीस लीला
बयालीस लीला
1. जीव-दशा लीला
चौपाई
जीव दशा कछु इक सुनि भाई ।
हरि-जस अमृत तजि विष खाई ॥1।।
छिन भंगुर यह देह न जानी ।
उलटी समुझि अमर ही मानी ॥2।।
घर घरनी के रंग यौं राच्यौ ।
छिन-छिन में कपि नट लौं नाच्यौ ॥3।।
करी ना कबहूँ भजन सँभारी ।
ऐसे मगन रह्यौ व्यौहारी ॥4।।
बय गई बीति जात नहिं जानी ।
ज्यौं सावन-सरिता कौ पानी ॥5।।
द्वै स्वांसा या घट में चलैं ।
जो बिछुरैं तो फेरि न मिलैं ॥6।।
माया सुख में यौं लपटानौं ।
विषै स्वाद सर्वस ही जानौ ॥7।।
कृष्ण भक्ति सौं कबहुँ न राँच्यौ ।
महा मूढ़ बड़े सुख ते बाँच्यौ ॥8।।
काल समै जब आइ तुलानी ।
तन मन की सुधि सबै भुलानी ॥9।।
रसना थकी न बोल्यौ जाई ।
बार-बार मन में पछिताई ॥10।।
जम-किंकर जब दई दिखाई ।
महा भयानक अति दुखदाई ॥11।।
रञ्च न स्याम-भक्ति उर आई ।
या दुख में अब कौन सहाई ॥12।।
रोम-रोम पीड़ा दुख पाई ।
हरि केहरि बिनु कौन छुड़ाई ॥13।।
ताकौ नाम न लियौ अभागे ।
कबहूँ सोवत सुपन न जागे ॥14।।
अब मुख नहिं निसरत हरिबानी ।
पित्त-वायु कफ घेर्यौ आनी ॥15।।
एक नाम त्रैलोकहि तारै ।
जो न लेहि सो जनमहिं हारै ॥16।।
दोहा
कैसैंहूँ हरि नाम लै, खेलत हँसत अजान ।
एसे हूँ कौ देत हैं, उत्तम गति भगवान ॥17।।
जो कोउ साँची प्रीति सौं, हरि-हरि कहत लड़ाइ ।
तिनकौं 'ध्रुव' कहा दैंहिगे, यह जानी नहिं जाइ ॥18।।
सब धर्मनि पर जगमगै, कृष्ण नाम सिरताज ।
जैसैं वन के मृगनि में, गाजत है मृगराज ॥19।।
चौपाई
पापी एक अजामिल भयौ ।
अधम बीज तिन तरु निर्मयौ ॥20।।
सुत मिस नाम नरायन लयौ ।
सो पापी बैकुंठहिं गयौ ॥21।।
ऐसे बहुत पातकी तरे ।
हरि हरि कहत पाप सब जरे ॥22।।
दोहा
कृष्ण नाम लीन्हौं न जिनि, कीन्हौं बड़ौ अकाज ।
धर्म - मृगनि पाछैं लग्यौ, छाँड़ि नाम मृगराज ॥23।।
दान पुन्य नृग नृप बड़ कियौ ।
सो लै अंध-कूप में दियौ ॥24।।
धर्मनि में अरुझाइ भुलाने ।
विधि परपंच सबै जग जाने ॥25।।
दोहा
कोटि धर्म व्रत निगम रटि, विधि सौ करै बनाइ ।
एक नाम बिनु कृष्ण के, सबै अविधि है जाइ ॥26।।
चौपाई
कोटि धर्म जो कोउ करि आवै ।
कृष्ण नाम बिनु गति नहिं पावै ॥27।।
नामहिं सौ जिनि बाँध्यौ नातौ ।
जग के सुख तें सो भयौ हाँतौ ॥28।।
दोहा
मिथ्या लालच जगत सुख, सबहिं दुःख कौ धाम ।
इक रस नित आनन्दमय, सत्य श्याम कौ नाम ।।29।।
1. जीव-दशा लीला
चौपाई
जीव दशा कछु इक सुनि भाई ।
हरि-जस अमृत तजि विष खाई ॥1।।
छिन भंगुर यह देह न जानी ।
उलटी समुझि अमर ही मानी ॥2।।
घर घरनी के रंग यौं राच्यौ ।
छिन-छिन में कपि नट लौं नाच्यौ ॥3।।
करी ना कबहूँ भजन सँभारी ।
ऐसे मगन रह्यौ व्यौहारी ॥4।।
बय गई बीति जात नहिं जानी ।
ज्यौं सावन-सरिता कौ पानी ॥5।।
द्वै स्वांसा या घट में चलैं ।
जो बिछुरैं तो फेरि न मिलैं ॥6।।
माया सुख में यौं लपटानौं ।
विषै स्वाद सर्वस ही जानौ ॥7।।
कृष्ण भक्ति सौं कबहुँ न राँच्यौ ।
महा मूढ़ बड़े सुख ते बाँच्यौ ॥8।।
काल समै जब आइ तुलानी ।
तन मन की सुधि सबै भुलानी ॥9।।
रसना थकी न बोल्यौ जाई ।
बार-बार मन में पछिताई ॥10।।
जम-किंकर जब दई दिखाई ।
महा भयानक अति दुखदाई ॥11।।
रञ्च न स्याम-भक्ति उर आई ।
या दुख में अब कौन सहाई ॥12।।
रोम-रोम पीड़ा दुख पाई ।
हरि केहरि बिनु कौन छुड़ाई ॥13।।
ताकौ नाम न लियौ अभागे ।
कबहूँ सोवत सुपन न जागे ॥14।।
अब मुख नहिं निसरत हरिबानी ।
पित्त-वायु कफ घेर्यौ आनी ॥15।।
एक नाम त्रैलोकहि तारै ।
जो न लेहि सो जनमहिं हारै ॥16।।
दोहा
कैसैंहूँ हरि नाम लै, खेलत हँसत अजान ।
एसे हूँ कौ देत हैं, उत्तम गति भगवान ॥17।।
जो कोउ साँची प्रीति सौं, हरि-हरि कहत लड़ाइ ।
तिनकौं 'ध्रुव' कहा दैंहिगे, यह जानी नहिं जाइ ॥18।।
सब धर्मनि पर जगमगै, कृष्ण नाम सिरताज ।
जैसैं वन के मृगनि में, गाजत है मृगराज ॥19।।
चौपाई
पापी एक अजामिल भयौ ।
अधम बीज तिन तरु निर्मयौ ॥20।।
सुत मिस नाम नरायन लयौ ।
सो पापी बैकुंठहिं गयौ ॥21।।
ऐसे बहुत पातकी तरे ।
हरि हरि कहत पाप सब जरे ॥22।।
दोहा
कृष्ण नाम लीन्हौं न जिनि, कीन्हौं बड़ौ अकाज ।
धर्म - मृगनि पाछैं लग्यौ, छाँड़ि नाम मृगराज ॥23।।
दान पुन्य नृग नृप बड़ कियौ ।
सो लै अंध-कूप में दियौ ॥24।।
धर्मनि में अरुझाइ भुलाने ।
विधि परपंच सबै जग जाने ॥25।।
दोहा
कोटि धर्म व्रत निगम रटि, विधि सौ करै बनाइ ।
एक नाम बिनु कृष्ण के, सबै अविधि है जाइ ॥26।।
चौपाई
कोटि धर्म जो कोउ करि आवै ।
कृष्ण नाम बिनु गति नहिं पावै ॥27।।
नामहिं सौ जिनि बाँध्यौ नातौ ।
जग के सुख तें सो भयौ हाँतौ ॥28।।
दोहा
मिथ्या लालच जगत सुख, सबहिं दुःख कौ धाम ।
इक रस नित आनन्दमय, सत्य श्याम कौ नाम ।।29।।
2. वैद्यक ज्ञान लीला
चौपाई
वैद्य एक पंडित अति भारी ।
ठाढ़ौ सब सौं कहत पुकारी ॥1॥
जैसौ रोग होइ है जाकौं ।
तैसी औषध देहौं ताकौ ॥2॥
यह सुनि एक गयौ तेहि नेरें ।
ऐसौ बल औषधि को तेरें ॥3॥
मेरें विथा बढ़ी अति भारी ।
कहि मोसौं कछु सोच विचारी ॥4॥
तेरें रोग कहा है भाई ।
ताकी औषधि देउँ बताई ॥5॥
पापहि-कर्म अधिक मैं कीनैं ।
महा दुखी तिहि रोग के लीनैं ॥6॥
विषै विषम विषतन रह्यौ छाई ।
भव-भुवंग तें लेहु छुडाई ॥7॥
धरि यह देह कछु नहिं कीन्हौं ।
कृष्न चरण चित कबहुँ न दीन्हौं ॥8॥
विषै स्वाद में रह्यौ लुभाई ।
झूठे सुख में आयु गंमाई ॥9॥
दुख पायौ जहँ-जहँ चित दीयौ ।
अब हौं पावत अपनौ कियौ ॥10॥
ऐसे मोह जाल में पर्यौ ।
यह माया नें सर्बस हर्यौ ॥11॥
जिनकौं हौं समुझत हौं अपने ।
ते तौ भये रैंनि के सपने ॥12॥
गज तुरंग सेवक सुत नाती ।
जागि परे तें दिया न बाती ॥13॥
दोहा
एते पर समुझाय रह्यौ, समुझत नहिं मन मोर ।
देखि-देखि नाचत मुदित, विषै बादरनि ओर ॥14॥
बूड़त मोह सिंधु की धारा ।
काढि दया करि करि मोहिं पारा ॥15॥
हौं अति दीन महा दुख पावत।
लोग कुटुम्ब कोऊ न मुँह लावत ॥16॥
चौपाई
जे जे मुख जोवत हे मेरौ ।
तिनमें कोऊ न आवत नेरौ ॥17॥
मेरी बात सुहाति न काहू ।
तातें उपजत है उर-दाहू ॥18॥
चौपाई
भयौ बलहीन बुद्धि हू नाठी ।
तहाँ सहाइ भई कछु लाठी ॥19॥
झूँठे कुटुम्बहि में रंग भीनौं ।
साँचे प्रभु सौं चित नहिं दीनौं ॥20॥
कहँ लगि कहौं मूढ़ता अपनी ।
ढ़ाँपि लियौ माया की चपनी ॥21॥
दोहा
नैंन गये अरु श्रवन हूँ, और गये मुख दंत ।
बुद्धि घटी तन गति लटी, तृष्णा कौ नहिं अंत ॥22॥
टूटी खाट न छाँड़ी भावै ।
सुत के सुत नातीनु खिलावे ॥23॥
यहै रुचै मुख नाम न आवै ।
जैवो जमके घरही भावै ॥24॥
दोहा
मन लाग्यौ अति झूँठ सौं,
तजि साँचहि सुख-मूल ।
छाँड़ि सुधा के सुख फलहिं,
जाइ गही विष-शूल ॥25॥
चौपाई
ज्यौं-ज्यौं तन अति जीरन भयौ ।
त्यौं-त्यौं लोभ रोग बढ़ि गयौ ॥26॥
अब तुम जतन करौ चित लाई।
तातें कछु इक हियौ सिराई ॥27॥
तबहिं वैद तासौं यौं कही।
करौं जतन दुख जैहै सही ॥28॥
इन्द्री निग्रह जो पथ करई ।
तिय इमली ते मन परिहरई ॥29॥
लोभ खटाई मोह मिठाई ।
दही क्रोध के निकट न जाई ॥30॥
इतनी कहि जु अनुग्रह कीन्हौं ।
ताकौ कर आपुन गहि लीन्हौं ॥31॥
नारी देखत सीस डुलायौ ।
रह्यौ अपथ्य कियौ मन भायौ ॥32॥
रंग-मनोरथ करन विचार्यौ ।
हरि सौ मीत न कबहुँ सँभार्यौ ॥33॥
दोहा
विषै जूप खेलत रह्यौ, कबहुँ न मानी हारि ।
पियौ जु मदिरा मोह की, सब सुधि दई विसारि ॥34॥
मत्त भयौ अप-वपु न सँभारत ।
छिन-छिन विषै धूरि सिर डारत ॥35॥
त्रिगुण मोह की लगी तोहिं बाता ।
तातें उपज्यौ है सनिपाता ॥36॥
तिनमें दोइ अधिक बढ़े तन में ।
तम-रज बसत निरंतर मन में ॥37॥
तिनको और जतन नहिं कोई।
श्री शुकदेव कह्यौ है सोई ॥38॥
करि विश्वास वचन सुनि मेरौ ।
रोग रहै तौ गुनही तेरौ ॥39॥
तब रोगी बोल्यौ सुनि भाई।
तैं तौ मेरी वेदन पाई ॥40॥
अब मैं शरन गही है तेरी ।
तोहिं लाज सब बात की मेरी ॥41॥
तुम अति गुनी दुनी सब जानै ।
करि उपाइ जोई मन मानें ॥42॥
दोहा
पंडित सोचि-विचारि कै, करनि लग्यौ उपचार ।
जैसे वेगहिं जाइ तरि, भव दुस्तर संसार ॥43॥
चौपाई
जड़ वैराग वृक्ष की लावहु ।
सौंठ संतोषहि आनि मिलावहु ॥44॥
मिरचि तितीच्छ्न करुना चीता ।
निस्पृह पीपर मिलवहु मीता ॥45॥
कोमलता सब सौंज गिलोई ।
मधुबानी सौं लेहु समोई ॥46॥
हरर आमरे शुचि अरु दाया ।
तातें निर्मल ह्वै है काया ॥47॥
असगँध आसन दृढ़ कै करौ ।
चिंतामनि चिंता परिहरौ ॥48॥
मुसलि सौंफ अजवाइन जीरा ।
ग्यान-ध्यान-जप-जोग में धीरा ॥49॥
सांत मृगांग बिना सुख नाहीं ।
साँच लौंग मिलवहु ता माही ॥50॥
भगवत धर्म धातु सब लीजै ।
नाम सुधा रस की पुट दीजै ॥51॥
ये औषधि सब आनि मिलावौ ।
ग्यान ओखली माँहि कुटावौ ॥52॥
हिय हाँड़ी में आनि चढ़ावौ ।
चेतन वह्नी करि औटावौ ॥53॥
निर्मत्सर चपनी ढँकि लैयै ।
श्रृद्धा करछी फेरत जैयै ॥54॥
हस्त-क्रिया जबही बनि आवै ।
जौ कबहूँ सत् संगति पावै ॥55॥
पुनि लै प्रेम चषक में करै ।
भूमि गरीबी में लै धरै ॥56॥
प्रात कृपा बल जल सौं पीवै ।
रोग जाइ अरु जुग-जुग जीवै ॥57॥
दोहा
नारदादि प्रह्लाद ध्रुव, कीनौ यहै विचार ।
या जुग में या रोग कौ, सिद्ध यहै उपचार ॥58॥
अब तरिहैं केतेक तरे, याही औषधि खाइ ।
ताते बिलम्ब न कीजिये, बेगहि करौ उपाइ ॥59॥
मन के समुझन को कह्यौ, अद्भुत वैद्यक ग्यान ।
जन मनि के सब रोग,'ध्रुव' सुनतहि करैं पयान ॥60॥
जै जै श्री वैद्यक ज्ञान लीला की जै जै श्री हित हरिवंश
चौपाई
वैद्य एक पंडित अति भारी ।
ठाढ़ौ सब सौं कहत पुकारी ॥1॥
जैसौ रोग होइ है जाकौं ।
तैसी औषध देहौं ताकौ ॥2॥
यह सुनि एक गयौ तेहि नेरें ।
ऐसौ बल औषधि को तेरें ॥3॥
मेरें विथा बढ़ी अति भारी ।
कहि मोसौं कछु सोच विचारी ॥4॥
तेरें रोग कहा है भाई ।
ताकी औषधि देउँ बताई ॥5॥
पापहि-कर्म अधिक मैं कीनैं ।
महा दुखी तिहि रोग के लीनैं ॥6॥
विषै विषम विषतन रह्यौ छाई ।
भव-भुवंग तें लेहु छुडाई ॥7॥
धरि यह देह कछु नहिं कीन्हौं ।
कृष्न चरण चित कबहुँ न दीन्हौं ॥8॥
विषै स्वाद में रह्यौ लुभाई ।
झूठे सुख में आयु गंमाई ॥9॥
दुख पायौ जहँ-जहँ चित दीयौ ।
अब हौं पावत अपनौ कियौ ॥10॥
ऐसे मोह जाल में पर्यौ ।
यह माया नें सर्बस हर्यौ ॥11॥
जिनकौं हौं समुझत हौं अपने ।
ते तौ भये रैंनि के सपने ॥12॥
गज तुरंग सेवक सुत नाती ।
जागि परे तें दिया न बाती ॥13॥
दोहा
एते पर समुझाय रह्यौ, समुझत नहिं मन मोर ।
देखि-देखि नाचत मुदित, विषै बादरनि ओर ॥14॥
बूड़त मोह सिंधु की धारा ।
काढि दया करि करि मोहिं पारा ॥15॥
हौं अति दीन महा दुख पावत।
लोग कुटुम्ब कोऊ न मुँह लावत ॥16॥
चौपाई
जे जे मुख जोवत हे मेरौ ।
तिनमें कोऊ न आवत नेरौ ॥17॥
मेरी बात सुहाति न काहू ।
तातें उपजत है उर-दाहू ॥18॥
चौपाई
भयौ बलहीन बुद्धि हू नाठी ।
तहाँ सहाइ भई कछु लाठी ॥19॥
झूँठे कुटुम्बहि में रंग भीनौं ।
साँचे प्रभु सौं चित नहिं दीनौं ॥20॥
कहँ लगि कहौं मूढ़ता अपनी ।
ढ़ाँपि लियौ माया की चपनी ॥21॥
दोहा
नैंन गये अरु श्रवन हूँ, और गये मुख दंत ।
बुद्धि घटी तन गति लटी, तृष्णा कौ नहिं अंत ॥22॥
टूटी खाट न छाँड़ी भावै ।
सुत के सुत नातीनु खिलावे ॥23॥
यहै रुचै मुख नाम न आवै ।
जैवो जमके घरही भावै ॥24॥
दोहा
मन लाग्यौ अति झूँठ सौं,
तजि साँचहि सुख-मूल ।
छाँड़ि सुधा के सुख फलहिं,
जाइ गही विष-शूल ॥25॥
चौपाई
ज्यौं-ज्यौं तन अति जीरन भयौ ।
त्यौं-त्यौं लोभ रोग बढ़ि गयौ ॥26॥
अब तुम जतन करौ चित लाई।
तातें कछु इक हियौ सिराई ॥27॥
तबहिं वैद तासौं यौं कही।
करौं जतन दुख जैहै सही ॥28॥
इन्द्री निग्रह जो पथ करई ।
तिय इमली ते मन परिहरई ॥29॥
लोभ खटाई मोह मिठाई ।
दही क्रोध के निकट न जाई ॥30॥
इतनी कहि जु अनुग्रह कीन्हौं ।
ताकौ कर आपुन गहि लीन्हौं ॥31॥
नारी देखत सीस डुलायौ ।
रह्यौ अपथ्य कियौ मन भायौ ॥32॥
रंग-मनोरथ करन विचार्यौ ।
हरि सौ मीत न कबहुँ सँभार्यौ ॥33॥
दोहा
विषै जूप खेलत रह्यौ, कबहुँ न मानी हारि ।
पियौ जु मदिरा मोह की, सब सुधि दई विसारि ॥34॥
मत्त भयौ अप-वपु न सँभारत ।
छिन-छिन विषै धूरि सिर डारत ॥35॥
त्रिगुण मोह की लगी तोहिं बाता ।
तातें उपज्यौ है सनिपाता ॥36॥
तिनमें दोइ अधिक बढ़े तन में ।
तम-रज बसत निरंतर मन में ॥37॥
तिनको और जतन नहिं कोई।
श्री शुकदेव कह्यौ है सोई ॥38॥
करि विश्वास वचन सुनि मेरौ ।
रोग रहै तौ गुनही तेरौ ॥39॥
तब रोगी बोल्यौ सुनि भाई।
तैं तौ मेरी वेदन पाई ॥40॥
अब मैं शरन गही है तेरी ।
तोहिं लाज सब बात की मेरी ॥41॥
तुम अति गुनी दुनी सब जानै ।
करि उपाइ जोई मन मानें ॥42॥
दोहा
पंडित सोचि-विचारि कै, करनि लग्यौ उपचार ।
जैसे वेगहिं जाइ तरि, भव दुस्तर संसार ॥43॥
चौपाई
जड़ वैराग वृक्ष की लावहु ।
सौंठ संतोषहि आनि मिलावहु ॥44॥
मिरचि तितीच्छ्न करुना चीता ।
निस्पृह पीपर मिलवहु मीता ॥45॥
कोमलता सब सौंज गिलोई ।
मधुबानी सौं लेहु समोई ॥46॥
हरर आमरे शुचि अरु दाया ।
तातें निर्मल ह्वै है काया ॥47॥
असगँध आसन दृढ़ कै करौ ।
चिंतामनि चिंता परिहरौ ॥48॥
मुसलि सौंफ अजवाइन जीरा ।
ग्यान-ध्यान-जप-जोग में धीरा ॥49॥
सांत मृगांग बिना सुख नाहीं ।
साँच लौंग मिलवहु ता माही ॥50॥
भगवत धर्म धातु सब लीजै ।
नाम सुधा रस की पुट दीजै ॥51॥
ये औषधि सब आनि मिलावौ ।
ग्यान ओखली माँहि कुटावौ ॥52॥
हिय हाँड़ी में आनि चढ़ावौ ।
चेतन वह्नी करि औटावौ ॥53॥
निर्मत्सर चपनी ढँकि लैयै ।
श्रृद्धा करछी फेरत जैयै ॥54॥
हस्त-क्रिया जबही बनि आवै ।
जौ कबहूँ सत् संगति पावै ॥55॥
पुनि लै प्रेम चषक में करै ।
भूमि गरीबी में लै धरै ॥56॥
प्रात कृपा बल जल सौं पीवै ।
रोग जाइ अरु जुग-जुग जीवै ॥57॥
दोहा
नारदादि प्रह्लाद ध्रुव, कीनौ यहै विचार ।
या जुग में या रोग कौ, सिद्ध यहै उपचार ॥58॥
अब तरिहैं केतेक तरे, याही औषधि खाइ ।
ताते बिलम्ब न कीजिये, बेगहि करौ उपाइ ॥59॥
मन के समुझन को कह्यौ, अद्भुत वैद्यक ग्यान ।
जन मनि के सब रोग,'ध्रुव' सुनतहि करैं पयान ॥60॥
जै जै श्री वैद्यक ज्ञान लीला की जै जै श्री हित हरिवंश
3. मन शिक्षा लीला
दोहा
रे मन श्री हित हरिवंश भजु, जो चाहत विश्राम ।
जिहिं रस बस व्रज सुंदरिन, छाँड़ि दिये सुख-धाम ॥1॥
निगम नीर मिलि एक भयौ, भजन- दूध सम सेत ।
श्री हरिवंश हंस न्यारौ कियौ, प्रकट जगत के हेत ॥2॥
एक सोच मन में रह्यौ, अरु आवत जिय लाज ।
अद्भुत मानुष देह धरि, कियौ न कछुवै काज ॥3॥
रे मन चंचल तजि विषै, ढरौ भजन की ओर ।
छाँड़ि कुमति अब सुमति गहि, भजि लै नवल किशोर ॥4॥
अब लगि मन कीन्हौ सोई, जो जो कह्यौ तैं मोहि ।
अब तू मेरौ कह्यौ करि, युगल चरन छबि जोहि ॥5॥
मन गज तजि कै विषै मग, चलहु भजन रस माहिं ।
श्री राधावल्लभ लाल बिनु, तेरौ कोऊ नाहिं ॥6॥
रे मन अरु अब छाँडि कै, जो अटकै इक ठौर ।
वृन्दावन घन कुंज में, जहाँ रसिक शिरमौर ॥7॥
रे मन अलि सुनि छुवै जिन, विषय सुमन शठ मंद ।
युगल चरन अरविंद कौ, करहि पान मकरंद ॥8॥
मन पंछी अब परैहि जिन, जगत मोह के जाल ।
तब तोकौं ह्वै है कठिन, बढ़िहै दुःख विशाल ॥9॥
विषै चुगा जिन चुगै मन, चुगत कछुक सुख होइ ।
फिरि फाँसी ऐसी परै, तिहिं सम दुःख न कोइ ॥10॥
रे मन कबहुँ जाइ जिन, भूलि विषै मन रंग ।
मनमथ ठग मारत तहाँ, लिये बहुत ठग संग ॥11॥
जब लगि मन छाँड़त नहीं, सब बातनि कौ लोभ ।
तब लगि हिय उपजति नहीं, युगल प्रेम की गोभ ॥12॥
सब पापनि कौ छत्र यह, लोभ तें मनहिं घटाइ ।
निस्प्रेही संतोष करि, रहै भजन चित लाइ ॥13॥
मन तौ चंचल सबनि तें, कीजै कौन उपाइ ।
साधन को हरि भजन है, कै सतसंग सहाइ ॥14॥
काम-कामना-वासना, मन तें करि सब दूरि ।
श्री राधावल्लभ लाल भजि, रसिकनि जीवन मूरि ॥15॥
रस बल छुटै न जो विषै, सुख नहिं पावै कोई ।
तन छाँडै मन गहि रहै, दूनौ दुख तहँ होइ ॥16॥
रस बल छूटै जौ विषै, तबहिं लहै सुख मूल ।
जैसैं आतप कौ तप्यौ, पावै सरिता कूल ॥17॥
विषै करत वय बीत गई, तृपित भयौ तउ नाहि ।
नैन अछत द्वै दीप धरि, परत कूप तम माहिं ॥18॥
जद्यपि तन जीरन भयौ, छुटी न मन की रीति ।
बिखरि पर्यौ सिमटत नहीं, इन्द्रिन लीन्हौं जीति ॥19॥
परनिंदा के किये ते, आवत नहिं कछु हाथ ।
मूरख पर्वत पाप कौ लै चल्यौ अपने साथ ॥20॥
भक्तनि निंदा अति बुरी, भूलि करौ जिनि कोइ ।
किये सुकृत सब जनम के, छिन में डारत खोइ ॥21॥
मत्सर-क्रोध भर्यौ रहै, अरु सहाइ अभिमान ।
बिनु पावक जरिबौ करै, महा-मूढ अग्यान ॥22॥
अब सुनि भजन की रीति कछु, होइ महादृढ धीर ।
कोऊ थाह न पावही, जहाँ नीर गंभीर ॥23॥
जाकौ जैसौ भाव है, मन में धरि विश्वास ।
कर्म-धर्म अरु लोक कुल, तोरै सब की आस ॥24॥
भक्त आहिं बहु भाँति के, तिनमें बहुतक भेद ।
बिनु विवेक मिलिबौ तहाँ, मन पावै अति खेद ॥25॥
सब ठाँ मिलिबौ एक सौ, ग्यानी की यह रीति ।
भजनी सोइ विवेक सों, करै समुझि कै प्रीति ॥26॥
खान पान तौ कीजिये, रसिक मंडली माहिं ।
जिनिकैं और उपासना, तहाँ उचित ध्रुव नांहि ॥27॥
रसिक रँगे जे युगल रंग, तिनकी जूँठन खाइ ।
जहाँ तहाँ के पावने, भजन तेज घटि जाइ ॥28॥
इष्ट मिलै अरु मन मिलै, मिलै भजन रस रीति ।
मिलिये तहाँ निसंक ह्वै, कीजै तिनसौं प्रीति ॥29॥
युगल प्रेम रस मगन जे, तेई अपनें जानि ।
सब बिधि अंतर खोलि कै, तिनिही सौं रूचि मानि ॥30॥
यह रस परस्यौ नाहिं जिनि, तू जिनि परसै ताहि ।
तासौं नातौ नाहिं कछु, यह रस रुचै न जाहि ॥31॥
संग सोई जाके मिले, भूलै गृह त्यौहार ।
तिहिं छिन आवै हिये में, अद्भुत युगल बिहार ॥32॥
जिनके देखै पुलक तन, रोमांचित ह्वै जाइ ।
सुनत मधुर तिनके बचन, नैंन भरे जल आइ ॥33॥
जिनकौ सहज सुभाव पर्यौ युगल रंग की बात ।
निशि दिन बीतैं भजन में, और न कछू सुहात ॥34॥
ऐसे भक्तनि के मिले, हिय अरु नैंन सिरात ।
मन दै नीकें समुझि कैं, सुनिये तिन की बात ॥35॥
जिनके युगल बिहार की बात चलै दिन रैंन ।
तिनहीं सौं सँग कीजिये, छाँडि और सब गैन ॥36॥
बहुत मिलै सो संग नहिं, न्यारी न्यारी भाँति ।
युगल प्रेम रस मगन जे, तेई अपनी पाँति ॥37॥
बहुत भाँति के मत जहाँ, तिनहिं न समुझौ संग ।
नव किशोरता माधुरी, बिना न अपनौ रंग ॥38॥
सोरठा
देखौ प्रेम बिलास, वृन्दावन घन कुंज मै ।
जिनकै यहै उपास, ऐसौ सङ्ग जु कीजियै ॥39॥
दोहा
नव किसोर सुकुँवार तन, रंगे प्रेम के रंग ।
जिनकै हिय में बसत ध्रुव, तिन सों करि ध्रुव संग ॥40॥
कठिन है रसिक अनन्यता, रहत न मन इक ठौर ।
राई के सम चलत ही, होत और की और ॥41॥
भजन न होई संग बिनु, भजन बिना नहिं प्रेम ।
छिनहूँ भजन न छाँडिये, धरिये ध्रुव ये नेम ॥42॥
महा मधुर रस प्रेम कौ, जिनकै लाग्यौ रंग ।
ऐसे रसिक अनन्य जे, कीजै तिनकौ संग ॥43॥
और भाव जिनकै नहीं, युगल विहार उपास ।
सुनि ध्रुव मन-वच-कर्म कै, ह्वै रहू तिनकौ दास ॥44॥
धर्मी ऐसौ चाहिये, जैसैं सूर रन माहिं ।
खंड खंड ह्वै जाइ तन, फिरि कै चितवत नाहिं ॥45॥
कबहूँ तौ थोरौ भजन, कबहूँ होत विशाल ।
मन कौ धीरज छुटै नहिं, गहै न दूजी चाल ॥46॥
कहा अचार अपरस कहा, कहा संजम व्रत नेम ।
कहा भजन विधि सौं विंध्यौ, जो नहिं परस्यौ प्रेम ॥47॥
भजन न करै निमित्त लै, परै सहज रस ढार ।
जैसे रोकी रुकत नहिं, प्रबल नदी की धार ॥48॥
भक्त न ऐसौ चाहिये, मन धीरज छुटि जाइ ।
सुख पाये फूलै अधिक, दुख पाये विललाइ ॥49॥
रहै धीर रस भजन में, व्यापै नहिं कछु और ।
होत पवन झकझोर बहु, गिरि नहिं छाड़ै ठौर ॥50॥
सूर सोइ रन भूमि कौं, तजै न जब लगि प्रान ।
भजनी ऐसौ चाहिये, उर नहिं आनै आन ॥51॥
महा मधुर रस प्रेम बिनु, परसै नहिं कछु और ।
ऐसे रसिक अनन्य जे, तेई मम सिरमौर ॥52॥
कहा न होइ सतसंग तें, देखौ तिल अरु तेल ।
मोल तोल सब फिरि गयौ, पायौ नाम फुलेल ॥53॥
और धरम साधन भजन, फीके बिनु अनुराग ।
जैसे बागौ बनत नहिं, जो न होइ सिर पाग ॥54॥
प्रेम बिना जो कछु करै, सो नहिं लागत नीक ।
विविध भाँति व्यंजन करौ, लौन बिना सब फीक ॥55॥
नवल किशोरी कुँवरि की, सहजहि ऐसी बानि ।
ताकौ संग न छाँड़हीं, नैकु सरन गहै आनि ॥56॥
प्रीतम हू कें प्रण यहै, प्रीति के बस ह्वै जाहिं ।
कोटि धर्म किन करौ कोऊ, तिन तन चितवत नाहिं ॥57॥
एक प्रान मन दोइ तन, अँखियनि की-सी प्रीति ।
यद्यपि न्यारी रहत हैं, देखति एकहि रीति ॥58॥
बाहाँ जोरी चलत दोऊ, रसिक लाड़िती लाल ।
देखौ ऐसी भाँति छबि, चितवनि नैन विशाल ॥59॥
औगुन करै समुद्र सम, गनत न अपनौ जान ।
राई के सम भजन कौं, मानत मेरु समान ॥60॥
ऐसे प्रभु त्रैलोक मनि, जिन न भजे चितलाइ ।
पशु पंछी ताकौं सबै, मानत अपनौ राइ ॥61॥
तिय सुत नाती नातिनी, तिनहीं तन चित दीय ।
श्री राधावल्लभलाल जू, नेकु न आने हीय ॥62॥
परयौ विषै के स्वाद में, ऐसौ रह्यौ लुभाई ।
तिहिं रस में वय बीति गई. गह्यौ काल तब आइ ॥63॥
अद्भुत युगल बिहार कौ, जिनके हिये विचार ।
सुनि ध्रुव तिनकी चरण रज, लै लै सिर पर धार ॥64॥
मन शिक्षा के कहे 'ध्रुव' दोहा साठ अरु चारि ।
जुगल चरन अरविंद रस, पलु पलु प्रतिहिं सँभारि ॥65॥
मन शिक्षा के सुनत ही, ढरयौ न नैननि नीर ।
पाठ भजन सब यौं भयौ, जैसे पढत है कीर ॥66॥
॥ जै जै श्री मन शिक्षा लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश ॥
दोहा
रे मन श्री हित हरिवंश भजु, जो चाहत विश्राम ।
जिहिं रस बस व्रज सुंदरिन, छाँड़ि दिये सुख-धाम ॥1॥
निगम नीर मिलि एक भयौ, भजन- दूध सम सेत ।
श्री हरिवंश हंस न्यारौ कियौ, प्रकट जगत के हेत ॥2॥
एक सोच मन में रह्यौ, अरु आवत जिय लाज ।
अद्भुत मानुष देह धरि, कियौ न कछुवै काज ॥3॥
रे मन चंचल तजि विषै, ढरौ भजन की ओर ।
छाँड़ि कुमति अब सुमति गहि, भजि लै नवल किशोर ॥4॥
अब लगि मन कीन्हौ सोई, जो जो कह्यौ तैं मोहि ।
अब तू मेरौ कह्यौ करि, युगल चरन छबि जोहि ॥5॥
मन गज तजि कै विषै मग, चलहु भजन रस माहिं ।
श्री राधावल्लभ लाल बिनु, तेरौ कोऊ नाहिं ॥6॥
रे मन अरु अब छाँडि कै, जो अटकै इक ठौर ।
वृन्दावन घन कुंज में, जहाँ रसिक शिरमौर ॥7॥
रे मन अलि सुनि छुवै जिन, विषय सुमन शठ मंद ।
युगल चरन अरविंद कौ, करहि पान मकरंद ॥8॥
मन पंछी अब परैहि जिन, जगत मोह के जाल ।
तब तोकौं ह्वै है कठिन, बढ़िहै दुःख विशाल ॥9॥
विषै चुगा जिन चुगै मन, चुगत कछुक सुख होइ ।
फिरि फाँसी ऐसी परै, तिहिं सम दुःख न कोइ ॥10॥
रे मन कबहुँ जाइ जिन, भूलि विषै मन रंग ।
मनमथ ठग मारत तहाँ, लिये बहुत ठग संग ॥11॥
जब लगि मन छाँड़त नहीं, सब बातनि कौ लोभ ।
तब लगि हिय उपजति नहीं, युगल प्रेम की गोभ ॥12॥
सब पापनि कौ छत्र यह, लोभ तें मनहिं घटाइ ।
निस्प्रेही संतोष करि, रहै भजन चित लाइ ॥13॥
मन तौ चंचल सबनि तें, कीजै कौन उपाइ ।
साधन को हरि भजन है, कै सतसंग सहाइ ॥14॥
काम-कामना-वासना, मन तें करि सब दूरि ।
श्री राधावल्लभ लाल भजि, रसिकनि जीवन मूरि ॥15॥
रस बल छुटै न जो विषै, सुख नहिं पावै कोई ।
तन छाँडै मन गहि रहै, दूनौ दुख तहँ होइ ॥16॥
रस बल छूटै जौ विषै, तबहिं लहै सुख मूल ।
जैसैं आतप कौ तप्यौ, पावै सरिता कूल ॥17॥
विषै करत वय बीत गई, तृपित भयौ तउ नाहि ।
नैन अछत द्वै दीप धरि, परत कूप तम माहिं ॥18॥
जद्यपि तन जीरन भयौ, छुटी न मन की रीति ।
बिखरि पर्यौ सिमटत नहीं, इन्द्रिन लीन्हौं जीति ॥19॥
परनिंदा के किये ते, आवत नहिं कछु हाथ ।
मूरख पर्वत पाप कौ लै चल्यौ अपने साथ ॥20॥
भक्तनि निंदा अति बुरी, भूलि करौ जिनि कोइ ।
किये सुकृत सब जनम के, छिन में डारत खोइ ॥21॥
मत्सर-क्रोध भर्यौ रहै, अरु सहाइ अभिमान ।
बिनु पावक जरिबौ करै, महा-मूढ अग्यान ॥22॥
अब सुनि भजन की रीति कछु, होइ महादृढ धीर ।
कोऊ थाह न पावही, जहाँ नीर गंभीर ॥23॥
जाकौ जैसौ भाव है, मन में धरि विश्वास ।
कर्म-धर्म अरु लोक कुल, तोरै सब की आस ॥24॥
भक्त आहिं बहु भाँति के, तिनमें बहुतक भेद ।
बिनु विवेक मिलिबौ तहाँ, मन पावै अति खेद ॥25॥
सब ठाँ मिलिबौ एक सौ, ग्यानी की यह रीति ।
भजनी सोइ विवेक सों, करै समुझि कै प्रीति ॥26॥
खान पान तौ कीजिये, रसिक मंडली माहिं ।
जिनिकैं और उपासना, तहाँ उचित ध्रुव नांहि ॥27॥
रसिक रँगे जे युगल रंग, तिनकी जूँठन खाइ ।
जहाँ तहाँ के पावने, भजन तेज घटि जाइ ॥28॥
इष्ट मिलै अरु मन मिलै, मिलै भजन रस रीति ।
मिलिये तहाँ निसंक ह्वै, कीजै तिनसौं प्रीति ॥29॥
युगल प्रेम रस मगन जे, तेई अपनें जानि ।
सब बिधि अंतर खोलि कै, तिनिही सौं रूचि मानि ॥30॥
यह रस परस्यौ नाहिं जिनि, तू जिनि परसै ताहि ।
तासौं नातौ नाहिं कछु, यह रस रुचै न जाहि ॥31॥
संग सोई जाके मिले, भूलै गृह त्यौहार ।
तिहिं छिन आवै हिये में, अद्भुत युगल बिहार ॥32॥
जिनके देखै पुलक तन, रोमांचित ह्वै जाइ ।
सुनत मधुर तिनके बचन, नैंन भरे जल आइ ॥33॥
जिनकौ सहज सुभाव पर्यौ युगल रंग की बात ।
निशि दिन बीतैं भजन में, और न कछू सुहात ॥34॥
ऐसे भक्तनि के मिले, हिय अरु नैंन सिरात ।
मन दै नीकें समुझि कैं, सुनिये तिन की बात ॥35॥
जिनके युगल बिहार की बात चलै दिन रैंन ।
तिनहीं सौं सँग कीजिये, छाँडि और सब गैन ॥36॥
बहुत मिलै सो संग नहिं, न्यारी न्यारी भाँति ।
युगल प्रेम रस मगन जे, तेई अपनी पाँति ॥37॥
बहुत भाँति के मत जहाँ, तिनहिं न समुझौ संग ।
नव किशोरता माधुरी, बिना न अपनौ रंग ॥38॥
सोरठा
देखौ प्रेम बिलास, वृन्दावन घन कुंज मै ।
जिनकै यहै उपास, ऐसौ सङ्ग जु कीजियै ॥39॥
दोहा
नव किसोर सुकुँवार तन, रंगे प्रेम के रंग ।
जिनकै हिय में बसत ध्रुव, तिन सों करि ध्रुव संग ॥40॥
कठिन है रसिक अनन्यता, रहत न मन इक ठौर ।
राई के सम चलत ही, होत और की और ॥41॥
भजन न होई संग बिनु, भजन बिना नहिं प्रेम ।
छिनहूँ भजन न छाँडिये, धरिये ध्रुव ये नेम ॥42॥
महा मधुर रस प्रेम कौ, जिनकै लाग्यौ रंग ।
ऐसे रसिक अनन्य जे, कीजै तिनकौ संग ॥43॥
और भाव जिनकै नहीं, युगल विहार उपास ।
सुनि ध्रुव मन-वच-कर्म कै, ह्वै रहू तिनकौ दास ॥44॥
धर्मी ऐसौ चाहिये, जैसैं सूर रन माहिं ।
खंड खंड ह्वै जाइ तन, फिरि कै चितवत नाहिं ॥45॥
कबहूँ तौ थोरौ भजन, कबहूँ होत विशाल ।
मन कौ धीरज छुटै नहिं, गहै न दूजी चाल ॥46॥
कहा अचार अपरस कहा, कहा संजम व्रत नेम ।
कहा भजन विधि सौं विंध्यौ, जो नहिं परस्यौ प्रेम ॥47॥
भजन न करै निमित्त लै, परै सहज रस ढार ।
जैसे रोकी रुकत नहिं, प्रबल नदी की धार ॥48॥
भक्त न ऐसौ चाहिये, मन धीरज छुटि जाइ ।
सुख पाये फूलै अधिक, दुख पाये विललाइ ॥49॥
रहै धीर रस भजन में, व्यापै नहिं कछु और ।
होत पवन झकझोर बहु, गिरि नहिं छाड़ै ठौर ॥50॥
सूर सोइ रन भूमि कौं, तजै न जब लगि प्रान ।
भजनी ऐसौ चाहिये, उर नहिं आनै आन ॥51॥
महा मधुर रस प्रेम बिनु, परसै नहिं कछु और ।
ऐसे रसिक अनन्य जे, तेई मम सिरमौर ॥52॥
कहा न होइ सतसंग तें, देखौ तिल अरु तेल ।
मोल तोल सब फिरि गयौ, पायौ नाम फुलेल ॥53॥
और धरम साधन भजन, फीके बिनु अनुराग ।
जैसे बागौ बनत नहिं, जो न होइ सिर पाग ॥54॥
प्रेम बिना जो कछु करै, सो नहिं लागत नीक ।
विविध भाँति व्यंजन करौ, लौन बिना सब फीक ॥55॥
नवल किशोरी कुँवरि की, सहजहि ऐसी बानि ।
ताकौ संग न छाँड़हीं, नैकु सरन गहै आनि ॥56॥
प्रीतम हू कें प्रण यहै, प्रीति के बस ह्वै जाहिं ।
कोटि धर्म किन करौ कोऊ, तिन तन चितवत नाहिं ॥57॥
एक प्रान मन दोइ तन, अँखियनि की-सी प्रीति ।
यद्यपि न्यारी रहत हैं, देखति एकहि रीति ॥58॥
बाहाँ जोरी चलत दोऊ, रसिक लाड़िती लाल ।
देखौ ऐसी भाँति छबि, चितवनि नैन विशाल ॥59॥
औगुन करै समुद्र सम, गनत न अपनौ जान ।
राई के सम भजन कौं, मानत मेरु समान ॥60॥
ऐसे प्रभु त्रैलोक मनि, जिन न भजे चितलाइ ।
पशु पंछी ताकौं सबै, मानत अपनौ राइ ॥61॥
तिय सुत नाती नातिनी, तिनहीं तन चित दीय ।
श्री राधावल्लभलाल जू, नेकु न आने हीय ॥62॥
परयौ विषै के स्वाद में, ऐसौ रह्यौ लुभाई ।
तिहिं रस में वय बीति गई. गह्यौ काल तब आइ ॥63॥
अद्भुत युगल बिहार कौ, जिनके हिये विचार ।
सुनि ध्रुव तिनकी चरण रज, लै लै सिर पर धार ॥64॥
मन शिक्षा के कहे 'ध्रुव' दोहा साठ अरु चारि ।
जुगल चरन अरविंद रस, पलु पलु प्रतिहिं सँभारि ॥65॥
मन शिक्षा के सुनत ही, ढरयौ न नैननि नीर ।
पाठ भजन सब यौं भयौ, जैसे पढत है कीर ॥66॥
॥ जै जै श्री मन शिक्षा लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश ॥
4. श्री वृंदावन शत लीला
दोहा
प्रथम नाम हरिवंश हित, रटि रसना दिन रैन ।
प्रीति रीति तब पाइये, अरु वृन्दावन ऐन ।।1।।
चरन शरन हरिवंश की, जब लगि आयौ नाहिं ।
नवनिकुंज निजु माधुरी, क्यौं परसै मन माहिं ।।2।।
वृन्दावन सत करन कौं, कीन्हौं मन उत्साह ।
नवल राधिका कृपा बिनु, कैसैं होत निबाह ।।3।।
यह आशा धरि चित्त में, कहत यथा-मति मोर ।
वृन्दावन सुख रंग कौ, काहु न पायौ ओर ।।4।।
दुर्लभ दुर्घट सबनि तैं, वृन्दावन निजु भौन ।
नवल राधिका कृपा बिनु, कहि धौं पावै कौन ।।5।।
सबें अंग गुनहीन हों, ताकौ जतन न कोइ ।
एक किशोरी कृपा तें, जो कछु होइ सु होइ ।।6।।
सोऊ कृपा अति सुगम नहिं, ताकौ कौन उपाव ।
चरन शरन हरिवंश की, सहजहिं बन्यौ बनाव ।।7।।
हरिवंश चरन उर धरनि धरि, मन वच कै विश्वास ।
कुँवरि कृपा ह्वै है तबहिं, अरु वृन्दावन वास ।।8।।
प्रिया चरन बल जांनि कें, बाढ़्यौ हियैं हुलास ।
तेई उर में आनि हैं, वृन्दाविपिन प्रकास ।।9।।
कुँवरि किशोरी लाड़िली, करुणानिधि सुकुवारि ।
बरनौ वृन्दाविपिन कौं, तिनके चरन सँभारि ।।10।।
हेममयी अवनी सहज, रतन खचित बहु रंग ।
चित्रित चित्र विचित्र गति, छबि की उठति तरंग ।।11।।
वृन्दावन झलकनि झमक, फूले नेंन निहारि ।
रवि शशि दुतिधर जहाँ लगि, ते सब डारे वारि ।।12।।
वृन्दावन दुति पत्र की, उपमा कौं कछु नांहिं ।
कोटि-कोटि बैकुण्ठ हू, तेहिं सम कहे न जाहिं ।।13।।
लता-लता सब कल्पतरु, पारिजात सब फूल ।
सहज एक रस रहत हैं, झलकत यमुना कूल ।।14।।
कुंज-कुंज अति प्रेम सौं, कोटि-कोटि रति मैन ।
दिनहिं संवारत रहत हैं, श्री वृन्दावन ऐंन ।।15।।
विपिन राज राजत दिनहिं, बरसत आनंद पुंज ।
लुब्ध सुगन्ध पराग रस, मधुप करत मधु गुंज ।।16।।
अरुन नील सित कमल कुल, रहे फूलि बहुरंग ।
वृन्दावन पहिरैं मनौं बहुविधि बसन सुरंग ।।17।।
हित सौं त्रिविधि समीर बहै, जैसी रुचि जिहिं काल ।
मधुर-मधुर कल कोकिला, कूजत मोर मराल ।।18।।
मण्डित यमुना वारि यौं, राजति परम रसाल ।
अति सुदेस सोभित मनौं, नील मनिन की माल ।।19।।
विपिन धाम आनंद कौ, चतुरई चित्रित ताहि ।
मदन केलि सम्पति सदा, तेहि करि पूरन आहि ।।20।।
देवी वृंदा-विपिन की, वृंदा सखी सरूप ।
जेहि विधि रुचि होइ दुहुँनि की, तेहिं विधि करति अनूप ।।21।।
छिन-छिन बन की छबि नई, नवल युगल के हेत ।
समुझि बात सब जीय की, सखि वृंदा सुख देत ।।22।।
गावत वृंदा-विपिन गुन, नवल लाड़िली-लाल ।
सुखद लता फल फूल द्रुम, अद्भुत परम रसाल ।।23।।
उपमा वृंदा विपिन की, कहि धौं दीजै काहि ।
अति अभूत अद्भुत सरस, श्रीमुख बरनत ताहि ।।24।।
आदि अंत जाकौ नहीं, नित्य सुखद बन आहि ।
माया त्रिगुन प्रपंच की, पवन न परसत ताहि ।।25।।
वृंदा विपिन सुहावनौं, रहत एक रस नित्त ।
प्रेम सुरंग रंगै तहाँ, एक प्रान द्वै मित्त ।।26।।
अति सरूप सुकुँमार तन, नव किशोर सुखरासि ।
हरत प्रान सब सखिनि के, करत मंद मृदु हासि ।।27।।
न्यारौ है सब लोक तें, वृन्दावन निज गेह ।
खेलत लाड़िली लाल जहँ भींजे सरस सनेह ।।28।।
गौर-श्याम तन मन रंगे, प्रेम स्वाद रस सार ।
निकसत नहिं तिहिं ऐन तें, अटके सरस विहार ।।29।।
बन है बाग सुहाग कौ, राख्यौ रस में पागि ।
रूप रंग के फूल दो, प्रीति लता रहे लागि ।।30।।
मदन सुधा के रस भरे, फूलि रहे दिन रैन ।
चहुँदिशि भ्रमत न तजत छिन, भृंग सखिनि के नैंन ।।31।।
कानन में रहै झलकि कैं, आनन विवि विधु काँति ।
सहज चकोरी सखिनि की, अखियाँ निरखि सिराँति ।।32।।
ऐसे रस में दिन मगन, नहिं जानत निशि भोर ।
वृन्दावन में प्रेम की, नदी बहै चहुँ ओर ।।33।।
महिमा वृन्दाविपिन की, कैसैं कै कहि जाइ ।
ऐसे रसिक किशोर दोऊ, जामें रहे लुभाइ ।।34।।
विपिन अलौकिक लोक में, अति अभूत रसकंद ।
नव किशोर इक वैस द्रुम, फूले रहत स्वछंद ।।35।।
पत्र-फूल-फल-लता प्रति, रहत रसिक पिय चाहि ।
नवल कुँवरि दृग छटा जल, तिहि करि सींचे आहि ।।36।।
कुँवरि चरन अंकित धरनि, देखत जेहि-जेहि ठौर ।
प्रिया चरन रज जांनि कैं, लुठत रसिक सिरमौर ।।37।।
वृन्दावन प्यारौ अधिक, यातें प्रेम अपार ।
जामें खेलति लाड़िली, सर्वसु प्रान अधार ।।38।।
सबै सखी सब सौंज लै, रँगी युगल ध्रुव रंग ।
समै-समै की जानि रुचि, लियै रहति हैं संग ।।39।।
वृन्दावन वैभव जितौ, तितौ कह्यौ नहिं जात ।
देखत संपति विपिन की, कमला हू ललचात ।।40।।
वृन्दावन की लता सम, कोटि कल्पतरु नाहिं ।
रज की तुल बैकुंठ नहिं, और लोक किहिं माहिं ।।41।।
श्रीपति श्रीमुख सौ कह्यौं, नारद सौं समुझाइ ।
वृन्दावन रस सबनि तें, राख्यौ दूरि दुराइ ।।42।।
अंशकला अवतार जे, ते सेवत हैं ताहि ।
ऐसे वृन्दाविपिन कौं, मन-वच कै अवगाहि ।।43।।
शिव बिधि उद्धव सबनि के, यह आसा है चित्त ।
गुल्म लता ह्वै सिर धरैं, वृन्दावन रज नित्त ।।44।।
चतुरानन देख्यौ कछुक, वृन्दाविपिन प्रभाव ।
द्रुम-द्रुम प्रति अरु लता प्रति, औरै बन्यौ बनाव ।।45।।
आप सहित सब पचुर्भुज, सब ठाँ रह्यौ निहारि ।
प्रभुता अपनी भूलि गयौ, तन मन कै रह्यौ हारि ।।46।।
लोक चतुर्दश ठकुरई, संपत्ति सकल समेत ।
सब तजि बसि वृन्दाविपिन, रसिकन कौ रस खेत ।।47।।
सकहि तौ वृन्दाविपिन बसि, छिन-छिन आयु बिहात ।
ऐसौ समै न पाइये, भली बनी है बात ।।48।।
छाँड़ि स्वाद सुख देह के और जगत की लाज ।
मनहिं मारि तन हारि कै, वृन्दावन में गाज ।।49।।
वृन्दावन के बसत ही, अंतर जो करै आनि ।
तिहि सम शत्रु न और कोऊ, मन वच कै यह जानि ।।50।।
वृन्दावन के वास कौ, जिनकैं नाहिं हुलास ।
माता मित्र सुतादि तीय, तजि ध्रुव तिनकौ पास ।।51।।
और देश के बसत ही, अधिक भजन जों होइ ।
इहि सम नहिं पूजत तऊ, वृन्दावन रहै सोइ ।।52।।
वृन्दावन में जो कबहुँ, भजन कछू नहिं होय ।
रज तौ उड़ि लागै तनहिं, पीवै यमुना तोय ।।53।।
वृन्दाविपिन प्रभाव सुनि, अपनौ ही गुन देत ।
जैसैं बालक मलिन कौं, मातु गोद भरि लेत ।।54।।
और ठौर जो जतन करै, होत भजन तऊ नाहिं ।
ह्याँ फिरै स्वारथ आपनैं, भजन गहैं फिरै बाँहिं ।।55।।
और देश के बसत ही, घटत भजन की बात ।
वृन्दावन में स्वारथौ, उलटि भजन ह्वै जात ।।56।।
यद्यपि सब औगुन भर्यौ, तदपि करत तुव ईठ ।
हितमय वृन्दाविपिन कौं, कैसैं दीजै पीठ ।।57।।
वृन्दावन तें अनत ही, जेतिक द्यौस विहात ।
ते दिन लेखे जिनि लिखौ, वृथा अकारथ जात ।।58।।
भजन रसमयी विपिन घर, समुझि बसै जो कोइ ।
प्रेम-बीज तिहिं खेत तें, तब ही अंकुर होइ ।।59।।
यद्यपि धावत विषै कौं, भजन गहत बिच पानि ।
ऐसे वृंदाविपिन की, सरन गही ध्रुव आनि ।।60।।
बसिबौ वृदाविपिन कौ, जिहिं तिहिं विधि दृढ़ होइ ।
नहिं चूकै ऐसौ समौ, जतन कीजियै सोइ ।।61।।
कहँ तू कहँ वृदाविपिन, आनि बन्यौ भल बान ।
यहै बात जिय समुझि कै, अपनौ छाँड़ि सयान ।।62।।
छिन भंगुर तन जात है, छाँड़हि विषै अलोल ।
कौड़ी बदले लेहिं तू, अद्भुत रतन अमोल ।।63।।
कोटि-कोटि हीरा रतन, अरू मनि विविध अनेक ।
मिथ्या लालच छाँड़ि कै, गहि वृन्दावन एक ।।64।।
नहिं सो माता पिता नहिं, मित्र पुत्र कोऊ नाहिं ।
इनमें जो अंतर करै, बसत वृन्दावन माँहि ।।65।।
नाते जेते जगत के, ते सब मिथ्या मानि ।
सत्य नित्य आनंदमय, वृन्दावन पहिचानि ।।66।।
बसि कै वृंदाविपिन में, ऐसी मन में राख ।
प्रान तजौं बन ना तजौं, कहौ बात कोऊ लाख ।।67।।
चलत फिरत सुनियत यहै, (श्री) राधावल्लभ लाल ।
ऐसे वृन्दाविपिन में, बसत रहौ सब काल ।।68।।
बसिबौं वृंदाविपिन कौ, यह मन में धरि लेहु ।
कीजै ऐसौ नैंम दृढ़, या रज में परै देहु ।।69।।
खंड-खंड ह्वै जाइ तन, अंग-अंग सत टूक ।
वृन्दावन नहिं छाँड़िये, छाँड़िबौ है बड़ि चूक ।।70।।
पटतर वृंदाविपिन की, कहि धौं दीजै काहि ।
जेहि वन की ध्रुव रैंनु में, मरिबौउ मंगल आहि ।।71।।
वृन्दावन के गुननि सुनि, हित सौं रज में लोटि ।
जेहि सुख कौं पूजत नहीं, मुक्ति आदि सत कोटि ।।72।।
सुरपति-पशुपति प्रजापति, रहे भूलि तेहिं ठौर ।
वृन्दावन वैभव कहौ, कौन जानि है और ।।73।।
यद्यपि राजत अवनि पर, सब तें ऊँचै आहि ।
ताकी सम कहियै कहा, श्रीपति बंदत ताहि ।।74।।
वृन्दावन वृंदाविपिन, वृंदा-कानन ऐन ।
छिन-छिन रसना रट्यौ करि, वृन्दावन सुख दैन ।।75।।
वृन्दावन आनंद-घन, तो तन नश्वर आहि ।
पशु ज्यौं खोवत विषै रस, काहि न चिंतत ताहि ।।76।।
वृन्दावन वृंदा कहत, दुरित वृंद दुरि जाहिं ।
नेह बेलि रस भजन की, तब उपजै मन माहिं ।।77।।
वृन्दावन श्रवननि सुनहिं, वृन्दावन कौ गान ।
मन बच कै अति हेत सौं, वृंदावन उर आन ।।78।।
वृन्दावन कौ नाम रटि, वृन्दावन कौं देखि ।
वृन्दावन सौं प्रीति करि, वृन्दावन उर लेखि ।।79।।
वृंदाविपिन प्रनाम करि, वृन्दावन सुख खानि ।
जो चाहत विश्राम ध्रुव, वृन्दावन पहिचानि ।।80।।
तजि कैं वृंदाविपिन कौं, और तीर्थ जे जात ।
छाँड़ि विमल चिंतामणी, कौड़ी कौं ललचात ।।81।।
पाइ रतन चीन्ह्यौ नहीं, दीन्हौं कर तैं डारि ।
यह माया श्री कृष्ण की, मोह्यौ सब संसार ।।82।।
प्रगट जगत में जगमगै, वृंदाविपिन अनूप ।
नैन अछत दीसत नहीं, यह माया कौ रूप ।।83।।
वृन्दावन कौ जस अमल, जिहि पुरान में नाहिं ।
ताकी बानी परौ जिनि, कबहूँ श्रवननि माँहि ।।84।।
वृन्दावन कौ जस सुनत, जिनकैं नाहिं हुलास ।
तिनकौ परस न कीजिये, तजि ध्रुव तिनकौ पास ।।85।।
भुवन चतुर्दश आदि दै, ह्वै है सब कौ नास ।
इकछत वृंदाविपिन घन, सुख कौ सहज निवास ।।86।।
वृंदावन इहि विधि बसै, तजि कैं सब अभिमान ।
तृण तैं नीचै आपकौं, जानै सोई जान ।।87।।
कोमल चित सब सौं मिलै, कबहुँ कठोर न होइ ।
निस्प्रेही निरवैरता, ताकौ शत्रु न कोइ ।।88।।
दूजै तीजै जो जुरै, साक-पत्र कछु आय ।
ताही सौं संतोष करि, रहै अधिक सुख पाय ।।89।।
देह स्वाद छुटि जाहिं सब, कछु होइ छीन शरीर ।
प्रेम रंग उर में बढ़ै, बिहरै जमुना तीर ।।90।।
युगल रूप की झलक उर, झलकै नैननि बारि ।
ऐसे सुख के रंग में, राखै मनहि रँगाइ ।।91।।
आवै छबि की झलक उर, झलकै नैननि बारि ।
चिंतत स्यामल-गौर तन, सकहि न तनहिं सँभारि ।।92।।
जीरन पट अति दीन लट, हिये सरस अनुराग ।
विबस सघन वन में फिरै, गावत युगल सुहाग ।।93।।
रसमय देखत फिरै बन, नैननि बन रहै आइ ।
कहुँ-कहुँ आनँद रंग भरि, परै धरनि थहराइ ।।94।।
ऐसी गति ह्वै है कबहुँ, मुख निसरत नहिं बैन ।
देखि-देखि वृंदाविपिन, भरि-भरि ढारै नैन ।।95।।
वृन्दावन तरु-तरु तरे, ढरै नैन सुख नीर ।
चिंतत फिरै आवेस बस, स्यामल-गौर सरीर ।।96।।
परम सच्चिदानंद घन, वृंदाविपिन सुदेश ।
जामें कबहूं होत नहिं, माया काल प्रवेश ।।97।।
शारद जो सत कोटि मिलि, कलपन करैं विचार ।
वृन्दावन सुख रंग कौ, कबहुँ न पावैं पार ।।98।।
वृन्दावन आनंद घन, सब तें उत्तम आहि ।
मो ते नीच न और कोऊ, कैसे पैहों ताहि ।।99।।
इत बौना आकाश फल, चाहत है मन माहिं ।
ताकौ एक कृपा बिना, और जतन कछु नाहिं ।।100।।
कुँवरि किशोरी नाम सौं, उपज्यौ दृढ़ विस्वास ।
करुनानिधि मृदु चित्त अति, तातैं बढ़ी जिय आस ।।101।।
जिनकौ वृन्दाविपिन है, कृपा तिनहिं की होइ ।
वृन्दावन में तबहि तौ, रहन पाइ है सोइ ।।102।।
वृन्दावन सत रतन की, माला गुही बनाइ ।
भाल भाग जाके लिखी, सोई पहिरै आइ ।।103।।
वृन्दावन सुख रंग की, आशा जो चित होइ ।
निशि दिन कंठ धरे रहै, छिन नहिं टारै सोइ ।।104।।
वृन्दावन सत जो कहै, सुनि है नीकी भाँति ।
निसि दिन तिहिं उर जगमगै, वृन्दावन की काँति ।।105।।
वृन्दावन कौ चिंतबन, यहै दीप उर बारि ।
कोटि जन्म के तम अघहिं, काटि करै उजियारि ।।106।।
बसि कै वृंदाविपिन में, इतनौ बड़ौ सयान ।
युगल चरण के भजन बिन, निमिष न दीजै जान ।।107।।
सहज विराजत एक रस, वृन्दावन निज धाम ।
ललितादिक सखियन सहित, क्रीड़त श्यामा श्याम ।।108।।
प्रेम सिंधु वृंदाविपिन, जाकौ अन्त न आदि ।
जहाँ कलोलत रहत नित, युगल किशोर अनादि ।।109।।
न्यारो चौदह लोक तें, वृन्दावन निजु भौन ।
तहाँ न कबहुँ लगत है, महाप्रलय की पौन ।।110।।
महिमा वृंदाविपिन की, कहि न सकत मम जीह ।
जाके रसना द्वै सहस, तिन हूँ काढ़ी लीह ।।111।।
एती मति मोपै कहाँ, शौभा निधि वनराज ।
ढीठौ कै कछु कहत हौं, आवत नहिं जिय लाज ।।112।।
मति प्रमान चाहत कह्यौ,सोऊ कहत लजात ।
सिन्धु अगम जेहिं पार नहिं, कैसैं सीप समात ।।113।।
या मन के अबलंब हित, कीन्हौ आहि उपाय ।
वृन्दावन रस कहन में, मति कबहूँ उरझाय ।।114।।
सोलह सै ध्रुव छ्यासिया, पून्यौ अगहन मास ।
यह प्रबन्ध पूरन भयौ, सुनत होत अघ नास ।।115।।
वृंदाविपिन के, इकसत षोड़स आहि ।
जो चाहत रस रीति फल, छिन-छिन ध्रुव अवगाहि ।।116।।
॥ जै जै श्री वृंदावनशत लीला की जैजै श्रीहित हरिवंश ॥
दोहा
प्रथम नाम हरिवंश हित, रटि रसना दिन रैन ।
प्रीति रीति तब पाइये, अरु वृन्दावन ऐन ।।1।।
चरन शरन हरिवंश की, जब लगि आयौ नाहिं ।
नवनिकुंज निजु माधुरी, क्यौं परसै मन माहिं ।।2।।
वृन्दावन सत करन कौं, कीन्हौं मन उत्साह ।
नवल राधिका कृपा बिनु, कैसैं होत निबाह ।।3।।
यह आशा धरि चित्त में, कहत यथा-मति मोर ।
वृन्दावन सुख रंग कौ, काहु न पायौ ओर ।।4।।
दुर्लभ दुर्घट सबनि तैं, वृन्दावन निजु भौन ।
नवल राधिका कृपा बिनु, कहि धौं पावै कौन ।।5।।
सबें अंग गुनहीन हों, ताकौ जतन न कोइ ।
एक किशोरी कृपा तें, जो कछु होइ सु होइ ।।6।।
सोऊ कृपा अति सुगम नहिं, ताकौ कौन उपाव ।
चरन शरन हरिवंश की, सहजहिं बन्यौ बनाव ।।7।।
हरिवंश चरन उर धरनि धरि, मन वच कै विश्वास ।
कुँवरि कृपा ह्वै है तबहिं, अरु वृन्दावन वास ।।8।।
प्रिया चरन बल जांनि कें, बाढ़्यौ हियैं हुलास ।
तेई उर में आनि हैं, वृन्दाविपिन प्रकास ।।9।।
कुँवरि किशोरी लाड़िली, करुणानिधि सुकुवारि ।
बरनौ वृन्दाविपिन कौं, तिनके चरन सँभारि ।।10।।
हेममयी अवनी सहज, रतन खचित बहु रंग ।
चित्रित चित्र विचित्र गति, छबि की उठति तरंग ।।11।।
वृन्दावन झलकनि झमक, फूले नेंन निहारि ।
रवि शशि दुतिधर जहाँ लगि, ते सब डारे वारि ।।12।।
वृन्दावन दुति पत्र की, उपमा कौं कछु नांहिं ।
कोटि-कोटि बैकुण्ठ हू, तेहिं सम कहे न जाहिं ।।13।।
लता-लता सब कल्पतरु, पारिजात सब फूल ।
सहज एक रस रहत हैं, झलकत यमुना कूल ।।14।।
कुंज-कुंज अति प्रेम सौं, कोटि-कोटि रति मैन ।
दिनहिं संवारत रहत हैं, श्री वृन्दावन ऐंन ।।15।।
विपिन राज राजत दिनहिं, बरसत आनंद पुंज ।
लुब्ध सुगन्ध पराग रस, मधुप करत मधु गुंज ।।16।।
अरुन नील सित कमल कुल, रहे फूलि बहुरंग ।
वृन्दावन पहिरैं मनौं बहुविधि बसन सुरंग ।।17।।
हित सौं त्रिविधि समीर बहै, जैसी रुचि जिहिं काल ।
मधुर-मधुर कल कोकिला, कूजत मोर मराल ।।18।।
मण्डित यमुना वारि यौं, राजति परम रसाल ।
अति सुदेस सोभित मनौं, नील मनिन की माल ।।19।।
विपिन धाम आनंद कौ, चतुरई चित्रित ताहि ।
मदन केलि सम्पति सदा, तेहि करि पूरन आहि ।।20।।
देवी वृंदा-विपिन की, वृंदा सखी सरूप ।
जेहि विधि रुचि होइ दुहुँनि की, तेहिं विधि करति अनूप ।।21।।
छिन-छिन बन की छबि नई, नवल युगल के हेत ।
समुझि बात सब जीय की, सखि वृंदा सुख देत ।।22।।
गावत वृंदा-विपिन गुन, नवल लाड़िली-लाल ।
सुखद लता फल फूल द्रुम, अद्भुत परम रसाल ।।23।।
उपमा वृंदा विपिन की, कहि धौं दीजै काहि ।
अति अभूत अद्भुत सरस, श्रीमुख बरनत ताहि ।।24।।
आदि अंत जाकौ नहीं, नित्य सुखद बन आहि ।
माया त्रिगुन प्रपंच की, पवन न परसत ताहि ।।25।।
वृंदा विपिन सुहावनौं, रहत एक रस नित्त ।
प्रेम सुरंग रंगै तहाँ, एक प्रान द्वै मित्त ।।26।।
अति सरूप सुकुँमार तन, नव किशोर सुखरासि ।
हरत प्रान सब सखिनि के, करत मंद मृदु हासि ।।27।।
न्यारौ है सब लोक तें, वृन्दावन निज गेह ।
खेलत लाड़िली लाल जहँ भींजे सरस सनेह ।।28।।
गौर-श्याम तन मन रंगे, प्रेम स्वाद रस सार ।
निकसत नहिं तिहिं ऐन तें, अटके सरस विहार ।।29।।
बन है बाग सुहाग कौ, राख्यौ रस में पागि ।
रूप रंग के फूल दो, प्रीति लता रहे लागि ।।30।।
मदन सुधा के रस भरे, फूलि रहे दिन रैन ।
चहुँदिशि भ्रमत न तजत छिन, भृंग सखिनि के नैंन ।।31।।
कानन में रहै झलकि कैं, आनन विवि विधु काँति ।
सहज चकोरी सखिनि की, अखियाँ निरखि सिराँति ।।32।।
ऐसे रस में दिन मगन, नहिं जानत निशि भोर ।
वृन्दावन में प्रेम की, नदी बहै चहुँ ओर ।।33।।
महिमा वृन्दाविपिन की, कैसैं कै कहि जाइ ।
ऐसे रसिक किशोर दोऊ, जामें रहे लुभाइ ।।34।।
विपिन अलौकिक लोक में, अति अभूत रसकंद ।
नव किशोर इक वैस द्रुम, फूले रहत स्वछंद ।।35।।
पत्र-फूल-फल-लता प्रति, रहत रसिक पिय चाहि ।
नवल कुँवरि दृग छटा जल, तिहि करि सींचे आहि ।।36।।
कुँवरि चरन अंकित धरनि, देखत जेहि-जेहि ठौर ।
प्रिया चरन रज जांनि कैं, लुठत रसिक सिरमौर ।।37।।
वृन्दावन प्यारौ अधिक, यातें प्रेम अपार ।
जामें खेलति लाड़िली, सर्वसु प्रान अधार ।।38।।
सबै सखी सब सौंज लै, रँगी युगल ध्रुव रंग ।
समै-समै की जानि रुचि, लियै रहति हैं संग ।।39।।
वृन्दावन वैभव जितौ, तितौ कह्यौ नहिं जात ।
देखत संपति विपिन की, कमला हू ललचात ।।40।।
वृन्दावन की लता सम, कोटि कल्पतरु नाहिं ।
रज की तुल बैकुंठ नहिं, और लोक किहिं माहिं ।।41।।
श्रीपति श्रीमुख सौ कह्यौं, नारद सौं समुझाइ ।
वृन्दावन रस सबनि तें, राख्यौ दूरि दुराइ ।।42।।
अंशकला अवतार जे, ते सेवत हैं ताहि ।
ऐसे वृन्दाविपिन कौं, मन-वच कै अवगाहि ।।43।।
शिव बिधि उद्धव सबनि के, यह आसा है चित्त ।
गुल्म लता ह्वै सिर धरैं, वृन्दावन रज नित्त ।।44।।
चतुरानन देख्यौ कछुक, वृन्दाविपिन प्रभाव ।
द्रुम-द्रुम प्रति अरु लता प्रति, औरै बन्यौ बनाव ।।45।।
आप सहित सब पचुर्भुज, सब ठाँ रह्यौ निहारि ।
प्रभुता अपनी भूलि गयौ, तन मन कै रह्यौ हारि ।।46।।
लोक चतुर्दश ठकुरई, संपत्ति सकल समेत ।
सब तजि बसि वृन्दाविपिन, रसिकन कौ रस खेत ।।47।।
सकहि तौ वृन्दाविपिन बसि, छिन-छिन आयु बिहात ।
ऐसौ समै न पाइये, भली बनी है बात ।।48।।
छाँड़ि स्वाद सुख देह के और जगत की लाज ।
मनहिं मारि तन हारि कै, वृन्दावन में गाज ।।49।।
वृन्दावन के बसत ही, अंतर जो करै आनि ।
तिहि सम शत्रु न और कोऊ, मन वच कै यह जानि ।।50।।
वृन्दावन के वास कौ, जिनकैं नाहिं हुलास ।
माता मित्र सुतादि तीय, तजि ध्रुव तिनकौ पास ।।51।।
और देश के बसत ही, अधिक भजन जों होइ ।
इहि सम नहिं पूजत तऊ, वृन्दावन रहै सोइ ।।52।।
वृन्दावन में जो कबहुँ, भजन कछू नहिं होय ।
रज तौ उड़ि लागै तनहिं, पीवै यमुना तोय ।।53।।
वृन्दाविपिन प्रभाव सुनि, अपनौ ही गुन देत ।
जैसैं बालक मलिन कौं, मातु गोद भरि लेत ।।54।।
और ठौर जो जतन करै, होत भजन तऊ नाहिं ।
ह्याँ फिरै स्वारथ आपनैं, भजन गहैं फिरै बाँहिं ।।55।।
और देश के बसत ही, घटत भजन की बात ।
वृन्दावन में स्वारथौ, उलटि भजन ह्वै जात ।।56।।
यद्यपि सब औगुन भर्यौ, तदपि करत तुव ईठ ।
हितमय वृन्दाविपिन कौं, कैसैं दीजै पीठ ।।57।।
वृन्दावन तें अनत ही, जेतिक द्यौस विहात ।
ते दिन लेखे जिनि लिखौ, वृथा अकारथ जात ।।58।।
भजन रसमयी विपिन घर, समुझि बसै जो कोइ ।
प्रेम-बीज तिहिं खेत तें, तब ही अंकुर होइ ।।59।।
यद्यपि धावत विषै कौं, भजन गहत बिच पानि ।
ऐसे वृंदाविपिन की, सरन गही ध्रुव आनि ।।60।।
बसिबौ वृदाविपिन कौ, जिहिं तिहिं विधि दृढ़ होइ ।
नहिं चूकै ऐसौ समौ, जतन कीजियै सोइ ।।61।।
कहँ तू कहँ वृदाविपिन, आनि बन्यौ भल बान ।
यहै बात जिय समुझि कै, अपनौ छाँड़ि सयान ।।62।।
छिन भंगुर तन जात है, छाँड़हि विषै अलोल ।
कौड़ी बदले लेहिं तू, अद्भुत रतन अमोल ।।63।।
कोटि-कोटि हीरा रतन, अरू मनि विविध अनेक ।
मिथ्या लालच छाँड़ि कै, गहि वृन्दावन एक ।।64।।
नहिं सो माता पिता नहिं, मित्र पुत्र कोऊ नाहिं ।
इनमें जो अंतर करै, बसत वृन्दावन माँहि ।।65।।
नाते जेते जगत के, ते सब मिथ्या मानि ।
सत्य नित्य आनंदमय, वृन्दावन पहिचानि ।।66।।
बसि कै वृंदाविपिन में, ऐसी मन में राख ।
प्रान तजौं बन ना तजौं, कहौ बात कोऊ लाख ।।67।।
चलत फिरत सुनियत यहै, (श्री) राधावल्लभ लाल ।
ऐसे वृन्दाविपिन में, बसत रहौ सब काल ।।68।।
बसिबौं वृंदाविपिन कौ, यह मन में धरि लेहु ।
कीजै ऐसौ नैंम दृढ़, या रज में परै देहु ।।69।।
खंड-खंड ह्वै जाइ तन, अंग-अंग सत टूक ।
वृन्दावन नहिं छाँड़िये, छाँड़िबौ है बड़ि चूक ।।70।।
पटतर वृंदाविपिन की, कहि धौं दीजै काहि ।
जेहि वन की ध्रुव रैंनु में, मरिबौउ मंगल आहि ।।71।।
वृन्दावन के गुननि सुनि, हित सौं रज में लोटि ।
जेहि सुख कौं पूजत नहीं, मुक्ति आदि सत कोटि ।।72।।
सुरपति-पशुपति प्रजापति, रहे भूलि तेहिं ठौर ।
वृन्दावन वैभव कहौ, कौन जानि है और ।।73।।
यद्यपि राजत अवनि पर, सब तें ऊँचै आहि ।
ताकी सम कहियै कहा, श्रीपति बंदत ताहि ।।74।।
वृन्दावन वृंदाविपिन, वृंदा-कानन ऐन ।
छिन-छिन रसना रट्यौ करि, वृन्दावन सुख दैन ।।75।।
वृन्दावन आनंद-घन, तो तन नश्वर आहि ।
पशु ज्यौं खोवत विषै रस, काहि न चिंतत ताहि ।।76।।
वृन्दावन वृंदा कहत, दुरित वृंद दुरि जाहिं ।
नेह बेलि रस भजन की, तब उपजै मन माहिं ।।77।।
वृन्दावन श्रवननि सुनहिं, वृन्दावन कौ गान ।
मन बच कै अति हेत सौं, वृंदावन उर आन ।।78।।
वृन्दावन कौ नाम रटि, वृन्दावन कौं देखि ।
वृन्दावन सौं प्रीति करि, वृन्दावन उर लेखि ।।79।।
वृंदाविपिन प्रनाम करि, वृन्दावन सुख खानि ।
जो चाहत विश्राम ध्रुव, वृन्दावन पहिचानि ।।80।।
तजि कैं वृंदाविपिन कौं, और तीर्थ जे जात ।
छाँड़ि विमल चिंतामणी, कौड़ी कौं ललचात ।।81।।
पाइ रतन चीन्ह्यौ नहीं, दीन्हौं कर तैं डारि ।
यह माया श्री कृष्ण की, मोह्यौ सब संसार ।।82।।
प्रगट जगत में जगमगै, वृंदाविपिन अनूप ।
नैन अछत दीसत नहीं, यह माया कौ रूप ।।83।।
वृन्दावन कौ जस अमल, जिहि पुरान में नाहिं ।
ताकी बानी परौ जिनि, कबहूँ श्रवननि माँहि ।।84।।
वृन्दावन कौ जस सुनत, जिनकैं नाहिं हुलास ।
तिनकौ परस न कीजिये, तजि ध्रुव तिनकौ पास ।।85।।
भुवन चतुर्दश आदि दै, ह्वै है सब कौ नास ।
इकछत वृंदाविपिन घन, सुख कौ सहज निवास ।।86।।
वृंदावन इहि विधि बसै, तजि कैं सब अभिमान ।
तृण तैं नीचै आपकौं, जानै सोई जान ।।87।।
कोमल चित सब सौं मिलै, कबहुँ कठोर न होइ ।
निस्प्रेही निरवैरता, ताकौ शत्रु न कोइ ।।88।।
दूजै तीजै जो जुरै, साक-पत्र कछु आय ।
ताही सौं संतोष करि, रहै अधिक सुख पाय ।।89।।
देह स्वाद छुटि जाहिं सब, कछु होइ छीन शरीर ।
प्रेम रंग उर में बढ़ै, बिहरै जमुना तीर ।।90।।
युगल रूप की झलक उर, झलकै नैननि बारि ।
ऐसे सुख के रंग में, राखै मनहि रँगाइ ।।91।।
आवै छबि की झलक उर, झलकै नैननि बारि ।
चिंतत स्यामल-गौर तन, सकहि न तनहिं सँभारि ।।92।।
जीरन पट अति दीन लट, हिये सरस अनुराग ।
विबस सघन वन में फिरै, गावत युगल सुहाग ।।93।।
रसमय देखत फिरै बन, नैननि बन रहै आइ ।
कहुँ-कहुँ आनँद रंग भरि, परै धरनि थहराइ ।।94।।
ऐसी गति ह्वै है कबहुँ, मुख निसरत नहिं बैन ।
देखि-देखि वृंदाविपिन, भरि-भरि ढारै नैन ।।95।।
वृन्दावन तरु-तरु तरे, ढरै नैन सुख नीर ।
चिंतत फिरै आवेस बस, स्यामल-गौर सरीर ।।96।।
परम सच्चिदानंद घन, वृंदाविपिन सुदेश ।
जामें कबहूं होत नहिं, माया काल प्रवेश ।।97।।
शारद जो सत कोटि मिलि, कलपन करैं विचार ।
वृन्दावन सुख रंग कौ, कबहुँ न पावैं पार ।।98।।
वृन्दावन आनंद घन, सब तें उत्तम आहि ।
मो ते नीच न और कोऊ, कैसे पैहों ताहि ।।99।।
इत बौना आकाश फल, चाहत है मन माहिं ।
ताकौ एक कृपा बिना, और जतन कछु नाहिं ।।100।।
कुँवरि किशोरी नाम सौं, उपज्यौ दृढ़ विस्वास ।
करुनानिधि मृदु चित्त अति, तातैं बढ़ी जिय आस ।।101।।
जिनकौ वृन्दाविपिन है, कृपा तिनहिं की होइ ।
वृन्दावन में तबहि तौ, रहन पाइ है सोइ ।।102।।
वृन्दावन सत रतन की, माला गुही बनाइ ।
भाल भाग जाके लिखी, सोई पहिरै आइ ।।103।।
वृन्दावन सुख रंग की, आशा जो चित होइ ।
निशि दिन कंठ धरे रहै, छिन नहिं टारै सोइ ।।104।।
वृन्दावन सत जो कहै, सुनि है नीकी भाँति ।
निसि दिन तिहिं उर जगमगै, वृन्दावन की काँति ।।105।।
वृन्दावन कौ चिंतबन, यहै दीप उर बारि ।
कोटि जन्म के तम अघहिं, काटि करै उजियारि ।।106।।
बसि कै वृंदाविपिन में, इतनौ बड़ौ सयान ।
युगल चरण के भजन बिन, निमिष न दीजै जान ।।107।।
सहज विराजत एक रस, वृन्दावन निज धाम ।
ललितादिक सखियन सहित, क्रीड़त श्यामा श्याम ।।108।।
प्रेम सिंधु वृंदाविपिन, जाकौ अन्त न आदि ।
जहाँ कलोलत रहत नित, युगल किशोर अनादि ।।109।।
न्यारो चौदह लोक तें, वृन्दावन निजु भौन ।
तहाँ न कबहुँ लगत है, महाप्रलय की पौन ।।110।।
महिमा वृंदाविपिन की, कहि न सकत मम जीह ।
जाके रसना द्वै सहस, तिन हूँ काढ़ी लीह ।।111।।
एती मति मोपै कहाँ, शौभा निधि वनराज ।
ढीठौ कै कछु कहत हौं, आवत नहिं जिय लाज ।।112।।
मति प्रमान चाहत कह्यौ,सोऊ कहत लजात ।
सिन्धु अगम जेहिं पार नहिं, कैसैं सीप समात ।।113।।
या मन के अबलंब हित, कीन्हौ आहि उपाय ।
वृन्दावन रस कहन में, मति कबहूँ उरझाय ।।114।।
सोलह सै ध्रुव छ्यासिया, पून्यौ अगहन मास ।
यह प्रबन्ध पूरन भयौ, सुनत होत अघ नास ।।115।।
वृंदाविपिन के, इकसत षोड़स आहि ।
जो चाहत रस रीति फल, छिन-छिन ध्रुव अवगाहि ।।116।।
॥ जै जै श्री वृंदावनशत लीला की जैजै श्रीहित हरिवंश ॥
5. ख्याल हुल्लास लीला
दोहा
दोहा ख्याल हुलास मन, कछु इक कीनें आहि ।
प्रेम छटा जिहिं उर चढ़ी, सो 'ध्रुव' समुझे ताहि ॥1॥
प्रीति समान न और सुख, दुखहू होत अपार ।
मिलिबौ सुख दुख बिछुरिबौ, यह कीनौं निरधार ॥2॥
बिनु देखैं तलफत रहै, क्यौं पावै चित चैन ।
वदन रूप जलपान कौं, प्यासे हैं दोउ नैंन ॥3॥
अब सुनि इक इक घरी तौ, कलपन की सम होत ।
तिहिं दुख लिखिबे कौं कहूँ, नहिं कागद नहिं दोत ॥4॥
कठिन पीर पिय विरह की, लगे प्रेम के बान ।
अब तौ चाहत है चल्यौ, रहि न सकत इहि प्रान ॥5॥
महा प्रेम निजु मधुर अति, सब तें न्यारौ आहि ।
तहाँ न मिलिबौ बिछुरिबौ, जीवत रूपहिं चाहि ॥6॥
यह रस नित्य-विहार बिनु, सुन्यौ न देख्यौ नैंन।
एक प्रीति वय रूप दोऊ, बिलसत इक रस मैन ॥7॥
नैंना तौ अटके जहाँ, तहाँ न बिछुरन होइ।
इक रस अद्भुत प्रेम के, सुखहि लहै दिन सोइ ॥8॥
नवल बिमल रस प्रेम कौ, जिनकैं सहजहिं ढार ।
तिनके हियमें चलत रहै, सुख प्रवाह की धार ॥9॥
दोहा
युगल प्रेम रसमाधुरी, तहाँ न अटकै चित्त ।
चखत फिरै माया फलनि, तहाँ रहै दुःख नित्त ॥10॥
जहाँ-जहाँ चित लागि है, तहाँ-तहाँ दुख राशि।
जब लगि मन परि है नहीं, युगल प्रेम की पाशि ॥11॥
युगल रूप तन विपिन जहँ, तहाँ न अटकै जाइ ।
देखि विषै विष छिनक सुख, तिहि ठाँ रह्यौ लुभाइ ॥12॥
मूरख मन समुझत नहीं, नवल रूप निधि पाय ।
फीकौ छिल्लर विषै कौ, तहाँ धँसत है धाय ॥13॥
सोऊ कर आवत नहीं, बनत न एकौ बात।
बिचहीं दुख पावत फिरत, दुहूँ ओर तें जात ॥14॥
जहाँ-जहाँ चित्त दीजिये, तहाँ-तहाँ दुख मूल ।
तहाँ न अरुझै जाइ कै, सदा रहै सुख फूल ॥15॥
अनत अटक नाहिंन भली, यह समुझै सब कोइ ।
लहै न मन कौं जो रुचै, फिरि-फिरि दुख ही होइ ॥16॥
और विषै रस पाइये, सोऊ दुख करि जानि ।
तहाँ न दीजै चित्त 'ध्रुव', यह कह्यौ मेरौ मानि ॥17॥
दोहा
अब तौ ऐसी चित्त धरि, जुगल चरन रँग राँचि ।
महामाधुरी केलि गुन, छिन छिन गाय अरु नाचि ॥18॥
सुनि 'ध्रुव' ऐसी चाहियै, छाँड़ि जगत की रीति ।
युगल चरन कोमल सुरँग, तिनहीं सौं करि प्रीति ॥19॥
अब तौ आहि यहै भली, सबतैं मोह मिटाय।
रसिक अनन्यन संग गहि, श्यामा-श्याम लड़ाय ॥20॥
अब तौ करनौ है यहै, वृंदावन करि बास ।
युगल चरन छबि रंग रँगि, सब तें होइ उदास ॥21॥
तन मन कै बन सेइये, या पर नहिं मत और ।
विहरत जहाँ सुकुमार दोऊ, अद्भुत श्यामल गौर ॥22॥
सोरठा
सुनि लै मेरी बात, युगल चरन चित लाइयै ।
जौ चूक्यौ यह घात, फिरि पाछैं पछिताइहै ॥23॥
अब तै वय सब बीति गई, अरु जु रही सोऊ जाति।
द्यौस न कछुवै करि सक्यौ, अब जिनि खोवै राति ॥24॥
पंगु होइ सब ओर तें, अटकै विवि छबि माँहि ।
तबही तौ पावै सुखहिं, और विषै छुटि जाहिं ॥25॥
अब की देही मनुज की, पाई है किहुँ भाग ।
युगल चंद पद कमल सौं, कीजै 'ध्रुव' अनुराग ॥26॥
समुझत नहिं देखत सुनत, घटति नाहिं ललचानि ।
जैसे खोटे तुरँग की, मिटत न मन की बानि ॥27॥
सुख तौ सोई जानिबौ, इक रस रहै दिन साथ।
सो सुख दुख सम जानिये, जो होइ पराये हाथ ॥28॥
नख - शिख लौं भूषन जिते, अंगनि छबिहि निहारि ।
सुख सीवाँ माधुर्य रस, छिन छिन यहै विचारि ॥29॥
जाकै यह संपति सदा, सोई धनी जग माहिं।
ताकै माया काल की, पवनहुँ परसत नाहिं ॥30॥
कुंज भवन रचना रुचिर, सेज सुरंग अनूप ।
ता पर बैठे देखि 'ध्रुव' अद्भुत सहज सरूप ॥31॥
दोहा
जाके नैंननि झलकि रहे, गौर-श्याम अभिराम ।
तिनहीं 'ध्रुव' यह देह धरि, पायौ है विश्राम ॥32॥
दोहा
रूप सिंधु में पैठि 'ध्रुव', जो मन सकहि सँभारि ।
प्रेम रतन तब कर परै, विषया-विष दै डारि ॥33॥
ग्यान भजन जो करहु बहु, कौन करै बकवाद ।
विविध भाँति विंजन करौ, लौन बिना नहिं स्वाद ॥34॥
प्यार बिना नहिं सोहई, करौ भजन बहु ग्यान ।
दीपक बहु इकठौर है, होत न भान समान ॥35॥
बहुत भाँति लै चतुरई, करौ भजन की बात।
रंच प्रेम की छटा बिनु, सब नीरस ह्वै जात ॥36॥
पानिप मोती की यथा, ऐसौ भजन सनेह ।
जाके उर झलकत रहै, तिनहिं धरी 'ध्रुव' देह ॥37॥
करत भजन विधि सौं बिंध्यौ, अरु अचार बहुतेर ।
प्रेम छटा की झलक बिनु, होत है सब अंधेर ॥38॥
प्रेम छटा रंचक नहीं, विधि कौ भजन अपार ।
स्वादी स्वाद न पावही, घृत बिनु ज्यौं ज्यौनार ॥39॥
प्रेम आँच के लगत ही, ढरकि चलत मन मैन।
हियौ छकै तन पुलकि ह्वै, भरि-भरि ढारै नैन ॥40॥
अपरस ग्यान समान जम, भजन धर्म आचार ।
पाहन कबहुँ न होइ मृदु, पर्यौ रहै जलधार ॥41॥
बहु रँग माया विपिन घन, तहाँ फिरै सुख मानि ।
ऐंचि खँचि या मन मृगहि, गहि सतसंगहि आनि ॥42॥
मन तें चंचल नाहिं कछु, नैंकु न कहुँ ठहरात ।
तब ही तौ 'ध्रुव' होत बस, परै प्रेम की घात ॥43॥
बिचल्यौ फिरै भली नहीं, प्रेम गली छुटि जाइ ।
रहै एक ही ठौर लगि, युगल चरन चित लाइ ॥44॥
प्रेम रंग सौं रँगे जे, नहिं आनत उर आन।
अद्भुत युगल विहार रस, तेई करिहैं पान ॥45॥
घाइल कबहूँ नहिं भयौ, नवल नेह के तीर ।
अटक बिना ध्रुव खटक नहिं, कहा जानै पर पीर ॥46॥
दोहा
चढ़ि कै मैन तुरंग पर, चलिबौ पावक माँहि
प्रेम-पंथ ऐसौ कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं ॥47॥
पर्यौ न रूप प्रवाह में, परस्यौ नहिं उर नेह ।
सुनि 'ध्रुव' तिनि या जगत में, धरी बाद ही देह ॥48॥
प्रेम प्रकार अनेक विधि, तिनमें उत्तम भाँति ।
अद्भुत चरित दुहूँनि के, जिनके उर झलकाँति ॥49॥
प्रेम भानु के उदय तें, मिटत है भ्रम सब केर ।
खंड-खंड ह्वै जाइ 'ध्रुव', माया-मोह अँधेर ॥50॥
जहाँ प्रीतम तिहिं देश की, प्यारी लागत पौन ।
प्रेम छटा जाने बिना, यह सुख समुझे कौन ॥51॥
नव किशोरता माधुरी, दंपति रूप निहारि ।
तेहिं सुख के 'ध्रुव' निमिष पर, ज्ञान मुक्ति सब वारि ॥52॥
दोहा
जाकौ हीयौ सरस नहिं, क्यौं समुझै रस रीति ।
बिनु अनुभव जानैं कहा, कैसी होति है प्रीति ॥53॥
मन न मिल्यौ तन निकट ह्वै, तहाँ कहा सुख होइ।
बिनु गुन मन-मनियाँ कहौ, कैसें लीजै पोइ ॥54॥
ग्यान बिना पशु हू कछू, समुझत प्रीति कौ रंग ।
मोह बँध्यौ पाछै फिरै, तजै न कबहूँ संग ॥55॥
ग्यान सहित नर देह वर, भरत खंड में होइ ।
जो नहिं समुझ्यौ प्रेम रस, ताकौं रहियै रोइ ॥56॥
प्रेमी मलिन न होइ 'ध्रुव' जाकौ उज्वल हीय ।
इक रस जाके उर बसै, रसिक लाड़िली -पीय ॥57॥
दोहा
अब ध्रुव ऐसी चाहिये, सबही तें मन फेरि ।
कै रसिकन कौ संग गहि, युगल चन्द छबि हेरि ॥58॥
दोहा ख्याल हुलास के, तहाँ प्रबन्ध कछु नाहिं ।
आगैं पाछें हैं भये, जो आये उर माँहिं ॥59॥
उलटौ पंथ है प्रेम कौ, तहाँ रह्यौ मन हारि ।
यशहू सुनि लागत बुरौ, मीठी लागति गारि ॥60॥
॥जै जै श्री ख्याल हुल्लास लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश ॥
दोहा
दोहा ख्याल हुलास मन, कछु इक कीनें आहि ।
प्रेम छटा जिहिं उर चढ़ी, सो 'ध्रुव' समुझे ताहि ॥1॥
प्रीति समान न और सुख, दुखहू होत अपार ।
मिलिबौ सुख दुख बिछुरिबौ, यह कीनौं निरधार ॥2॥
बिनु देखैं तलफत रहै, क्यौं पावै चित चैन ।
वदन रूप जलपान कौं, प्यासे हैं दोउ नैंन ॥3॥
अब सुनि इक इक घरी तौ, कलपन की सम होत ।
तिहिं दुख लिखिबे कौं कहूँ, नहिं कागद नहिं दोत ॥4॥
कठिन पीर पिय विरह की, लगे प्रेम के बान ।
अब तौ चाहत है चल्यौ, रहि न सकत इहि प्रान ॥5॥
महा प्रेम निजु मधुर अति, सब तें न्यारौ आहि ।
तहाँ न मिलिबौ बिछुरिबौ, जीवत रूपहिं चाहि ॥6॥
यह रस नित्य-विहार बिनु, सुन्यौ न देख्यौ नैंन।
एक प्रीति वय रूप दोऊ, बिलसत इक रस मैन ॥7॥
नैंना तौ अटके जहाँ, तहाँ न बिछुरन होइ।
इक रस अद्भुत प्रेम के, सुखहि लहै दिन सोइ ॥8॥
नवल बिमल रस प्रेम कौ, जिनकैं सहजहिं ढार ।
तिनके हियमें चलत रहै, सुख प्रवाह की धार ॥9॥
दोहा
युगल प्रेम रसमाधुरी, तहाँ न अटकै चित्त ।
चखत फिरै माया फलनि, तहाँ रहै दुःख नित्त ॥10॥
जहाँ-जहाँ चित लागि है, तहाँ-तहाँ दुख राशि।
जब लगि मन परि है नहीं, युगल प्रेम की पाशि ॥11॥
युगल रूप तन विपिन जहँ, तहाँ न अटकै जाइ ।
देखि विषै विष छिनक सुख, तिहि ठाँ रह्यौ लुभाइ ॥12॥
मूरख मन समुझत नहीं, नवल रूप निधि पाय ।
फीकौ छिल्लर विषै कौ, तहाँ धँसत है धाय ॥13॥
सोऊ कर आवत नहीं, बनत न एकौ बात।
बिचहीं दुख पावत फिरत, दुहूँ ओर तें जात ॥14॥
जहाँ-जहाँ चित्त दीजिये, तहाँ-तहाँ दुख मूल ।
तहाँ न अरुझै जाइ कै, सदा रहै सुख फूल ॥15॥
अनत अटक नाहिंन भली, यह समुझै सब कोइ ।
लहै न मन कौं जो रुचै, फिरि-फिरि दुख ही होइ ॥16॥
और विषै रस पाइये, सोऊ दुख करि जानि ।
तहाँ न दीजै चित्त 'ध्रुव', यह कह्यौ मेरौ मानि ॥17॥
दोहा
अब तौ ऐसी चित्त धरि, जुगल चरन रँग राँचि ।
महामाधुरी केलि गुन, छिन छिन गाय अरु नाचि ॥18॥
सुनि 'ध्रुव' ऐसी चाहियै, छाँड़ि जगत की रीति ।
युगल चरन कोमल सुरँग, तिनहीं सौं करि प्रीति ॥19॥
अब तौ आहि यहै भली, सबतैं मोह मिटाय।
रसिक अनन्यन संग गहि, श्यामा-श्याम लड़ाय ॥20॥
अब तौ करनौ है यहै, वृंदावन करि बास ।
युगल चरन छबि रंग रँगि, सब तें होइ उदास ॥21॥
तन मन कै बन सेइये, या पर नहिं मत और ।
विहरत जहाँ सुकुमार दोऊ, अद्भुत श्यामल गौर ॥22॥
सोरठा
सुनि लै मेरी बात, युगल चरन चित लाइयै ।
जौ चूक्यौ यह घात, फिरि पाछैं पछिताइहै ॥23॥
अब तै वय सब बीति गई, अरु जु रही सोऊ जाति।
द्यौस न कछुवै करि सक्यौ, अब जिनि खोवै राति ॥24॥
पंगु होइ सब ओर तें, अटकै विवि छबि माँहि ।
तबही तौ पावै सुखहिं, और विषै छुटि जाहिं ॥25॥
अब की देही मनुज की, पाई है किहुँ भाग ।
युगल चंद पद कमल सौं, कीजै 'ध्रुव' अनुराग ॥26॥
समुझत नहिं देखत सुनत, घटति नाहिं ललचानि ।
जैसे खोटे तुरँग की, मिटत न मन की बानि ॥27॥
सुख तौ सोई जानिबौ, इक रस रहै दिन साथ।
सो सुख दुख सम जानिये, जो होइ पराये हाथ ॥28॥
नख - शिख लौं भूषन जिते, अंगनि छबिहि निहारि ।
सुख सीवाँ माधुर्य रस, छिन छिन यहै विचारि ॥29॥
जाकै यह संपति सदा, सोई धनी जग माहिं।
ताकै माया काल की, पवनहुँ परसत नाहिं ॥30॥
कुंज भवन रचना रुचिर, सेज सुरंग अनूप ।
ता पर बैठे देखि 'ध्रुव' अद्भुत सहज सरूप ॥31॥
दोहा
जाके नैंननि झलकि रहे, गौर-श्याम अभिराम ।
तिनहीं 'ध्रुव' यह देह धरि, पायौ है विश्राम ॥32॥
दोहा
रूप सिंधु में पैठि 'ध्रुव', जो मन सकहि सँभारि ।
प्रेम रतन तब कर परै, विषया-विष दै डारि ॥33॥
ग्यान भजन जो करहु बहु, कौन करै बकवाद ।
विविध भाँति विंजन करौ, लौन बिना नहिं स्वाद ॥34॥
प्यार बिना नहिं सोहई, करौ भजन बहु ग्यान ।
दीपक बहु इकठौर है, होत न भान समान ॥35॥
बहुत भाँति लै चतुरई, करौ भजन की बात।
रंच प्रेम की छटा बिनु, सब नीरस ह्वै जात ॥36॥
पानिप मोती की यथा, ऐसौ भजन सनेह ।
जाके उर झलकत रहै, तिनहिं धरी 'ध्रुव' देह ॥37॥
करत भजन विधि सौं बिंध्यौ, अरु अचार बहुतेर ।
प्रेम छटा की झलक बिनु, होत है सब अंधेर ॥38॥
प्रेम छटा रंचक नहीं, विधि कौ भजन अपार ।
स्वादी स्वाद न पावही, घृत बिनु ज्यौं ज्यौनार ॥39॥
प्रेम आँच के लगत ही, ढरकि चलत मन मैन।
हियौ छकै तन पुलकि ह्वै, भरि-भरि ढारै नैन ॥40॥
अपरस ग्यान समान जम, भजन धर्म आचार ।
पाहन कबहुँ न होइ मृदु, पर्यौ रहै जलधार ॥41॥
बहु रँग माया विपिन घन, तहाँ फिरै सुख मानि ।
ऐंचि खँचि या मन मृगहि, गहि सतसंगहि आनि ॥42॥
मन तें चंचल नाहिं कछु, नैंकु न कहुँ ठहरात ।
तब ही तौ 'ध्रुव' होत बस, परै प्रेम की घात ॥43॥
बिचल्यौ फिरै भली नहीं, प्रेम गली छुटि जाइ ।
रहै एक ही ठौर लगि, युगल चरन चित लाइ ॥44॥
प्रेम रंग सौं रँगे जे, नहिं आनत उर आन।
अद्भुत युगल विहार रस, तेई करिहैं पान ॥45॥
घाइल कबहूँ नहिं भयौ, नवल नेह के तीर ।
अटक बिना ध्रुव खटक नहिं, कहा जानै पर पीर ॥46॥
दोहा
चढ़ि कै मैन तुरंग पर, चलिबौ पावक माँहि
प्रेम-पंथ ऐसौ कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं ॥47॥
पर्यौ न रूप प्रवाह में, परस्यौ नहिं उर नेह ।
सुनि 'ध्रुव' तिनि या जगत में, धरी बाद ही देह ॥48॥
प्रेम प्रकार अनेक विधि, तिनमें उत्तम भाँति ।
अद्भुत चरित दुहूँनि के, जिनके उर झलकाँति ॥49॥
प्रेम भानु के उदय तें, मिटत है भ्रम सब केर ।
खंड-खंड ह्वै जाइ 'ध्रुव', माया-मोह अँधेर ॥50॥
जहाँ प्रीतम तिहिं देश की, प्यारी लागत पौन ।
प्रेम छटा जाने बिना, यह सुख समुझे कौन ॥51॥
नव किशोरता माधुरी, दंपति रूप निहारि ।
तेहिं सुख के 'ध्रुव' निमिष पर, ज्ञान मुक्ति सब वारि ॥52॥
दोहा
जाकौ हीयौ सरस नहिं, क्यौं समुझै रस रीति ।
बिनु अनुभव जानैं कहा, कैसी होति है प्रीति ॥53॥
मन न मिल्यौ तन निकट ह्वै, तहाँ कहा सुख होइ।
बिनु गुन मन-मनियाँ कहौ, कैसें लीजै पोइ ॥54॥
ग्यान बिना पशु हू कछू, समुझत प्रीति कौ रंग ।
मोह बँध्यौ पाछै फिरै, तजै न कबहूँ संग ॥55॥
ग्यान सहित नर देह वर, भरत खंड में होइ ।
जो नहिं समुझ्यौ प्रेम रस, ताकौं रहियै रोइ ॥56॥
प्रेमी मलिन न होइ 'ध्रुव' जाकौ उज्वल हीय ।
इक रस जाके उर बसै, रसिक लाड़िली -पीय ॥57॥
दोहा
अब ध्रुव ऐसी चाहिये, सबही तें मन फेरि ।
कै रसिकन कौ संग गहि, युगल चन्द छबि हेरि ॥58॥
दोहा ख्याल हुलास के, तहाँ प्रबन्ध कछु नाहिं ।
आगैं पाछें हैं भये, जो आये उर माँहिं ॥59॥
उलटौ पंथ है प्रेम कौ, तहाँ रह्यौ मन हारि ।
यशहू सुनि लागत बुरौ, मीठी लागति गारि ॥60॥
॥जै जै श्री ख्याल हुल्लास लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश ॥
6. भक्त नामावली
दोहा
(श्री) हरिवंश नाम ध्रुव कहत ही बाढ़ै आनँद-बेलि ।
प्रेम-रंग उर जगमगै, युगल नवल रस-केलि ॥01॥
निगम ब्रह्म परसत नहीं, जो रस सब तें दूरि ।
कियौ प्रकट हरिवंश जू, रसिकनि जीवन-मूरि ॥02॥
(श्री) वनचंद्र चरन अबुंज भजहि, मन क्रम बचन प्रतीति ।
वृंदावन निज प्रेम की, तब पावै रस-रीति ॥03॥
(श्री) कृष्णचंद के कहत ही, मन को भ्रम मिटि जाइ ।
विमल भजन सुख सिंधु में, रहै चित्त ठहराइ ॥04॥
(श्री) गोपीनाथ पद उर धरैं, महा गोप्य रस- सार ।
बिनु विलम्ब आवै हियें, अद्भुत युगल-विहार ॥05॥
पति, कुटुम्ब देखत सबै, घूँघट-पट दिये डारि ।
देह-गेह बिसर्यौ तिनहिं, (श्री) मोहन रूप निहार ॥06॥
धीर गंभीर समुद्र सम, सील सुभाव अनूप ।
सब अँग सुन्दर हँसत मुख, अद्भुत सुखद सरूप ॥07॥
दोहा
शुक, नारद, उद्धव, जनक, प्रह्लादिक, सनकादि ।
ज्यौं हरि आपुन नित्य हैं, त्यौं ये भक्त अनादि ॥08॥
प्रकट भयौ जयदेव मुख, अद्भुत गीत गोविंद ।
कयौ महा सिंगार रस, सहित प्रेम-मकरंद ॥09॥
अरिल्ल
पद्मावति जयदेव, प्रेम, बस कीने मोहन ।
अष्टपदी जो कहै, सुनत फिरैं ताके गोहन ॥10॥
दोहा
श्रीधर स्वामी तौ मनौं, श्रीधर प्रकटे आनि ।
तिलक भागवत कियौ रचि, सब तिलकनि परमानि ॥11॥
रसिक अनन्य हरिदास जू, गायौ नित्य विहार ।
सेवा हू में दूरि किए, विधि-निषेध जंजार ॥12॥
सघन निकुंजनि रहत दिन, बाढ्यौ अधिक सनेह ।
एक बिहारी हेत लगि छाँड़ि दिये सुख-गेह ॥13॥
रंक छत्र-पति काहु की, धरी न मन परवाह ।
रहे भींजि रस भजन में, लीने कर करुवाह ॥14॥
बल्लभ-सुत विठ्ठल भये, अति प्रसिद्ध संसार ।
सेवा विधि जिहिं समय की, कीनी तिहि व्यौहार ॥15॥
राग-भोग अद्भुत विविध, जो चहियै जिहि काल ।
दिनहिं लड़ाये हेत सौं गिरधर श्री गोपाल ॥16॥
गौड़ देस सब उद्धर्यौ, प्रकट कृष्ण चैतन्य ।
तैसेहि नित्यानंदहू, रस में भये अनन्य ॥17॥
पावत ही तिनकौ दरस, उपजै भजनानन्द ।
बिनु ही श्रम छुटि जाहिं सब, जे माया के फन्द ॥18॥
रूप- सनातन मन बढ्यौ, राधा-कृष्ण अनुराग ।
जानि विश्व नश्वर सबै, तब उपज्यौ बैराग ॥19॥
विष समान तजि विषै-सुख, देश सहित परिवार ।
वृन्दावन कौं यौं चले, ज्यौं सावन जल-धार ॥20॥
तृन तैं नीचौ आपकौं, जानि बसे बन माहिं ।
मोह छाँड़ि ऐसैं रहे, मनौ चिन्हारिहु नाहिं ॥21॥
अरिल्ल
रघुनन्दन सारंग जीव, तिन पाछैं आये ।
कृष्ण कृपा करि सबै, आनि निज धाम बसाये ॥22॥
दोहा
भजन रसिक रघुनाथजी, राधा-कुण्ड स्थान ।
लौंन तक्र ब्रज को लियौ, परस्यौ नहिं कछु आन ॥23॥
वंदन करिकै चिंतवन, गौर-श्याम अभिराम ।
सोवतहू रसना रटै, राधा-कृष्ण सुनाम ॥24॥
श्री बिलास, ब्रजनाथ अरु, श्री चंद, मुकुंद प्रवीन ।
मदन मोहन पद कमल सौं, अधिक प्रीति तिन कीन ॥25॥
महा पुरुष नन्दन भये, करि तन सकल सिंगार ।
सखी-रूप चिंतत फिरैं, गौर-श्याम सुकुमार ॥26॥
नैंन सजल तिहिं रंग में, चित पायौ विश्राम।
विबस वेग ह्वै जात सुनि, लाल-लाड़िली नाम ॥27॥
श्री कृष्णदास हुते जंगली, तेऊ तैसी भाँति ।
तिनके उर झलकत रहे, हेम नील-मनि काँति ॥28॥
युगल प्रेम-रस अवधि में, परयौ प्रबोध मन जाइ।
वृंदावन रस माधुरी, गाई अधिक लड़ाइ ॥29॥
अति विरक्त संसार ते, बसे विपिन तजि भौन।
प्रीति सहित गोपाल भट, सेये राधा-रौन ॥30॥
घमंडी रस में घमड़ि रह्यौ, वृंदावन निज धाम ।
बंशीवट-तट वास किय, गाये श्यामा-श्याम ॥31॥
भट्ट नरायन अति सरस, ब्रज मंडल सौं हेत ।
ठौर-ठौर रचना करी, प्रकट कियौ संकेत ॥32॥
अरिल्ल
वर्द्धमान श्रीभट्ट अरु गंगल ब्रज वृंदावन गायौ ।
करि प्रतीति सर्वोपरि जान्यौ, तातें चित्त लगायौ ॥33॥
भट्ट गदाधर नाथ भट्ट, बिद्या-भजन प्रवीन ।
सरस कथा बानी मधुर, सुनि रुचि होत नवीन ॥34॥
गोविंद स्वामी गंग अरु, बिष्नु विचित्र बनाइ ।
पिय-प्यारी कौ जस कह्यौ, राग रंग सौं छाइ ॥35॥
मन-मोहन सेवा अधिक कीनी है रघुनाथ ।
न्यारीयै रस-भजन की, बात परी तेहि हाथ ॥36॥
गिरिधर स्वामी पर कृपा, बहुत भई दई कुंज ।
रसिक-रसिकनी कौ सुजस, गायौ तिहि सुख पुंज ॥37॥
विठ्ठल बिपुल बिनोद रस, गाई अद्भुत केलि ।
बिलसत लाड़िली-लाल सुख, अंसनि पर भुज मेलि ॥38॥
बिहारीदास निजु एक रस, ज्यौं स्वामी की रीति ।
निर्वाही पाछैं भली तोरी सब सौं प्रीति ॥39॥
मत्त भयौ रस रंग में, करी न दूजी बात ।
बिनु बिहार निजु एक रस, और न कछू सुहात ॥40॥
भर किशोर दोउ लाड़िले, नवल-प्रिया नव-पीय ।
प्रकट देखियत जगमगे, रसिक व्यास के हीय ॥41॥
कहनी-करनी करि गयौ, एक व्यास इहि काल ।
लोक वेद तजि कै भजे, (श्री) राधाबल्लभ लाल ॥42॥
प्रेम मगन नहि गन्यौ कछु, बरनाबरन बिचार ।
सबनिं मध्य पायौ प्रगट, लै प्रसाद रस सार ॥43॥
सेवक की सर को करै, भजन सरोवर हंस ।
मन बच कै धरि एक व्रत, गाये श्रीहरिवंश ॥44॥
वंश बिना हरिनाम हूँ, लियौ न जाकैं टेक ।
पावै सोई वस्तु कौं, जाकैं है व्रत एक ॥45॥
कहा कहौं नहिं कहि सकत, नरवाहन को भाग ।
श्री मुख जाकौ नाम धर्यौ, निजु बानी अनुराग ॥46॥
अति अनन्य निजु धर्म में, नाइक रसिक मुकुंद ।
बसे विपिन रस भजन कै, छाँड़ि जगत दुख-द्वंद ॥47॥
परम भागवत अति भये, भजन माँहि दृढ़ धीर ।
चतुर्भुज वैष्णवदास की, बानी अति गंभीर ॥48॥
सकल देश पावन कियौ, भगवत-जसहिं बढ़ाइ ।
जहाँ-तहाँ निजु एक रस, गाई भक्ति लड़ाइ ॥49॥
परमानन्द किशोर दोऊ, संत मनोहर खेम ।
निर्वाह्यौ नीकैं सबनि, सुंदर भजन कौ नेम ॥50॥
छाँड़ि मोह, अभिमान सब, भक्तन सौं अति दीन।
वृन्दावन बसिकै तिनहिं, फिरि मन अनत न कीन ॥51॥
लालदास स्वामी सरस, जाकैं भजन अनूप ।
बरन्यौ अति दृढ़ अक्षरनि, लाल-लाड़िली रूप ॥52॥
अधिक प्यार है भजन सों, और न कछू सुहात ।
कहत सुनत भगवत् जसहि, निसि दिन जाहि बिहात ॥53॥
बालकृष्ण गति कहा कहौं, कैसेहुँ कहत बनै न।
रूप लाड़ली-लाल कौ, झलमलात तेहि नैंन ॥54॥
अति प्रवीन पंडित अधिक, लेश गर्व कौ नाहिं ।
कीनी सेवा मानसी, निसि-दिन मन तेहि माहिं ॥55॥
ग्यानू नाहरमल्ल की, देखी अद्भुत रीति ।
हरिवंश चंद पद कमल सौं, बाढ़ी दिन-दिन प्रीति ॥56॥
कहा कहौं मोहनदास-रति, ताकी गति भई आन।
व्यासनन्द अन्तर सुनत, तजे तिही छिन प्रान ॥57॥
बिट्ठलदास मुरली धरनि, चरण सेये सब काल ।
तैसेहि लाल गोपाल जी, गाये ललना लाल ॥58॥
सुन्दर मन्दिर की टहल, कीनी अति रुचि मानि।
सफल करी संपति सकल, लगी ठिकाने आनि ॥59॥
अंगीकृत ताकौं कियौ, परम रसिक सिरमौर ।
करुणा निधि बहु कृपा करि, दीनी सनमुख ठौर ॥60॥
बड़ौ उपासक गौड़िया, नाम गोसाईं दास ।
एक चरन बनचन्द बिनु, जाकैं और न आस ॥61॥
नेही नागरीदास अति, जानत नेह की रीति ।
दिन दुलराई लाड़िली, लाल रँगीली प्रीति ॥62॥
व्यासनन्द पद कमल सौं, जाकै दृढ़ विश्वास ।
जेहि प्रताप यह रस कह्यौ, अरु बृन्दावन बास ॥63॥
भली भाँति सेयौ विपिन, तजि बन्धुनि सौं हेत ।
सूर भजन में एक-रस, छाँड्यौ नाहिंन खेत ॥64॥
बिहारी दास दम्पति जुगल, माधौ परमानन्द ।
वृंदावन नीके रहे, काटि लाज कौ फन्द ॥65॥
नीकी भाँति मुकन्द की, कैसेहुँ कहत बनै न।
बात लाड़िली-लाल की, सुनि भरि आवै नैंन ॥66॥
मन-बच करि विश्वास धरि, मारि हिये के काम ।
मात, पिता, तिय छाँड़ि कै, बस्यौ वृन्दावन धाम ॥67॥
अन्तकाल गति कह कहौं, कैसेहुँ कही न जाति ।
चतुरदास वृन्दाबिपिन, पायौ आछी भाँति ॥68॥
चिंतामनि बातनि सरस, सेवा माहिं प्रवीन ।
कहत सुनत भगवत जसहि, छिन छिन उपज नवीन ॥69॥
नागर अरु हरिदास मिलि, सेये नित हरि-दास ।
वृन्दावन पायौ दुहुँनि, पूजी मन की आस ॥70॥
नवल कल्यानी सखिनु के, मन मे अति अनुराग ।
लाल-लड़ैती कुँवरि कौ, गायौ भाग-सुहाग ॥71॥
भली भाँति वृन्दा-अली, अति कोमल सु-सुभाव ।
कृपा लड़ैंती कुँवरि की, उपज्यौ अद्भुत चाव ॥72॥
कीने रास विलास बहु, सुख बरसत संकेत ।
रचना रची कल्यान रुचि, मंडनी दास समेत ॥73॥
सेवा राधारमन की, भक्तनि कौ सनमान ।
साँते बास यमुना कियौ, तिहि सम नहिं कोउ आन ॥74॥
हुते उपासक अधिक ही, या रस में हरिदास ।
निसिदिन बीतै भजन में, राधाकुण्ड निवास ॥75॥
बरसाने गिरिधर सुहृद, जाकै ऐसौ हेत।
भोजन हूँ भक्तनि बिना, धर्यौ रहत नहिं लेत ॥76॥
नंददास जो कछु कह्यौ, राग रंग सौं पागि ।
अच्छर सरस सनेहमय, सुनत स्रवन उठै जागि ॥77॥
रमनदास अद्भुत हुते, करत कवित्त सुढार ।
बात प्रेम की सुनत ही, छुटत नैन जलधार ॥78॥
बावरो सो रस में फिरै, खोजत नेह की बात ।
आछे रस के बचन सुनि, बेगि बिवस ह्वै जात ॥79॥
कहा कहौं मृदुल सुभाव अति, सरस नागरी दास ।
बिहारी-बिहारिन कौ सुजस, गायौ हरषि हुलास ॥80॥
परमानन्द माधौ मुदित, नव-किशोर कल केलि ।
कही रसीली भाँति सौं, तिहि रस में रह्यौ झेलि ॥81॥
सेयौ नीकी भाँति सौं, श्री संकेत स्थान ।
रह्यौ बड़ाई छाँडिकै, सूरज द्विज कल्यान ॥82॥
खरगसेन के प्रेम की, बात कही नहिं जात।
लिखत ललित लीला करत, गये प्राण तजि गात ॥83॥
तैसेहि राघौदास की, बात सुनी यह कान ।
गावत करत धमारि हरि, गये छूटि तन प्रान ॥84॥
इहि बरन भक्त अद्भुत भयौ, और न कछू सुहात ।
अंगनि की छवि माधुरी, चिंतत जाहि बिहात ॥85॥
रोमांचित तन पुलकि ह्वै, नैंन रहे जल पूरि।
जाके आसा एक ही, (श्री) वृन्दावन की धूरि ॥86॥
कह कहौं महिमा भाग की, भई कृपा सब अंग ।
वृन्दावन दासी गह्यौ, जाइ सखिनु कौ संग ॥87॥
लाज छाँड़ि गिरिधर भजी, करी न कछु कुल कान।
सोई मीरा जग विदित, प्रगट भक्ति की खान ॥88॥
ललितहु लाई बोलि कै, तासौं हौ अति हेत ।
आनँद सौं निरखत फिरै, वृन्दावन रस-खेत ॥89॥
निर्तति नूपुर बाँधि कै, गावति लै करतार ।
बिमल हियौ भक्तनि मिली, तृन सम गनि संसार ॥90॥
बंधुनि विष ताकौं दियौ, करि विचार चित आन ।
सो विष फिरि अमृत भयौ, तब लागे पछितान ॥91॥
गंगा जमुना तियनि में, परम भागवत जानि ।
तिनकी बानी सुनत ही, बढ़े भक्ति उर आनि ॥92॥
कुंभन कृष्णदास गिरिधरनि सौं, कीनी साँची प्रीति ।
कर्म-धर्म पथ छाँड़िकै, गाई निजु रस रीति ॥93॥
पूरनमल जसवंत जी, भूपति गोविंद दास ।
हरीदास इनि सबनि मिलि, सेये नित हरि दास ॥94॥
परमानन्द अरु सूर मिलि, गाई सब ब्रज-रीति ।
भूलि जात बिधि भजन की, सुनि गोपिनु की प्रीति ॥95॥
माधौ रामदास बरसानियाँ, ब्रज-विहार के केलि ।
गाये नीकी भाँति सौं, तेहि रस में रहे झेलि ॥96॥
सूरदास अति प्रीति सौं, कवित रीति भलि कीन ।
मदन-मोहन अपनाइ कैं, अंगीकृत करि लीन ॥97॥
जिन-जिन भक्तन प्रीति किय, ताके बस भये आन।
सेन हेत नृप टहल किय, नामा की छाई छाँन ॥98॥
जगत बिदित पीपा धना, अरु रैदास कबीर ।
महा धीर दृढ़ एक रस, भरे भक्ति गंभीर ॥99॥
जगन्नाथ वत्सल भगत, कीनौं जस बिस्तार ।
माधौ भूखौ जानि कैं, लाये भोजन थार ॥100॥
एक समै निसि सीत सौं, काँपन लाग्यौ गात।
आनि उढ़ाई तेहि समै, अपनैं कर सकलात ॥101॥
बिलु-मंगल जब अंध भयौ, आपनु कर गहे आइ ।
भक्तनि पाछें यौं फिरत, ज्यौं बछरा सँग गाइ ॥102॥
रामानँद अंगद सोभू, हरीव्यास अरु छीत।
एक-एक के नाम सौं, सब जग होत पुनीत ॥103॥
रँका बँका भक्त द्वै, महा भजन - रस लीन ।
इन्द्रासन कें सुखनि कौं, मानत तृन सों हीन ॥104॥
नरसी हू अति सरस हिय, कहा देऊँ समतूल ।
कह्यौ महा सिंगार रस, जानि सुखनि कौ मूल ॥105॥
दीनी ताकौं रीझि कैं, माला नन्द-कुमार ।
राखि लियौ अपनी सरन, विमुखनि मुख दै छार ॥106॥
जहाँ जहाँ भक्तनि कौं कछू, परत है संकट आनि ।
तहाँ तहाँ आपुन बीच ह्वै, धरत अभै कौ पानि ॥107॥
भक्त नरायन भक्त सब, धरैं हियैं दृढ़ प्रीति ।
बरनी आछी भाँति सौं, जैसी जाकी रीति ॥108॥
रसिक भक्त भूतल घने, लघुमति क्यौं कहे जाहिं ।
बुधि प्रमान गाये कछू, जो आये उर माहिं ॥109॥
हरि कौं निजु जस तें अधिक भक्तनि-जस पर प्यार ।
तातैं यह माला रची, करि 'ध्रुव' कंठ-सिंगार ॥110॥
भक्तनि की नामावली, जो सुनि है चित लाइ ।
ताके भक्ति बढ़ै घनी, अरु हरि होइ सहाइ ॥111॥
एक बार जिनि नाम लिये, हित सौं ह्वै अति दीन ।
ताकौ संग न छाँड़िहीं, 'ध्रुव' अपनौ करि लीन ॥112॥
ऐसे प्रभु जिन नहिं भजे, सोई अति मति हीन ।
देखि समुझि या जगत में, बुरौ आपुनौं कीन ॥113॥
अजहूँ सोचि बिचारि कैं, गहि भक्तनि पद ओट।
हरि कृपालु सब पाछिली, छमि हैं तेरी खोट ॥114॥
।। जै जै श्री भक्त-नामावली लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश ।।
दोहा
(श्री) हरिवंश नाम ध्रुव कहत ही बाढ़ै आनँद-बेलि ।
प्रेम-रंग उर जगमगै, युगल नवल रस-केलि ॥01॥
निगम ब्रह्म परसत नहीं, जो रस सब तें दूरि ।
कियौ प्रकट हरिवंश जू, रसिकनि जीवन-मूरि ॥02॥
(श्री) वनचंद्र चरन अबुंज भजहि, मन क्रम बचन प्रतीति ।
वृंदावन निज प्रेम की, तब पावै रस-रीति ॥03॥
(श्री) कृष्णचंद के कहत ही, मन को भ्रम मिटि जाइ ।
विमल भजन सुख सिंधु में, रहै चित्त ठहराइ ॥04॥
(श्री) गोपीनाथ पद उर धरैं, महा गोप्य रस- सार ।
बिनु विलम्ब आवै हियें, अद्भुत युगल-विहार ॥05॥
पति, कुटुम्ब देखत सबै, घूँघट-पट दिये डारि ।
देह-गेह बिसर्यौ तिनहिं, (श्री) मोहन रूप निहार ॥06॥
धीर गंभीर समुद्र सम, सील सुभाव अनूप ।
सब अँग सुन्दर हँसत मुख, अद्भुत सुखद सरूप ॥07॥
दोहा
शुक, नारद, उद्धव, जनक, प्रह्लादिक, सनकादि ।
ज्यौं हरि आपुन नित्य हैं, त्यौं ये भक्त अनादि ॥08॥
प्रकट भयौ जयदेव मुख, अद्भुत गीत गोविंद ।
कयौ महा सिंगार रस, सहित प्रेम-मकरंद ॥09॥
अरिल्ल
पद्मावति जयदेव, प्रेम, बस कीने मोहन ।
अष्टपदी जो कहै, सुनत फिरैं ताके गोहन ॥10॥
दोहा
श्रीधर स्वामी तौ मनौं, श्रीधर प्रकटे आनि ।
तिलक भागवत कियौ रचि, सब तिलकनि परमानि ॥11॥
रसिक अनन्य हरिदास जू, गायौ नित्य विहार ।
सेवा हू में दूरि किए, विधि-निषेध जंजार ॥12॥
सघन निकुंजनि रहत दिन, बाढ्यौ अधिक सनेह ।
एक बिहारी हेत लगि छाँड़ि दिये सुख-गेह ॥13॥
रंक छत्र-पति काहु की, धरी न मन परवाह ।
रहे भींजि रस भजन में, लीने कर करुवाह ॥14॥
बल्लभ-सुत विठ्ठल भये, अति प्रसिद्ध संसार ।
सेवा विधि जिहिं समय की, कीनी तिहि व्यौहार ॥15॥
राग-भोग अद्भुत विविध, जो चहियै जिहि काल ।
दिनहिं लड़ाये हेत सौं गिरधर श्री गोपाल ॥16॥
गौड़ देस सब उद्धर्यौ, प्रकट कृष्ण चैतन्य ।
तैसेहि नित्यानंदहू, रस में भये अनन्य ॥17॥
पावत ही तिनकौ दरस, उपजै भजनानन्द ।
बिनु ही श्रम छुटि जाहिं सब, जे माया के फन्द ॥18॥
रूप- सनातन मन बढ्यौ, राधा-कृष्ण अनुराग ।
जानि विश्व नश्वर सबै, तब उपज्यौ बैराग ॥19॥
विष समान तजि विषै-सुख, देश सहित परिवार ।
वृन्दावन कौं यौं चले, ज्यौं सावन जल-धार ॥20॥
तृन तैं नीचौ आपकौं, जानि बसे बन माहिं ।
मोह छाँड़ि ऐसैं रहे, मनौ चिन्हारिहु नाहिं ॥21॥
अरिल्ल
रघुनन्दन सारंग जीव, तिन पाछैं आये ।
कृष्ण कृपा करि सबै, आनि निज धाम बसाये ॥22॥
दोहा
भजन रसिक रघुनाथजी, राधा-कुण्ड स्थान ।
लौंन तक्र ब्रज को लियौ, परस्यौ नहिं कछु आन ॥23॥
वंदन करिकै चिंतवन, गौर-श्याम अभिराम ।
सोवतहू रसना रटै, राधा-कृष्ण सुनाम ॥24॥
श्री बिलास, ब्रजनाथ अरु, श्री चंद, मुकुंद प्रवीन ।
मदन मोहन पद कमल सौं, अधिक प्रीति तिन कीन ॥25॥
महा पुरुष नन्दन भये, करि तन सकल सिंगार ।
सखी-रूप चिंतत फिरैं, गौर-श्याम सुकुमार ॥26॥
नैंन सजल तिहिं रंग में, चित पायौ विश्राम।
विबस वेग ह्वै जात सुनि, लाल-लाड़िली नाम ॥27॥
श्री कृष्णदास हुते जंगली, तेऊ तैसी भाँति ।
तिनके उर झलकत रहे, हेम नील-मनि काँति ॥28॥
युगल प्रेम-रस अवधि में, परयौ प्रबोध मन जाइ।
वृंदावन रस माधुरी, गाई अधिक लड़ाइ ॥29॥
अति विरक्त संसार ते, बसे विपिन तजि भौन।
प्रीति सहित गोपाल भट, सेये राधा-रौन ॥30॥
घमंडी रस में घमड़ि रह्यौ, वृंदावन निज धाम ।
बंशीवट-तट वास किय, गाये श्यामा-श्याम ॥31॥
भट्ट नरायन अति सरस, ब्रज मंडल सौं हेत ।
ठौर-ठौर रचना करी, प्रकट कियौ संकेत ॥32॥
अरिल्ल
वर्द्धमान श्रीभट्ट अरु गंगल ब्रज वृंदावन गायौ ।
करि प्रतीति सर्वोपरि जान्यौ, तातें चित्त लगायौ ॥33॥
भट्ट गदाधर नाथ भट्ट, बिद्या-भजन प्रवीन ।
सरस कथा बानी मधुर, सुनि रुचि होत नवीन ॥34॥
गोविंद स्वामी गंग अरु, बिष्नु विचित्र बनाइ ।
पिय-प्यारी कौ जस कह्यौ, राग रंग सौं छाइ ॥35॥
मन-मोहन सेवा अधिक कीनी है रघुनाथ ।
न्यारीयै रस-भजन की, बात परी तेहि हाथ ॥36॥
गिरिधर स्वामी पर कृपा, बहुत भई दई कुंज ।
रसिक-रसिकनी कौ सुजस, गायौ तिहि सुख पुंज ॥37॥
विठ्ठल बिपुल बिनोद रस, गाई अद्भुत केलि ।
बिलसत लाड़िली-लाल सुख, अंसनि पर भुज मेलि ॥38॥
बिहारीदास निजु एक रस, ज्यौं स्वामी की रीति ।
निर्वाही पाछैं भली तोरी सब सौं प्रीति ॥39॥
मत्त भयौ रस रंग में, करी न दूजी बात ।
बिनु बिहार निजु एक रस, और न कछू सुहात ॥40॥
भर किशोर दोउ लाड़िले, नवल-प्रिया नव-पीय ।
प्रकट देखियत जगमगे, रसिक व्यास के हीय ॥41॥
कहनी-करनी करि गयौ, एक व्यास इहि काल ।
लोक वेद तजि कै भजे, (श्री) राधाबल्लभ लाल ॥42॥
प्रेम मगन नहि गन्यौ कछु, बरनाबरन बिचार ।
सबनिं मध्य पायौ प्रगट, लै प्रसाद रस सार ॥43॥
सेवक की सर को करै, भजन सरोवर हंस ।
मन बच कै धरि एक व्रत, गाये श्रीहरिवंश ॥44॥
वंश बिना हरिनाम हूँ, लियौ न जाकैं टेक ।
पावै सोई वस्तु कौं, जाकैं है व्रत एक ॥45॥
कहा कहौं नहिं कहि सकत, नरवाहन को भाग ।
श्री मुख जाकौ नाम धर्यौ, निजु बानी अनुराग ॥46॥
अति अनन्य निजु धर्म में, नाइक रसिक मुकुंद ।
बसे विपिन रस भजन कै, छाँड़ि जगत दुख-द्वंद ॥47॥
परम भागवत अति भये, भजन माँहि दृढ़ धीर ।
चतुर्भुज वैष्णवदास की, बानी अति गंभीर ॥48॥
सकल देश पावन कियौ, भगवत-जसहिं बढ़ाइ ।
जहाँ-तहाँ निजु एक रस, गाई भक्ति लड़ाइ ॥49॥
परमानन्द किशोर दोऊ, संत मनोहर खेम ।
निर्वाह्यौ नीकैं सबनि, सुंदर भजन कौ नेम ॥50॥
छाँड़ि मोह, अभिमान सब, भक्तन सौं अति दीन।
वृन्दावन बसिकै तिनहिं, फिरि मन अनत न कीन ॥51॥
लालदास स्वामी सरस, जाकैं भजन अनूप ।
बरन्यौ अति दृढ़ अक्षरनि, लाल-लाड़िली रूप ॥52॥
अधिक प्यार है भजन सों, और न कछू सुहात ।
कहत सुनत भगवत् जसहि, निसि दिन जाहि बिहात ॥53॥
बालकृष्ण गति कहा कहौं, कैसेहुँ कहत बनै न।
रूप लाड़ली-लाल कौ, झलमलात तेहि नैंन ॥54॥
अति प्रवीन पंडित अधिक, लेश गर्व कौ नाहिं ।
कीनी सेवा मानसी, निसि-दिन मन तेहि माहिं ॥55॥
ग्यानू नाहरमल्ल की, देखी अद्भुत रीति ।
हरिवंश चंद पद कमल सौं, बाढ़ी दिन-दिन प्रीति ॥56॥
कहा कहौं मोहनदास-रति, ताकी गति भई आन।
व्यासनन्द अन्तर सुनत, तजे तिही छिन प्रान ॥57॥
बिट्ठलदास मुरली धरनि, चरण सेये सब काल ।
तैसेहि लाल गोपाल जी, गाये ललना लाल ॥58॥
सुन्दर मन्दिर की टहल, कीनी अति रुचि मानि।
सफल करी संपति सकल, लगी ठिकाने आनि ॥59॥
अंगीकृत ताकौं कियौ, परम रसिक सिरमौर ।
करुणा निधि बहु कृपा करि, दीनी सनमुख ठौर ॥60॥
बड़ौ उपासक गौड़िया, नाम गोसाईं दास ।
एक चरन बनचन्द बिनु, जाकैं और न आस ॥61॥
नेही नागरीदास अति, जानत नेह की रीति ।
दिन दुलराई लाड़िली, लाल रँगीली प्रीति ॥62॥
व्यासनन्द पद कमल सौं, जाकै दृढ़ विश्वास ।
जेहि प्रताप यह रस कह्यौ, अरु बृन्दावन बास ॥63॥
भली भाँति सेयौ विपिन, तजि बन्धुनि सौं हेत ।
सूर भजन में एक-रस, छाँड्यौ नाहिंन खेत ॥64॥
बिहारी दास दम्पति जुगल, माधौ परमानन्द ।
वृंदावन नीके रहे, काटि लाज कौ फन्द ॥65॥
नीकी भाँति मुकन्द की, कैसेहुँ कहत बनै न।
बात लाड़िली-लाल की, सुनि भरि आवै नैंन ॥66॥
मन-बच करि विश्वास धरि, मारि हिये के काम ।
मात, पिता, तिय छाँड़ि कै, बस्यौ वृन्दावन धाम ॥67॥
अन्तकाल गति कह कहौं, कैसेहुँ कही न जाति ।
चतुरदास वृन्दाबिपिन, पायौ आछी भाँति ॥68॥
चिंतामनि बातनि सरस, सेवा माहिं प्रवीन ।
कहत सुनत भगवत जसहि, छिन छिन उपज नवीन ॥69॥
नागर अरु हरिदास मिलि, सेये नित हरि-दास ।
वृन्दावन पायौ दुहुँनि, पूजी मन की आस ॥70॥
नवल कल्यानी सखिनु के, मन मे अति अनुराग ।
लाल-लड़ैती कुँवरि कौ, गायौ भाग-सुहाग ॥71॥
भली भाँति वृन्दा-अली, अति कोमल सु-सुभाव ।
कृपा लड़ैंती कुँवरि की, उपज्यौ अद्भुत चाव ॥72॥
कीने रास विलास बहु, सुख बरसत संकेत ।
रचना रची कल्यान रुचि, मंडनी दास समेत ॥73॥
सेवा राधारमन की, भक्तनि कौ सनमान ।
साँते बास यमुना कियौ, तिहि सम नहिं कोउ आन ॥74॥
हुते उपासक अधिक ही, या रस में हरिदास ।
निसिदिन बीतै भजन में, राधाकुण्ड निवास ॥75॥
बरसाने गिरिधर सुहृद, जाकै ऐसौ हेत।
भोजन हूँ भक्तनि बिना, धर्यौ रहत नहिं लेत ॥76॥
नंददास जो कछु कह्यौ, राग रंग सौं पागि ।
अच्छर सरस सनेहमय, सुनत स्रवन उठै जागि ॥77॥
रमनदास अद्भुत हुते, करत कवित्त सुढार ।
बात प्रेम की सुनत ही, छुटत नैन जलधार ॥78॥
बावरो सो रस में फिरै, खोजत नेह की बात ।
आछे रस के बचन सुनि, बेगि बिवस ह्वै जात ॥79॥
कहा कहौं मृदुल सुभाव अति, सरस नागरी दास ।
बिहारी-बिहारिन कौ सुजस, गायौ हरषि हुलास ॥80॥
परमानन्द माधौ मुदित, नव-किशोर कल केलि ।
कही रसीली भाँति सौं, तिहि रस में रह्यौ झेलि ॥81॥
सेयौ नीकी भाँति सौं, श्री संकेत स्थान ।
रह्यौ बड़ाई छाँडिकै, सूरज द्विज कल्यान ॥82॥
खरगसेन के प्रेम की, बात कही नहिं जात।
लिखत ललित लीला करत, गये प्राण तजि गात ॥83॥
तैसेहि राघौदास की, बात सुनी यह कान ।
गावत करत धमारि हरि, गये छूटि तन प्रान ॥84॥
इहि बरन भक्त अद्भुत भयौ, और न कछू सुहात ।
अंगनि की छवि माधुरी, चिंतत जाहि बिहात ॥85॥
रोमांचित तन पुलकि ह्वै, नैंन रहे जल पूरि।
जाके आसा एक ही, (श्री) वृन्दावन की धूरि ॥86॥
कह कहौं महिमा भाग की, भई कृपा सब अंग ।
वृन्दावन दासी गह्यौ, जाइ सखिनु कौ संग ॥87॥
लाज छाँड़ि गिरिधर भजी, करी न कछु कुल कान।
सोई मीरा जग विदित, प्रगट भक्ति की खान ॥88॥
ललितहु लाई बोलि कै, तासौं हौ अति हेत ।
आनँद सौं निरखत फिरै, वृन्दावन रस-खेत ॥89॥
निर्तति नूपुर बाँधि कै, गावति लै करतार ।
बिमल हियौ भक्तनि मिली, तृन सम गनि संसार ॥90॥
बंधुनि विष ताकौं दियौ, करि विचार चित आन ।
सो विष फिरि अमृत भयौ, तब लागे पछितान ॥91॥
गंगा जमुना तियनि में, परम भागवत जानि ।
तिनकी बानी सुनत ही, बढ़े भक्ति उर आनि ॥92॥
कुंभन कृष्णदास गिरिधरनि सौं, कीनी साँची प्रीति ।
कर्म-धर्म पथ छाँड़िकै, गाई निजु रस रीति ॥93॥
पूरनमल जसवंत जी, भूपति गोविंद दास ।
हरीदास इनि सबनि मिलि, सेये नित हरि दास ॥94॥
परमानन्द अरु सूर मिलि, गाई सब ब्रज-रीति ।
भूलि जात बिधि भजन की, सुनि गोपिनु की प्रीति ॥95॥
माधौ रामदास बरसानियाँ, ब्रज-विहार के केलि ।
गाये नीकी भाँति सौं, तेहि रस में रहे झेलि ॥96॥
सूरदास अति प्रीति सौं, कवित रीति भलि कीन ।
मदन-मोहन अपनाइ कैं, अंगीकृत करि लीन ॥97॥
जिन-जिन भक्तन प्रीति किय, ताके बस भये आन।
सेन हेत नृप टहल किय, नामा की छाई छाँन ॥98॥
जगत बिदित पीपा धना, अरु रैदास कबीर ।
महा धीर दृढ़ एक रस, भरे भक्ति गंभीर ॥99॥
जगन्नाथ वत्सल भगत, कीनौं जस बिस्तार ।
माधौ भूखौ जानि कैं, लाये भोजन थार ॥100॥
एक समै निसि सीत सौं, काँपन लाग्यौ गात।
आनि उढ़ाई तेहि समै, अपनैं कर सकलात ॥101॥
बिलु-मंगल जब अंध भयौ, आपनु कर गहे आइ ।
भक्तनि पाछें यौं फिरत, ज्यौं बछरा सँग गाइ ॥102॥
रामानँद अंगद सोभू, हरीव्यास अरु छीत।
एक-एक के नाम सौं, सब जग होत पुनीत ॥103॥
रँका बँका भक्त द्वै, महा भजन - रस लीन ।
इन्द्रासन कें सुखनि कौं, मानत तृन सों हीन ॥104॥
नरसी हू अति सरस हिय, कहा देऊँ समतूल ।
कह्यौ महा सिंगार रस, जानि सुखनि कौ मूल ॥105॥
दीनी ताकौं रीझि कैं, माला नन्द-कुमार ।
राखि लियौ अपनी सरन, विमुखनि मुख दै छार ॥106॥
जहाँ जहाँ भक्तनि कौं कछू, परत है संकट आनि ।
तहाँ तहाँ आपुन बीच ह्वै, धरत अभै कौ पानि ॥107॥
भक्त नरायन भक्त सब, धरैं हियैं दृढ़ प्रीति ।
बरनी आछी भाँति सौं, जैसी जाकी रीति ॥108॥
रसिक भक्त भूतल घने, लघुमति क्यौं कहे जाहिं ।
बुधि प्रमान गाये कछू, जो आये उर माहिं ॥109॥
हरि कौं निजु जस तें अधिक भक्तनि-जस पर प्यार ।
तातैं यह माला रची, करि 'ध्रुव' कंठ-सिंगार ॥110॥
भक्तनि की नामावली, जो सुनि है चित लाइ ।
ताके भक्ति बढ़ै घनी, अरु हरि होइ सहाइ ॥111॥
एक बार जिनि नाम लिये, हित सौं ह्वै अति दीन ।
ताकौ संग न छाँड़िहीं, 'ध्रुव' अपनौ करि लीन ॥112॥
ऐसे प्रभु जिन नहिं भजे, सोई अति मति हीन ।
देखि समुझि या जगत में, बुरौ आपुनौं कीन ॥113॥
अजहूँ सोचि बिचारि कैं, गहि भक्तनि पद ओट।
हरि कृपालु सब पाछिली, छमि हैं तेरी खोट ॥114॥
।। जै जै श्री भक्त-नामावली लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश ।।
7. वृहद् वामन पुराण की भाषा
दोहा
बामन बृहद् पुरान की, कछु इक कथा बनाइ ।
भक्तनि हित भाषा करी, जैसैं समुझी जाइ ॥01॥
एक समै भृगु पिता सौं, प्रश्न करी यह आनि ।
करि प्रनाम ठाढ़ौ भयौ, आगैं जोरे पानि ॥02॥
एक असंका उर बढ़ी, चित्त रह्यौ बिस्माइ ।
सर्वोपरि सर्वग्य तुम, हमहिं देहु समुझाइ ॥03॥
नारदादि शुक से जिते, किये भक्त सब गौन।
जाँची रज ब्रज-तियनि की, यह धौं कारन कौन ॥04॥
सुनहु पुत्र समुझी न तैं, रह्यौ भूलि ब्रह्म-ग्यान ।
सर्वोपरि ये हरि-प्रिया, इनकी कौन समान ॥05॥
बहुत बरष हम तप कियौ, इनकी पद-रज हेत ।
सो रज दुर्लभ सबनि कौं, हम हूँ बनी न लेत ॥06॥
और तियनि में गनहु जिनि, ये श्रुति-कन्या आहिं ।
कियौ अधीन पिय साँवरौ, प्रेम चितबनी चाहिं ॥07॥
अब लगि तैं समुझ्यौ नहीं, ब्रज कौ रंग रसाल ।
जो दिन बीते रस बिना, बदि गयौ सब काल ॥08॥
ब्रह्म-ग्यान में रह्यौ भ्रमि, और न कछू सुहात ।
छाँड़ि रसमयी अमृत फल, जाँचत सूखे पात ॥09॥
ग्यानी खोजत ग्यान में, भजनी भजन अपार ।
ते हरि ठाढ़े रहत हैं, ब्रज-देविनु के द्वार ॥10॥
एक भक्त वंदन करत, नहिं चितवत तिनि ओर।
ब्रज बनितनि के पगनि सौं, लावत मुकुट किशोर ॥11॥
निगमनि अस्तुति रुचति नहिं, करत हैं तत्त्व-बिचारि ।
जैसें भावत हेत सौं, ब्रजदेविन की गारि ॥12॥
अजहूँ खोजत लहत नहिं, रिषि मुनि-जन की पाँति ।
द्वार-द्वार ब्रज सुन्दरिनु , फिरत चक्र की भाँति ॥13॥
सब भक्तनि के सिरनि पर, हरि ईश्वर नँदलाल ।
ब्रज में सेवक ह्वै रहे, अद्भुत प्रेम की चाल ॥14॥
एक भजन विधि सौं करत, नीके मानत नाहिं।
जैसे ब्रज जुवती तिनहिं ठेलि पगनि सौं जाहिं ॥15॥
फिरत किशोर चकोर ज्यौं , बरसाने की ओर।
घर-घर प्यारौ लगत है, परे प्रेम की डोर ॥16॥
चित्र-सारी चितवत रहत, जैसैं घन तन मोर।
चहूँ ओर ग्रीवा फिरति, ज्यौं प्रति चन्द्र चकोर ॥17॥
जबहिं द्वार वृषभानु के, आए नंद-कुमार ।
तिहिं छिन गति औरे भई, रही न देह सँभार ॥18॥
हाय-हाय सब कोउ करैं, अद्भुत रूप निहारि ।
कहा भयौ या कुँवर कौं, देत प्रान सब वारि ॥19॥
तनक-भनक श्रवननि परी, रहि न सकी अकुलाइ ।
झाँकी सखियनि संग तजि, कुँवरि झरोखा आइ ॥20॥
लाज छाँड़ि अति प्यार सौं, चितई कछु मुसकाइ ।
सैननि में अति चतुर पिय, रहे चरन सिर नाइ ॥21॥
अंग अंग प्रति फूल भई, आनँद उर न समाइ ।
भाग मानि पहिचानि करि, चले लाल सिर नाइ ॥22॥
सर्वोपरि राधा कुँवरि, पिय प्राननि के प्रान ।
ललितादिक सेवत तिनहिं, अति प्रवीन रस जानि ॥23॥
पहिली पैरी प्रेम की, कीन्ही ब्रज विस्तार ।
भक्तनि हित लीला धरी, करूना निधि सुकुँवार ॥24॥
रच्यौ रास कोऊ बची नहिं, आइ मिलीं ब्रजनारि ।
प्रेम फाग खेलीं तहाँ, सब संकोच निबारि ॥25॥
रिषि-मुनि-जोगिनु के लिये, कबहुँ न लसे ब्रज-चन्द ।
गहि लीन्हें ब्रज-सुन्दरिन, डारि प्रेम कौ फंद ॥26॥
जोइ जोइ ब्रज वनिता कहैं, सोइ सोइ लेत हैं मानि ।
नाचत ज्यौं कठपूतरी, तिनके आगैं आनि ॥27॥
बहुत भाँति लीला चरित, तैसेई भक्त अपार ।
अपनी-अपनी रुचि लिए, करत भक्ति-विस्तार ॥28॥
और चरित बहु भाँति के, कीन्हे हैं जग केत ।
दूजौ कारन नाहिं कछु, ते सब भक्तनि हेत ॥29॥
अर्जुन पूछ्यौ कृष्ण सौं, मेरे एक सँदेहु ।
कौन भक्त प्यारौ तुम्हैं, यह मोसौं कहि देहु ॥30॥
भक्त जगत में बहुत हैं, तिनकौं नाहिं प्रमान ।
हौं गोपिन के हिय बसौं, गोपी मेरे प्रान ॥31॥
बैकुंठहु ते अधिक है, मथुरा मण्डल जान ।
तामें ताहू ते अधिक, ब्रज मण्डल सुख खान ॥32॥
अति सुदेस माया रहित, इकइस जोजन भूमि ।
जहाँ सहाइ ब्रजबास की, रहत कृष्ण दिन झूमि ॥33॥
मधि राजत ज्यौं मुकुट मणि, वृन्दावन रसकन्द ।
रसमय सुखमय तेजमय, झलकत कोटिक चन्द ॥34॥
एक रंग रुचि एक रस, अद्भुत नित्य-बिहार ।
जहाँ किशोरी लाड़िली, करी लाल उर-हार ॥35॥
निसदिन तो पहिरे रहैं, रूप की मनि उजियार ।
रस में लटकि छके रहैं, अधर सुधा आहार ॥36॥
अंग-अंग मन-मन मिले, नैननि-नैन विशाल ।
रूप-बेलि प्यारी बनी, छबि के लाल तमाल ॥37॥
जोरी दूलहु-दुलहिनी, मोहन-मोहिनी आहि ।
परम न अंतर निमिष कौ, जीवत रूपहि चाहि ॥38॥
महा मधुर रस-माधुरी, नव-नव वैस किशोर ।
अद्भुत रस में मगन रहि, नहिं जानत निशि भोर ॥39॥
नव किशोरता-माधुरी, सब गुन लीन्हें संग ।
युगल चरन सेवत रहैं, रँगी प्रेम के रंग ॥40॥
नित्य लाड़िली लाल दोऊ, नित वृन्दावन धाम ।
नित्य सखी ललितादि निजु, सेवत श्यामा-श्याम ॥41॥
ब्रज में जो लीला चरित, भये जु बहुत प्रकार ।
सबकौ सार बिहार है, रसिकनि कियौ निरधार ॥42॥
वृन्दावन-महिमा कछुक, कहत हौं सो सुनि लेहु ।
द्रुम-द्रुम प्रति अरु लता प्रति, लपट्यौ सहज सनेहु ॥43॥
महा प्रलय जबही भयौ, रह्यौ न कछुवै आँन ।
गिरि, वन, व्यौम न भूमि रही, नहिं नक्षत्र शशि भाँन ॥44॥
सर सरिता सागर मिले, अमित मेघ की धार ।
तीन लोक जल चढ़ि गयौ, बूढ्यौ सब संसार ॥45॥
कोटि-कोटि उतपति प्रलय, होति रहति इहि भाँति ।
जैसैं अरहट की घरी, भरि-भरि, ढरि-ढरि जाति ॥46॥
लोक पाल लीला-रचित, अब कछु दीसति नाँहि ।
निगम रिचा भूली भ्रमत, तरत फिरैं तिन माँहिं ॥47॥
सहज बिराजत एक रस, वृन्दावन निज भौंन ।
माया-जल परसत नहीं, अरु माया की पौंन ॥48॥
न्यारौ चौदह लोक तें, वृन्दावन निज धाम ।
इक रस बिलसत रहत नित, सहजहिं श्यामा-श्याम ॥49॥
चहूँ ओर वृंदा विपिन, सेवत सब औतार ।
विहारी विहारिनि करत तहँ, आनँद रंग-विहार ॥50॥
निगमनि सोच-विचारि कैं, यह ठहराई चित्त ।
भजन ताहि कौ कीजियै, इक-रस रहै जु नित्त ॥51॥
तव लागे अस्तुति करन, बाढ्यौ उर आनंद ।
जाने पूरन सबनि पर, श्री वृन्दावन-चन्द ॥52॥
एकै पुरुष किशोर वर, दूजौ नाहिंन कोइ ।
जाकी इच्छा सहज ही, यह कौतुक सब होइ ॥53॥
गावत जाकौ सुजस रस, आनँद बढ्यौ अपार ।
देखि कछू छवि की छटा, वृन्दा विपिन बिहार ॥54॥
रूप-माधुरी देखि कछु, विवस भये मुरिझाइ ।
बाढ़ी रुचि की चाह अति, रहे ललचाइ-लुभाइ ॥55॥
काम-कामना बढ़ी उर, यह उपजी अति आइ ।
खेलैं ऐसे रूप सँग, वनिता कौ तन पाइ ॥56॥
तिनि प्रति तव बानी भई, यह प्रभु लीन्ही मानि ।
प्रगट होहु व्रज जाइ तुम, हमहूँ प्रगटैं आनि ॥57॥
तहाँ सबै सुख पाइहौ, जो-जो करी मन-आस ।
हम तुम एकहि संग मिलि, करिहैं रास-विलास ॥58॥
जाकी बानी भई ही, सो सखि प्रगटी आइ ।
वेदनि के आनँद भयौ, अद्भुत दरसन पाइ ॥59॥
एक असंका बढ़ी उर, चित्त रह्यौ विस्माइ ।
कछु इक नित्य-बिहार रस, हमहिं देहु समुझाइ ॥60॥
प्रभु आज्ञा इक भई है, सो पहिलैं करि लेहुँ ।
ता पाछैं जो पूछि हौ, ताकौ उत्तर देहुँ ॥61॥
सखी कियौ जब चिंतवन, श्रीपति प्रगटे आइ ।
प्रभु आज्ञा तिन सौं भई, सृष्टि रचावहु जाइ ॥62॥
ऐसें ही अवतार सब, लीन्हे तहाँ बुलाइ ।
अपनौं-अपनौं काज तुम, कीजौं समयौ पाइ ॥63॥
धर्मराज सौं कही तहाँ, मेरौ वचन सुनि लेहु ।
जाकें रंचक भक्ति है, ताहि कष्ट जिनि देहु ॥64॥
भक्तनि छाँड़े अरु सबनि कौं, तेरे आगैं न्याउ ।
हरि भक्तन तैं विमुख जे, तिनकौं तू समुझाउ ॥65॥
पुनि फिरि वेदन सों कही, जो पूछ्यौ सुनि लेहु ।
नित ही नित्य बिहार करैं, यामें कछु न संदेहु ॥66॥
नित्य सहज वृंदा विपिन, नित्य सखी ललितादि ।
नित ही विलसत एक रस, युगल किशोर अनादि ॥67॥
नवल प्रेम सौं रँगे दोऊ, नित ही नवल किशोर ।
होत रहत उत्पति प्रलय, नहि जानत निशि भोर ॥68॥
वेदहु जानैं अंश सब, मिट्यौ भरम तिहिंकाल ।
समुझे पूरन सबनि पर, नित्य बिहारी लाल ॥69॥
अपनैं-अपनैं सदन कौं, कीन्हौं सबनि पयान ।
ता पाछैं सोई सखी, भई जु अन्तरध्यान ॥70॥
श्रीपति चितयौ आपु ही , प्रकृति पुरुष की कोद ।
तेही छिन उपजी हियैं, कीजै जगत विनोद ॥71॥
प्रथमहिं माया ते भये महत्तत्त्व अहँकार ।
अहंकार त्रै रूप भयौ, तातें जग विस्तार ॥72॥
प्रथमहिं प्रकटे तीन गुन, ब्रह्मा बिष्णु महेश ।
ता पाछें सुर असुर नर, लोक-पाल सर्वेश ॥73॥
दोइ मुहूरत में रचे, चौदह लोक बनाइ ।
बाढी प्रभुता पुरुषता, कापै बरनी जाय ॥74॥
बहुत भाँति लीला चरित, तिनकौ नाहिन पार ।
सोई भूल्यौ भ्रम्यौ फिरै, कियौ चहै निरधार ॥75॥
सब तजि युगल किशोर भजि, जो चाहत विश्राम।
हित ध्रुव' मन बच हेत सौं, सेवहु श्यामा-श्याम ॥76॥
।। जै जै श्री वृहद् वामन पुराण लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश ।।
दोहा
बामन बृहद् पुरान की, कछु इक कथा बनाइ ।
भक्तनि हित भाषा करी, जैसैं समुझी जाइ ॥01॥
एक समै भृगु पिता सौं, प्रश्न करी यह आनि ।
करि प्रनाम ठाढ़ौ भयौ, आगैं जोरे पानि ॥02॥
एक असंका उर बढ़ी, चित्त रह्यौ बिस्माइ ।
सर्वोपरि सर्वग्य तुम, हमहिं देहु समुझाइ ॥03॥
नारदादि शुक से जिते, किये भक्त सब गौन।
जाँची रज ब्रज-तियनि की, यह धौं कारन कौन ॥04॥
सुनहु पुत्र समुझी न तैं, रह्यौ भूलि ब्रह्म-ग्यान ।
सर्वोपरि ये हरि-प्रिया, इनकी कौन समान ॥05॥
बहुत बरष हम तप कियौ, इनकी पद-रज हेत ।
सो रज दुर्लभ सबनि कौं, हम हूँ बनी न लेत ॥06॥
और तियनि में गनहु जिनि, ये श्रुति-कन्या आहिं ।
कियौ अधीन पिय साँवरौ, प्रेम चितबनी चाहिं ॥07॥
अब लगि तैं समुझ्यौ नहीं, ब्रज कौ रंग रसाल ।
जो दिन बीते रस बिना, बदि गयौ सब काल ॥08॥
ब्रह्म-ग्यान में रह्यौ भ्रमि, और न कछू सुहात ।
छाँड़ि रसमयी अमृत फल, जाँचत सूखे पात ॥09॥
ग्यानी खोजत ग्यान में, भजनी भजन अपार ।
ते हरि ठाढ़े रहत हैं, ब्रज-देविनु के द्वार ॥10॥
एक भक्त वंदन करत, नहिं चितवत तिनि ओर।
ब्रज बनितनि के पगनि सौं, लावत मुकुट किशोर ॥11॥
निगमनि अस्तुति रुचति नहिं, करत हैं तत्त्व-बिचारि ।
जैसें भावत हेत सौं, ब्रजदेविन की गारि ॥12॥
अजहूँ खोजत लहत नहिं, रिषि मुनि-जन की पाँति ।
द्वार-द्वार ब्रज सुन्दरिनु , फिरत चक्र की भाँति ॥13॥
सब भक्तनि के सिरनि पर, हरि ईश्वर नँदलाल ।
ब्रज में सेवक ह्वै रहे, अद्भुत प्रेम की चाल ॥14॥
एक भजन विधि सौं करत, नीके मानत नाहिं।
जैसे ब्रज जुवती तिनहिं ठेलि पगनि सौं जाहिं ॥15॥
फिरत किशोर चकोर ज्यौं , बरसाने की ओर।
घर-घर प्यारौ लगत है, परे प्रेम की डोर ॥16॥
चित्र-सारी चितवत रहत, जैसैं घन तन मोर।
चहूँ ओर ग्रीवा फिरति, ज्यौं प्रति चन्द्र चकोर ॥17॥
जबहिं द्वार वृषभानु के, आए नंद-कुमार ।
तिहिं छिन गति औरे भई, रही न देह सँभार ॥18॥
हाय-हाय सब कोउ करैं, अद्भुत रूप निहारि ।
कहा भयौ या कुँवर कौं, देत प्रान सब वारि ॥19॥
तनक-भनक श्रवननि परी, रहि न सकी अकुलाइ ।
झाँकी सखियनि संग तजि, कुँवरि झरोखा आइ ॥20॥
लाज छाँड़ि अति प्यार सौं, चितई कछु मुसकाइ ।
सैननि में अति चतुर पिय, रहे चरन सिर नाइ ॥21॥
अंग अंग प्रति फूल भई, आनँद उर न समाइ ।
भाग मानि पहिचानि करि, चले लाल सिर नाइ ॥22॥
सर्वोपरि राधा कुँवरि, पिय प्राननि के प्रान ।
ललितादिक सेवत तिनहिं, अति प्रवीन रस जानि ॥23॥
पहिली पैरी प्रेम की, कीन्ही ब्रज विस्तार ।
भक्तनि हित लीला धरी, करूना निधि सुकुँवार ॥24॥
रच्यौ रास कोऊ बची नहिं, आइ मिलीं ब्रजनारि ।
प्रेम फाग खेलीं तहाँ, सब संकोच निबारि ॥25॥
रिषि-मुनि-जोगिनु के लिये, कबहुँ न लसे ब्रज-चन्द ।
गहि लीन्हें ब्रज-सुन्दरिन, डारि प्रेम कौ फंद ॥26॥
जोइ जोइ ब्रज वनिता कहैं, सोइ सोइ लेत हैं मानि ।
नाचत ज्यौं कठपूतरी, तिनके आगैं आनि ॥27॥
बहुत भाँति लीला चरित, तैसेई भक्त अपार ।
अपनी-अपनी रुचि लिए, करत भक्ति-विस्तार ॥28॥
और चरित बहु भाँति के, कीन्हे हैं जग केत ।
दूजौ कारन नाहिं कछु, ते सब भक्तनि हेत ॥29॥
अर्जुन पूछ्यौ कृष्ण सौं, मेरे एक सँदेहु ।
कौन भक्त प्यारौ तुम्हैं, यह मोसौं कहि देहु ॥30॥
भक्त जगत में बहुत हैं, तिनकौं नाहिं प्रमान ।
हौं गोपिन के हिय बसौं, गोपी मेरे प्रान ॥31॥
बैकुंठहु ते अधिक है, मथुरा मण्डल जान ।
तामें ताहू ते अधिक, ब्रज मण्डल सुख खान ॥32॥
अति सुदेस माया रहित, इकइस जोजन भूमि ।
जहाँ सहाइ ब्रजबास की, रहत कृष्ण दिन झूमि ॥33॥
मधि राजत ज्यौं मुकुट मणि, वृन्दावन रसकन्द ।
रसमय सुखमय तेजमय, झलकत कोटिक चन्द ॥34॥
एक रंग रुचि एक रस, अद्भुत नित्य-बिहार ।
जहाँ किशोरी लाड़िली, करी लाल उर-हार ॥35॥
निसदिन तो पहिरे रहैं, रूप की मनि उजियार ।
रस में लटकि छके रहैं, अधर सुधा आहार ॥36॥
अंग-अंग मन-मन मिले, नैननि-नैन विशाल ।
रूप-बेलि प्यारी बनी, छबि के लाल तमाल ॥37॥
जोरी दूलहु-दुलहिनी, मोहन-मोहिनी आहि ।
परम न अंतर निमिष कौ, जीवत रूपहि चाहि ॥38॥
महा मधुर रस-माधुरी, नव-नव वैस किशोर ।
अद्भुत रस में मगन रहि, नहिं जानत निशि भोर ॥39॥
नव किशोरता-माधुरी, सब गुन लीन्हें संग ।
युगल चरन सेवत रहैं, रँगी प्रेम के रंग ॥40॥
नित्य लाड़िली लाल दोऊ, नित वृन्दावन धाम ।
नित्य सखी ललितादि निजु, सेवत श्यामा-श्याम ॥41॥
ब्रज में जो लीला चरित, भये जु बहुत प्रकार ।
सबकौ सार बिहार है, रसिकनि कियौ निरधार ॥42॥
वृन्दावन-महिमा कछुक, कहत हौं सो सुनि लेहु ।
द्रुम-द्रुम प्रति अरु लता प्रति, लपट्यौ सहज सनेहु ॥43॥
महा प्रलय जबही भयौ, रह्यौ न कछुवै आँन ।
गिरि, वन, व्यौम न भूमि रही, नहिं नक्षत्र शशि भाँन ॥44॥
सर सरिता सागर मिले, अमित मेघ की धार ।
तीन लोक जल चढ़ि गयौ, बूढ्यौ सब संसार ॥45॥
कोटि-कोटि उतपति प्रलय, होति रहति इहि भाँति ।
जैसैं अरहट की घरी, भरि-भरि, ढरि-ढरि जाति ॥46॥
लोक पाल लीला-रचित, अब कछु दीसति नाँहि ।
निगम रिचा भूली भ्रमत, तरत फिरैं तिन माँहिं ॥47॥
सहज बिराजत एक रस, वृन्दावन निज भौंन ।
माया-जल परसत नहीं, अरु माया की पौंन ॥48॥
न्यारौ चौदह लोक तें, वृन्दावन निज धाम ।
इक रस बिलसत रहत नित, सहजहिं श्यामा-श्याम ॥49॥
चहूँ ओर वृंदा विपिन, सेवत सब औतार ।
विहारी विहारिनि करत तहँ, आनँद रंग-विहार ॥50॥
निगमनि सोच-विचारि कैं, यह ठहराई चित्त ।
भजन ताहि कौ कीजियै, इक-रस रहै जु नित्त ॥51॥
तव लागे अस्तुति करन, बाढ्यौ उर आनंद ।
जाने पूरन सबनि पर, श्री वृन्दावन-चन्द ॥52॥
एकै पुरुष किशोर वर, दूजौ नाहिंन कोइ ।
जाकी इच्छा सहज ही, यह कौतुक सब होइ ॥53॥
गावत जाकौ सुजस रस, आनँद बढ्यौ अपार ।
देखि कछू छवि की छटा, वृन्दा विपिन बिहार ॥54॥
रूप-माधुरी देखि कछु, विवस भये मुरिझाइ ।
बाढ़ी रुचि की चाह अति, रहे ललचाइ-लुभाइ ॥55॥
काम-कामना बढ़ी उर, यह उपजी अति आइ ।
खेलैं ऐसे रूप सँग, वनिता कौ तन पाइ ॥56॥
तिनि प्रति तव बानी भई, यह प्रभु लीन्ही मानि ।
प्रगट होहु व्रज जाइ तुम, हमहूँ प्रगटैं आनि ॥57॥
तहाँ सबै सुख पाइहौ, जो-जो करी मन-आस ।
हम तुम एकहि संग मिलि, करिहैं रास-विलास ॥58॥
जाकी बानी भई ही, सो सखि प्रगटी आइ ।
वेदनि के आनँद भयौ, अद्भुत दरसन पाइ ॥59॥
एक असंका बढ़ी उर, चित्त रह्यौ विस्माइ ।
कछु इक नित्य-बिहार रस, हमहिं देहु समुझाइ ॥60॥
प्रभु आज्ञा इक भई है, सो पहिलैं करि लेहुँ ।
ता पाछैं जो पूछि हौ, ताकौ उत्तर देहुँ ॥61॥
सखी कियौ जब चिंतवन, श्रीपति प्रगटे आइ ।
प्रभु आज्ञा तिन सौं भई, सृष्टि रचावहु जाइ ॥62॥
ऐसें ही अवतार सब, लीन्हे तहाँ बुलाइ ।
अपनौं-अपनौं काज तुम, कीजौं समयौ पाइ ॥63॥
धर्मराज सौं कही तहाँ, मेरौ वचन सुनि लेहु ।
जाकें रंचक भक्ति है, ताहि कष्ट जिनि देहु ॥64॥
भक्तनि छाँड़े अरु सबनि कौं, तेरे आगैं न्याउ ।
हरि भक्तन तैं विमुख जे, तिनकौं तू समुझाउ ॥65॥
पुनि फिरि वेदन सों कही, जो पूछ्यौ सुनि लेहु ।
नित ही नित्य बिहार करैं, यामें कछु न संदेहु ॥66॥
नित्य सहज वृंदा विपिन, नित्य सखी ललितादि ।
नित ही विलसत एक रस, युगल किशोर अनादि ॥67॥
नवल प्रेम सौं रँगे दोऊ, नित ही नवल किशोर ।
होत रहत उत्पति प्रलय, नहि जानत निशि भोर ॥68॥
वेदहु जानैं अंश सब, मिट्यौ भरम तिहिंकाल ।
समुझे पूरन सबनि पर, नित्य बिहारी लाल ॥69॥
अपनैं-अपनैं सदन कौं, कीन्हौं सबनि पयान ।
ता पाछैं सोई सखी, भई जु अन्तरध्यान ॥70॥
श्रीपति चितयौ आपु ही , प्रकृति पुरुष की कोद ।
तेही छिन उपजी हियैं, कीजै जगत विनोद ॥71॥
प्रथमहिं माया ते भये महत्तत्त्व अहँकार ।
अहंकार त्रै रूप भयौ, तातें जग विस्तार ॥72॥
प्रथमहिं प्रकटे तीन गुन, ब्रह्मा बिष्णु महेश ।
ता पाछें सुर असुर नर, लोक-पाल सर्वेश ॥73॥
दोइ मुहूरत में रचे, चौदह लोक बनाइ ।
बाढी प्रभुता पुरुषता, कापै बरनी जाय ॥74॥
बहुत भाँति लीला चरित, तिनकौ नाहिन पार ।
सोई भूल्यौ भ्रम्यौ फिरै, कियौ चहै निरधार ॥75॥
सब तजि युगल किशोर भजि, जो चाहत विश्राम।
हित ध्रुव' मन बच हेत सौं, सेवहु श्यामा-श्याम ॥76॥
।। जै जै श्री वृहद् वामन पुराण लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश ।।
8. सिद्धान्त-विचार
।। बचनिका ।।
प्रेम की बात कुछ इक लाड़िली लालजू जैसी उर में उपजाई, तैसी कही। रसिक भक्तनि सौं यह विनती है, जो कछु घटि बढ़ि भूलि कही गई होइ, तौ कृपा करि समुझाइ दैनी।
जेहि प्रेम माधुरी श्री युगलचंद, आनंदकंद, नित्यानंद, उन्नत नित्य किशोर श्री वृंदावन निकुंज बिहार रसमत्त विलास करत हैं, यथामति किंचित् ढीठ्यौ कै कही। जैसें सिंधु तैं सीप भरि लीजै।
प्रेम-नेम के लक्षन कहा। कहा प्रेम, कहा नेम ।
प्रेम कौ निज रूप चाह, चटपटी, अधीनता, उज्वलता, कोमलता, स्निग्धता, सरसता, नूतनता, सदा एकरस, रुचि-तरंग बढ़त रहै, सहज स्वच्छंद, मधुरता, मादिकता, जाकौ आदि अन्त नाहीं, छिन-छिन नूतन स्वाद ।
अरु नेम अनेक भाँति हैं। कछु इक कहैं; देखिबौ, हँसिबौ, बोलिबौ, मान, निकुंजांतर किंवा निकट होइ और कोक के विलासादिक सब प्रेम के नेम हैं। जाकौ आदि-अन्त होइ सो सब नेम जानिबौ।
जहाँ संयोग में देखत-देखत बिरह रहे तहाँ स्थूल विरह की समाई नाहीं। सब रस, सब सिंगार, सब प्रेम, सब नेम, मूर्ति धरै श्री किशोरी-किशोरजू कौं सर्वदा सेवत रहत हैं। जिन भक्तनि जैसौ भाव धरि भजे, तिनकौं तहाँ पूरन सुख देत हैं।
प्रेम नेम के रूप अनेक हैं, कहाँ ताई कहे जाहिं। प्रेम मई रस को सार ब्यौरौ कियौ। श्री किशोरी-किशोरजू के प्रेम ही को नेम है और कछू रुचत नाहिं । ताही रस में मन दीजै सदा, कै उनके रसिक उपासिकनि सौं चित्त लावै, सदा संग करै।
ते रसिक भक्त कैसे हैं ? छाँडि रसिक रसिकिनी जू के प्रेम रस-विहार बिना और बात कछु रुचत नाहिं । तिनि की दृष्टि में और रस कछु न आवै, तिहिं रस के बल सब तें बेपरवाह रहत हैं। और जहाँ ताई अवतार लीला तहाँ तैसीये भाँति के भक्त हैं। एक भक्त ऐसे हैं, सब औतार लीला गावत हैं कछु भेद नाहीं, ये ऐश्वर्य महातम ज्ञान लिये हैं। एकनि के इष्ट धर्म है, ये उनतें सरस कहिये। काहे ते जु इहाँ सनेह पाइयतु हैं। इष्ट कहिये सनेही सौं तातें सनेही कौं छाँड़ि दूसरी ठौर मन न चलै, जो चलै तौ सनेही नाहीं । अनन्यता याकौं कहियै छाँडि अपनौ इष्ट और न जानै, न मन चलै। जो चलै तौ अनन्यता नाही। रसिक तासौं कहिये, जो रस कौ सार गहै।
और जहाँ ताई भक्त उद्धव, जनक, सनकादिक अरु लीला, द्वारिका, मथुरा आदि तिन सबनि पर अति गरिष्ट सर्वोपरि ब्रजदेविनु कौ प्रेम है। ब्रह्मादिक जिनकी पदरज बांछत हैं। तिनके रस पर महारस, अति दुर्लभ, श्री वृन्दावनेश्वरी, श्री वृन्दावनचन्द आनंदघन उन्नत नित्य किशोर सबके चूड़ामणि तिनके प्रेममयी निकुंज माधुरी विलास ललिता विसाखा आदि। इन सखियनि के प्रान अधार अहार यहै हैं। इनि सखियनि कौ प्रेम सर्वोपरि जानियै। या पर न और सुख न और रस। श्री रसिकानंद किशोर प्रेम की सीवाँ ललिता बिसाखादि सखियन कौ प्रेम बिना सीवाँ, जु कह्यौ न जाइ । सदा नौतन तें नौतन एकरस रहै। इनकौ प्रेम समुझनौ अति कठिन है। जिनि पर उनकी कृपा होइ तब ही उर में आवै। सखियनि कौ प्रेम सर्वोपरि विराजमान है, काहे तैं जु लाड़िली लालजू के मननि कौ कोई एक सुख है, तासौं आसक्त अवलम्बि रही है। इनकौ भाव धरि याही रस की उपासना में कपट छाँडि, भ्रम छाँडि निशिदिन मन दै इहै विचार में रहै। अनन्य होइ ताकौ भाग कहिबे कौं कोऊ समर्थ नाहीं, इति।
एक में कही कि जब प्रेम उपजै तब नेम रहै कि जाइ ? जे नेम, प्रेम तें न्यारे हैं ते जाँइ, अरु जे नेम, प्रेम सौं जंत्रित हैं ते कैसे जाँइ ? नौधा भक्ति हूँ नेम है, जब प्रेम-लक्षना उपजै ताही प्रेम में लीन ह्वै रहै। ताकौ दृष्टांत-जैसे स्वेत वस्त्र लाल रँग्यौ, तब वह लाल भयौ, वस्त्र कहूँ नाहीं गयौ, अरु जैसे भरिया पात्र कौ आकार नेम, पात्र प्रेम। जो करिये अरु निबरै सो सब नेम। अरु सदा एक रस रहे सो प्रेम | अद्भुत प्रेम की गति ऐसी है, जो देह के सुख जहाँ ताई हैं ते सब भूलि जाहिं । एक जासौं प्रेम है ताही रंग में रँगै। अरु ताके अंग-संग की जेती बातें हैं, ते सब प्यारी लागें--- ताके नातें। अरु ताकौं भावै सोइ याकौं रुचै।
एक ने कही प्रेम में अरु काम में कहा भेद है सो कहौ, समुझाइ देउ ? तातें जैसी यथामति उपजी तैसी कही। और जहाँ ताई सुख हैं तिन पर काम-रस अधिक है या पर और नाहिं। तहाँ व्यास जू ने कही, उहाँ के सुख की निशानी। पद में-“काम रति सुख की निशानी।“ या प्रेम के सुख रस आगे सो काम लज्जित होइ रहै। तातें सबनि काम-सुख नेंम में राखे। या पर प्रेम कौ सुख निमित्त रहित सदा एक रस है। ताते प्रेम-नेम के लक्षन ऊपर कहि आये हैं। जाकौ आदि-अंत होइ सो सब नेम जानिबौ। जाकौ अंत नाहीं सो प्रेम सर्वदा एक रस रहे सो अद्भुत प्रेम है। युगल किशोर जू कौ रूप जानिबौ जा प्रेम नें ये बस किये हैं, सो प्रेम महा अद्भुत है। ता प्रेम के एक निमेष पर और सुख कोटि कलपनि के वारि डारिये। स्वाद विशेष के लिये भयौ शुद्ध प्रेम है। जैसे खाँड़ अरु जल एकत्र कियौ तब खाँड़ न जल शरबत भयौ । खाँड़ जल हू वाही में है। ऐसे महामधुर रस स्वाद कौं शुद्ध प्रेम है प्रगट कियौ।
जहाँ नायक-नाइका बरनन कियौ है।नाइक अपनौ सुख चाहै नायका अपनौ रस चाहै । सो यह प्रेम न होइ, साधारण सुखभोग है। जब ताई अपनौं-अपनौं सुख चाहियै तब ताई प्रेम कहाँ पाइयै ? दोइ सुख, दोइ मन, दोइ रुचि जब ताई प्रेम कहाँ पाइये है। दोइ सुख, दोइ मन, दोइ रुचि जब ताई एक न हौंइ तब ताई प्रेम कहाँ ? कामादिक सुख जहाँ स्वारथ भये हैं तौ और सुखनि की कौन चलावै, निमित्त रहित, नित्य प्रेम सहज एकरस श्री किशोरी-किशोर जू के है और कहूँ नाहीं।
जो कोऊ कहै कि काम नेम में कहि आये तौ उनहूँ कौ काम-केलि तौ गाई है। सो यह काम प्राकृत न होइ प्रेममई जानिवौ, निज प्रेम है। नेम, रस-सिंगार पोषक के लिये न्यारे कै कहे हैं। जो बात प्रिया जू के अंग-संग ते उपजै सोई प्रीतम कौं प्यारी लागै। यह अप्राकृत प्रेम है। श्री कृष्ण काम के बस नाहीं। जिनको रूप देखत कोटि-कोटि मनोज रति सहित मूर्छित हौंहिं। ऐसे नवल किशोर श्रीवृन्दावन चन्द जू मदन सहित सबके मन मोहि राखें । तेई यहाँ श्रीवृन्दावनेश्वरी जू के प्रेममई अनंग चितवनि, रसमई भौंहनि तें तरंग उपजै, तिन प्रेममई अनंग में सहज ही ऐसे मनमोहन मोहि राखे। अपनें बस किये, सो साक्षात् प्रेम है। श्रीप्रियाजू जित चाहें, जित चलैं, जासौं बोलें, जु पहिरें, जु हाँथ करि छुवैं ते सब बात प्रीतम के प्रान ह्वै जाहिं । यहाँ कौ नेम ऐसौ है जु प्रेम शोभा पावै। एकरस समुझनो। जैसें ताना-बाना दोऊ मिलि एक पट भयौ। स्वाद के लिये नेम न्यारे कै कहे हैं। नेम प्रेम को साधन सो एकै जानिबो। प्रिया जू को अंग-संग छाँड़ि और ठौर मन न चलै, प्रीति ऐसी है। तहाँ श्रीजी की बानी, “प्रीति की रीति रंगीलोई जानै”।
यह बात प्रेम की, बिना श्रीवृन्दावनचन्द को जानै, को समुझे ? जो बात प्रिया जू कौं भावै सोई इनकौं भावै। तहाँ श्रीजी की बानी- “जोई-जोई प्यारौ करै सोई मोहिं भावै, भावै मोहि जोई सोई-सोई करें प्यारे।‘ सहज प्रेम के रस में दोऊ मत्त रहत हैं। एकरस सनेह की रीति ऐसी है जो सनेही कौ सुख चाहै अपनी चाह कछु नाँही। श्री प्रियाजू जु बिलास करें सो सब लालजू के हेत अरु लालजू जामैं लाड़िलीजू सुख पावैं सोई करें, अपनी चाह कछू नाँही। तहाँ भर केलि महामदन के सुख रस में लाल जू के वचन, तहाँ श्रीजी की बानी “विरमि-विरमि नाथ बदत वर विहार री”। तातें सनेही के सुख सौं आसक्त होइ सो सनेही कहिये। जैसे सखियनि की रीति, दोउन के प्रेम रस सौं अवलम्बि रही हैं और निमित्त बीच कछू नाहीं।
श्री गुसाँई श्रीहरिवंशचन्द्रजू प्रगट भये युगल केलि रस माधुरी प्रगट करिबे कौं। और सबनि मिश्रित गाई, प्रेम की आसक्तता श्रीगुसाँईजू ने गाई।
आसक्त कहा ? सक्ति रहित आसक्त । जब ताईं मन की गति भँवर की सी चंचल फिरै तब ताईं आसक्त नाहीं। जब सब ठौर ते चंचलता छुटै तब आसक्ति के रस में अटकै। तहाँ श्रीजू की बानी-
“कहा कहौं इन नैननि की बात।
ये अलि प्रिया बदन अम्बुज रस अटके अनत न जात” ।।
अरु “चंचल रसिक मधुप मोहन मन राखे कनक कमल कुच कोरी” इत्यादि।
ऐसै रसिक लाड़िली लाल जू जिनकौ मूरतिवन्त आसक्तता सेवत रहे है।
पद-बिहारीदासजी - "आसक्त उपासक दम्पति कौ सुख।"
दोहा पुरातन - फँद सरकावत फिरत दिन, चित चंचल जु कहंत।
फँद्यौ जु कुंतल विकट लट टक-टक मुख जोवंत।।
श्री लाड़िली-लाल जू प्रेम रसमई मूरतिवंत हैं। इनतें उपजै सो सब प्रेम है विलासमई। तातें दोइ नाम रस स्वाद के निमित्य परे। प्रेम, नेम। जैसे तंतु कौ तानौ-बानौ, न्यारौ कोई नाहीं। और सोना है तातें भूषन कर्यौ सो नेम भयौ । सोना एक रस है सो प्रेम है ।
।। कुण्डलिया ।।
प्रेम मदन के सिंधु द्वै, बहत रहत दिन हीय।
कबहुँ बिबस चेतत कबहुँ, छिन छिन प्यारी-पीय ।।
छिन-छिन प्यारी पीय, मधुर रस बिलसत ऐसैं।
सूक्षम प्रेम की बात, कहौ कोउ बरने कैसें ।।
यह सुख सखियनि बाँट पर्यौ, भूले 'ध्रुव' सब नेम।
इक रस फूली फिरति सँग, पाइ माधुरी प्रेम ।।
प्रेम मदन के सिंधु द्वै लाड़िली लालजू के हिये बहत रहत हैं। जब प्रेम रूपी सिन्धु के तंरग छावैं तब बिवस होहिं। जब मदन रूपी सिंधु के तरंग छावै तब चैतन्य होंहिं। विलास-रंग में परे ऐसैं प्रेम-नेम ओत-प्रोत हैं। प्रेम की क्रिया बिवसता। नेम की क्रिया सावधानता । यातें एक कहिये स्वाद कौं दोइ। कबहूँ खिलारी खेल बस और कबहूँ खिलारी बस खेल ।। ऐसी भाँति कौ विहार निसि-दिन करत हैं। या रस की अधिकारिनी सखी हैं कै जिन रसिक भक्तनि कैं सखियनि कौ भाव है । धन्य तेई भक्त रसिक।
श्री वृन्दावन निकुंज धाम में श्री वृन्दावनचन्द उन्नत नित्य किशोर प्रेममई बिलास करत हैं। तामें प्रेम ही कौ नेम नित्य है एक रस है कबहूँ न छूटै। तहाँ की आसंका कोऊ जिनि करौ। निमित्य रहित बिहार में दोऊ मगन रहत हैं, यहाँ प्रेम-नेम में कछु भेद नाहीं, स्वाद विशेष के लिए कहे हैं। जैसे रसमई फल। बिनु गुठली बिनु बकला होइ। तातें इनके रस-बिहार में दोइ रस नाहीं एक प्रेम सौं आसक्त हैं। निश्चै मन क्रम वचन कै जानिबौ ।
ऐश्वर्यता, ज्ञान, महातम विषय या रसमाधुरी के आवरन हैं। इनतें चित्त काढ़ि माधुर्य रस में दैनौं। तन-मन की वृत्ति जब प्रेम रस में थकै तब आसक्त कहिये| तहाँ श्रीजी की बानी "बिंध्यौ मोहन-मृग सकत चलि न री।"
अद्भुत प्रेम की आसक्तता समुझनी अति कठिन है। जिनके मन अति सरस हौंहि तिनके उर आवै। जा प्रेम रस में मान हूँ नेम है। दुहुँनि के तन-मन सहज प्रेम रस भरे हैं। नेम कहाँ रहे ठौर नाहीं।। श्रीप्रिया जू कौ सहज स्वभाव, प्रेम, रस, रूप, जोबन रस की गरूरता देखि लाल जी व्याकुल ह्वै जात हैं। यह अवस्था देखि लाड़िलीजू अपनों सुभाव भूलि जात हैं। महा प्यार सौं अंक भरि लैहिं। जो कबहूँ प्रिया जू अपने रस में लालजी तन न चितवें, नैंकहु न बोलें तौ उनकी गति मीन-जल की-सी होइ है। जहाँ मान सहज कौ यह है।
जो कोऊ कहै कि मान तौ रस कौ पोषक है अरु रुचि बढ़ावै, सो यह प्रेम साधारण जानिबौ । इहाँ यौं नाहीं। नित्य छिन ही छिन प्रीति-रस सिंधु तें तंरग रुचि के उठत रहत हैं नये-नये, तहाँ श्री स्वामी जी कौ पद-
जब जब देखौं प्यारी तेरो मुख, तब-तब नयौ-नयौ लागत
अरु श्रीजी की बानी “करत पान रसमत्त परस्पर लोचन तृषित चकोर' तातें प्रेम, बिरह अनेक भाँति के हैं। जैसौ जहाँ प्रेम तैसौ तहाँ बिरह है। जहाँ स्थूल प्रेम, तहाँ स्थूल विरह। जहाँ सूक्षम प्रेम तहाँ सूक्षम विरह।
जो कोऊ कहै कि स्थूल कहा सूक्षम कहा ? सूक्षम प्रेम याही कहियै जो एक सेज पर रूप देखत चंद-चकोर ज्यों नैनांचल ओट भये महा कठिन दशा होइ । अरु देह हूँ अपनी न्यारी नाँहीं सहि सकत यह भी विरह मानत हैं, तहाँ की बात गुसाईजू गाई। तहाँ श्रीजी की बानी “श्रुति पर कंज दृगंजन कुच बिच मृगमद है न समात। (जैश्री) हित हरिवंश नाभि सर जलचर जाँचत साँवल गात।“ अरु श्री स्वामी जी कौ पद “ऐसी जिय होत जो जिय सौं जिय मिलै तन सौं तन समाइ लैऊँ तौ देखौं कहा हो प्यारी।“
यह प्रेम अति तीव्र है, जा पर श्रीजू के रसिक भक्तनि की कृपा होइ तब उर में आवै। ऐसे अद्भुत प्रेम में और भाँति को विरह न संभवै। जो फूलनि की माला देखे कुम्हिलाइ ताकौं असिवर कौ दिखाइबौ अनीत है। भ्रमहूँ को बिरह कहत डर आवै। या प्रेम में न स्थूल प्रेम की समाई न स्थूल विरह की समाई न मान की। एकरस यह प्रेम ही विरह रूप है। या रस की जिनकै उपासना है तिनके हिये ठहराई।
जो कोऊ कहै कि मान-विरह तौ महापुरुषन हू गायौ है। सो सदाचार के लिये गायौ है। औरनि के समुझाइबे कौं कह्यौ है। पहिले स्थूल प्रेम समुझे तब आगे चलै। जैसे श्रीभागवत की बानी, पहिलै नवधा- भक्ति करै तब प्रेम लक्षना आवै। अरु महापुरुषन अनेक भाँति के रस कहे हैं। ए पर इतनौ समुझनौ कै उनको हियौ कहाँ ठहरानौ है, सोई गहनौं | तहाँ श्री बिहारिनदासजी कौ पद- “तहाँ कछू न श्रम, तम न गम, विरह, भ्रम, मान लवलेश न प्रवेश न प्रशंगी”
और सब प्रेम-नेम या नित्य महाप्रेम रस के आगे साधन हैं, यह निर्धार जानिबौ। नित्य अखंडित एक रस सहज निमित्य रहित महामाधुरी निकुंज-केलि अद्भुत रसिकानंद दोऊ विलसत हैं या पर न और सुख, न और प्रेम। तहाँ कौ जु रससार है, तामें सखी ललिता- विसाखादिक आसक्त हैं। सार कौ सार प्रेम सुख यह अद्भुत महारस प्रेम की उपासना श्रीजू प्रकट करि दई है, निहसंक ह्वै सबके कल्याणार्थ। जो उर में आवै ठहराय।
या प्रेम की सूक्षम गति है, खाइ और तृपित होइ और । तहाँ श्रीजी की बानी “(जै श्री) हित- हरिवंश लाल ललना मिलि हियौ सिरावत मोर।“ यह सार कौ सार। बिरलौ कोइ इक जानै, समुझे। साधारन प्रेम, साधारन विरह सब के मन में आवै, भगवत-भजन की विधि-महातम और जहाँ ताईं ऐश्वर्य लीला तिनमें समाई है। यहाँ श्रीजी जो रस प्रगट कह्यौ ता रस-उपासना में कछु न मिले। अद्भुत उपासना सबनि ते न्यारी गति ताकी है।
यह महामाधुरी रस जाके उर न आवै, ताकौं संग न करिये। तिनकौ संग करनौ बड़ी अज्ञानता है। और सब भजन में गोष्ठी है, सनेह में गोष्ठी कहा ? समस्त भागवत धर्मनि ऊपर यह निकुंज माधुरी श्रीयुगल चन्दजू विलास करत हैं; जिनि यह रस समुझ्यौ नाहीं, तासौं रस की बात करनी उचित नाहीं। जो कहै तौ आपतें जाइ, अंतर परै निःसंदेह । तातें मौन होइ रहनौ बहुत भलौ है। विजाती सौं मिलिबौ भलौ नाहीं। बिनु सजाती सौं मिले बात न चलावै ।
अनेक भाँति भजन भक्ति के भेद तैसेई भक्त हैं ! जैसौ जाकौ भाव है तैसौ सिद्धि होय। तातें औरनि सौं प्रयोजन नाहीं। तहाँ बखानौ है- “तोहि बिरानी कहा परी तू अपनी निरबेर”। आपकों यौं चाहिये औरनि सौं मत्सरता छाँड़ि अपुनौ रस लिये रहे और याही रस के उपासिकनि सौं अंतर खोलि संग करै।
श्री व्यासजी के वचन-
“व्यास विवेकी भगत सों, दृढ़ कर कीजै प्रीति । अविवेकी कौ संग तजि, इहै भक्ति की रीति”।।
तो विवेकी कहा ? विवेकी तासौं कहियै जो भली गहै बुरी छाँडै। अविवेकी भली बुरी कछु न समुझे सब गहै सब छाँडै। तातें सजाती सौं मिलि बात युगल बिहार की करै, बिचारै। तिनकी जूँठन खाइ चरनोदक पीवै। बिजाती कौ परस हू न करै। और वृन्दावन-चन्द एक प्रीति ही मानै हैं कोटि भाँति भावै अपरस रहौ, भावै सपरस रहौ, अनेक आचार करौ, उनको एक प्रीति की सचाई सौं काम है।
तब एक ने कही आचार न करै ? थोरौ बहुत करै सदाचार के लिये। जब श्री जी की सेवा पाक करै तहाँ आचार करै, जैसौ संभवै। अपने प्रसाद पाइबे कौं आचार बहुत न करै। प्रसाद ही कोटि आचार कौ स्वरूप रूप है। भोग लागे पाछें बहुत आचार उचित नाहीं। शास्त्र हू में कही है, अति आचार अनाचार समान है। राँधे अन्न विषै कछू न मानै। जो भोग श्रीजी कौ लाग्यौ, तौ सब बराबर, कहा काचौ, कहा पाकौ। वैष्णव सदाचार के लिये आचार करै। मन में विश्वास न धरै कि याही तें कारज सिद्ध होइगौ। शुद्धता के लिये करै। श्रीजी की टहल कोटि कोटि आचार कौ स्वरूप है। बहुत आचार तें हियौ अति कठोर होइ जाइ है। यह भजन अति कोमल है, कोमल कठोर एक संग न बनै।
जे सनेही भजनीक हैं, तिनकी घटि-बढ़ि क्रिया में मन न देइ। आपको बड़ी हानि है, बड़ौ अपराध है। कोटि-कोटि आचार उनके एक निमेष के रस भजन के ऊपर वारि डारियै। ब्रह्मादिक, सनकादिक या बात में भूले हैं। औरनि की कौन चलावै । जो यह बात मन में न आवै तिन सब अनाचार किये। जे सनेही भक्त हैं, तिनकी पदरज कोटि आचार है, साधन-सिद्ध तीरथ है।
श्री गुसाँई कृष्णदास जी कौ पद-
“साधु-चरन-रज सब सुख साधन, यहै मेरै मत काज सुधी कौ”।
श्री व्यासजी कौ पद-
“साधु चरन रज माँझ व्यास से, कोटिक पतित समात” इत्यादि ।
अनंत लीला अवतार अनेक, तिनकी ऐश्वर्यता कौ पारावार नाहीं। ऐसे ही नाना प्रकार के भक्त हैं। श्री कृष्ण-लीला तीन प्रकार की, तिनहूँ में भेद-भक्त बहुत हैं। जहाँ-जहाँ जाकौ मन लाग्यौ ते सब नीके हैं, घटि कोऊ नाहीं। आपकौं यौं चाहिये औरनि की घटि-बढि कछु कहै नाहीं। अपने रस में जैसी उपासना है, तहाँ मन दिये रहे। जे रसिक अनन्य श्री वृंदावन की उपासना में श्री किशोरी-किशोर जू की किशोरताई की छबि अरु निकुंज माधुरी रस जिनकें हिये बसत है, नैननि में झलकति है, तिनकी चरन-रज सीस पर धारियै उनकौ संग निशिदिन करियै, जूठन पाइयै, अंतर न राखियै।
जो ऐसे भक्तनि सौं कछु आचार निमित्त गिलानि आनै तो तिन सब अनाचार कियौ। यह बड़ौ अतंराय है। तातें या रस पाइबै कौं कछू और जतन नाही—बिनु भक्तनि की पद-रज। जो कबहूँ यह बात काहू के मन न आवै, और कहै कि कहाँ कही है ताकी साखी श्रीमद्भागवत श्लोक-
व्रतानियज्ञ छन्दांसि तीर्थानि नियमायमाः |
यथाSवरून्धेत् सत्संगः सर्वसङ्गापहो हि माम् ||
अरु श्री मुख कही कि- “हौं भक्तनि के पाछे फिरत हौं” जो एकांती भक्त हैं, तिनकी चरन रज निमित्य । और भी महापुरुषन यह सिद्धांत करि राख्यौ। तहाँ श्रीजू की बानी –
“जै श्रीहित हरिवंश प्रपंच बंच सब, काल व्याल कौ खायौ।
‘यह जिय जानि स्याम-स्यामा-पद, कमल-संगी सिर नायौ”।
अपने रस की उपासना में सावधान रहिये। भक्तनि के अपराधनि सौं डरपत रहिये। छिन छिन भजन ही सँभार्यौ करै, जैसे पुतरीन कौं पलकें।
पलकनि के जैसें अधिक, पुतरिनु सौं अति प्यार।
ऐसें लाड़िली-लाल के, छिन-छिन चरन सँभार।।
एक नें कही कि यह लाड़िली-लाल जू कौ अद्भुत निकुंज माधुरी कौ रस, सबतें दुर्लभ दुर्घट है; तासौं प्रेम कैसें उपजै ? कौन उपाइ, कौन साधन ?
मूल तौ कृपा रसिक भक्तनि की, जिनसौं संग मन-वच-क्रम करि करै, निशिदिन। अरु रसमई भजन के अभ्यास में रहे। और कठिन कलेश साधन सौं न बनै। यह रस अति कोमल है, माखन सौं माखन मिलै कठोरता न चाहिये। कठिन साधन सौं शुद्ध भक्ति हू न पाइये, तो यह महा-माधुर्य-रस कैसे पावै ? सर्वोपरि साधन यह है जो रसिक भक्त हैं, तिनकी चरन-रज बंदै, तिनसौं मिलि निशि-दिन किशोरी-किशोरजू के रस की बात कहै अरु सुनै निशिदिन, अरु पल-पल उनकी रूप-माधुरी विचारत रहै।
यह अभ्यास छाँड़े नहीं, आलस न करै, तो रसिक भक्तन कौ संग ऐसौ है, अवश्य प्रेम कौ अंकुर उर में उपजै। जो कुसंग पशु तें बच्चै। जब ताई अंकुर रहै- तब ताई भजन जल सौं सींच्यौ करै बारंबार। अरु सत्संग की बाड़ दृढ़ के करै तौ प्रेम की बेलि हिये में बढ़े, फूलै, जड़ नीके गहै तौ चिंता कछु नाहीं, यह ही यतन है | संग तैं कृपा, कृपा तैं संग, तब भक्ति होइ | या सिद्धांत पर और कछु नाँही। यह बात अबहूँ काहू के मन न आवै तौ तासौं कछू बसात नाहीं, अपनी वह जानै।
या रस कौ विचार अपनैं मन समुझाइबे कौं, कैं जिनकौ मन या रस में होइ तिनके हेत कह्यौ । जो या विचार में रहे तौ काल वृथा न जाइ । जिन कौं यह रस रुचै नाहीं तिनके पास न बैठे, न यह प्रसंग चलावै। जो बिजाती सौं गोष्ठी करै तौ या रस में अंतर परै, चित्त कठोर ह्वै जाइ जैसे महा रंक धन कौं छिपाये फिरै, तैसें महा प्यार सौं उर में राखै यह भजन । अरु अभिमान छाँड़े। मान-अपमान उर में न आनै, दीन होइ। जहाँ रसिक भक्तनि की मंडली सुनै, तहाँ जाइ, तिनकी चरन-रज सिर पर धरै, अरु उनसों मिलि काल बितीत करै।
निमित्य रहित भजन स्वाद लिये होइ। जैसे विषई कौ अपनों-अपनौं रस रुचै। ऐसें भजनी होइ, तब विषय-नेम कौं भस्म करै, तब प्रेम बढै। जब ताईं मन भ्रम्यौ फिरै, कबहूँ महातम, कबहूँ ज्ञान, कबहूँ विरक्तता तिनकौ या रस माधुरी सौं बहुत अंतराय है। जो निस्प्रेही भयौ ताकौं जैसी कौड़ी तैसौ रतन। और सब रस या माधुर्य रस के आवरण हैं, अन्तराय बनाये हैं। सो यह बात रसिकनि की कृपा तें मन में आवै। श्री किशोरी-किशोर जू की प्रेमरस माधुरी तबहीं उर में आवै जाकें सांगोपांग उपासना सहजकी होइ।
सांग कहा ? गुरु, इष्ट, मंत्र, रसिकनि कौ संग, जब या रस माधुर्य के जुरें तब उपासना सिद्ध होइ, ते उपासिक कहिये। जो मन नेकहूँ और धर्म में चलै तौ उपासना भंग होइ। और वृन्दावन में जो कोई निमित्य, तिथि, विधि मानें सो भली नाहीं। श्री लाड़िली-लालजू जहाँ नित्य-विहार करत हैं, ऐसौ श्री वृंदावन है, ताकौ निमित्य धर्मनि में सानै, यह बड़ी चूक है। चंद्रमनिहि लै ज्यों काँच के मनियनि में पोवै तो शोभा न पावई। जा वृंदावन की तुल्य को वैकुण्ठ हू, नाहीं, ताकौ तुच्छ धर्मनि में मिलावै यह बड़ी अज्ञानता है। रसिक अनन्य ऐसौ चाहियै धीर, सुभट कहूँ मन कबहूँ न चले या बात की समान।
।। चौपाई ।।
यह प्रबोध (ध्रुव) जो मन धरै । सोई भलौ आपनौ करै।।
यह सिद्धांत सार है जानौ । और कछू जिय जिनि उर आनौं।।
छिन-छिन काल वृथा चल्यौ जाई । लाड़िली-लालहिं लेहु लड़ाई।।
छाँडि कपट मन, वच, चित दीजै। अलि ज्यौं चरन कमल रस पीजै ।।
जिनिकै मन निश्चै यह आई । रस सुख की निधि तिनहीं पाई ।।
तिनही देह धरी या जग में । जाकौ मन लाग्यौ या रंग में।।
दोहा-
यह सिद्धान्त बिचार तें, चारु बुद्धि (ध्रुव) होइ।
तन मन के सब भरम मल, पल में डारै धोइ।।
।। जै जै श्री सिद्धान्त-विचार लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश ।।
9. प्रीति चौवनी लीला
दोहा
नवल रँगीले लाल बिनु, को समुझै निजु-रीति ।
सब तजि बस आपुन भये, रँगे रँगीली प्रीति ।।1।।
चूड़ामनि सब लोक के, लये प्रेम-रस मोहि ।
जद्यपि रूप निधान पिय, प्रिया-बदन रहे जोहि ।।2।।
बरनौं ऐसे प्रेम कौं, जिहि बस कीने लाल ।
शुद्ध स्वरूप अनूप ध्रुव, अद्भुत परम रसाल ।।3।।
आदि अन्त जाकौ नहीं, रहत एक रस रूप ।
रुचि तरंग पल-पल बढ़ैं, सहजहि सुखद अनूप ।।4।।
नित्य नवल मृदु मधुर वर, भीने रंग सुहाग ।
जामें नाहिं निमित्त कछु, सो अभंग अनुराग ।।5।।
प्रेम नेम व्योरौ कियौ, जो आयौ उर माहिं ।
याते न्यारे दुहुँनि के, लक्षण जानैं जाहिं ।।6।।
जेहि तन बन गरजत रहै, अद्भुत केहरि प्रेम ।
तामैं पावैं रहन क्यौं, गज, बिहंग, मृग, नेम ।।7।।
रहन न पावत और रस, जहाँ प्रेम कौ राज ।
सकल सुखनि कौं दलमलै, ज्यौं पंछिनु कौं बाज ।।8।।
मन पंछी तब लगि उड़े, विषय-वासना माहिं ।
प्रेम बाज की झपट में, जब लगि आयौ नाहिं ।।9।।
जहँ लगि लालच विषयै कौ, सो न होइ 'ध्रुव' प्रेम ।
तासौं कहा बसाइ 'ध्रुव', पीतर सौं कहै हेम ।।10।।
पलटि परत ताकी दशा, जो सनेह रँग रात।
और अंग मिटि कै सबै, नैना ही ह्वै जात ।।11।।
रहन देत नहिं और रस, यहै प्रेम की टेक ।
याकौ सहज सुभाव यह, करत दोइ तें एक ।।12।।
भूल्यौ नहिं अपनौ विषय, मिट्यौ न मन तें नेम ।
तासौं 'ध्रुव' कैसे कहे, जानि बूझि कै प्रेम ।।13।।
तन-विलास जे विषय के, जौ न प्रेम ते जाहिं ।
भानु उदै जो तम रहै, तौ वह भानुहि नाहिं ।।14।।
जामैं नाहिंन प्रीति कछु, जो जाकौ आहार ।
हिम रितु ग्रीषमता रुचै, ग्रीषम माहिं तुषार ।।15।।
अलि, पतंग, मृग, मीन, गज, चातक, चकइ, चकोर ।
ये सब झूठे नेह में, बँधे विषय की डोर ।।16।।
जब लगि द्वै मन बीच कछु, स्वारथ कौ हित होइ ।
शुद्ध सुधा कैसे रहै, परै जो तामें तोइ ।।17।।
आदि अन्त जाकौ भयौ, सो सब प्रेम न रूप ।
आवत जात न जानिये, जैसे छांहऽरु धूप ।।18।।
जब बिछुरत तब होत दुख, मिलतहि हियौ सिराइ ।
याही में रस द्वै भये, प्रेम कयौ क्यौं जाइ ।।19।।
तन मन कै बिछुरे नहीं, चाह बढ़ै दिन-रैन ।
कबहुँ सँजोग न मानहीं, देखत भरि-भरि नैंन ।।20।।
ऐसौ प्रेम न कहूँ 'ध्रुव', है वृंदावन माहिं ।
तिन बिच अंतर निमिष कौ, होत जु कबहूँ नाहिं ।।21।।
प्रेम-रूप वय घटत नहिं, मिटत न कबहुँ संजोग ।
आदि-अंत नाहिन जहाँ, सहज प्रेम कौ भोग ।।22।।
अंग अंग मिलि रहे सब, मन सौं मन अरुझात।
देखौ अटपटि प्रेम गति, चित्त न कबहुँ अघात ।।23।।
प्रेम चाल बाँकी चलनि, मन पग नहि ठहराइ ।
नख - शिख अरुझे नेम तें, ते कैसै तहँ जाँइ ।।24।।
प्रेम-बात हूँ बात तें, सूक्षम कही न जाइ ।
तन तरवर कौं छाँड़ि कै, मनहि झुलावै आइ ।।25।।
प्रेम प्रकार अनेक विधि, तिनमें उत्तम भाँति ।
अद्भुत प्रीति दुहुँनि की, जिनके उर झलकाँति ।।26।।
नेह निवाहन कठिन है, फिर्यौ जगत सब जोइ ।
विमल प्रीति नहिं देखियै, स्वारथ लग सब कोइ ।।27।।
प्रीति प्रीति सब कोऊ कहै, कठिन तासु की रीति ।
आदि अंत निबहै नहीं, बारू की सी भीति ।।28।।
प्रीति आरसी बिमल है, जौ कोऊ राखै जानि ।
कपट मोरचा लगत ही, होति दरस की हानि ।।29।।
जाके हिय में जगमगै, रूप-दीप उजियार ।
परसे ताके जाइ नसि, दुख सुख सब अँधियार ।।30।।
वृंदावन रसके रसिक, ये तौ पइयत थोर ।
जिनके हिय में बसत रहैं, रसमय मधुर किशोर ।।31।।
जौ कोऊ खोजत फिरै, आवै जग अवगाहि ।
नेही दुर्लभ पावनौ, और सुलभ सब आहि ।।32।।
बंकट घाटी नेह की, अतिहि दुहेली आहि ।
नैन पगनि चलिबौ तहाँ, जो 'ध्रुव' बनै तौ जाहि ।।33।।
चढ़िकै मैंन-तुरंग पर, चलिबौं पावक माहिं ।
प्रेम-पंथ ऐसौ कठिन, सब कोऊ निबहत नाहिं ।।34।।
लोक-वेद संकल सुदृढ़, मन-गज डारी तोरि ।
देखौ प्रेम-चरित्र यह, बँध्यौ फिरै बिनु डोरी ।।35।।
मन-मतंग मद रस मत्यौ, धँस्यौ प्रेम रन धाइ ।
लोक-वेद कुल कानि की, दई फौज बिचलाइ ।।36।।
जेहि उर उपज्यौ प्रेम-रस, सो नित रहत उदास ।
भूल्यौ हँसिबौ, खेलिबौ, खान-पान सुख-बास ।।37।।
रूप छटा अद्भुत निरखि, थकित भये मुख बैंन ।
प्रान तहाँ पहिले गये, रोवत छाँड़े नैंन ।।38।।
रूप-धसक हिय धँसि गयौ, सिथिल भये सब अंग ।
मुख पियराई फिरि गई, बदलि परयौ तन-रंग ।।39।।
प्रेम-बेलि जेहि पर चढ़ी, गई सबै सुधि भूलि ।
एक कमल 'ध्रुव' चाह कौ, ताके उर रह्यौ फूलि ।।40।।
मोह्यौ नहिं सुनि राग-धुनि, बिंध्यौ न उर छबि-बान ।
तिनकौं ऐसौ समुझ तू, पाहन चित्र- समान ।।41।।
पर्यौ न रूप-तंरग में, अर्यौ न मृदु मुसिक्यान ।
रम्यौ न भौंहनि भाइ-रस, नीरस तरु सम जान ।।42।।
प्रेम रंग तन मन रँगे, कहँ समाइ सुख और ।
रोम-रोम पिय रम रह्यौ, बची नाहिं कहुँ ठौर ।।43।।
कुंडलियाँ
नैननि पिय मूरति बसै, तेहि रस रहे समाइ ।
ये लच्छन सुनि प्रेम के, और न कछू सुहाइ ।।
और न कछू सुहाइ, फिरै अपनैं मदमातौ ।
कुटुँब देह सौं जाइ टूटि, सबही विधि नातौ ।।
जहँ-जहँ पिय की बात सुनैं, खोजत तिन गैंननि ।
छिन-छिन प्रति 'ध्रुव' लेत, प्रेम-जल भरि भरि नैननि ।।44।।
दोहा
कहा कहौं गति प्रेम की, बढ़ी चाह की पीर ।
लोचन भूखे रूप के, भरि भरि ढारत नीर ।।45।।
को आवै बुलवैब को, कोब कहै उठि जाहि ।
प्रेम चटपटी जासु उर, गृह-बन भूल्यौ ताहि ।।46।।
भाव बढ्यौ तब जानियै, यह गति होइ अनूप ।
भूलै भूखSरु सैन-सुख, नैंन भरे रहें रूप ।।47।।
चित्त रहै द्रविभूत नित, अति कोमल रस-प्रेम ।
हिय में झलकत रहैं यौं, जैसे चाँदी-हेम ।।48।।
वृंदावन नित सहजही, आनँद कौ निजु धाम ।
बिलसत है जहँ प्रेम-रस, इकछत स्यामा - स्याम ।।49।।
नवल किसोरी नव कुँवर, सहज प्रेम की रासि ।
भीने दोउ आनंद रस, करत मंद मृदु हाँसि ।।50।।
रूप परस्पर चितैबौ, जीवनि दुहुँनि की आहि ।
यह सुख समुझति हैं सखी, रहत निरंतर पाहि ।।51।।
या रस में चित दीजिये, छाँड़ि और सब आस ।
धन्य-धन्य तेई जू नर, जिनकै यह उपास ।।52।।
हित सौं जाहि चिन्हार नहिं, तासौं करि न चिन्हारि ।
बिनु 'ध्रुव' नेही भाजनहिं, रंग न दीजै डारि ।।53।।
प्रीति चौवनी जो सुनै, उपजैगी निजु प्रीति ।
ताही तें 'ध्रुव' समुझि है, वृंदावन-रस-रीति ।।54।।
हित सौं हियै धरे रहौ, यह माला रस-प्रेम।
हित ध्रुव' ताके झलमलै, हिये केलि रस-क्षेम ।।55।।
जै जै श्री प्रीति चौवनी लीला की जै जै श्री हित हरिवंश
दोहा
नवल रँगीले लाल बिनु, को समुझै निजु-रीति ।
सब तजि बस आपुन भये, रँगे रँगीली प्रीति ।।1।।
चूड़ामनि सब लोक के, लये प्रेम-रस मोहि ।
जद्यपि रूप निधान पिय, प्रिया-बदन रहे जोहि ।।2।।
बरनौं ऐसे प्रेम कौं, जिहि बस कीने लाल ।
शुद्ध स्वरूप अनूप ध्रुव, अद्भुत परम रसाल ।।3।।
आदि अन्त जाकौ नहीं, रहत एक रस रूप ।
रुचि तरंग पल-पल बढ़ैं, सहजहि सुखद अनूप ।।4।।
नित्य नवल मृदु मधुर वर, भीने रंग सुहाग ।
जामें नाहिं निमित्त कछु, सो अभंग अनुराग ।।5।।
प्रेम नेम व्योरौ कियौ, जो आयौ उर माहिं ।
याते न्यारे दुहुँनि के, लक्षण जानैं जाहिं ।।6।।
जेहि तन बन गरजत रहै, अद्भुत केहरि प्रेम ।
तामैं पावैं रहन क्यौं, गज, बिहंग, मृग, नेम ।।7।।
रहन न पावत और रस, जहाँ प्रेम कौ राज ।
सकल सुखनि कौं दलमलै, ज्यौं पंछिनु कौं बाज ।।8।।
मन पंछी तब लगि उड़े, विषय-वासना माहिं ।
प्रेम बाज की झपट में, जब लगि आयौ नाहिं ।।9।।
जहँ लगि लालच विषयै कौ, सो न होइ 'ध्रुव' प्रेम ।
तासौं कहा बसाइ 'ध्रुव', पीतर सौं कहै हेम ।।10।।
पलटि परत ताकी दशा, जो सनेह रँग रात।
और अंग मिटि कै सबै, नैना ही ह्वै जात ।।11।।
रहन देत नहिं और रस, यहै प्रेम की टेक ।
याकौ सहज सुभाव यह, करत दोइ तें एक ।।12।।
भूल्यौ नहिं अपनौ विषय, मिट्यौ न मन तें नेम ।
तासौं 'ध्रुव' कैसे कहे, जानि बूझि कै प्रेम ।।13।।
तन-विलास जे विषय के, जौ न प्रेम ते जाहिं ।
भानु उदै जो तम रहै, तौ वह भानुहि नाहिं ।।14।।
जामैं नाहिंन प्रीति कछु, जो जाकौ आहार ।
हिम रितु ग्रीषमता रुचै, ग्रीषम माहिं तुषार ।।15।।
अलि, पतंग, मृग, मीन, गज, चातक, चकइ, चकोर ।
ये सब झूठे नेह में, बँधे विषय की डोर ।।16।।
जब लगि द्वै मन बीच कछु, स्वारथ कौ हित होइ ।
शुद्ध सुधा कैसे रहै, परै जो तामें तोइ ।।17।।
आदि अन्त जाकौ भयौ, सो सब प्रेम न रूप ।
आवत जात न जानिये, जैसे छांहऽरु धूप ।।18।।
जब बिछुरत तब होत दुख, मिलतहि हियौ सिराइ ।
याही में रस द्वै भये, प्रेम कयौ क्यौं जाइ ।।19।।
तन मन कै बिछुरे नहीं, चाह बढ़ै दिन-रैन ।
कबहुँ सँजोग न मानहीं, देखत भरि-भरि नैंन ।।20।।
ऐसौ प्रेम न कहूँ 'ध्रुव', है वृंदावन माहिं ।
तिन बिच अंतर निमिष कौ, होत जु कबहूँ नाहिं ।।21।।
प्रेम-रूप वय घटत नहिं, मिटत न कबहुँ संजोग ।
आदि-अंत नाहिन जहाँ, सहज प्रेम कौ भोग ।।22।।
अंग अंग मिलि रहे सब, मन सौं मन अरुझात।
देखौ अटपटि प्रेम गति, चित्त न कबहुँ अघात ।।23।।
प्रेम चाल बाँकी चलनि, मन पग नहि ठहराइ ।
नख - शिख अरुझे नेम तें, ते कैसै तहँ जाँइ ।।24।।
प्रेम-बात हूँ बात तें, सूक्षम कही न जाइ ।
तन तरवर कौं छाँड़ि कै, मनहि झुलावै आइ ।।25।।
प्रेम प्रकार अनेक विधि, तिनमें उत्तम भाँति ।
अद्भुत प्रीति दुहुँनि की, जिनके उर झलकाँति ।।26।।
नेह निवाहन कठिन है, फिर्यौ जगत सब जोइ ।
विमल प्रीति नहिं देखियै, स्वारथ लग सब कोइ ।।27।।
प्रीति प्रीति सब कोऊ कहै, कठिन तासु की रीति ।
आदि अंत निबहै नहीं, बारू की सी भीति ।।28।।
प्रीति आरसी बिमल है, जौ कोऊ राखै जानि ।
कपट मोरचा लगत ही, होति दरस की हानि ।।29।।
जाके हिय में जगमगै, रूप-दीप उजियार ।
परसे ताके जाइ नसि, दुख सुख सब अँधियार ।।30।।
वृंदावन रसके रसिक, ये तौ पइयत थोर ।
जिनके हिय में बसत रहैं, रसमय मधुर किशोर ।।31।।
जौ कोऊ खोजत फिरै, आवै जग अवगाहि ।
नेही दुर्लभ पावनौ, और सुलभ सब आहि ।।32।।
बंकट घाटी नेह की, अतिहि दुहेली आहि ।
नैन पगनि चलिबौ तहाँ, जो 'ध्रुव' बनै तौ जाहि ।।33।।
चढ़िकै मैंन-तुरंग पर, चलिबौं पावक माहिं ।
प्रेम-पंथ ऐसौ कठिन, सब कोऊ निबहत नाहिं ।।34।।
लोक-वेद संकल सुदृढ़, मन-गज डारी तोरि ।
देखौ प्रेम-चरित्र यह, बँध्यौ फिरै बिनु डोरी ।।35।।
मन-मतंग मद रस मत्यौ, धँस्यौ प्रेम रन धाइ ।
लोक-वेद कुल कानि की, दई फौज बिचलाइ ।।36।।
जेहि उर उपज्यौ प्रेम-रस, सो नित रहत उदास ।
भूल्यौ हँसिबौ, खेलिबौ, खान-पान सुख-बास ।।37।।
रूप छटा अद्भुत निरखि, थकित भये मुख बैंन ।
प्रान तहाँ पहिले गये, रोवत छाँड़े नैंन ।।38।।
रूप-धसक हिय धँसि गयौ, सिथिल भये सब अंग ।
मुख पियराई फिरि गई, बदलि परयौ तन-रंग ।।39।।
प्रेम-बेलि जेहि पर चढ़ी, गई सबै सुधि भूलि ।
एक कमल 'ध्रुव' चाह कौ, ताके उर रह्यौ फूलि ।।40।।
मोह्यौ नहिं सुनि राग-धुनि, बिंध्यौ न उर छबि-बान ।
तिनकौं ऐसौ समुझ तू, पाहन चित्र- समान ।।41।।
पर्यौ न रूप-तंरग में, अर्यौ न मृदु मुसिक्यान ।
रम्यौ न भौंहनि भाइ-रस, नीरस तरु सम जान ।।42।।
प्रेम रंग तन मन रँगे, कहँ समाइ सुख और ।
रोम-रोम पिय रम रह्यौ, बची नाहिं कहुँ ठौर ।।43।।
कुंडलियाँ
नैननि पिय मूरति बसै, तेहि रस रहे समाइ ।
ये लच्छन सुनि प्रेम के, और न कछू सुहाइ ।।
और न कछू सुहाइ, फिरै अपनैं मदमातौ ।
कुटुँब देह सौं जाइ टूटि, सबही विधि नातौ ।।
जहँ-जहँ पिय की बात सुनैं, खोजत तिन गैंननि ।
छिन-छिन प्रति 'ध्रुव' लेत, प्रेम-जल भरि भरि नैननि ।।44।।
दोहा
कहा कहौं गति प्रेम की, बढ़ी चाह की पीर ।
लोचन भूखे रूप के, भरि भरि ढारत नीर ।।45।।
को आवै बुलवैब को, कोब कहै उठि जाहि ।
प्रेम चटपटी जासु उर, गृह-बन भूल्यौ ताहि ।।46।।
भाव बढ्यौ तब जानियै, यह गति होइ अनूप ।
भूलै भूखSरु सैन-सुख, नैंन भरे रहें रूप ।।47।।
चित्त रहै द्रविभूत नित, अति कोमल रस-प्रेम ।
हिय में झलकत रहैं यौं, जैसे चाँदी-हेम ।।48।।
वृंदावन नित सहजही, आनँद कौ निजु धाम ।
बिलसत है जहँ प्रेम-रस, इकछत स्यामा - स्याम ।।49।।
नवल किसोरी नव कुँवर, सहज प्रेम की रासि ।
भीने दोउ आनंद रस, करत मंद मृदु हाँसि ।।50।।
रूप परस्पर चितैबौ, जीवनि दुहुँनि की आहि ।
यह सुख समुझति हैं सखी, रहत निरंतर पाहि ।।51।।
या रस में चित दीजिये, छाँड़ि और सब आस ।
धन्य-धन्य तेई जू नर, जिनकै यह उपास ।।52।।
हित सौं जाहि चिन्हार नहिं, तासौं करि न चिन्हारि ।
बिनु 'ध्रुव' नेही भाजनहिं, रंग न दीजै डारि ।।53।।
प्रीति चौवनी जो सुनै, उपजैगी निजु प्रीति ।
ताही तें 'ध्रुव' समुझि है, वृंदावन-रस-रीति ।।54।।
हित सौं हियै धरे रहौ, यह माला रस-प्रेम।
हित ध्रुव' ताके झलमलै, हिये केलि रस-क्षेम ।।55।।
जै जै श्री प्रीति चौवनी लीला की जै जै श्री हित हरिवंश
10. आनन्दाष्टक
दोहा
सखी सबै उडगन मनौं, एक बार आनंद ।
पिय चकोर 'ध्रुव' छकि रहे, निरखि कुँवरि मुखचंद ।।1।।
ऐसी अद्भुत सभा बनी, इक छत सुख की रासि ।
फूले फूल आनंद के, सहज परस्पर हाँसि ।।2।।
देखि लाल के लालचहि, लालच हू ललचाइ ।
नवल कटाक्ष तरंग रस, पीवतहू न अघाइ ।।3।।
एकहि वय गुन प्रेम रस, रूपऽरु सील सुभाव ।
अद्भुत जोरी बनी ध्रुव, देखि बढ़त चित चाव ।।4।।
या रस के जे रसिकजन, तिनकी कौन समान ।
बिना मधुर रस-माधुरी, परसत नहिं कछु आन ।।5।।
रसिक तबहिं पहिचानियै जाकैं यह रस-रीति ।
छिन छिन हिय में झलकि रहै, लाल-लाड़िली प्रीति ।।6।।
यह रस जिन समुझ्यौ नहीं, ताके ढिंग जिनि जाहु ।
तजि सतसंग सुधा रसहि, सिंधु-सुतहि जिनि खाहु ।।7।।
वृन्दावन-रस अति सरस कैसैं करौं बखान ।
जिहि आगैं बैकुंठ कौ, फीकौ लगतु पयान ।।8।।
यह अष्टक 'ध्रुव' पढ़ै जौ, संध्या और सबार ।
ताके हियैं प्रकाश रहै, मिटै त्रिगुन -अँधियार ।।9।।
जै जै श्री आनंदाष्टक लीला की जै जै श्री हित हरिवंश
दोहा
सखी सबै उडगन मनौं, एक बार आनंद ।
पिय चकोर 'ध्रुव' छकि रहे, निरखि कुँवरि मुखचंद ।।1।।
ऐसी अद्भुत सभा बनी, इक छत सुख की रासि ।
फूले फूल आनंद के, सहज परस्पर हाँसि ।।2।।
देखि लाल के लालचहि, लालच हू ललचाइ ।
नवल कटाक्ष तरंग रस, पीवतहू न अघाइ ।।3।।
एकहि वय गुन प्रेम रस, रूपऽरु सील सुभाव ।
अद्भुत जोरी बनी ध्रुव, देखि बढ़त चित चाव ।।4।।
या रस के जे रसिकजन, तिनकी कौन समान ।
बिना मधुर रस-माधुरी, परसत नहिं कछु आन ।।5।।
रसिक तबहिं पहिचानियै जाकैं यह रस-रीति ।
छिन छिन हिय में झलकि रहै, लाल-लाड़िली प्रीति ।।6।।
यह रस जिन समुझ्यौ नहीं, ताके ढिंग जिनि जाहु ।
तजि सतसंग सुधा रसहि, सिंधु-सुतहि जिनि खाहु ।।7।।
वृन्दावन-रस अति सरस कैसैं करौं बखान ।
जिहि आगैं बैकुंठ कौ, फीकौ लगतु पयान ।।8।।
यह अष्टक 'ध्रुव' पढ़ै जौ, संध्या और सबार ।
ताके हियैं प्रकाश रहै, मिटै त्रिगुन -अँधियार ।।9।।
जै जै श्री आनंदाष्टक लीला की जै जै श्री हित हरिवंश
11. भजनाष्टक
दोहा
ग्यान, शांत रस ते अधिक, अद्भुत पदवी दास ।
सखा भाव तिनतें अधिक, जिनकैं प्रीति प्रकास ।।1।।
अद्भुत बाल चरित्र कौ, जो जसुदा सुख लेत ।
तातैं अधिक किशोर-रस, व्रज-बनितनि के हेत ।।2।।
सर्वोपरि है मधुर रस, जुगल किशोर विलास ।
ललितादिक सेवतिं तिनहिं, मिटत न कबहुँ हुलास ।।3।।
यापर नाहिंन भजन कछु, नाहिंन है सुख और ।
प्रेम मगन बिलसत दोऊ, परम रसिक सिरमौर ।।4।।
वृन्दावन नित सहज ही, नित्य सखी चहुँ ओर ।
मध्य विराजत एक रस, रसमय मधुर किशोर ।।5।।
छैल छबीली लाड़िली, छैल-छबीलौ लाल ।
छैल-छबीली सहचरी, मनौ प्रेम की माल ।।6।।
पंच बान जेहि पानि हैं, देखि गयौ इहि रंग ।
तेई बान तेहि फिरि लगे, जरजर भये सब अंग ।।7।।
बिवस भयौ सुधि रही न कछु, मोह्यौ महा अनंग ।
लज्जित ह्वै रहयौ नमित अति, करत न सीस उतंग ।।8।।
यह अष्टक 'ध्रुव' पढ़ै जो, जुगल चंद संजोग ।
ताके हियैं प्रकास रहै, मिटै तिमिर हृदि रोग ।।9।।
जै जै श्री भजनाष्टक लीला की जै श्री हित हरिवंश
दोहा
ग्यान, शांत रस ते अधिक, अद्भुत पदवी दास ।
सखा भाव तिनतें अधिक, जिनकैं प्रीति प्रकास ।।1।।
अद्भुत बाल चरित्र कौ, जो जसुदा सुख लेत ।
तातैं अधिक किशोर-रस, व्रज-बनितनि के हेत ।।2।।
सर्वोपरि है मधुर रस, जुगल किशोर विलास ।
ललितादिक सेवतिं तिनहिं, मिटत न कबहुँ हुलास ।।3।।
यापर नाहिंन भजन कछु, नाहिंन है सुख और ।
प्रेम मगन बिलसत दोऊ, परम रसिक सिरमौर ।।4।।
वृन्दावन नित सहज ही, नित्य सखी चहुँ ओर ।
मध्य विराजत एक रस, रसमय मधुर किशोर ।।5।।
छैल छबीली लाड़िली, छैल-छबीलौ लाल ।
छैल-छबीली सहचरी, मनौ प्रेम की माल ।।6।।
पंच बान जेहि पानि हैं, देखि गयौ इहि रंग ।
तेई बान तेहि फिरि लगे, जरजर भये सब अंग ।।7।।
बिवस भयौ सुधि रही न कछु, मोह्यौ महा अनंग ।
लज्जित ह्वै रहयौ नमित अति, करत न सीस उतंग ।।8।।
यह अष्टक 'ध्रुव' पढ़ै जो, जुगल चंद संजोग ।
ताके हियैं प्रकास रहै, मिटै तिमिर हृदि रोग ।।9।।
जै जै श्री भजनाष्टक लीला की जै श्री हित हरिवंश
12. भजन कुंडलिया
कुंडलिया
हंस सुता तट बिहरिबौ, करि वृंदाबन बास ।
कुंज-केलि मृदु मधुर रस, प्रेम विलास उपास ।।
प्रेम-विलास उपास, रहै इक-रस मन माही ।
तिहि सुख कौ सुख कहा कहौं, मेरी मति नाही ।।
हित ध्रुव' यह रस अति सरस, रसिकनि कियौ प्रसंस।
मुकतनि छाँड़े चुगत नहिं, मान-सरोवर हंस ।।1।।
दोहा
रस भींज्यौ रस में फिरै, रसनिधि जमुना तीर ।
चिंतत रस में सने दोऊ, स्यामल-गौर सरीर ।।2।।
कुंडलिया
नवल रँगीले लाल दोऊ, करत विलास-अनंग ।
चितवनि-मुसकनि-छुवनि कच, परसनि उरज-उतंग ।।
परसनि उरज उतंग, चाह रुचि अति ही बाढ़ी ।
भई फूल अंग-अंग, भुजनि की कसकनि गाढ़ी ।।
यह सुख देखत सखिनु के, रहे फूलि लोइन कमल ।
हित ध्रुव' कोक कलानि में, अति प्रवीन नागर नवल ।।3।।
दोहा
प्रेम-तृषा की बेलि कौ, केलि अदन-रस आहि ।
परम रसिक नागर-नवल, पीवत जीवत ताहि ।।4।।
कुंडलिया
मदन केलि कौ खेल है, सकल सुखन कौ सार ।
तेहि विहार रस मगन रहैं, और न कछू सँभार ।।
और न कछू सँभार, हारि, करि प्रान पियारी ।
राखति उर पर लाल, नेकहूँ करति न न्यारी ।।
याही रस कौ भजन तौ, नित्य रहौ 'ध्रुव' हिय-सदन ।
कुंज-कुंज सुख-पुंज में करत केलि लीला-मदन ।।5।।
दोहा
केलि-बेलि फूली रहति, चितवनि, मुसकनि, फूल ।
तेहि लागे छबि-फल उरज, ढाँपे प्यार- दुकूल ।।6।।
कुंडलिया
प्रेमहि शील सुभाव नित, सहजहि कोमल बैंन ।
ऐसी तिय पिय-हीय में, बसति रहौ दिन-रैंन ।।
बसति रहौ दिन रैन, नैन सुख पावत अति ही ।
प्रिया प्रेम-रस भरी, लाल तन चितवति जब ही ।।
देखो यह रस अति सरस, बिसरावत सब नेम ही ।
"हित ध्रुव' रस की रासि दोउ, दिन बिलसत रहैं प्रेम ही ।।7।। दोहा एकै सहज सुभाव बन्यौ, एकै विधि सब भाँति । एक रंग-रुचि एक रस, एकै बात सुहाति ।।8।। कुंडलिया सीस-फूल झलकान छबि, चंद्रिका की फहरानि । 'ध्रुव' के हिय में बसत रहौ, बिबि चितवनि मुसकानि ।। बिबि चितवनि मुसकानि, रहौ यौं उर में छाई । तिहिं रस के बल मनहिं, और कछुवै न सुहाई ।। या शोभा पर वारियै, कोटि-कोटि रति-ईस । रीझि-रीझि नख-चंद्रकनि, जब लावत पिय सीस ।।9।। दोहा सीस फूल सिखि चंद्रिका, सदा बसौ मन मोर । अरु जब चितवति लाड़िली, पिय तन नैंननि कोर ।।10।। कुंडलिया ऐसैं हिय में बसत रहौ, नव-किशोर रस-रासि । चितवनि अति अनुराग की, करत मंद मृदु हाँसि ।। करत मंद मृदु हाँसि दोऊ, होत जु प्रेम प्रकास । छके रहत मदमत्त गति, आनँद मदन बिलास ।। 'हित ध्रुव' छबि सौं कुंज में, दै अंसनि-भुज वैसे । मेरी मति इति नाहिं, कहौं उपमा दै ऐसे ।।11।। दोहा नव-किशोर चितचोर दोऊ, परम-रसिक सिर मौर । ऐसैं हिय में मिलि रहौ, बचै नहीं कहुँ ठौर ।।12।। कुंडलिया (श्री) राधाबल्लभ लाल की, बिमल धुजा फहरंत । भगवत धर्महुँ जीति कैं, निजु प्रेमा ठहरंत ।। निजु प्रेमा ठहरंत, नेम कछु परसत नाहीं । अलक लड़े दोउ लाल, मुदित हँसि-हँसि लपटाहीं ।। 'हित ध्रुव' यह रस मधुर, सार कौ सार अगाधा । आवै तबहीं हीय में, कृपा करैं वल्लभ राधा ।।13।। दोहा महामाधुरी प्रेम रस, आवै जिहि उर माहिं । नवधा हूँ तिहि रुचै नहिं, नेम सबै मिटि जाहिं ।।14।। कुंडलिया श्रीराधा बल्लभ-लाड़िली, अति उदार सुकुमारि । ध्रुव'"" तौ भूल्यौ और ते, तुम जिनि देहु बिसारि ।।
" तुम जिनि देहु बिसारि, ठौर मोकौं कहुँ नाहीं ।
पिय रँग-भरी कटाक्ष, नेकु चितवौ मो माहीं ।।
बढ़ै प्रीति की रीति, बीच कछु होइ न बाधा ।
तुम हौ परम प्रवीन, प्राण-बल्लभ श्रीराधा ।।15।।
दोहा
अतिहि मृदुल नागर-नवल, करुणासिंधु अपार ।
ऐसे शील सुभाव पर, "धुव" कीन्हौं बलिहार ।।16।।
कुंडलिया
वृन्दाविपिन निमित्त गहि, तिथि बिधि मानैं आन ।
भजन तहाँ कैसे रहै, खोयौ अपनै पान ।।
खोयौ अपनै पान, मूढ़ कछु समुझत नाहीं ।
चन्द्रमणिहिं लै गुहै, काँच के मनियनि माहीं ।।
जमुना- पुलिन निकुंज-घन, अद्भुत है सुख कौ सदन ।
खेलत लाड़िली-लाल जहँ, ऐसौ है वृन्दाविपिन ।।17।।
दोहा
ह्वै अनन्य इक-रस गहै, वृन्दावन रस-रीति ।
विधि-निषेध मानै न कछु, करै भजनसौं प्रीति ।।18।।
कुंडलिया
बार-बार तो बनत नहिं, यह संजोग अनूप ।
मानुष तन, वृन्दाविपिन, रसिकनि-संग, बिबिरूप ।।
रसिकनि-संग बिबि रूप, भजन सर्वोपरि आही ।
मन दै "धुव" यह रंग, लेहु पल-पल अवगाही ।।
जो छिनु जात सो फिरत नहिं, करहु उपाइ अपार ।
सकल सयानप छाँड़ि भजु, दुर्लभ है यह बार ।।19।।
दोहा
भजन-रंग सतसंग मिलि, वृन्दावन सौ खेत ।
एक कृपा तें जुरै "ध्रुव" याके चहियै हेत ।।20।।
दस दोहा, दस कुण्डलिया, कुण्डल भजन कौ आहि ।
बाहर पाँव न दीजियै, छिनु-छिनु यह अवगाहि ।।21।।
भजन कुण्डलिया में रहौ, पग बाहिर जिनि देहु ।
एकै जुगल-किशोर सौं करि 'ध्रुव' सहज सनेहु ।।22।।
जै जै श्री भजन कुण्डलिया की जै जै श्री हित हरिवंश
कुंडलिया
हंस सुता तट बिहरिबौ, करि वृंदाबन बास ।
कुंज-केलि मृदु मधुर रस, प्रेम विलास उपास ।।
प्रेम-विलास उपास, रहै इक-रस मन माही ।
तिहि सुख कौ सुख कहा कहौं, मेरी मति नाही ।।
हित ध्रुव' यह रस अति सरस, रसिकनि कियौ प्रसंस।
मुकतनि छाँड़े चुगत नहिं, मान-सरोवर हंस ।।1।।
दोहा
रस भींज्यौ रस में फिरै, रसनिधि जमुना तीर ।
चिंतत रस में सने दोऊ, स्यामल-गौर सरीर ।।2।।
कुंडलिया
नवल रँगीले लाल दोऊ, करत विलास-अनंग ।
चितवनि-मुसकनि-छुवनि कच, परसनि उरज-उतंग ।।
परसनि उरज उतंग, चाह रुचि अति ही बाढ़ी ।
भई फूल अंग-अंग, भुजनि की कसकनि गाढ़ी ।।
यह सुख देखत सखिनु के, रहे फूलि लोइन कमल ।
हित ध्रुव' कोक कलानि में, अति प्रवीन नागर नवल ।।3।।
दोहा
प्रेम-तृषा की बेलि कौ, केलि अदन-रस आहि ।
परम रसिक नागर-नवल, पीवत जीवत ताहि ।।4।।
कुंडलिया
मदन केलि कौ खेल है, सकल सुखन कौ सार ।
तेहि विहार रस मगन रहैं, और न कछू सँभार ।।
और न कछू सँभार, हारि, करि प्रान पियारी ।
राखति उर पर लाल, नेकहूँ करति न न्यारी ।।
याही रस कौ भजन तौ, नित्य रहौ 'ध्रुव' हिय-सदन ।
कुंज-कुंज सुख-पुंज में करत केलि लीला-मदन ।।5।।
दोहा
केलि-बेलि फूली रहति, चितवनि, मुसकनि, फूल ।
तेहि लागे छबि-फल उरज, ढाँपे प्यार- दुकूल ।।6।।
कुंडलिया
प्रेमहि शील सुभाव नित, सहजहि कोमल बैंन ।
ऐसी तिय पिय-हीय में, बसति रहौ दिन-रैंन ।।
बसति रहौ दिन रैन, नैन सुख पावत अति ही ।
प्रिया प्रेम-रस भरी, लाल तन चितवति जब ही ।।
देखो यह रस अति सरस, बिसरावत सब नेम ही ।
"हित ध्रुव' रस की रासि दोउ, दिन बिलसत रहैं प्रेम ही ।।7।। दोहा एकै सहज सुभाव बन्यौ, एकै विधि सब भाँति । एक रंग-रुचि एक रस, एकै बात सुहाति ।।8।। कुंडलिया सीस-फूल झलकान छबि, चंद्रिका की फहरानि । 'ध्रुव' के हिय में बसत रहौ, बिबि चितवनि मुसकानि ।। बिबि चितवनि मुसकानि, रहौ यौं उर में छाई । तिहिं रस के बल मनहिं, और कछुवै न सुहाई ।। या शोभा पर वारियै, कोटि-कोटि रति-ईस । रीझि-रीझि नख-चंद्रकनि, जब लावत पिय सीस ।।9।। दोहा सीस फूल सिखि चंद्रिका, सदा बसौ मन मोर । अरु जब चितवति लाड़िली, पिय तन नैंननि कोर ।।10।। कुंडलिया ऐसैं हिय में बसत रहौ, नव-किशोर रस-रासि । चितवनि अति अनुराग की, करत मंद मृदु हाँसि ।। करत मंद मृदु हाँसि दोऊ, होत जु प्रेम प्रकास । छके रहत मदमत्त गति, आनँद मदन बिलास ।। 'हित ध्रुव' छबि सौं कुंज में, दै अंसनि-भुज वैसे । मेरी मति इति नाहिं, कहौं उपमा दै ऐसे ।।11।। दोहा नव-किशोर चितचोर दोऊ, परम-रसिक सिर मौर । ऐसैं हिय में मिलि रहौ, बचै नहीं कहुँ ठौर ।।12।। कुंडलिया (श्री) राधाबल्लभ लाल की, बिमल धुजा फहरंत । भगवत धर्महुँ जीति कैं, निजु प्रेमा ठहरंत ।। निजु प्रेमा ठहरंत, नेम कछु परसत नाहीं । अलक लड़े दोउ लाल, मुदित हँसि-हँसि लपटाहीं ।। 'हित ध्रुव' यह रस मधुर, सार कौ सार अगाधा । आवै तबहीं हीय में, कृपा करैं वल्लभ राधा ।।13।। दोहा महामाधुरी प्रेम रस, आवै जिहि उर माहिं । नवधा हूँ तिहि रुचै नहिं, नेम सबै मिटि जाहिं ।।14।। कुंडलिया श्रीराधा बल्लभ-लाड़िली, अति उदार सुकुमारि । ध्रुव'"" तौ भूल्यौ और ते, तुम जिनि देहु बिसारि ।।
" तुम जिनि देहु बिसारि, ठौर मोकौं कहुँ नाहीं ।
पिय रँग-भरी कटाक्ष, नेकु चितवौ मो माहीं ।।
बढ़ै प्रीति की रीति, बीच कछु होइ न बाधा ।
तुम हौ परम प्रवीन, प्राण-बल्लभ श्रीराधा ।।15।।
दोहा
अतिहि मृदुल नागर-नवल, करुणासिंधु अपार ।
ऐसे शील सुभाव पर, "धुव" कीन्हौं बलिहार ।।16।।
कुंडलिया
वृन्दाविपिन निमित्त गहि, तिथि बिधि मानैं आन ।
भजन तहाँ कैसे रहै, खोयौ अपनै पान ।।
खोयौ अपनै पान, मूढ़ कछु समुझत नाहीं ।
चन्द्रमणिहिं लै गुहै, काँच के मनियनि माहीं ।।
जमुना- पुलिन निकुंज-घन, अद्भुत है सुख कौ सदन ।
खेलत लाड़िली-लाल जहँ, ऐसौ है वृन्दाविपिन ।।17।।
दोहा
ह्वै अनन्य इक-रस गहै, वृन्दावन रस-रीति ।
विधि-निषेध मानै न कछु, करै भजनसौं प्रीति ।।18।।
कुंडलिया
बार-बार तो बनत नहिं, यह संजोग अनूप ।
मानुष तन, वृन्दाविपिन, रसिकनि-संग, बिबिरूप ।।
रसिकनि-संग बिबि रूप, भजन सर्वोपरि आही ।
मन दै "धुव" यह रंग, लेहु पल-पल अवगाही ।।
जो छिनु जात सो फिरत नहिं, करहु उपाइ अपार ।
सकल सयानप छाँड़ि भजु, दुर्लभ है यह बार ।।19।।
दोहा
भजन-रंग सतसंग मिलि, वृन्दावन सौ खेत ।
एक कृपा तें जुरै "ध्रुव" याके चहियै हेत ।।20।।
दस दोहा, दस कुण्डलिया, कुण्डल भजन कौ आहि ।
बाहर पाँव न दीजियै, छिनु-छिनु यह अवगाहि ।।21।।
भजन कुण्डलिया में रहौ, पग बाहिर जिनि देहु ।
एकै जुगल-किशोर सौं करि 'ध्रुव' सहज सनेहु ।।22।।
जै जै श्री भजन कुण्डलिया की जै जै श्री हित हरिवंश
13. भजनशत
दोहा
श्री हरिवंश सरोज-पद, जो पै सेये नाहिं ।
भजन रीति अरु प्रेम-रस, क्यौं आवै मन माहिं ।।1।।
हरिवंश चंद अरविंद पद, यह निज सर्वसु जानि ।
हित ध्रुव' मिथुन किशोर सौं, तिहिं बल होइ पहिचानि ।।2।।
सोरठा
प्रेम सहित हुलसात, सेवा श्यामा-श्याम की।
कीजै मन इहिं भाँति, दिन-दिन अति अनुराग सौं ।।3।।
दोहा
प्रथमहि मज्जन कीजियै, सौरभ अंग लगाइ ।
ता पाछे रचि-पचि करै, सुन्दर तिलक बनाइ ।।4।।
तिय के तन कौ भाव धरि, सेवा हित श्रृंगार ।
युगल- महल की टहल कौ, तब पावै अधिकार ।।5।।
नारी किंवा पुरुष हो, जिनिकै मन इह भाव ।
दिन-दिन तिनकी चरन-रज, लै लै मस्तक लाव ।।6।।
दुलहिनि-दूलहु छवि झलक, तहँ राखै दोऊ नैन ।
भाव तरंगनि मन रँगै, सुनत मधुर मृदु बैंन ।।7।।
लाल-लड़ैती केलि कल, अद्भुत प्रेम-विलास ।
तिनहीं के रँग रँगि रहै, सब ते होइ उदास ।।8।।
मन की दृढ़ता हेत लगि, कही भजन की रीति ।
सुनै हिये के श्रवन दै, तब उपजै मन प्रीति ।।9।।
(श्री) राधावल्लभ रूप रस, करहु नैन-मग पान ।
प्रेम सहित निजु केलि गुन, करि रसना दिन गान ।।10।।
गद्गद सुर नैंना सजल, दंपति-रस रहै भीन।
इहि गति वृन्दा-विपिन में, फिरै प्रेम-तन-लीन ।।11।।
नील-पीत अंचल झलक, नैननि में रहौ नित्त ।
जावक जुत नख-चरन-जुग, सदा बसौ “ध्रुव” चित्त ।।12।।
सोरठा
चलत रहौ दिन रैनि, प्रेम-वारि धारा नयन ।
जाग्रत अरु सुख सैंन, चितै-चितै विवि कुँवर छबि ।।13।।
दोहा
करत टहल बन्दन अधिक, रंच प्रेम मन जौन ।
ते तौ सब ऐसै भये, ज्यौं सालन बिनु लौन ।।14।।
हित ध्रुव' निरखत नेंकु नहिं, वैभवता की ओर।
रंच प्रेम में अपुनपौ, हारत नवल किशोर ।।15।।
साधन करत अनेक जो, कोटि-कोटि जुग जाहिं ।
तऊ न आवत प्रेम बिनु, रसिक कुँवर मन माहीं ।।16।।
एक प्रेम पैयत कुँवर, करहु जतन बहुतेर ।
मन वच निश्चय जानि यह, एक ग्रन्थ सौ फेर ।।17।।
नैन न झलक्यौ प्रेम जल, भई न तन-गति और ।
तेहि उर कहौ कैसैं लसै, परम रसिक-सिरमौर ।।18।।
नव किशोर इक प्रेम बस, नाहिंन आन उपाइ ।
अनेक चतुरई करौ किनि, बातैं कोटि बनाइ।।19।।
मन की गति यौं चाहियै, भयौ रहै दिन दीन ।
रसिकनि की पदरज तरैं, लुठत सदा ह्वै लीन ।।20।।
सहजहिं जल अरु प्रेम कौ, एक सुभावहि जानि ।
चलत अधिक तेहि ठाँव कौ, पावत जहाँ निवानि ।।21।।
देखौ अद्भुत प्रेम फल, सब ते ऊँचौ आहि ।
सीस करै जब चरन तर, तब पहुँचै कर ताहि ।।22।।
वैभव-सुख 'ध्रुव' जहाँ लगि, छत्रधार सत अर्ब ।
प्रेम-गरीबी सहज पर, वारि डारि 'ध्रुव' सर्ब ।।23।।
जब लगि मन चंचल भयौ, फिरत विषय-सुख माहि।
तब लगि दंपति-चरन सौं, होत प्रेम छिन नाहिं ।।24।।
मन गति चंचल सबनि तें, उपजत छिन सतरंग ।
आवत तबहीं हाथ जो, रसिकनि कौ होइ सग ।।25।।
भयौ न रसिकन संग जौ, रँग्यो न मन रँग प्रेम ।
पारस बिन परसे कहौ, होत लोह ते हेम ।।26।।
जब लगि मन गज खुभत नहिं, प्रेम-पंक में आइ ।
तब लगि पाँचौं रिषिनु के, सुख में रहत समाइ ।।27।।
सोरठा
रसिकनि के रहि संग, रे मन आन विचार तजि ।
नैननि कौ लै रंग, मिथुन-रूप-रस रंगि कै ।।28।।
दोहा
रे मन रसिकनि-संग बिनु, रंच न उपजै प्रेम ।
या रस कौ साधन यहै, और करौ जिनि नेम ।।29।।
दंपति छवि में मत्त जे, चाहत दिन इक-रंग ।
हित सौं चित चाहत रहौ, निशि-दिन तिनकौ संग ।।30।।
झूलत झूमत फिरै दिन, घूमत दंपति-रंग ।
भाग पाइ छिन एक जो, पैयत तिनकौ संग ।।31।।
सेवा अरु तीरथ-भ्रमन, फलत हैं कालहि पाइ।
भक्त-संग छिन एक में, लेत भक्ति उपजाइ ।।32।।
जिनके हिये बसत रहैं, (श्री) राधाबल्लभ लाल ।
तिनकी पद रज धोइ 'ध्रुव' पीवत रहु सब काल ।।33।।
महा मधुर सुकुमार दोऊ, जिनके उर बसे आनि ।
तिनहूँ तें तिनकौं अधिक, निश्चय करि 'ध्रुव' जानि ।।34।।
जिनकै जाने जानियै, युगल-चंद-सुकुमार ।
तिनकी पद-रज सीस धरि, 'ध्रुव' कै यहै अधार ।।35।।
सोरठा
तृन सम सब ह्वै जाहिं, प्रभुता सुख त्रैलोक की ।
उपजै या मन माहिं, अद्भुत रंचक प्रेम जब ।।36।।
दोहा
मन बच धरै अनन्य व्रत, करत भजन रस-रीति ।
तेई भावत श्याम-मन, 'हित ध्रुव' मानत प्रीति ।।37।।
पिय-प्यारी के पद-कमल, निसि-वासर करि ध्यान ।
रे मन भजन-अनन्य में, मिलवहु मति कछु आन ।।38।।
(श्री) राधावल्लभ लाल से, परम रसिक-सिरमौर ।
ते पद छाँड़े मूढ़ मति, खोजत फिरै कछु और ।।39।।
ज्ञान, धर्म, व्रत, कर्म में, देत है मन अज्ञान ।
करत आस तंदुलनि की, कूटत है तुस-धान ।।40।।
(श्री) राधावल्लभ लाल-जस, जिहि उर नाहिं सुहात ।
देखौ ते नर मंद- मति, करत आप अपघात ।।41।।
संजम, व्रत, सतमख करत, वेद-पाठ, तप, नेम।
इन करि हरि पैयत नहीं, बिनु आये उर प्रेम ।।42।।
कर्म-धर्म मत अमित कै, त्याग, सांख्य-विधि, योग ।
माया- उदधि प्रवाह में, दियौ बहाइ सब लोग ।।43।।
तहाँ जु नौका कर परै, भक्ति विमल-रस-सार ।
तिहि पर भक्तनि-कृपा-बल, चढ़त सुलभ होइ पार ।।44।।
जे अनुसरत हैं ज्ञान पथ, निवटत बिरला कोइ ।
तेहि साधन कौ फल यहै, मुक्ति जीव की होइ ।।45।।
कर्म-श्राद्ध में कुशल जे, पितर-लोक ते जाहिं ।
भक्त गनत नहिं मुक्ति कौं, और लोक किहि माहिं ।।46।।
कर्म-धर्म में करहु जिनि, भगवत भजन मिलाइ ।
सिंह-शरन गहि मूढ़ मति, स्यार-शरन कित जाइ।।47।।
बड़ी मूढ़ता गही जिय, लई लोक की लाज ।
पाछौ गर्दभ कौ गह्यौ, चढ़े बड़े गजराज ।।48।।
विधि-निषेध के बंध' हैं, और धर्म मृग मानि ।
केहरि पुनि निर्बन्ध है, भगवत धर्महि जानि ।।49।।
यदपि विषय इंद्रियन बस, भक्त अनन्य जो होइ ।
कर्मठ कोटि जितेंद्रियन, तेहि सम सर नहिं कोइ ।।50।।
श्रुति, पुरान-विधि, स्मृति बहु, अलप आयु यह काल ।
लेहु सार गहि हंस जिमि, बिमल भजन- नंद-लाल ।।51।।
रीति भजन की यहै 'ध्रुव', छाँड़ै सब की आस ।
युगल चरन की शरन गहि, मन में धरि विश्वास ।।52।।
भक्तहि अंतर को रचै, नाना बिधि के फंद ।
चित्त-भ्रांति सब दूर करि, करौ भजन आनंद ।।53।।
नाना बिधि सब भजन की, तिनहिं भजत सब कोइ ।
जो है जाकी भावना, सिद्ध सोई पै होइ ।।54।।
भुवन चतुर्दश नाहिं सुख, भक्तनि-पद समतूल ।
माया कौतुक जो कछू, सो है सब दुख मूल ।।55।।
सो दिन कबहूँ आइ है, मन कुवासना जाहिं।
सरस चित्त अहर्निशि फिरौं, सघन विपिन बन माहिं ।।56।।
भक्त प्रकार अनेक बिधि, मन-मन औरै बात ।
भीजें विपिन-विहार-रस, तिनहिं न और सुहात ।।57।।
जे सेवत वृन्दाविपिन, युगल कुँवर रस ऐंन ।
ते बैकुंठ सुखादि तन, चितवत नहिं भरि नैंन ।।58।।
नौतन वैस किशोर छबि, बसति है जिहि उर नित्त ।
पौगँड बाल लीलादिहू, भावत नहिं तेहि चित्त ।।59।।
सकल भजन के माहिं है, 'हित-ध्रुव' यह रस सार ।
नव किशोर सु नव-कुँवरि, करत हैं विपिन -विहार ।।60।।
नवल-प्रिया छवि बसत रहौ, इहि बिधि नैंननि माहिं ।
निकसत सघन लतानि ते, धरे कंठ पिय बाँहिं ।।61।।
नीलांचल रह्यौ अरुझि कै, कनक लतनि सौं आहि ।
या छबि सौं कब निरखिहौं, पिय निरवारत ताहि ।।62।।
नवल कुंज नव सहचरी, नवल खगादि कुरंग ।
सब नवलनि में नवल दोऊ, करत केलि सुख रंग ।।63।।
अद्भुत सुख रस-सार में, कब ह्वै है मन लीन ।
ध्रुव' अँखियाँ तहँ यौं रहौ, ज्यौं जल में गति मीन ।।64।।
इहि बिधि गति ह्वै है कबहुँ, और न कछू सुहाइ ।
वृन्दावन सुख रंग में, रहै चित्त ठहराइ ।।65।।
सकल बात घट तैं घटौ, मन की वृत्ति अनेक ।
वृन्दा-विपिन विहार रस, यहै बढ़ौ उर एक ।।66।।
बिबस दशा विहरत रहौं, अद्भुत सुखहि बिचारि ।
नैन सजल ह्वै कैं ढरैं, शोभा विपिन निहारि ।।67।।
जिनके मन 'ध्रुव' रचि रहे, वृन्दावन सुख-रंग ।
तेहि सुख कौं जानत सोई, डोलत भए मतंग ।।68।।
हित ध्रुव' जब लगि प्रान हैं, आनहु जिनि कछु चित्त ।
परम रसिक विवि कुँवर वर, हियैं लड़ावहु नित्त ।।69।।
ऐसै रसिक किसोर तजि, भजत मंद-मति आनि ।
कौन देह खोवत वृथा, समुझत नहिं कछु हानि ।।70।।
जे नर वृन्दा-विपिन तजि, अनतहि मन लै जात ।
कंचन तजि गहि काँच कौं, फिरि पाछैं पछितात ।।71।।
धावत वृन्दा-विपिन तजि, जे जन आन विचारि ।
अति ही दुर्लभ ठौर यह, तातें कढ़ियत मारि ।।72।।
दुर्लभ वृन्दा- विपिन है, राख्यौ सब तें गोइ ।
तेहि ठाँ पावै रहन क्यौं, भाग-हीन जो होइ ।।73।।
करत हैं विविध- बिहार तहँ, परम रसिक सिरमौर ।
वृन्दावन बिनु चित्त में, आनहु जिनि कछु और ।।74।।
जे नर निंदत मंद- मति, वृन्दावन कौ बास ।
सुपनेहुँ परस न कीजिये, तजि 'ध्रुव' तिनकौ पास ।।75।।
दुर्लभ निधि देखत सुनत, सो आवत उर नाहिं।
जिनि धर्मनि में कष्ट बहु, हठ ठानत मन माहिं ।।76।।
पाँचौ इंद्री साधि कै, योग, मौन-व्रत लीन ।
देखौ भजन-अनन्य बिनु, बाद वृथा श्रम कीन ।।77।।
ह्वै आवैं या देह तें, कैसेहुँ दोष बिशाल ।
जो है एक अनन्य-व्रत, तजत न ताहि गोपाल ।।78।।
ज्यौं घरनी है अति बुरी, पति नहिं छाँड़त वाहि।
देखत ही पर-पुरुष तन, तजत तिही छिन ताहि ।।79।।
बिनु अटके मन पद-कमल, जेहि छिन रहत हैं प्रान ।
देखियत पसु विहरत मनौं, जीवत मृतक समान ।।80।।
विवि-किशोर छवि रंग जो, नैन न भींजे नेह ।
अरु मन भयौ न मैन सो, तो निष्फल गई देह ।।81।।
बिन अर्पे जे जो कछू, ते लागत हैं खान ।
देखौ तिहि अपराध कौ, कहँ लगि कहौं प्रमान ।।82।।
जल हूँ भूलि न पीजिये, बिनु लीन्हें निजु नाम ।
ऐसी जो उपजै हिये, तौ पावै सुख धाम ।।83।।
(श्री) राधाबल्लभ लाल कौं, रुचि सौं जेंवाबहु नित्त ।
सो जूँठन लै पाइये, और न आनहु चित्त ।।84।।
सुनि 'ध्रुव' धर्मी आन सौं, कबहुँ न कीजै बाद ।
सब ते दिनहि निशंक ह्वै, लीजै महा प्रसाद ।।85।।
रे मन लागत भोग जब, कीजै तब न विचारि ।
सब प्रसाद लै पाइये, व्यौरौ भेद निवारि ।।86।।
जौ है मन विश्वास 'ध्रुव', तब सुधरै सब बात ।
नातरु माया-पंथ में, फिरत जु टक्कर खात ।।87।।
ज्यौं चातक स्वाती बिना, परसत नहिं जल और ।
दृढ़ता यौं मन चाहिये, फिरै न बहुतै ठौर ।।88।।
बिच-बिच दुख-सुख देह के, ह्वै आवत अनियास ।
भजन-पंथ ते डिगहु जिन, मन में राखि हुलास ।।89।।
बिपति काल ब्यौहार में, माया-मोह समीर ।
डुलवत बहु बिधि चित्त कौं, टिकै सोई जो धीर ।।90।।
प्रभुता संपति के भयैं, मन इंद्रिन बस होइ ।
परम धीर बिनु कैसें हूँ, राखि सकै नहिं कोई ।।91।।
परतहि प्रेम प्रवाह में, रहत सरस दिन चित्त ।
दुख सुख संपति-विपति के, तृन सम पैयत कित्त ।।92।।
अल्प बुद्धि कल्पत कछू, भक्तनि चरन-प्रताप ।
इहि बिधि जौ मन अनुसरै, जाहिं विविध तन-ताप ।।93।।
सोरठा
भक्तनि सौं अभिमान, प्रभुता भये न कीजिये ।
मन बच निश्चय जान, इहि सम नहिं अपराध कछु ।।94।।
दोहा
सकल आयु सत-कर्म में, जो पै बितई होई ।
भक्तनि कौ अपराध इक, डारत छिन में खोइ ।।95।।
और सकल अघ मुचन कौं, नाम उपाइ है नीक ।
भक्त-द्रोह कौ जतन नहिं, होत बज्र की लीक ।।96।।
निंदा भक्तनि की करै, सुनत हैं जे अघराशि ।
वे तौ एकहिं संग दोऊ, बँधत भानु-सुत पाशि ।।97।।
भूलि हुँ मन दीजै नहीं, भक्तनि-निंदा ओर ।
होत अधिक अपराध यह, यौं मत जानहु थोर ।।98।।
सेवा करत में भक्त जन, होइ प्राप्त जो आइ ।
सो सेवा तजि बेगि ही, अरचहु तिनकौं जाइ ।।99।।
भक्तनि देखे अधिक ही, आदर दीजै प्रीति ।
यह गति जो मन की करै, जाइ सकल जग जीति ।।100।।
जाति अभिमान न कीजिये, भक्त जननि सौं भूलि ।
सुपच आदि दै होंहिं जो, मिलिये तिन सौं फूलि ।।101।।
कुण्डलिया
बहु बीती थोरी रही, सोऊ बीती जाइ ।
हित ध्रुव' बेग बिचारि कै, बसि वृन्दावन आइ ।।
बसि वृन्दावन आइ, लाज तजि कै अभिमानै ।
प्रेम लीन ह्वै दीन, आपकौं तृण सम जानै ।।
सकल भजन कौ सार, सार तू करि रस-रीती ।
रे मन देखि विचारि, रही कछु इक बहु बीती ।।102।।
सोरठा
वृन्दावन रस रीति, रहै विचारत चित्त 'ध्रुव' ।
पुनि जैहै वय बीति, भजिये नवल किशोर दोऊ ।।103।।
दोहा
दुर्लभ मानुष देह यह, पैयत कैसैहुँ भाँति ।
सोई खोयौ कौन नग, बाद भजन बिनु जाति ।।104।।
विषया जल में मीन ज्यौं, करत कलोल अग्यान ।
नहिं जानत ढिंग काल बक, रह्यौ ताकि धरि ध्यान ।।105।।
ज्यौं मृग मृगयिन संग में, फिरत मत्त मन बाँधि ।
जानत नाहिंन पारधी, रहयौ काल सर साँधि ।।106।।
निसि बासर कर कतरनी, लियैं काल करवाहि ।
कागद सम भई आयु तो, छिन छिन कतरत ताहि ।।107।।
जेहि तन कौं सुर आदि दै, ईछत रहैं दिन आहि ।
सो पायौ मति हीन तैं, वृथा गँवावत ताहि ।।108।।
रे मन प्रभुता काल की, करहु जतन होइ ज्यौंन ।
तू फिरि भजन कुठार सौं, काटत ताही क्यौंन ।।109।।
पुरुष सोई जो पुरीष सम, छाँड़ि भजै संसार ।
विपिन-भजन गहि हृदै दृढ़, तजि कुटुंब परिवार ।।110।।
सुख में सुमरै नाहिं जो, (श्री) राधाबल्लभ लाल ।
तब कैसैं मुख कहि सकत, चलत प्रान जेहि काल ।।111।।
ढीठौ (ह्वै) करि बिनती दियौ, कंचन काँच बताइ ।
इन में जाके मन रुचै, सोई लेहु उठाइ ।।112।।
सोरठा
तब पावै रस सार, शुद्ध भजन आवै हियैं ।
यातें कहयौ बिस्तार, भजन नसैनी प्रेम की ।।113।।
दोहा
यह रस तौ अति अमल है, रहौ बिचारत नित्त ।
कहत-सुनत‘ध्रुव´भजन- सत, दृढ़ता ह्वै है चित्त ।।114।।
जै जै श्री भजन शत लीला की जै जै श्री हित हरिवंश
दोहा
श्री हरिवंश सरोज-पद, जो पै सेये नाहिं ।
भजन रीति अरु प्रेम-रस, क्यौं आवै मन माहिं ।।1।।
हरिवंश चंद अरविंद पद, यह निज सर्वसु जानि ।
हित ध्रुव' मिथुन किशोर सौं, तिहिं बल होइ पहिचानि ।।2।।
सोरठा
प्रेम सहित हुलसात, सेवा श्यामा-श्याम की।
कीजै मन इहिं भाँति, दिन-दिन अति अनुराग सौं ।।3।।
दोहा
प्रथमहि मज्जन कीजियै, सौरभ अंग लगाइ ।
ता पाछे रचि-पचि करै, सुन्दर तिलक बनाइ ।।4।।
तिय के तन कौ भाव धरि, सेवा हित श्रृंगार ।
युगल- महल की टहल कौ, तब पावै अधिकार ।।5।।
नारी किंवा पुरुष हो, जिनिकै मन इह भाव ।
दिन-दिन तिनकी चरन-रज, लै लै मस्तक लाव ।।6।।
दुलहिनि-दूलहु छवि झलक, तहँ राखै दोऊ नैन ।
भाव तरंगनि मन रँगै, सुनत मधुर मृदु बैंन ।।7।।
लाल-लड़ैती केलि कल, अद्भुत प्रेम-विलास ।
तिनहीं के रँग रँगि रहै, सब ते होइ उदास ।।8।।
मन की दृढ़ता हेत लगि, कही भजन की रीति ।
सुनै हिये के श्रवन दै, तब उपजै मन प्रीति ।।9।।
(श्री) राधावल्लभ रूप रस, करहु नैन-मग पान ।
प्रेम सहित निजु केलि गुन, करि रसना दिन गान ।।10।।
गद्गद सुर नैंना सजल, दंपति-रस रहै भीन।
इहि गति वृन्दा-विपिन में, फिरै प्रेम-तन-लीन ।।11।।
नील-पीत अंचल झलक, नैननि में रहौ नित्त ।
जावक जुत नख-चरन-जुग, सदा बसौ “ध्रुव” चित्त ।।12।।
सोरठा
चलत रहौ दिन रैनि, प्रेम-वारि धारा नयन ।
जाग्रत अरु सुख सैंन, चितै-चितै विवि कुँवर छबि ।।13।।
दोहा
करत टहल बन्दन अधिक, रंच प्रेम मन जौन ।
ते तौ सब ऐसै भये, ज्यौं सालन बिनु लौन ।।14।।
हित ध्रुव' निरखत नेंकु नहिं, वैभवता की ओर।
रंच प्रेम में अपुनपौ, हारत नवल किशोर ।।15।।
साधन करत अनेक जो, कोटि-कोटि जुग जाहिं ।
तऊ न आवत प्रेम बिनु, रसिक कुँवर मन माहीं ।।16।।
एक प्रेम पैयत कुँवर, करहु जतन बहुतेर ।
मन वच निश्चय जानि यह, एक ग्रन्थ सौ फेर ।।17।।
नैन न झलक्यौ प्रेम जल, भई न तन-गति और ।
तेहि उर कहौ कैसैं लसै, परम रसिक-सिरमौर ।।18।।
नव किशोर इक प्रेम बस, नाहिंन आन उपाइ ।
अनेक चतुरई करौ किनि, बातैं कोटि बनाइ।।19।।
मन की गति यौं चाहियै, भयौ रहै दिन दीन ।
रसिकनि की पदरज तरैं, लुठत सदा ह्वै लीन ।।20।।
सहजहिं जल अरु प्रेम कौ, एक सुभावहि जानि ।
चलत अधिक तेहि ठाँव कौ, पावत जहाँ निवानि ।।21।।
देखौ अद्भुत प्रेम फल, सब ते ऊँचौ आहि ।
सीस करै जब चरन तर, तब पहुँचै कर ताहि ।।22।।
वैभव-सुख 'ध्रुव' जहाँ लगि, छत्रधार सत अर्ब ।
प्रेम-गरीबी सहज पर, वारि डारि 'ध्रुव' सर्ब ।।23।।
जब लगि मन चंचल भयौ, फिरत विषय-सुख माहि।
तब लगि दंपति-चरन सौं, होत प्रेम छिन नाहिं ।।24।।
मन गति चंचल सबनि तें, उपजत छिन सतरंग ।
आवत तबहीं हाथ जो, रसिकनि कौ होइ सग ।।25।।
भयौ न रसिकन संग जौ, रँग्यो न मन रँग प्रेम ।
पारस बिन परसे कहौ, होत लोह ते हेम ।।26।।
जब लगि मन गज खुभत नहिं, प्रेम-पंक में आइ ।
तब लगि पाँचौं रिषिनु के, सुख में रहत समाइ ।।27।।
सोरठा
रसिकनि के रहि संग, रे मन आन विचार तजि ।
नैननि कौ लै रंग, मिथुन-रूप-रस रंगि कै ।।28।।
दोहा
रे मन रसिकनि-संग बिनु, रंच न उपजै प्रेम ।
या रस कौ साधन यहै, और करौ जिनि नेम ।।29।।
दंपति छवि में मत्त जे, चाहत दिन इक-रंग ।
हित सौं चित चाहत रहौ, निशि-दिन तिनकौ संग ।।30।।
झूलत झूमत फिरै दिन, घूमत दंपति-रंग ।
भाग पाइ छिन एक जो, पैयत तिनकौ संग ।।31।।
सेवा अरु तीरथ-भ्रमन, फलत हैं कालहि पाइ।
भक्त-संग छिन एक में, लेत भक्ति उपजाइ ।।32।।
जिनके हिये बसत रहैं, (श्री) राधाबल्लभ लाल ।
तिनकी पद रज धोइ 'ध्रुव' पीवत रहु सब काल ।।33।।
महा मधुर सुकुमार दोऊ, जिनके उर बसे आनि ।
तिनहूँ तें तिनकौं अधिक, निश्चय करि 'ध्रुव' जानि ।।34।।
जिनकै जाने जानियै, युगल-चंद-सुकुमार ।
तिनकी पद-रज सीस धरि, 'ध्रुव' कै यहै अधार ।।35।।
सोरठा
तृन सम सब ह्वै जाहिं, प्रभुता सुख त्रैलोक की ।
उपजै या मन माहिं, अद्भुत रंचक प्रेम जब ।।36।।
दोहा
मन बच धरै अनन्य व्रत, करत भजन रस-रीति ।
तेई भावत श्याम-मन, 'हित ध्रुव' मानत प्रीति ।।37।।
पिय-प्यारी के पद-कमल, निसि-वासर करि ध्यान ।
रे मन भजन-अनन्य में, मिलवहु मति कछु आन ।।38।।
(श्री) राधावल्लभ लाल से, परम रसिक-सिरमौर ।
ते पद छाँड़े मूढ़ मति, खोजत फिरै कछु और ।।39।।
ज्ञान, धर्म, व्रत, कर्म में, देत है मन अज्ञान ।
करत आस तंदुलनि की, कूटत है तुस-धान ।।40।।
(श्री) राधावल्लभ लाल-जस, जिहि उर नाहिं सुहात ।
देखौ ते नर मंद- मति, करत आप अपघात ।।41।।
संजम, व्रत, सतमख करत, वेद-पाठ, तप, नेम।
इन करि हरि पैयत नहीं, बिनु आये उर प्रेम ।।42।।
कर्म-धर्म मत अमित कै, त्याग, सांख्य-विधि, योग ।
माया- उदधि प्रवाह में, दियौ बहाइ सब लोग ।।43।।
तहाँ जु नौका कर परै, भक्ति विमल-रस-सार ।
तिहि पर भक्तनि-कृपा-बल, चढ़त सुलभ होइ पार ।।44।।
जे अनुसरत हैं ज्ञान पथ, निवटत बिरला कोइ ।
तेहि साधन कौ फल यहै, मुक्ति जीव की होइ ।।45।।
कर्म-श्राद्ध में कुशल जे, पितर-लोक ते जाहिं ।
भक्त गनत नहिं मुक्ति कौं, और लोक किहि माहिं ।।46।।
कर्म-धर्म में करहु जिनि, भगवत भजन मिलाइ ।
सिंह-शरन गहि मूढ़ मति, स्यार-शरन कित जाइ।।47।।
बड़ी मूढ़ता गही जिय, लई लोक की लाज ।
पाछौ गर्दभ कौ गह्यौ, चढ़े बड़े गजराज ।।48।।
विधि-निषेध के बंध' हैं, और धर्म मृग मानि ।
केहरि पुनि निर्बन्ध है, भगवत धर्महि जानि ।।49।।
यदपि विषय इंद्रियन बस, भक्त अनन्य जो होइ ।
कर्मठ कोटि जितेंद्रियन, तेहि सम सर नहिं कोइ ।।50।।
श्रुति, पुरान-विधि, स्मृति बहु, अलप आयु यह काल ।
लेहु सार गहि हंस जिमि, बिमल भजन- नंद-लाल ।।51।।
रीति भजन की यहै 'ध्रुव', छाँड़ै सब की आस ।
युगल चरन की शरन गहि, मन में धरि विश्वास ।।52।।
भक्तहि अंतर को रचै, नाना बिधि के फंद ।
चित्त-भ्रांति सब दूर करि, करौ भजन आनंद ।।53।।
नाना बिधि सब भजन की, तिनहिं भजत सब कोइ ।
जो है जाकी भावना, सिद्ध सोई पै होइ ।।54।।
भुवन चतुर्दश नाहिं सुख, भक्तनि-पद समतूल ।
माया कौतुक जो कछू, सो है सब दुख मूल ।।55।।
सो दिन कबहूँ आइ है, मन कुवासना जाहिं।
सरस चित्त अहर्निशि फिरौं, सघन विपिन बन माहिं ।।56।।
भक्त प्रकार अनेक बिधि, मन-मन औरै बात ।
भीजें विपिन-विहार-रस, तिनहिं न और सुहात ।।57।।
जे सेवत वृन्दाविपिन, युगल कुँवर रस ऐंन ।
ते बैकुंठ सुखादि तन, चितवत नहिं भरि नैंन ।।58।।
नौतन वैस किशोर छबि, बसति है जिहि उर नित्त ।
पौगँड बाल लीलादिहू, भावत नहिं तेहि चित्त ।।59।।
सकल भजन के माहिं है, 'हित-ध्रुव' यह रस सार ।
नव किशोर सु नव-कुँवरि, करत हैं विपिन -विहार ।।60।।
नवल-प्रिया छवि बसत रहौ, इहि बिधि नैंननि माहिं ।
निकसत सघन लतानि ते, धरे कंठ पिय बाँहिं ।।61।।
नीलांचल रह्यौ अरुझि कै, कनक लतनि सौं आहि ।
या छबि सौं कब निरखिहौं, पिय निरवारत ताहि ।।62।।
नवल कुंज नव सहचरी, नवल खगादि कुरंग ।
सब नवलनि में नवल दोऊ, करत केलि सुख रंग ।।63।।
अद्भुत सुख रस-सार में, कब ह्वै है मन लीन ।
ध्रुव' अँखियाँ तहँ यौं रहौ, ज्यौं जल में गति मीन ।।64।।
इहि बिधि गति ह्वै है कबहुँ, और न कछू सुहाइ ।
वृन्दावन सुख रंग में, रहै चित्त ठहराइ ।।65।।
सकल बात घट तैं घटौ, मन की वृत्ति अनेक ।
वृन्दा-विपिन विहार रस, यहै बढ़ौ उर एक ।।66।।
बिबस दशा विहरत रहौं, अद्भुत सुखहि बिचारि ।
नैन सजल ह्वै कैं ढरैं, शोभा विपिन निहारि ।।67।।
जिनके मन 'ध्रुव' रचि रहे, वृन्दावन सुख-रंग ।
तेहि सुख कौं जानत सोई, डोलत भए मतंग ।।68।।
हित ध्रुव' जब लगि प्रान हैं, आनहु जिनि कछु चित्त ।
परम रसिक विवि कुँवर वर, हियैं लड़ावहु नित्त ।।69।।
ऐसै रसिक किसोर तजि, भजत मंद-मति आनि ।
कौन देह खोवत वृथा, समुझत नहिं कछु हानि ।।70।।
जे नर वृन्दा-विपिन तजि, अनतहि मन लै जात ।
कंचन तजि गहि काँच कौं, फिरि पाछैं पछितात ।।71।।
धावत वृन्दा-विपिन तजि, जे जन आन विचारि ।
अति ही दुर्लभ ठौर यह, तातें कढ़ियत मारि ।।72।।
दुर्लभ वृन्दा- विपिन है, राख्यौ सब तें गोइ ।
तेहि ठाँ पावै रहन क्यौं, भाग-हीन जो होइ ।।73।।
करत हैं विविध- बिहार तहँ, परम रसिक सिरमौर ।
वृन्दावन बिनु चित्त में, आनहु जिनि कछु और ।।74।।
जे नर निंदत मंद- मति, वृन्दावन कौ बास ।
सुपनेहुँ परस न कीजिये, तजि 'ध्रुव' तिनकौ पास ।।75।।
दुर्लभ निधि देखत सुनत, सो आवत उर नाहिं।
जिनि धर्मनि में कष्ट बहु, हठ ठानत मन माहिं ।।76।।
पाँचौ इंद्री साधि कै, योग, मौन-व्रत लीन ।
देखौ भजन-अनन्य बिनु, बाद वृथा श्रम कीन ।।77।।
ह्वै आवैं या देह तें, कैसेहुँ दोष बिशाल ।
जो है एक अनन्य-व्रत, तजत न ताहि गोपाल ।।78।।
ज्यौं घरनी है अति बुरी, पति नहिं छाँड़त वाहि।
देखत ही पर-पुरुष तन, तजत तिही छिन ताहि ।।79।।
बिनु अटके मन पद-कमल, जेहि छिन रहत हैं प्रान ।
देखियत पसु विहरत मनौं, जीवत मृतक समान ।।80।।
विवि-किशोर छवि रंग जो, नैन न भींजे नेह ।
अरु मन भयौ न मैन सो, तो निष्फल गई देह ।।81।।
बिन अर्पे जे जो कछू, ते लागत हैं खान ।
देखौ तिहि अपराध कौ, कहँ लगि कहौं प्रमान ।।82।।
जल हूँ भूलि न पीजिये, बिनु लीन्हें निजु नाम ।
ऐसी जो उपजै हिये, तौ पावै सुख धाम ।।83।।
(श्री) राधाबल्लभ लाल कौं, रुचि सौं जेंवाबहु नित्त ।
सो जूँठन लै पाइये, और न आनहु चित्त ।।84।।
सुनि 'ध्रुव' धर्मी आन सौं, कबहुँ न कीजै बाद ।
सब ते दिनहि निशंक ह्वै, लीजै महा प्रसाद ।।85।।
रे मन लागत भोग जब, कीजै तब न विचारि ।
सब प्रसाद लै पाइये, व्यौरौ भेद निवारि ।।86।।
जौ है मन विश्वास 'ध्रुव', तब सुधरै सब बात ।
नातरु माया-पंथ में, फिरत जु टक्कर खात ।।87।।
ज्यौं चातक स्वाती बिना, परसत नहिं जल और ।
दृढ़ता यौं मन चाहिये, फिरै न बहुतै ठौर ।।88।।
बिच-बिच दुख-सुख देह के, ह्वै आवत अनियास ।
भजन-पंथ ते डिगहु जिन, मन में राखि हुलास ।।89।।
बिपति काल ब्यौहार में, माया-मोह समीर ।
डुलवत बहु बिधि चित्त कौं, टिकै सोई जो धीर ।।90।।
प्रभुता संपति के भयैं, मन इंद्रिन बस होइ ।
परम धीर बिनु कैसें हूँ, राखि सकै नहिं कोई ।।91।।
परतहि प्रेम प्रवाह में, रहत सरस दिन चित्त ।
दुख सुख संपति-विपति के, तृन सम पैयत कित्त ।।92।।
अल्प बुद्धि कल्पत कछू, भक्तनि चरन-प्रताप ।
इहि बिधि जौ मन अनुसरै, जाहिं विविध तन-ताप ।।93।।
सोरठा
भक्तनि सौं अभिमान, प्रभुता भये न कीजिये ।
मन बच निश्चय जान, इहि सम नहिं अपराध कछु ।।94।।
दोहा
सकल आयु सत-कर्म में, जो पै बितई होई ।
भक्तनि कौ अपराध इक, डारत छिन में खोइ ।।95।।
और सकल अघ मुचन कौं, नाम उपाइ है नीक ।
भक्त-द्रोह कौ जतन नहिं, होत बज्र की लीक ।।96।।
निंदा भक्तनि की करै, सुनत हैं जे अघराशि ।
वे तौ एकहिं संग दोऊ, बँधत भानु-सुत पाशि ।।97।।
भूलि हुँ मन दीजै नहीं, भक्तनि-निंदा ओर ।
होत अधिक अपराध यह, यौं मत जानहु थोर ।।98।।
सेवा करत में भक्त जन, होइ प्राप्त जो आइ ।
सो सेवा तजि बेगि ही, अरचहु तिनकौं जाइ ।।99।।
भक्तनि देखे अधिक ही, आदर दीजै प्रीति ।
यह गति जो मन की करै, जाइ सकल जग जीति ।।100।।
जाति अभिमान न कीजिये, भक्त जननि सौं भूलि ।
सुपच आदि दै होंहिं जो, मिलिये तिन सौं फूलि ।।101।।
कुण्डलिया
बहु बीती थोरी रही, सोऊ बीती जाइ ।
हित ध्रुव' बेग बिचारि कै, बसि वृन्दावन आइ ।।
बसि वृन्दावन आइ, लाज तजि कै अभिमानै ।
प्रेम लीन ह्वै दीन, आपकौं तृण सम जानै ।।
सकल भजन कौ सार, सार तू करि रस-रीती ।
रे मन देखि विचारि, रही कछु इक बहु बीती ।।102।।
सोरठा
वृन्दावन रस रीति, रहै विचारत चित्त 'ध्रुव' ।
पुनि जैहै वय बीति, भजिये नवल किशोर दोऊ ।।103।।
दोहा
दुर्लभ मानुष देह यह, पैयत कैसैहुँ भाँति ।
सोई खोयौ कौन नग, बाद भजन बिनु जाति ।।104।।
विषया जल में मीन ज्यौं, करत कलोल अग्यान ।
नहिं जानत ढिंग काल बक, रह्यौ ताकि धरि ध्यान ।।105।।
ज्यौं मृग मृगयिन संग में, फिरत मत्त मन बाँधि ।
जानत नाहिंन पारधी, रहयौ काल सर साँधि ।।106।।
निसि बासर कर कतरनी, लियैं काल करवाहि ।
कागद सम भई आयु तो, छिन छिन कतरत ताहि ।।107।।
जेहि तन कौं सुर आदि दै, ईछत रहैं दिन आहि ।
सो पायौ मति हीन तैं, वृथा गँवावत ताहि ।।108।।
रे मन प्रभुता काल की, करहु जतन होइ ज्यौंन ।
तू फिरि भजन कुठार सौं, काटत ताही क्यौंन ।।109।।
पुरुष सोई जो पुरीष सम, छाँड़ि भजै संसार ।
विपिन-भजन गहि हृदै दृढ़, तजि कुटुंब परिवार ।।110।।
सुख में सुमरै नाहिं जो, (श्री) राधाबल्लभ लाल ।
तब कैसैं मुख कहि सकत, चलत प्रान जेहि काल ।।111।।
ढीठौ (ह्वै) करि बिनती दियौ, कंचन काँच बताइ ।
इन में जाके मन रुचै, सोई लेहु उठाइ ।।112।।
सोरठा
तब पावै रस सार, शुद्ध भजन आवै हियैं ।
यातें कहयौ बिस्तार, भजन नसैनी प्रेम की ।।113।।
दोहा
यह रस तौ अति अमल है, रहौ बिचारत नित्त ।
कहत-सुनत‘ध्रुव´भजन- सत, दृढ़ता ह्वै है चित्त ।।114।।
जै जै श्री भजन शत लीला की जै जै श्री हित हरिवंश
14. शृंगार शत लीला (प्रथम शृंखला)
दोहा
(श्री)हरिवंश नाम 'ध्रुव' चिंतवत, होत जु हियैं हुलास ।
जो रस दुर्लभ सबनि ते, सो पैयत अनियास ।।1।।
व्यास-नंद-पद कमल बल, सकल सुखन कौ सार ।
रचि कीन्हौं श्रृंगार-सत, अद्भुत प्रेम-बिहार ।।2।।
बाँधी 'ध्रुव' गुन श्रृंखला, प्रथम चालिस अरु तीन ।
दुतिय चालिस अरु तीसरी, द्वै पर चालिस कीन ।।3।।
प्रथम श्रृंखला माहिं कछु, कह्यौ लाड़िली रूप ।
निरखि लाल सखि रहे छकि, सो छबि अतिहि अनूप ।।4।।
छिन छिन नेह कटाक्ष जल, सींचत पिय-हिय ऐंन ।
भाग पाइ जो कबहुँ 'ध्रुव', या सुख सौं लगैं नैन ।।5।।
सवैया
कैसौ फव्यौ है नीलांबर सुंदर, मोहि लिये मन मोहन माई ।
फैलि रही छवि अंगनि कांति, लसै बहु भाँति सुदेस सुहाई ।।
सीस कौ फूल सुहाग कौ छत्र, सदा पिय के मन कौं सुखदाई ।
और कछू न रुचै ध्रुव पीय कौं, भावै यहै सुकुमारि लड़ाई ।।6।।
कवित्त
(श्री) राधिकाबल्लभ प्यारी फुलवारी माँझ ठाड़ी, फूलकारी सारी तन शोभित बनाव की ।
लोचन विशाल बाँके अनियारे कजरारे, प्रीतम के प्रान हरै हेरनि सुभाव की ।।
चूरी मखतूल नीलमनिन की कर बनी, बेसरि सुदेस उर अँगिया कटाव की ।
कुन्दन की दुलरी अरु मोतिये के हार हिये, हित 'ध्रुव' चारु चौकी लसत जड़ाव की ।।7।।
जरकसी सारी तन जगमग रही फबि, छबि की छलक मनौं परी है रसाल री ।
उज्वल सुरंग अनियारी कोर नैननिं की, सीस फूल बेंदी लाल सोहै वर भाल री ।।
रतनजटित नीलमनि चौकी झलमलै, 'हित ध्रुव' लसै उर, मोतिन की माल री।
पानिप अनूप पेखैं भूली हैं निमेषैं देखैं, मंद-मंद बेसर के मुक्ता की हाल री ।।8।।
फबि रही सारी मृदु केसरी सुरंग अंग, भींजी है फुलेल स्वच्छ सौंधे मोद में सनी ।
खुल रही तामें आली अँगिया जँगाली गाढ़ी, दमकत कंठ लर मोतिन की द्वै बनी ।।
मृगमद बैंदी लसै प्रीतम के मन बसै, बेसरि झलक छबि बरषत है घनी ।
मुसकनि मंद सुख-रंग के तरंग उठैं, सोहने रसीले नैन सैन में बिके धनी ।।9।।
तनसुख सारी मिहीं भींजी है फुलेल माँहि, तामें लाल अँगिया सुदेस कसनी कसी ।
सौंधे सगबगे बार बन्यौ है सादौ सिंगार, मुख पर डारौं वारि कोटि कंज औ ससी ।।
चंचल छबीले बड़े सोहने रसीले नैन, चितै नेकु अलबेली अंचल लै मंद हँसी ।
हित ध्रुव' बस भये देखत ही रह गये, थिरकन बेसरि की प्रीतम के मन बसी ।।10।।
ककरेजी सारी तन गोरैं कैसी शोभियत, पीत अतरौटा सौं दुरंग छबि न्यारी है ।
मुख की पानिप अति चंचल नैननि गति, देखै 'ध्रुव' भूली मति उपमा कौं हारी है ।।
बैंदी लाल नथ सोहै बन्यौ मोती मन मोहै, बस भये पिय सुधि देह की बिसारी है ।
गहैं द्रुम-डारी एक रहि गये ताकी टेक, ऐसै बेस जब ते किशोरीजू निहारी है ।।11।।
सुरँग कसूँभी सारी पहिरैं रँगीली प्यारी, आली अलबेली भाँति रंग माहि ठाढ़ी है ।
केसरी सुरंग भीनी सौंधे सगबगी कीन्ही, सोहै उर अँगिया कसनि अति गाढ़ी है ।।
फैलि रही अरुनाई तैसी 'ध्रुव' तरुनाई, मानौं अनुराग रूप में झकोर काढ़ी है ।
बदन झलक पर परी है अलक आइ, देखि पिय नैननि ललक अति बाढ़ी है ।।12।।
सवैया
सारी सुरंग सुही अति झीनी, सुगंध सौं भींनी महा सुखदाई ।
रची चुनि प्रान समान सुजान ने, फूलनि-मोद हु ते मृदु माई ।।
भूलि रही मति की गति हेरत, जात नहीं उपमा 'ध्रुव' पाई ।
रँगी पिय प्यारे के रंग मनौ ऐंकि, अंगनि रूप तरंगनि छाई ।।13।।
सारी हरी ने हर्यौ मन लाल कौ, मोहनी सोहनी के तन सोहै ।
अँगिया लाल सुरंग बनी लहि, गातहि रंग खरौ मन मोहै ।।
रूप की राशि सबै गुन आगरि, या छबि की उपमा कहौ कोहै ।
राजति है 'ध्रुव' कुंज बिहारिनि, सो छबि लाल पलौ पल जोहै ।।14।।
कवित्त
हँसनि में फूलनि की चाहनि में अमृत की, नख - सिख रूप ही की बरषा सी होति है ।
केसनि की चंद्रिका सुहाग अनुराग घटा, दामिनी की लसनि दसन ही की दोति है ।।
हित ध्रुव' पानिप तरंग-रस छलकत ताकौ, मानौ सहज सिंगार सीवाँ पोति है ।
अति अलबेली प्रिये भूषित भूषन बिनु, छिन छिन औरे और बदन की जोति है ।।15।।
छबि सौं छबीली खरी प्रीतम के रसभरी, कोटि-कोटि दामिनी न नख-छबि पावहीं ।
चंद-कोटि मंद होत मोतिन की कहा जोति, नेकु ही की चितवनि ढरे लाल आवहीं ।।
देखत हैं रुचि लियैं मुख-शोभा चित दियैं, परम प्रबीन प्यारौ रुचि लै लड़ावहीं ।
हित ध्रुव' छिन छिन मैन के तरंग बढ़ें, प्रेम के हिंडोले चढ़े मदन झुलावहीं ।।16।।
गोरी मृदु अँगुरिन मैंहदी को रंग फब्यौ, अतिहि सुरंग कंज दलनि लजावहीं ।
मनिनु के बहुरंग हरित जँगाली छल्ले, जिहि पोरी जैसै बने पिय पहिरावहीं ।।
चितै छबि कर गहैं नैननि कौं छ्वाइ-छ्वाइ, चूँमि-चूँमि माथे धरि आनि उर लावहीं ।
हित ध्रुव' निशि-दिन याही रस रहे पगि, जेहि अंग मन परै तिहि सचु पावहीं ।।17।।
कंचन के वरन चरन मृदु प्यारीजू के, जावक सुरंग रँगे मनहि हरत हैं।
हित ध्रुव' रही फबि सुमिलि जेहरि-छबि, नूपुर रतन-खचे दीप से बरत हैं ।।
रीझि-रीझि सुंदर करनि पर पट धरैं, आरसी सी लियैं लाल देखिबौ करत हैं ।
नख-मनि-प्रभा प्रतिबिंब झलमलै कंज, चंदनि के जूथ मानौं पायनि परत हैं ।।18।।
दोहा
अद्भुत पद-पल्लव प्रभा, मृदु सुरंग छबि ऐन ।
छिनछिन चूँवत प्यार सौं, रहत लाइ उर-नैन ।।19।।
फूलि-फूल रहे सब फूल फुलवारी में के, रीझि-रीझि छबि आइ पाइनि में परी है ।
लाड़िली नवेली अलबेली सुख सहज ही, निकसि निकुंज तें अनूप भाँति खरी है ।।
नख-सिख भूषन लावण्य ही के जगमगैं, दीठि सौं छुवत सुकुमारताहू डरी है ।
हित ध्रुव' मुसिकनि हेरत बिकाइ रहे, दामिनि की दुति अरु हीरनि की हरी है ।।20।।
कुंजन के आँगन में जहाँ-जहाँ पग धरैं, छबि के बिछौना से बिछाये तहाँ जात हैं ।
रंगभरी लाड़िली निपट अलबेली भाँति, अलबेले लोचन न कहूँ ठहरात हैं ।।
नई-नई माधुरी कौ सार है सुभाइनि में, मुसकनि मानौ सुख-फूल बिगसात हैं ।
सौंधे की सी बास 'ध्रुव' फैलि रही पहिलैं ही, रूपनिधि पानिप के पुंज बरसात हैं ।।21।।
अलबेली चितवनि मुसिकनि अलबेली, अलबेली चलनि ललन मन हर्यौ है ।
वृन्दावन-मही सब भई छबिमई आली, पग-पग पर मानौं रूप झरि पर्यौ है ।।
कनक बरन भये पत्र-फूल दुमनि के, आभा तन रही छाइ कुंदन सौ ढर्यौ है ।
हित ध्रुव' ऐसी भाँति झलकति तन काँति, चितवत पिय चित नैकहूँ न टर्यौ है ।।22।।
कवित्त
देखत छबीली जू की छबि छके छबि-निधि, ऐसी छबि देखि आली दृग नहिं टारियै ।
अलबेली चितवनि हँसनि ललन पर, मानो सुख पुंज रंग के प्रवाह ढारियै ।।
छिन छिन नई-नई छवि की तरंग छटा, बिवस करत प्रान कैसे कैं सँभारियै ।
हित ध्रुव' प्यारी जू के चरन चिह्ननि पर, कोटि-कोटि रति दुति मोहनी सी वारियै ।।23।।
थिरकनि बेसरि के मोती की अनूप भाँति, प्रीतम के नैना देखि अति ही लुभाने हैं।
तेहि छबि की समान देबैं कौं न कछू आन, याही तें बिहारीलाल आपुही बिकाने हैं ।।
परे रूप-सिंधु माँझ जानत न भोर-साँझ, 'हित ध्रुव' प्रेम ही के रंग-रस साने हैं ।
प्यारी जू के मिलिवे की तृपति न होत क्यौँ हूँ, कोटि-कोटि जुग एक सुख में बिहाने हैं ।।24।।
बड़े बड़े उज्ज्वल सुरंग अनियारे नैना, अंजन की रेख हेरैं हियरौ सिरात है ।
चपलाई खंजन की अरुनाई कंजन की, उजराई मोतिन की पानिप लजात है ।।
सरस सलज्ज नये रहत हैं प्रेम भरे, चंचल न अंचल में कैसेहुँ समात हैं।
हित ध्रुव' चितवनि छटा जेही कोद परै, तेहि ओर बरसा सी रूप की ह्वै जात है ।।25।।
कौल पत्र सारी बनी सौंधे ही के मोद सनी, चितै रहे स्याम धनी मानौ चित्र-ऐंन हैं ।
आँगी नील रही फबि कहि न सकत छबि, मोतिन की झलकनि अति सुख-दैन है ।।
चितवनि मैन मई मुसिकनि रस मई, कोकिला हू वारि डारी ऐसै मृदु बैन हैं ।
हित ध्रुव' अंग-अंग सबै सुखसार मई, मन के हरन-हार बाँके दोऊ नैन हैं ।।26।।
रूप-जल में तरंग उठत कटाच्छनि के, अंग-अंग भौंरनि की अति गहराई है ।
नैंननि कौ प्रतिबिंब पर्यौ है कपोलनि में, तेई भये मीन तहाँ ऐसी उर आई है ।।
अरुन कमल मुसिकानि मानो फब रही, थिरकनि बेसरि के मोती की सुहाई है ।
भयौ है मुदित सखी लाल कौ मराल-मन, जीवन जुगल 'ध्रुव' एक ठाँव पाई है ।।27।।
चलनि छबीली जू की चितवत छके पिय, कहि न सकत कछु आज औरै भाँति है।
अलबेली रूप पुंज-कुंज ते निकसि जब, चंद कोटि मंद होत ऐसी तन-कांति है।।
देखैं हंसी मोरी मृगी तेई तहाँ मोहि रहीं, झनक-भनक सुनि भूली सुधि जाति है।
हित ध्रुव' फूलनि की माला-सी सहेली सब, ऐसैं रहि गईं मानौं चित्रनि की पाँति है ।।28।।
दोहा
अद्भुत छबि की माधुरी, चितै बिवस ह्वै जाहिं ।
यह सोच पिय-प्रेम कौ, रहत प्रिया मन माहिं ।।29।।
कवित्त
छबि के छिपाइबे कौं रस के बढ़ाइबे कौं, अंग-अंग भूषन बनाये हैं बनाइकै ।
देखैं नासापुट वेह प्रीतम भये विदेह, याही हेत बेसरि बनाइ धरी चाइकै ।।
रोम-रोम जगमगैं रूप की पानिप अति, सकैं न सँभारि हँसि चितई सुभाइकै ।
"हित ध्रुव' विवस लटकि जात छिन छिन, यातें सखी शोभा सब राखी है दुराइकै ।।30।। ऐसी है ललित प्यारी लाल जू की प्रान-प्यारी, डीठहू न ठहराति कैसै कै निहारियै । जाकी परछाई पर कोटि-कोटि चंद्र अरु, दामिनी भामिनी काम कोटि-कोटि वारियै ।। काजर की रेख जहाँ पाननि की पीक भारी, और सुकुमारताई कैसैं कै विचारियै । सहजहि अंग-अंग रूप सार मोद मई, 'हित ध्रुव' प्राण न्यौछावर करि डारियै ।।31।। अनियारे नैन-सर बेध्यौ मन प्रीतम कौ, विथकित चकित रहत बल-हीने हैं। काजर की रेख जहाँ रही फबि निसि-रैन, तरफि गिरत सखी अंक भरि लीने हैं ।। रसिक किशोर पिय महासूर प्रेम रन, नैननि ते नैना तौऊ न्यारे नहिं कीने हैं। 'हित ध्रुव' प्यारी सुकुमारी रीझि देखैं गति, अति सुकुमार महा प्रेम रंग भीने हैं ।।32।। प्यारी जू की मुसकनि बीजुरी सी कौंधि जाति, प्यारे जू के उर तैं न रेखा सी टरति है । भरि-भरि आवैं नैन कैसेहू न पावैं चैन, बान की-सी अनी हिये खरक्यौ करति है ।। लाड़िली नवेली अलबेली खानि माधुरी की, सहज सुभाइनि में सर्वसु हरति है । 'हित ध्रुव' नये-नये छबि के तरंग देखें, रीझि सीस-चंद्रिका पगनि कौं ढरति है ।।33।। हारनि के भार भारी ऐसी सुकुमारी प्यारी, रसिक रँगीले लाल कीन्हीं उर हार-सी । छबि के तमाल लपटानी रूप बेलि मानो, हँसनि दसनि फूल फूले सुख सार-सी ।। नख-शिख जगमगै रोम-रोम प्रतिबिंब, लसत है ऐसैं जैसैं आरसी में आरसी । 'हित ध्रुव' इहि बिधि देखैं सखी चित्र भईं, चहूँ कोद रही झूमि कंचन की डार सी ।।34।। अति अलबेली भाँति झूलैं अलबेली प्रिये, सहज छबीली छबि नवल निहारहीं । सारी सुही सुरँग परति खसि खसि सखी, बार-बार प्यारौ पिय फूल सौ सँवारहीं ।। जेहि ओर अंग पट भूषन खिसत पिय, तेहि ओर मुरि मुरि प्रान ज्यौं सँभारहीं । 'हित ध्रुव' प्रीतम के नाहिं और दूजी गति, छिन छिन तिनहिं के सुखहि बिचारहीं ।।35।। सवैया रूप-रसीली हँसीली छबीली रँगीली, रँगीले के प्रान ते प्यारी । सुलज्ज सुरंग सुनैन बिशालनि, सोभित अंजन रेख अनियारी ।। महामृदु बोलनि मोती की डोलनि, मोल लिये ध्रुव कुंज-बिहारी । रहे सुख पाइ न और सुहाइ, भये बस नेह के देह बिसारी ।।36।। कवित्त सोने ते सुरंग गोरी सोंधे सौं सुवास अति, मृदुताई पर वारौं जेतिक सुमन री । रूप ही कौ रूप जगमगत सकल बन, आरसी कौं आरसी लसत ऐसौ तन री ।। फैलि रही छबि प्रभा जहाँ लौं बिराजै सभा, 'हित ध्रुव' चितै लाल भये हैं मगन री । प्राननि के प्रान और नैंननि के नैंन मेरे, रीझि-रीझि बार-बार कहैं छ्वै चरन री ।।37।। कौन भाँति कौन कांति कौन रूप कौन नेह, कौन एक है सुभाव कहा आली कहिये । कौन माधुरी तरंग हाव-भाव कौन रंग, कौन मुख पानिप विलोकत ही रहिये ।। कोक कला रंग मई जौवन की जोति नई, रही है बिचारि मति उपमा न लहिये। हित ध्रुव' ऐसी प्यारी मृदुताई वारि डारी, रीझि पिय छ्वावत चरन नैननि हिये ।।38।।
"
छवि ठाढ़ी कर जोरैं गुन कला चौंर ढोरें, दुति सेवैतन गोरैं रति बलि जाति है।
उजराई कुंज ऐंन सुथराई रची सैंन, चतुराई चितै नैन अति ही लजाति है ।।
राग सुनि रागिनि हूँ होत अनुराग बस, मृदुताई अंगनि छुवत सकुचाति है ।
हित ध्रुव' सुकुमारी पुतरीन हूँ ते प्यारी, जीवत देखे बिहारी सुख बरषाति है ।।39।।
रूप की नौलासी' प्यारी नाना रंग के सुभाइ, भाइनि की मृदुताई कही न परति है ।
नैननि के आगें लाल लिये रहें निशि दिन, एकौ छिन मन तें न क्यौं हूँ बिसरति है ।।
भीजि-भींजि जात पिय सुख के तरंगनि में, जब प्रिया बातनि के रंग में ढरति है ।
हित ध्रुव' प्यारे जू की जीवन किशोरी गोरी, छिन छिन प्रीतम के मन कौं हरति है ।।40।।
रूप की नौलासी देखैं फूल की नौलासी सखी, परी खसि नवल रँगीले जू के कर तें ।
हाव-भाव रंगनि कै जगि-मगि रही प्यारी, चित्र से ह्वै रहे चितै-चितै प्रेम-भर तें ।।
अति ही बिचित्र सखी रही है सँभारि 'ध्रुव', जिनि धुकि परैं धर पर याही डर तें।
छिन-छिन-प्रेम सिंधु के तरंग नाना भाँति, रह्यौ जकि थकि मन तेहि रस पर तें ।।41।।
दोहा
अंग-अंग ढरैं मैन ज्यौं, रूप तेज की काँति ।
चहुँ दिशि थामे रहति सखि, निरखि लाल की भाँति ।।42।।
कवित्त
रूप की-सी फुलबारी फूलि रही सुकुमारी, अंग-अंग नाना रंग नवल निहारहीं ।
नैन कर कमल अधर हैं बँधूक मानौं, दसन झलक पर कुन्द वारि डारहीं ।।
बैंदी लाल है गुलाल नासिका सुवर्न-फूल, मोती बने जहाँ-जहाँ जुही सी बिचारहीं ।
छबि ही के खंजन रसीले नैन प्रीतम के, खेलैं तहाँ 'ध्रुव' सखी चितै प्रान वारहीं ।।43।।
रूप-बन प्यारी-तन मौर्यौ है जोवन तहाँ, सहज हरितताई पानिप अनंग री ।
दसन झलक झरैं छबि के सुरंग फूल, मैन सुख फल मानौं उरज उतंग री ।।
अंग-अंग माधुरी श्रवत मकरन्द मानौं, भुज रस बेलि नख पल्लव सुरंग री।
हित ध्रुव' तेहि मधि राजै नाभि-सरवर, क्रीड़ै तहाँ पिय मन मद कौ मतंग री ।।44।।
अलबेली सुकुमारी नैननिं के आगे रहै, तब लगि प्रीतम के प्रान रहैं तन में ।
यहै जिय जानि प्यारी रंचकौ न होति न्यारी, तिनही के प्रेम-रंग रँगि रही मन में ।।
परम प्रवीन गोरी हाव-भाव में किशोरी, नये-नये छबि के तरंग उठैं छिन में ।
हित ध्रुव' प्रीतम के नैन-मीन-रस लीन, खेलिबौ करत दिन-प्रति रूप बन में ।।45।।
सवैया
राधिका बल्लभ लाल की प्यारी, सखीनि के प्रान महा सुकुमारी ।
रूप की बेलि फबी फल फूल, मनोज उरोज भरे रस भारी ।।
पत्र लावण्य हरे भरे रंगरु, जोवन-मौरनि पानिप न्यारी ।
प्रीतम नैननि चैन तऊ नहिं, देखत ही 'ध्रुव' बाढ़ै तृषा री ।।46।।
कवित्त
डीठि हू कौ भार जानि देखत न डीठ भरि, ऐसी सुकुमारी नैन-प्रान हू ते प्यारी है ।
माधुरी सहज कछू कहत न बनि आवै, नैकही के चितवत चकित बिहारी है ।।
कौन भाँति मुख की अनूप काँति सरसाति, करत बिचार तऊ जाति न बिचारी है ।
हित ध्रुव' मन पर्यौ रूप के भँवर माँझ, नेह बस भये सुधि देह की बिसारी है ।।47।।
सवैया
भीजी नवेली चँवेली फुलेल सौं, फूलनि के पट भूषन सोहैं ।
लोइन बंक बिसाल सचिक्कन, अंजन की छबि प्राननि मोहैं ।।
रूप तरंगनि पानिप अंगनि, प्यारी सखी ललितादिक जोहैं ।
भूलि रही 'ध्रुव' तौ छबि श्री अरु, मोहनी मैन की नारि धौं कोहैं ।।48।।
कवित्त
कुंज ते निकसि दोऊ ठाढ़े जमुना के तीर, आजु सखी और भाँति प्रिया रंग भरी है ।
निशि के चिन्हनि चितै मुसकात रस-निधि, वहु विधि सुख-केलि रंग-रस ढरी है ।।
देखैं 'ध्रुव' छबि सींवा मृदु भुज मेलैं ग्रीवा, हंसी, भौंरी, मोरी, मृगी ठौर ते न टरी है।
हरी-हरी लाल-लाल पीत-सेत सारी तन, पहिरैं सहेली सबै चित्र की सी खरी है ।।49।।
नवल नवेली अलबेली सुकुमारी जू कौ, रूप पिय-प्राननि कौ सहज अहार री ।
बिंजन सुभाइनि के नेह घृत सौं जु बने, रोचक रुचिर हैं अनूप अति चारु री ।।
नैननिं की रसना तृपित न होति क्यौं हू, नई-नई रुचि 'ध्रुव' बढ़ति अपार री।
पानिप कौ पानी प्याइ पान मुसिक्यान ख्वाइ, राखे उर सेज स्वाइ पायौ सुख सार री ।।50।।
प्रानहूँ ते प्यारी सुकुमारी जू कौं देखत, बिहारी जू के रोम-रौंम लोचन ह्वै जात हैं ।
ज्यौं-ज्यौं रूप पान करैं निमिष न चैन धरैं, त्यौं-त्यौं प्यास बाढ़े अति क्यौं हू न अघात हैं ।।
छबि के तरंगनि में झूलत किशोर पिय, हारत न हेरि-हेरि खरे ललचात हैं ।
हित ध्रुव' आरत में भयौ भ्रम चाहत ही, मिलै हैं कि नाहिं मन क्यौं हू न पत्यात हैं ।।51।।
सवैया
रहे चकि लाल चितै मुख बाल, पर्यौ मन रूप तरंगनि माहीं ।
भाइ सुभाइ उठैं छिन ही छिन, लालची नैन न क्यौं हूँ अघाहीं ।।
जौवन रंग भरे अँग-अंग, बिलास अनंत कहे नहिं जाहीं ।
बानिक आहि अनूप छबीली की, पानिप की उपमा 'ध्रुव' नाहीं ।।52।।
कवित्त
मुख छबि कांति सोहै उपमा कौ चंद कोहै, रहे मोहि जोहि-जोहि नवल रसिक वर ।
शीशफूल सोभा कछु कहत न बनि आवै, मनहुँ सुहाग-छत्र झलकत सीस पर ।।
बैंदी लाल रही फबी कहा कहौं नथ छबि, और सब रहे दबि जहाँ लगि दुति-धर ।
हित ध्रुव' नैननि में अंजन बिराजै खरौ, चंचल चपल मनमोहन कौ चित्त हर ।।53।।
दोहा
कुँवरि छबीली अमित छबि, छिन छिन औरै और।
रहि गये चितवत चित्र से, परम रसिक सिरमौर ।।54।।
जै जै श्री शृङ्गार शत लीला (प्रथम शृङ्खला) की जै जै श्रीहित हरिवंश
दोहा
(श्री)हरिवंश नाम 'ध्रुव' चिंतवत, होत जु हियैं हुलास ।
जो रस दुर्लभ सबनि ते, सो पैयत अनियास ।।1।।
व्यास-नंद-पद कमल बल, सकल सुखन कौ सार ।
रचि कीन्हौं श्रृंगार-सत, अद्भुत प्रेम-बिहार ।।2।।
बाँधी 'ध्रुव' गुन श्रृंखला, प्रथम चालिस अरु तीन ।
दुतिय चालिस अरु तीसरी, द्वै पर चालिस कीन ।।3।।
प्रथम श्रृंखला माहिं कछु, कह्यौ लाड़िली रूप ।
निरखि लाल सखि रहे छकि, सो छबि अतिहि अनूप ।।4।।
छिन छिन नेह कटाक्ष जल, सींचत पिय-हिय ऐंन ।
भाग पाइ जो कबहुँ 'ध्रुव', या सुख सौं लगैं नैन ।।5।।
सवैया
कैसौ फव्यौ है नीलांबर सुंदर, मोहि लिये मन मोहन माई ।
फैलि रही छवि अंगनि कांति, लसै बहु भाँति सुदेस सुहाई ।।
सीस कौ फूल सुहाग कौ छत्र, सदा पिय के मन कौं सुखदाई ।
और कछू न रुचै ध्रुव पीय कौं, भावै यहै सुकुमारि लड़ाई ।।6।।
कवित्त
(श्री) राधिकाबल्लभ प्यारी फुलवारी माँझ ठाड़ी, फूलकारी सारी तन शोभित बनाव की ।
लोचन विशाल बाँके अनियारे कजरारे, प्रीतम के प्रान हरै हेरनि सुभाव की ।।
चूरी मखतूल नीलमनिन की कर बनी, बेसरि सुदेस उर अँगिया कटाव की ।
कुन्दन की दुलरी अरु मोतिये के हार हिये, हित 'ध्रुव' चारु चौकी लसत जड़ाव की ।।7।।
जरकसी सारी तन जगमग रही फबि, छबि की छलक मनौं परी है रसाल री ।
उज्वल सुरंग अनियारी कोर नैननिं की, सीस फूल बेंदी लाल सोहै वर भाल री ।।
रतनजटित नीलमनि चौकी झलमलै, 'हित ध्रुव' लसै उर, मोतिन की माल री।
पानिप अनूप पेखैं भूली हैं निमेषैं देखैं, मंद-मंद बेसर के मुक्ता की हाल री ।।8।।
फबि रही सारी मृदु केसरी सुरंग अंग, भींजी है फुलेल स्वच्छ सौंधे मोद में सनी ।
खुल रही तामें आली अँगिया जँगाली गाढ़ी, दमकत कंठ लर मोतिन की द्वै बनी ।।
मृगमद बैंदी लसै प्रीतम के मन बसै, बेसरि झलक छबि बरषत है घनी ।
मुसकनि मंद सुख-रंग के तरंग उठैं, सोहने रसीले नैन सैन में बिके धनी ।।9।।
तनसुख सारी मिहीं भींजी है फुलेल माँहि, तामें लाल अँगिया सुदेस कसनी कसी ।
सौंधे सगबगे बार बन्यौ है सादौ सिंगार, मुख पर डारौं वारि कोटि कंज औ ससी ।।
चंचल छबीले बड़े सोहने रसीले नैन, चितै नेकु अलबेली अंचल लै मंद हँसी ।
हित ध्रुव' बस भये देखत ही रह गये, थिरकन बेसरि की प्रीतम के मन बसी ।।10।।
ककरेजी सारी तन गोरैं कैसी शोभियत, पीत अतरौटा सौं दुरंग छबि न्यारी है ।
मुख की पानिप अति चंचल नैननि गति, देखै 'ध्रुव' भूली मति उपमा कौं हारी है ।।
बैंदी लाल नथ सोहै बन्यौ मोती मन मोहै, बस भये पिय सुधि देह की बिसारी है ।
गहैं द्रुम-डारी एक रहि गये ताकी टेक, ऐसै बेस जब ते किशोरीजू निहारी है ।।11।।
सुरँग कसूँभी सारी पहिरैं रँगीली प्यारी, आली अलबेली भाँति रंग माहि ठाढ़ी है ।
केसरी सुरंग भीनी सौंधे सगबगी कीन्ही, सोहै उर अँगिया कसनि अति गाढ़ी है ।।
फैलि रही अरुनाई तैसी 'ध्रुव' तरुनाई, मानौं अनुराग रूप में झकोर काढ़ी है ।
बदन झलक पर परी है अलक आइ, देखि पिय नैननि ललक अति बाढ़ी है ।।12।।
सवैया
सारी सुरंग सुही अति झीनी, सुगंध सौं भींनी महा सुखदाई ।
रची चुनि प्रान समान सुजान ने, फूलनि-मोद हु ते मृदु माई ।।
भूलि रही मति की गति हेरत, जात नहीं उपमा 'ध्रुव' पाई ।
रँगी पिय प्यारे के रंग मनौ ऐंकि, अंगनि रूप तरंगनि छाई ।।13।।
सारी हरी ने हर्यौ मन लाल कौ, मोहनी सोहनी के तन सोहै ।
अँगिया लाल सुरंग बनी लहि, गातहि रंग खरौ मन मोहै ।।
रूप की राशि सबै गुन आगरि, या छबि की उपमा कहौ कोहै ।
राजति है 'ध्रुव' कुंज बिहारिनि, सो छबि लाल पलौ पल जोहै ।।14।।
कवित्त
हँसनि में फूलनि की चाहनि में अमृत की, नख - सिख रूप ही की बरषा सी होति है ।
केसनि की चंद्रिका सुहाग अनुराग घटा, दामिनी की लसनि दसन ही की दोति है ।।
हित ध्रुव' पानिप तरंग-रस छलकत ताकौ, मानौ सहज सिंगार सीवाँ पोति है ।
अति अलबेली प्रिये भूषित भूषन बिनु, छिन छिन औरे और बदन की जोति है ।।15।।
छबि सौं छबीली खरी प्रीतम के रसभरी, कोटि-कोटि दामिनी न नख-छबि पावहीं ।
चंद-कोटि मंद होत मोतिन की कहा जोति, नेकु ही की चितवनि ढरे लाल आवहीं ।।
देखत हैं रुचि लियैं मुख-शोभा चित दियैं, परम प्रबीन प्यारौ रुचि लै लड़ावहीं ।
हित ध्रुव' छिन छिन मैन के तरंग बढ़ें, प्रेम के हिंडोले चढ़े मदन झुलावहीं ।।16।।
गोरी मृदु अँगुरिन मैंहदी को रंग फब्यौ, अतिहि सुरंग कंज दलनि लजावहीं ।
मनिनु के बहुरंग हरित जँगाली छल्ले, जिहि पोरी जैसै बने पिय पहिरावहीं ।।
चितै छबि कर गहैं नैननि कौं छ्वाइ-छ्वाइ, चूँमि-चूँमि माथे धरि आनि उर लावहीं ।
हित ध्रुव' निशि-दिन याही रस रहे पगि, जेहि अंग मन परै तिहि सचु पावहीं ।।17।।
कंचन के वरन चरन मृदु प्यारीजू के, जावक सुरंग रँगे मनहि हरत हैं।
हित ध्रुव' रही फबि सुमिलि जेहरि-छबि, नूपुर रतन-खचे दीप से बरत हैं ।।
रीझि-रीझि सुंदर करनि पर पट धरैं, आरसी सी लियैं लाल देखिबौ करत हैं ।
नख-मनि-प्रभा प्रतिबिंब झलमलै कंज, चंदनि के जूथ मानौं पायनि परत हैं ।।18।।
दोहा
अद्भुत पद-पल्लव प्रभा, मृदु सुरंग छबि ऐन ।
छिनछिन चूँवत प्यार सौं, रहत लाइ उर-नैन ।।19।।
फूलि-फूल रहे सब फूल फुलवारी में के, रीझि-रीझि छबि आइ पाइनि में परी है ।
लाड़िली नवेली अलबेली सुख सहज ही, निकसि निकुंज तें अनूप भाँति खरी है ।।
नख-सिख भूषन लावण्य ही के जगमगैं, दीठि सौं छुवत सुकुमारताहू डरी है ।
हित ध्रुव' मुसिकनि हेरत बिकाइ रहे, दामिनि की दुति अरु हीरनि की हरी है ।।20।।
कुंजन के आँगन में जहाँ-जहाँ पग धरैं, छबि के बिछौना से बिछाये तहाँ जात हैं ।
रंगभरी लाड़िली निपट अलबेली भाँति, अलबेले लोचन न कहूँ ठहरात हैं ।।
नई-नई माधुरी कौ सार है सुभाइनि में, मुसकनि मानौ सुख-फूल बिगसात हैं ।
सौंधे की सी बास 'ध्रुव' फैलि रही पहिलैं ही, रूपनिधि पानिप के पुंज बरसात हैं ।।21।।
अलबेली चितवनि मुसिकनि अलबेली, अलबेली चलनि ललन मन हर्यौ है ।
वृन्दावन-मही सब भई छबिमई आली, पग-पग पर मानौं रूप झरि पर्यौ है ।।
कनक बरन भये पत्र-फूल दुमनि के, आभा तन रही छाइ कुंदन सौ ढर्यौ है ।
हित ध्रुव' ऐसी भाँति झलकति तन काँति, चितवत पिय चित नैकहूँ न टर्यौ है ।।22।।
कवित्त
देखत छबीली जू की छबि छके छबि-निधि, ऐसी छबि देखि आली दृग नहिं टारियै ।
अलबेली चितवनि हँसनि ललन पर, मानो सुख पुंज रंग के प्रवाह ढारियै ।।
छिन छिन नई-नई छवि की तरंग छटा, बिवस करत प्रान कैसे कैं सँभारियै ।
हित ध्रुव' प्यारी जू के चरन चिह्ननि पर, कोटि-कोटि रति दुति मोहनी सी वारियै ।।23।।
थिरकनि बेसरि के मोती की अनूप भाँति, प्रीतम के नैना देखि अति ही लुभाने हैं।
तेहि छबि की समान देबैं कौं न कछू आन, याही तें बिहारीलाल आपुही बिकाने हैं ।।
परे रूप-सिंधु माँझ जानत न भोर-साँझ, 'हित ध्रुव' प्रेम ही के रंग-रस साने हैं ।
प्यारी जू के मिलिवे की तृपति न होत क्यौँ हूँ, कोटि-कोटि जुग एक सुख में बिहाने हैं ।।24।।
बड़े बड़े उज्ज्वल सुरंग अनियारे नैना, अंजन की रेख हेरैं हियरौ सिरात है ।
चपलाई खंजन की अरुनाई कंजन की, उजराई मोतिन की पानिप लजात है ।।
सरस सलज्ज नये रहत हैं प्रेम भरे, चंचल न अंचल में कैसेहुँ समात हैं।
हित ध्रुव' चितवनि छटा जेही कोद परै, तेहि ओर बरसा सी रूप की ह्वै जात है ।।25।।
कौल पत्र सारी बनी सौंधे ही के मोद सनी, चितै रहे स्याम धनी मानौ चित्र-ऐंन हैं ।
आँगी नील रही फबि कहि न सकत छबि, मोतिन की झलकनि अति सुख-दैन है ।।
चितवनि मैन मई मुसिकनि रस मई, कोकिला हू वारि डारी ऐसै मृदु बैन हैं ।
हित ध्रुव' अंग-अंग सबै सुखसार मई, मन के हरन-हार बाँके दोऊ नैन हैं ।।26।।
रूप-जल में तरंग उठत कटाच्छनि के, अंग-अंग भौंरनि की अति गहराई है ।
नैंननि कौ प्रतिबिंब पर्यौ है कपोलनि में, तेई भये मीन तहाँ ऐसी उर आई है ।।
अरुन कमल मुसिकानि मानो फब रही, थिरकनि बेसरि के मोती की सुहाई है ।
भयौ है मुदित सखी लाल कौ मराल-मन, जीवन जुगल 'ध्रुव' एक ठाँव पाई है ।।27।।
चलनि छबीली जू की चितवत छके पिय, कहि न सकत कछु आज औरै भाँति है।
अलबेली रूप पुंज-कुंज ते निकसि जब, चंद कोटि मंद होत ऐसी तन-कांति है।।
देखैं हंसी मोरी मृगी तेई तहाँ मोहि रहीं, झनक-भनक सुनि भूली सुधि जाति है।
हित ध्रुव' फूलनि की माला-सी सहेली सब, ऐसैं रहि गईं मानौं चित्रनि की पाँति है ।।28।।
दोहा
अद्भुत छबि की माधुरी, चितै बिवस ह्वै जाहिं ।
यह सोच पिय-प्रेम कौ, रहत प्रिया मन माहिं ।।29।।
कवित्त
छबि के छिपाइबे कौं रस के बढ़ाइबे कौं, अंग-अंग भूषन बनाये हैं बनाइकै ।
देखैं नासापुट वेह प्रीतम भये विदेह, याही हेत बेसरि बनाइ धरी चाइकै ।।
रोम-रोम जगमगैं रूप की पानिप अति, सकैं न सँभारि हँसि चितई सुभाइकै ।
"हित ध्रुव' विवस लटकि जात छिन छिन, यातें सखी शोभा सब राखी है दुराइकै ।।30।। ऐसी है ललित प्यारी लाल जू की प्रान-प्यारी, डीठहू न ठहराति कैसै कै निहारियै । जाकी परछाई पर कोटि-कोटि चंद्र अरु, दामिनी भामिनी काम कोटि-कोटि वारियै ।। काजर की रेख जहाँ पाननि की पीक भारी, और सुकुमारताई कैसैं कै विचारियै । सहजहि अंग-अंग रूप सार मोद मई, 'हित ध्रुव' प्राण न्यौछावर करि डारियै ।।31।। अनियारे नैन-सर बेध्यौ मन प्रीतम कौ, विथकित चकित रहत बल-हीने हैं। काजर की रेख जहाँ रही फबि निसि-रैन, तरफि गिरत सखी अंक भरि लीने हैं ।। रसिक किशोर पिय महासूर प्रेम रन, नैननि ते नैना तौऊ न्यारे नहिं कीने हैं। 'हित ध्रुव' प्यारी सुकुमारी रीझि देखैं गति, अति सुकुमार महा प्रेम रंग भीने हैं ।।32।। प्यारी जू की मुसकनि बीजुरी सी कौंधि जाति, प्यारे जू के उर तैं न रेखा सी टरति है । भरि-भरि आवैं नैन कैसेहू न पावैं चैन, बान की-सी अनी हिये खरक्यौ करति है ।। लाड़िली नवेली अलबेली खानि माधुरी की, सहज सुभाइनि में सर्वसु हरति है । 'हित ध्रुव' नये-नये छबि के तरंग देखें, रीझि सीस-चंद्रिका पगनि कौं ढरति है ।।33।। हारनि के भार भारी ऐसी सुकुमारी प्यारी, रसिक रँगीले लाल कीन्हीं उर हार-सी । छबि के तमाल लपटानी रूप बेलि मानो, हँसनि दसनि फूल फूले सुख सार-सी ।। नख-शिख जगमगै रोम-रोम प्रतिबिंब, लसत है ऐसैं जैसैं आरसी में आरसी । 'हित ध्रुव' इहि बिधि देखैं सखी चित्र भईं, चहूँ कोद रही झूमि कंचन की डार सी ।।34।। अति अलबेली भाँति झूलैं अलबेली प्रिये, सहज छबीली छबि नवल निहारहीं । सारी सुही सुरँग परति खसि खसि सखी, बार-बार प्यारौ पिय फूल सौ सँवारहीं ।। जेहि ओर अंग पट भूषन खिसत पिय, तेहि ओर मुरि मुरि प्रान ज्यौं सँभारहीं । 'हित ध्रुव' प्रीतम के नाहिं और दूजी गति, छिन छिन तिनहिं के सुखहि बिचारहीं ।।35।। सवैया रूप-रसीली हँसीली छबीली रँगीली, रँगीले के प्रान ते प्यारी । सुलज्ज सुरंग सुनैन बिशालनि, सोभित अंजन रेख अनियारी ।। महामृदु बोलनि मोती की डोलनि, मोल लिये ध्रुव कुंज-बिहारी । रहे सुख पाइ न और सुहाइ, भये बस नेह के देह बिसारी ।।36।। कवित्त सोने ते सुरंग गोरी सोंधे सौं सुवास अति, मृदुताई पर वारौं जेतिक सुमन री । रूप ही कौ रूप जगमगत सकल बन, आरसी कौं आरसी लसत ऐसौ तन री ।। फैलि रही छबि प्रभा जहाँ लौं बिराजै सभा, 'हित ध्रुव' चितै लाल भये हैं मगन री । प्राननि के प्रान और नैंननि के नैंन मेरे, रीझि-रीझि बार-बार कहैं छ्वै चरन री ।।37।। कौन भाँति कौन कांति कौन रूप कौन नेह, कौन एक है सुभाव कहा आली कहिये । कौन माधुरी तरंग हाव-भाव कौन रंग, कौन मुख पानिप विलोकत ही रहिये ।। कोक कला रंग मई जौवन की जोति नई, रही है बिचारि मति उपमा न लहिये। हित ध्रुव' ऐसी प्यारी मृदुताई वारि डारी, रीझि पिय छ्वावत चरन नैननि हिये ।।38।।
"
छवि ठाढ़ी कर जोरैं गुन कला चौंर ढोरें, दुति सेवैतन गोरैं रति बलि जाति है।
उजराई कुंज ऐंन सुथराई रची सैंन, चतुराई चितै नैन अति ही लजाति है ।।
राग सुनि रागिनि हूँ होत अनुराग बस, मृदुताई अंगनि छुवत सकुचाति है ।
हित ध्रुव' सुकुमारी पुतरीन हूँ ते प्यारी, जीवत देखे बिहारी सुख बरषाति है ।।39।।
रूप की नौलासी' प्यारी नाना रंग के सुभाइ, भाइनि की मृदुताई कही न परति है ।
नैननि के आगें लाल लिये रहें निशि दिन, एकौ छिन मन तें न क्यौं हूँ बिसरति है ।।
भीजि-भींजि जात पिय सुख के तरंगनि में, जब प्रिया बातनि के रंग में ढरति है ।
हित ध्रुव' प्यारे जू की जीवन किशोरी गोरी, छिन छिन प्रीतम के मन कौं हरति है ।।40।।
रूप की नौलासी देखैं फूल की नौलासी सखी, परी खसि नवल रँगीले जू के कर तें ।
हाव-भाव रंगनि कै जगि-मगि रही प्यारी, चित्र से ह्वै रहे चितै-चितै प्रेम-भर तें ।।
अति ही बिचित्र सखी रही है सँभारि 'ध्रुव', जिनि धुकि परैं धर पर याही डर तें।
छिन-छिन-प्रेम सिंधु के तरंग नाना भाँति, रह्यौ जकि थकि मन तेहि रस पर तें ।।41।।
दोहा
अंग-अंग ढरैं मैन ज्यौं, रूप तेज की काँति ।
चहुँ दिशि थामे रहति सखि, निरखि लाल की भाँति ।।42।।
कवित्त
रूप की-सी फुलबारी फूलि रही सुकुमारी, अंग-अंग नाना रंग नवल निहारहीं ।
नैन कर कमल अधर हैं बँधूक मानौं, दसन झलक पर कुन्द वारि डारहीं ।।
बैंदी लाल है गुलाल नासिका सुवर्न-फूल, मोती बने जहाँ-जहाँ जुही सी बिचारहीं ।
छबि ही के खंजन रसीले नैन प्रीतम के, खेलैं तहाँ 'ध्रुव' सखी चितै प्रान वारहीं ।।43।।
रूप-बन प्यारी-तन मौर्यौ है जोवन तहाँ, सहज हरितताई पानिप अनंग री ।
दसन झलक झरैं छबि के सुरंग फूल, मैन सुख फल मानौं उरज उतंग री ।।
अंग-अंग माधुरी श्रवत मकरन्द मानौं, भुज रस बेलि नख पल्लव सुरंग री।
हित ध्रुव' तेहि मधि राजै नाभि-सरवर, क्रीड़ै तहाँ पिय मन मद कौ मतंग री ।।44।।
अलबेली सुकुमारी नैननिं के आगे रहै, तब लगि प्रीतम के प्रान रहैं तन में ।
यहै जिय जानि प्यारी रंचकौ न होति न्यारी, तिनही के प्रेम-रंग रँगि रही मन में ।।
परम प्रवीन गोरी हाव-भाव में किशोरी, नये-नये छबि के तरंग उठैं छिन में ।
हित ध्रुव' प्रीतम के नैन-मीन-रस लीन, खेलिबौ करत दिन-प्रति रूप बन में ।।45।।
सवैया
राधिका बल्लभ लाल की प्यारी, सखीनि के प्रान महा सुकुमारी ।
रूप की बेलि फबी फल फूल, मनोज उरोज भरे रस भारी ।।
पत्र लावण्य हरे भरे रंगरु, जोवन-मौरनि पानिप न्यारी ।
प्रीतम नैननि चैन तऊ नहिं, देखत ही 'ध्रुव' बाढ़ै तृषा री ।।46।।
कवित्त
डीठि हू कौ भार जानि देखत न डीठ भरि, ऐसी सुकुमारी नैन-प्रान हू ते प्यारी है ।
माधुरी सहज कछू कहत न बनि आवै, नैकही के चितवत चकित बिहारी है ।।
कौन भाँति मुख की अनूप काँति सरसाति, करत बिचार तऊ जाति न बिचारी है ।
हित ध्रुव' मन पर्यौ रूप के भँवर माँझ, नेह बस भये सुधि देह की बिसारी है ।।47।।
सवैया
भीजी नवेली चँवेली फुलेल सौं, फूलनि के पट भूषन सोहैं ।
लोइन बंक बिसाल सचिक्कन, अंजन की छबि प्राननि मोहैं ।।
रूप तरंगनि पानिप अंगनि, प्यारी सखी ललितादिक जोहैं ।
भूलि रही 'ध्रुव' तौ छबि श्री अरु, मोहनी मैन की नारि धौं कोहैं ।।48।।
कवित्त
कुंज ते निकसि दोऊ ठाढ़े जमुना के तीर, आजु सखी और भाँति प्रिया रंग भरी है ।
निशि के चिन्हनि चितै मुसकात रस-निधि, वहु विधि सुख-केलि रंग-रस ढरी है ।।
देखैं 'ध्रुव' छबि सींवा मृदु भुज मेलैं ग्रीवा, हंसी, भौंरी, मोरी, मृगी ठौर ते न टरी है।
हरी-हरी लाल-लाल पीत-सेत सारी तन, पहिरैं सहेली सबै चित्र की सी खरी है ।।49।।
नवल नवेली अलबेली सुकुमारी जू कौ, रूप पिय-प्राननि कौ सहज अहार री ।
बिंजन सुभाइनि के नेह घृत सौं जु बने, रोचक रुचिर हैं अनूप अति चारु री ।।
नैननिं की रसना तृपित न होति क्यौं हू, नई-नई रुचि 'ध्रुव' बढ़ति अपार री।
पानिप कौ पानी प्याइ पान मुसिक्यान ख्वाइ, राखे उर सेज स्वाइ पायौ सुख सार री ।।50।।
प्रानहूँ ते प्यारी सुकुमारी जू कौं देखत, बिहारी जू के रोम-रौंम लोचन ह्वै जात हैं ।
ज्यौं-ज्यौं रूप पान करैं निमिष न चैन धरैं, त्यौं-त्यौं प्यास बाढ़े अति क्यौं हू न अघात हैं ।।
छबि के तरंगनि में झूलत किशोर पिय, हारत न हेरि-हेरि खरे ललचात हैं ।
हित ध्रुव' आरत में भयौ भ्रम चाहत ही, मिलै हैं कि नाहिं मन क्यौं हू न पत्यात हैं ।।51।।
सवैया
रहे चकि लाल चितै मुख बाल, पर्यौ मन रूप तरंगनि माहीं ।
भाइ सुभाइ उठैं छिन ही छिन, लालची नैन न क्यौं हूँ अघाहीं ।।
जौवन रंग भरे अँग-अंग, बिलास अनंत कहे नहिं जाहीं ।
बानिक आहि अनूप छबीली की, पानिप की उपमा 'ध्रुव' नाहीं ।।52।।
कवित्त
मुख छबि कांति सोहै उपमा कौ चंद कोहै, रहे मोहि जोहि-जोहि नवल रसिक वर ।
शीशफूल सोभा कछु कहत न बनि आवै, मनहुँ सुहाग-छत्र झलकत सीस पर ।।
बैंदी लाल रही फबी कहा कहौं नथ छबि, और सब रहे दबि जहाँ लगि दुति-धर ।
हित ध्रुव' नैननि में अंजन बिराजै खरौ, चंचल चपल मनमोहन कौ चित्त हर ।।53।।
दोहा
कुँवरि छबीली अमित छबि, छिन छिन औरै और।
रहि गये चितवत चित्र से, परम रसिक सिरमौर ।।54।।
जै जै श्री शृङ्गार शत लीला (प्रथम शृङ्खला) की जै जै श्रीहित हरिवंश
15. शृङ्गार शत लीला (द्वितीय शृंखला)
दोहा
दुतिय शृंखला सुनत ही, श्रवननिं अति सुख होइ ।
प्रेम रतन गुन रूप सौं, मानौं राखी पोइ ।।1।।
कवित्त
दुलहिनि-दूलहु कुँवर दोऊ, सहज ही, रसिक रँगीले लाल भींने रस रंगना ।
छबि के बसन अभरन अलबेले ताके, ठाढ़े हैं छबीली भाँति कुंजनि के अंगना ।।
सहज सुरंग मृदु झलकें चरन कर, रूप गुन पोइ बाँध्यौ प्रेम ही कौ कंगना ।
हित ध्रुव' सहज द्रगंचलनि गाँठि परी, नयौ चाव नई रुचि बढ़त अनंगना ।।2।।
जैसी अलबेली बाल तैसे अलबेले लाल, दुहुँनि में उलही सहज गोभा' नेह की ।
चाहनि के अंबु दै-दै सींचत हैं छिन-छिन, आल-बाल भई सेज छाया कुंज-गेह की ।।
अनुदिन हरी होति पानिप बदन-जोति, ज्यौं-ज्यौं ही बौछार 'ध्रुव' लागै रूप-मेह की ।
नैननिं की बार कियै हेरेँ सखी मन दियै, चित्र सी ह्वै रहीं सब भूली सुधि देह की ।।3।।
प्यारे जी की जीवन हैं नवल किसोरी गोरी, तैसी भाँति प्यारी जू के जीवन बिहारी है ।
जोई-जोई भावै उन्हें सोई-सोई रुचै इन्हें, एकै गति भई ऐसी रंचकौ न न्यारी है ।।
छिन छिन देखि देखि छबि की तरंग नाना, प्रीतम दुहुँनि सुधि देह की बिसारी है ।
हित ध्रुव' रीझि-रीझि रहे रति रस भींजि, प्रीति ऐसी अब लगि सुनी न निहारी है ।।4।।
प्रीतम की प्रेम-गति देखैं भूली तन-गति, बड़े-बड़े नैना दोऊ आये प्रेम-जल भरि ।
प्रिया लाल-लाल कहि लाये लाइ उरजनि, चूँमि-चूँमि नैना रही अधर दसन धरि ।।
हित ध्रुव' सखी सब देखत विवस भईं, प्रेम पट नाना रंग झलकैं सबनि परि ।
एक चित्र की सी खरी एक धर खसि परी, एकनि के नैननिं तें गिरै नेह-नीर ढरि ।।5।।
नैननिं के आगैं प्यारी बिलपत है बिहारी, असुँवनि प्रेम-जल धारा चली जाइ री।
कौन प्रेम केहि फंद परे हैं रँगीले लाल, अटपटी गति हेरैं हियौ अकुलाइ री ।।
हित ध्रुव' चेति कैं किसोरी गोरी धीर-धरि, नैना नेह-नीर भरि लीन्हें उर लाइ री ।
प्रेम कौ समुद्र फिरि गयौ है सबनि पर, जहाँ-तहाँ सखी धर परीं मुरझाइ री।।6।।
सवैया
सेज सरोवर राजत हैं, जल मादिक रूप भरे तरुनाई ।
अंगनि आभा तरंग उठैं, तहाँ मीन कटाक्षनि की चपलाई ।।
प्यासी सखी भरि अंजुलि नैन, पियैं ते गिरी उपमा 'ध्रुव' पाई ।
प्रेम गयन्द ने डारे हैं तोरि कैं, कंचन-कंज़ चहूँ दिसि माई ।।7।।
कवित्त
सखीनि की गति हेरैं ठाड़े भये जाइ नेरैं, करुना कै चितयौ दुहुनि तिन ओर री ।
अमी की सी धारा उर सींचि गये सबनि कें, प्रेम सिंधु भौंर तें निकासी बरजोर री ।।
चहुँ दिसि राजैं खरी महा रस रंग भरी, नैननिं की गति वहै तृषित चकोर री।
सहज तरंग उठैं जल के से छिन छिन, 'हित ध्रुव' यहै खेल तहाँ निसि-भोर री ।।8।।
नई सेज नई रुचि नयौ रूप नयौ नेह, नेही नये अलबेले अति सुकुमार री ।
नई लाज नयौ रंग नेह रँगी चितवनि, नई केलि कौ सिंगार सोहै उर हार री ।।
छिन-छिन तृषा बढ़ै पानिप अनूप चढ़ै, मधुर बिमल निजु यहै प्रेम-सार री ।
हित ध्रुव' प्यारी मानौं छुई है न मनहू कैं, एकै रस दिन जहाँ बिसद बिहार री ।।9।।
सवैया
सेज रँगीली रँगीली सखीनि, रची बहु रंग सुरंग सुहाई ।
तापर बैठे रँगीले छबीले, हँसैं रस में सुख की सरसाई ।।
सचिक्कन अंजन नैन लसै, मेहँदी झलकै पद-पानि रचाई।
रूप की दीपति तें 'ध्रुव' कुंज, फनूस सी ह्वै रही यौं उर आई ।।10।।
फूल सौं फूलनि-ऐंन रची, सुख सैन सुदेस सुरंग सुहाई ।
लाड़िली-लाल बिलास की रासि, औ पानिप-रूप बढ़ी अधिकाई ।।
सखी चहुँ ओर बिलोकैं झरोखनि, जाति नहीं उपमा 'ध्रुव' पाई।
खंजन कोटि जुरे छबि के एैं कि, नैननि की नव-कुंज बनाई ।।11।।
दोहा
नवल रँगीली कुंज में, नवल रँगीले लाल ।
नवल रँगीलौ खेल रच्यौ, चितवनि नैन बिशाल ।।12।।
कवित्त
फूलनि की कुंज ऐंन फूलनि की रची सैंन, फूलनि के भूषन बसन फूल मन में ।
फूल ही की चितवनि मुसिकनि फूलही की, फूलि - फूलि लपटात फूल के सदन में ।।
फूलनि के हाव-भाव फूलनि कौ बढ्यौ चाव, फूले फूल देखि 'ध्रुव' उभै तन-वन में।
बरसत सुख- फूल सुरत हिंडोरे झूल, फूल ही की दामिनी लसत फूल घन में ।।13।।
आछी छबि सौं छबीले बैठे हैं छबीली भाँति, रतन निकुंज माहिं बातैं रति करहीं ।
परम प्रवीन प्यारौ ताहू तें अधिक प्यारी, रस भरी चितवनि चितै चित्त हरहीं ।।
नवल नवल भाइ बेध्यौ है मरम जाइ, आनँद कौ रंग पाइ सुख-रस ढरहीं ।
हित ध्रुव' रीझि-रीझि देबै कौं न कछू आहि, फिरि-फिरि प्यारेलाल पाँइन में परहीं ।।14।।
लाल पीत फूलनि की कुंज सुख पुंज मध्य, लाल पीत बागे तन दोऊ लाल पहिरैं ।
भूषन की दुति प्रति अंगनि में झलकत, मानौं रूप सिंधुन तै उठति हैं लहरैं ।।
मंद-मंद हँसि कहैं कछु रंग-भीनी बात, बेसरि के मोती दोऊ छबि सौं थरहरैं ।
हित ध्रुव' रीझि-रीझि रहे रति-रस भींजि, अंचलनि सुधि भूलि परे सुख गहरैं ।।15।।
प्रीतम किसोरी गोरी रसिक रँगीली जोरी, प्रेमही के रंग बोरी शोभा कही जात है।
एक प्राण एक वैस एक हीं सुभाव चाव, एक बात दुहुँनि के मनहिं सुहात है ।।
एक कुंज एक सेज एक पट ओढ़े बैठे, एक एक बीरी दोऊ खंडि-खंडि खात हैं।
एक रस एक प्राण एक दृष्टि 'हित ध्रुव', हेरि हेरि बढ़े चौंप क्यौं हूँ न अघात हैं ।।16।।
साँवरे किशोर लाल लाड़िली किशोरी गोरी, बाहाँ-जोरी एकै संग नीके देखि पाये हैं ।
कंचन के कंजनि की कुंजनि में बैठे सखी, बीती रति-केलि निशि तऊ न अघाये हैं ।।
हारनि के ब्याज पिय छुयौ चाहै उरजनि, प्रिया जानि अंचल सौं तबही दुराये हैं।
हित ध्रुव' परम प्रवीन कोक-अंगनि में, समुझि-समुझि मन दोऊ मुसिकाये हैं ।।17।।
बैठे सेज एक संग भींजे रस अंग-अंग, मन के मनोज-रंग मुदित करत हैं ।
अधिक अधीरताई देखि प्रिया मुसिक्याई, बिवस किशोर पिय अंक में भरत हैं ।।
चितै-चितै नैंन ओर छुवै लाल कुच कोर, भौंहनि की मुरनि तें अति ही डरत हैं।
हित ध्रुव' ललित कपोल नासा-पुट चूमि, अधरनि-रस हित पाँइनि परत हैं ।।18।।
दुलहिनि दूलहु किशोर इक जोर दोऊ, भूषन सहाने बागे बने अँग-अंग री ।
चंचल नैना बिसाल अंजन बन्यौ रसाल, कर पद रचे सोहैं मैंहँदी कौ रंग री ।।
सहज सहानी कुंज रची है सहानी सेज, लियें लाल बैठे हैं लड़ैती कौ उछंग री ।
हित ध्रुव' छिन छिन बढ़त सहानौ नेह, रौंम-रौंम उपजत छबि के तरंग री ।।19।।
नवल निकुंज सुख पुंज में रँगीले लाल, दुलहिनि-दूलहु रसिक सिरमौर री ।
रति - रस रंग साने ऐसैं अंग लपटाने, परत न सुधि कछु कौ है श्याम गौर री ।।
महारस माधुरी कौं पीवत हैं ज्यों-ज्यों दोऊ, बढ़ति अधिक आली त्यों-त्यों प्यास और री ।
हित ध्रुव' हेरि-हेरि करति बिचार सखी, कौन प्रेम कौन रूप जुर्यौ इक ठौर री ।।20।।
रूप निधि पानिप तरंगनि कें चितवत, मैन-रंग भरे नैन शोभित बिशाल री ।
आनँद की कुंज ऐन राजत हैं प्रेम सैन, तापर रँगीले जगमगैं दोउ लाल री ।।
माधुरी मदन मोद मद के बिनोद करैं, लालच की राशि ललचात सब काल री ।
हाव-भाव चतुरई छिन छिन नई-नई, 'हित ध्रुव' रस-बस कीन्हें बर बाल री ।।21।।
सवैया
आनँद पुंज सुहाग की कुंज में, सेज सुदेश सुरंग सहानी ।
लै 'ध्रुव' फूल अनूप दुकूल रची, सुख मूल सुगंध सौं सानी ।।
दूलहु दोऊ बिचित्र महा कल, ही कल कोक कला कल ठानी ।
परे रस रंग तरंग अभंग, भई लव रैनि विहात न जानी ।।22।।
दोहा
अद्भुत कोक कलानि की, नवल रँगीली केलि ।
हार जीत समुझत नहीं, बढ़त रहै रुचि-बेलि ।।23।।
कवित्त
माधुरी की कुंज तामैं मोद की लै सेज रची, तेहि पर राजैं अलबेले सुकुमार री ।
रूप तेज मोद के जुगल तन जगमगैं, हाव-भाव चातुरी के भूषन सुढ़ार री ।।
नेह-नीर नैननिं की सैननिं में रहे भींजि, कौन रंग बाढ्यौ जहाँ बोलिबोऊ भार री।
अति ही आसक्त सखी रहीं मोहि जोहि-जोहि, 'हित ध्रुव' प्राननि कौ यहै है अहार री ।।24।।
कमल निकुंज में गुलाब-दल सेज रची, बागे कोलपत्र मृदु अति ही सुरंग री ।
अंग-अंग रहे भींजि सौंधे ही के मोद माँझ, द्वै-द्वैलर मोतिनु के फौंदा बने संग री ।।
कोलपत्र वारि डारे नैन अरुनाई पर, चपलाई पर फीके खंजन कुरंग री ।
फूले मुख देखि सखी रहि गईं न्यारी-न्यारी, छकीं अनुराग 'ध्रुव' सब के अभंग री ।।25।।
फूलनि में फूले दोउ संग सखी नाहिं कोऊ, में रंग भीनी बतियनि कहि मुसिकात री।
आँनद के सिंधु परे नैन मैन रंग भरे,'हित ध्रुव' रस ढरे उर लपटात री ।।
अधर अधर जोरैं मिलि रहीं नैन कोरैं, थोरे-थोरे बेसरि के मोती थहरात री।
चली है उमड़ि शोभा बढ़ी रति-पति गोभा, देखि लाल लालचहि लालचौ लजात री ।।26।।
लाल कुंज लाल सेज लाल बागे रहे बनि, राजत हैं दोऊ लाल बातनि के रंग में।
लालनि की लाल भूमि लाल फूल रहे झूमि, ललित लड़ैती लाल फूले अंग-अंग में ।।
लाल-लाल सारी तन पहिरैं सहेली सब, भीजें दोऊ प्रान प्यारे प्रेम ही के रंग में ।
हित ध्रुव' चितवत लोचनि सिरात तब, देखैं जब प्यारी जू कौं पिय के उछंग में ।।27।।
जहाँ-जहाँ राधा प्यारी धरति चरन पिय, तहाँ-तहाँ नैननि के पाँवड़े बनावहीं।
महा प्रेम रंग रँगे तिनहीं के प्यार पगे, सेवा सब अंगनि की करैं सचु पावहीं।।
मादिक मधुर पियैं प्यारी को सुभाव लियैं, छिन-छिन भाँति-भाँति लाड़नि लड़ावहीं।
तैसियै प्रवीन प्यारी 'हित ध्रुव' सुकुमारी, समुझि सनेह रस कंठ सौं लगावहीं ।।28।।
सवैया
नेह रँगी मद मैन छकी पिय, छाती लगी जु चितै मुख ओरी ।
गुन रासि किशोरी सुखाकर गोरी, सुकोक कलानि के सिंधु झकोरी ।।
रंग तरंग अनंग अभंग बढ़ै, छिन ही छिन प्रीति न थोरी ।
सखी हित की चित की नित की, 'ध्रुव' सो सुख पीवति हैं निशि भोरी ।।29।।
कवित्त
छिन छिन नई छबि पानिप रही है फबि, राधिका-वल्लभ पर प्रान वारि डारियै ।
अंगनि झलक अरु भूषन झमकि आली, देखत रँगीली भाँति पलकैं न टारियै ।।
रँग भींनी करै बातें बीच-बीच मुसिकात, चाहन चपल चितै मोही सखी सारियै ।
प्रेम की अनूप गति भूली तहाँ ध्रुव-मति, तन मन धन बुद्धि सबै बात हारियै ।।30।।
सुमिलि सुठौर अंग झलकत मैन रंग, पानिप झलक बहु भाँति झलकात हैं।
हाव-भाव माधुरी की मूरति रँगीली जोर, कानन लौं नैन कोर रंग ही चुचात हैं ।।
फूले द्रुम तर ठाढ़े प्रेम के तरंग बाढ़े, 'हित ध्रुव' मंद-मंद दोउ मुसिकात हैं।
छबि की छलक मानौं उछरि-उछरि परै, ऐसै रूप आली कहौ कैसैं कहे जात हैं ।।31।।
केशरी सुरंग इक रंग बागे दुहुँनि के, जमुना के कूल-कूल बाहाँ जोरी आवहीं ।
सखिन के यूथ साथ आवत हैं पाछैं आछैं, हित की निकट सखी संग लागी गावहीं ।।
कहूँ-कहूँ ठाढ़े होइ देखत फूलनि छबि, मन भाये रंग लै लै प्रियहि बनावहीं।
अति अलबेली भाँति फिरैं अलबेले दोऊ, करत बिनोद 'ध्रुव' जे जे मन भावहीं ।।32।।
जमुना के कूल-कूल जहाँ-तहाँ फूले फूल, बाँहा-जोरी लटकत आवत हैं भोर हीं।
सघन लतनि माहिं फूले फिरैं रंग भरे, कहूँ कहूँ ठाढ़े होइ फूलनि कौं तोर हीं ।।
थोरी सखी संग जहाँ सोऊ न्यारी होइ रहीं, 'हित ध्रुव' देखि छबि पलकैं न जोर हीं ।
प्रेम-रस राते माते छिनहूँ न होत हाँते, ऐसे मन मिलि रहे चले एक ओर हीं ।।33।।
दोहा
एक प्रान मन एक ही, एक प्रेम कौ चाव ।
एकै शील सुभाव मृदु, सहजहि बन्यौ बनाव ।।34।।
कवित्त
प्यारी के जँगाली बागौ लाल के गुलाबी आली, फबि रहे जैसे मोपै कहत न आवही ।
मृगमद बैंदी इत बनी है सुरंग उत, हारि रह्यौ मन कछु उपमा न पावही ।।
कुँवरि के नथ सोहै बेसर बिहारीजू के, कौन एक छबि बाढ़ी देखिबोई भावही ।
झलकत मोती लरैं कुंदन की माल गरैं, मुसकनि मंद 'ध्रुव' सुख बरसावही ।।35।।
अंग भरि पट भरि भूषन भवन भरि, चल्यौ है उमड़ि छबि-अंबु चहुँ ओर री ।
सखीनि के नैन मीन परे हैं तरंगनि में, जानत न कहाँ होत आली निशि-भोर री ।।
वृंदावन कुंज-कुंज रह्यौ पूरि सुख पुंज, हंसी और मोरी मृगी भये हैं चकोर री।
हित ध्रुव' एक रस रस के समुद्र दोऊ, नागर अनंग-केलि नवल-किसोर री ।।36।।
सवैया
फूलि चले दोउ फूल निकुंज ते, फूलनि-फूलनि देखत आवैं ।
मनौं छबि के विवि चंद अनंद सौं, मंदहि-मंद मिले सुर गावैं ।।
नूपुर भूषन की झनकार सखी, सुनि कैं चहुँ ओर तैं धावैं।
रूप सुधा रस प्रेम सुरंगहि, नैन चकोरन कौं 'ध्रुव' प्यावैं ।।37।।
कवित्त
ललित रँगीली सेज पर दोउ रंग भरे, हँसि-हँसि लपटात सुख केलि करहीं ।
सहज आनंद मोद मई तन दंपति के, प्रेम रस मोद भींजि मृदु भुज भरहीं ।।
मैन मोद के तरंग झलकत अंग-अंग, लोचनि राजैं सुरंग चितै चित्त हरहीं।
हित ध्रुव' सखी सब प्रेम रस मोद मातीं, रहत बिवस नैनानेह नीर ढरहीं ।।38।।
रसिक रँगीले दोऊ तहाँ नाहि सखी कोऊ, हँसत मुदित मन उर लपटात री।
अधर मधुर मधुपान के बिवस रहैं, जानत न रैन दिन कहाँ धौं बिहात री ।।
रति रस सिंधु केलि तेहि रस रहे झेलि, 'हित ध्रुव' तऊ नेक नाहिंन अघात री।
छिन छिन औरै-और भौंहनि के भाइ भेद, रीझि-रीझि रस भींजि लाल हा-हा खात री ।।39।।
नवल रसिक पिय एक मन एक हिय, एकै बात है सुहात दुहुँनि के मन कौं ।
एक वैस एक जोर एक से भूषन पट, एक सी छबीली छबि राजति है तन कौं ।।
रूप ही के रंग भीने लोचन चकोर कीन्हें, एकै संग चाहैं ऐसैं जैसैं मीन वन कौं ।
हित ध्रुव' रसिक शिरोमनि युगल बिनु, आली को निवाहै एक रस प्रेम पन कौं ।।40।।
रूप की अवधि दोउ उपमा कौं नाहिं कोउ, प्रेम-सींव सुकुमार एक रंग रँगे हैं ।
सहज अटक जहाँ बिना हेत हित तहाँ, उज्वल अनूप रस दोउ मन पगे हैं ।।
मदन-कुसुम-मोद रमि रह्यौ दुहुँ कोद, अंग-अंग रोम-रोम भाइ जग मगे हैं ।
हित ध्रुव' हेरि-हेरि छबि रस भये बस, तृपित न नेक क्यौं हूं रैनि सब जगे हैं ।।41।।
ज्यौं-ज्यौं लाल देखै मुख नैननि कौं तृषा होत, प्यारी जू कौ रूप मानौं प्यास ही कौ रूप है।
डीठि डीठि रही मिलि जैसे एक धारा 'ध्रुव', हौंहूँ भूली देखि दसा अति ही अनूप है ।।
कौन रस स्वाद गह्यौ कैसेहूँ न जात कह्यौ, जानत न छाँह और कैसी होति धूप है।
और सुख जेते सब भये हैं पतंग, रस-राज के सुखनि पर प्रेम भान भूप है ।।42।।
छुवत न रसिक रंगीलौ लाल प्यारी जू कौं,मनहूँ के करनि सौं छुवत डरत हैं ।
प्रेम की नौलासी प्यारी सहज ही सुकुमारी, प्रानन की छाया तिन ऊपर करत हैं ।।
नेक ही कौ हास सखी सार है बिलासन कौ, जाके हेरैं और सब सुख बिसरत हैं ।
अतिही आसक्त ताकी 'हित ध्रुव' यहै गति, रीझि-रीझि दूरि ही तें पाँइनि परत हैं ।।43।।
हेरि-हेरि रूपहि चकित ह्वै रहे हैं दोऊ, प्रेम कौ न वार-पार कैसै कै बखानियै ।
मन-मन चतुराई तन सुधि बिसराई, कौन एक रंग बाढ्यौ जानत न जानियै ।।
और कौ प्रवेस कहाँ मन हूँ न भेदी जहाँ, ऐसी प्रेम-छटा ताहि काहि लै प्रमानियै।
हित ध्रुव' जोई कछु कहिवौ है ऐसी भाँति, जैसे आली पाहन सौं मानिक लै भानियै ।।44।।
दोहा
कहिवौ सुनिवौ रहि गयौ, देखत मोहन रूप ।
अद्भुत कौतुक सौं रँगे, प्रेम-बिलास अनूप ।।45।।
जै जै श्री शृंगार शत लीला (द्वितीय शृंखला) की जै जै श्रीहित हरिवंश
दोहा
दुतिय शृंखला सुनत ही, श्रवननिं अति सुख होइ ।
प्रेम रतन गुन रूप सौं, मानौं राखी पोइ ।।1।।
कवित्त
दुलहिनि-दूलहु कुँवर दोऊ, सहज ही, रसिक रँगीले लाल भींने रस रंगना ।
छबि के बसन अभरन अलबेले ताके, ठाढ़े हैं छबीली भाँति कुंजनि के अंगना ।।
सहज सुरंग मृदु झलकें चरन कर, रूप गुन पोइ बाँध्यौ प्रेम ही कौ कंगना ।
हित ध्रुव' सहज द्रगंचलनि गाँठि परी, नयौ चाव नई रुचि बढ़त अनंगना ।।2।।
जैसी अलबेली बाल तैसे अलबेले लाल, दुहुँनि में उलही सहज गोभा' नेह की ।
चाहनि के अंबु दै-दै सींचत हैं छिन-छिन, आल-बाल भई सेज छाया कुंज-गेह की ।।
अनुदिन हरी होति पानिप बदन-जोति, ज्यौं-ज्यौं ही बौछार 'ध्रुव' लागै रूप-मेह की ।
नैननिं की बार कियै हेरेँ सखी मन दियै, चित्र सी ह्वै रहीं सब भूली सुधि देह की ।।3।।
प्यारे जी की जीवन हैं नवल किसोरी गोरी, तैसी भाँति प्यारी जू के जीवन बिहारी है ।
जोई-जोई भावै उन्हें सोई-सोई रुचै इन्हें, एकै गति भई ऐसी रंचकौ न न्यारी है ।।
छिन छिन देखि देखि छबि की तरंग नाना, प्रीतम दुहुँनि सुधि देह की बिसारी है ।
हित ध्रुव' रीझि-रीझि रहे रति रस भींजि, प्रीति ऐसी अब लगि सुनी न निहारी है ।।4।।
प्रीतम की प्रेम-गति देखैं भूली तन-गति, बड़े-बड़े नैना दोऊ आये प्रेम-जल भरि ।
प्रिया लाल-लाल कहि लाये लाइ उरजनि, चूँमि-चूँमि नैना रही अधर दसन धरि ।।
हित ध्रुव' सखी सब देखत विवस भईं, प्रेम पट नाना रंग झलकैं सबनि परि ।
एक चित्र की सी खरी एक धर खसि परी, एकनि के नैननिं तें गिरै नेह-नीर ढरि ।।5।।
नैननिं के आगैं प्यारी बिलपत है बिहारी, असुँवनि प्रेम-जल धारा चली जाइ री।
कौन प्रेम केहि फंद परे हैं रँगीले लाल, अटपटी गति हेरैं हियौ अकुलाइ री ।।
हित ध्रुव' चेति कैं किसोरी गोरी धीर-धरि, नैना नेह-नीर भरि लीन्हें उर लाइ री ।
प्रेम कौ समुद्र फिरि गयौ है सबनि पर, जहाँ-तहाँ सखी धर परीं मुरझाइ री।।6।।
सवैया
सेज सरोवर राजत हैं, जल मादिक रूप भरे तरुनाई ।
अंगनि आभा तरंग उठैं, तहाँ मीन कटाक्षनि की चपलाई ।।
प्यासी सखी भरि अंजुलि नैन, पियैं ते गिरी उपमा 'ध्रुव' पाई ।
प्रेम गयन्द ने डारे हैं तोरि कैं, कंचन-कंज़ चहूँ दिसि माई ।।7।।
कवित्त
सखीनि की गति हेरैं ठाड़े भये जाइ नेरैं, करुना कै चितयौ दुहुनि तिन ओर री ।
अमी की सी धारा उर सींचि गये सबनि कें, प्रेम सिंधु भौंर तें निकासी बरजोर री ।।
चहुँ दिसि राजैं खरी महा रस रंग भरी, नैननिं की गति वहै तृषित चकोर री।
सहज तरंग उठैं जल के से छिन छिन, 'हित ध्रुव' यहै खेल तहाँ निसि-भोर री ।।8।।
नई सेज नई रुचि नयौ रूप नयौ नेह, नेही नये अलबेले अति सुकुमार री ।
नई लाज नयौ रंग नेह रँगी चितवनि, नई केलि कौ सिंगार सोहै उर हार री ।।
छिन-छिन तृषा बढ़ै पानिप अनूप चढ़ै, मधुर बिमल निजु यहै प्रेम-सार री ।
हित ध्रुव' प्यारी मानौं छुई है न मनहू कैं, एकै रस दिन जहाँ बिसद बिहार री ।।9।।
सवैया
सेज रँगीली रँगीली सखीनि, रची बहु रंग सुरंग सुहाई ।
तापर बैठे रँगीले छबीले, हँसैं रस में सुख की सरसाई ।।
सचिक्कन अंजन नैन लसै, मेहँदी झलकै पद-पानि रचाई।
रूप की दीपति तें 'ध्रुव' कुंज, फनूस सी ह्वै रही यौं उर आई ।।10।।
फूल सौं फूलनि-ऐंन रची, सुख सैन सुदेस सुरंग सुहाई ।
लाड़िली-लाल बिलास की रासि, औ पानिप-रूप बढ़ी अधिकाई ।।
सखी चहुँ ओर बिलोकैं झरोखनि, जाति नहीं उपमा 'ध्रुव' पाई।
खंजन कोटि जुरे छबि के एैं कि, नैननि की नव-कुंज बनाई ।।11।।
दोहा
नवल रँगीली कुंज में, नवल रँगीले लाल ।
नवल रँगीलौ खेल रच्यौ, चितवनि नैन बिशाल ।।12।।
कवित्त
फूलनि की कुंज ऐंन फूलनि की रची सैंन, फूलनि के भूषन बसन फूल मन में ।
फूल ही की चितवनि मुसिकनि फूलही की, फूलि - फूलि लपटात फूल के सदन में ।।
फूलनि के हाव-भाव फूलनि कौ बढ्यौ चाव, फूले फूल देखि 'ध्रुव' उभै तन-वन में।
बरसत सुख- फूल सुरत हिंडोरे झूल, फूल ही की दामिनी लसत फूल घन में ।।13।।
आछी छबि सौं छबीले बैठे हैं छबीली भाँति, रतन निकुंज माहिं बातैं रति करहीं ।
परम प्रवीन प्यारौ ताहू तें अधिक प्यारी, रस भरी चितवनि चितै चित्त हरहीं ।।
नवल नवल भाइ बेध्यौ है मरम जाइ, आनँद कौ रंग पाइ सुख-रस ढरहीं ।
हित ध्रुव' रीझि-रीझि देबै कौं न कछू आहि, फिरि-फिरि प्यारेलाल पाँइन में परहीं ।।14।।
लाल पीत फूलनि की कुंज सुख पुंज मध्य, लाल पीत बागे तन दोऊ लाल पहिरैं ।
भूषन की दुति प्रति अंगनि में झलकत, मानौं रूप सिंधुन तै उठति हैं लहरैं ।।
मंद-मंद हँसि कहैं कछु रंग-भीनी बात, बेसरि के मोती दोऊ छबि सौं थरहरैं ।
हित ध्रुव' रीझि-रीझि रहे रति-रस भींजि, अंचलनि सुधि भूलि परे सुख गहरैं ।।15।।
प्रीतम किसोरी गोरी रसिक रँगीली जोरी, प्रेमही के रंग बोरी शोभा कही जात है।
एक प्राण एक वैस एक हीं सुभाव चाव, एक बात दुहुँनि के मनहिं सुहात है ।।
एक कुंज एक सेज एक पट ओढ़े बैठे, एक एक बीरी दोऊ खंडि-खंडि खात हैं।
एक रस एक प्राण एक दृष्टि 'हित ध्रुव', हेरि हेरि बढ़े चौंप क्यौं हूँ न अघात हैं ।।16।।
साँवरे किशोर लाल लाड़िली किशोरी गोरी, बाहाँ-जोरी एकै संग नीके देखि पाये हैं ।
कंचन के कंजनि की कुंजनि में बैठे सखी, बीती रति-केलि निशि तऊ न अघाये हैं ।।
हारनि के ब्याज पिय छुयौ चाहै उरजनि, प्रिया जानि अंचल सौं तबही दुराये हैं।
हित ध्रुव' परम प्रवीन कोक-अंगनि में, समुझि-समुझि मन दोऊ मुसिकाये हैं ।।17।।
बैठे सेज एक संग भींजे रस अंग-अंग, मन के मनोज-रंग मुदित करत हैं ।
अधिक अधीरताई देखि प्रिया मुसिक्याई, बिवस किशोर पिय अंक में भरत हैं ।।
चितै-चितै नैंन ओर छुवै लाल कुच कोर, भौंहनि की मुरनि तें अति ही डरत हैं।
हित ध्रुव' ललित कपोल नासा-पुट चूमि, अधरनि-रस हित पाँइनि परत हैं ।।18।।
दुलहिनि दूलहु किशोर इक जोर दोऊ, भूषन सहाने बागे बने अँग-अंग री ।
चंचल नैना बिसाल अंजन बन्यौ रसाल, कर पद रचे सोहैं मैंहँदी कौ रंग री ।।
सहज सहानी कुंज रची है सहानी सेज, लियें लाल बैठे हैं लड़ैती कौ उछंग री ।
हित ध्रुव' छिन छिन बढ़त सहानौ नेह, रौंम-रौंम उपजत छबि के तरंग री ।।19।।
नवल निकुंज सुख पुंज में रँगीले लाल, दुलहिनि-दूलहु रसिक सिरमौर री ।
रति - रस रंग साने ऐसैं अंग लपटाने, परत न सुधि कछु कौ है श्याम गौर री ।।
महारस माधुरी कौं पीवत हैं ज्यों-ज्यों दोऊ, बढ़ति अधिक आली त्यों-त्यों प्यास और री ।
हित ध्रुव' हेरि-हेरि करति बिचार सखी, कौन प्रेम कौन रूप जुर्यौ इक ठौर री ।।20।।
रूप निधि पानिप तरंगनि कें चितवत, मैन-रंग भरे नैन शोभित बिशाल री ।
आनँद की कुंज ऐन राजत हैं प्रेम सैन, तापर रँगीले जगमगैं दोउ लाल री ।।
माधुरी मदन मोद मद के बिनोद करैं, लालच की राशि ललचात सब काल री ।
हाव-भाव चतुरई छिन छिन नई-नई, 'हित ध्रुव' रस-बस कीन्हें बर बाल री ।।21।।
सवैया
आनँद पुंज सुहाग की कुंज में, सेज सुदेश सुरंग सहानी ।
लै 'ध्रुव' फूल अनूप दुकूल रची, सुख मूल सुगंध सौं सानी ।।
दूलहु दोऊ बिचित्र महा कल, ही कल कोक कला कल ठानी ।
परे रस रंग तरंग अभंग, भई लव रैनि विहात न जानी ।।22।।
दोहा
अद्भुत कोक कलानि की, नवल रँगीली केलि ।
हार जीत समुझत नहीं, बढ़त रहै रुचि-बेलि ।।23।।
कवित्त
माधुरी की कुंज तामैं मोद की लै सेज रची, तेहि पर राजैं अलबेले सुकुमार री ।
रूप तेज मोद के जुगल तन जगमगैं, हाव-भाव चातुरी के भूषन सुढ़ार री ।।
नेह-नीर नैननिं की सैननिं में रहे भींजि, कौन रंग बाढ्यौ जहाँ बोलिबोऊ भार री।
अति ही आसक्त सखी रहीं मोहि जोहि-जोहि, 'हित ध्रुव' प्राननि कौ यहै है अहार री ।।24।।
कमल निकुंज में गुलाब-दल सेज रची, बागे कोलपत्र मृदु अति ही सुरंग री ।
अंग-अंग रहे भींजि सौंधे ही के मोद माँझ, द्वै-द्वैलर मोतिनु के फौंदा बने संग री ।।
कोलपत्र वारि डारे नैन अरुनाई पर, चपलाई पर फीके खंजन कुरंग री ।
फूले मुख देखि सखी रहि गईं न्यारी-न्यारी, छकीं अनुराग 'ध्रुव' सब के अभंग री ।।25।।
फूलनि में फूले दोउ संग सखी नाहिं कोऊ, में रंग भीनी बतियनि कहि मुसिकात री।
आँनद के सिंधु परे नैन मैन रंग भरे,'हित ध्रुव' रस ढरे उर लपटात री ।।
अधर अधर जोरैं मिलि रहीं नैन कोरैं, थोरे-थोरे बेसरि के मोती थहरात री।
चली है उमड़ि शोभा बढ़ी रति-पति गोभा, देखि लाल लालचहि लालचौ लजात री ।।26।।
लाल कुंज लाल सेज लाल बागे रहे बनि, राजत हैं दोऊ लाल बातनि के रंग में।
लालनि की लाल भूमि लाल फूल रहे झूमि, ललित लड़ैती लाल फूले अंग-अंग में ।।
लाल-लाल सारी तन पहिरैं सहेली सब, भीजें दोऊ प्रान प्यारे प्रेम ही के रंग में ।
हित ध्रुव' चितवत लोचनि सिरात तब, देखैं जब प्यारी जू कौं पिय के उछंग में ।।27।।
जहाँ-जहाँ राधा प्यारी धरति चरन पिय, तहाँ-तहाँ नैननि के पाँवड़े बनावहीं।
महा प्रेम रंग रँगे तिनहीं के प्यार पगे, सेवा सब अंगनि की करैं सचु पावहीं।।
मादिक मधुर पियैं प्यारी को सुभाव लियैं, छिन-छिन भाँति-भाँति लाड़नि लड़ावहीं।
तैसियै प्रवीन प्यारी 'हित ध्रुव' सुकुमारी, समुझि सनेह रस कंठ सौं लगावहीं ।।28।।
सवैया
नेह रँगी मद मैन छकी पिय, छाती लगी जु चितै मुख ओरी ।
गुन रासि किशोरी सुखाकर गोरी, सुकोक कलानि के सिंधु झकोरी ।।
रंग तरंग अनंग अभंग बढ़ै, छिन ही छिन प्रीति न थोरी ।
सखी हित की चित की नित की, 'ध्रुव' सो सुख पीवति हैं निशि भोरी ।।29।।
कवित्त
छिन छिन नई छबि पानिप रही है फबि, राधिका-वल्लभ पर प्रान वारि डारियै ।
अंगनि झलक अरु भूषन झमकि आली, देखत रँगीली भाँति पलकैं न टारियै ।।
रँग भींनी करै बातें बीच-बीच मुसिकात, चाहन चपल चितै मोही सखी सारियै ।
प्रेम की अनूप गति भूली तहाँ ध्रुव-मति, तन मन धन बुद्धि सबै बात हारियै ।।30।।
सुमिलि सुठौर अंग झलकत मैन रंग, पानिप झलक बहु भाँति झलकात हैं।
हाव-भाव माधुरी की मूरति रँगीली जोर, कानन लौं नैन कोर रंग ही चुचात हैं ।।
फूले द्रुम तर ठाढ़े प्रेम के तरंग बाढ़े, 'हित ध्रुव' मंद-मंद दोउ मुसिकात हैं।
छबि की छलक मानौं उछरि-उछरि परै, ऐसै रूप आली कहौ कैसैं कहे जात हैं ।।31।।
केशरी सुरंग इक रंग बागे दुहुँनि के, जमुना के कूल-कूल बाहाँ जोरी आवहीं ।
सखिन के यूथ साथ आवत हैं पाछैं आछैं, हित की निकट सखी संग लागी गावहीं ।।
कहूँ-कहूँ ठाढ़े होइ देखत फूलनि छबि, मन भाये रंग लै लै प्रियहि बनावहीं।
अति अलबेली भाँति फिरैं अलबेले दोऊ, करत बिनोद 'ध्रुव' जे जे मन भावहीं ।।32।।
जमुना के कूल-कूल जहाँ-तहाँ फूले फूल, बाँहा-जोरी लटकत आवत हैं भोर हीं।
सघन लतनि माहिं फूले फिरैं रंग भरे, कहूँ कहूँ ठाढ़े होइ फूलनि कौं तोर हीं ।।
थोरी सखी संग जहाँ सोऊ न्यारी होइ रहीं, 'हित ध्रुव' देखि छबि पलकैं न जोर हीं ।
प्रेम-रस राते माते छिनहूँ न होत हाँते, ऐसे मन मिलि रहे चले एक ओर हीं ।।33।।
दोहा
एक प्रान मन एक ही, एक प्रेम कौ चाव ।
एकै शील सुभाव मृदु, सहजहि बन्यौ बनाव ।।34।।
कवित्त
प्यारी के जँगाली बागौ लाल के गुलाबी आली, फबि रहे जैसे मोपै कहत न आवही ।
मृगमद बैंदी इत बनी है सुरंग उत, हारि रह्यौ मन कछु उपमा न पावही ।।
कुँवरि के नथ सोहै बेसर बिहारीजू के, कौन एक छबि बाढ़ी देखिबोई भावही ।
झलकत मोती लरैं कुंदन की माल गरैं, मुसकनि मंद 'ध्रुव' सुख बरसावही ।।35।।
अंग भरि पट भरि भूषन भवन भरि, चल्यौ है उमड़ि छबि-अंबु चहुँ ओर री ।
सखीनि के नैन मीन परे हैं तरंगनि में, जानत न कहाँ होत आली निशि-भोर री ।।
वृंदावन कुंज-कुंज रह्यौ पूरि सुख पुंज, हंसी और मोरी मृगी भये हैं चकोर री।
हित ध्रुव' एक रस रस के समुद्र दोऊ, नागर अनंग-केलि नवल-किसोर री ।।36।।
सवैया
फूलि चले दोउ फूल निकुंज ते, फूलनि-फूलनि देखत आवैं ।
मनौं छबि के विवि चंद अनंद सौं, मंदहि-मंद मिले सुर गावैं ।।
नूपुर भूषन की झनकार सखी, सुनि कैं चहुँ ओर तैं धावैं।
रूप सुधा रस प्रेम सुरंगहि, नैन चकोरन कौं 'ध्रुव' प्यावैं ।।37।।
कवित्त
ललित रँगीली सेज पर दोउ रंग भरे, हँसि-हँसि लपटात सुख केलि करहीं ।
सहज आनंद मोद मई तन दंपति के, प्रेम रस मोद भींजि मृदु भुज भरहीं ।।
मैन मोद के तरंग झलकत अंग-अंग, लोचनि राजैं सुरंग चितै चित्त हरहीं।
हित ध्रुव' सखी सब प्रेम रस मोद मातीं, रहत बिवस नैनानेह नीर ढरहीं ।।38।।
रसिक रँगीले दोऊ तहाँ नाहि सखी कोऊ, हँसत मुदित मन उर लपटात री।
अधर मधुर मधुपान के बिवस रहैं, जानत न रैन दिन कहाँ धौं बिहात री ।।
रति रस सिंधु केलि तेहि रस रहे झेलि, 'हित ध्रुव' तऊ नेक नाहिंन अघात री।
छिन छिन औरै-और भौंहनि के भाइ भेद, रीझि-रीझि रस भींजि लाल हा-हा खात री ।।39।।
नवल रसिक पिय एक मन एक हिय, एकै बात है सुहात दुहुँनि के मन कौं ।
एक वैस एक जोर एक से भूषन पट, एक सी छबीली छबि राजति है तन कौं ।।
रूप ही के रंग भीने लोचन चकोर कीन्हें, एकै संग चाहैं ऐसैं जैसैं मीन वन कौं ।
हित ध्रुव' रसिक शिरोमनि युगल बिनु, आली को निवाहै एक रस प्रेम पन कौं ।।40।।
रूप की अवधि दोउ उपमा कौं नाहिं कोउ, प्रेम-सींव सुकुमार एक रंग रँगे हैं ।
सहज अटक जहाँ बिना हेत हित तहाँ, उज्वल अनूप रस दोउ मन पगे हैं ।।
मदन-कुसुम-मोद रमि रह्यौ दुहुँ कोद, अंग-अंग रोम-रोम भाइ जग मगे हैं ।
हित ध्रुव' हेरि-हेरि छबि रस भये बस, तृपित न नेक क्यौं हूं रैनि सब जगे हैं ।।41।।
ज्यौं-ज्यौं लाल देखै मुख नैननि कौं तृषा होत, प्यारी जू कौ रूप मानौं प्यास ही कौ रूप है।
डीठि डीठि रही मिलि जैसे एक धारा 'ध्रुव', हौंहूँ भूली देखि दसा अति ही अनूप है ।।
कौन रस स्वाद गह्यौ कैसेहूँ न जात कह्यौ, जानत न छाँह और कैसी होति धूप है।
और सुख जेते सब भये हैं पतंग, रस-राज के सुखनि पर प्रेम भान भूप है ।।42।।
छुवत न रसिक रंगीलौ लाल प्यारी जू कौं,मनहूँ के करनि सौं छुवत डरत हैं ।
प्रेम की नौलासी प्यारी सहज ही सुकुमारी, प्रानन की छाया तिन ऊपर करत हैं ।।
नेक ही कौ हास सखी सार है बिलासन कौ, जाके हेरैं और सब सुख बिसरत हैं ।
अतिही आसक्त ताकी 'हित ध्रुव' यहै गति, रीझि-रीझि दूरि ही तें पाँइनि परत हैं ।।43।।
हेरि-हेरि रूपहि चकित ह्वै रहे हैं दोऊ, प्रेम कौ न वार-पार कैसै कै बखानियै ।
मन-मन चतुराई तन सुधि बिसराई, कौन एक रंग बाढ्यौ जानत न जानियै ।।
और कौ प्रवेस कहाँ मन हूँ न भेदी जहाँ, ऐसी प्रेम-छटा ताहि काहि लै प्रमानियै।
हित ध्रुव' जोई कछु कहिवौ है ऐसी भाँति, जैसे आली पाहन सौं मानिक लै भानियै ।।44।।
दोहा
कहिवौ सुनिवौ रहि गयौ, देखत मोहन रूप ।
अद्भुत कौतुक सौं रँगे, प्रेम-बिलास अनूप ।।45।।
जै जै श्री शृंगार शत लीला (द्वितीय शृंखला) की जै जै श्रीहित हरिवंश
16. शृंगार शत लीला (तृतीय शृंखला)
दोहा
अब सुनि तीजी श्रृंखला, रति विलास आनंद ।
तिहि रस मादिक मत्त रहैं, विवि वृंदावन चंद ।।1।।
सवैया
भाँति भली नवकुंज विराजत, राधिका वल्लभ लाल बिहारी ।
प्राननि की मनि प्यारी बिहारिनि, प्यार सौं प्रीतम लै उर धारी ।।
ज्यौं छबि-चंद्रिका चंद के अंक में, बाढ़ी महा छबि की उजियारी ।
सखी चहुँ कोद चकोरी सखी भईं 'ध्रुव', पीवत रूप अनूप सुधारी ।।2।।
केलि करैं सुकुमारी-बिहारी, बढ़ी छबि भारी कही नहिं जाई ।
लालची लाल रँगे रस-बाल, बिलोकि रहे 'ध्रुव' सुंदरताई ।।
पीवत नैंन कटाक्षनि माधुरी, कौतुक एक न कैंहूँ अघाई ।
हित सो हित हेरि लुभाइ रह्यौ, रुचि कौं रुचि देखिकै आप लजाई ।।3।।
भाँति रँगीली छबीली के संग, छबीलौ बन्यौ छबि की निधि माई।
सेज सहानी सुरंग बनी, तिहि ऊपर केलि करैं सुखदाई ।।
हिय सौं हिय लाइ रहे लपटाइ, लसै अँग अंग में अंगनि-झाँई ।
मिलीं हैं 'ध्रुव' द्वै सरिता छबि की, मनौं दीठि तहाँ न कहूँ ठहराई ।।4।।
लाड़िली-लाल बिलास करैं, रचि सेज सुदेश सुरंग सुहाई ।
मंदहि-मंद हँसैं रस मत्त, भरे अनुराग महा छबि पाई ।।
कोक-कलानि की घातिन माँहिं, बिचित्र बिनोद बढ़ावत माई।
सखी चहुँ कोद लतानि लगी, निरखैं 'ध्रुव' प्राननि देत बधाई ।।5।।
गोरी किशोरी की अंगनि काँति, लसै बहु भाँति न जात बखानी ।
रंग कौ रास रच्यौ रति रासि, बिलासी की औधि निकुंजनि रानी ।।
अँसनि-बाहुँ जुरी 'ध्रुव' मंडली, नैननि निर्त्तत रैन विहानी ।
अंचल चीर करैं श्रम जानि कैं, भूषन अंग तेई भये गानी ।।6।।
कवित्त
मदन के रस माँझ मगन बिहार करैं, सुख के प्रवाह माहिं लाल मन भींनौ है।
श्रम-जलकन मुख छबि के समूह मानौं, नैन बैन सैन सर-पंजर सो कीनौ है ।।
कहाँ लौं सँभारैं पिय परे सेज वेसँभारि, लटकत शीश गहि लाइ उर लीनौ है।
हित ध्रुव' परम प्रवीन सब अंगनि में, अधर-अधर जोरि सुधा रस दीनौ है ।।7।।
सरस बिलास साने अंग-अंग लपटानें, आरस में अरसाने नैना न अघाने हैं।
जब-जब छुटि जात फिरि-फिरि लपटात, छांड़ि न सकत सेज ऐसैं ललचाने हैं ।।
उठिबे कौ मन करैं पुनि तेहि रंग ढरैं, घरी एक और जाउ कहि मुसिकाने हैं।
हित ध्रुव' ऐसी भाँति छिन छिन सरसात, जानत न दिन-रैन केतिक विहाने है ।।8।।
भोर कुंज द्वार खरे अंग-अंग रंग भरे, अरुनाई नैननि की बरनी न जाति है।
अधर अंजन लीक फबी है कपोल पीक, बसन पलटि परे सोभा झलकाति है।।
रसमसी अलबेली लटकी है लाल पर, मूँदरी की आरसी निरखि मुसिकाति है।
हित ध्रुव' ऐसी छबि देखत ही रीझि रहे, प्रीतम की अखियाँ तौ क्यौंहू न अघाति है ।।9।।
सवैया
आज की वानिक लाल रँगीले की, मोपै कछू नहिं जात बखानी।
लाड़िली रंग भरी सुकुमारि, रही लपटाइ हियैं अलसानी ।।
रहे छुटि बार न हार सम्हार, बिहार बिनोद में रैन बिहानी।
रूप बिलास सनेह निहारि, सखी हित वारि पियैं 'ध्रुव' पानी ।।10।।
कवित्त
भोर भयैं साँझ ही कौ धोखौ है दुहुँनि मन, सुपनो सो चेत कहैं कहा बात है भई।
ऐंकि हम मिले नाहिं बैठे हैं अबहिं आइ, ऐंकि निशा आज कछु बीच ही तें ह्वै गई ।।
भूषन बसन छूटे देखेँ पुनि समुझत, कौन एक भ्रम दशा उपजी है सुखमई ।
हित ध्रुव' यहै जानैं मिल्यौ अनमिल्यौ मानैं, नैननिं में रुचि ही की प्रेम-बेलि ह्वै बई ।।11।।
नवल रँगीले दोऊ रस में रसीले अति, सहज सुरंग नये नेह अनुरागे हैं।
देखि देखि प्यारी अनदेखी सी लगत मन, निमिषौ न लागै नैंन रैंन सब जागे हैं ।।
चाह भूली चाहि चाहि यद्यपि लड़ैती पाहि, ऐसै प्रेम रंग रस मोद मद पागे हैं।
तेहि सुख की निकाई 'ध्रुव' पै कही न जाई, तृपितौ न आई उर उरजन लागे हैं।।12।।
सवैया
न आदि न अंत विलास करैं दोउ, लाल-प्रिया में भई न चिन्हारी।
नई नई भाँति नई छबि कांति, नई नवला नव नेह विहारी ।।
रहे मुख चाहि दियें चित आहि, परे रस प्रीति सु सर्वसु हारी ।
रहें इक पास करैं मृदु हास, सुनौ 'ध्रुव' प्रेम अकत्थ कथारी ।।13।।
दोहा
नवल कुँवर दोउ रसिक-मनि, उपमा दीजै कौन ।
चितै- चितै मुख-माधुरी, ह्वै रहिये 'ध्रुव' मौन ।।14।।
सवैया
पाग सुरंग बनी है छबीली के, भाँति अनूप सखीन बनाई ।
त्यों पर्यौ मन लाल कौ प्रेम के पेंच में, देखत पेंच रहे हैं लुभाई ।।
बैंदी जराव की भाल दियैं, अरु नैंनन अंजन रेख सुहाई ।
तैसोई नत्थ कौ मोती बन्यौ, छबि छाइ रही न कही 'ध्रुव' जाई ।।15।।
चूँदरी लाल सुरंग छबीली की, ओढ़ैं छबीलौ महा छबि पाई।
केशन गूँथि रची रुचि माँग रु, नैननि अंजन रेख बनाई ।।
बैंदी दई हँसि लाड़िली रंग सौं, बेसरि लै अपनी पहिराई ।
रूप बढ्यौ मन मोद चढ्यौ, 'ध्रुव' देखत नैन निमेष भुलाई ।।16।।
पाग जँगाली बनी है किशोरी कैं, केशर रंग किसोर के माई।
बैंदी मृगमद सोहै इतै, उत लाल रसाल अनूप बनाई ।।
बेसरि नत्थ बनी झलकैं 'ध्रुव', खोजि रह्यौ उपमा नहिं पाई ।
रूप-तरंग चितै मन मोद, सखी चहुँ कोद रही हैं लुभाई ।।17।।
चूँनरी लाल बनी है बिहारी कैं, पाग बिहारिनि के सिर सोहै ।
छके नव नेह महा रस मेह, छकै सखी आइ जोई छबि जोहै ।।
बेसरि पीय कैं नत्थ सुतीय कैं, बानिक रूप अनूपम मोहै ।
भाँति रँगीली कही न परै सखि, या छबि की उपमा कहौ को है।।18।।
कवित्त
प्यारी जू की सारी अति प्यारी लागै प्रीतम कौं, सौंधे भींजी अँगिया सुरंग उर धारी है ।
नवल रँगीलीजू के भूषन बिहारीलाल, पहिरत बाढ़ी फूल जात ना सँभारी है ।।
जोई कछु प्रिया जू के अंगनि परस होत, सोई प्रान जात होत ऐसी प्यारी प्यारी है ।
हित ध्रुव' प्रेम बात कैसैहूँ न कही जात, जानै सोई जिहि शिर मोहिनी सी डारी है ।।19।।
सवैया
उज्वल स्याम सुरंग सुहावनी, लाज भरी अँखिया अति सोहैं ।
प्रेम भरी रस भाइ भरी 'ध्रुव', प्यार भरी पिय की दिशि जोहैं ।।
बढ्यौ अनुराग सुरंग सुहाग, सबै अँग प्रीतम प्राननि मोहैं।
लई छबि छीनि प्रवीन बिहारिनि, खंजन मीन कुरंगनि कोहैं ।।20।।
कवित्त
खेलत बसंत होरी नवल छबीली जोरी, उड़त गुलाल अनुराग कौ सुरंग री।
मृदु मुसकानि उर फूल एई फूल भये, हाव-भाव सौंधे भींजे सोहैं अँग-अंग री ।।
नैननिं की चितवनि छिरकनि प्रेम-नीर, सींचत हैं पिय-हिय भरी रस-रंग री ।
हित ध्रुव' भींजे सुख बारिध विलास हाँस, सोई सुख देखैं सखी दिनहिं अभंग री ।।21।।
सवैया
खेलत फाग भरे अनुराग सौं, लाड़िली-लाल महा अनुरागी ।
तैसियै संग सखी सुठि सोहनी, प्रेम सुरंग सुधा-रस पागी ।।
चलैं पिचकारी चितौन छबीली की, प्रीतम के उर अंतर लागी ।
रंग कौ ओर न छोर सनेह कौ, देखि सबै उपमा 'ध्रुव' भागी ।।22।।
सखीन की मंडली मध्य जु खेलत, रंग बिहारिनि संग बिहारी ।
लै नव कुंकुम रंगनि छींटत, बंदन डारत नैन सँभारी ।।
परै तहीं बूँद जहीं जहीं चाहियै, ऐसै प्रवीन सिंगार सिंगारी ।
बढ्यौ 'ध्रुव रंग तरंग अनंग, सनेह की राशि रहै हैं निहारी ।।23।।
लाड़िली-लाल निकुंज में खेलत, आनँद प्रेम बिलास की होरी ।
हैं अंखियाँ पिचकारी भरी 'ध्रुव', प्यार सौं छाँड़त प्रीतम गोरी ।।
मैन कौ खेल बढ्यौ सुख पुंज, बजै धुनि भूषन थोरी ही थोरी ।
भयौ छबि कौ छिरकाव मनौं, जब साँवरे ओर हँसी मुख मोरी ।।24।।
कवित्त
हंसजा बिमल नीर सुंदर सुदेश तीर, निर्त्तत मयूरी-मोर आनँद अधीर री ।
कमल निकुंज कुंज मधुपनि होत गुंज, बरसत सुख-पुंज रटैं पिक-कीर री ।।
खेलैं तहाँ रस-राशि बिविध बिनोद हास, सुरँगित भये 'ध्रुव' अंगनि के चीर री ।
बंदन डारत प्यारी छिरकैं लाल बिहारी, रंगनि की बूँदें बनीं सुभग शरीर री।।25।।
दोहा
खेलत कामिनि-कंत, भीनें रँग अनुराग में ।
अद्भुत रास-बसंत, छबिहू तहँ भूली फिरै ।।26।।
सवैया
खेलत रास दोउ रस-राशि, विचित्र सुरंग कलानि में माई।
नई नई भाँति नई गति लेत हैं, निर्त्तंहूँ रीझि तहाँ बलि जाई ।।
कंचन-मंडल में प्रतिबिंबित, अंगनि रूप-तरंगनि झाँई ।
मनौं 'ध्रुव' चंद उभै छबि के बिधु, ऊपर निर्त्तत यौं उर आई ।।27।।
खेलैं मनौ अनुराग के बाग में, बाहु-लता छबि अंसनि दीने ।
चहूँ दिशि राजैं सखीन के वृंद, विचित्र बनाइ सिंगारहि कीने ।।
सारी सुही सब एकहि रंग, फबी पहिरैं कर-कंजन लीने ।
मध्य किशोर-किशोरी बने दोउ, रूप सने 'ध्रुव' रंग में भीने ।।28।।
कवित्त
माधुरी-तरंग रंग उपजत छिन-छिन, रौंम-रौंम प्रति शोभा रही है लुभाइ कैं ।
फूलनि कौं छाँड़ि-छाँड़ि आवत मधुप धाइ, तन की सुबास अति रही बन छाइ कैं ।।
रूप की अनूप कांति कैसैहूँ न कही जात, नख आभा पर चंद गयौ है लजाइकैं ।
हित ध्रुव' पिय मन यहै सोच रहै दिन, ऐसी सुकुमारी क्यौं हूँ देखी न अघाइ कैं ।।29।।
प्यारी जू की भौंहनि की सहज मरोर माँझ, गयौ है मरोर्यौ मन मोहन कौ माई री ।
ऐसै प्रेम रस लीन तिलहू तें भये छीन, जैसैं जल बिन कंज रहै मुरझाइ री ।।
धीरज न नेक धरैं नैना नेह-नीर ढरैं, बिवस पगनि ओर ढरयौ शीश जाइ री।
व्याकुल बिहारी लाल चितै अंक भरे बाल, पाये प्रान तब 'ध्रुव' मृदु मुसिकाइ री।।30।।
नागरी नवल गुन सींव सब अंगनि में, तेई भाइ जानिबे कौं नागर प्रवीन हैं।
रूप अरु यौबन की जैसीयै गरूरताई, तैसै उत रसिक शिरोमनि अधीन हैं ।।
नैंकु मुरि बैठैं जब व्याकुल है जात तब, सहजहि गति ऐसी जैसैं जल मीन हैं।
रंच हँसि चाहत ही रौंम-रौंम होत फूल, 'हित ध्रुव' नेह जहाँ सदाईं नवीन है ।।31।।
प्रेम की तरंगनि में प्यारी जू कौ मन पर्यौ, कछुक रुखाई छबि औरै भाँति भई है ।
मान पिय मानि लीन्हौं हियौ गहवर दीन्हौं, दीरघ उसाँस लेत भूलि सुधि गई है ।।
प्राण प्यारे लाल जू की गति हेरि फेरि मन, उर सौं रही है लाइ आँखें भरि लई है ।
हित ध्रुव' दुहुँनि कौ प्रेम कैसैं कह्यौ जात, जानत हैं वेई छिन छिन प्रीति नई है ।।32।।
जौलौं प्यारी बतराति चितै- चितै मुसिकाति, पिय हिय लपटात तौही लगि शांति है ।
प्रेम नेम में प्रवीन याही रस भये लीन, जैसैं जल माहिं मीन प्यारौ ऐसी भाँति है ।।
रुचि ही की बेलि नई नैननि में आनि बई, बाढ़त है रस मई फैली अति जाति है।
आनँद के फूल ताहि लागे अनुराग पागे, छिनछिन डहडहे और 'ध्रुव' कांति है।।33।।
जहाँ-जहाँ पग धरैं माधुरी कौ मन हरैं, रूप गुन पाछैं फिरैं ऐसै सुकुमार री ।
हाव-भाव सिंधु के तरंग उठैं अंग-अंग, नेकुही की चितवनि मोहे कोटि मार री ।।
छिन-छिन नई-नई पानिप अनूप कांति, देखैं तन झलकाति रहै न सँभार री ।
हित ध्रुव' चित-चोर नवल रँगीली जोर, निसि दिन सखियनि कीने उर हार री ।।34।।
लाड़िली रंग भरी सुकुमारी, सिंगार सखीनि अनूप कर्यौ है ।
रैन बढ्यौ 'ध्रुव' रंग कौ खेल, महा सुख में रस-सिंधु तर्यौ है ।।
रहे छुटि बार टूटी लर हार, सु अंग कौ अंगनि रंग ढर्यौ है ।
मैंन रची फुलवारि में मानहुँ, प्रेम कौ वारन आन पर्यौ है ।।35।।
सोरठा
फूल सौं जब मुसिकाति, चितै लाड़िली लाल तन ।
को बरनै यह भाँति, प्रीतम हूँ रहे भूलि तहाँ ।।36।।
सवैया
मैंन की बेलि बढ़ी पिय हीय में फूल मनोरथ बाढ़े अपारा ।
एकहि रंग सुरंग रहे दिन सीच्यौ करैं रस प्रेम की धारा ।।
रीझि कै चाहि रही सुकुमारी बिहारी किये अपने उर हारा।
देखत ही 'ध्रुव' या छबि कौं शिर नाइ लजाइ गये शत मारा ।।37।।
कवित्त
नवल-नवेली हेली अलबेली भाँति दोउ, रस-केलि सहजहि रंग भरे करहीं ।
बदन-बदन जोरैं मिलि रही नैन-कोरैं, थोरे-थोरे बेसरि के मोती थरहरहीं ।।
आरस में अरसानी छबि न परै बखानी, प्यार सौं लटकि प्यारे पिय पर ढरहीं ।
हित ध्रुव' सखिनि की जीवनि है यहै सुख, रुख लियैं दुहुँनि कौ मन अनुसरहीं ।।38।।
सवैया
कही न परै मुख की छबि पानिप, राजत आज रँगीली विहारिनि ।
भूलि रहे बिसरी सुधि देह की, मैन-मनोरथ बाढ़े अपारनि ।।
मोह के सिंधु परे मन मोहन, हेरत-नेह-नवेली निहारनि ।
लिये 'ध्रुव' हेत सौं लाइ हियैं पिय, देखि सखी सुकुमारी सँभारनि ।।39।।
कवित्त
प्रेम के खिलौना दोऊ खेलत हैं प्रेम-खेल, प्रेम-फूल फूलनि सौं प्रेम-सेज रची है ।
प्रेम ही की चितवनि मुसकनि प्रेम ही की, प्रेम रँगी बातैं करैं प्रेम-केलि मची है ।।
प्रेम के तरंगनि में प्रीतम परे हैं दोऊ, प्रेम प्यार-भार प्यारी पिय-हिय लची है ।
हित ध्रुव' प्रेम भरी प्यारी सखी देखैं खरी, हित-चितवनि छबि आनि उर सची है ।।40।।
प्यारी जू की उनहार पिय के अहार यहै, हियहू को हार छिन चित तें न टारहीं ।
अंग की सुवास पर भ्रमत भँवर मन, लोचन छबीली जू की छबि ही निहारहीं ।।
पल-पल पानिप तरंग-रंग औरै और, माधुरी सुभाइन की अमित अपारहीं ।
हित ध्रुव' प्रेम-रस-बिवस रहत दिन, चितै-चितै मुख ओर प्रानन कौं वारहीं ।।41।।
आज की छबीली छबि-छटा चित वेधि रही, कही नहीं जाति कछू औरै गति भई है ।
नवल युगल-हाँस चितवति ठाढ़ी पास, मानौं तेहि ओर नई नेह बेलि बई है ।।
हित ध्रुव' नीरज से नीर भरे ढरैं नैन, बोलत न कछू बैन चित्र सी ह्वै गई है।
नैंना छाइ लीन्हें रूप परी तब प्रेम कूप, बाकी गति जानै सोई जेहि अनभई है ।।42।।
सवैया
आलिन-प्रानन की मनौं मूरति, लाड़िली-लाल बनाइ सँवारै ।
जीवति हैं सब देखि दुहूँनि कौं, राखतिं ज्यौं अखियाँनि में तारै ।।
खान रु पान बिलास-बिनोद, अहार यहै तिनके सुख सारै ।
रूप-बिलास सनेह की सींव, निहारि रहीं ध्रुव नैन न टारै ।।43।।
रूप की राशि किशोर-किशोरी, रँगे रस-केलि निकुंज बिहारा ।
माते अनंग प्रवीन सबै अँग, फूल सिरीषहु ते सुकुमारा ।।
बसौ उर-नैनन में दिन-रैन, नसौ मन के जिते आहिं बिकारा ।
जाँचत बात न और कछु 'ध्रुव' देहु प्रिये रस-प्रेम की धारा ।।44।।
सहज सुभाव पर्यौ नवल किसोरी जू कौ, मृदुता दयालुता कृपालुता की रासि हैं ।
नैंकहू न रिस कहूँ भूलेहूँ न होत सखी, रहत प्रसन्न सदा हियै मुख हाँसि हैं ।।
ऐसी सुकुमारी प्यारे लाल जू की प्रान-प्यारी, धन्य-धन्य-धन्य तेई जे इनके उपासि हैं ।
हित ध्रुव' और सुख जहाँ लगि देखियत, सुनियत तहाँ लगि सबै दुख पासि हैं ।।45।।
सवैया
ऐसी करौ नव लाल रँगीले जू, चित्त न और कहूँ ललचाई।
जे सुख दुक्ख रहे लगि देह सौं, ते मिटि जाँइ औ लोक बड़ाई ।।
संगति-साधु वृंदावन कानन, तौ गुन- गाननि माँझ बिहाई।
छबि-कंज-चरन्न तिहारे बसौ उर, देहु यहै'ध्रुव' कौं ध्रुवताई ।।46।।
शीशफूल सिखि-चंद्रिका, सदा बसौ मन मोर ।
अरु जब चितवति लाड़िली, पिय तन नैननि कोर ।।47।।
इकसत विंस अरु पंच मिलि, भये सवैया आहि ।
मन दै यह श्रृंगार-सत, छिन-छिन प्रति अवगाहि ।।48।।
नव किशोरता माधुरी, एक वैस रस एक ।
या रस बिनु कहियै न कछु, धरियै 'ध्रुव' यह टेक ।।49।।
रस-पति रस-श्रृंगार कौ, यह रस है श्रृंगार ।
धन्य-धन्य तेई जु नर, जिनकै यहै बिचार ।।50।।
सब तें कठिन उपासना, प्रेम-पंथ रस-रीति ।
राई सम जो चलै मन, छूटि जाइ 'ध्रुव' प्रीति ।।51।।
प्रेम-भजन बिन स्वाद नहिं, भजन कहा बिन स्वाद ।
देत प्रान मृग बिवस ह्वै, सुनत कपट कौ नाद ।।52।।
या रस सौं जे रहे रँगि, तिनकी पद-रज लेहु ।
जिन समझी यह बात 'ध्रुव' सुफल करी तिन देहु ।।53।।
भये कवित्त शृंगार के, इकसत अरु पच्चीस ।
दोहनि मिलि सब ठीक भये, इकसत दस चालीस ।।54।।
जै जै श्री शृंगार शत लीला (तृतीय शृंखला) की जै जै श्रीहित हरिवंश
दोहा
अब सुनि तीजी श्रृंखला, रति विलास आनंद ।
तिहि रस मादिक मत्त रहैं, विवि वृंदावन चंद ।।1।।
सवैया
भाँति भली नवकुंज विराजत, राधिका वल्लभ लाल बिहारी ।
प्राननि की मनि प्यारी बिहारिनि, प्यार सौं प्रीतम लै उर धारी ।।
ज्यौं छबि-चंद्रिका चंद के अंक में, बाढ़ी महा छबि की उजियारी ।
सखी चहुँ कोद चकोरी सखी भईं 'ध्रुव', पीवत रूप अनूप सुधारी ।।2।।
केलि करैं सुकुमारी-बिहारी, बढ़ी छबि भारी कही नहिं जाई ।
लालची लाल रँगे रस-बाल, बिलोकि रहे 'ध्रुव' सुंदरताई ।।
पीवत नैंन कटाक्षनि माधुरी, कौतुक एक न कैंहूँ अघाई ।
हित सो हित हेरि लुभाइ रह्यौ, रुचि कौं रुचि देखिकै आप लजाई ।।3।।
भाँति रँगीली छबीली के संग, छबीलौ बन्यौ छबि की निधि माई।
सेज सहानी सुरंग बनी, तिहि ऊपर केलि करैं सुखदाई ।।
हिय सौं हिय लाइ रहे लपटाइ, लसै अँग अंग में अंगनि-झाँई ।
मिलीं हैं 'ध्रुव' द्वै सरिता छबि की, मनौं दीठि तहाँ न कहूँ ठहराई ।।4।।
लाड़िली-लाल बिलास करैं, रचि सेज सुदेश सुरंग सुहाई ।
मंदहि-मंद हँसैं रस मत्त, भरे अनुराग महा छबि पाई ।।
कोक-कलानि की घातिन माँहिं, बिचित्र बिनोद बढ़ावत माई।
सखी चहुँ कोद लतानि लगी, निरखैं 'ध्रुव' प्राननि देत बधाई ।।5।।
गोरी किशोरी की अंगनि काँति, लसै बहु भाँति न जात बखानी ।
रंग कौ रास रच्यौ रति रासि, बिलासी की औधि निकुंजनि रानी ।।
अँसनि-बाहुँ जुरी 'ध्रुव' मंडली, नैननि निर्त्तत रैन विहानी ।
अंचल चीर करैं श्रम जानि कैं, भूषन अंग तेई भये गानी ।।6।।
कवित्त
मदन के रस माँझ मगन बिहार करैं, सुख के प्रवाह माहिं लाल मन भींनौ है।
श्रम-जलकन मुख छबि के समूह मानौं, नैन बैन सैन सर-पंजर सो कीनौ है ।।
कहाँ लौं सँभारैं पिय परे सेज वेसँभारि, लटकत शीश गहि लाइ उर लीनौ है।
हित ध्रुव' परम प्रवीन सब अंगनि में, अधर-अधर जोरि सुधा रस दीनौ है ।।7।।
सरस बिलास साने अंग-अंग लपटानें, आरस में अरसाने नैना न अघाने हैं।
जब-जब छुटि जात फिरि-फिरि लपटात, छांड़ि न सकत सेज ऐसैं ललचाने हैं ।।
उठिबे कौ मन करैं पुनि तेहि रंग ढरैं, घरी एक और जाउ कहि मुसिकाने हैं।
हित ध्रुव' ऐसी भाँति छिन छिन सरसात, जानत न दिन-रैन केतिक विहाने है ।।8।।
भोर कुंज द्वार खरे अंग-अंग रंग भरे, अरुनाई नैननि की बरनी न जाति है।
अधर अंजन लीक फबी है कपोल पीक, बसन पलटि परे सोभा झलकाति है।।
रसमसी अलबेली लटकी है लाल पर, मूँदरी की आरसी निरखि मुसिकाति है।
हित ध्रुव' ऐसी छबि देखत ही रीझि रहे, प्रीतम की अखियाँ तौ क्यौंहू न अघाति है ।।9।।
सवैया
आज की वानिक लाल रँगीले की, मोपै कछू नहिं जात बखानी।
लाड़िली रंग भरी सुकुमारि, रही लपटाइ हियैं अलसानी ।।
रहे छुटि बार न हार सम्हार, बिहार बिनोद में रैन बिहानी।
रूप बिलास सनेह निहारि, सखी हित वारि पियैं 'ध्रुव' पानी ।।10।।
कवित्त
भोर भयैं साँझ ही कौ धोखौ है दुहुँनि मन, सुपनो सो चेत कहैं कहा बात है भई।
ऐंकि हम मिले नाहिं बैठे हैं अबहिं आइ, ऐंकि निशा आज कछु बीच ही तें ह्वै गई ।।
भूषन बसन छूटे देखेँ पुनि समुझत, कौन एक भ्रम दशा उपजी है सुखमई ।
हित ध्रुव' यहै जानैं मिल्यौ अनमिल्यौ मानैं, नैननिं में रुचि ही की प्रेम-बेलि ह्वै बई ।।11।।
नवल रँगीले दोऊ रस में रसीले अति, सहज सुरंग नये नेह अनुरागे हैं।
देखि देखि प्यारी अनदेखी सी लगत मन, निमिषौ न लागै नैंन रैंन सब जागे हैं ।।
चाह भूली चाहि चाहि यद्यपि लड़ैती पाहि, ऐसै प्रेम रंग रस मोद मद पागे हैं।
तेहि सुख की निकाई 'ध्रुव' पै कही न जाई, तृपितौ न आई उर उरजन लागे हैं।।12।।
सवैया
न आदि न अंत विलास करैं दोउ, लाल-प्रिया में भई न चिन्हारी।
नई नई भाँति नई छबि कांति, नई नवला नव नेह विहारी ।।
रहे मुख चाहि दियें चित आहि, परे रस प्रीति सु सर्वसु हारी ।
रहें इक पास करैं मृदु हास, सुनौ 'ध्रुव' प्रेम अकत्थ कथारी ।।13।।
दोहा
नवल कुँवर दोउ रसिक-मनि, उपमा दीजै कौन ।
चितै- चितै मुख-माधुरी, ह्वै रहिये 'ध्रुव' मौन ।।14।।
सवैया
पाग सुरंग बनी है छबीली के, भाँति अनूप सखीन बनाई ।
त्यों पर्यौ मन लाल कौ प्रेम के पेंच में, देखत पेंच रहे हैं लुभाई ।।
बैंदी जराव की भाल दियैं, अरु नैंनन अंजन रेख सुहाई ।
तैसोई नत्थ कौ मोती बन्यौ, छबि छाइ रही न कही 'ध्रुव' जाई ।।15।।
चूँदरी लाल सुरंग छबीली की, ओढ़ैं छबीलौ महा छबि पाई।
केशन गूँथि रची रुचि माँग रु, नैननि अंजन रेख बनाई ।।
बैंदी दई हँसि लाड़िली रंग सौं, बेसरि लै अपनी पहिराई ।
रूप बढ्यौ मन मोद चढ्यौ, 'ध्रुव' देखत नैन निमेष भुलाई ।।16।।
पाग जँगाली बनी है किशोरी कैं, केशर रंग किसोर के माई।
बैंदी मृगमद सोहै इतै, उत लाल रसाल अनूप बनाई ।।
बेसरि नत्थ बनी झलकैं 'ध्रुव', खोजि रह्यौ उपमा नहिं पाई ।
रूप-तरंग चितै मन मोद, सखी चहुँ कोद रही हैं लुभाई ।।17।।
चूँनरी लाल बनी है बिहारी कैं, पाग बिहारिनि के सिर सोहै ।
छके नव नेह महा रस मेह, छकै सखी आइ जोई छबि जोहै ।।
बेसरि पीय कैं नत्थ सुतीय कैं, बानिक रूप अनूपम मोहै ।
भाँति रँगीली कही न परै सखि, या छबि की उपमा कहौ को है।।18।।
कवित्त
प्यारी जू की सारी अति प्यारी लागै प्रीतम कौं, सौंधे भींजी अँगिया सुरंग उर धारी है ।
नवल रँगीलीजू के भूषन बिहारीलाल, पहिरत बाढ़ी फूल जात ना सँभारी है ।।
जोई कछु प्रिया जू के अंगनि परस होत, सोई प्रान जात होत ऐसी प्यारी प्यारी है ।
हित ध्रुव' प्रेम बात कैसैहूँ न कही जात, जानै सोई जिहि शिर मोहिनी सी डारी है ।।19।।
सवैया
उज्वल स्याम सुरंग सुहावनी, लाज भरी अँखिया अति सोहैं ।
प्रेम भरी रस भाइ भरी 'ध्रुव', प्यार भरी पिय की दिशि जोहैं ।।
बढ्यौ अनुराग सुरंग सुहाग, सबै अँग प्रीतम प्राननि मोहैं।
लई छबि छीनि प्रवीन बिहारिनि, खंजन मीन कुरंगनि कोहैं ।।20।।
कवित्त
खेलत बसंत होरी नवल छबीली जोरी, उड़त गुलाल अनुराग कौ सुरंग री।
मृदु मुसकानि उर फूल एई फूल भये, हाव-भाव सौंधे भींजे सोहैं अँग-अंग री ।।
नैननिं की चितवनि छिरकनि प्रेम-नीर, सींचत हैं पिय-हिय भरी रस-रंग री ।
हित ध्रुव' भींजे सुख बारिध विलास हाँस, सोई सुख देखैं सखी दिनहिं अभंग री ।।21।।
सवैया
खेलत फाग भरे अनुराग सौं, लाड़िली-लाल महा अनुरागी ।
तैसियै संग सखी सुठि सोहनी, प्रेम सुरंग सुधा-रस पागी ।।
चलैं पिचकारी चितौन छबीली की, प्रीतम के उर अंतर लागी ।
रंग कौ ओर न छोर सनेह कौ, देखि सबै उपमा 'ध्रुव' भागी ।।22।।
सखीन की मंडली मध्य जु खेलत, रंग बिहारिनि संग बिहारी ।
लै नव कुंकुम रंगनि छींटत, बंदन डारत नैन सँभारी ।।
परै तहीं बूँद जहीं जहीं चाहियै, ऐसै प्रवीन सिंगार सिंगारी ।
बढ्यौ 'ध्रुव रंग तरंग अनंग, सनेह की राशि रहै हैं निहारी ।।23।।
लाड़िली-लाल निकुंज में खेलत, आनँद प्रेम बिलास की होरी ।
हैं अंखियाँ पिचकारी भरी 'ध्रुव', प्यार सौं छाँड़त प्रीतम गोरी ।।
मैन कौ खेल बढ्यौ सुख पुंज, बजै धुनि भूषन थोरी ही थोरी ।
भयौ छबि कौ छिरकाव मनौं, जब साँवरे ओर हँसी मुख मोरी ।।24।।
कवित्त
हंसजा बिमल नीर सुंदर सुदेश तीर, निर्त्तत मयूरी-मोर आनँद अधीर री ।
कमल निकुंज कुंज मधुपनि होत गुंज, बरसत सुख-पुंज रटैं पिक-कीर री ।।
खेलैं तहाँ रस-राशि बिविध बिनोद हास, सुरँगित भये 'ध्रुव' अंगनि के चीर री ।
बंदन डारत प्यारी छिरकैं लाल बिहारी, रंगनि की बूँदें बनीं सुभग शरीर री।।25।।
दोहा
खेलत कामिनि-कंत, भीनें रँग अनुराग में ।
अद्भुत रास-बसंत, छबिहू तहँ भूली फिरै ।।26।।
सवैया
खेलत रास दोउ रस-राशि, विचित्र सुरंग कलानि में माई।
नई नई भाँति नई गति लेत हैं, निर्त्तंहूँ रीझि तहाँ बलि जाई ।।
कंचन-मंडल में प्रतिबिंबित, अंगनि रूप-तरंगनि झाँई ।
मनौं 'ध्रुव' चंद उभै छबि के बिधु, ऊपर निर्त्तत यौं उर आई ।।27।।
खेलैं मनौ अनुराग के बाग में, बाहु-लता छबि अंसनि दीने ।
चहूँ दिशि राजैं सखीन के वृंद, विचित्र बनाइ सिंगारहि कीने ।।
सारी सुही सब एकहि रंग, फबी पहिरैं कर-कंजन लीने ।
मध्य किशोर-किशोरी बने दोउ, रूप सने 'ध्रुव' रंग में भीने ।।28।।
कवित्त
माधुरी-तरंग रंग उपजत छिन-छिन, रौंम-रौंम प्रति शोभा रही है लुभाइ कैं ।
फूलनि कौं छाँड़ि-छाँड़ि आवत मधुप धाइ, तन की सुबास अति रही बन छाइ कैं ।।
रूप की अनूप कांति कैसैहूँ न कही जात, नख आभा पर चंद गयौ है लजाइकैं ।
हित ध्रुव' पिय मन यहै सोच रहै दिन, ऐसी सुकुमारी क्यौं हूँ देखी न अघाइ कैं ।।29।।
प्यारी जू की भौंहनि की सहज मरोर माँझ, गयौ है मरोर्यौ मन मोहन कौ माई री ।
ऐसै प्रेम रस लीन तिलहू तें भये छीन, जैसैं जल बिन कंज रहै मुरझाइ री ।।
धीरज न नेक धरैं नैना नेह-नीर ढरैं, बिवस पगनि ओर ढरयौ शीश जाइ री।
व्याकुल बिहारी लाल चितै अंक भरे बाल, पाये प्रान तब 'ध्रुव' मृदु मुसिकाइ री।।30।।
नागरी नवल गुन सींव सब अंगनि में, तेई भाइ जानिबे कौं नागर प्रवीन हैं।
रूप अरु यौबन की जैसीयै गरूरताई, तैसै उत रसिक शिरोमनि अधीन हैं ।।
नैंकु मुरि बैठैं जब व्याकुल है जात तब, सहजहि गति ऐसी जैसैं जल मीन हैं।
रंच हँसि चाहत ही रौंम-रौंम होत फूल, 'हित ध्रुव' नेह जहाँ सदाईं नवीन है ।।31।।
प्रेम की तरंगनि में प्यारी जू कौ मन पर्यौ, कछुक रुखाई छबि औरै भाँति भई है ।
मान पिय मानि लीन्हौं हियौ गहवर दीन्हौं, दीरघ उसाँस लेत भूलि सुधि गई है ।।
प्राण प्यारे लाल जू की गति हेरि फेरि मन, उर सौं रही है लाइ आँखें भरि लई है ।
हित ध्रुव' दुहुँनि कौ प्रेम कैसैं कह्यौ जात, जानत हैं वेई छिन छिन प्रीति नई है ।।32।।
जौलौं प्यारी बतराति चितै- चितै मुसिकाति, पिय हिय लपटात तौही लगि शांति है ।
प्रेम नेम में प्रवीन याही रस भये लीन, जैसैं जल माहिं मीन प्यारौ ऐसी भाँति है ।।
रुचि ही की बेलि नई नैननि में आनि बई, बाढ़त है रस मई फैली अति जाति है।
आनँद के फूल ताहि लागे अनुराग पागे, छिनछिन डहडहे और 'ध्रुव' कांति है।।33।।
जहाँ-जहाँ पग धरैं माधुरी कौ मन हरैं, रूप गुन पाछैं फिरैं ऐसै सुकुमार री ।
हाव-भाव सिंधु के तरंग उठैं अंग-अंग, नेकुही की चितवनि मोहे कोटि मार री ।।
छिन-छिन नई-नई पानिप अनूप कांति, देखैं तन झलकाति रहै न सँभार री ।
हित ध्रुव' चित-चोर नवल रँगीली जोर, निसि दिन सखियनि कीने उर हार री ।।34।।
लाड़िली रंग भरी सुकुमारी, सिंगार सखीनि अनूप कर्यौ है ।
रैन बढ्यौ 'ध्रुव' रंग कौ खेल, महा सुख में रस-सिंधु तर्यौ है ।।
रहे छुटि बार टूटी लर हार, सु अंग कौ अंगनि रंग ढर्यौ है ।
मैंन रची फुलवारि में मानहुँ, प्रेम कौ वारन आन पर्यौ है ।।35।।
सोरठा
फूल सौं जब मुसिकाति, चितै लाड़िली लाल तन ।
को बरनै यह भाँति, प्रीतम हूँ रहे भूलि तहाँ ।।36।।
सवैया
मैंन की बेलि बढ़ी पिय हीय में फूल मनोरथ बाढ़े अपारा ।
एकहि रंग सुरंग रहे दिन सीच्यौ करैं रस प्रेम की धारा ।।
रीझि कै चाहि रही सुकुमारी बिहारी किये अपने उर हारा।
देखत ही 'ध्रुव' या छबि कौं शिर नाइ लजाइ गये शत मारा ।।37।।
कवित्त
नवल-नवेली हेली अलबेली भाँति दोउ, रस-केलि सहजहि रंग भरे करहीं ।
बदन-बदन जोरैं मिलि रही नैन-कोरैं, थोरे-थोरे बेसरि के मोती थरहरहीं ।।
आरस में अरसानी छबि न परै बखानी, प्यार सौं लटकि प्यारे पिय पर ढरहीं ।
हित ध्रुव' सखिनि की जीवनि है यहै सुख, रुख लियैं दुहुँनि कौ मन अनुसरहीं ।।38।।
सवैया
कही न परै मुख की छबि पानिप, राजत आज रँगीली विहारिनि ।
भूलि रहे बिसरी सुधि देह की, मैन-मनोरथ बाढ़े अपारनि ।।
मोह के सिंधु परे मन मोहन, हेरत-नेह-नवेली निहारनि ।
लिये 'ध्रुव' हेत सौं लाइ हियैं पिय, देखि सखी सुकुमारी सँभारनि ।।39।।
कवित्त
प्रेम के खिलौना दोऊ खेलत हैं प्रेम-खेल, प्रेम-फूल फूलनि सौं प्रेम-सेज रची है ।
प्रेम ही की चितवनि मुसकनि प्रेम ही की, प्रेम रँगी बातैं करैं प्रेम-केलि मची है ।।
प्रेम के तरंगनि में प्रीतम परे हैं दोऊ, प्रेम प्यार-भार प्यारी पिय-हिय लची है ।
हित ध्रुव' प्रेम भरी प्यारी सखी देखैं खरी, हित-चितवनि छबि आनि उर सची है ।।40।।
प्यारी जू की उनहार पिय के अहार यहै, हियहू को हार छिन चित तें न टारहीं ।
अंग की सुवास पर भ्रमत भँवर मन, लोचन छबीली जू की छबि ही निहारहीं ।।
पल-पल पानिप तरंग-रंग औरै और, माधुरी सुभाइन की अमित अपारहीं ।
हित ध्रुव' प्रेम-रस-बिवस रहत दिन, चितै-चितै मुख ओर प्रानन कौं वारहीं ।।41।।
आज की छबीली छबि-छटा चित वेधि रही, कही नहीं जाति कछू औरै गति भई है ।
नवल युगल-हाँस चितवति ठाढ़ी पास, मानौं तेहि ओर नई नेह बेलि बई है ।।
हित ध्रुव' नीरज से नीर भरे ढरैं नैन, बोलत न कछू बैन चित्र सी ह्वै गई है।
नैंना छाइ लीन्हें रूप परी तब प्रेम कूप, बाकी गति जानै सोई जेहि अनभई है ।।42।।
सवैया
आलिन-प्रानन की मनौं मूरति, लाड़िली-लाल बनाइ सँवारै ।
जीवति हैं सब देखि दुहूँनि कौं, राखतिं ज्यौं अखियाँनि में तारै ।।
खान रु पान बिलास-बिनोद, अहार यहै तिनके सुख सारै ।
रूप-बिलास सनेह की सींव, निहारि रहीं ध्रुव नैन न टारै ।।43।।
रूप की राशि किशोर-किशोरी, रँगे रस-केलि निकुंज बिहारा ।
माते अनंग प्रवीन सबै अँग, फूल सिरीषहु ते सुकुमारा ।।
बसौ उर-नैनन में दिन-रैन, नसौ मन के जिते आहिं बिकारा ।
जाँचत बात न और कछु 'ध्रुव' देहु प्रिये रस-प्रेम की धारा ।।44।।
सहज सुभाव पर्यौ नवल किसोरी जू कौ, मृदुता दयालुता कृपालुता की रासि हैं ।
नैंकहू न रिस कहूँ भूलेहूँ न होत सखी, रहत प्रसन्न सदा हियै मुख हाँसि हैं ।।
ऐसी सुकुमारी प्यारे लाल जू की प्रान-प्यारी, धन्य-धन्य-धन्य तेई जे इनके उपासि हैं ।
हित ध्रुव' और सुख जहाँ लगि देखियत, सुनियत तहाँ लगि सबै दुख पासि हैं ।।45।।
सवैया
ऐसी करौ नव लाल रँगीले जू, चित्त न और कहूँ ललचाई।
जे सुख दुक्ख रहे लगि देह सौं, ते मिटि जाँइ औ लोक बड़ाई ।।
संगति-साधु वृंदावन कानन, तौ गुन- गाननि माँझ बिहाई।
छबि-कंज-चरन्न तिहारे बसौ उर, देहु यहै'ध्रुव' कौं ध्रुवताई ।।46।।
शीशफूल सिखि-चंद्रिका, सदा बसौ मन मोर ।
अरु जब चितवति लाड़िली, पिय तन नैननि कोर ।।47।।
इकसत विंस अरु पंच मिलि, भये सवैया आहि ।
मन दै यह श्रृंगार-सत, छिन-छिन प्रति अवगाहि ।।48।।
नव किशोरता माधुरी, एक वैस रस एक ।
या रस बिनु कहियै न कछु, धरियै 'ध्रुव' यह टेक ।।49।।
रस-पति रस-श्रृंगार कौ, यह रस है श्रृंगार ।
धन्य-धन्य तेई जु नर, जिनकै यहै बिचार ।।50।।
सब तें कठिन उपासना, प्रेम-पंथ रस-रीति ।
राई सम जो चलै मन, छूटि जाइ 'ध्रुव' प्रीति ।।51।।
प्रेम-भजन बिन स्वाद नहिं, भजन कहा बिन स्वाद ।
देत प्रान मृग बिवस ह्वै, सुनत कपट कौ नाद ।।52।।
या रस सौं जे रहे रँगि, तिनकी पद-रज लेहु ।
जिन समझी यह बात 'ध्रुव' सुफल करी तिन देहु ।।53।।
भये कवित्त शृंगार के, इकसत अरु पच्चीस ।
दोहनि मिलि सब ठीक भये, इकसत दस चालीस ।।54।।
जै जै श्री शृंगार शत लीला (तृतीय शृंखला) की जै जै श्रीहित हरिवंश
17. मन शृंगार लीला
दोहा
(श्री) हरिवंश-हंस आवत हिये, होत जु अधिक प्रकास ।
अद्भुत आनँद प्रेम कौ, फूलै कमल बिलास ।।1।।
नवल किशोरी सहजहीं, झलकति सहजहि जोति ।
उपमा दै बरनौं तिनहिं, यह ढीठौ अति होति ।।2।।
रूप-रंग कौ सार तन, सार-माधुरी अंग ।
चंद-सार कौ मोद मुख, कांति-सार कौ रंग ।।3।।
ललित लड़ैती कुँवरि कौ, बरनौं कछु इक रूप ।
पिय तन-मन जो पूरि रह्यौ, मोहन सहज सरूप ।।4।।
अतिहि सोहनी मोहनी, पिय-मन सुख की सींव ।
उपमा सब सेवतिं तिनहीं, कीन्हें नीची ग्रीव ।।5।।
नवल छबीली बदन मनौं, आनँद मोद कौ फूल ।
इक रस फूल्यौ रहत दिन, पिय-तन यमुना-कूल ।।6।।
कुंडल - दुति अरु मुख-प्रभा, राजत ऐसी भाँति ।
झलमलात मिलि एक ठाँ, मनौं रवि शशि की कांति ।।7।।
चिकुर चंद्रिका रचि रुचिर, रची मनोहर बानि ।
मनौं घटा श्रृंगार की, जुरी चंद पर आनि ।।8।।
लटकनि बैनी की ललित, फूलनि गुही सुढार ।
मनौं हासि युत मेरु तें, उतरति रविजा-धार ।।9।।
शीश-फूल रह्यौ झलकि कै, तैसियै मांग सुरंग ।
मानौं छत्र सुहाग कौ, लियै अनुरागहि संग ।।10।।
निरखि अरुन बैंदी छबिहि, मति की गति भई मूक ।
मानौं विधु पूज्यौ सखिन, आनि फूल बंधूक ।।11।।
बंक- भृकुटि कल सोहनी, अलक जुरी तहँ आनि ।
मानौं पिय मन-मीन कौं, बनसी राखी बानि ।।12।।
लोइनि तौं स्रवननि लगे, बिबि कुंडल झलकात ।
मनौं कंज हित जानि कैं, पूछन गये कछु बात ।।13।।
अंजन युत चंचल चपल, अंचल में न समाहिं ।
अति विशाल उज्जवल सुरँग, चुभे लाल मन माहिं ।।14।।
सहजहिं सूच्छम अलक छुटि, परी पलक पर आइ ।
खँजन मीन मनु ग्रहन कौ, विधु दई पाशि चलाइ ।।15।।
श्रवननि छबि ताटंक दुति, रहि गंडनि झलकाइ ।
मनौं भान आभा परी, कंज-दलनि पर आइ ।।16।।
कहि न सकत नासा बनक, अधर सुरंग निहारि ।
मानौं शुक झुकि छकि रह्यौ, मन में कछू विचार ।।17।।
बेसर की थरहरनि छबि, मीनरका मनु ऐंन ।
पिय-हित-हृदि में मीन, मन ताकौं चितवन लैंन ।।18।।
अरुन श्याम उज्वल दसन, अति छबि सौं झलकाहिं ।
कंज में अलि मुक्तन सहित, मनु रँगे बंदन माहिं ।।19।।
शोभा-निधि वर चिबुक पर, श्याम बिंदु सुख देत ।
रहि गयौ अलि शावक मनौं, कंज कली रस हेत ।।20।।
नील बिंदु उपमा दुतिय, कहा कहौं अतिहिं अनूप ।
मानौं पिय मन विवस ह्वै, पर्यौ आनि छबि-कूप ।।21।।
द्वै लर मोतिनु कंठ बनी, डारी सब छबि निंद ।
मानौं पूरन चंद पर प्रगट्यौ दुतिया इंद ।।22।।
जलज-हार हीरावली, बिच-बिच मनि झलकाहिं ।
मानौं मैंन तरंग उठैं, रूप-सरोवर माहिं ।।23।।
रतन खचित चौकी ललित, जगमग जगमग होति ।
बिबि गिरि-कंचन बीच मनु, छबि-रवि कियौ उदोति ।।24।।
भूषन युत मृदु भुजन कौं, निरखि लाल रहे भूलि ।
मानौं छबि की लता द्वै, फूलनि सौं रहीं फूलि ।।25।।
उरज पीन कटि छीन छबि नव किशोर रहै चाहि ।
मानौं आनँद बेलि सौं, लागे सुख-फल आहि ।।26।।
आई उपमा और उर, बस किये मोहन मैन ।
मुँदे कंज देखत मनौं, खुले कमल पिय नैन ।।27।।
अति सुंदर अँगिया बनी, सौंधे सनी सुरंग ।
पिय मन अलि तहाँ भ्रमत रहै, तजत न कबहूँ संग ।।28।।
नीलांबर छबि फबि रही, मन में रहत विचार ।
मानौं सार शृंगार कौ, ओढ़े वर सुकुमार ।।29।।
सारी पीरी जरकसी, झलकत छबि सौं जोति ।
कुन्दन की वरषा मनौं, कालिंदी पर होति ।।30।।
जब सुरंग सारी सुही, पहिरति भरी सुहाग ।
अंतर भरि मनु उमगि कै, प्रगट्यौ पिय-अनुराग ।।31।।
राजत सुंदर उदर पर, अद्भुत रेखा तीन ।
देखत सींवा रूप की, ललन भये आधीन ।।32।।
शोभित नाभि गंभीर ढिंग, रोमावलि अनुसार ।
मानौ निकसी कमल तें, सूच्छम रेख शृंगार ।।33।।
पृथु नितंब ऊपर बनी, मणिमय किंकिनि-जाल ।
फिरि आई चहुँ ओर मनु, छबि-दीपन की माल ।।34।।
अति सुढ़ार सुठि सुमिलि बनी, मणिमय जेहरि चारु ।
चलन छबीली भाँति पर, मत्त मरालनि वारु ।।35।।
पायल नूपुर की झनक, होति है मंदहि-मंद ।
मनु सावक कल हंस के, बोलत भरे आनंद ।।36।।
चरन कमल कोमल सुरंग, मधुप लाल मन मंत।
दृग कंजनि छ्वावत रहत, कर कमलनि सेवंत ।।37।।
मैंहदी कौ रँग फबि रह्यौ, नख-मणि झलक अपार ।
मनौं चंद कमलनि मिले, रही न और सँभार ।।38।।
करि श्रृंगार दियौ डीठि डर, श्यामल बिंदु कपोल ।
मुसिकनि छबि बदलै मनौं, राख्यौ पिय-मन ओल ।।39।।
अपुनौ जश कछु रुचत नहिं ऐसी लाल की बात ।
प्रान-प्रिया गुन सुनत ही, अमित करनि है जात ।।40।।
सब अँग अद्भुत भाँति कोउ, सहज रूप की खानि ।
एती मति मोपै कहाँ, नख- छबि सकौं बखानि ।।41।।
उपमा तौ सब जे कहीं, ऐसी चित्त विचार ।
जैसै दिनकर पूजियै, आगे दीपक बार ।।42।।
रूप-माधुरी सहजहीं, झलकत नये तरंग ।
उपमा हूँ सब सुफल भईं, बड़ी ठौर के संग ।।43।।
याही तें कछु इक कही, पाइ बात कौ फेरि ।
जैसै रति इक हेम तें, समुझे सोभा- मेरि ।।44।।
अंग-अंग मृदु माधुरी, अतिहि रसीली आहि ।
तैसे मधुर किशोर पिय, जीवत तिनकौं चाहि ।।45।।
ललित लड़ैती कुँवरि बिनु, और न कछुक सुहाइ ।
नेक नैंन की कोर कैं, लीनौं चित्त चुराइ ।।46।।
अमित कोटि ब्रह्माण्ड की, प्रभुता मन लगी थोर ।
कर जोरैं चितवत रहैं, बंक दृगनि की कोर ।।47।।
देखौ बल या प्रेम कौ, सर्वस लीन्हों छीन ।
महामोहन गज-मत्त पिय, बिनु अकुंश बस कीन ।।48।।
अखिल लोक की साहिबी, दीन्हीं तृण ज्यौं डारि ।
छिन-छिन प्रति सेवा करै, रहै अपनपौ हारि ।।49।।
पानी पान श्रृंगार सब, करत आपने हाथ ।
बँधे जु प्रेम अनंग गुन, फिरत प्रिया के साथ ।।50।।
प्रेम-खेल ऐसैं भयौ, जैसैं खेलत यूप ।
तन मन धन सब हारि कैं, भये दीन रस-भूप ।।51।।
नव किशोर के प्रेम की, बात कही नहिं जाइ ।
सहचरि जे निज कुँवरि की, तिनके परत हैं पाँइ ।।52।।
नैन-सैन चितवनि चपल, मन मुक्ता छबि ऐंन ।
सखी सबै मनु हंसिनी, चुगत हैं भरि भरि नैन ।।53।।
पिय की प्रीति की रीति सुनि, हीये होत हुलास ।
दासी जहँ लगि प्रिया की, ह्वै रहे तिनके दास ।।54।।
अब सुनि प्यारे लाल की, छबिहि नाहिने ओर ।
बँधे लाड़िली प्रेम सौं, ऐसै रसिक किशोर ।।55।।
कुँवर माधुरी रूप की, सोऊ कहत बनैन ।
घटि बढ़ि कहे न जात हैं, जैसै दोऊ नैन ।।56।।
मोहन के मोहन सबै अंग रहे झलकाइ ।
नेक चितै मुख-माधुरी, मैंन गिरत मुरझाई ।।57।।
प्रथमहि प्रियाहि शृंगार के, पिय कौ करहिं श्रृंगार ।
शोभा उभय निहारि सखि, करतिं प्रान बलिहार ।।58।।
इक रस रूप समान वय, दंपति नवल किशोर ।
नख-शिख बानिक एक सी, छैल-छबीली जोर ।।59।।
द्वै मूरति श्रृंगार की, पुनि कीनौं श्रृंगार ।
मिले रूप के सिंधु द्वै, अब को पावै पार ।।60।।
अब सुनि रंग बिहार की, बात न कबहुँ अघात ।
इक रस प्रेम छके रहैं, और न कछू सुहात ।।61।।
ललित रँगीली सेज पर, ललित रँगीले लाल ।
राजत अद्भुत भाँति सौं, संग छबीली बाल ।।62।।
लाल-वल्लभा लाड़ली, नवल छबीली भाँति ।
प्रेम प्यार के चाइ सौं, प्रीतम उर लपटाति ।।63।।
सब अँग सुदंरि सोहनी, रूप-राशि सुकुमारि ।
महा मोहन-गज मोहनी, बस किये नैंकु निहारि ।।64।।
लाल रँगीली संग रँग, करत विनोद अनंग ।
कबहुँ बात हँसि जात बिच, कबहूँ भरत उछंग ।।65।।
कबहूँ कुच-कमलनि छुवत, भौंह भंग ह्वै जात ।
अति प्रवीन रस खेल में, चूकत नहिं कोऊ घात ।।66।।
अंत लाल पाँइनि परत, मृदु मुख हा-हा खात ।
ऐसैं वचनन सहचरी, सुनि-सुनि सब बलि जात ।।67।।
विविध भाँति रति-केलि रँग, छिन छिन औरै और।
करत रँगीले लाल दोउ, परम रसिक शिरमौर ।।68।।
कमल-कपोलनि पर कछू, लागी पीक सुरंग ।
मनौं छलक अनुराग की, उछरि परी छबि संग ।।69।।
अरिल्ल
बाढ़ी अतिही चौंप न उरहि समात है ।
समझि लाड़िली ताहि हियैं लपटात है ।।
नवल रँगीली केलि छबीली भाँति है ।
पुनि हाँ तिनके रस की बात कही क्यौं जाति है ।।70।।
दोहा
तन तौ सिंधु है रूप कौ, लाल नैन जल-मीन ।
खेलत तहँ आनंद सौं, नाभि भँवर घर कीन ।।71।।
कुंज-कुंज प्रति द्रुमनि तर, करैं विलास सुख झेलि ।
फैली वृदांविपिन में, बेलि रंग-रति-केलि ।।72।।
ताके लागे फूल द्वै, कोमल सुरँग सुवास ।
ईषद मुसिकनि सहज की, करत मंद मृदु हास ।।73।।
पुनि फल उरजनि सौं लगे, प्रीतम कर छबि देत ।
मानौं कुंदन घटनि कौं, नील कमल ढँकि लेत ।।74।।
छबि-निधि दुलहिनि नायिका, नायक रूप निधान ।
प्रेम रंग तन मन रँगे, ह्वै रहे एकै प्रान ।।75।।
ललित कुँवरि वरनौं कहा, नख-शिख रूप अपार ।
नैन-कोर पाछैं लगे, फिरत रसिक सुकुँवार ।।76।।
मन अटक्यौ छबि अलक सौं, नैन बदन-तन-रंग ।
श्रवन लगे बैंनन मधुर, नासा सौरभ अंग ।।77।।
अंग-अंग पिय के सबै, परे प्रेम के फंद ।
रुचि लै मुख जोवत रहैं, श्री वृंदावन चंद ।।78।।
भई भीर छबि की तहाँ, और प्रीति उर माहिं ।
पर्यौ लाल मन जाइ तहँ, निकसन पावत नाहिं ।।79।।
अति उदार सुकुमार तन, रसिक शूर शिरमौर ।
नैन-सैन बानन छयौ, छाँड़ी नहिं तउ ठौर ।।80।।
नैन स्रवन नासा अधर, चिबुक रूप की खानि ।
गहि लीन्हौं पिय मन सबनि, सौंप्यौ प्रेम के पानि ।।81।।
अब सुनि फल शृंगार कौ, नवल रंग रस सार ।
दुलहिनि-दूलहु लाल की, रति-बिलास ज्यौंनार ।।82।।
लाज बसन तजि न्हाइ मनु, पानी पानिप माहिं ।
चाह मदन की छुधा बढ़ी, चितै नवल मुसिकाहिं ।।83।।
कुंज रसोई रचि दियौ, चौका सेज बनाइ ।
अति दृढ़ चौकी प्रेम की, तापर बैठे आइ ।।84।।
हार थार बिच झलकि रह्यौ, नाहिंन इंदु समान ।
पहिरैं धोती फूल की, राजत मिथुन सुजान ।।85।।
सुंदर रूचि की खीर भई, मिसरी मुसिकनि थोर ।
डोरा दियौ घृत नेह कौ, स्वादहिं नाहिंन ओर ।।86।।
पुनि फल उरजनि की झलकि, लेत लाल-मन चोर ।
करजनि कै जब छुवत पिय, कछू झुकनि मुख ओर ।।87।।
परिरंभन चुंबन अधर, महा मधुर रस पाइ ।
बीच सलौनी चितवनी, लेत है सुखहिं बढ़ाइ ।।88।।
हाव-भाव लावन्यता, बिंजन अंग निहार ।
उज्जल हाँसि कपूर की, पुट दै रचे सँवारि ।।89।।
भौंह बंक नैननि झुकनि, कर धूननि मुख नेत ।
अद्रक मिरचि अचार ढिंग, ज्यौं रुचि कौ कर देत ।।90।।
नैनन रसना के रसिक, जेंवत तृपति न होइ ।
अद्भुत गति या प्रेम की, कहि न सकत है कोइ ।।91।।
भाजन भूषन अंग दुति, श्रम जल छबिहि न ओर ।
पलक कटोरिनु कै पिवत, श्यामा-श्याम किशोर ।।92।।
बीरी मुख अनुराग की, स्वांस पवन आनंद ।
अति सुवास मृदु हाँस बिच, होत मंद ही मंद ।।93।।
पौढ़े प्रीति प्रजंक पर, ओढ़े प्यार कौ चीर ।
गौर श्याम अंगनि मिले, ज्यौं द्वै धारा नीर ।।94।।
परम रसिक रस राशि दोउ, परे प्रेम के फंद ।
रहत भरे आनंद में, जुग चकोर बिबि-चंद ।।95।।
सखी चकोरी अति सरस द्वै, शशि छबि रस रंग ।
पल-पल पीवतिं दृगन भरि, होत न कबहूँ भंग ।।96।।
‘हित ध्रुव’ सखियन शरन गहि, ऐसै मन अनुसार ।
औरहुँ तिनकौ संग गहि, जिनकै यहै विचार ।।97।।
रचि कीन्ही शृंगार-मनि, जो लै राखी शीश ।
ताके हिय में बसत रहैं, श्री वृंदावन-ईश ।।98।।
जेहैं 'मणि श्रृंगार' की, सब गुन भरि अनुराग ।
पहिरी पिय हिय प्यार सौं, पोइ प्रेम के ताग ।।99।।
अद्भुत सरिता प्रेम की, वृंदावन चहुँ ओर ।
नव-नव रंग तरंग उठैं, मदन पवन झकझोर ।।100।।
ऐसै रसिक किशोर पिय, 'ध्रुव' के हिय में राखि ।
अद्भुत रस की माधुरी, नैननिं रसना चाखि ।।101।।
दोहा कहे श्रृंगार मनि, साठि चौंतिस अरु आठ।
प्रेमा तिहिं उर झलकि रहै, जो करि हैं ध्रुव पाठ ।।102।।
जै जै श्री मन शृंगार लीला की जै जै श्री हित हरिवंश
दोहा
(श्री) हरिवंश-हंस आवत हिये, होत जु अधिक प्रकास ।
अद्भुत आनँद प्रेम कौ, फूलै कमल बिलास ।।1।।
नवल किशोरी सहजहीं, झलकति सहजहि जोति ।
उपमा दै बरनौं तिनहिं, यह ढीठौ अति होति ।।2।।
रूप-रंग कौ सार तन, सार-माधुरी अंग ।
चंद-सार कौ मोद मुख, कांति-सार कौ रंग ।।3।।
ललित लड़ैती कुँवरि कौ, बरनौं कछु इक रूप ।
पिय तन-मन जो पूरि रह्यौ, मोहन सहज सरूप ।।4।।
अतिहि सोहनी मोहनी, पिय-मन सुख की सींव ।
उपमा सब सेवतिं तिनहीं, कीन्हें नीची ग्रीव ।।5।।
नवल छबीली बदन मनौं, आनँद मोद कौ फूल ।
इक रस फूल्यौ रहत दिन, पिय-तन यमुना-कूल ।।6।।
कुंडल - दुति अरु मुख-प्रभा, राजत ऐसी भाँति ।
झलमलात मिलि एक ठाँ, मनौं रवि शशि की कांति ।।7।।
चिकुर चंद्रिका रचि रुचिर, रची मनोहर बानि ।
मनौं घटा श्रृंगार की, जुरी चंद पर आनि ।।8।।
लटकनि बैनी की ललित, फूलनि गुही सुढार ।
मनौं हासि युत मेरु तें, उतरति रविजा-धार ।।9।।
शीश-फूल रह्यौ झलकि कै, तैसियै मांग सुरंग ।
मानौं छत्र सुहाग कौ, लियै अनुरागहि संग ।।10।।
निरखि अरुन बैंदी छबिहि, मति की गति भई मूक ।
मानौं विधु पूज्यौ सखिन, आनि फूल बंधूक ।।11।।
बंक- भृकुटि कल सोहनी, अलक जुरी तहँ आनि ।
मानौं पिय मन-मीन कौं, बनसी राखी बानि ।।12।।
लोइनि तौं स्रवननि लगे, बिबि कुंडल झलकात ।
मनौं कंज हित जानि कैं, पूछन गये कछु बात ।।13।।
अंजन युत चंचल चपल, अंचल में न समाहिं ।
अति विशाल उज्जवल सुरँग, चुभे लाल मन माहिं ।।14।।
सहजहिं सूच्छम अलक छुटि, परी पलक पर आइ ।
खँजन मीन मनु ग्रहन कौ, विधु दई पाशि चलाइ ।।15।।
श्रवननि छबि ताटंक दुति, रहि गंडनि झलकाइ ।
मनौं भान आभा परी, कंज-दलनि पर आइ ।।16।।
कहि न सकत नासा बनक, अधर सुरंग निहारि ।
मानौं शुक झुकि छकि रह्यौ, मन में कछू विचार ।।17।।
बेसर की थरहरनि छबि, मीनरका मनु ऐंन ।
पिय-हित-हृदि में मीन, मन ताकौं चितवन लैंन ।।18।।
अरुन श्याम उज्वल दसन, अति छबि सौं झलकाहिं ।
कंज में अलि मुक्तन सहित, मनु रँगे बंदन माहिं ।।19।।
शोभा-निधि वर चिबुक पर, श्याम बिंदु सुख देत ।
रहि गयौ अलि शावक मनौं, कंज कली रस हेत ।।20।।
नील बिंदु उपमा दुतिय, कहा कहौं अतिहिं अनूप ।
मानौं पिय मन विवस ह्वै, पर्यौ आनि छबि-कूप ।।21।।
द्वै लर मोतिनु कंठ बनी, डारी सब छबि निंद ।
मानौं पूरन चंद पर प्रगट्यौ दुतिया इंद ।।22।।
जलज-हार हीरावली, बिच-बिच मनि झलकाहिं ।
मानौं मैंन तरंग उठैं, रूप-सरोवर माहिं ।।23।।
रतन खचित चौकी ललित, जगमग जगमग होति ।
बिबि गिरि-कंचन बीच मनु, छबि-रवि कियौ उदोति ।।24।।
भूषन युत मृदु भुजन कौं, निरखि लाल रहे भूलि ।
मानौं छबि की लता द्वै, फूलनि सौं रहीं फूलि ।।25।।
उरज पीन कटि छीन छबि नव किशोर रहै चाहि ।
मानौं आनँद बेलि सौं, लागे सुख-फल आहि ।।26।।
आई उपमा और उर, बस किये मोहन मैन ।
मुँदे कंज देखत मनौं, खुले कमल पिय नैन ।।27।।
अति सुंदर अँगिया बनी, सौंधे सनी सुरंग ।
पिय मन अलि तहाँ भ्रमत रहै, तजत न कबहूँ संग ।।28।।
नीलांबर छबि फबि रही, मन में रहत विचार ।
मानौं सार शृंगार कौ, ओढ़े वर सुकुमार ।।29।।
सारी पीरी जरकसी, झलकत छबि सौं जोति ।
कुन्दन की वरषा मनौं, कालिंदी पर होति ।।30।।
जब सुरंग सारी सुही, पहिरति भरी सुहाग ।
अंतर भरि मनु उमगि कै, प्रगट्यौ पिय-अनुराग ।।31।।
राजत सुंदर उदर पर, अद्भुत रेखा तीन ।
देखत सींवा रूप की, ललन भये आधीन ।।32।।
शोभित नाभि गंभीर ढिंग, रोमावलि अनुसार ।
मानौ निकसी कमल तें, सूच्छम रेख शृंगार ।।33।।
पृथु नितंब ऊपर बनी, मणिमय किंकिनि-जाल ।
फिरि आई चहुँ ओर मनु, छबि-दीपन की माल ।।34।।
अति सुढ़ार सुठि सुमिलि बनी, मणिमय जेहरि चारु ।
चलन छबीली भाँति पर, मत्त मरालनि वारु ।।35।।
पायल नूपुर की झनक, होति है मंदहि-मंद ।
मनु सावक कल हंस के, बोलत भरे आनंद ।।36।।
चरन कमल कोमल सुरंग, मधुप लाल मन मंत।
दृग कंजनि छ्वावत रहत, कर कमलनि सेवंत ।।37।।
मैंहदी कौ रँग फबि रह्यौ, नख-मणि झलक अपार ।
मनौं चंद कमलनि मिले, रही न और सँभार ।।38।।
करि श्रृंगार दियौ डीठि डर, श्यामल बिंदु कपोल ।
मुसिकनि छबि बदलै मनौं, राख्यौ पिय-मन ओल ।।39।।
अपुनौ जश कछु रुचत नहिं ऐसी लाल की बात ।
प्रान-प्रिया गुन सुनत ही, अमित करनि है जात ।।40।।
सब अँग अद्भुत भाँति कोउ, सहज रूप की खानि ।
एती मति मोपै कहाँ, नख- छबि सकौं बखानि ।।41।।
उपमा तौ सब जे कहीं, ऐसी चित्त विचार ।
जैसै दिनकर पूजियै, आगे दीपक बार ।।42।।
रूप-माधुरी सहजहीं, झलकत नये तरंग ।
उपमा हूँ सब सुफल भईं, बड़ी ठौर के संग ।।43।।
याही तें कछु इक कही, पाइ बात कौ फेरि ।
जैसै रति इक हेम तें, समुझे सोभा- मेरि ।।44।।
अंग-अंग मृदु माधुरी, अतिहि रसीली आहि ।
तैसे मधुर किशोर पिय, जीवत तिनकौं चाहि ।।45।।
ललित लड़ैती कुँवरि बिनु, और न कछुक सुहाइ ।
नेक नैंन की कोर कैं, लीनौं चित्त चुराइ ।।46।।
अमित कोटि ब्रह्माण्ड की, प्रभुता मन लगी थोर ।
कर जोरैं चितवत रहैं, बंक दृगनि की कोर ।।47।।
देखौ बल या प्रेम कौ, सर्वस लीन्हों छीन ।
महामोहन गज-मत्त पिय, बिनु अकुंश बस कीन ।।48।।
अखिल लोक की साहिबी, दीन्हीं तृण ज्यौं डारि ।
छिन-छिन प्रति सेवा करै, रहै अपनपौ हारि ।।49।।
पानी पान श्रृंगार सब, करत आपने हाथ ।
बँधे जु प्रेम अनंग गुन, फिरत प्रिया के साथ ।।50।।
प्रेम-खेल ऐसैं भयौ, जैसैं खेलत यूप ।
तन मन धन सब हारि कैं, भये दीन रस-भूप ।।51।।
नव किशोर के प्रेम की, बात कही नहिं जाइ ।
सहचरि जे निज कुँवरि की, तिनके परत हैं पाँइ ।।52।।
नैन-सैन चितवनि चपल, मन मुक्ता छबि ऐंन ।
सखी सबै मनु हंसिनी, चुगत हैं भरि भरि नैन ।।53।।
पिय की प्रीति की रीति सुनि, हीये होत हुलास ।
दासी जहँ लगि प्रिया की, ह्वै रहे तिनके दास ।।54।।
अब सुनि प्यारे लाल की, छबिहि नाहिने ओर ।
बँधे लाड़िली प्रेम सौं, ऐसै रसिक किशोर ।।55।।
कुँवर माधुरी रूप की, सोऊ कहत बनैन ।
घटि बढ़ि कहे न जात हैं, जैसै दोऊ नैन ।।56।।
मोहन के मोहन सबै अंग रहे झलकाइ ।
नेक चितै मुख-माधुरी, मैंन गिरत मुरझाई ।।57।।
प्रथमहि प्रियाहि शृंगार के, पिय कौ करहिं श्रृंगार ।
शोभा उभय निहारि सखि, करतिं प्रान बलिहार ।।58।।
इक रस रूप समान वय, दंपति नवल किशोर ।
नख-शिख बानिक एक सी, छैल-छबीली जोर ।।59।।
द्वै मूरति श्रृंगार की, पुनि कीनौं श्रृंगार ।
मिले रूप के सिंधु द्वै, अब को पावै पार ।।60।।
अब सुनि रंग बिहार की, बात न कबहुँ अघात ।
इक रस प्रेम छके रहैं, और न कछू सुहात ।।61।।
ललित रँगीली सेज पर, ललित रँगीले लाल ।
राजत अद्भुत भाँति सौं, संग छबीली बाल ।।62।।
लाल-वल्लभा लाड़ली, नवल छबीली भाँति ।
प्रेम प्यार के चाइ सौं, प्रीतम उर लपटाति ।।63।।
सब अँग सुदंरि सोहनी, रूप-राशि सुकुमारि ।
महा मोहन-गज मोहनी, बस किये नैंकु निहारि ।।64।।
लाल रँगीली संग रँग, करत विनोद अनंग ।
कबहुँ बात हँसि जात बिच, कबहूँ भरत उछंग ।।65।।
कबहूँ कुच-कमलनि छुवत, भौंह भंग ह्वै जात ।
अति प्रवीन रस खेल में, चूकत नहिं कोऊ घात ।।66।।
अंत लाल पाँइनि परत, मृदु मुख हा-हा खात ।
ऐसैं वचनन सहचरी, सुनि-सुनि सब बलि जात ।।67।।
विविध भाँति रति-केलि रँग, छिन छिन औरै और।
करत रँगीले लाल दोउ, परम रसिक शिरमौर ।।68।।
कमल-कपोलनि पर कछू, लागी पीक सुरंग ।
मनौं छलक अनुराग की, उछरि परी छबि संग ।।69।।
अरिल्ल
बाढ़ी अतिही चौंप न उरहि समात है ।
समझि लाड़िली ताहि हियैं लपटात है ।।
नवल रँगीली केलि छबीली भाँति है ।
पुनि हाँ तिनके रस की बात कही क्यौं जाति है ।।70।।
दोहा
तन तौ सिंधु है रूप कौ, लाल नैन जल-मीन ।
खेलत तहँ आनंद सौं, नाभि भँवर घर कीन ।।71।।
कुंज-कुंज प्रति द्रुमनि तर, करैं विलास सुख झेलि ।
फैली वृदांविपिन में, बेलि रंग-रति-केलि ।।72।।
ताके लागे फूल द्वै, कोमल सुरँग सुवास ।
ईषद मुसिकनि सहज की, करत मंद मृदु हास ।।73।।
पुनि फल उरजनि सौं लगे, प्रीतम कर छबि देत ।
मानौं कुंदन घटनि कौं, नील कमल ढँकि लेत ।।74।।
छबि-निधि दुलहिनि नायिका, नायक रूप निधान ।
प्रेम रंग तन मन रँगे, ह्वै रहे एकै प्रान ।।75।।
ललित कुँवरि वरनौं कहा, नख-शिख रूप अपार ।
नैन-कोर पाछैं लगे, फिरत रसिक सुकुँवार ।।76।।
मन अटक्यौ छबि अलक सौं, नैन बदन-तन-रंग ।
श्रवन लगे बैंनन मधुर, नासा सौरभ अंग ।।77।।
अंग-अंग पिय के सबै, परे प्रेम के फंद ।
रुचि लै मुख जोवत रहैं, श्री वृंदावन चंद ।।78।।
भई भीर छबि की तहाँ, और प्रीति उर माहिं ।
पर्यौ लाल मन जाइ तहँ, निकसन पावत नाहिं ।।79।।
अति उदार सुकुमार तन, रसिक शूर शिरमौर ।
नैन-सैन बानन छयौ, छाँड़ी नहिं तउ ठौर ।।80।।
नैन स्रवन नासा अधर, चिबुक रूप की खानि ।
गहि लीन्हौं पिय मन सबनि, सौंप्यौ प्रेम के पानि ।।81।।
अब सुनि फल शृंगार कौ, नवल रंग रस सार ।
दुलहिनि-दूलहु लाल की, रति-बिलास ज्यौंनार ।।82।।
लाज बसन तजि न्हाइ मनु, पानी पानिप माहिं ।
चाह मदन की छुधा बढ़ी, चितै नवल मुसिकाहिं ।।83।।
कुंज रसोई रचि दियौ, चौका सेज बनाइ ।
अति दृढ़ चौकी प्रेम की, तापर बैठे आइ ।।84।।
हार थार बिच झलकि रह्यौ, नाहिंन इंदु समान ।
पहिरैं धोती फूल की, राजत मिथुन सुजान ।।85।।
सुंदर रूचि की खीर भई, मिसरी मुसिकनि थोर ।
डोरा दियौ घृत नेह कौ, स्वादहिं नाहिंन ओर ।।86।।
पुनि फल उरजनि की झलकि, लेत लाल-मन चोर ।
करजनि कै जब छुवत पिय, कछू झुकनि मुख ओर ।।87।।
परिरंभन चुंबन अधर, महा मधुर रस पाइ ।
बीच सलौनी चितवनी, लेत है सुखहिं बढ़ाइ ।।88।।
हाव-भाव लावन्यता, बिंजन अंग निहार ।
उज्जल हाँसि कपूर की, पुट दै रचे सँवारि ।।89।।
भौंह बंक नैननि झुकनि, कर धूननि मुख नेत ।
अद्रक मिरचि अचार ढिंग, ज्यौं रुचि कौ कर देत ।।90।।
नैनन रसना के रसिक, जेंवत तृपति न होइ ।
अद्भुत गति या प्रेम की, कहि न सकत है कोइ ।।91।।
भाजन भूषन अंग दुति, श्रम जल छबिहि न ओर ।
पलक कटोरिनु कै पिवत, श्यामा-श्याम किशोर ।।92।।
बीरी मुख अनुराग की, स्वांस पवन आनंद ।
अति सुवास मृदु हाँस बिच, होत मंद ही मंद ।।93।।
पौढ़े प्रीति प्रजंक पर, ओढ़े प्यार कौ चीर ।
गौर श्याम अंगनि मिले, ज्यौं द्वै धारा नीर ।।94।।
परम रसिक रस राशि दोउ, परे प्रेम के फंद ।
रहत भरे आनंद में, जुग चकोर बिबि-चंद ।।95।।
सखी चकोरी अति सरस द्वै, शशि छबि रस रंग ।
पल-पल पीवतिं दृगन भरि, होत न कबहूँ भंग ।।96।।
‘हित ध्रुव’ सखियन शरन गहि, ऐसै मन अनुसार ।
औरहुँ तिनकौ संग गहि, जिनकै यहै विचार ।।97।।
रचि कीन्ही शृंगार-मनि, जो लै राखी शीश ।
ताके हिय में बसत रहैं, श्री वृंदावन-ईश ।।98।।
जेहैं 'मणि श्रृंगार' की, सब गुन भरि अनुराग ।
पहिरी पिय हिय प्यार सौं, पोइ प्रेम के ताग ।।99।।
अद्भुत सरिता प्रेम की, वृंदावन चहुँ ओर ।
नव-नव रंग तरंग उठैं, मदन पवन झकझोर ।।100।।
ऐसै रसिक किशोर पिय, 'ध्रुव' के हिय में राखि ।
अद्भुत रस की माधुरी, नैननिं रसना चाखि ।।101।।
दोहा कहे श्रृंगार मनि, साठि चौंतिस अरु आठ।
प्रेमा तिहिं उर झलकि रहै, जो करि हैं ध्रुव पाठ ।।102।।
जै जै श्री मन शृंगार लीला की जै जै श्री हित हरिवंश
18. हित शृंगार लीला
दोहा
सहज सुभग वृंदाविपिन, मिथुन प्रेम-रस ऐंन ।
सेवत शरद-बसंत नित, रति युत कोटिक मैन ।।1।।
फूल फूलनि की लता, रहीं यमुन-जल झूमि ।
तैसिय अद्भुत झलमलै, कंचन मणि मय भूमि ।।2।।
जलज थलज विकसत सहज, नील पीत सित लाल ।
हेम बेलि रही लपटि कै सुंदर सुभग तमाल ।।3।।
नव निकुंज मंजुल बनी, सनी सनेह सुवास ।
सुमन सुरंग अनेक रँग, छाई विविध बिलास ।।4।।
अति सुरंग बहु रंग दल, कोमल कमल गुलाल ।
रची रँगीली सखिनु मिलि, सेज सुरंग रसाल ।।5।।
सोरठा
करत मिथुन मृदुहाँस, मन-मन अति अनुराग सौं ।
अधर दसन छबि रास, रहे तँबोल रँग भजि सखि ।।6।।
दोहा
विपिन-देश चहुँ दिशि बहै, सरिता श्याम सुदेश ।
प्रेम-राज राजत तहाँ, इकछत जुगल नरेश ।।7।।
दुलहिनि रानी सहजही, दूलहु नृपति किशोर ।
रूप-छत्र शिर पर फिरै, आसन योवन-जोर ।।8।।
कुंज-धाम सखियनि सभा, प्रजा हंस मृग मोर ।
बसत निरंतर चैन सौं, कीन्हें नैन चकोर ।।9।।
फुलवारी आनंद की, फूली छबि अँग-अंग ।
षट-रितु मालिन सुख फलनि, देत दिनहिं बहु रंग ।।10।।
मैन रंग सतरंज तहँ, खेलत दोउ सुकुमार ।
हाव-भाव चितवनि चलनि, छिन छिन चाह अपार ।।11।।
मन नृप मंत्री चौंप सौं, रचि कीन्हीं रुख चाल ।
उरज गयंद तुरंग दृग, पाइक अँगुरी लाल ।।12।।
तिल कपोल पर अलक छबि, मुसिकनि कही न जात ।
जब चितई पिय लाल तन, भये नैन सहमात ।।13।।
रति नागरि दै अधर रस, हेत विसात सँवारि ।
आलिंगन चुंबन मनौ, खेलत फेरि सँभारि ।।14।।
नव किसोर सुकुमार तन, बिलसत प्रेम बिलास ।
अलबेली चितवनि हँसनि, नौतन नेह हुलास ।।15।।
सवैया
नेह निकुंज में रूप की मूरति, खेलत प्रेम बिलास बिहारी ।
चौंप की चालनि नैंन बिशालनि, चाहि रहे 'ध्रुव' प्रीतम प्यारी ।।
रँगे रस सार दोऊ सुकुमार, महा रिझवार रहे मनहारी ।
हेरति ठाढ़ी सखी सुख सींव, दियैं भुज ग्रींव निमेष विसारी ।।16।।
दोहा
सहज सरस सुंदर बदन, चंद्र बिंब मनौं आहि ।
रूप-किरन हित रसिक पिय, चख चकोर रहे चाहि ।।17।।
सगबगे केश फुलेल में, छुटे अधिक छबि देत ।
कछु चितवनि पुनि मृदु हँसनि, प्रीतम मन हरि लेत ।।18।।
बैंदी श्याम सुहावनी, शोभित गौर लिलार ।
प्रगट सुधाकर पर भयौ, मनौं रूप सिँगार ।।19।।
पल उतंग उज्वल अरुन, अति सलज्ज रस ऐन ।
करनाइत लौंने चपल, कजरारे कल नैन ।।20।।
भौहँनि बिच फगुआ फब्यौ, अरुन भये छबि कौन ।
बैठ्यौ है अनुराग मनु, निज शृंगार के भौंन ।।21।।
नासा पुट डोलत जलज, पल-पल स्वाँसा संग ।
यह छबि निरखत नवल पिय, होति नैन-गति पंग ।।22।।
राजत बाम कपोल तिल, अलप अलक तिहिं पाँहि ।
डार्यौ मनौ श्रृंगार फँद, खंजन नैंननि चाहि ।।23।।
दशन-दमक छबि कह कहौं, मुसिकनि बरषत फूल ।
अद्भुत अंगनि माधुरी, देखति भूली भूल ।।24।।
फब्यौ चिबुक पर सहज ही, बिंदुका अतिहि अनूप ।
पिय साँवल कौ मन मनौं, पर्यौ रूप के कूप ।।25।।
सवैया
बैठे हैं सेज भरे रस रंग, रँगीली कछू मुरि कैं मुसिकाई ।
और की और भई पिय की गति, कैसेहुँ कैं न कही 'ध्रुव' जाई ।।
चाहत चाहत रूप प्रिया कौ, परे सुख में जिहि ठाँ गहराई ।
गुराई कौ भार भयौ गरुवौ, मन बूड़ि गयौ छबि अंबु में माई ।।26।।
दोहा
करुणा करि लिये लाइ उर, देखे लाल अधीर ।
लिये काढ़ि छबि भँवर तें, छ्वाइ दशन वर चीर ।।27।।
छबि मुरझानी देखि छबि, मृदुताई मृदु अंग ।
चतुराई जहँ चित्र भई, चपलाई गति पंग ।।28।।
कोटिक छबि मुख कमल पर, रंजित पाननि राग ।
छिन-छिन प्रीतम नैन अलि, पीवत पीक पराग ।।29।।
नवल नवेली उर बनी, मृदुल चमेली-माल ।
सारी सौंधे सौं सनी, अँगिया फूल-गुलाल ।।30।।
अलबेली चितवनि अली, रस बेली मुसिकानि ।
छिनछिन प्रति बाढ़ति नई, फैली पिय-उर आनि ।।31।।
मैंहँदी रँग भीने बने, मृदु कर चरन सुरंग ।
नख-मनि दुति अति झलमलै, पानिप झलक अनंग ।।32।।
बरषत अद्भुत रूप जल, एकहि रस निशि-भोर ।
तृषित पपीहा तऊ पिय, चितवत मुख की ओर ।।33।।
कवित्त
रोम-रोम रूप कांति पानिप जगमगाति, मोहिनी के देखैं आवै मोहन कौं मोहिनी ।
हित ध्रुव' माधुरी मदन मद मोद मई, अति सुकुमार तन सहजही सोहनी ।।
दशन-दमक देखैं दामिनी लजानी जाति, नख पटतर कोऊ कोहै पति-रोहनी ।
अतिही छबीली गोरी बरनि सकत को री, जाके संग फिरैं छकि छबिनि की छोहनी ।।34।।
रोम-रोम प्रति अमित छबि, ज्यौं दधि लहर उठाँति ।
चषक अलप बहु प्यास पिय, तृषा मिटति किहि भाँति ।।35।।
गाढ़ी कै कसि कंचुकी, दरकि रही कुच-कोर ।
निरखत दृष्टि बचाइ पिय, नागर नवल किशोर ।।36।।
मोहे मोहन मैंन रस, अति सलज्ज मुसिकानि ।
लालच के लालच बढ्यौ देखि लाल-ललचानि ।।37।।
बेसरि अरुझी अलक सौं, शोभा बढ़ी सुभाइ ।
पिय निरवारन व्याज कैं, दई अधिक उरझाइ ।।38।।
सोरठा
सुंदर रूप निधान, परम चतुर नागरि प्रिया ।
लयौ झटकि पिय पान, जानि चतुरई लाल की ।।39।।
दोहा
जो अँग चाहत रसिक पिय, इन नैंननि सौं छ्वाइ ।
सो ठाँ सुदंरि पहिले ही, राखत बसन दुराइ ।।40।।
काँपत कर धरकत हियौ, बनत न मन की बात ।
कुशल युगल कल कोक में, समुझि समुझि मुसिकात ।।41।।
सवैया
कोक बिलास कलान में नागर, नाहिं दुहूँ कोऊ घटि घातनि ।
नई-नई भाँति नई 'ध्रुव' चौंप, बढ़ी मन माहिं चितै दृग-पातनि ।।
चाहत लाल छुयौ उरहार, लई सखी लाइ रँगीली जु बातनि ।
आनि धरै कर तौ कुच यौं, जनु कुंदन-कुंभ ढँके जल-जातनि ।।42।।
दोहा
मन-मन अंतर सहज ही, बढ़ी रंग-रस-केलि ।
उर-नैननि फैली अधिक, चाह मदन-सुख-बेलि ।।43।।
दोउ प्रवीन नागर नवल, अपनी-अपनी भाँत ।
फवति न जब कछु चतुरई, तब पिय हा-हा खात ।।44।।
कहत बचन अति दीन ह्वै, निरखि प्रिया मुख ओर ।
चरन अलंकृत करन कौं, जाँचत नवल किशोर ।।45।।
आतुरता अति दीनता, चाह-चौंप अधिकाइ ।
निरखि समुझि मन नागरी, चितई कछु मुसिकाइ ।।46।।
मंजु कंज-पद विमल द्वै, गहे मृदुल पिय पानि ।
करत चित्र अति गहर सौं, जावक कौ रँग बानि ।।47।।
नखनि माहिं प्रतिबिंब छबि, रही अधिक झलकाइ ।
चंद कंज मिलि एक ठाँ, जनु पाँइनि परे आइ ।।48।।
जेहि रस ढरै मन नागरी, ढरत लाल तिहिं रंग ।
छिन छिन प्रति चितवत रहत, भौंहनि भाइ तरंग ।।49।।
अतिहिं छबीली सोहनी, प्रीतम यह उर आनि ।
सुंदर मुख पर डीठि डर, दियौ दिठौना बानि ।।50।।
अटपटी बात है प्रेम की, बरनत बनै न बैन ।
धरति चरन प्यारी जहाँ, लाल धरत तहाँ नैन ।।51।।
यद्यपि प्यारे पीय कौं, रहत है प्रेम अवेस ।
कुँवर प्रेम गंभीर तहँ, नाँहिन बचन प्रवेस ।।52।।
प्रिया प्रेम सागर अमल, लहरिनु लेति समाइ ।
उमड़ै जो मर्जाद तजि, कापै रोक्यौ जाइ ।।53।।
छबि छिपाइ भूषन बसन, राखति प्रेम दुराइ ।
समुझि कुँवर की गति कुँवरि, जतननि करति बिहाइ ।।54।।
कवित्त
परी है कठिन अति नवल किसोरी जू कौं, छिन-छिन नई छबि कहाँ लौ छिपावहीं ।
जोई अंग प्रीतम के दीठि सौं परस होत, नीरज से नैना नीर भरि भरि आवहीं ।।
हित ध्रुव' अधिक विवस भये जात पिय, ताही हेत सुकुमारी जतन बनावहीं ।
और अंग राखे पट भूषननि में दुराइ, लोचन चपल चल कहे में न आवहीं ।।55।।
दोहा
तहाँ मान कैसे बनै, अद्भुत जहँ यह प्रेम ।
भींजे दोउ आसक्ति रस, कहाँ समाइ बिच नेम ।।56।।
जब चितवत अनुराग युत, कुँवरि नैन चख कोर ।
तेहि छिन बारत प्रान पिय, ढरत शीश पग ओर ।।57।।
भये मगन छबि निरखि पिय, गये बिसरि चख-चीर ।
रूप सरोवर में मनौं, रहे कंज भरि नीर ।।58।।
प्रेम सुरँग रँग रचि रहे, शोभा कही न जाइ ।
मनौं लालच पिय हीय तें, नैंनन प्रगट्यौ आइ ।।59।।
पिय मुख अंबुज की दशा, सुनि सखि कही न जात।
फूलत अधरनि-रस पियैं, बिनु पीयैं कुम्हिलात ।।60।।
अति प्रवीन रस नागरी, लिये कुँवर भरि अंक ।
मनौ सुधा-रस प्रेम-बल, कंजहि देत मयंक ।।61।।
जबहि लाल लटकत बिवस, ललना लेत सँभारि ।
राखत हिय सौं लाइ पिय, लज्जा नेम बिसारि ।।62।।
छबि-निधि रस-निधि नेह-निधि, गुन-निधि परम उदार ।
रँगे परस्पर एक रँग, अद्भुत युगल बिहार ।।63।।
जोवन मद, नव नेह मद, रूप मदन मद मोद ।
रसमद-रतिमद-चाहमद, उनमद करत विनोद ।।64।।
कवित्त
मधुर तें मधुर अनूप तें अनूप अति, रसनि कौ रस सब सुखनि कौ सार री ।
विलास कौ विलास निज प्रेम की है राज-दशा, राजै एक-छत दिन विमल बिहार री ।।
छिन-छिन त्रिषित चकित रूप-माधुरी में, भूले सेई रहैं कछु आवै न विचार री ।
भ्रमहूँ कौ विरह कहत जहाँ डर आवै, ऐसै हैं रँगीले 'ध्रुव' तनु-सुकुमार री ।।65।।
दोहा
दिन दूलहु दिन दुलहिनी, परम रसिक सुकुमार ।
प्रेम-समागम रहत दिन, नवल निकुंज-बिहार ।।66।।
सोरठा
कोक कलानि प्रवीन, नव किशोर दंपति सदा ।
सुरत- सिंधु सुखलीन, अति विचित्र नागर कुँवर ।।67।।
दोहा
रति-नागर दोउ रँग भरे, सुरत तरंगनि माँहिं ।
चाह चौंप मन-मन समुझि, चितै चखनि मुसिकाहिं ।।68।।
वर बिहार कछु श्रमित भई, प्रिया परम सुकुमारि ।
रुचिर पीत अंचल लियैं, मृदु कर करत वयारि ।।69।।
गौर बदन पर फबि रही, विथुरी अलक रसाल ।
शिथिल बसन भूषन सबै, घूमत नैन विसाल ।।70।।
अति सुदेश आलस भरे, अरुन छबीले नैन ।
प्रेम की रैंनी में मनौं, रँगे कंज रति-मैन ।।71।।
अरुनाई बिच स्यामता, छबि नहिं परति बखानि ।
मनौ मधुप अनुराग के, रँग में बोरे आनि ।।72।।
रति-विनोद जामिनि जगे, शिथिल अटपटे बैन ।
अंग-अंग अरसाने सबै, सरसाने सखि नैन ।।73।।
कवित्त
सब निशि रंग भीने मन के मनोज कीने, भोर एक चूनरी सुरंग ओढ़े ठाढ़े हैं ।
अरुझे हैं नख-सिख घटति न चौंप कैंहूँ, अंग-अंग प्रति अति आलिंगन गाढ़े हैं ।।
सौंधे भींजे सोहैं बार छूटि टूटि रहे हार, देखिवे कौं रूप नैना सतगुन बाढ़े हैं ।
हित ध्रुव' रसमसे फबि रहे रसमाते, सुरत सुरंग रंग में झकोर-काढ़े हैं ।।74।।
दोहा
रँगमगे दंपति रसमसे, 'हित ध्रुव' अद्भुत केलि ।
छबि तमाल सौं लपटि रही, मानौं छबि की बेलि ।।75।।
सीस सीस तरैं बाहु दै, जुरे मिथुन मुख चाहि ।
निशि-दिन जीवनि सखिन कै, यहै परम सुख आहि ।।76।।
उभै सरोवर रूप के, हंस सखिन के नैन ।
अद्भुत मुक्ता चुगत दिन, चितवनि मुसकनि सैन ।।77।।
सहज रंग सुख सिंधु कौ, नाहिन है सखि पार ।
श्री हरिवंश प्रताप बल, कह्यौ बुद्धि अनुसार ।।78।।
सोरठा
हौंहिं सकल जौ गात, रौंम-रौंम रसना सहित ।
कह्यौ तऊ नहिं जात, पिय-प्यारी कौ प्रेम-रस ।।79।।
दोहा
मन-बच जो गावै सुनै, हित सौं हित-सिंगार ।
तेहि उर झलकत रहैं विवि, पद-अंबुज सुकुमार ।।80।।
यह रस जिनके सुनत मन, नाहिंन होत हुलास ।
सपनेहुँ परस न कीजियै, तजि 'ध्रुव' तिनकौ पास ।।81।।
अस्सी दोइ दोहा कवित, हित-श्रृंगार के कीन ।
जाके उर में बसैं ध्रुव, जुगल चरन ह्वै लीन ।।82।।
जै जै श्री हित शृंगार लीला की जै जै श्री हित हरिवंश
दोहा
सहज सुभग वृंदाविपिन, मिथुन प्रेम-रस ऐंन ।
सेवत शरद-बसंत नित, रति युत कोटिक मैन ।।1।।
फूल फूलनि की लता, रहीं यमुन-जल झूमि ।
तैसिय अद्भुत झलमलै, कंचन मणि मय भूमि ।।2।।
जलज थलज विकसत सहज, नील पीत सित लाल ।
हेम बेलि रही लपटि कै सुंदर सुभग तमाल ।।3।।
नव निकुंज मंजुल बनी, सनी सनेह सुवास ।
सुमन सुरंग अनेक रँग, छाई विविध बिलास ।।4।।
अति सुरंग बहु रंग दल, कोमल कमल गुलाल ।
रची रँगीली सखिनु मिलि, सेज सुरंग रसाल ।।5।।
सोरठा
करत मिथुन मृदुहाँस, मन-मन अति अनुराग सौं ।
अधर दसन छबि रास, रहे तँबोल रँग भजि सखि ।।6।।
दोहा
विपिन-देश चहुँ दिशि बहै, सरिता श्याम सुदेश ।
प्रेम-राज राजत तहाँ, इकछत जुगल नरेश ।।7।।
दुलहिनि रानी सहजही, दूलहु नृपति किशोर ।
रूप-छत्र शिर पर फिरै, आसन योवन-जोर ।।8।।
कुंज-धाम सखियनि सभा, प्रजा हंस मृग मोर ।
बसत निरंतर चैन सौं, कीन्हें नैन चकोर ।।9।।
फुलवारी आनंद की, फूली छबि अँग-अंग ।
षट-रितु मालिन सुख फलनि, देत दिनहिं बहु रंग ।।10।।
मैन रंग सतरंज तहँ, खेलत दोउ सुकुमार ।
हाव-भाव चितवनि चलनि, छिन छिन चाह अपार ।।11।।
मन नृप मंत्री चौंप सौं, रचि कीन्हीं रुख चाल ।
उरज गयंद तुरंग दृग, पाइक अँगुरी लाल ।।12।।
तिल कपोल पर अलक छबि, मुसिकनि कही न जात ।
जब चितई पिय लाल तन, भये नैन सहमात ।।13।।
रति नागरि दै अधर रस, हेत विसात सँवारि ।
आलिंगन चुंबन मनौ, खेलत फेरि सँभारि ।।14।।
नव किसोर सुकुमार तन, बिलसत प्रेम बिलास ।
अलबेली चितवनि हँसनि, नौतन नेह हुलास ।।15।।
सवैया
नेह निकुंज में रूप की मूरति, खेलत प्रेम बिलास बिहारी ।
चौंप की चालनि नैंन बिशालनि, चाहि रहे 'ध्रुव' प्रीतम प्यारी ।।
रँगे रस सार दोऊ सुकुमार, महा रिझवार रहे मनहारी ।
हेरति ठाढ़ी सखी सुख सींव, दियैं भुज ग्रींव निमेष विसारी ।।16।।
दोहा
सहज सरस सुंदर बदन, चंद्र बिंब मनौं आहि ।
रूप-किरन हित रसिक पिय, चख चकोर रहे चाहि ।।17।।
सगबगे केश फुलेल में, छुटे अधिक छबि देत ।
कछु चितवनि पुनि मृदु हँसनि, प्रीतम मन हरि लेत ।।18।।
बैंदी श्याम सुहावनी, शोभित गौर लिलार ।
प्रगट सुधाकर पर भयौ, मनौं रूप सिँगार ।।19।।
पल उतंग उज्वल अरुन, अति सलज्ज रस ऐन ।
करनाइत लौंने चपल, कजरारे कल नैन ।।20।।
भौहँनि बिच फगुआ फब्यौ, अरुन भये छबि कौन ।
बैठ्यौ है अनुराग मनु, निज शृंगार के भौंन ।।21।।
नासा पुट डोलत जलज, पल-पल स्वाँसा संग ।
यह छबि निरखत नवल पिय, होति नैन-गति पंग ।।22।।
राजत बाम कपोल तिल, अलप अलक तिहिं पाँहि ।
डार्यौ मनौ श्रृंगार फँद, खंजन नैंननि चाहि ।।23।।
दशन-दमक छबि कह कहौं, मुसिकनि बरषत फूल ।
अद्भुत अंगनि माधुरी, देखति भूली भूल ।।24।।
फब्यौ चिबुक पर सहज ही, बिंदुका अतिहि अनूप ।
पिय साँवल कौ मन मनौं, पर्यौ रूप के कूप ।।25।।
सवैया
बैठे हैं सेज भरे रस रंग, रँगीली कछू मुरि कैं मुसिकाई ।
और की और भई पिय की गति, कैसेहुँ कैं न कही 'ध्रुव' जाई ।।
चाहत चाहत रूप प्रिया कौ, परे सुख में जिहि ठाँ गहराई ।
गुराई कौ भार भयौ गरुवौ, मन बूड़ि गयौ छबि अंबु में माई ।।26।।
दोहा
करुणा करि लिये लाइ उर, देखे लाल अधीर ।
लिये काढ़ि छबि भँवर तें, छ्वाइ दशन वर चीर ।।27।।
छबि मुरझानी देखि छबि, मृदुताई मृदु अंग ।
चतुराई जहँ चित्र भई, चपलाई गति पंग ।।28।।
कोटिक छबि मुख कमल पर, रंजित पाननि राग ।
छिन-छिन प्रीतम नैन अलि, पीवत पीक पराग ।।29।।
नवल नवेली उर बनी, मृदुल चमेली-माल ।
सारी सौंधे सौं सनी, अँगिया फूल-गुलाल ।।30।।
अलबेली चितवनि अली, रस बेली मुसिकानि ।
छिनछिन प्रति बाढ़ति नई, फैली पिय-उर आनि ।।31।।
मैंहँदी रँग भीने बने, मृदु कर चरन सुरंग ।
नख-मनि दुति अति झलमलै, पानिप झलक अनंग ।।32।।
बरषत अद्भुत रूप जल, एकहि रस निशि-भोर ।
तृषित पपीहा तऊ पिय, चितवत मुख की ओर ।।33।।
कवित्त
रोम-रोम रूप कांति पानिप जगमगाति, मोहिनी के देखैं आवै मोहन कौं मोहिनी ।
हित ध्रुव' माधुरी मदन मद मोद मई, अति सुकुमार तन सहजही सोहनी ।।
दशन-दमक देखैं दामिनी लजानी जाति, नख पटतर कोऊ कोहै पति-रोहनी ।
अतिही छबीली गोरी बरनि सकत को री, जाके संग फिरैं छकि छबिनि की छोहनी ।।34।।
रोम-रोम प्रति अमित छबि, ज्यौं दधि लहर उठाँति ।
चषक अलप बहु प्यास पिय, तृषा मिटति किहि भाँति ।।35।।
गाढ़ी कै कसि कंचुकी, दरकि रही कुच-कोर ।
निरखत दृष्टि बचाइ पिय, नागर नवल किशोर ।।36।।
मोहे मोहन मैंन रस, अति सलज्ज मुसिकानि ।
लालच के लालच बढ्यौ देखि लाल-ललचानि ।।37।।
बेसरि अरुझी अलक सौं, शोभा बढ़ी सुभाइ ।
पिय निरवारन व्याज कैं, दई अधिक उरझाइ ।।38।।
सोरठा
सुंदर रूप निधान, परम चतुर नागरि प्रिया ।
लयौ झटकि पिय पान, जानि चतुरई लाल की ।।39।।
दोहा
जो अँग चाहत रसिक पिय, इन नैंननि सौं छ्वाइ ।
सो ठाँ सुदंरि पहिले ही, राखत बसन दुराइ ।।40।।
काँपत कर धरकत हियौ, बनत न मन की बात ।
कुशल युगल कल कोक में, समुझि समुझि मुसिकात ।।41।।
सवैया
कोक बिलास कलान में नागर, नाहिं दुहूँ कोऊ घटि घातनि ।
नई-नई भाँति नई 'ध्रुव' चौंप, बढ़ी मन माहिं चितै दृग-पातनि ।।
चाहत लाल छुयौ उरहार, लई सखी लाइ रँगीली जु बातनि ।
आनि धरै कर तौ कुच यौं, जनु कुंदन-कुंभ ढँके जल-जातनि ।।42।।
दोहा
मन-मन अंतर सहज ही, बढ़ी रंग-रस-केलि ।
उर-नैननि फैली अधिक, चाह मदन-सुख-बेलि ।।43।।
दोउ प्रवीन नागर नवल, अपनी-अपनी भाँत ।
फवति न जब कछु चतुरई, तब पिय हा-हा खात ।।44।।
कहत बचन अति दीन ह्वै, निरखि प्रिया मुख ओर ।
चरन अलंकृत करन कौं, जाँचत नवल किशोर ।।45।।
आतुरता अति दीनता, चाह-चौंप अधिकाइ ।
निरखि समुझि मन नागरी, चितई कछु मुसिकाइ ।।46।।
मंजु कंज-पद विमल द्वै, गहे मृदुल पिय पानि ।
करत चित्र अति गहर सौं, जावक कौ रँग बानि ।।47।।
नखनि माहिं प्रतिबिंब छबि, रही अधिक झलकाइ ।
चंद कंज मिलि एक ठाँ, जनु पाँइनि परे आइ ।।48।।
जेहि रस ढरै मन नागरी, ढरत लाल तिहिं रंग ।
छिन छिन प्रति चितवत रहत, भौंहनि भाइ तरंग ।।49।।
अतिहिं छबीली सोहनी, प्रीतम यह उर आनि ।
सुंदर मुख पर डीठि डर, दियौ दिठौना बानि ।।50।।
अटपटी बात है प्रेम की, बरनत बनै न बैन ।
धरति चरन प्यारी जहाँ, लाल धरत तहाँ नैन ।।51।।
यद्यपि प्यारे पीय कौं, रहत है प्रेम अवेस ।
कुँवर प्रेम गंभीर तहँ, नाँहिन बचन प्रवेस ।।52।।
प्रिया प्रेम सागर अमल, लहरिनु लेति समाइ ।
उमड़ै जो मर्जाद तजि, कापै रोक्यौ जाइ ।।53।।
छबि छिपाइ भूषन बसन, राखति प्रेम दुराइ ।
समुझि कुँवर की गति कुँवरि, जतननि करति बिहाइ ।।54।।
कवित्त
परी है कठिन अति नवल किसोरी जू कौं, छिन-छिन नई छबि कहाँ लौ छिपावहीं ।
जोई अंग प्रीतम के दीठि सौं परस होत, नीरज से नैना नीर भरि भरि आवहीं ।।
हित ध्रुव' अधिक विवस भये जात पिय, ताही हेत सुकुमारी जतन बनावहीं ।
और अंग राखे पट भूषननि में दुराइ, लोचन चपल चल कहे में न आवहीं ।।55।।
दोहा
तहाँ मान कैसे बनै, अद्भुत जहँ यह प्रेम ।
भींजे दोउ आसक्ति रस, कहाँ समाइ बिच नेम ।।56।।
जब चितवत अनुराग युत, कुँवरि नैन चख कोर ।
तेहि छिन बारत प्रान पिय, ढरत शीश पग ओर ।।57।।
भये मगन छबि निरखि पिय, गये बिसरि चख-चीर ।
रूप सरोवर में मनौं, रहे कंज भरि नीर ।।58।।
प्रेम सुरँग रँग रचि रहे, शोभा कही न जाइ ।
मनौं लालच पिय हीय तें, नैंनन प्रगट्यौ आइ ।।59।।
पिय मुख अंबुज की दशा, सुनि सखि कही न जात।
फूलत अधरनि-रस पियैं, बिनु पीयैं कुम्हिलात ।।60।।
अति प्रवीन रस नागरी, लिये कुँवर भरि अंक ।
मनौ सुधा-रस प्रेम-बल, कंजहि देत मयंक ।।61।।
जबहि लाल लटकत बिवस, ललना लेत सँभारि ।
राखत हिय सौं लाइ पिय, लज्जा नेम बिसारि ।।62।।
छबि-निधि रस-निधि नेह-निधि, गुन-निधि परम उदार ।
रँगे परस्पर एक रँग, अद्भुत युगल बिहार ।।63।।
जोवन मद, नव नेह मद, रूप मदन मद मोद ।
रसमद-रतिमद-चाहमद, उनमद करत विनोद ।।64।।
कवित्त
मधुर तें मधुर अनूप तें अनूप अति, रसनि कौ रस सब सुखनि कौ सार री ।
विलास कौ विलास निज प्रेम की है राज-दशा, राजै एक-छत दिन विमल बिहार री ।।
छिन-छिन त्रिषित चकित रूप-माधुरी में, भूले सेई रहैं कछु आवै न विचार री ।
भ्रमहूँ कौ विरह कहत जहाँ डर आवै, ऐसै हैं रँगीले 'ध्रुव' तनु-सुकुमार री ।।65।।
दोहा
दिन दूलहु दिन दुलहिनी, परम रसिक सुकुमार ।
प्रेम-समागम रहत दिन, नवल निकुंज-बिहार ।।66।।
सोरठा
कोक कलानि प्रवीन, नव किशोर दंपति सदा ।
सुरत- सिंधु सुखलीन, अति विचित्र नागर कुँवर ।।67।।
दोहा
रति-नागर दोउ रँग भरे, सुरत तरंगनि माँहिं ।
चाह चौंप मन-मन समुझि, चितै चखनि मुसिकाहिं ।।68।।
वर बिहार कछु श्रमित भई, प्रिया परम सुकुमारि ।
रुचिर पीत अंचल लियैं, मृदु कर करत वयारि ।।69।।
गौर बदन पर फबि रही, विथुरी अलक रसाल ।
शिथिल बसन भूषन सबै, घूमत नैन विसाल ।।70।।
अति सुदेश आलस भरे, अरुन छबीले नैन ।
प्रेम की रैंनी में मनौं, रँगे कंज रति-मैन ।।71।।
अरुनाई बिच स्यामता, छबि नहिं परति बखानि ।
मनौ मधुप अनुराग के, रँग में बोरे आनि ।।72।।
रति-विनोद जामिनि जगे, शिथिल अटपटे बैन ।
अंग-अंग अरसाने सबै, सरसाने सखि नैन ।।73।।
कवित्त
सब निशि रंग भीने मन के मनोज कीने, भोर एक चूनरी सुरंग ओढ़े ठाढ़े हैं ।
अरुझे हैं नख-सिख घटति न चौंप कैंहूँ, अंग-अंग प्रति अति आलिंगन गाढ़े हैं ।।
सौंधे भींजे सोहैं बार छूटि टूटि रहे हार, देखिवे कौं रूप नैना सतगुन बाढ़े हैं ।
हित ध्रुव' रसमसे फबि रहे रसमाते, सुरत सुरंग रंग में झकोर-काढ़े हैं ।।74।।
दोहा
रँगमगे दंपति रसमसे, 'हित ध्रुव' अद्भुत केलि ।
छबि तमाल सौं लपटि रही, मानौं छबि की बेलि ।।75।।
सीस सीस तरैं बाहु दै, जुरे मिथुन मुख चाहि ।
निशि-दिन जीवनि सखिन कै, यहै परम सुख आहि ।।76।।
उभै सरोवर रूप के, हंस सखिन के नैन ।
अद्भुत मुक्ता चुगत दिन, चितवनि मुसकनि सैन ।।77।।
सहज रंग सुख सिंधु कौ, नाहिन है सखि पार ।
श्री हरिवंश प्रताप बल, कह्यौ बुद्धि अनुसार ।।78।।
सोरठा
हौंहिं सकल जौ गात, रौंम-रौंम रसना सहित ।
कह्यौ तऊ नहिं जात, पिय-प्यारी कौ प्रेम-रस ।।79।।
दोहा
मन-बच जो गावै सुनै, हित सौं हित-सिंगार ।
तेहि उर झलकत रहैं विवि, पद-अंबुज सुकुमार ।।80।।
यह रस जिनके सुनत मन, नाहिंन होत हुलास ।
सपनेहुँ परस न कीजियै, तजि 'ध्रुव' तिनकौ पास ।।81।।
अस्सी दोइ दोहा कवित, हित-श्रृंगार के कीन ।
जाके उर में बसैं ध्रुव, जुगल चरन ह्वै लीन ।।82।।
जै जै श्री हित शृंगार लीला की जै जै श्री हित हरिवंश
19. शृंगार सभा मण्डल लीला
दोहा
प्रथम चरण हरिवंशजी, उर धरि करौं विचार ।
जेहि प्रताप यह रस कछू, कहत बुद्धि अनुसार ।।1।।
सर्वोपरि अद्भुत सरस, (श्री) वृंदाविपिन-विहार ।
वरनौं युगल किशोर कौ, मंडल सभा श्रृंगार ।।2।।
कुडंल जमुना कौ जितौ, तितौ आहि बिस्तार ।
पंकति कुंजनि की बनी, मंजु मंडलाकार ।।3।।
कहा कहौं वृंदाविपिन छबि, जहँ बिहरत सुकुमार ।
पत्र-पत्र सेवत दिनहि, कोटि-कोटि रति-मार ।।4।।
हेम-लता फूलन सहित, लसत छबीली भाँति ।
नैन चितै चकचौंधि रहै, सोभा कही न जाति ।।5।।
मत्त फिरति मधुपावली, करत मधुर गुंजार ।
मनहुँ मेघ अनुराग के, गावत मंगलाचार ।।6।।
कुंज-कुंज अति झलमलैं, बनत न उपमा आन ।
सोम-सूर सत जोरियै, होत न तऊ समान ।।7।।
रचना चित्र विचित्र दुति, राजत परम रसाल ।
झालर जलजनि झलकि रहीं, बिच-बिच हीरा लाल ।।8।।
जमुना की छबि कहा कहौं, तहाँ न आनँद थोर ।
मनहुँ ढर्यौ श्रृंगार रस, करि प्रवाह चहुँ ओर ।।9।।
फूल-फूल रहे फूल कै, कमल सुरंग अनेक ।
हंस-हंसिनी फिरत बिच, निर्तत केकी-केक ।।10।।
कुंज-कुंज आसन सुमन, राखी सेज रचाइ ।
भरि सुरंग मादिक विविध, भाजन धरे बनाइ ।।11।।
संपति इक इक कुंज की, को कहि सकै प्रमान ।
शारद जो शत-कोटि मिलि, हारहिं तऊ निदान ।।12।।
मधुर-मधुर गति ताल सौं, कूजत विविध विहंग ।
मनौं द्रुमनि चढ़ि रागिनी, गावतिं तान-तरंग ।।13।।
विविध भाँति रह्यौ फूल कै, वृंदावन निज बाग ।
रति अरु श्री लियैं सोहनी, झारत कुसुम पराग ।।14।।
मनिमय अवनी अति बनी, सुंदर सुभग सुढार ।
बिच कंचन कौ जगमगै, रतन-खचित आगार ।।15।।
फूली फूलनि की लता, रही झरोखनि झूमि ।
प्रतिबिंबित जहँ तहँ मनौं, रची फूलनि की भूमि ।।16।।
सौरभताई जहाँ लगि, अरु सुगंध रस सार ।
तिन करि वासित रहत दिन, उठत मोद उदगार ।।17।।
अति अनूप सुख पुंज में, चितवन चित्त लुभाइ ।
रच्यौ राज-सत राज रति, नाना चित्र बनाइ ।।18।।
भान कोटि तिहिं सम नहीं, झलकत झलक अपार ।
भाँति-भाँति रचना नई, राजत चौंसठ द्वार ।।19।।
द्वार-द्वार प्रति सहचरी, खरी भरी रस- प्रेम ।
तिनके प्यारी पीय की, सेवा ही कौ नेम ।।20।।
मृदु-मृदु दल लै जलज के, अति सुरंग रचि सैन ।
तापर विलसत नवल दोउ, मैंन-रंग भरे नैंन ।।21।।
सुरत- रंग सुख में सरस, दोऊ रस की रासि ।
मरम भिदी बतियनिं करैं, मृदु-मृदु ईषद हांसि ।।22।।
दसन चिलक मुख की दमक, रह्यौ झलकि सब भौंन ।
सो रस तो ललितादि निज, भरि पीवत दृग-दौन ।।23।।
रँगी रंग-अनुराग सौं, पगी दुहुँनि के प्यार ।
और न कछु सुहाइ मन, जीवन युगल-बिहार ।।24।।
सहज सुभग अद्भुत अयन, सुख वरषत चहुँ कोद ।
रँगमगे नवल-किशोर दोउ, तामें करत विनोद ।।25।।
तिहि आगे मंडल सभा, प्रभा कही नहिं जाइ ।
शोभा तँह की देखि कै, शोभा रहत लजाइ ।।26।।
सुरंग बिछौना मृदुल अति, भाँति-भाँति के आनि ।
जो जैसैं जिहिं ठाँ बनैं, सखिनि बिछाये बानि ।।27।।
कंचन कौ रतननि खच्यौ, मनिमय विविध सुरंग ।
सिंहासन झलकत तहाँ, धर पर कछू उतंग ।।28।।
कोमल कुसुमनि की गदी, तापर धरी बनाइ ।
अति सुरंग सौंधे सनी, रह्यौ विपिन महकाइ ।।29।।
मधुर-मधुर खग बोलहीं, डोलैं छबि सौं मोर ।
सखिनि सहित सब दरस कौं, ह्वै रहे मनहुँ चकोर ।।30।।
तब आये मण्डल-सभा, जहाँ सखिनु की भीर ।
भई एक गति सबनि की, बिसरे नैननि-चीर ।।31।।
बन बैठे भली भाँति सौं, नवल लाड़िली-लाल ।
मनौं तमाल ढिंग लसत मृदु, कंचन-बेली बाल ।।32।।
नख शिख पानिप रूप निधि, सहज सरस सुकुमार ।
रोम-रोम वरषत रहै, गुन- माधुरि छबि-वारि ।।33।।
(श्री) राधावल्लभ लाल सिर, फबी चंद्रिका-मोर ।
सुरंग पाग सौं लटक रही, बाम भाग की ओर ।।34।।
लाल भाल पर फबि रही, बैंदी लाल अनूप ।
मनौं मूरति अनुराग की, प्रगट भईं धरि रूप ।।35।।
नासा पुट मुक्ता फब्यौ, चितै रहे दृग द्वंद ।
भाजन भरि तन छलकि परी, मनौं रूप की बुंद ।।36।।
अरुन अधर दशनावली, झलकति परम रसाल ।
हीरनि की पंकति मनौं, बंदन में करी लाल ।।37।।
साँवल मुख छबि-प्रभा पर, वारौं कोटिक चंद ।
जित चितवत वरषत तहीं, सहज रूप-मकरंद ।।38।।
रूप प्रिया कौ कहन कौं, कितक बुद्धि है मोर ।
तेई कुँवर चरननि लुठत, निरखि नैन की कोर ।।39।।
जिहि मनमथ त्रैलोक सब अपने बस कियौ आनि ।
सोई मैंन मोह्यौ चितै, मोहन मृदु मुसकानि ।।40।।
मोहनी सोहनी भौंह तें, उपज्यौं सहज अनंग ।
ते मोहन ध्रुव बस किये, तेहिं मनोज रस-रंग ।।41।।
चितवत मोहन चित्र से, रहे भूलि छबि ऐंन ।
मानौं तेहि ठाँ मोल के, नैननि लीनें नैन ।।42।।
यह सुख देखत हैं सखी, ठाढ़ी सब गहि ठौर ।
वरषत आनँद सबनि पर, रसिकनि-मनि शिरमौर ।।43।।
लक्ष-लक्ष के जूथ तहाँ, अगनित अमित अपार ।
रसन कोटि जौ हौंहि तन, कहि न सकत विस्तार ।।44।।
यूथ-यूथ प्रति नाइका, इक इक सखी उदार ।
तिनके नाम कहौं कछू, अपनी मति अनुसार ।।45।।
ललित विसाखा रूचि लियैं, करत भाँवती बात ।
रँग देवी चित्रा तहाँ, युगल रंग-रस रात ।।46।।
तुंगविद्या चंपकलता, इँदुलेखा गुनखान ।
सखी सुदेवी सहित 'धुव', आठौं परम सुजान ।।47।।
इनमें अंतर नेक नहिं, ज्यौं छाया तन संग ।
मानौं मूरति हेत की, बढ़वति पल-पल रंग ।।48।।
एक वैस छबि-रास सब, भूषन बसन समान ।
एक प्रेम में रहीं सनि, इकमन एकै प्रान ।।49।।
अब कछु तिनके नाम सुनि, हीयौ श्रवन सिरात ।
प्रेम-रंग उर में बढ़ै, और दुःख मिटि जात ।।50।।
चंद्रभागा चंद्रानना, चंद्रप्रभा चित चाव ।
चंद्रकला अरु चंद्रिका, कोमल सहज सुभाव ।।51।।
चंद्रमती चंद्रासखी, चंपक बरनी चारु ।
चित्रांगी चंदनवती, चंद्रजिता चितहार ।।52।।
चपला चतुरा चंचला, चित्तहरा चित चैन।
चंद्रछटा वर चंदिनी, चंद्र-कांति रस ऐंन ।।53।।
चारुमुखी चरिता चतुर, चारुदृगी चल नैन ।
चारुमती चंपक-तनी, चित्रांगी चित-चैन ।।54।।
रस-रंगा रस-रंगिनी, रसपुंजा रस-रूप ।
रस भरी रसिका रसवती, रंगावली अनूप ।।55।।
रतनप्रभा रस-मंजरी, रूप-मंजरी नाम ।
रस-ऐंनी रस-मंजरी, रस-रैंनी रस धाम ।।56।।
रतन-मंजरी रति-कला, राग रंग के साथ ।
रस- दैनी अरु रस-भरी, गहै रसलिका हाथ ।।57।।
वृंदा विपिन- विनोदनी, बन-दीपा बन- कांति ।
वनशोभा अरु बनमती, बन-मोदा भली भाँति ।।58।।
बन-रागा अरु-बन प्रभा, बन-भूषा बन-केलि ।
बन-विज्ञा विजया जया, बन-माला बन-बेलि ।।59।।
सुभग सुमती शारदा, सारंगी रस-सार ।
सुखद जयंती शशि-मुखी, सरसी मुखी उदार ।।60।।
सुघर सुनंदा साँवरी, सहज सलौनी चाहि ।
सिंदूरा शुभ- आनना, शोभा की निधि आहि ।।61।।
सरला सुमना सारिका, सौदामिनी लसंत ।
सुमुखी संग सुकुन्तला, भ्रमत भँवर रस-मंत ।।62।।
मालती माधवी माधुरी, मधुपा कै अति हेत ।
मानवती मंदालसा, मदनावती समेत ।।63।।
मंजुकेश मनमंजरी, मनिकुंडला रसाल ।
मृगनैनी मधुमालती, मंजुपदा मनिमाल ।।64।।
कलहंसी कटिकेहरी, कलवंशी कलकेलि ।
कलनैंनी कलगामिनी कलबैंनी कलबेलि ।।65।।
कंजमुखी कमलावती, कनकांगी रही सोहि ।
केलिकला कृष्णावती, कुमुदा रही छबि जोहि ।।66।।
भाँमा भाँमती भानुजा, भवन-सुंदरी संग ।
भानमती मन-भावनी, भूषनभूषा अंग ।।67।।
भद्रपदा भद्रावती, भामिनि दीपा भौन ।
भद्र-सरूपा भाग-भरी, उपमा दीजै कौन ।।68।।
तानवती तारावती, भरी तमाल रंग ।
तम-हरनी तरला तहीं, तान-तरंगा संग ।।69।।
पिकबैनी प्रेमावली, प्रेमा रस में लीन ।
परिमल पुन्या पावनी, पद्मावती प्रवीन ।।70।।
नीरजनैंनी नंदनी, नेह नवीना नित्त ।
नाद-नंदिनी निर्मला, नवला कोमल चित्त ।।71।।
गुनमाला अरु गुनवती, गुन भूषन गुन खान ।
गुनकंदा अरु गुनकला, गुनभेदा गुन जान ।।72।।
चंप चमेली केतकी, वासंती रस ऐंन ।
बेलि गुलाली सेवती, सेवत हैं दिन रैन ।।73।।
रुप धरैं सब रागिनी, रँगी रंग- अनुराग ।
लाल-लड़ैती कुँवरि कौ, गावत दिनहिं सुहाग ।।74।।
दिवा- जामिनी छहौं ऋतु, ठाड़ी रहैं कर जोर ।
करत जोइ तेहि छिन समुझि, जब चितवत जेहि ओर ।।75।।
गोरी-गोरी सखी जे, भरी प्रिया रस गर्व ।
चंदकिरनि सी चहुँ दिशन, राजत अर्वनि-अर्व ।।76।।
कुंज भृंगी सब सहचरी, मोर मराली चाहि ।
जे हैं प्यारी पक्ष की, ते सगर्व सब आहि ।।77।।
शुक पिक बल्ली सखी सब, हंस मयूरी मोर ।
लिये दीनता रहत दिन, जितक लाल की ओर ।।78।।
जुगल मिलन सुख सहज ही, अद्भुत केलि विहार ।
जीवन सब की एक ही, जीवति तेहि अधार ।।79।।
यह नामावली सखिन की, सुनत रुचैगी जाहि ।
प्रेम बढ़ै शोभा चढ़ै, रहै जाहि तेहि पाहि ।।80।।
रज-कन उड़गन बूँद घन, आवत गिनती माहिं ।
कहत जोई थोड़ी सोई, सखियन संख्या नाहिं ।।81।।
मंडल जोरैं खड़ी मनौं, जुरे चकोरनि बृंद ।
इक टक रहीं निहारि सब, विवि वृंदावन चंद ।।82।।
अपनौ अपनौ गुन जितौ, हित के रस सौं सानि ।
ते सब आगैं दुहुँनि के, प्रगट करति हैं आनि ।।83।।
सखी सुधंगा नृत करै, लियैं कला सब संग ।
देखौ अद्भुत गतिन कौं, होत नैन-मन पंग ।।84।।
उरप तिरप अरु हुरमई, लाग डांट बंधान ।
सरस सुलप सुंदर चलन, मुसिकनि हरत है प्रान ।।85।।
अति प्रवीन सब अंग में, रीझि-रीझि दोउ लाल ।
तबहिं बेलि तेहि सखी कौं, पहिराई उर माल ।।86।।
पाछैं गावत रागिनी, बीना लियै मृदंग ।
एक सारँगी किन्नरी, एक सजै मुहचंग ।।87।।
अमृत- कुंडली हुड़कई, एक गहैं करतार ।
गुन- सरिता उमड़ी मनौं, बाढ्यौ रंग अपार ।।88।।
जितक कला संगीत की, तामें सबै प्रवीन ।
गावत निर्त्तत लेत हैं, अद्भुत गतिनि नवीन ।।89।।
एक वैस गुन राशि सब, तैसौ तिनकौ हेत ।
देखि छबीली छबि तहाँ, रीझि दुँहुनि सुख देत ।।90।।
तानतरंगा निकट ह्वै, गाई बाँकी तान।
तबहिं रीझि तेहि सखी कौं, दिय बुलाय हँसि पान ।।91।।
सोरठा
आँनद मेघ चुचात, सुख कौ सर 'ध्रुव' दिन तहाँ ।
क्यौं आवै कहि बात, वृंदावन-बिधु-सभा की ।।92।।
दोहा
पावस रितु आगम कियौ, अपनी सेवा हेत ।
द्रुम-द्रुम बोलत खग मधुर, नाम सनेह समेत ।।93।।
श्याम सचिक्कन मोहिनी, आई घटा अनूप ।
मनौं रह्यौ बन छाई के, निज सिंगार कौ रूप ।।94।।
ऊँचे नीचे महल की, शिखर सिखी चहुँ ओर ।
जहँ तहँ आनँद रंग भरि, निरतत मोरी-मोर ।।95।।
सुरंग हिडोरे रंग में, झूलत समय विचार ।
पानिप रूप तरँग उठैं, सो छबि रही निहार ।।96।।
रिमझिमि बूँदनि की परनि, गावनि मधुर मलार ।
यह सुख देखत सुनत ही, रहति न देह सँभार ।।97।।
बढ़ी ओप झलकत सबै, पत्र फूल फल डार ।
मानौं मज्जन करि विपिन, फेरि कियौ श्रृंगार ।।98।।
देखि भाँति बन की भली, रुचि में रुचि की गोभ ।
उपजी है मन दुहुँनि कै, एक केलि की लोभ ।।99।।
बाहाँ-जोरी चलत दोउ, देखन हित सब कुंज ।
चहूँ ओर सब सहचरी, मध्य प्रान सुख- पुंज ।।100।।
कमल कुंज आये प्रथम, सहज रंग-रस ऐंन ।
अति सुरंग अंबुज- दलनि, रची तहाँ सखि सैन ।।101।।
देखत रचना रुचिर अति, रीझे दोउ सुकुमार ।
बोलि सखी कमलावती, पहिरायो उर हार ।।102।।
पुनि पौढ़े तिहिं सेज पर, करत हाँसि पर हाँसि ।
भीजे रंग अनंग में, बाढ्यौ हिये हुलास ।।103।।
रति-विनोद बिलसत विविध, उपज्यौ आनँद रंग ।
हँसनि दसनि अंगनि लसनि, छबि के उठत तरंग ।।104।।
लतनि ओट ललितादि निज, सुख देखत भरि नैन ।
कहत बचन जे रँगमगे, सुनत श्रवन है चैन ।।105।।
ता पाछैं तेहि कुंज तें, आये कुंज सिंगार ।
नौतन भूषण बसन तन, पहिराये उर हार ।।106।।
सुरंग सहानी सेज पर, दुलहिनि-दुलह लाल ।
मुसिकनि मन हरि लेत हैं, चितवनि-नैन-विशाल ।।107।।
मैंहँदी कौ रँग बनि रह्यौ, अंजन नैंन सुदेस ।
नवसत अंगनि जगमगै, कहि न सकत छबि लेस ।।108।।
ललिता आनँद रँग भरी, बिवि-मुख चितै अनूप ।
मनहुँ नैन नरजा किये, तोल्यौ करत हैं रूप ।।109।।
जबहिं ढ़रत जिहि कुंज कौं, तहँ की सखी सुजान ।
नैननि के करि पाँवड़े, न्यौछाविर करे प्रान ।।110।।
मान कुंज आये जबहिं, कुंवरि-भौंह भई भंग ।
चितै लाल पाइन परैं, समुझि मान कौ अंग ।।111।।
ऐसे रस में हो प्रिये, ऐसी जिय न बिचारि ।
तासौं इतनी चाहियै, तन मन जोरह्यौ हार ।।112।।
कैसे कै सहि जात है, नेक रुखाई भौंह ।
याते नाहिंन और दुख, प्यारी तेरी सौंह ।।113।।
मेरो तो कछुवै नहीं, तुमही प्राननि प्रान ।
यहै बात जिय समुझिकै, चित जिन आनौं आन ।।114।।
सोरठा
मेरे है गति एक, तुव पद-पंकज की प्रिये ।
अपने हठ की टेक, छाँड़ि कृपा करि लाड़िली ।।115।।
दोहा
मोहन के मोहन वचन, सुनि मोहिनी मुसिकाइ ।
प्यारौ प्यारी प्यार-सौं ढरकि लियौ उर लाइ ।।116।।
तेहि छिन दीनौं अधर रस, नवल रँगीली-बाल ।
तिनकी प्रीति न कहि परै, प्रेम-सींव दोउ लाल ।।117।।
कवित्त
प्यारी जू की रिस ऐसी दामिनी दमकि जैसी, छिन एक चमकि मिलति जाइ घन में ।
नैन नेक बंक करै फिरि ताही रंग ढ़रै, परम कोमल चित रसभरी मन में ।।
उर सौं लपटि रही छबि न परति कही, मानौं मीन विहरत स्याम-सर वन में ।
हित ध्रुव' मान ऐसौ बिरह न हौन पावै, समुझि प्रवीन प्यारी सावधान पन में ।।118।।
दोहा
पुनि हँसि कै तहाँ ते चले, आये कुंज विलास ।
देखत रचना रुचिर अति, बाढ्यौ हियैं हुलास ।।119।।
मनिमय कनक प्रजंक पर, फूलनि सेज बनाय ।
रचि राखी सखियनि जहाँ, अरगजा सौं छिरकाय ।।120।।
मेवा फल सब अमृत मय, चहूँ ओर धरे आनि ।
भाजन भरि मधुर मादिकन, बीरी राखी बानि ।।121।।
आसन मृदु बहु भाँति के, शोभा कही न जाइ ।
कहुँ चौपर सतरँज कहूँ, राखी विविध बिछाइ ।।122।।
हँसि बैठे तेहि सेज पर, हेत सखिनु कौ जांनि ।
कहत परस्पर बैन मृदु, मैन रंग सौं सानि ।।123।।
सोरठा
कहत बनत कछु नाहिं, सुरत-रंग सुख-सिंधु बढ्यौ ।
पैरावत तिहि माहि, पियहि लाइ कुच घटनि सौं ।।124।।
दोहा
सब विधि नागरि निपुन अति, कोक-विलास कलानि ।
उपजत नव-नव भाव सत, गुन-रतननि की खानि ।।125।।
कवित्त
कोटि-कोटि रसना जो रोम-रोम प्रति होंइ, प्यारी जू के रूप कौ न प्रमान कह्यौ जात है ।
अतिहि अगाध सिंधु पार नाहिं पावै कोऊ, थोरी बुद्धि सीप माँझ कैसे कैं समात है ।।
छिन छिन नई-नई माधुरी तरंग रंग, देखैं नख-चंद्रिकानि चंद हू लजात है ।
हित ध्रुव अंग-अंग बरसत छबि स्वाति, नैना पिय-चातिक तौ कैहूँ न अघात हैं ।।126।।
दोहा
रंग कुंज नीकी बनी, रंगावलि चित लाइ ।
दुलहिनि दूलहु हेत सौं, तामें बैठे आइ ।।127।।
रँगमगे दंपति रसमसे, भरयौ हिऐं रस-मैन ।
अतिही रँगीले रँगमगे, कहत परस्पर बैन ।।128।।
उपज्यौ रंग बिनोद इक, सखियन के उर ऐंन।
लाड़-लड़ैती ब्याह कौ, सुख देखैं भरि नैन ।।129।।
तबहिं भाव यह बढ़ि गयौ, सब के भयौ विचार ।
जैसी रीति है ब्याह की, करन लगीं-विधिचार ।।130।।
कुंज-द्वार मंडप रच्यौ, सुमन सुरंग बनाइ ।
हेम-खंभ रतननि खच्यौ, रह्यौ मध्य झलकाइ ।।131।।
हीरा गज-मोतीन की, झालर रची सँभारि ।
षट-रितु मालिन फूल सौं, बाँधी बंदनवारि ।।132।।
एक सखी गाइनि भई, गावति मंगल-गीत ।
और बहुत बाजे लियैं, मगन भईं रस प्रीति ।।133।।
मज्जन की विधि करन कौं, जुरी सखिनु की माल ।
कोलाहल आनंद कौ, बाढ़यौ है तेहि काल ।।134।।
कंचन चौकी पर दोऊ, राजत भाँति अनूप ।
बसन उतारे सुठि बने, बाढ्यौ सतगुन रूप ।।135।।
पट दै बिच अंतर कियौ, चतुर सखी इकसार ।
चंदन कौ करि उबटनौ, उबटत दोउ सुकुमार ।।136।।
सोरठा
होत हि पट की ओट, पिय के दृग व्याकुल भये ।
मनौं कलप सत-कोट, सो छिन तौ ऐसी भई ।।137।।
दोहा
कुंकुम तेल फुलेल मथि, सीसन तैं दियौ डारि ।
मानौं पानिप रूप की, उमड़ि चली मित टारि ।।138।।
अधिक हेत सौं करैं सखी, प्रथम चारु अस्नान ।
इक गावति इक हँसत है, इक वारति है प्राण ।।139।।
एक प्रिया तन होइ कै, कहत वचन परिहास ।
सुनि-सुनि पिय के हीय में, बाढ़त अधिक हुलास ।।140।।
सब सुगंध सों बासि जल, जैसो तनहिं सुहाइ ।
तब सबहिन अति प्यार सौं, लीनें कुँवर न्हवाइ ।।141।।
मंडप वर आसन सुमन, राख्यौ रुचिर बनाइ ।
सुरंग सहाने बसन तहाँ, ल्याईं मृदु पहिराइ ।।142।।
एक सखी अंजन दियौ, एक खवावत पान ।
इक हँसि बाँधत कंकनौ, एक करत है गान ।।143।।
मेहँदी को रँग फबि रह्यौ, भूषन छबि अंग-अंग ।
मगन भईं शोभा निरखि, निर्त्तति नारि अनंग ।।144।।
सीसनि सुभग जराव के, झलकत मौरी मौर ।
देखि छबीली भाँति दोऊ, छबि भूली तेहि ठौर ।।145।।
कुंकुम रोरी रंग लै, चित्रै अद्भुत भाँति ।
किये चित्र रचि मुखन पर, अखियाँ निरखि सिराति ।।146।।
फूल सुनहरे सेहरै, सोभा बढ़ी नवीन ।
प्रान-थार दृग-दीप करि, सखियनि आरति कीन ।।147।।
सुरँग पीत विवि अंचलनि, जोरी ग्रंथि बनाइ ।
चितै कुँवरि मुसिकाइ मृदु, कछु इक रही लजाइ ।।148।।
निगम छंद तब उच्चरत, चतुर सखी द्वै चार ।
जदपि बिवस हैं प्रेमरस, सब बिधि करत सँभारि ।।149।।
अरुन-अरुन मनि फूल बिच, धरि बेदी सो कीन ।
पाछे पिय आगे प्रिया, भाँवरि विधि सौं दीन ।।150।।
एक मधुर मिलि गावही, मंगल गीत सुहाग ।
मानो बोलत कोकिला, मध्य बिपिन अनुराग ।।151।।
तब ललिता हँसिकै कह्यौ, दुहु विधु मुखहि निहारि ।
दूधा-भाती करहु अब, पिय सौं मिलि सुकुँवारि ।।152।।
सुनत सखिन के बचन ये, मुरि बैठी पट तानि ।
मनौं लाज कौ ऐंन रचि, कियौ प्रवेस तहँ आनि ।।153।।
ऊँचे चितवति नेकु नहिं, नमित कर रही नारि ।
घूँघट पट नहीं छाँड़ही, प्रिय कर देति है टारि ।।154।।
तब सखियनि पिय सौं कह्यौ, सुनहु रसिक-वर-राइ ।
जौ रस चाहत आपनौं, गहौ कुँवरि के पाइ ।।155।।
अति सुरंग मुख कमल तें, ललित उगारहिं लेति ।
छल सौं पियहि खवाइ कै, हँसि-हँसि तारी देति ।।156।।
कुँवरि-चरण- छबि मनि मनौं, प्रीतम बंदत ताहि ।
मानौं देवी प्रेम की, पियहि पुजावत आहि ।।157।।
तेहि-तेहि छिन जो सहचरी, करवावत विधिचार ।
करत कुँवर अति प्यार सौं, यहै नेह की ढार ।।158।।
सबही विधि आधीन पिय, पगनि सीस रहे लाइ ।
तबहि लाज पट दूर करि, चितई कछु मुसिकाइ ।।159।।
ऐसैं सुख के रंग की, क्यौं कहि आवै बात ।
जद्दपि बीतत है कलप, छिन के सम ह्वै जात ।।160।।
नित्य-विहार विवाह नित, दुलहिनि-दूलहु लाल ।
नित्य सखी सुख सहजही, लेत रहत सब काल ।।161।।
रस-सनेह-सागर बढ्यौ, नवल रंग रस-सार ।
तेहि रस में सखि मगन भईं, भूली देह सँभार ।।162।।
सोरठा
करवावत सब ख्याल, इच्छा सक्ति सखी तहाँ ।
उपजावत तेहि काल, भाव सबनि के तैसोई ।।163।।
दोहा
बैठे कुंज विनोद में, करत विनोद-बिहार ।
चितवनि मुसिकनि लसनि रद, सोभा-निधि सकुवाँर ।।164।।
लाल सखी कौ भेष कियौ, उपज्यौ चित यहै भाव ।
पट-भूषन नव कुँवरि के, पहिरनि को बढ्यौ चाव ।।165।।
जय सेवा सिंगार की, लगे करन भली भाँति ।
तब फिरि चितवति लाड़िली, लाज सहित मुसिकाति ।।166।।
छुटे बार सौंधे सने, पिय-कर पर प्रिया वार ।
मनौं सिंगारत रचि रुचिर, सिंगारहिं सिंगार ।।167।।
बैनी रचि फूलनि गुही, सुंदर सुभग सुढार ।
नख-सिख भूषन पट बने, अरु गज-मोतिन-हार ।।168।।
नैननि अंजन दियौ जब, रीझे मुकुर निहारि ।
दसन खंडि अति हेत सौं, बीरी दई सुकुँवारि ।।169।।
दसन-बसन रस देत हैं, लालहि लियैं उछंग ।
मांनौं चंदहि चंद मिलि, प्यावत सुधा सुरंग ।।170।।
फूले आनँद रंग भरि, अति सुख कौ रस पाइ ।
नैन छ्वाइ चूमत चरन, कबहुँ रहत उर लाइ ।।171।।
कहा कहौं या प्रेम की, अद्भुत भाँति अनूप ।
वृंदावन घन कुंज में, सेवत रूपहीं रूप ।।172।।
उलटी चाल है प्रेम की, को समुझे बिन लाल ।
ज्यौं- ज्यौं हारै अपनपौ, त्यौं-त्यौं बढ़ै विशाल ।।173।।
कवित्त
प्यारी जू की सारी अति प्यारी लागे प्रीतम कौं, सौंधे भींजी अँगिया सुरंग उर धारी है ।
नवल रँगीलीजू के भूषन बिहारी लाल, पहिरत बाढ़ी फूल जाति न सँभारी है ।।
जोइ कछु प्रियाजू के अंगनि परस होत, सोई प्रान जात होत ऐसी प्यारी प्यारी है ।
हितधुव प्रेम बात कैसेहूँ न कही जात, जानै सोई जेहि सिर मोहनी सी डारी है ।।174।।
दोहा
रैंनि सुहावनी सरद की, राजत सहज सुदेस ।
इक इक मनि आभा मनौं, झलकति सत राकेस ।।175।।
ऐसी रजनी देखि पिय, सजनी मन भयौ मोद ।
पुलिन हंसजा रह्यौ बनि, कीजै रास-बिनोद ।।176।।
सखिन मंडली जुरी तब, हेत दुहुँनि कौ जानि ।
चहूँ ओर सब फिर गई, जोरि पानि सौं पानि ।।177।।
मध्य रसिक दोउ लाड़िले, सभा रही सब हेरि ।
मानौं छबि के चंद द्वै, छबि कमलनि लिये घेरि ।।178।।
सरस एक तें एक सखि, अपनी-अपनी भाँति ।
निर्त्तत अंग सुधंग के, दामिनिसी दमकाति ।।179।।
नवल कुँवर वर कुँवरसौं, कहत बदन तन जोहि ।
अपनीसी गति निर्त्तकी, कछुक सिखावहु मोंहि ।।180।।
नागर-मनि नव-नागरी, समुझि पीय कौ हीय ।
भरी नेह आनंद रस, अद्भुत कौतिक कीय ।।181।।
कंज- दलनि पर रुचिर कल, करति निर्त्त सुकुँवारि ।
तिहिं छिन जहाँ लगि सहचरी, चकित ह्वै रहीं निहारि ।।182।।
जो गति नहिं देखी सुनि, उपजै नव-नव भाई ।
निर्त जु मूर्तिमंत ही, सोउ रही लुभाइ ।।183।।
तिरप बाँधि दल एक पर, अलग लाग तहाँ लीन ।
दूजौ दल परस्यौ नहीं, लाघवता अति कीन ।।184।।
रीझि लाल चूँवत चरन, ऐसी चित्त बिचारि ।
प्रानहारि पहिले रह्यौ, अब कहा दीजै वारि ।।185।।
मोहन सँग महा मोहिनी, सुख बरषत है नित्त ।
चंदनि में अति चमकि रही, चमकावति पिय-चित्त ।।186।।
श्रम-जल-कन मुख गौरपर, चितै रहे पिय मोहि ।
मानौं छबि के कमल पर, छबि के कन रहे सोहि ।।187।।
रविजा-वन परसै पवन, सौरभ घन जनु लेत ।
मंद-मंद जैसी रुचै, आइ दुहुँनि सुख देत ।।188।।
मान सरोवर रसमयी, झलकत निर्मल नीर ।
नव किशोर इक बैस द्रुम, रतन खचित वर तीर ।।189।।
छत्री मध्य जराव की, मैंन-फूल छबि-ऐंन ।
रचि राखी अति हेत सौं, सखियनि तहाँ सुख सैन ।।190।।
देखि भाँति सर की भली, बाढ़ी आनँद-बेलि ।
तामें दोउ निज सखिन जुत, करन लगे जल-केलि ।।191।।
हँसि-हँसि छिरकत आप में, अलबेले सुकुँवार ।
मानौं वारन रूप के, विहरत वारि-विहार ।।192।।
छुटे बार सौंधे सने, छूटि रहे उरहार ।
विवस भये खेलत दोऊ, बाढ़ी चौंप अपार ।।193।।
अंगराग बहु भाँति मिलि, ह्वै गयौ अंबु सुरंग।
मनौं सरस अनुराग के, दिखियत प्रगट तरंग ।।194।।
निकसे दोउ भींजे बसन, सोभा कही न जाइ ।
मानों पानिप रूपकी, बढ़िकै चली चुचाइ ।।195।।
अंग-अंग छबि कहा कहौं, बाढ़ी सतगुन ओप ।
उपमा दुति सब और जे, ते सब ह्वै गईं लोप ।।196।।
पहिरे पट नव जरकसी, मृदु सुरंग अति बाँनि।
सौंधे सौं रहे घमड़ि कै, सौरभता की खाँनि ।।197।।
देखत फिरत निसंक वन, जैसैं मत्त गयंद ।
बिन अकुंस रुचि आपनी, दुरत है मुरत स्वछंद ।।198।।
संग लिये सब सहचरी, विलसत लसत हसंत ।
ऐसी छबि तहाँ रही फबी, खेलत मनौं बसंत ।।199।।
कुंकम तौ तन कौ वरन, अंबर विविध गुलाल ।
अधर दसन मनौं फूल भये, अबुंज नैन बिशाल ।।200।।
नौलासी भुज-लतनि की, आगम जोवन मौर ।
कुच-गेंदुक उर फूल भई, उपमा नहिं कछु और ।।201।।
चितवन मुसकनि छिरकिबौ, बाजे भूषन-राव ।
देखत ऐसी मंडली, उपजत है चित चाव ।।202।।
इहि बिधि तौ खेलत रहैं, दिनहि बसंत रु फाग ।
यह सुख जो चिंतत रहै, ताही के 'ध्रुव' भाग ।।203।।
कुंज-कुंज सब ऐसैं ही, कीनें विविध विनोद ।
ता पाछे दोउ रँग भरे, चले महल की कोद ।।204।।
झलकत हैं छबि चंद द्वै, सखिनु-माल चहुँ ओर ।
मानौं घेरे फिरत हैं, सबके नैन-चकोर ।।205।।
ठाढ़े भये मंडल सभा, सोभा-सिंधु अगाध ।
जैसी रुचि ही सखिनि की, पुजई सब की साध ।।206।।
फूली अंग न मात हैं, भरी रंग आनंद ।
जीवन सबके एकही, विवि वृंदावन चंद ।।207।।
रचि मृदु आसन सुमन पर, बैठारे दोउ लाल ।
अति प्रवीन सेवा करैं, जैसी रुचि जेहि काल ।।208।।
विविध भाँति विंजन अधिक, आगे राखे आनि ।
मधुर सलोने चरपरे, खाटे-मीठे बाँनि ।।209।।
हँसि-हँसि स्वाद सराहि दोउ, ग्रास परस्पर लेत ।
ललित-विसाखा तेहि समैं, वारि प्रान धन देत ।।210।।
कछु खाये सखियनि दिये, नागर नवल प्रवीन ।
अमृत चितवनी चितै सखि, बोलि सबनि सुख दीन ।।211।।
चतुर सिरोमनि नेह-निधि, सब विधि रूप-निधान ।
पग धारे निजु महल कौं, करि सब कौ सनमान ।।212।।
मंडल सब देखत फिरत, बीते कलप अनेक।
सहचरि यौं मानत भईं, मनौं भई घरी एक ।।213।।
जब जाने सबही श्रमित, नवल भामिनी-स्याम ।
बाढ्यौ तिनके हेत यह, नेकु करें विश्राम ।।214।।
भाँति रँगीली सेज पर, रहे लटकि लपटाइ ।
ललितादिक निजु सहचरी, तहाँ पलोटतिं पाँइ ।।215।।
एक सुनावत सारँगी, रँग भीनी लिये बीन ।
मंद मधुर सुर गावहीं, रुचि लिये ताँन नवीन ।।216।।
दोहा
राग-रंग जुत प्रेम रस, अद्भुत केलि अनंग ।
छिन-छिन आनँद सिंधु के, उठिबौ करत तरंग ।।217।।
कवित्त
नवल रँगीले लाल रस में रसीले अति, छबि सौं छबीले दोऊ उर घुरि लागे हैं ।
नैंननिं सौं नैंन कोर मुख-मुख रहे जोर, रुचि कौ न ओर-छोर ऐसे अनुरागे हैं ।।
परे रूप-सिंधु माँझ जानत न भोर-साँझ, अंग-अंग मैंन-रंग मोद-मद पागे हैं ।
हित ध्रुव' बिलसत तृपित न होत कैहूँ, जद्दपि लड़ैती-लाल सब निसि जागे हैं ।।218।।
दोहा
नित उठि जो गावै सुनै, "मंडल-सभा-सिंगार"।
सो ध्रुव पावै वेग ही, प्रेम-कृपा कौ हार ।।219।।
सोरठा
मंडल सभा-सिंगार', सोलह सै इक्यासिया ।
सकल रसनि कौ सार, हित ध्रुव बरने जथा मति ।।220।।
दोहा कवित्त अरु सोरठा, द्वै सत तिथि गुन वेद ।
या रँग में जे रँगि रहे, तेई पैहैं भेद ।।221।।
द्वै सत ऊपर अष्ट दस, और सवैया चार ।
अद्भुत युगल बिहार रस, छिन छिन 'ध्रुव' उर धार ।।222।।
दोहा द्वै सत बीस इक, बरनत युगल-विलास ।
सुनत सुनावत सरस "धुव", रसिकन होत हुलास ।।223।।
जै जै श्री शृंगार सभा मण्डल की जै जै श्री हित हरिवंश
दोहा
प्रथम चरण हरिवंशजी, उर धरि करौं विचार ।
जेहि प्रताप यह रस कछू, कहत बुद्धि अनुसार ।।1।।
सर्वोपरि अद्भुत सरस, (श्री) वृंदाविपिन-विहार ।
वरनौं युगल किशोर कौ, मंडल सभा श्रृंगार ।।2।।
कुडंल जमुना कौ जितौ, तितौ आहि बिस्तार ।
पंकति कुंजनि की बनी, मंजु मंडलाकार ।।3।।
कहा कहौं वृंदाविपिन छबि, जहँ बिहरत सुकुमार ।
पत्र-पत्र सेवत दिनहि, कोटि-कोटि रति-मार ।।4।।
हेम-लता फूलन सहित, लसत छबीली भाँति ।
नैन चितै चकचौंधि रहै, सोभा कही न जाति ।।5।।
मत्त फिरति मधुपावली, करत मधुर गुंजार ।
मनहुँ मेघ अनुराग के, गावत मंगलाचार ।।6।।
कुंज-कुंज अति झलमलैं, बनत न उपमा आन ।
सोम-सूर सत जोरियै, होत न तऊ समान ।।7।।
रचना चित्र विचित्र दुति, राजत परम रसाल ।
झालर जलजनि झलकि रहीं, बिच-बिच हीरा लाल ।।8।।
जमुना की छबि कहा कहौं, तहाँ न आनँद थोर ।
मनहुँ ढर्यौ श्रृंगार रस, करि प्रवाह चहुँ ओर ।।9।।
फूल-फूल रहे फूल कै, कमल सुरंग अनेक ।
हंस-हंसिनी फिरत बिच, निर्तत केकी-केक ।।10।।
कुंज-कुंज आसन सुमन, राखी सेज रचाइ ।
भरि सुरंग मादिक विविध, भाजन धरे बनाइ ।।11।।
संपति इक इक कुंज की, को कहि सकै प्रमान ।
शारद जो शत-कोटि मिलि, हारहिं तऊ निदान ।।12।।
मधुर-मधुर गति ताल सौं, कूजत विविध विहंग ।
मनौं द्रुमनि चढ़ि रागिनी, गावतिं तान-तरंग ।।13।।
विविध भाँति रह्यौ फूल कै, वृंदावन निज बाग ।
रति अरु श्री लियैं सोहनी, झारत कुसुम पराग ।।14।।
मनिमय अवनी अति बनी, सुंदर सुभग सुढार ।
बिच कंचन कौ जगमगै, रतन-खचित आगार ।।15।।
फूली फूलनि की लता, रही झरोखनि झूमि ।
प्रतिबिंबित जहँ तहँ मनौं, रची फूलनि की भूमि ।।16।।
सौरभताई जहाँ लगि, अरु सुगंध रस सार ।
तिन करि वासित रहत दिन, उठत मोद उदगार ।।17।।
अति अनूप सुख पुंज में, चितवन चित्त लुभाइ ।
रच्यौ राज-सत राज रति, नाना चित्र बनाइ ।।18।।
भान कोटि तिहिं सम नहीं, झलकत झलक अपार ।
भाँति-भाँति रचना नई, राजत चौंसठ द्वार ।।19।।
द्वार-द्वार प्रति सहचरी, खरी भरी रस- प्रेम ।
तिनके प्यारी पीय की, सेवा ही कौ नेम ।।20।।
मृदु-मृदु दल लै जलज के, अति सुरंग रचि सैन ।
तापर विलसत नवल दोउ, मैंन-रंग भरे नैंन ।।21।।
सुरत- रंग सुख में सरस, दोऊ रस की रासि ।
मरम भिदी बतियनिं करैं, मृदु-मृदु ईषद हांसि ।।22।।
दसन चिलक मुख की दमक, रह्यौ झलकि सब भौंन ।
सो रस तो ललितादि निज, भरि पीवत दृग-दौन ।।23।।
रँगी रंग-अनुराग सौं, पगी दुहुँनि के प्यार ।
और न कछु सुहाइ मन, जीवन युगल-बिहार ।।24।।
सहज सुभग अद्भुत अयन, सुख वरषत चहुँ कोद ।
रँगमगे नवल-किशोर दोउ, तामें करत विनोद ।।25।।
तिहि आगे मंडल सभा, प्रभा कही नहिं जाइ ।
शोभा तँह की देखि कै, शोभा रहत लजाइ ।।26।।
सुरंग बिछौना मृदुल अति, भाँति-भाँति के आनि ।
जो जैसैं जिहिं ठाँ बनैं, सखिनि बिछाये बानि ।।27।।
कंचन कौ रतननि खच्यौ, मनिमय विविध सुरंग ।
सिंहासन झलकत तहाँ, धर पर कछू उतंग ।।28।।
कोमल कुसुमनि की गदी, तापर धरी बनाइ ।
अति सुरंग सौंधे सनी, रह्यौ विपिन महकाइ ।।29।।
मधुर-मधुर खग बोलहीं, डोलैं छबि सौं मोर ।
सखिनि सहित सब दरस कौं, ह्वै रहे मनहुँ चकोर ।।30।।
तब आये मण्डल-सभा, जहाँ सखिनु की भीर ।
भई एक गति सबनि की, बिसरे नैननि-चीर ।।31।।
बन बैठे भली भाँति सौं, नवल लाड़िली-लाल ।
मनौं तमाल ढिंग लसत मृदु, कंचन-बेली बाल ।।32।।
नख शिख पानिप रूप निधि, सहज सरस सुकुमार ।
रोम-रोम वरषत रहै, गुन- माधुरि छबि-वारि ।।33।।
(श्री) राधावल्लभ लाल सिर, फबी चंद्रिका-मोर ।
सुरंग पाग सौं लटक रही, बाम भाग की ओर ।।34।।
लाल भाल पर फबि रही, बैंदी लाल अनूप ।
मनौं मूरति अनुराग की, प्रगट भईं धरि रूप ।।35।।
नासा पुट मुक्ता फब्यौ, चितै रहे दृग द्वंद ।
भाजन भरि तन छलकि परी, मनौं रूप की बुंद ।।36।।
अरुन अधर दशनावली, झलकति परम रसाल ।
हीरनि की पंकति मनौं, बंदन में करी लाल ।।37।।
साँवल मुख छबि-प्रभा पर, वारौं कोटिक चंद ।
जित चितवत वरषत तहीं, सहज रूप-मकरंद ।।38।।
रूप प्रिया कौ कहन कौं, कितक बुद्धि है मोर ।
तेई कुँवर चरननि लुठत, निरखि नैन की कोर ।।39।।
जिहि मनमथ त्रैलोक सब अपने बस कियौ आनि ।
सोई मैंन मोह्यौ चितै, मोहन मृदु मुसकानि ।।40।।
मोहनी सोहनी भौंह तें, उपज्यौं सहज अनंग ।
ते मोहन ध्रुव बस किये, तेहिं मनोज रस-रंग ।।41।।
चितवत मोहन चित्र से, रहे भूलि छबि ऐंन ।
मानौं तेहि ठाँ मोल के, नैननि लीनें नैन ।।42।।
यह सुख देखत हैं सखी, ठाढ़ी सब गहि ठौर ।
वरषत आनँद सबनि पर, रसिकनि-मनि शिरमौर ।।43।।
लक्ष-लक्ष के जूथ तहाँ, अगनित अमित अपार ।
रसन कोटि जौ हौंहि तन, कहि न सकत विस्तार ।।44।।
यूथ-यूथ प्रति नाइका, इक इक सखी उदार ।
तिनके नाम कहौं कछू, अपनी मति अनुसार ।।45।।
ललित विसाखा रूचि लियैं, करत भाँवती बात ।
रँग देवी चित्रा तहाँ, युगल रंग-रस रात ।।46।।
तुंगविद्या चंपकलता, इँदुलेखा गुनखान ।
सखी सुदेवी सहित 'धुव', आठौं परम सुजान ।।47।।
इनमें अंतर नेक नहिं, ज्यौं छाया तन संग ।
मानौं मूरति हेत की, बढ़वति पल-पल रंग ।।48।।
एक वैस छबि-रास सब, भूषन बसन समान ।
एक प्रेम में रहीं सनि, इकमन एकै प्रान ।।49।।
अब कछु तिनके नाम सुनि, हीयौ श्रवन सिरात ।
प्रेम-रंग उर में बढ़ै, और दुःख मिटि जात ।।50।।
चंद्रभागा चंद्रानना, चंद्रप्रभा चित चाव ।
चंद्रकला अरु चंद्रिका, कोमल सहज सुभाव ।।51।।
चंद्रमती चंद्रासखी, चंपक बरनी चारु ।
चित्रांगी चंदनवती, चंद्रजिता चितहार ।।52।।
चपला चतुरा चंचला, चित्तहरा चित चैन।
चंद्रछटा वर चंदिनी, चंद्र-कांति रस ऐंन ।।53।।
चारुमुखी चरिता चतुर, चारुदृगी चल नैन ।
चारुमती चंपक-तनी, चित्रांगी चित-चैन ।।54।।
रस-रंगा रस-रंगिनी, रसपुंजा रस-रूप ।
रस भरी रसिका रसवती, रंगावली अनूप ।।55।।
रतनप्रभा रस-मंजरी, रूप-मंजरी नाम ।
रस-ऐंनी रस-मंजरी, रस-रैंनी रस धाम ।।56।।
रतन-मंजरी रति-कला, राग रंग के साथ ।
रस- दैनी अरु रस-भरी, गहै रसलिका हाथ ।।57।।
वृंदा विपिन- विनोदनी, बन-दीपा बन- कांति ।
वनशोभा अरु बनमती, बन-मोदा भली भाँति ।।58।।
बन-रागा अरु-बन प्रभा, बन-भूषा बन-केलि ।
बन-विज्ञा विजया जया, बन-माला बन-बेलि ।।59।।
सुभग सुमती शारदा, सारंगी रस-सार ।
सुखद जयंती शशि-मुखी, सरसी मुखी उदार ।।60।।
सुघर सुनंदा साँवरी, सहज सलौनी चाहि ।
सिंदूरा शुभ- आनना, शोभा की निधि आहि ।।61।।
सरला सुमना सारिका, सौदामिनी लसंत ।
सुमुखी संग सुकुन्तला, भ्रमत भँवर रस-मंत ।।62।।
मालती माधवी माधुरी, मधुपा कै अति हेत ।
मानवती मंदालसा, मदनावती समेत ।।63।।
मंजुकेश मनमंजरी, मनिकुंडला रसाल ।
मृगनैनी मधुमालती, मंजुपदा मनिमाल ।।64।।
कलहंसी कटिकेहरी, कलवंशी कलकेलि ।
कलनैंनी कलगामिनी कलबैंनी कलबेलि ।।65।।
कंजमुखी कमलावती, कनकांगी रही सोहि ।
केलिकला कृष्णावती, कुमुदा रही छबि जोहि ।।66।।
भाँमा भाँमती भानुजा, भवन-सुंदरी संग ।
भानमती मन-भावनी, भूषनभूषा अंग ।।67।।
भद्रपदा भद्रावती, भामिनि दीपा भौन ।
भद्र-सरूपा भाग-भरी, उपमा दीजै कौन ।।68।।
तानवती तारावती, भरी तमाल रंग ।
तम-हरनी तरला तहीं, तान-तरंगा संग ।।69।।
पिकबैनी प्रेमावली, प्रेमा रस में लीन ।
परिमल पुन्या पावनी, पद्मावती प्रवीन ।।70।।
नीरजनैंनी नंदनी, नेह नवीना नित्त ।
नाद-नंदिनी निर्मला, नवला कोमल चित्त ।।71।।
गुनमाला अरु गुनवती, गुन भूषन गुन खान ।
गुनकंदा अरु गुनकला, गुनभेदा गुन जान ।।72।।
चंप चमेली केतकी, वासंती रस ऐंन ।
बेलि गुलाली सेवती, सेवत हैं दिन रैन ।।73।।
रुप धरैं सब रागिनी, रँगी रंग- अनुराग ।
लाल-लड़ैती कुँवरि कौ, गावत दिनहिं सुहाग ।।74।।
दिवा- जामिनी छहौं ऋतु, ठाड़ी रहैं कर जोर ।
करत जोइ तेहि छिन समुझि, जब चितवत जेहि ओर ।।75।।
गोरी-गोरी सखी जे, भरी प्रिया रस गर्व ।
चंदकिरनि सी चहुँ दिशन, राजत अर्वनि-अर्व ।।76।।
कुंज भृंगी सब सहचरी, मोर मराली चाहि ।
जे हैं प्यारी पक्ष की, ते सगर्व सब आहि ।।77।।
शुक पिक बल्ली सखी सब, हंस मयूरी मोर ।
लिये दीनता रहत दिन, जितक लाल की ओर ।।78।।
जुगल मिलन सुख सहज ही, अद्भुत केलि विहार ।
जीवन सब की एक ही, जीवति तेहि अधार ।।79।।
यह नामावली सखिन की, सुनत रुचैगी जाहि ।
प्रेम बढ़ै शोभा चढ़ै, रहै जाहि तेहि पाहि ।।80।।
रज-कन उड़गन बूँद घन, आवत गिनती माहिं ।
कहत जोई थोड़ी सोई, सखियन संख्या नाहिं ।।81।।
मंडल जोरैं खड़ी मनौं, जुरे चकोरनि बृंद ।
इक टक रहीं निहारि सब, विवि वृंदावन चंद ।।82।।
अपनौ अपनौ गुन जितौ, हित के रस सौं सानि ।
ते सब आगैं दुहुँनि के, प्रगट करति हैं आनि ।।83।।
सखी सुधंगा नृत करै, लियैं कला सब संग ।
देखौ अद्भुत गतिन कौं, होत नैन-मन पंग ।।84।।
उरप तिरप अरु हुरमई, लाग डांट बंधान ।
सरस सुलप सुंदर चलन, मुसिकनि हरत है प्रान ।।85।।
अति प्रवीन सब अंग में, रीझि-रीझि दोउ लाल ।
तबहिं बेलि तेहि सखी कौं, पहिराई उर माल ।।86।।
पाछैं गावत रागिनी, बीना लियै मृदंग ।
एक सारँगी किन्नरी, एक सजै मुहचंग ।।87।।
अमृत- कुंडली हुड़कई, एक गहैं करतार ।
गुन- सरिता उमड़ी मनौं, बाढ्यौ रंग अपार ।।88।।
जितक कला संगीत की, तामें सबै प्रवीन ।
गावत निर्त्तत लेत हैं, अद्भुत गतिनि नवीन ।।89।।
एक वैस गुन राशि सब, तैसौ तिनकौ हेत ।
देखि छबीली छबि तहाँ, रीझि दुँहुनि सुख देत ।।90।।
तानतरंगा निकट ह्वै, गाई बाँकी तान।
तबहिं रीझि तेहि सखी कौं, दिय बुलाय हँसि पान ।।91।।
सोरठा
आँनद मेघ चुचात, सुख कौ सर 'ध्रुव' दिन तहाँ ।
क्यौं आवै कहि बात, वृंदावन-बिधु-सभा की ।।92।।
दोहा
पावस रितु आगम कियौ, अपनी सेवा हेत ।
द्रुम-द्रुम बोलत खग मधुर, नाम सनेह समेत ।।93।।
श्याम सचिक्कन मोहिनी, आई घटा अनूप ।
मनौं रह्यौ बन छाई के, निज सिंगार कौ रूप ।।94।।
ऊँचे नीचे महल की, शिखर सिखी चहुँ ओर ।
जहँ तहँ आनँद रंग भरि, निरतत मोरी-मोर ।।95।।
सुरंग हिडोरे रंग में, झूलत समय विचार ।
पानिप रूप तरँग उठैं, सो छबि रही निहार ।।96।।
रिमझिमि बूँदनि की परनि, गावनि मधुर मलार ।
यह सुख देखत सुनत ही, रहति न देह सँभार ।।97।।
बढ़ी ओप झलकत सबै, पत्र फूल फल डार ।
मानौं मज्जन करि विपिन, फेरि कियौ श्रृंगार ।।98।।
देखि भाँति बन की भली, रुचि में रुचि की गोभ ।
उपजी है मन दुहुँनि कै, एक केलि की लोभ ।।99।।
बाहाँ-जोरी चलत दोउ, देखन हित सब कुंज ।
चहूँ ओर सब सहचरी, मध्य प्रान सुख- पुंज ।।100।।
कमल कुंज आये प्रथम, सहज रंग-रस ऐंन ।
अति सुरंग अंबुज- दलनि, रची तहाँ सखि सैन ।।101।।
देखत रचना रुचिर अति, रीझे दोउ सुकुमार ।
बोलि सखी कमलावती, पहिरायो उर हार ।।102।।
पुनि पौढ़े तिहिं सेज पर, करत हाँसि पर हाँसि ।
भीजे रंग अनंग में, बाढ्यौ हिये हुलास ।।103।।
रति-विनोद बिलसत विविध, उपज्यौ आनँद रंग ।
हँसनि दसनि अंगनि लसनि, छबि के उठत तरंग ।।104।।
लतनि ओट ललितादि निज, सुख देखत भरि नैन ।
कहत बचन जे रँगमगे, सुनत श्रवन है चैन ।।105।।
ता पाछैं तेहि कुंज तें, आये कुंज सिंगार ।
नौतन भूषण बसन तन, पहिराये उर हार ।।106।।
सुरंग सहानी सेज पर, दुलहिनि-दुलह लाल ।
मुसिकनि मन हरि लेत हैं, चितवनि-नैन-विशाल ।।107।।
मैंहँदी कौ रँग बनि रह्यौ, अंजन नैंन सुदेस ।
नवसत अंगनि जगमगै, कहि न सकत छबि लेस ।।108।।
ललिता आनँद रँग भरी, बिवि-मुख चितै अनूप ।
मनहुँ नैन नरजा किये, तोल्यौ करत हैं रूप ।।109।।
जबहिं ढ़रत जिहि कुंज कौं, तहँ की सखी सुजान ।
नैननि के करि पाँवड़े, न्यौछाविर करे प्रान ।।110।।
मान कुंज आये जबहिं, कुंवरि-भौंह भई भंग ।
चितै लाल पाइन परैं, समुझि मान कौ अंग ।।111।।
ऐसे रस में हो प्रिये, ऐसी जिय न बिचारि ।
तासौं इतनी चाहियै, तन मन जोरह्यौ हार ।।112।।
कैसे कै सहि जात है, नेक रुखाई भौंह ।
याते नाहिंन और दुख, प्यारी तेरी सौंह ।।113।।
मेरो तो कछुवै नहीं, तुमही प्राननि प्रान ।
यहै बात जिय समुझिकै, चित जिन आनौं आन ।।114।।
सोरठा
मेरे है गति एक, तुव पद-पंकज की प्रिये ।
अपने हठ की टेक, छाँड़ि कृपा करि लाड़िली ।।115।।
दोहा
मोहन के मोहन वचन, सुनि मोहिनी मुसिकाइ ।
प्यारौ प्यारी प्यार-सौं ढरकि लियौ उर लाइ ।।116।।
तेहि छिन दीनौं अधर रस, नवल रँगीली-बाल ।
तिनकी प्रीति न कहि परै, प्रेम-सींव दोउ लाल ।।117।।
कवित्त
प्यारी जू की रिस ऐसी दामिनी दमकि जैसी, छिन एक चमकि मिलति जाइ घन में ।
नैन नेक बंक करै फिरि ताही रंग ढ़रै, परम कोमल चित रसभरी मन में ।।
उर सौं लपटि रही छबि न परति कही, मानौं मीन विहरत स्याम-सर वन में ।
हित ध्रुव' मान ऐसौ बिरह न हौन पावै, समुझि प्रवीन प्यारी सावधान पन में ।।118।।
दोहा
पुनि हँसि कै तहाँ ते चले, आये कुंज विलास ।
देखत रचना रुचिर अति, बाढ्यौ हियैं हुलास ।।119।।
मनिमय कनक प्रजंक पर, फूलनि सेज बनाय ।
रचि राखी सखियनि जहाँ, अरगजा सौं छिरकाय ।।120।।
मेवा फल सब अमृत मय, चहूँ ओर धरे आनि ।
भाजन भरि मधुर मादिकन, बीरी राखी बानि ।।121।।
आसन मृदु बहु भाँति के, शोभा कही न जाइ ।
कहुँ चौपर सतरँज कहूँ, राखी विविध बिछाइ ।।122।।
हँसि बैठे तेहि सेज पर, हेत सखिनु कौ जांनि ।
कहत परस्पर बैन मृदु, मैन रंग सौं सानि ।।123।।
सोरठा
कहत बनत कछु नाहिं, सुरत-रंग सुख-सिंधु बढ्यौ ।
पैरावत तिहि माहि, पियहि लाइ कुच घटनि सौं ।।124।।
दोहा
सब विधि नागरि निपुन अति, कोक-विलास कलानि ।
उपजत नव-नव भाव सत, गुन-रतननि की खानि ।।125।।
कवित्त
कोटि-कोटि रसना जो रोम-रोम प्रति होंइ, प्यारी जू के रूप कौ न प्रमान कह्यौ जात है ।
अतिहि अगाध सिंधु पार नाहिं पावै कोऊ, थोरी बुद्धि सीप माँझ कैसे कैं समात है ।।
छिन छिन नई-नई माधुरी तरंग रंग, देखैं नख-चंद्रिकानि चंद हू लजात है ।
हित ध्रुव अंग-अंग बरसत छबि स्वाति, नैना पिय-चातिक तौ कैहूँ न अघात हैं ।।126।।
दोहा
रंग कुंज नीकी बनी, रंगावलि चित लाइ ।
दुलहिनि दूलहु हेत सौं, तामें बैठे आइ ।।127।।
रँगमगे दंपति रसमसे, भरयौ हिऐं रस-मैन ।
अतिही रँगीले रँगमगे, कहत परस्पर बैन ।।128।।
उपज्यौ रंग बिनोद इक, सखियन के उर ऐंन।
लाड़-लड़ैती ब्याह कौ, सुख देखैं भरि नैन ।।129।।
तबहिं भाव यह बढ़ि गयौ, सब के भयौ विचार ।
जैसी रीति है ब्याह की, करन लगीं-विधिचार ।।130।।
कुंज-द्वार मंडप रच्यौ, सुमन सुरंग बनाइ ।
हेम-खंभ रतननि खच्यौ, रह्यौ मध्य झलकाइ ।।131।।
हीरा गज-मोतीन की, झालर रची सँभारि ।
षट-रितु मालिन फूल सौं, बाँधी बंदनवारि ।।132।।
एक सखी गाइनि भई, गावति मंगल-गीत ।
और बहुत बाजे लियैं, मगन भईं रस प्रीति ।।133।।
मज्जन की विधि करन कौं, जुरी सखिनु की माल ।
कोलाहल आनंद कौ, बाढ़यौ है तेहि काल ।।134।।
कंचन चौकी पर दोऊ, राजत भाँति अनूप ।
बसन उतारे सुठि बने, बाढ्यौ सतगुन रूप ।।135।।
पट दै बिच अंतर कियौ, चतुर सखी इकसार ।
चंदन कौ करि उबटनौ, उबटत दोउ सुकुमार ।।136।।
सोरठा
होत हि पट की ओट, पिय के दृग व्याकुल भये ।
मनौं कलप सत-कोट, सो छिन तौ ऐसी भई ।।137।।
दोहा
कुंकुम तेल फुलेल मथि, सीसन तैं दियौ डारि ।
मानौं पानिप रूप की, उमड़ि चली मित टारि ।।138।।
अधिक हेत सौं करैं सखी, प्रथम चारु अस्नान ।
इक गावति इक हँसत है, इक वारति है प्राण ।।139।।
एक प्रिया तन होइ कै, कहत वचन परिहास ।
सुनि-सुनि पिय के हीय में, बाढ़त अधिक हुलास ।।140।।
सब सुगंध सों बासि जल, जैसो तनहिं सुहाइ ।
तब सबहिन अति प्यार सौं, लीनें कुँवर न्हवाइ ।।141।।
मंडप वर आसन सुमन, राख्यौ रुचिर बनाइ ।
सुरंग सहाने बसन तहाँ, ल्याईं मृदु पहिराइ ।।142।।
एक सखी अंजन दियौ, एक खवावत पान ।
इक हँसि बाँधत कंकनौ, एक करत है गान ।।143।।
मेहँदी को रँग फबि रह्यौ, भूषन छबि अंग-अंग ।
मगन भईं शोभा निरखि, निर्त्तति नारि अनंग ।।144।।
सीसनि सुभग जराव के, झलकत मौरी मौर ।
देखि छबीली भाँति दोऊ, छबि भूली तेहि ठौर ।।145।।
कुंकुम रोरी रंग लै, चित्रै अद्भुत भाँति ।
किये चित्र रचि मुखन पर, अखियाँ निरखि सिराति ।।146।।
फूल सुनहरे सेहरै, सोभा बढ़ी नवीन ।
प्रान-थार दृग-दीप करि, सखियनि आरति कीन ।।147।।
सुरँग पीत विवि अंचलनि, जोरी ग्रंथि बनाइ ।
चितै कुँवरि मुसिकाइ मृदु, कछु इक रही लजाइ ।।148।।
निगम छंद तब उच्चरत, चतुर सखी द्वै चार ।
जदपि बिवस हैं प्रेमरस, सब बिधि करत सँभारि ।।149।।
अरुन-अरुन मनि फूल बिच, धरि बेदी सो कीन ।
पाछे पिय आगे प्रिया, भाँवरि विधि सौं दीन ।।150।।
एक मधुर मिलि गावही, मंगल गीत सुहाग ।
मानो बोलत कोकिला, मध्य बिपिन अनुराग ।।151।।
तब ललिता हँसिकै कह्यौ, दुहु विधु मुखहि निहारि ।
दूधा-भाती करहु अब, पिय सौं मिलि सुकुँवारि ।।152।।
सुनत सखिन के बचन ये, मुरि बैठी पट तानि ।
मनौं लाज कौ ऐंन रचि, कियौ प्रवेस तहँ आनि ।।153।।
ऊँचे चितवति नेकु नहिं, नमित कर रही नारि ।
घूँघट पट नहीं छाँड़ही, प्रिय कर देति है टारि ।।154।।
तब सखियनि पिय सौं कह्यौ, सुनहु रसिक-वर-राइ ।
जौ रस चाहत आपनौं, गहौ कुँवरि के पाइ ।।155।।
अति सुरंग मुख कमल तें, ललित उगारहिं लेति ।
छल सौं पियहि खवाइ कै, हँसि-हँसि तारी देति ।।156।।
कुँवरि-चरण- छबि मनि मनौं, प्रीतम बंदत ताहि ।
मानौं देवी प्रेम की, पियहि पुजावत आहि ।।157।।
तेहि-तेहि छिन जो सहचरी, करवावत विधिचार ।
करत कुँवर अति प्यार सौं, यहै नेह की ढार ।।158।।
सबही विधि आधीन पिय, पगनि सीस रहे लाइ ।
तबहि लाज पट दूर करि, चितई कछु मुसिकाइ ।।159।।
ऐसैं सुख के रंग की, क्यौं कहि आवै बात ।
जद्दपि बीतत है कलप, छिन के सम ह्वै जात ।।160।।
नित्य-विहार विवाह नित, दुलहिनि-दूलहु लाल ।
नित्य सखी सुख सहजही, लेत रहत सब काल ।।161।।
रस-सनेह-सागर बढ्यौ, नवल रंग रस-सार ।
तेहि रस में सखि मगन भईं, भूली देह सँभार ।।162।।
सोरठा
करवावत सब ख्याल, इच्छा सक्ति सखी तहाँ ।
उपजावत तेहि काल, भाव सबनि के तैसोई ।।163।।
दोहा
बैठे कुंज विनोद में, करत विनोद-बिहार ।
चितवनि मुसिकनि लसनि रद, सोभा-निधि सकुवाँर ।।164।।
लाल सखी कौ भेष कियौ, उपज्यौ चित यहै भाव ।
पट-भूषन नव कुँवरि के, पहिरनि को बढ्यौ चाव ।।165।।
जय सेवा सिंगार की, लगे करन भली भाँति ।
तब फिरि चितवति लाड़िली, लाज सहित मुसिकाति ।।166।।
छुटे बार सौंधे सने, पिय-कर पर प्रिया वार ।
मनौं सिंगारत रचि रुचिर, सिंगारहिं सिंगार ।।167।।
बैनी रचि फूलनि गुही, सुंदर सुभग सुढार ।
नख-सिख भूषन पट बने, अरु गज-मोतिन-हार ।।168।।
नैननि अंजन दियौ जब, रीझे मुकुर निहारि ।
दसन खंडि अति हेत सौं, बीरी दई सुकुँवारि ।।169।।
दसन-बसन रस देत हैं, लालहि लियैं उछंग ।
मांनौं चंदहि चंद मिलि, प्यावत सुधा सुरंग ।।170।।
फूले आनँद रंग भरि, अति सुख कौ रस पाइ ।
नैन छ्वाइ चूमत चरन, कबहुँ रहत उर लाइ ।।171।।
कहा कहौं या प्रेम की, अद्भुत भाँति अनूप ।
वृंदावन घन कुंज में, सेवत रूपहीं रूप ।।172।।
उलटी चाल है प्रेम की, को समुझे बिन लाल ।
ज्यौं- ज्यौं हारै अपनपौ, त्यौं-त्यौं बढ़ै विशाल ।।173।।
कवित्त
प्यारी जू की सारी अति प्यारी लागे प्रीतम कौं, सौंधे भींजी अँगिया सुरंग उर धारी है ।
नवल रँगीलीजू के भूषन बिहारी लाल, पहिरत बाढ़ी फूल जाति न सँभारी है ।।
जोइ कछु प्रियाजू के अंगनि परस होत, सोई प्रान जात होत ऐसी प्यारी प्यारी है ।
हितधुव प्रेम बात कैसेहूँ न कही जात, जानै सोई जेहि सिर मोहनी सी डारी है ।।174।।
दोहा
रैंनि सुहावनी सरद की, राजत सहज सुदेस ।
इक इक मनि आभा मनौं, झलकति सत राकेस ।।175।।
ऐसी रजनी देखि पिय, सजनी मन भयौ मोद ।
पुलिन हंसजा रह्यौ बनि, कीजै रास-बिनोद ।।176।।
सखिन मंडली जुरी तब, हेत दुहुँनि कौ जानि ।
चहूँ ओर सब फिर गई, जोरि पानि सौं पानि ।।177।।
मध्य रसिक दोउ लाड़िले, सभा रही सब हेरि ।
मानौं छबि के चंद द्वै, छबि कमलनि लिये घेरि ।।178।।
सरस एक तें एक सखि, अपनी-अपनी भाँति ।
निर्त्तत अंग सुधंग के, दामिनिसी दमकाति ।।179।।
नवल कुँवर वर कुँवरसौं, कहत बदन तन जोहि ।
अपनीसी गति निर्त्तकी, कछुक सिखावहु मोंहि ।।180।।
नागर-मनि नव-नागरी, समुझि पीय कौ हीय ।
भरी नेह आनंद रस, अद्भुत कौतिक कीय ।।181।।
कंज- दलनि पर रुचिर कल, करति निर्त्त सुकुँवारि ।
तिहिं छिन जहाँ लगि सहचरी, चकित ह्वै रहीं निहारि ।।182।।
जो गति नहिं देखी सुनि, उपजै नव-नव भाई ।
निर्त जु मूर्तिमंत ही, सोउ रही लुभाइ ।।183।।
तिरप बाँधि दल एक पर, अलग लाग तहाँ लीन ।
दूजौ दल परस्यौ नहीं, लाघवता अति कीन ।।184।।
रीझि लाल चूँवत चरन, ऐसी चित्त बिचारि ।
प्रानहारि पहिले रह्यौ, अब कहा दीजै वारि ।।185।।
मोहन सँग महा मोहिनी, सुख बरषत है नित्त ।
चंदनि में अति चमकि रही, चमकावति पिय-चित्त ।।186।।
श्रम-जल-कन मुख गौरपर, चितै रहे पिय मोहि ।
मानौं छबि के कमल पर, छबि के कन रहे सोहि ।।187।।
रविजा-वन परसै पवन, सौरभ घन जनु लेत ।
मंद-मंद जैसी रुचै, आइ दुहुँनि सुख देत ।।188।।
मान सरोवर रसमयी, झलकत निर्मल नीर ।
नव किशोर इक बैस द्रुम, रतन खचित वर तीर ।।189।।
छत्री मध्य जराव की, मैंन-फूल छबि-ऐंन ।
रचि राखी अति हेत सौं, सखियनि तहाँ सुख सैन ।।190।।
देखि भाँति सर की भली, बाढ़ी आनँद-बेलि ।
तामें दोउ निज सखिन जुत, करन लगे जल-केलि ।।191।।
हँसि-हँसि छिरकत आप में, अलबेले सुकुँवार ।
मानौं वारन रूप के, विहरत वारि-विहार ।।192।।
छुटे बार सौंधे सने, छूटि रहे उरहार ।
विवस भये खेलत दोऊ, बाढ़ी चौंप अपार ।।193।।
अंगराग बहु भाँति मिलि, ह्वै गयौ अंबु सुरंग।
मनौं सरस अनुराग के, दिखियत प्रगट तरंग ।।194।।
निकसे दोउ भींजे बसन, सोभा कही न जाइ ।
मानों पानिप रूपकी, बढ़िकै चली चुचाइ ।।195।।
अंग-अंग छबि कहा कहौं, बाढ़ी सतगुन ओप ।
उपमा दुति सब और जे, ते सब ह्वै गईं लोप ।।196।।
पहिरे पट नव जरकसी, मृदु सुरंग अति बाँनि।
सौंधे सौं रहे घमड़ि कै, सौरभता की खाँनि ।।197।।
देखत फिरत निसंक वन, जैसैं मत्त गयंद ।
बिन अकुंस रुचि आपनी, दुरत है मुरत स्वछंद ।।198।।
संग लिये सब सहचरी, विलसत लसत हसंत ।
ऐसी छबि तहाँ रही फबी, खेलत मनौं बसंत ।।199।।
कुंकम तौ तन कौ वरन, अंबर विविध गुलाल ।
अधर दसन मनौं फूल भये, अबुंज नैन बिशाल ।।200।।
नौलासी भुज-लतनि की, आगम जोवन मौर ।
कुच-गेंदुक उर फूल भई, उपमा नहिं कछु और ।।201।।
चितवन मुसकनि छिरकिबौ, बाजे भूषन-राव ।
देखत ऐसी मंडली, उपजत है चित चाव ।।202।।
इहि बिधि तौ खेलत रहैं, दिनहि बसंत रु फाग ।
यह सुख जो चिंतत रहै, ताही के 'ध्रुव' भाग ।।203।।
कुंज-कुंज सब ऐसैं ही, कीनें विविध विनोद ।
ता पाछे दोउ रँग भरे, चले महल की कोद ।।204।।
झलकत हैं छबि चंद द्वै, सखिनु-माल चहुँ ओर ।
मानौं घेरे फिरत हैं, सबके नैन-चकोर ।।205।।
ठाढ़े भये मंडल सभा, सोभा-सिंधु अगाध ।
जैसी रुचि ही सखिनि की, पुजई सब की साध ।।206।।
फूली अंग न मात हैं, भरी रंग आनंद ।
जीवन सबके एकही, विवि वृंदावन चंद ।।207।।
रचि मृदु आसन सुमन पर, बैठारे दोउ लाल ।
अति प्रवीन सेवा करैं, जैसी रुचि जेहि काल ।।208।।
विविध भाँति विंजन अधिक, आगे राखे आनि ।
मधुर सलोने चरपरे, खाटे-मीठे बाँनि ।।209।।
हँसि-हँसि स्वाद सराहि दोउ, ग्रास परस्पर लेत ।
ललित-विसाखा तेहि समैं, वारि प्रान धन देत ।।210।।
कछु खाये सखियनि दिये, नागर नवल प्रवीन ।
अमृत चितवनी चितै सखि, बोलि सबनि सुख दीन ।।211।।
चतुर सिरोमनि नेह-निधि, सब विधि रूप-निधान ।
पग धारे निजु महल कौं, करि सब कौ सनमान ।।212।।
मंडल सब देखत फिरत, बीते कलप अनेक।
सहचरि यौं मानत भईं, मनौं भई घरी एक ।।213।।
जब जाने सबही श्रमित, नवल भामिनी-स्याम ।
बाढ्यौ तिनके हेत यह, नेकु करें विश्राम ।।214।।
भाँति रँगीली सेज पर, रहे लटकि लपटाइ ।
ललितादिक निजु सहचरी, तहाँ पलोटतिं पाँइ ।।215।।
एक सुनावत सारँगी, रँग भीनी लिये बीन ।
मंद मधुर सुर गावहीं, रुचि लिये ताँन नवीन ।।216।।
दोहा
राग-रंग जुत प्रेम रस, अद्भुत केलि अनंग ।
छिन-छिन आनँद सिंधु के, उठिबौ करत तरंग ।।217।।
कवित्त
नवल रँगीले लाल रस में रसीले अति, छबि सौं छबीले दोऊ उर घुरि लागे हैं ।
नैंननिं सौं नैंन कोर मुख-मुख रहे जोर, रुचि कौ न ओर-छोर ऐसे अनुरागे हैं ।।
परे रूप-सिंधु माँझ जानत न भोर-साँझ, अंग-अंग मैंन-रंग मोद-मद पागे हैं ।
हित ध्रुव' बिलसत तृपित न होत कैहूँ, जद्दपि लड़ैती-लाल सब निसि जागे हैं ।।218।।
दोहा
नित उठि जो गावै सुनै, "मंडल-सभा-सिंगार"।
सो ध्रुव पावै वेग ही, प्रेम-कृपा कौ हार ।।219।।
सोरठा
मंडल सभा-सिंगार', सोलह सै इक्यासिया ।
सकल रसनि कौ सार, हित ध्रुव बरने जथा मति ।।220।।
दोहा कवित्त अरु सोरठा, द्वै सत तिथि गुन वेद ।
या रँग में जे रँगि रहे, तेई पैहैं भेद ।।221।।
द्वै सत ऊपर अष्ट दस, और सवैया चार ।
अद्भुत युगल बिहार रस, छिन छिन 'ध्रुव' उर धार ।।222।।
दोहा द्वै सत बीस इक, बरनत युगल-विलास ।
सुनत सुनावत सरस "धुव", रसिकन होत हुलास ।।223।।
जै जै श्री शृंगार सभा मण्डल की जै जै श्री हित हरिवंश
20. रस मुक्तावली लीला
दोहा
प्रथमहि श्रीगुरु के चरन, उर धरि करौं विचारि ।
वैस वेष सखि भाव सौं, अद्भुत रूप निहारि ।।1।।
एती मति मोपै कहाँ, सिंधु न सीप समाइ ।
रसिक अनन्यनि कृपा बल, जो कछु बरन्यौ जाइ ।।2।।
चौपाई
रसिक अनन्यनि कृपा मनाऊँ ।
वृंदावन रस कछु इक गाऊँ ।।3।।
जोजन पंच विहार-स्थाना ।
श्रीपति, श्री सौं कह्यौ प्रमाना ।।4।।
रतन खचित कंचन की अवनी ।
झलकि रही सोभा अति कवनी ।।5।।
कुंदन बेलि द्रुमनि लपटानी ।
मुक्तनि-लता भरी छबि पानी ।।6।।
जगमगात है सब वन ऐसैं ।
दामिनि कोटि लसति घन जैसैं ।।7।।
राजत हंस-सुता छबि न्यारी ।
रसपति रस की मनौं पनारी ।।8।।
बहु विधि रंग कमल कल कूले ।
आनँद फूल जहाँ-तहाँ फूले ।।9।।
भ्रमत मधुप सौरभ-रस-माते ।
पंछी सबै गान-गुन राते ।।10।।
कोकिल कीर कपोत रसाला ।
छबि सौं निर्त्तत मोर मराला ।।11।।
जेहि बन कौं शिव श्री पति गावैं ।
मन प्रवेश तहाँ कैसैं पावैं ।।12।।
अगम अगाध सबनितें न्यारौ ।
प्रेम खेल तेहि ठाँ विस्तारौ ।।13।।
दोहा
प्रेम रासि दोउ रसिक वर, रूप रंग रस ऐंन ।
मैंन-खेल खेलत तहाँ, नहिं जानत दिन-रैंन ।।14।।
चौपाई
मंडल मनिमय अधिक विराजै ।
निरखत कोटि भान-ससि लाजै ।।15।।
तापर कमल सुदेस सुवासा ।
षोडस-दल राजत चहुँ पासा ।।16।।
मध्य किशोर-किशोरी सोहैं ।
दल-दल प्रति सहचरि छबि जोहैं ।।17।।
अति सरूप मोहन सुकुँवारा ।
रँगे परस्पर प्रेम अपारा ।।18।।
रसिकानंद रसिकनी संगा ।
विलसत हैं नव केलि अनंगा ।।19।।
एक वैस रुचि एकै प्राना ।
जीवन अधर-सुधा-रस पाना ।।20।।
अद्भुत रसनिधि जुगल-विहारा ।
सब सखियनि के यहै अहारा ।।21।।
अष्ट सखी मनौं मूरति हित की ।
अति प्रवीन सेवा करैं चितकी ।।22।।
आठ-आठ सहचरि दिन संगा ।
रँगी निरंतर तिहिं सुख रंगा ।।23।।
दोहा
नाम वरन सेवा बसन, जैसैं सुने पुरान ।
ते सब ब्यौरे सौं कहौं, अपनी मति अनुमान ।।24।।
चौपाई
ललिता परम चतुर सब बातनि ।
जानति है निज नेह की घातनि ।।25।।
पाननिं बीरी रुचिर बनावै ।
रुचि लै रचि-रचि रुचि सौं ख्वावै ।।26।।
मुख सौं वचन सोई तौ काढ़ैं ।
जातैं दुहुँ में अति रुचि बाढ़ैं ।।27।।
दोहा
गोरोचन सम तन प्रभा, अद्भुत कही न जाइ ।
मोर-पिच्छ की भाँति के, पहिरे बसन बनाइ ।।28।।
रतन प्रभा अरु रति कला, सुभा निपुन सब अंग ।
कलहंसीरु कलापनी, भद्र सौरभा संग ।।29।।
मनमथ मोदा मोद सौं, सुमुखी है सुख रास ।
निसि दिन ये आठौं सखी, रहैं ललिता के पास ।।30।।
चौपाई
सखी विसाखा अति ही प्यारी ।
कबहुँ न होति संग ते न्यारी ।।31।।
बहु बिधि रंग बसन जो भावै ।
हित सौं चुनि के लै पहिरावै ।।32।।
ज्यौं छाया ऐसैं सँग रहही ।
हित की बात कुँवरि सौं कहही ।।33।।
दोहा
दामिनि-सत-दुति देह की, अधिक प्रिया सौं हेत ।
तारा मंडल से बसन, पहिरैं अति सुख देत ।।34।।
माधवि, मालती, कुंजरी, हरिनी चपला नैंन ।
गँध-रेखा, सुभ-आनना, सौरभी कहैं मृदु बैंन ।।35।।
चौपाई
चंपकलता चतुर सब जानै ।
बहुत भाँति के बिंजन बानै ।।36।।
जेहि-जेहि छिन जैसी रुचि पावै ।
तैसे बिंजन तुरत बनावै ।।37।।
चंपकलता चंपक बरन, उपमा कौं रह्यौ जोहि ।
नीलांबर दियौ लाड़िली, तन पर रह्यौ अति सोहि ।।38।।
दोहा
कुरंगाछी, मन-कुंडला, चंद्रिका अति सुख दैन ।
सखी सुचरिता, मंडनी, चंद्रलता रति ऐंन ।।39।।
राजत सखी सुमंदिरा, कटि-काछनी समेत ।
बिबिधि भाँति बिंजन करै, नवल जुगल के हेत ।।40।।
चौपाई
चित्रा सखी दुहुँनि मन भावै ।
जल सुगंध लै आनि पिवावै ।।41।।
जहाँ लगि रस पीवे के आहीं ।
मेलि सुगंध बनावै ताहीं ।।42।।
जिहिं छिन जैसी रुचि पहिचानै ।
तबही आनि करावति पानैं ।।43।।
दोहा
कुंकुम को सो बरन तन, कनक-बसन परिधान ।
रूप चतुरई कहा कहौं, नाहिन कोउ समान ।।44।।
सखी रसालिका तिलकनी, अरु सुगंधिका नाम ।
सौर-सैन अरु नागरी, रामिलका अभिराम ।।45।।
नाग-बेंनिका नागरी, भरी सबै सुख रंग ।
हित सौं ये सेवा करैं, श्रीचित्रा के संग ।।46।।
चौपाई
तुँगविद्या सब विद्या माँही ।
अति प्रवीन नीके अवगाही ।।47।।
जहाँ लगि बाजे सबै बजावै ।
राग-रागिनी प्रगट दिखावै ।।48।।
गुनकी अवधि कहत नहिं आवै ।
छिन छिन लाड़िली-लाल लड़ावै ।।49।।
दोहा
गौर बरन छबि-हरन मन, पंडुर बसन अनूप ।
कैसैं बरन्यौ जात है, यह रसना करि रूप ।।50।।
मंजु-मेधा अरु मेधिका, तनु-मध्या मृदु बैंन ।
गुनचूड़ा बारंगदा, मधुरा मधुमय ऐंन ।।51।।
मधु-अस्पंदा अति सुखद, मधुरेच्छना प्रवीन ।
निसि दिन तौ ये सब सखी, रहत प्रेम रस लीन ।।52।।
चौपाई
इंदुलेखा अति चतुर सयानी ।
हित की रासि दुहुँनि मनमानी ।।53।।
कोक कला घातनि सब जानै ।
काम कहानी सरस बखानै ।।54।।
बसी- करन निजु-प्रेम के मंत्रा ।
मोहन-विधि के जानत जंत्रा ।।55।।
दोहा
छिन छिन ते सब पियहि सिखावै ।
तातें अधिक प्रिया मन भावै ।।56।।
देह प्रभा हरताल रँग, बसन दाड़िमी-फूल ।
अधिकारिनि सब कोस की, नाहिंन कोउ समतूल ।।57।।
चित्रलेखा अरु मोदिनी, मंदालसा प्रवीन ।
भद्रतुंगा अरु रसतुँगा, गानकला रस लीन ।।58।।
सोभित सखी सुमंगला, चित्रांगी रस दैंन ।
ये तौ रहैं सब बात में, सावधान दिन-रैंन ।।59।।
चौपाई
रँगदेवी अति रंग बढ़ावै ।
नख सिख लौं भूषन पहिरावै ।।60।।
भाँति-भाँति के भूषन जेते ।
सावधान ह्वै राखत तेते ।।61।।
कमल-केसरी आभा तन की ।
बड़ी सक्ति है चित्र लिखन की ।।62।।
दोहा
तन पर सारी फबि रही, जपा-पुहुप के रंग ।
ठाढ़ी सब अभरन लियैं, जिनकैं प्रेम अभंग ।।63।।
कलकंठी अरु ससि कला, कमला अतिहि अनूप ।
मधुरिंदा अरु सुंदरी, कंदर्पा जु सरूप ।।64।।
प्रेममंजरी जो कहै, कोमलता गुन गाथ ।
एतौ सब में पगी, रँगदेवी के साथ ।।65।।
चौपाई
सखी सुदेवी अतिहि सलौंनी ।
काहूँ अंग नाहिनैं औंनी ।।66।।
सुठि सरूप मोहन मन भावै ।
रुचि सौं सब सिंगार बनावै ।।67।।
कच-कबरी गूँथति है नीकी ।
अति प्रवीन सेवा करै जी की ।।68।।
अंजन-रेख बनाइ सँवारै ।
रीझि मुकर लै प्रिया निहारै ।।69।।
सारौ सुवा पढ़ावति नीकैं ।
सुनि-सुनि मोद होत सबही कैं ।।70।।
दोहा
अति प्रवीन सब अंग में, जानत रस की रीति ।
पहिरैं तन सारी सुही, वढ़वति पल-पल प्रीति ।।71।।
कावेरी रु मनोहरा, चारु कबरि अभिराम ।
मंजु केसी अरु केसिका, हार-हीरा छबि धाम ।।72।।
महा हीरा अतिही बनी, हीरा-कंठ अनूप ।
उपमा कछु नहिं कहि सकत, ऐसी सबै सरूप ।।73।।
कहे गौतमी तंत्र में, इन सखियनि के नाम ।
प्रथम वंदि इनके चरन, सेवहु स्यामा - स्याम ।।74।।
जो यह टहल सखीनि की, रहत बिचारत नित्त ।
सो पावै 'ध्रुव' प्रेम रस, तेहि सुख सौं रँगै चित्त ।।75।।
चौपाई
सबै सखी इहि बिधि ज्यौ ज्यावैं ।
छिन छिन प्रति नव लाल लड़ावैं ।।76।।
फूलनि कुंज अनूप बनावैं ।
लै गुलाब-दल सेज रचावैं ।।77।।
तापर लाल -लाड़िली सोहैं ।
अति आसक्त परस्पर जोहैं ।।78।।
चितवनि मुसिकनि अति रस भींनी ।
मैंन अनी मनौं आगे कीनी ।।79।।
आलिंगन चुम्बन अनुरागे ।
अद्भुत सुरत प्रेम-रस पागे ।।80।।
बिच-बिच बतियाँ कहत सुहाई ।
अँखियन सौं अँखियाँ अरुझाई ।।81।।
तेहि सुख-रंग में रैंन बिहानी ।
रति बिहार की तृपति न मानी ।।82।।
अंग-अंग ऐसैं लपटानें ।
गौर स्याम तहाँ जात न जाने ।।83।।
दोहा
रैंन घटी रुचि नहिं घटी, अद्भुत जुगल-विहार ।
तन मन अरुझे लेत हैं, अधर-सुधा रस सार ।।84।।
चौपाई
भोर भयैं सहचरि सब आईं ।
यह सुख देखति करति बधाई ।।85।।
कोउ बीना सारंगी बजावैं ।
कोउ इक राग विभासहि गावैं ।।86।।
एक चरन हित सौं सहिरावै ।
एक बचन-परिहास सुनावै ।।87।।
उठि बैठे दोउ लाल रँगीले ।
बिथुरी अलक सबै अँग ढीले ।।88।।
घूमत अरुन नैन अनियारे ।
भूषन-बसन न जात सँभारे ।।89।।
कहूँ अंजन कहूँ पीक रही फबि ।
कैसैं कही जाति है सो छबि ।।90।।
हार-वार मिलि कैं अरुझाने ।
निसि के चिन्ह निरखि मुसिकाने ।।91।।
दोहा
निरखि-निरखि निसि के चिन्हनिं, रोमांचित ह्वै जाहिं ।
मानौं अंकुर मैन के, फिरि निपजे तन माहिं ।।92।।
चौपाई
अद्भुत मिश्री मेलि मलाई ।
अधिक हेत सौं आनि खवाई ।।93।।
चितवत जुगल बदन-बिधु ओरी ।
मानौं रसभरी त्रिषित चकोरी ।।94।।
दोहा
कीनी मंगल आरती, मंगल निधि सुकुँवार ।
मंगल भयौ सब सखिनु कै, यह रस प्रेम अधार ।।95।।
चौपाई
एक सखी ल्याई पिकदानी ।
एक लियैं झारी भरि पानी ।।96।।
रतन खचित कंचन की चौकी ।
झलमलात सोभा रवि सौ की ।।97।।
कोमल कुसुमनिं गदी बिछाई ।
अति सुगंध सौंधे छिरकाई ।।98।।
तेहि ऊपर बैठे दोउ प्यारे ।
जल सुगंध सौं बदन पखारे ।।99।।
सहचरी एक मुकुर लियैं ठाढी ।
झलकनि सोभा सतगुन बाढ़ी ।।100।।
तेहि छिन कछु खैवैं कौं लाई ।
मादिक मधुर बात मन भाई ।।101।।
दोहा
बहु बिधि मेवा मधुर फल, कढ्यौ दूध इकसार ।
लै आई निज सहचरी, जानि कलेऊ वार ।।102।।
चौपाई
हँसि-हँसि नवल जुगल कछु लयौ।
सखियनिं के मन आनँद भयौ।।103।।
ललिता पान खवावत खरी ।
निरखत छबि आनँद रस भरी ।।104।।
ख्वाइ प्याइ कैं जब मन मान्यौ ।
मंजन कौ हित सबहिनि ठान्यौ ।।105।।
काहू सखी तप्त जल आन्यौ ।
काहू घोरि उबटनौ बान्यौ ।।106।।
एक फुलेल अरगजा ल्याई ।
टहल हेत सब फिरति हैं धाई ।।107।।
दंपति-सुख के रस में भींजी ।
छिन-छिन तिन की प्रीति नवीनी ।।108।।
एकै रस भींनी रहैं नितहीं ।
जानत नहिं निसि-वासर कितहीं ।।109।।
सवैया
सखी चहुँ कोद फिरैं चकडोरी सी, सेवा कौ चाव बढ्यौ मन माँही ।
सौंज सिंगार नई-नई आनति, वानत नैकहूँ हारत नाँही ।।
प्रेम पगी तेहि रंग रँगी, निरखैं तिनकौं तनकौ न अघाहीं ।
और सवाद लगे 'ध्रुव' फीके, रहैं विवि-रूप के छत्र की छाँही ।।110।।
चौपाई
रतन-कुंज में आये दोऊ ।
ललितादिक बिनु तहाँ न कोऊ ।।111।।
दोहा
चाँपि चुपरि मृदु सेज पर, न्यौछावर करि प्रान ।
अति सुगंध जल उस्न सौं, करवावतिं स्नान ।।112।।
चौपाई
अद्भुत अंग अगौंछे जबही ।
कोटि आरसी वारीं तबही ।।113।।
पुनि सिंगार कुंज में आये ।
मन भाये सिंगार कराये ।।114।।
मन की रुचि लै सेवा करहीं ।
छिन-छिन प्रति ऐसैं अनुसरहीं ।।115।।
फूलनि-आसन रचे बनाई ।
भोजन कुंज में बैठे जाई ।।116।।
मनि-मय चौकी राखी आनि ।
हेम-थार तापर धरयौ वानि ।।117।।
झलकि रहे बहु कनक-कटोरा ।
बिंजन भरि-भरि धरे चहुँ ओरा ।।118।।
मध्य अनूप खीर अति नीकी ।
भरी कटोरी सौंधे घी की ।।119।।
उज्वल मिश्री पीस मिलाई ।
रसना स्वादहि कहि न सकाई ।।120।।
एक दूध के बहुत प्रकारा ।
कहि न सकत तिनके बिस्तारा ।।121।।
विविध भाँति पकवान बनाये ।
ते सब नवल जुगल मन भाये ।।122।।
मोहन-भोग सरस घी माँही ।
अति कोमल उपमा कछु नाहीं ।।123।।
पतरी रोटी घी सौं सनी ।
बरी फुलौरी अति ही बनी ।।124।।
खाटे चरपरे बरे सलोने ।
घृत में नीके बने निमोने ।।125।।
पापर कचरी गीचे नीके ।
पावत रुचि सौं प्यारे जीके ।।126।।
सालन साक और तरकारी ।
रसना स्वादहि लेत न हारी ।।127।।
दोहा
जो बिंजन कर पल्लवनि, छुवति छबीली बाल ।
तहाँ ते रुचि सौं लेत हैं, नवल रँगीले लाल ।।128।।
चौपाई
चंपक लता चौंप सौं जिंवावै ।
ललिता बातनिं रुचि उपजावै ।।129।।
पीत भात सिखरन सुठि गाढ़ी ।
ग्रास लेत अति ही रुचि बाढ़ी ।।130।।
दोहा
हँसि-हँसि दोउ नागर नवल, ग्रास परस्पर लेत ।
ललितादिक निज सखिनु के, नैंननिं कौं सुख देत ।।131।।
चौपाई
दूध पना सरबत रुचि कारी ।
बहुत भांति सौं तक्र सँवारी ।।132।।
हित की निधि सहचरी चहुँ ओरैं।
कौर-कौर प्रति सबै निहारैं ।।133।।
हँसि-हँसि जैंवत हैं पिय-प्यारी।
तेहि छिन कौ सुख कहौं कहारी ।।134।।
मन जानै कै दोऊ नैंना ।
रसना पै कछु कहत बनैंना ।।135।।
यह आनंद कहयौ नहिं जाई ।
रसना कोटि होहिं जौ माई ।।136।।
तब सखियनि आचमन दिवायौ ।
सबके नैंन-प्रान सुख पायौ ।।137।।
ललिता रचि-रचि बीरी कीनी ।
नवल कुँवरि अरु कुँवरहि दीनी ।।138।।
दोहा
नैन दीप हिय-थार भरि, पूरि प्रेम घृत ताहि ।
लीने हित के करनि सौं, आरति करतिं उमाहि ।।139।।
चौपाई
सो प्रसाद सब सखियनि लीनौं ।
अपनौ सेस 'ध्रुवहि' कछु दीनौं ।।140।।
इहि विधि कै जो भोग लगावै ।
ताकी चरन रैंनु 'ध्रुव' पावै ।।141।।
दोहा
सखियन अद्भुत सेज रचि, नव निकुंञ्ज रस-ऐन ।
तहाँ रसिक दोउ लाड़िले, करत सुखद सुख सैंन ।।142।।
चौपाई
उर सौं उर नैननिं सौं नैंना ।
मन सौं मन बैननिं सौं बैंना ।।143।।
दसननि अधर रही धरि प्यारी ।
करुना रस की निधि सुकुमारी ।।144।।
सुख के सिंधु परे पिय गहरैं ।
रति-बिनोद की उठति हैं लहरैं ।।145।।
ललितादिक तेहि सुखहि निहारैं ।
प्रेम बिबस प्राननि कौं वारैं ।।146।।
दोहा
मदन-मोद आनन्द मद, मते रहत निशि भोर ।
कुसल सुरत रस सूर दोउ, नागर नवल-किशोर ।।147।।
चौपाई
जबही घरी चार दिन रह्यौ ।
प्रीतम प्रान-प्रिया सौं कहयौ ।।148।।
चलहुँ कुँवरि देखैं बनराई ।
फूलनिं सोभा कही न जाई ।।149।।
फूलीं लता बढ़ी तरु छाँही ।
झूमि रही जमुना-जल माहीं ।।150।।
सिमटीं आइ सखी हितकारी ।
एक बैस अति ही सुकुँवारी ।।151।।
विबिध भाँति मधु भोजन आन्यौ ।
सब सुगंध सौं बास्यौ पान्यौ ।।152।।
जोइ भायौ सोई कछु लीनौ ।
पुनि बन देखन कौ मन कीनौ ।।153।।
दोहा
भीने अति रस रंग में, नवल रँगीले लाल ।
बाहाँ जोरी चलत दोउ, मत्त मरालनि चाल ।।154।।
चौपाई
जिहिं द्रुम बेलि फूल तन हेरैं ।
सींचत मनौं अनुराग सौं फेरैं ।।155।।
निकसत हैं घन बीथिन माहीं ।
नवल निचोलनि परसत नाहीं ।।156।।
बंशीवट तट रबिजा तीरैं ।
शीतल मंद सुगंध समीरैं ।।157।।
उज्वल चौक अधिक झलकाई ।
मानौं सोभा आनि बिछाई ।।158।।
सखियनि-सभा तहाँ सुखदाई ।
सुख की सींव कही नहि जाई ।।159।।
मध्य महा मन मोहन माई ।
आनँद छबि सब पर बरषाई ।।160।।
बैठे दोऊ ग्रीवा भुज मेलैं ।
नैंननि-खेल परस्पर खेलैं ।।161।।
अपनैं-अपनैं गुनहिं दिखावै ।
निर्तत एक-एक मिलि गावैं ।।162।।
दोहा
सहज रूप के चंद द्वै, सखिन पुंज चहुँ ओर ।
मानौं पीवत छबि-सुधा, सब के नैन-चकोर ।।163।।
चौपाई
सखी सबै चहुँ ओर सुहाई ।
निरखति फूलीं अंगनिं माई ।।164।।
एक सारंगी बीन सुनावै ।
एक मृदंग अनूप बजावै ।।165।।
तिरप लेत झलकत तनु ऐसैं ।
बहुत रंग की दामिनि जैसैं ।।166।।
राग-रागिनि मूरति धारैं ।
सखी रूप सेवत सुख वारैं ।।167।।
कोटि कलप जौ यह सुख देखै ।
रुचि न घटै छिन की सम लेखै ।।168।।
दोहा
अद्भुत मीठे मधुर फल, ल्याईं सखी बनाइ ।
ख्वावत प्यारे लाल कौं, पहिलैं प्रियहिं चखाय ।।169।।
चौपाई
रजनी मुख सोभा अति बढ़ी ।
पानिप मैंन दुहँनि मुख चढ़ी ।।170।।
हुलसि हियैं आनँद-रस भरे ।
चाह-चौंप रति-रँग में परे ।।171।।
सैन समय की बिरियाँ जानी ।
भोजन सौंज तबहि कछु आनी ।।172।।
दूध भात मधु अति रुचिकारी ।
जल सुगंध भरि आनी झारी ।।173।।
ख्वाइ प्याइकैं बीरी दीनी ।
प्रेम प्यार सौं आरति कीनी ।।174।।
मदन-रंग नैंननि झलकान्यौ ।
मन कौ हेत सखिनु जब जान्यौ ।।175।।
कलप द्रुमनि कल कुंज सुहाई ।
षोडस द्वार बने तहाँ माई ।।176।।
इक इक मनि की आभा ऐसी ।
कोटि दिवाकर प्रभा न तैसी ।।177।।
कोमल कमलनि के दल लीने ।
अति सुगंध सौंधे सौं भीने ।।178।।
रचि बिचित्र बर सेज बनाई ।
निरखत नैंन मैंन अरुझाई ।।179।।
दोहा
सेज सुखद रचना रची, लै मृदु कुसुमनि मोद ।
तेहि ऊपर सुकुँवार दोऊ, करत विलास बिनोद ।।180।।
सौंधो पान सुगंध मधु, दूध सौं मिश्री छानि ।
भरि भरि भाजन हेम के, सखियनि राखे वानि ।।181।।
चौपाई
सबै सौंज गृह धरी बनाई ।
आपुन लतिन ओट रहीं जाई ।।182।।
तब दोऊ बतियनि के रस परे ।
आलिंगन चुंबन अनुसरे ।।183।।
रूप मदन गुन नेह के ऐंना ।
तन मन अरुझि नैंन सौं नैंना ।।184।।
जो रस उपजत है दुहुँ माहीं ।
ललितादिक निरखत न अघाहीं ।।185।।
यह रस तौ समुझै नहि कोई ।
जानै सो जो इनकौ होई ।।186।।
दोहा
रूप तरंगनि में परीं अखियाँ मीन अनूप ।
सुरत-सिंधु सुख झिलि रहे साँवल गौर सरूप ।।187।।
सेज सुरत सरिता मनौं मज्जत दोउ सुकुँवार ।
बिवस लाल पैरत फिरैं, कुच तुंबन आधार ।।188।।
अद्भुत रस मुक्तावली मंडल केलि-विहार ।
हित ध्रुव' जो गावै सुनै, पावै प्रेम अपार ।।189।।
साँझ-भोर लौं ऐसैंही भोर-साँझ लौं जानि ।
हित ध्रुव' यह सुख सखिनि कौ निस-दिन उर में आनि ।।190।।
दोहा चौपई एक सत, नब्बै अति अभिराम ।
हित ध्रुव' रस मुक्तावली, रसिक-जननिं विश्राम ।।191।।
जै जै श्री रसमुक्तावली लीला की जै जै श्री हरिवंश
दोहा
प्रथमहि श्रीगुरु के चरन, उर धरि करौं विचारि ।
वैस वेष सखि भाव सौं, अद्भुत रूप निहारि ।।1।।
एती मति मोपै कहाँ, सिंधु न सीप समाइ ।
रसिक अनन्यनि कृपा बल, जो कछु बरन्यौ जाइ ।।2।।
चौपाई
रसिक अनन्यनि कृपा मनाऊँ ।
वृंदावन रस कछु इक गाऊँ ।।3।।
जोजन पंच विहार-स्थाना ।
श्रीपति, श्री सौं कह्यौ प्रमाना ।।4।।
रतन खचित कंचन की अवनी ।
झलकि रही सोभा अति कवनी ।।5।।
कुंदन बेलि द्रुमनि लपटानी ।
मुक्तनि-लता भरी छबि पानी ।।6।।
जगमगात है सब वन ऐसैं ।
दामिनि कोटि लसति घन जैसैं ।।7।।
राजत हंस-सुता छबि न्यारी ।
रसपति रस की मनौं पनारी ।।8।।
बहु विधि रंग कमल कल कूले ।
आनँद फूल जहाँ-तहाँ फूले ।।9।।
भ्रमत मधुप सौरभ-रस-माते ।
पंछी सबै गान-गुन राते ।।10।।
कोकिल कीर कपोत रसाला ।
छबि सौं निर्त्तत मोर मराला ।।11।।
जेहि बन कौं शिव श्री पति गावैं ।
मन प्रवेश तहाँ कैसैं पावैं ।।12।।
अगम अगाध सबनितें न्यारौ ।
प्रेम खेल तेहि ठाँ विस्तारौ ।।13।।
दोहा
प्रेम रासि दोउ रसिक वर, रूप रंग रस ऐंन ।
मैंन-खेल खेलत तहाँ, नहिं जानत दिन-रैंन ।।14।।
चौपाई
मंडल मनिमय अधिक विराजै ।
निरखत कोटि भान-ससि लाजै ।।15।।
तापर कमल सुदेस सुवासा ।
षोडस-दल राजत चहुँ पासा ।।16।।
मध्य किशोर-किशोरी सोहैं ।
दल-दल प्रति सहचरि छबि जोहैं ।।17।।
अति सरूप मोहन सुकुँवारा ।
रँगे परस्पर प्रेम अपारा ।।18।।
रसिकानंद रसिकनी संगा ।
विलसत हैं नव केलि अनंगा ।।19।।
एक वैस रुचि एकै प्राना ।
जीवन अधर-सुधा-रस पाना ।।20।।
अद्भुत रसनिधि जुगल-विहारा ।
सब सखियनि के यहै अहारा ।।21।।
अष्ट सखी मनौं मूरति हित की ।
अति प्रवीन सेवा करैं चितकी ।।22।।
आठ-आठ सहचरि दिन संगा ।
रँगी निरंतर तिहिं सुख रंगा ।।23।।
दोहा
नाम वरन सेवा बसन, जैसैं सुने पुरान ।
ते सब ब्यौरे सौं कहौं, अपनी मति अनुमान ।।24।।
चौपाई
ललिता परम चतुर सब बातनि ।
जानति है निज नेह की घातनि ।।25।।
पाननिं बीरी रुचिर बनावै ।
रुचि लै रचि-रचि रुचि सौं ख्वावै ।।26।।
मुख सौं वचन सोई तौ काढ़ैं ।
जातैं दुहुँ में अति रुचि बाढ़ैं ।।27।।
दोहा
गोरोचन सम तन प्रभा, अद्भुत कही न जाइ ।
मोर-पिच्छ की भाँति के, पहिरे बसन बनाइ ।।28।।
रतन प्रभा अरु रति कला, सुभा निपुन सब अंग ।
कलहंसीरु कलापनी, भद्र सौरभा संग ।।29।।
मनमथ मोदा मोद सौं, सुमुखी है सुख रास ।
निसि दिन ये आठौं सखी, रहैं ललिता के पास ।।30।।
चौपाई
सखी विसाखा अति ही प्यारी ।
कबहुँ न होति संग ते न्यारी ।।31।।
बहु बिधि रंग बसन जो भावै ।
हित सौं चुनि के लै पहिरावै ।।32।।
ज्यौं छाया ऐसैं सँग रहही ।
हित की बात कुँवरि सौं कहही ।।33।।
दोहा
दामिनि-सत-दुति देह की, अधिक प्रिया सौं हेत ।
तारा मंडल से बसन, पहिरैं अति सुख देत ।।34।।
माधवि, मालती, कुंजरी, हरिनी चपला नैंन ।
गँध-रेखा, सुभ-आनना, सौरभी कहैं मृदु बैंन ।।35।।
चौपाई
चंपकलता चतुर सब जानै ।
बहुत भाँति के बिंजन बानै ।।36।।
जेहि-जेहि छिन जैसी रुचि पावै ।
तैसे बिंजन तुरत बनावै ।।37।।
चंपकलता चंपक बरन, उपमा कौं रह्यौ जोहि ।
नीलांबर दियौ लाड़िली, तन पर रह्यौ अति सोहि ।।38।।
दोहा
कुरंगाछी, मन-कुंडला, चंद्रिका अति सुख दैन ।
सखी सुचरिता, मंडनी, चंद्रलता रति ऐंन ।।39।।
राजत सखी सुमंदिरा, कटि-काछनी समेत ।
बिबिधि भाँति बिंजन करै, नवल जुगल के हेत ।।40।।
चौपाई
चित्रा सखी दुहुँनि मन भावै ।
जल सुगंध लै आनि पिवावै ।।41।।
जहाँ लगि रस पीवे के आहीं ।
मेलि सुगंध बनावै ताहीं ।।42।।
जिहिं छिन जैसी रुचि पहिचानै ।
तबही आनि करावति पानैं ।।43।।
दोहा
कुंकुम को सो बरन तन, कनक-बसन परिधान ।
रूप चतुरई कहा कहौं, नाहिन कोउ समान ।।44।।
सखी रसालिका तिलकनी, अरु सुगंधिका नाम ।
सौर-सैन अरु नागरी, रामिलका अभिराम ।।45।।
नाग-बेंनिका नागरी, भरी सबै सुख रंग ।
हित सौं ये सेवा करैं, श्रीचित्रा के संग ।।46।।
चौपाई
तुँगविद्या सब विद्या माँही ।
अति प्रवीन नीके अवगाही ।।47।।
जहाँ लगि बाजे सबै बजावै ।
राग-रागिनी प्रगट दिखावै ।।48।।
गुनकी अवधि कहत नहिं आवै ।
छिन छिन लाड़िली-लाल लड़ावै ।।49।।
दोहा
गौर बरन छबि-हरन मन, पंडुर बसन अनूप ।
कैसैं बरन्यौ जात है, यह रसना करि रूप ।।50।।
मंजु-मेधा अरु मेधिका, तनु-मध्या मृदु बैंन ।
गुनचूड़ा बारंगदा, मधुरा मधुमय ऐंन ।।51।।
मधु-अस्पंदा अति सुखद, मधुरेच्छना प्रवीन ।
निसि दिन तौ ये सब सखी, रहत प्रेम रस लीन ।।52।।
चौपाई
इंदुलेखा अति चतुर सयानी ।
हित की रासि दुहुँनि मनमानी ।।53।।
कोक कला घातनि सब जानै ।
काम कहानी सरस बखानै ।।54।।
बसी- करन निजु-प्रेम के मंत्रा ।
मोहन-विधि के जानत जंत्रा ।।55।।
दोहा
छिन छिन ते सब पियहि सिखावै ।
तातें अधिक प्रिया मन भावै ।।56।।
देह प्रभा हरताल रँग, बसन दाड़िमी-फूल ।
अधिकारिनि सब कोस की, नाहिंन कोउ समतूल ।।57।।
चित्रलेखा अरु मोदिनी, मंदालसा प्रवीन ।
भद्रतुंगा अरु रसतुँगा, गानकला रस लीन ।।58।।
सोभित सखी सुमंगला, चित्रांगी रस दैंन ।
ये तौ रहैं सब बात में, सावधान दिन-रैंन ।।59।।
चौपाई
रँगदेवी अति रंग बढ़ावै ।
नख सिख लौं भूषन पहिरावै ।।60।।
भाँति-भाँति के भूषन जेते ।
सावधान ह्वै राखत तेते ।।61।।
कमल-केसरी आभा तन की ।
बड़ी सक्ति है चित्र लिखन की ।।62।।
दोहा
तन पर सारी फबि रही, जपा-पुहुप के रंग ।
ठाढ़ी सब अभरन लियैं, जिनकैं प्रेम अभंग ।।63।।
कलकंठी अरु ससि कला, कमला अतिहि अनूप ।
मधुरिंदा अरु सुंदरी, कंदर्पा जु सरूप ।।64।।
प्रेममंजरी जो कहै, कोमलता गुन गाथ ।
एतौ सब में पगी, रँगदेवी के साथ ।।65।।
चौपाई
सखी सुदेवी अतिहि सलौंनी ।
काहूँ अंग नाहिनैं औंनी ।।66।।
सुठि सरूप मोहन मन भावै ।
रुचि सौं सब सिंगार बनावै ।।67।।
कच-कबरी गूँथति है नीकी ।
अति प्रवीन सेवा करै जी की ।।68।।
अंजन-रेख बनाइ सँवारै ।
रीझि मुकर लै प्रिया निहारै ।।69।।
सारौ सुवा पढ़ावति नीकैं ।
सुनि-सुनि मोद होत सबही कैं ।।70।।
दोहा
अति प्रवीन सब अंग में, जानत रस की रीति ।
पहिरैं तन सारी सुही, वढ़वति पल-पल प्रीति ।।71।।
कावेरी रु मनोहरा, चारु कबरि अभिराम ।
मंजु केसी अरु केसिका, हार-हीरा छबि धाम ।।72।।
महा हीरा अतिही बनी, हीरा-कंठ अनूप ।
उपमा कछु नहिं कहि सकत, ऐसी सबै सरूप ।।73।।
कहे गौतमी तंत्र में, इन सखियनि के नाम ।
प्रथम वंदि इनके चरन, सेवहु स्यामा - स्याम ।।74।।
जो यह टहल सखीनि की, रहत बिचारत नित्त ।
सो पावै 'ध्रुव' प्रेम रस, तेहि सुख सौं रँगै चित्त ।।75।।
चौपाई
सबै सखी इहि बिधि ज्यौ ज्यावैं ।
छिन छिन प्रति नव लाल लड़ावैं ।।76।।
फूलनि कुंज अनूप बनावैं ।
लै गुलाब-दल सेज रचावैं ।।77।।
तापर लाल -लाड़िली सोहैं ।
अति आसक्त परस्पर जोहैं ।।78।।
चितवनि मुसिकनि अति रस भींनी ।
मैंन अनी मनौं आगे कीनी ।।79।।
आलिंगन चुम्बन अनुरागे ।
अद्भुत सुरत प्रेम-रस पागे ।।80।।
बिच-बिच बतियाँ कहत सुहाई ।
अँखियन सौं अँखियाँ अरुझाई ।।81।।
तेहि सुख-रंग में रैंन बिहानी ।
रति बिहार की तृपति न मानी ।।82।।
अंग-अंग ऐसैं लपटानें ।
गौर स्याम तहाँ जात न जाने ।।83।।
दोहा
रैंन घटी रुचि नहिं घटी, अद्भुत जुगल-विहार ।
तन मन अरुझे लेत हैं, अधर-सुधा रस सार ।।84।।
चौपाई
भोर भयैं सहचरि सब आईं ।
यह सुख देखति करति बधाई ।।85।।
कोउ बीना सारंगी बजावैं ।
कोउ इक राग विभासहि गावैं ।।86।।
एक चरन हित सौं सहिरावै ।
एक बचन-परिहास सुनावै ।।87।।
उठि बैठे दोउ लाल रँगीले ।
बिथुरी अलक सबै अँग ढीले ।।88।।
घूमत अरुन नैन अनियारे ।
भूषन-बसन न जात सँभारे ।।89।।
कहूँ अंजन कहूँ पीक रही फबि ।
कैसैं कही जाति है सो छबि ।।90।।
हार-वार मिलि कैं अरुझाने ।
निसि के चिन्ह निरखि मुसिकाने ।।91।।
दोहा
निरखि-निरखि निसि के चिन्हनिं, रोमांचित ह्वै जाहिं ।
मानौं अंकुर मैन के, फिरि निपजे तन माहिं ।।92।।
चौपाई
अद्भुत मिश्री मेलि मलाई ।
अधिक हेत सौं आनि खवाई ।।93।।
चितवत जुगल बदन-बिधु ओरी ।
मानौं रसभरी त्रिषित चकोरी ।।94।।
दोहा
कीनी मंगल आरती, मंगल निधि सुकुँवार ।
मंगल भयौ सब सखिनु कै, यह रस प्रेम अधार ।।95।।
चौपाई
एक सखी ल्याई पिकदानी ।
एक लियैं झारी भरि पानी ।।96।।
रतन खचित कंचन की चौकी ।
झलमलात सोभा रवि सौ की ।।97।।
कोमल कुसुमनिं गदी बिछाई ।
अति सुगंध सौंधे छिरकाई ।।98।।
तेहि ऊपर बैठे दोउ प्यारे ।
जल सुगंध सौं बदन पखारे ।।99।।
सहचरी एक मुकुर लियैं ठाढी ।
झलकनि सोभा सतगुन बाढ़ी ।।100।।
तेहि छिन कछु खैवैं कौं लाई ।
मादिक मधुर बात मन भाई ।।101।।
दोहा
बहु बिधि मेवा मधुर फल, कढ्यौ दूध इकसार ।
लै आई निज सहचरी, जानि कलेऊ वार ।।102।।
चौपाई
हँसि-हँसि नवल जुगल कछु लयौ।
सखियनिं के मन आनँद भयौ।।103।।
ललिता पान खवावत खरी ।
निरखत छबि आनँद रस भरी ।।104।।
ख्वाइ प्याइ कैं जब मन मान्यौ ।
मंजन कौ हित सबहिनि ठान्यौ ।।105।।
काहू सखी तप्त जल आन्यौ ।
काहू घोरि उबटनौ बान्यौ ।।106।।
एक फुलेल अरगजा ल्याई ।
टहल हेत सब फिरति हैं धाई ।।107।।
दंपति-सुख के रस में भींजी ।
छिन-छिन तिन की प्रीति नवीनी ।।108।।
एकै रस भींनी रहैं नितहीं ।
जानत नहिं निसि-वासर कितहीं ।।109।।
सवैया
सखी चहुँ कोद फिरैं चकडोरी सी, सेवा कौ चाव बढ्यौ मन माँही ।
सौंज सिंगार नई-नई आनति, वानत नैकहूँ हारत नाँही ।।
प्रेम पगी तेहि रंग रँगी, निरखैं तिनकौं तनकौ न अघाहीं ।
और सवाद लगे 'ध्रुव' फीके, रहैं विवि-रूप के छत्र की छाँही ।।110।।
चौपाई
रतन-कुंज में आये दोऊ ।
ललितादिक बिनु तहाँ न कोऊ ।।111।।
दोहा
चाँपि चुपरि मृदु सेज पर, न्यौछावर करि प्रान ।
अति सुगंध जल उस्न सौं, करवावतिं स्नान ।।112।।
चौपाई
अद्भुत अंग अगौंछे जबही ।
कोटि आरसी वारीं तबही ।।113।।
पुनि सिंगार कुंज में आये ।
मन भाये सिंगार कराये ।।114।।
मन की रुचि लै सेवा करहीं ।
छिन-छिन प्रति ऐसैं अनुसरहीं ।।115।।
फूलनि-आसन रचे बनाई ।
भोजन कुंज में बैठे जाई ।।116।।
मनि-मय चौकी राखी आनि ।
हेम-थार तापर धरयौ वानि ।।117।।
झलकि रहे बहु कनक-कटोरा ।
बिंजन भरि-भरि धरे चहुँ ओरा ।।118।।
मध्य अनूप खीर अति नीकी ।
भरी कटोरी सौंधे घी की ।।119।।
उज्वल मिश्री पीस मिलाई ।
रसना स्वादहि कहि न सकाई ।।120।।
एक दूध के बहुत प्रकारा ।
कहि न सकत तिनके बिस्तारा ।।121।।
विविध भाँति पकवान बनाये ।
ते सब नवल जुगल मन भाये ।।122।।
मोहन-भोग सरस घी माँही ।
अति कोमल उपमा कछु नाहीं ।।123।।
पतरी रोटी घी सौं सनी ।
बरी फुलौरी अति ही बनी ।।124।।
खाटे चरपरे बरे सलोने ।
घृत में नीके बने निमोने ।।125।।
पापर कचरी गीचे नीके ।
पावत रुचि सौं प्यारे जीके ।।126।।
सालन साक और तरकारी ।
रसना स्वादहि लेत न हारी ।।127।।
दोहा
जो बिंजन कर पल्लवनि, छुवति छबीली बाल ।
तहाँ ते रुचि सौं लेत हैं, नवल रँगीले लाल ।।128।।
चौपाई
चंपक लता चौंप सौं जिंवावै ।
ललिता बातनिं रुचि उपजावै ।।129।।
पीत भात सिखरन सुठि गाढ़ी ।
ग्रास लेत अति ही रुचि बाढ़ी ।।130।।
दोहा
हँसि-हँसि दोउ नागर नवल, ग्रास परस्पर लेत ।
ललितादिक निज सखिनु के, नैंननिं कौं सुख देत ।।131।।
चौपाई
दूध पना सरबत रुचि कारी ।
बहुत भांति सौं तक्र सँवारी ।।132।।
हित की निधि सहचरी चहुँ ओरैं।
कौर-कौर प्रति सबै निहारैं ।।133।।
हँसि-हँसि जैंवत हैं पिय-प्यारी।
तेहि छिन कौ सुख कहौं कहारी ।।134।।
मन जानै कै दोऊ नैंना ।
रसना पै कछु कहत बनैंना ।।135।।
यह आनंद कहयौ नहिं जाई ।
रसना कोटि होहिं जौ माई ।।136।।
तब सखियनि आचमन दिवायौ ।
सबके नैंन-प्रान सुख पायौ ।।137।।
ललिता रचि-रचि बीरी कीनी ।
नवल कुँवरि अरु कुँवरहि दीनी ।।138।।
दोहा
नैन दीप हिय-थार भरि, पूरि प्रेम घृत ताहि ।
लीने हित के करनि सौं, आरति करतिं उमाहि ।।139।।
चौपाई
सो प्रसाद सब सखियनि लीनौं ।
अपनौ सेस 'ध्रुवहि' कछु दीनौं ।।140।।
इहि विधि कै जो भोग लगावै ।
ताकी चरन रैंनु 'ध्रुव' पावै ।।141।।
दोहा
सखियन अद्भुत सेज रचि, नव निकुंञ्ज रस-ऐन ।
तहाँ रसिक दोउ लाड़िले, करत सुखद सुख सैंन ।।142।।
चौपाई
उर सौं उर नैननिं सौं नैंना ।
मन सौं मन बैननिं सौं बैंना ।।143।।
दसननि अधर रही धरि प्यारी ।
करुना रस की निधि सुकुमारी ।।144।।
सुख के सिंधु परे पिय गहरैं ।
रति-बिनोद की उठति हैं लहरैं ।।145।।
ललितादिक तेहि सुखहि निहारैं ।
प्रेम बिबस प्राननि कौं वारैं ।।146।।
दोहा
मदन-मोद आनन्द मद, मते रहत निशि भोर ।
कुसल सुरत रस सूर दोउ, नागर नवल-किशोर ।।147।।
चौपाई
जबही घरी चार दिन रह्यौ ।
प्रीतम प्रान-प्रिया सौं कहयौ ।।148।।
चलहुँ कुँवरि देखैं बनराई ।
फूलनिं सोभा कही न जाई ।।149।।
फूलीं लता बढ़ी तरु छाँही ।
झूमि रही जमुना-जल माहीं ।।150।।
सिमटीं आइ सखी हितकारी ।
एक बैस अति ही सुकुँवारी ।।151।।
विबिध भाँति मधु भोजन आन्यौ ।
सब सुगंध सौं बास्यौ पान्यौ ।।152।।
जोइ भायौ सोई कछु लीनौ ।
पुनि बन देखन कौ मन कीनौ ।।153।।
दोहा
भीने अति रस रंग में, नवल रँगीले लाल ।
बाहाँ जोरी चलत दोउ, मत्त मरालनि चाल ।।154।।
चौपाई
जिहिं द्रुम बेलि फूल तन हेरैं ।
सींचत मनौं अनुराग सौं फेरैं ।।155।।
निकसत हैं घन बीथिन माहीं ।
नवल निचोलनि परसत नाहीं ।।156।।
बंशीवट तट रबिजा तीरैं ।
शीतल मंद सुगंध समीरैं ।।157।।
उज्वल चौक अधिक झलकाई ।
मानौं सोभा आनि बिछाई ।।158।।
सखियनि-सभा तहाँ सुखदाई ।
सुख की सींव कही नहि जाई ।।159।।
मध्य महा मन मोहन माई ।
आनँद छबि सब पर बरषाई ।।160।।
बैठे दोऊ ग्रीवा भुज मेलैं ।
नैंननि-खेल परस्पर खेलैं ।।161।।
अपनैं-अपनैं गुनहिं दिखावै ।
निर्तत एक-एक मिलि गावैं ।।162।।
दोहा
सहज रूप के चंद द्वै, सखिन पुंज चहुँ ओर ।
मानौं पीवत छबि-सुधा, सब के नैन-चकोर ।।163।।
चौपाई
सखी सबै चहुँ ओर सुहाई ।
निरखति फूलीं अंगनिं माई ।।164।।
एक सारंगी बीन सुनावै ।
एक मृदंग अनूप बजावै ।।165।।
तिरप लेत झलकत तनु ऐसैं ।
बहुत रंग की दामिनि जैसैं ।।166।।
राग-रागिनि मूरति धारैं ।
सखी रूप सेवत सुख वारैं ।।167।।
कोटि कलप जौ यह सुख देखै ।
रुचि न घटै छिन की सम लेखै ।।168।।
दोहा
अद्भुत मीठे मधुर फल, ल्याईं सखी बनाइ ।
ख्वावत प्यारे लाल कौं, पहिलैं प्रियहिं चखाय ।।169।।
चौपाई
रजनी मुख सोभा अति बढ़ी ।
पानिप मैंन दुहँनि मुख चढ़ी ।।170।।
हुलसि हियैं आनँद-रस भरे ।
चाह-चौंप रति-रँग में परे ।।171।।
सैन समय की बिरियाँ जानी ।
भोजन सौंज तबहि कछु आनी ।।172।।
दूध भात मधु अति रुचिकारी ।
जल सुगंध भरि आनी झारी ।।173।।
ख्वाइ प्याइकैं बीरी दीनी ।
प्रेम प्यार सौं आरति कीनी ।।174।।
मदन-रंग नैंननि झलकान्यौ ।
मन कौ हेत सखिनु जब जान्यौ ।।175।।
कलप द्रुमनि कल कुंज सुहाई ।
षोडस द्वार बने तहाँ माई ।।176।।
इक इक मनि की आभा ऐसी ।
कोटि दिवाकर प्रभा न तैसी ।।177।।
कोमल कमलनि के दल लीने ।
अति सुगंध सौंधे सौं भीने ।।178।।
रचि बिचित्र बर सेज बनाई ।
निरखत नैंन मैंन अरुझाई ।।179।।
दोहा
सेज सुखद रचना रची, लै मृदु कुसुमनि मोद ।
तेहि ऊपर सुकुँवार दोऊ, करत विलास बिनोद ।।180।।
सौंधो पान सुगंध मधु, दूध सौं मिश्री छानि ।
भरि भरि भाजन हेम के, सखियनि राखे वानि ।।181।।
चौपाई
सबै सौंज गृह धरी बनाई ।
आपुन लतिन ओट रहीं जाई ।।182।।
तब दोऊ बतियनि के रस परे ।
आलिंगन चुंबन अनुसरे ।।183।।
रूप मदन गुन नेह के ऐंना ।
तन मन अरुझि नैंन सौं नैंना ।।184।।
जो रस उपजत है दुहुँ माहीं ।
ललितादिक निरखत न अघाहीं ।।185।।
यह रस तौ समुझै नहि कोई ।
जानै सो जो इनकौ होई ।।186।।
दोहा
रूप तरंगनि में परीं अखियाँ मीन अनूप ।
सुरत-सिंधु सुख झिलि रहे साँवल गौर सरूप ।।187।।
सेज सुरत सरिता मनौं मज्जत दोउ सुकुँवार ।
बिवस लाल पैरत फिरैं, कुच तुंबन आधार ।।188।।
अद्भुत रस मुक्तावली मंडल केलि-विहार ।
हित ध्रुव' जो गावै सुनै, पावै प्रेम अपार ।।189।।
साँझ-भोर लौं ऐसैंही भोर-साँझ लौं जानि ।
हित ध्रुव' यह सुख सखिनि कौ निस-दिन उर में आनि ।।190।।
दोहा चौपई एक सत, नब्बै अति अभिराम ।
हित ध्रुव' रस मुक्तावली, रसिक-जननिं विश्राम ।।191।।
जै जै श्री रसमुक्तावली लीला की जै जै श्री हरिवंश
21. रस हीरावली लीला
दोहा
प्रथमहिं श्री गुरु कृपा तें, यह उपजी उर आनि ।
बरनौं रस हीरावली, जुगल-केलि रसखाँनि ।।1।।
चौपाई
रंग भरे दोउ लाल रँगीले ।
रतिके रस पग रहे रसीले ।।2।।
अति सुदेस वृंदावन माँहीं ।
नवल प्रेम रस दिन वरषाहीं ।।3।।
सुख अनूप नव कुंज सुहाई ।
छबि के फूलनि सौं जनु छाई ।।4।।
मृदु मृदु दल जलजनि के लीने ।
अति सुगंध सौंधे सौं भीने ।।5।।
रचि विचित्र सुख-सेज बनाई ।
तेहि ऊपर बैठे सुखदाई ।।6।।
जहाँ-तहाँ डोलत मोर मराला ।
सुक-पिक बोलत वचन रसाला ।।7।।
फूलनि की छवि बनति निहारैं ।
होति मधुर मधुपनि गुंजारैं ।।8।।
मारुत त्रिविध बहै रुचि लीयैं ।
मदन मोद उपजावत हीयैं ।।9।।
हँसत परस्पर आँनद-रासी ।
सुख फूलनि की मनौं वरषा सी ।।10।।
दोहा
भीने नेह सुरंग रँग, अति उदार सुकुँवार ।
प्यारी तन अति प्यार सौं, रहत निहार-निहार ।।11।।
चौपाई
देखी प्यारी अति रस ढरी ।
तबहि लाल इक बिनती करी ।।12।।
हा-हा प्रिये बात इक पाऊँ ।
रचि अंगनि सिंगार कराऊँ ।।13।।
आतुरता हिय की जब जानी ।
पिय तन चितै कछुक मुसिकानी ।।14।।
इहि विधि की जब अज्ञा पाई ।
आँनद फूल न उरहि समाई ।।15।।
मेलि फुलेल सँवारत बारनि ।
छबि सौं राजत नित्य-विहारिनि ।।16।।
चिकुर-चंद्रिका रुचिर बनाइ ।
गुहत गहर सौं रहे लुभाई ।।17।।
कैसैं कहौं छबि जो उर माँही ।
इन नैननिं के रसना नाहीं ।।18।।
स्याम सुदेश सच्चिकन सोहैं ।
लाँबे कच गूँथत मन मोहैं ।।19।।
जानौं कमल बहुत इक ठौरैं ।
पंकति बाँधि भृंग मनौं दौरैं ।।20।।
दोहा
गुननिधि अंग सुवास निधि, नवल छबीली नारि ।
सौरभ की मूरति मनौं, रची है रूप सँवारि ।।21।।
चौपाई
सीस फूल छबि यौं उर आई ।
रवि सुहाग कौ प्रगट्यौ माई ।।22।।
मनिमय बैंदी रुचिर बनाई ।
रूप-दीप मनौं सोभा पाई ।।23।।
भाइनि भाइ भौंह सुकुँवारी ।
पिय पुतरी जहाँ रहैं रखवारी ।।24।।
श्रवननि तरल तरौना झलकैं ।
निरखत लाल परत नहिं पलकैं ।।25।।
पतरी अलक एक छुटि आई ।
पियमन कौं जनौं पासि चलाई ।।26।।
बंक बिशाल नैंन अनियारे ।
उज्ज्वल अरुन सहज कजरारे ।।27।।
सुठि सुढार पानिप मिति नाहीं ।
चंचल अंचल में न समाहीं ।।28।।
नासा बेसर जगमग रही ।
छबि की सींव परति नहिं कही ।।29।।
अधर-बिंब बंधूक पँवारी ।
दसनि झलक पर दामिनी वारी ।।30।।
दोहा
अति अनूप वर चिबुक पर, स्याम बिंदु सुख देत ।
मानौं मोहन-मन मधुप, बदन-कंज-रस लेत ।।31।।
चौपाई
नीलांबर छबि ऐसी पाई ।
रैंनि मनौं दिन के सँग आई ।।32।।
तामे अँगिया अरुन सुधारी ।
यातैं उपमा और बिचारी ।।33।।
मनौं सिंगार मेरु रह्यौ छाई ।
जनु अनुराग धर्यौ बिच आई ।।34।।
कुंदन की दुलरी बनी गरैं ।
फबी पोत विवि मोतिनु-लरैं ।।35।।
रतननि खच्यौ पदिक अति सोहै ।
ताकी दुति पर दिनकर को है ।।36।।
भुज-मृनाल छबि उदर बखानौं ।
रस-फल रूप-लता लगे मानौं ।।37।।
चूरी श्याम करनि फबि रहीं ।
तिनकी उपमा पावत नहीं ।।38।।
पहुँचिनु के लटकन बने ऐसैं ।
भ्रमत भँवर कमलन पर जैसैं ।।39।।
गोरी अँगुरिनु की छबि जोहैं ।
मिहँदी रँग भीनी अति सोहैं ।।40।।
दोहा
चन्द्रहार छबि कहा कहौं, पानिप मोतिनु हार ।
मनौ रूप अरु प्रेम की, आइ मिलीं द्वै धार ।।41।।
चौपाई
सरसी-नाभि सुदेश सुहाई ।
पिय मन हंस बसत तहाँ माई ।।42।।
त्रिवली प्रीतम प्रान-अधारा ।
मनौं रूप रस गुन की धारा ।।43।।
रोम-राजि सोभा यौं दीनी ।
मनौं रेखा रति-पति की कीनी ।।44।।
सूक्षम कटि पृथु जघन सुढारा ।
अति रोचक किंकिनी झनकारा ।।45।।
जेहर सुमिलि अनूप बिराजै ।
नूपुर अद्भुत रागिनी बाजै ।।46।।
तिन पर बंशी बारत प्यारौ ।
हित ध्रुव' रीझि अपनपौ हारौ ।।47।।
चरन-कमल जावक रंग भीने ।
प्रीतम चित्र प्यार सौं कीने ।।48।।
परम रसिक रस में सहरावत ।
कबहूँ लै हिय-नैंन लगावत ।।49।।
पिय मन बसत रहत तेहि ऐंना ।
अटक्यौ नागर नैननिं-सैंना ।।50।।
कोक-कला बरनी हैं जेती ।
प्रिया-चरन सेवत रहैं तेती ।।51।।
नख-सिख लौं अति कुँवरि सिंगारी ।
मानौं सोभा की फुलवारी ।।52।।
देखि छबीली भांति लुभाने ।
लाल तहां बिनु मोल बिकाने ।।53।।
दोहा
बाढ़ी छबि सब भूषननि, अद्भुत भाँति अनूप ।
गहने कौ गहनौं भयौ, नवल नागरी-रूप ।।54।।
चौपाई
यातें अंगनि भूषन बाने ।
ताके हेत दोऊ उर आने ।।55।।
चितवत लाल बिवस ह्वै जाई ।
यातें राखे अंग दुराई ।।56।।
दूजे सखियनि यौं पहिरावैं ।
सेवा हित के सुखहिं बढ़ावें ।।57।।
अंगनि के भूषन यौं भये ।
मनौं मनिनु के ढँपना दये ।।58।।
रूप-माधुरी सहजहि राजै ।
छिन छिन औरै-और बिराजै ।।59।।
दोहा
ऐसौ रूप प्रकाश तहाँ, नख की सम नहिं भान ।
तेहि ठाँ उपमा दीप की, धरिबौ बड़ौ अयान ।।60।।
चौपाई
जहाँ लगि दुति अरु कांति बखानी ।
कुँवरि अंग देखत सकुचानी ।।61।।
छबि ठाढ़ी आगैं कर जोरैं ।
गुन की कला चौंर सिर ढोरैं ।।62।।
चित्र भई तेहि ठाँ चतुराई ।
पंगु भई चितवत चपलाई ।।63।।
छ्वै न सकत अंगनि मृदुताई ।
अति सुकुँवार कुँवरि तन माई ।।64।।
यातें उपमा कछु उर आई ।
बात खोज बिनु जात न पाई ।।65।।
रति इक हेम छबिहि उर आनैं ।
ताहि समुझि सुमेरु पहिचानैं ।।66।।
दोहा
अंग कांति की छबि छटा, ताकी छटा सुदेस ।
उपमा सब जग की भईं, तेहि सोभा कौ लेस ।।67।।
चौपाई
सहज माधुरी अंगनि वरषै ।
पल-पल प्रीतम मन आकरषै ।।68।।
देखत अद्भुत भाँति अनूपहि ।
पिय मन पर्यौ प्रेम के कूपहि ।।69।।
चितै रूप गुन अलक-निकारौ ।
हित सौं लाइ लयौ उर प्यारौ ।।70।।
अधरनि रस सींच्यौ जब प्यारी ।
तनकी सुधि जब जाइ सँभारी ।।71।।
बढ्यौ केलि-रस-सिंधु अभंगा ।
हाव-भाव तहाँ उठत तरंगा ।।72।।
पायौ रूप अंबु निजु ऐंना ।
चंचल मीन फिरत तहाँ नैंना ।।73।।
रंग भरे पट अंग बिसारे ।
रस बिनोद भींजे दोउ प्यारे ।।74।।
अति विचित्र सबही बिधि दोऊ ।
रस विहार में घटि नहिं कोऊ ।।75।।
विद्या कोक कला जिती कहीं ।
तेऊ तहाँ भूलि सब रहीं ।।76।।
तेहि सुख रंग परे सुनि सजनी ।
जानत नहिं कित वासर रजनी ।।77।।
दोहा
मिटत न तृषा मनोज की, करत मधुर रस पान ।
जैसे निवरत खेल नहिं, जहाँ खिलार समान ।।78।।
हाव-भाव हीरा भये, हेम नील मनि अंग ।
जरे जु कुदंन प्रेम 'ध्रुव', पानिप झलक अनंग ।।79।।
षटरितु बरनौं जुगल हित, बहु विधि करत बिहार ।
रितु-रितु कौ सुख कहौं कछु, अपनी मति अनुसार ।।80।।
सवैया
खेलत कामिनी कंत बसंत, बढ्यौ मन मोद विनोद अनंगा ।
तैसौ रह्यौ बन फूलनि फूल, रंगे दोऊ प्रीतम प्रेम-सुरंगा ।।
प्रिया मुख-चन्द्र की ओर किशोर, चकोर भये पिवैं रूप तरंगा ।
सखी चहुँ कोद विलोकत हैं 'ध्रुव', आनँद को सुख सार अभंगा ।।81।।
चौपाई
रितु बसंत आई सुखदाई ।
भयौ आनंद सबनि मन भाई ।।82।।
हरित अरुन दल अंकुर नये ।
जहाँ-तहाँ फूल सुरंगित भये ।।83।।
नवल जुगल सुख हेत विचारयौ ।
मानौं वृंदा विपिन सिंगारयौ ।।84।।
फूली बेलि तरुनि लपटानी ।
मानौं तिय पिय सौं रति मानी ।।85।।
तन मन फूल कही नहिं जाई ।
फूले फूल जहाँ-तहाँ माई ।।86।।
शुक पिक वानी सुख सौं सानी ।
मानौं कहत हैं मैंन-कहानी ।।87।।
इक द्रुम तौ सब फूलनि छाये ।
मानौं अतन-वितान तनाये ।।88।।
सुरँग सुगंध गुलाल उड़ायौ ।
मनौं अनुराग सबनि पर छायौ ।।89।।
तेहि ठाँ खेल बढ्यौ अति भारी ।
चहुँ दिस सखी मध्य पिय-प्यारी ।।90।।
छिरकत हँसत अधिक सुख देहीं ।
बिच-बिच अधर-सुधा-रस लेहीं ।।91।।
कुंकुम अरगजा के रस भीने ।
रस विहार में परम प्रवीने ।।92।।
कोमल सेज रची सुख सीवाँ ।
तापर राजत दै भुज-ग्रीवा ।।93।।
झूलत दोऊ मिलि सुरत हिंडौरैं ।
चंचल चपल स्याम तन गौरैं ।।94।।
चितै रहत प्यारी मुख ओरैं ।
भाइनि भरी नैंन की कोरैं ।।95।।
छिन-छिन प्रीतम कौ चित चोरैं ।
बाजत किंकिनि थोरैं-थोरैं ।।96।।
रति विलास रस ऐसौ कीनौं ।
मनमथ कोटि मान हरि लीनौं ।।97।।
दोहा
रूप सखी कौ धरैं 'ध्रुव' सेवत दिनही बसंत ।
छिन-छिन रुचि लै दुहुँनि की, फूलत फूल अनंत ।।98।।
सवैया
ग्रीषम की रितु जानि सहेलिनु, कंज कपूर की कुंज बनाई ।
चंदन चंद के खंभ रचे दल, कोमल रंग सुरंगनि छाई ।।
उज्वल सेज सुरंग सुहावनी, वारि गुलाब सौं लै छिरकाई ।
राजत हैं 'ध्रुव' लाड़िली लाल, बिनोद कौ मोद बढ्यौ अधिकाई ।।99।।
चौपाई
आई ग्रीषम सोभा ऐंना ।
अंगनि छबि देखत भरि नैंना ।।100।।
झीनें बसन झलक अति तन की ।
पूरन भई आस सब मन की ।।101।।
उज्वल फूलन कुंज सुहाई ।
उज्वल कोमल सेज रचाई ।।102।।
फूलनि के रचि हार बनाये ।
लै कपूर जल सौं छिरकाये ।।103।।
जहाँ-तहाँ उज्वल बसन बिछाये ।
जलजनि के भूषन पहिराये ।।104।।
दोहा
उज्वलता उज्वल सहज, उज्वल भाँति अनूप ।
बैठे उज्वल सेज पर, उज्वल प्रेम सरूप ।।105।।
चौपाई
पुट कपूर दै चंदन गार्यौ ।
नव गुलाब लै तामें डार्यौ ।।106।।
सबै सखी पहिरैं सित सारी ।
तैसेइ भूषन अति रुचिकारी ।।107।।
बहत है सीतल मंद समीरा ।
सीरौ अदन-पान बर नीरा ।।108।।
दोहा
सियराई सेवा करैं, चितवनि नैंननि कोर ।
खान पान सीतल सबै, लिये रहति निसि भोर ।।109।।
सवैया
स्याम घटा उमड़ी चहुँ ओरनि, पावस की रितु आई सुहाई ।
नाँचत मोर मयूरी बिनोद सौं, आनँद की बरषा बरषाई ।।
कौंधै जहाँ-तहाँ दामिनि कामिनि, प्रीतम अंक रही दुरि माई ।
कैसैं कही 'ध्रुव' जात है सो छबि, देखत नैंन रहे हैं लुभाई ।।110।।
चौपाई
पावस रितु जब आइ तुलानी ।
भाँति अनूप दुहुँनि मन मानी ।।111।।
स्याम सचिक्कन घटा सुहाई ।
उमड़ि-उमड़ि चहुँ दिस ते आई ।।112।।
चमकत चपला कही न जाई ।
सकुचि कुँवरि पिय-उर लपटाई ।।113।।
गरजन-घन सुनि पवन-झकोरिनिं ।
आनँद बढ्यौ मोर अरु मोरिनिं ।।114।।
रंग-कुंज में सेज सहानी ।
रचि-रचि सखियनि हेत सौं बानी ।।115।।
सोभित भूषन-बसन सहानें ।
दूलहु-दुलहिनि रँग में सानें ।।116।।
नव किशोर मन मन अनुरागे ।
मदन मोद आनँद रस पागे ।।117।।
रिमझिमि-रिमझिमि बूदैं परैं ।
रंग-हिंडोरैं झूलत खरैं ।।118।।
तेहि छिन कुँवरि कछुक मन डरैं ।
लपटि जात प्रीतम के गरैं ।।119।।
तिनके छल-बल कहे न जाँही ।
अति विचित्र दोऊ विद्या माँही ।।120।।
दोहा
कुँवर रूप बरसत दिनहिं, पिय चातक न अघात ।
कहा कहौं या प्रेम की, सुनि 'ध्रुव' उलटी बात ।।121।।
सवैया
खेलत रास विनोद बिहार, निसा उँज्यारी महा सुख दैंनी ।
सखीनु के मंडल मध्य बने दोऊ, गावत सुंदर सारंग नैंनी ।।
राग जम्यौ बजैं भूषन अंगनि, चंदहि भूली है आपनी गैंनी ।
सखी रहीं भींजि तहाँ रँग में 'ध्रुव', रैंनि भई मनौं प्रेम की रैंनी ।।122।।
चौपाई
सुखद सरस रितु सरद सुहाई ।
सखियनि मानौं निधि सी पाई ।।123।।
फूले नील कमल सित राते ।
भ्रमत मधुप सौरभ रस माते ।।124।।
कुंज-कुंज गहवर बन खोरी ।
देखत फिरत किशोर-किशोरी ।।125।।
जहाँ-तहाँ स्वच्छ भई धर ऐसी ।
कीनी सिकल आरसी जैसी ।।126।।
बन की कांति कहाँ लौ कहियै ।
सोभा देखि चकित ह्वै रहियै ।।127।।
रैंन उज्यारी देखि बिहारी ।
रच्यौ रास अति ही सुखकारी ।।128।।
सेज मंडल मनि-दीप बिराजै ।
अंगनि भूषन बाजे बाजैं ।।129।।
पलक तार भौंहें भई गाइनि ।
निर्त्तत पुतरी सहज सुभाइनि ।।130।।
सोभित अंजन रेख उपंगा ।
मनौं कटाक्ष तहाँ मधुर मृदंगा ।।131।।
चितवनि सुलप चलन अँग अंगा ।
कोक कलानि के उठत तरंगा ।।132।।
हाव-भाव बहु बिधि दिखरावत ।
चुंबन दान रीझ तहाँ पावत ।।133।।
दोहा
रति बिहार कौ रास दोऊ, खेलत परम प्रवीन ।
कोक-कला घातें सहज, छिन छिन उठति नवीन ।।134।।
सवैया
लाड़िली लालहि भावत है सखि, आनँदमय हिम की रितु आई ।
ऐसे रहे लपटाइ दोउ जन, चाहत अंग में अंग समाई ।।
हार उतार धरे सब भूषन, स्वादी महा रस की निधि पाई ।
महा सुख कौ 'ध्रुव' सार बिहार है, श्री हरिवंश जू केलि लड़ाई ।।135।।
चौपाई
हिमरितु-रंग कह्यौ नहि जाई ।
लाड़िली-लाल रहे लपटाई ।।136।।
तहाँ लागत ऐसी सियराई ।
चाहत अंग में अंग समाई ।।137।।
ज्यौं-ज्यौं प्यारी पिय उर लागै ।
मनौं आनँद के रस में पागै ।।138।।
जाकौ सोच करत हे मन में ।
सहजहि बन आई सो छिन में ।।139।।
हिमरितु अधिक लाल मन भाई ।
जिनतौ ऐसी बात बनाई ।।140।।
या रितु कौ गुन मानत भारी ।
ऐसे रसिक लाल पर वारी ।।141।।
तन-मन भये एक रस माँही ।
तेहिसुख पर सहचरि बलि जाहीं ।।142।।
सावधान सब सखी सयानी ।
हित की सौंज धरी सब बानी ।।143।।
जेहि जेहि छिन जैसी रुचि होई ।
हित सौं आनि खवावत सोई ।।144।।
हित में हरषि सखी सुखकारी ।
निरखत प्रीति लेति बलिहारी ।।145।।
मन की रुचि लै सेवा करहीं ।
सावधान सब ऐसैं रहहीं ।।146।।
अति सुकुँवार किशोर-किशोरी ।
सहजहि बँधे प्रेम की डोरी ।।147।।
ऐसौ लालच बढ्यौ बिहारी ।
उर ते प्रिया करत नहिं न्यारी ।।148।।
अंग-अंग ऐसै लपटाहीं ।
भूषन-हार न बीच समाहीं ।।149।।
दोहा
अंग-अंग सब जूरि रहे , अरु नैंननि सौं नैंन ।
रीति दुहुँनि की यहै 'ध्रुव' तबही लौं चित चैंन ।।150।।
सवैया
ल्याई कछू सियराई सुगंध सौं, बात वहै अतिही सुखदाई ।
कौंमल फूल दुकूल सुरंगिनी, मंजु निकुंज में सेज बनाई ।।
विलास कौ रास करैं दोउ हाँस, मनौं छबि कंज रहे बिकसाई ।
भोर अली सत आइ जुरी 'ध्रुव', पीवति रूप परागहि माई ।।151।।
चौपाई
आई सिसिर कछू सियराई ।
त्रिविध समीर बहै सुखदाई ।।152।।
मंजुल कुंज में बनी निकुंजा ।
तामें रची सेज सुख- पुंजा ।।153।।
तापर रसिक रसिकनी सोहैं ।
सो छबि सखी नैंन भरि जोहैं ।।154।।
कबहूँ बातनि के रस परैं ।
कबहूँ लटकि सेज पर ढरैं ।।155।।
ऐसी सभा बनी सुखदाई ।
आनन्द हास परस्पर माई ।।156।।
दंपति-रुचि लै दिनहिं लड़ावैं ।
हित ध्रुव' रति-रस मंगल गावैं ।।157।।
यह रस प्रेम कौ सागर आही ।
मो मति पैर सकै क्यौं ताही ।।158।।
जतन अनेक कियैं नहिं पावै।
सिंधु सीप में कैसैं आवै ।।159।।
दोहा
मो मति लव त्रिसरैंनु सम, सोभा मेरु समान ।
या मन के अवलम्ब हित, कही कछू उनमान ।।160।।
बरषा-ग्रीष्म नैंन सुख, सरद वसंत विलास ।
लपटनिं कौ सुख हिम-सिसिर, प्रेम सुखद सब मास ।।161।।
रसमय "रस हीरावली", पढ़ि हैं 'ध्रुव' जो कोइ ।
प्रेम कमल तेहि हीय तें, तबहीं प्रफुल्लित होइ ।।162।।
और न कछू सुहाइ 'ध्रुव', यह जाँचत निसि भोर ।
याही रस की चटपटी, लगी रहौ हिय मोर ।।163।।
दोहा कबित्त अरु चौपाई, इकसत साठिरु दोइ ।
जुगल केलि हीरावली, हिय गुन माला पोइ ।।164।।
जै जै श्री रस हीरावली लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
दोहा
प्रथमहिं श्री गुरु कृपा तें, यह उपजी उर आनि ।
बरनौं रस हीरावली, जुगल-केलि रसखाँनि ।।1।।
चौपाई
रंग भरे दोउ लाल रँगीले ।
रतिके रस पग रहे रसीले ।।2।।
अति सुदेस वृंदावन माँहीं ।
नवल प्रेम रस दिन वरषाहीं ।।3।।
सुख अनूप नव कुंज सुहाई ।
छबि के फूलनि सौं जनु छाई ।।4।।
मृदु मृदु दल जलजनि के लीने ।
अति सुगंध सौंधे सौं भीने ।।5।।
रचि विचित्र सुख-सेज बनाई ।
तेहि ऊपर बैठे सुखदाई ।।6।।
जहाँ-तहाँ डोलत मोर मराला ।
सुक-पिक बोलत वचन रसाला ।।7।।
फूलनि की छवि बनति निहारैं ।
होति मधुर मधुपनि गुंजारैं ।।8।।
मारुत त्रिविध बहै रुचि लीयैं ।
मदन मोद उपजावत हीयैं ।।9।।
हँसत परस्पर आँनद-रासी ।
सुख फूलनि की मनौं वरषा सी ।।10।।
दोहा
भीने नेह सुरंग रँग, अति उदार सुकुँवार ।
प्यारी तन अति प्यार सौं, रहत निहार-निहार ।।11।।
चौपाई
देखी प्यारी अति रस ढरी ।
तबहि लाल इक बिनती करी ।।12।।
हा-हा प्रिये बात इक पाऊँ ।
रचि अंगनि सिंगार कराऊँ ।।13।।
आतुरता हिय की जब जानी ।
पिय तन चितै कछुक मुसिकानी ।।14।।
इहि विधि की जब अज्ञा पाई ।
आँनद फूल न उरहि समाई ।।15।।
मेलि फुलेल सँवारत बारनि ।
छबि सौं राजत नित्य-विहारिनि ।।16।।
चिकुर-चंद्रिका रुचिर बनाइ ।
गुहत गहर सौं रहे लुभाई ।।17।।
कैसैं कहौं छबि जो उर माँही ।
इन नैननिं के रसना नाहीं ।।18।।
स्याम सुदेश सच्चिकन सोहैं ।
लाँबे कच गूँथत मन मोहैं ।।19।।
जानौं कमल बहुत इक ठौरैं ।
पंकति बाँधि भृंग मनौं दौरैं ।।20।।
दोहा
गुननिधि अंग सुवास निधि, नवल छबीली नारि ।
सौरभ की मूरति मनौं, रची है रूप सँवारि ।।21।।
चौपाई
सीस फूल छबि यौं उर आई ।
रवि सुहाग कौ प्रगट्यौ माई ।।22।।
मनिमय बैंदी रुचिर बनाई ।
रूप-दीप मनौं सोभा पाई ।।23।।
भाइनि भाइ भौंह सुकुँवारी ।
पिय पुतरी जहाँ रहैं रखवारी ।।24।।
श्रवननि तरल तरौना झलकैं ।
निरखत लाल परत नहिं पलकैं ।।25।।
पतरी अलक एक छुटि आई ।
पियमन कौं जनौं पासि चलाई ।।26।।
बंक बिशाल नैंन अनियारे ।
उज्ज्वल अरुन सहज कजरारे ।।27।।
सुठि सुढार पानिप मिति नाहीं ।
चंचल अंचल में न समाहीं ।।28।।
नासा बेसर जगमग रही ।
छबि की सींव परति नहिं कही ।।29।।
अधर-बिंब बंधूक पँवारी ।
दसनि झलक पर दामिनी वारी ।।30।।
दोहा
अति अनूप वर चिबुक पर, स्याम बिंदु सुख देत ।
मानौं मोहन-मन मधुप, बदन-कंज-रस लेत ।।31।।
चौपाई
नीलांबर छबि ऐसी पाई ।
रैंनि मनौं दिन के सँग आई ।।32।।
तामे अँगिया अरुन सुधारी ।
यातैं उपमा और बिचारी ।।33।।
मनौं सिंगार मेरु रह्यौ छाई ।
जनु अनुराग धर्यौ बिच आई ।।34।।
कुंदन की दुलरी बनी गरैं ।
फबी पोत विवि मोतिनु-लरैं ।।35।।
रतननि खच्यौ पदिक अति सोहै ।
ताकी दुति पर दिनकर को है ।।36।।
भुज-मृनाल छबि उदर बखानौं ।
रस-फल रूप-लता लगे मानौं ।।37।।
चूरी श्याम करनि फबि रहीं ।
तिनकी उपमा पावत नहीं ।।38।।
पहुँचिनु के लटकन बने ऐसैं ।
भ्रमत भँवर कमलन पर जैसैं ।।39।।
गोरी अँगुरिनु की छबि जोहैं ।
मिहँदी रँग भीनी अति सोहैं ।।40।।
दोहा
चन्द्रहार छबि कहा कहौं, पानिप मोतिनु हार ।
मनौ रूप अरु प्रेम की, आइ मिलीं द्वै धार ।।41।।
चौपाई
सरसी-नाभि सुदेश सुहाई ।
पिय मन हंस बसत तहाँ माई ।।42।।
त्रिवली प्रीतम प्रान-अधारा ।
मनौं रूप रस गुन की धारा ।।43।।
रोम-राजि सोभा यौं दीनी ।
मनौं रेखा रति-पति की कीनी ।।44।।
सूक्षम कटि पृथु जघन सुढारा ।
अति रोचक किंकिनी झनकारा ।।45।।
जेहर सुमिलि अनूप बिराजै ।
नूपुर अद्भुत रागिनी बाजै ।।46।।
तिन पर बंशी बारत प्यारौ ।
हित ध्रुव' रीझि अपनपौ हारौ ।।47।।
चरन-कमल जावक रंग भीने ।
प्रीतम चित्र प्यार सौं कीने ।।48।।
परम रसिक रस में सहरावत ।
कबहूँ लै हिय-नैंन लगावत ।।49।।
पिय मन बसत रहत तेहि ऐंना ।
अटक्यौ नागर नैननिं-सैंना ।।50।।
कोक-कला बरनी हैं जेती ।
प्रिया-चरन सेवत रहैं तेती ।।51।।
नख-सिख लौं अति कुँवरि सिंगारी ।
मानौं सोभा की फुलवारी ।।52।।
देखि छबीली भांति लुभाने ।
लाल तहां बिनु मोल बिकाने ।।53।।
दोहा
बाढ़ी छबि सब भूषननि, अद्भुत भाँति अनूप ।
गहने कौ गहनौं भयौ, नवल नागरी-रूप ।।54।।
चौपाई
यातें अंगनि भूषन बाने ।
ताके हेत दोऊ उर आने ।।55।।
चितवत लाल बिवस ह्वै जाई ।
यातें राखे अंग दुराई ।।56।।
दूजे सखियनि यौं पहिरावैं ।
सेवा हित के सुखहिं बढ़ावें ।।57।।
अंगनि के भूषन यौं भये ।
मनौं मनिनु के ढँपना दये ।।58।।
रूप-माधुरी सहजहि राजै ।
छिन छिन औरै-और बिराजै ।।59।।
दोहा
ऐसौ रूप प्रकाश तहाँ, नख की सम नहिं भान ।
तेहि ठाँ उपमा दीप की, धरिबौ बड़ौ अयान ।।60।।
चौपाई
जहाँ लगि दुति अरु कांति बखानी ।
कुँवरि अंग देखत सकुचानी ।।61।।
छबि ठाढ़ी आगैं कर जोरैं ।
गुन की कला चौंर सिर ढोरैं ।।62।।
चित्र भई तेहि ठाँ चतुराई ।
पंगु भई चितवत चपलाई ।।63।।
छ्वै न सकत अंगनि मृदुताई ।
अति सुकुँवार कुँवरि तन माई ।।64।।
यातें उपमा कछु उर आई ।
बात खोज बिनु जात न पाई ।।65।।
रति इक हेम छबिहि उर आनैं ।
ताहि समुझि सुमेरु पहिचानैं ।।66।।
दोहा
अंग कांति की छबि छटा, ताकी छटा सुदेस ।
उपमा सब जग की भईं, तेहि सोभा कौ लेस ।।67।।
चौपाई
सहज माधुरी अंगनि वरषै ।
पल-पल प्रीतम मन आकरषै ।।68।।
देखत अद्भुत भाँति अनूपहि ।
पिय मन पर्यौ प्रेम के कूपहि ।।69।।
चितै रूप गुन अलक-निकारौ ।
हित सौं लाइ लयौ उर प्यारौ ।।70।।
अधरनि रस सींच्यौ जब प्यारी ।
तनकी सुधि जब जाइ सँभारी ।।71।।
बढ्यौ केलि-रस-सिंधु अभंगा ।
हाव-भाव तहाँ उठत तरंगा ।।72।।
पायौ रूप अंबु निजु ऐंना ।
चंचल मीन फिरत तहाँ नैंना ।।73।।
रंग भरे पट अंग बिसारे ।
रस बिनोद भींजे दोउ प्यारे ।।74।।
अति विचित्र सबही बिधि दोऊ ।
रस विहार में घटि नहिं कोऊ ।।75।।
विद्या कोक कला जिती कहीं ।
तेऊ तहाँ भूलि सब रहीं ।।76।।
तेहि सुख रंग परे सुनि सजनी ।
जानत नहिं कित वासर रजनी ।।77।।
दोहा
मिटत न तृषा मनोज की, करत मधुर रस पान ।
जैसे निवरत खेल नहिं, जहाँ खिलार समान ।।78।।
हाव-भाव हीरा भये, हेम नील मनि अंग ।
जरे जु कुदंन प्रेम 'ध्रुव', पानिप झलक अनंग ।।79।।
षटरितु बरनौं जुगल हित, बहु विधि करत बिहार ।
रितु-रितु कौ सुख कहौं कछु, अपनी मति अनुसार ।।80।।
सवैया
खेलत कामिनी कंत बसंत, बढ्यौ मन मोद विनोद अनंगा ।
तैसौ रह्यौ बन फूलनि फूल, रंगे दोऊ प्रीतम प्रेम-सुरंगा ।।
प्रिया मुख-चन्द्र की ओर किशोर, चकोर भये पिवैं रूप तरंगा ।
सखी चहुँ कोद विलोकत हैं 'ध्रुव', आनँद को सुख सार अभंगा ।।81।।
चौपाई
रितु बसंत आई सुखदाई ।
भयौ आनंद सबनि मन भाई ।।82।।
हरित अरुन दल अंकुर नये ।
जहाँ-तहाँ फूल सुरंगित भये ।।83।।
नवल जुगल सुख हेत विचारयौ ।
मानौं वृंदा विपिन सिंगारयौ ।।84।।
फूली बेलि तरुनि लपटानी ।
मानौं तिय पिय सौं रति मानी ।।85।।
तन मन फूल कही नहिं जाई ।
फूले फूल जहाँ-तहाँ माई ।।86।।
शुक पिक वानी सुख सौं सानी ।
मानौं कहत हैं मैंन-कहानी ।।87।।
इक द्रुम तौ सब फूलनि छाये ।
मानौं अतन-वितान तनाये ।।88।।
सुरँग सुगंध गुलाल उड़ायौ ।
मनौं अनुराग सबनि पर छायौ ।।89।।
तेहि ठाँ खेल बढ्यौ अति भारी ।
चहुँ दिस सखी मध्य पिय-प्यारी ।।90।।
छिरकत हँसत अधिक सुख देहीं ।
बिच-बिच अधर-सुधा-रस लेहीं ।।91।।
कुंकुम अरगजा के रस भीने ।
रस विहार में परम प्रवीने ।।92।।
कोमल सेज रची सुख सीवाँ ।
तापर राजत दै भुज-ग्रीवा ।।93।।
झूलत दोऊ मिलि सुरत हिंडौरैं ।
चंचल चपल स्याम तन गौरैं ।।94।।
चितै रहत प्यारी मुख ओरैं ।
भाइनि भरी नैंन की कोरैं ।।95।।
छिन-छिन प्रीतम कौ चित चोरैं ।
बाजत किंकिनि थोरैं-थोरैं ।।96।।
रति विलास रस ऐसौ कीनौं ।
मनमथ कोटि मान हरि लीनौं ।।97।।
दोहा
रूप सखी कौ धरैं 'ध्रुव' सेवत दिनही बसंत ।
छिन-छिन रुचि लै दुहुँनि की, फूलत फूल अनंत ।।98।।
सवैया
ग्रीषम की रितु जानि सहेलिनु, कंज कपूर की कुंज बनाई ।
चंदन चंद के खंभ रचे दल, कोमल रंग सुरंगनि छाई ।।
उज्वल सेज सुरंग सुहावनी, वारि गुलाब सौं लै छिरकाई ।
राजत हैं 'ध्रुव' लाड़िली लाल, बिनोद कौ मोद बढ्यौ अधिकाई ।।99।।
चौपाई
आई ग्रीषम सोभा ऐंना ।
अंगनि छबि देखत भरि नैंना ।।100।।
झीनें बसन झलक अति तन की ।
पूरन भई आस सब मन की ।।101।।
उज्वल फूलन कुंज सुहाई ।
उज्वल कोमल सेज रचाई ।।102।।
फूलनि के रचि हार बनाये ।
लै कपूर जल सौं छिरकाये ।।103।।
जहाँ-तहाँ उज्वल बसन बिछाये ।
जलजनि के भूषन पहिराये ।।104।।
दोहा
उज्वलता उज्वल सहज, उज्वल भाँति अनूप ।
बैठे उज्वल सेज पर, उज्वल प्रेम सरूप ।।105।।
चौपाई
पुट कपूर दै चंदन गार्यौ ।
नव गुलाब लै तामें डार्यौ ।।106।।
सबै सखी पहिरैं सित सारी ।
तैसेइ भूषन अति रुचिकारी ।।107।।
बहत है सीतल मंद समीरा ।
सीरौ अदन-पान बर नीरा ।।108।।
दोहा
सियराई सेवा करैं, चितवनि नैंननि कोर ।
खान पान सीतल सबै, लिये रहति निसि भोर ।।109।।
सवैया
स्याम घटा उमड़ी चहुँ ओरनि, पावस की रितु आई सुहाई ।
नाँचत मोर मयूरी बिनोद सौं, आनँद की बरषा बरषाई ।।
कौंधै जहाँ-तहाँ दामिनि कामिनि, प्रीतम अंक रही दुरि माई ।
कैसैं कही 'ध्रुव' जात है सो छबि, देखत नैंन रहे हैं लुभाई ।।110।।
चौपाई
पावस रितु जब आइ तुलानी ।
भाँति अनूप दुहुँनि मन मानी ।।111।।
स्याम सचिक्कन घटा सुहाई ।
उमड़ि-उमड़ि चहुँ दिस ते आई ।।112।।
चमकत चपला कही न जाई ।
सकुचि कुँवरि पिय-उर लपटाई ।।113।।
गरजन-घन सुनि पवन-झकोरिनिं ।
आनँद बढ्यौ मोर अरु मोरिनिं ।।114।।
रंग-कुंज में सेज सहानी ।
रचि-रचि सखियनि हेत सौं बानी ।।115।।
सोभित भूषन-बसन सहानें ।
दूलहु-दुलहिनि रँग में सानें ।।116।।
नव किशोर मन मन अनुरागे ।
मदन मोद आनँद रस पागे ।।117।।
रिमझिमि-रिमझिमि बूदैं परैं ।
रंग-हिंडोरैं झूलत खरैं ।।118।।
तेहि छिन कुँवरि कछुक मन डरैं ।
लपटि जात प्रीतम के गरैं ।।119।।
तिनके छल-बल कहे न जाँही ।
अति विचित्र दोऊ विद्या माँही ।।120।।
दोहा
कुँवर रूप बरसत दिनहिं, पिय चातक न अघात ।
कहा कहौं या प्रेम की, सुनि 'ध्रुव' उलटी बात ।।121।।
सवैया
खेलत रास विनोद बिहार, निसा उँज्यारी महा सुख दैंनी ।
सखीनु के मंडल मध्य बने दोऊ, गावत सुंदर सारंग नैंनी ।।
राग जम्यौ बजैं भूषन अंगनि, चंदहि भूली है आपनी गैंनी ।
सखी रहीं भींजि तहाँ रँग में 'ध्रुव', रैंनि भई मनौं प्रेम की रैंनी ।।122।।
चौपाई
सुखद सरस रितु सरद सुहाई ।
सखियनि मानौं निधि सी पाई ।।123।।
फूले नील कमल सित राते ।
भ्रमत मधुप सौरभ रस माते ।।124।।
कुंज-कुंज गहवर बन खोरी ।
देखत फिरत किशोर-किशोरी ।।125।।
जहाँ-तहाँ स्वच्छ भई धर ऐसी ।
कीनी सिकल आरसी जैसी ।।126।।
बन की कांति कहाँ लौ कहियै ।
सोभा देखि चकित ह्वै रहियै ।।127।।
रैंन उज्यारी देखि बिहारी ।
रच्यौ रास अति ही सुखकारी ।।128।।
सेज मंडल मनि-दीप बिराजै ।
अंगनि भूषन बाजे बाजैं ।।129।।
पलक तार भौंहें भई गाइनि ।
निर्त्तत पुतरी सहज सुभाइनि ।।130।।
सोभित अंजन रेख उपंगा ।
मनौं कटाक्ष तहाँ मधुर मृदंगा ।।131।।
चितवनि सुलप चलन अँग अंगा ।
कोक कलानि के उठत तरंगा ।।132।।
हाव-भाव बहु बिधि दिखरावत ।
चुंबन दान रीझ तहाँ पावत ।।133।।
दोहा
रति बिहार कौ रास दोऊ, खेलत परम प्रवीन ।
कोक-कला घातें सहज, छिन छिन उठति नवीन ।।134।।
सवैया
लाड़िली लालहि भावत है सखि, आनँदमय हिम की रितु आई ।
ऐसे रहे लपटाइ दोउ जन, चाहत अंग में अंग समाई ।।
हार उतार धरे सब भूषन, स्वादी महा रस की निधि पाई ।
महा सुख कौ 'ध्रुव' सार बिहार है, श्री हरिवंश जू केलि लड़ाई ।।135।।
चौपाई
हिमरितु-रंग कह्यौ नहि जाई ।
लाड़िली-लाल रहे लपटाई ।।136।।
तहाँ लागत ऐसी सियराई ।
चाहत अंग में अंग समाई ।।137।।
ज्यौं-ज्यौं प्यारी पिय उर लागै ।
मनौं आनँद के रस में पागै ।।138।।
जाकौ सोच करत हे मन में ।
सहजहि बन आई सो छिन में ।।139।।
हिमरितु अधिक लाल मन भाई ।
जिनतौ ऐसी बात बनाई ।।140।।
या रितु कौ गुन मानत भारी ।
ऐसे रसिक लाल पर वारी ।।141।।
तन-मन भये एक रस माँही ।
तेहिसुख पर सहचरि बलि जाहीं ।।142।।
सावधान सब सखी सयानी ।
हित की सौंज धरी सब बानी ।।143।।
जेहि जेहि छिन जैसी रुचि होई ।
हित सौं आनि खवावत सोई ।।144।।
हित में हरषि सखी सुखकारी ।
निरखत प्रीति लेति बलिहारी ।।145।।
मन की रुचि लै सेवा करहीं ।
सावधान सब ऐसैं रहहीं ।।146।।
अति सुकुँवार किशोर-किशोरी ।
सहजहि बँधे प्रेम की डोरी ।।147।।
ऐसौ लालच बढ्यौ बिहारी ।
उर ते प्रिया करत नहिं न्यारी ।।148।।
अंग-अंग ऐसै लपटाहीं ।
भूषन-हार न बीच समाहीं ।।149।।
दोहा
अंग-अंग सब जूरि रहे , अरु नैंननि सौं नैंन ।
रीति दुहुँनि की यहै 'ध्रुव' तबही लौं चित चैंन ।।150।।
सवैया
ल्याई कछू सियराई सुगंध सौं, बात वहै अतिही सुखदाई ।
कौंमल फूल दुकूल सुरंगिनी, मंजु निकुंज में सेज बनाई ।।
विलास कौ रास करैं दोउ हाँस, मनौं छबि कंज रहे बिकसाई ।
भोर अली सत आइ जुरी 'ध्रुव', पीवति रूप परागहि माई ।।151।।
चौपाई
आई सिसिर कछू सियराई ।
त्रिविध समीर बहै सुखदाई ।।152।।
मंजुल कुंज में बनी निकुंजा ।
तामें रची सेज सुख- पुंजा ।।153।।
तापर रसिक रसिकनी सोहैं ।
सो छबि सखी नैंन भरि जोहैं ।।154।।
कबहूँ बातनि के रस परैं ।
कबहूँ लटकि सेज पर ढरैं ।।155।।
ऐसी सभा बनी सुखदाई ।
आनन्द हास परस्पर माई ।।156।।
दंपति-रुचि लै दिनहिं लड़ावैं ।
हित ध्रुव' रति-रस मंगल गावैं ।।157।।
यह रस प्रेम कौ सागर आही ।
मो मति पैर सकै क्यौं ताही ।।158।।
जतन अनेक कियैं नहिं पावै।
सिंधु सीप में कैसैं आवै ।।159।।
दोहा
मो मति लव त्रिसरैंनु सम, सोभा मेरु समान ।
या मन के अवलम्ब हित, कही कछू उनमान ।।160।।
बरषा-ग्रीष्म नैंन सुख, सरद वसंत विलास ।
लपटनिं कौ सुख हिम-सिसिर, प्रेम सुखद सब मास ।।161।।
रसमय "रस हीरावली", पढ़ि हैं 'ध्रुव' जो कोइ ।
प्रेम कमल तेहि हीय तें, तबहीं प्रफुल्लित होइ ।।162।।
और न कछू सुहाइ 'ध्रुव', यह जाँचत निसि भोर ।
याही रस की चटपटी, लगी रहौ हिय मोर ।।163।।
दोहा कबित्त अरु चौपाई, इकसत साठिरु दोइ ।
जुगल केलि हीरावली, हिय गुन माला पोइ ।।164।।
जै जै श्री रस हीरावली लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
22. रस रत्नावली लीला
दोहा
प्रथम समागम सरस रस, वर विहार के रंग ।
बिलसत नागर नवल कल, कोक कलनि के अंग ।।1।।
नमित ग्रींव छवि सींव रही, घूंघट पटहि सँभारि ।
चरननि सेवत चतुरई, अति सलज्ज सुकुँवारि ।।2।।
जो अँग चाहत छुयौ पिय, कुवँरि छुवनि नहिं देत ।
चितवनि मुसकनि रस भरी, हरि-हरि प्राननिं लेत ।।3।।
चितवत औरै अंग पिय, छुयौ चहत अँग और ।
तऊ बनत नहिं चतुरई, कुँवरि चतुर सिरमौर ।।4।।
अलक सँवारन ब्याज कै, परस्यौ चहत कपोल ।
मृदुल करनि डारति झटकि, रसमय कलह कलोल ।।5।।
बातनिं लाई लाड़िली बहु विधि करि छल-छंद ।
बुधि-बल कै खौल्यौ चहत, नागर नीवी बंद ।।6।।
नागराई जहाँ लगि, कीनी नागर जानि ।
रहे दीन ह्वै चितै मुख, हारि आपनी मानि ।।7।।
आतुर पिय रस में विवस, उर अधीर अकुलात ।
कबहूँ गहत है पगनि कौं, कबहूँ हा-हा खात ।।8।।
यह गति देखति लाड़िली, भई कृपाल तेहि काल ।
हारे ही रस पाइयै, उलटी प्रेम की चाल ।।9।।
नैन कपोलनि चूमि कै, लये अंक भरि लाल ।
अधर सुधा-रस दै मनौं, सींचत मैंन तमाल ।।10।।
सुरत-सिंधु सुख रस बढ्यौ, अति अगाध नहिं पार ।
लाज नेम-पट दूरि कै, मज्जत दोउ सुकुँवार ।।11।।
रस विनोद विपरीति-रति, बरसत प्यार कौ मेह।
चल्यौ उमड़ि भरि नेम की, तोरि मैंड़ जल नेह ।।12।।
अंग-अंग उरझानि की, सोभा बढ़ी सुभाइ ।
मृदुल कनक की बेलि मनौं, रही तमाल लपटाइ ।।13।।
बिच-बिच बोलत बैंन मृदु, सुनि सुख होत अपार ।
रोचक रस पोषक सदा, कल किंकिनि झुनकार ।।14।।
प्रवल चौंप सरिता बढ़ी, कहत बनत कछु नाहिं ।
पियहि लाइ कुच घटनि सौं, पैरावति तेहि माहिं ।।15।।
अति उदार मृदु चित्त सखी, प्रेम सिंधु सुकुँवारि ।
विविध रतन सब अंग जे, देत सँभारि-सँभारि ।।16।।
सुरत स्वाति वरषा मनौ, निसि दिन बरसत आहि ।
रह्यौ हारि चात्रिक तहाँ, तृषा लाल की चाहि ।।17।।
सुरत रंग रस में कबहुँ, रसिक विवस ह्वै जाइ ।
करजन नासा पुट चटकि, ललना लेति जगाइ ।।18।।
ऐसौ सुख कौ रस बढ्यौ, श्रम नहिं जान्यौ जाइ ।
चाह चौंप रुचि तहाँ की, लालच चितै लजाइ ।।19।।
मैंन मनोरथ बेलि बढ़ी, सोभा चढ़ी अपार ।
मन न घटत तनहूँ नहीं, अटके सुरत बिहार ।।20।।
सुरति केलि ऐसी बनी, मानौं खेलत फाग ।
हाव-भाव सौंधौ भरयौ, मुख तँबोल अनुराग ।।21।।
अति सुरंग सारी सुही, छबि सौं रहि झलकाइ ।
कुंदन-बेलि तमाल पर, मनौं गुलाल रह्यौ छाई ।।22।।
चंचल नैंननिं की चलनि, पिचकारिनु की धार ।
बिवस भये खेलत दोऊ, भींजे रँग सुकुँवार ।।23।।
श्रम जलकन मुख गौर पर, अलकावलि गई छूटि ।
दरकी सब ठाँ कंचुकी, हारावलि गई टूटि ।।24।।
अलक लड़ी सुख लाड़िली, प्रीतम प्यार की देह ।
श्रमित जानि अंचल पवन, करत रंगे निज नेह ।।25।।
सिथल भये भूषन बसन, चित्रित पीक सुरंग ।
लिख्यौ पत्र अनुराग मनौं, हारे कोटि अनंग ।।26।।
अरुन नैंन घूमत बने, सोभा बढ़ी सुभाइ ।
अधरनि रँग मादिक पियौ, सोई रँग झलकाइ ।।27।।
पीक कपोलनि फबि रही, कहुँ कहुँ अंजन लीक ।
मनौं अनुराग सिंगार मिलि, चित्र बनाये नीक ।।28।।
निरखत तेई चिन्हनिं पुनि, बढ्यौ चतुरगुन काम ।
गही शरन चरननि तबै, जानि सुखद सुखधाम ।।29।।
लई लाल जिनकी शरन, कोमल सुरँग सुदेस ।
कछुक कहत हौं जथामति, तिनकी छबि कौ लेस ।।30।।
कुवँरि चरन सुख-पुंज में, अंबुज छबि हरि लैंन ।
चहुँ दिसि तापर भ्रमत रहैं, प्रीतम के अलि नैंन ।।31।।
लाल सखी को भेस धरि, रचि अद्भुत सिंगार ।
प्रेम प्यार के चाव सौं, सेवत पद सुकुवाँर ।।32।।
कर पर अंचल राखि कै, तिन पर चरन अनूप ।
चितवत लीने मुकुर ज्यौं, अमित माधुरी रूप ।।33।।
चूँवत छुवावत नैंन पिय, जावक चित्र बनाइ ।
देखि अटपटी प्रेम की, गति नहीं समुझी जाइ ।।34।।
ते पद सेवत रहत दिन, सहज परयौ यह नेम ।
चरन चारु कौ हार किय, पिय प्रवीन रस प्रेम ।।35।।
चरन कंज कुंदन बरन, झलमलात नख कांति ।
आई मिलि रस करन कौ, मनौं बिधुनि की पाँति ।।36।।
मनिगन जुत झलकत रहैं, पद अंबुज सुख-दैंन ।
सहज सुभग रसनिधि सरस, प्रीतम-चित अलि ऐंन ।।37।।
सुमन-सुखासन सेज पर, लटकी कुँवरि सुभाइ ।
पिय नैंननि के करनि सौं, तहाँ पलोटत पाइ ।।38।।
सब अँग नागर वैस सम, नेह रूप गुन ऐंन ।
पिय अधीर आधीन तहाँ, बँधे नैंन फँद सैंन ।।39।।
लोइनि भीनें मदन रस, निरखत पानिप अंग ।
कहि न सकत कछु बात पिय, वेपथ भये अंग-अंग ।।40।।
लाइ लये हित सौं हियैं, गहि अधरनि मृदु दंत ।
मैंन रसासव रह्यौ भरि, रौंम-रौंम प्रति कंत ।।41।।
प्रेम खेल वृंदाविपिन, नृप दोउ नवल किशोर ।
प्रेम खेल खेलत तहाँ, नहिं जानत निसि भोर ।।42।।
अति स्वादी दोऊ लाड़िले, केलि-पुंज सुख-रास ।
रीझि-रीझि बिच-बिच करत, मधुर मंद मृदुहास ।।43।।
ज्यौं-ज्यौं मैंन तरंग उठैं, त्यौं-त्यौं मुख छबि कांति ।
कहा-कहौं रुचि चाह की, छिन छिन नव-नव भाँति ।।44।।
श्रम जल पीक सुरंग कन, झलकत अमल कपोल ।
सुरत- सिंधु के मथत मनौं, प्रगटे रतन अमोल ।।45।।
यह सुख देखत सखिनु के, बाढ्यौ अति अनुराग ।
हित सौं देतिं असीस सब, अविचल कुँवरि-सुहाग ।।46।।
रूप मदन गुन नेह जुत, ऐसौ भयौ अनूप ।
सो रस पीवत छिनहि-छिन, मिलि वृंदावन भूप ।।47।।
तेहि सुख कौ रस मोद सखि, जो उपजत दुहुँ माहिं ।
पल-पल पीवत दृगनि भरि, ललितादिक न अघाहिं ।।48।।
रस-निधि "रस रतनावली", रसिक-रसिकनी-केलि ।
हित सौं जो उर धरै 'ध्रुव', बढ़ै प्रेम-रस-बेलि ।।49।।
महा गोप्य अद्भुत सरस, चिंतत रहौ मन माँहि ।
या रस के रसिकनि बिना, सुनि 'ध्रुव' कहिबौ नाँहि ।।50।।
जै जै श्री रस रत्नावली लीला की जै जै श्री हित हरिवंश
दोहा
प्रथम समागम सरस रस, वर विहार के रंग ।
बिलसत नागर नवल कल, कोक कलनि के अंग ।।1।।
नमित ग्रींव छवि सींव रही, घूंघट पटहि सँभारि ।
चरननि सेवत चतुरई, अति सलज्ज सुकुँवारि ।।2।।
जो अँग चाहत छुयौ पिय, कुवँरि छुवनि नहिं देत ।
चितवनि मुसकनि रस भरी, हरि-हरि प्राननिं लेत ।।3।।
चितवत औरै अंग पिय, छुयौ चहत अँग और ।
तऊ बनत नहिं चतुरई, कुँवरि चतुर सिरमौर ।।4।।
अलक सँवारन ब्याज कै, परस्यौ चहत कपोल ।
मृदुल करनि डारति झटकि, रसमय कलह कलोल ।।5।।
बातनिं लाई लाड़िली बहु विधि करि छल-छंद ।
बुधि-बल कै खौल्यौ चहत, नागर नीवी बंद ।।6।।
नागराई जहाँ लगि, कीनी नागर जानि ।
रहे दीन ह्वै चितै मुख, हारि आपनी मानि ।।7।।
आतुर पिय रस में विवस, उर अधीर अकुलात ।
कबहूँ गहत है पगनि कौं, कबहूँ हा-हा खात ।।8।।
यह गति देखति लाड़िली, भई कृपाल तेहि काल ।
हारे ही रस पाइयै, उलटी प्रेम की चाल ।।9।।
नैन कपोलनि चूमि कै, लये अंक भरि लाल ।
अधर सुधा-रस दै मनौं, सींचत मैंन तमाल ।।10।।
सुरत-सिंधु सुख रस बढ्यौ, अति अगाध नहिं पार ।
लाज नेम-पट दूरि कै, मज्जत दोउ सुकुँवार ।।11।।
रस विनोद विपरीति-रति, बरसत प्यार कौ मेह।
चल्यौ उमड़ि भरि नेम की, तोरि मैंड़ जल नेह ।।12।।
अंग-अंग उरझानि की, सोभा बढ़ी सुभाइ ।
मृदुल कनक की बेलि मनौं, रही तमाल लपटाइ ।।13।।
बिच-बिच बोलत बैंन मृदु, सुनि सुख होत अपार ।
रोचक रस पोषक सदा, कल किंकिनि झुनकार ।।14।।
प्रवल चौंप सरिता बढ़ी, कहत बनत कछु नाहिं ।
पियहि लाइ कुच घटनि सौं, पैरावति तेहि माहिं ।।15।।
अति उदार मृदु चित्त सखी, प्रेम सिंधु सुकुँवारि ।
विविध रतन सब अंग जे, देत सँभारि-सँभारि ।।16।।
सुरत स्वाति वरषा मनौ, निसि दिन बरसत आहि ।
रह्यौ हारि चात्रिक तहाँ, तृषा लाल की चाहि ।।17।।
सुरत रंग रस में कबहुँ, रसिक विवस ह्वै जाइ ।
करजन नासा पुट चटकि, ललना लेति जगाइ ।।18।।
ऐसौ सुख कौ रस बढ्यौ, श्रम नहिं जान्यौ जाइ ।
चाह चौंप रुचि तहाँ की, लालच चितै लजाइ ।।19।।
मैंन मनोरथ बेलि बढ़ी, सोभा चढ़ी अपार ।
मन न घटत तनहूँ नहीं, अटके सुरत बिहार ।।20।।
सुरति केलि ऐसी बनी, मानौं खेलत फाग ।
हाव-भाव सौंधौ भरयौ, मुख तँबोल अनुराग ।।21।।
अति सुरंग सारी सुही, छबि सौं रहि झलकाइ ।
कुंदन-बेलि तमाल पर, मनौं गुलाल रह्यौ छाई ।।22।।
चंचल नैंननिं की चलनि, पिचकारिनु की धार ।
बिवस भये खेलत दोऊ, भींजे रँग सुकुँवार ।।23।।
श्रम जलकन मुख गौर पर, अलकावलि गई छूटि ।
दरकी सब ठाँ कंचुकी, हारावलि गई टूटि ।।24।।
अलक लड़ी सुख लाड़िली, प्रीतम प्यार की देह ।
श्रमित जानि अंचल पवन, करत रंगे निज नेह ।।25।।
सिथल भये भूषन बसन, चित्रित पीक सुरंग ।
लिख्यौ पत्र अनुराग मनौं, हारे कोटि अनंग ।।26।।
अरुन नैंन घूमत बने, सोभा बढ़ी सुभाइ ।
अधरनि रँग मादिक पियौ, सोई रँग झलकाइ ।।27।।
पीक कपोलनि फबि रही, कहुँ कहुँ अंजन लीक ।
मनौं अनुराग सिंगार मिलि, चित्र बनाये नीक ।।28।।
निरखत तेई चिन्हनिं पुनि, बढ्यौ चतुरगुन काम ।
गही शरन चरननि तबै, जानि सुखद सुखधाम ।।29।।
लई लाल जिनकी शरन, कोमल सुरँग सुदेस ।
कछुक कहत हौं जथामति, तिनकी छबि कौ लेस ।।30।।
कुवँरि चरन सुख-पुंज में, अंबुज छबि हरि लैंन ।
चहुँ दिसि तापर भ्रमत रहैं, प्रीतम के अलि नैंन ।।31।।
लाल सखी को भेस धरि, रचि अद्भुत सिंगार ।
प्रेम प्यार के चाव सौं, सेवत पद सुकुवाँर ।।32।।
कर पर अंचल राखि कै, तिन पर चरन अनूप ।
चितवत लीने मुकुर ज्यौं, अमित माधुरी रूप ।।33।।
चूँवत छुवावत नैंन पिय, जावक चित्र बनाइ ।
देखि अटपटी प्रेम की, गति नहीं समुझी जाइ ।।34।।
ते पद सेवत रहत दिन, सहज परयौ यह नेम ।
चरन चारु कौ हार किय, पिय प्रवीन रस प्रेम ।।35।।
चरन कंज कुंदन बरन, झलमलात नख कांति ।
आई मिलि रस करन कौ, मनौं बिधुनि की पाँति ।।36।।
मनिगन जुत झलकत रहैं, पद अंबुज सुख-दैंन ।
सहज सुभग रसनिधि सरस, प्रीतम-चित अलि ऐंन ।।37।।
सुमन-सुखासन सेज पर, लटकी कुँवरि सुभाइ ।
पिय नैंननि के करनि सौं, तहाँ पलोटत पाइ ।।38।।
सब अँग नागर वैस सम, नेह रूप गुन ऐंन ।
पिय अधीर आधीन तहाँ, बँधे नैंन फँद सैंन ।।39।।
लोइनि भीनें मदन रस, निरखत पानिप अंग ।
कहि न सकत कछु बात पिय, वेपथ भये अंग-अंग ।।40।।
लाइ लये हित सौं हियैं, गहि अधरनि मृदु दंत ।
मैंन रसासव रह्यौ भरि, रौंम-रौंम प्रति कंत ।।41।।
प्रेम खेल वृंदाविपिन, नृप दोउ नवल किशोर ।
प्रेम खेल खेलत तहाँ, नहिं जानत निसि भोर ।।42।।
अति स्वादी दोऊ लाड़िले, केलि-पुंज सुख-रास ।
रीझि-रीझि बिच-बिच करत, मधुर मंद मृदुहास ।।43।।
ज्यौं-ज्यौं मैंन तरंग उठैं, त्यौं-त्यौं मुख छबि कांति ।
कहा-कहौं रुचि चाह की, छिन छिन नव-नव भाँति ।।44।।
श्रम जल पीक सुरंग कन, झलकत अमल कपोल ।
सुरत- सिंधु के मथत मनौं, प्रगटे रतन अमोल ।।45।।
यह सुख देखत सखिनु के, बाढ्यौ अति अनुराग ।
हित सौं देतिं असीस सब, अविचल कुँवरि-सुहाग ।।46।।
रूप मदन गुन नेह जुत, ऐसौ भयौ अनूप ।
सो रस पीवत छिनहि-छिन, मिलि वृंदावन भूप ।।47।।
तेहि सुख कौ रस मोद सखि, जो उपजत दुहुँ माहिं ।
पल-पल पीवत दृगनि भरि, ललितादिक न अघाहिं ।।48।।
रस-निधि "रस रतनावली", रसिक-रसिकनी-केलि ।
हित सौं जो उर धरै 'ध्रुव', बढ़ै प्रेम-रस-बेलि ।।49।।
महा गोप्य अद्भुत सरस, चिंतत रहौ मन माँहि ।
या रस के रसिकनि बिना, सुनि 'ध्रुव' कहिबौ नाँहि ।।50।।
जै जै श्री रस रत्नावली लीला की जै जै श्री हित हरिवंश
23. प्रेमावली लीला
दोहा
प्रगट प्रेम कौ रूप धरि, श्री हरिवंश उदार ।
श्री राधावल्लभ लाल कौ प्रगट कियौ रस सार ।।1।।
हरिवंश चंद सब रसिकजन, राखे रस में बोरि ।
प्रेम-सिंधु विस्तारि कैं, नेम-मेंड़ दई तोरि ।।2।।
रूप-बेलि प्यारी बनी, प्रीतम प्रेम-तमाल ।
द्वै मन मिलि एकै भये, श्री राधावल्लभलाल ।।3।।
लपटि रहे दोऊ लाड़िले, अलबेली लपटानि ।
रूप-बेलि बिबि अरुझि परी, प्रेम सेज पर आनि ।।4।।
प्रेम रीति निज आहि जो, तामें लाल प्रवीन ।
अंग-अंग सब हारि कैं, रहे आप ह्वै दीन ।।5।।
अलबेली नागरि जहाँ, धरत चरन छबि पुँज ।
पलकनि की करि सोहनी, देत कुँवर तेहि कुंज ।।6।।
धरति भाँवती पग जहाँ, रहत देखि तिहिं ठौर ।
को समुझै यह सुख सखी, बिना रसिक सिरमौर ।।7।।
भरि आए दोऊ नैंन जहँ, रहे नेह बस झूमि ।
तिहि-तिहि ठाँ काहे न भई, इन प्राननि की भूमि ।।8।।
देखि प्रेम पिय कौ सखी, नैंन भरे जल आइ ।
समुझि दसा पिय की तबहिं, पुतरिनु लियौ समाइ ।।9।।
लिये दीनता एक रस, महा प्रेम रंग-रात ।
ऐसी प्यारी पीय कौं, देखत हूँ न अघात ।।10।।
जावक रंग भीने चरन, गौर बरन छबि सींब ।
निरखत पिय अनुराग सौं, ढ़री जात अधि ग्रींव ।।11।।
अंग-अंग सब लाल के, झुकत प्रिया की ओर ।
सहज प्रेम कौ ढार पर्यौ, बँधे नेह की डोर ।।12।।
जिनके है यह प्रेम रस, सोई जानत रीति ।
जो हारै तौ पाइयै, नेह खेत में जीति ।।13।।
मन के पाछैं मन फिरै, नैननिं पाछैं नैंन ।
इहै एक सुख लाल के, रह्यौ पूरि उर ऐंन ।।14।।
नैननिं छवात फिरत पिय, पत्र फूल बन जेत ।
प्रान प्रिया दृग छटा जल, सींचे सखि यह हेत ।।15।।
नैननिं बाढ़ी तृषा अति, ज्यौं-ज्यौं देखत रूप ।
पानिहि लागै प्यास ज़्यौं, कहा करै ढिग कूप ।।16।।
विटप डारि अवलंब पिय, ठाढ़े चितहि नहिं चैन ।
झलमलात भरे प्रेम रस, झलकत सुदंर नैन ।।17।।
और सबै सुख देह के, पिय मन तें गये भूलि ।
अवलोकत मुख माधुरी, रहे प्रेम रस झूलि ।।18।।
हेरि-हेरि हियौ गहवरयौ, भरि भरि आवत नैंन ।
कौन अटपटी मन परी, ध्रुव पै कहत बनैं न ।।19।।
चितवनि सौं चित रँगि रह्यौ, मुसिकनि रस बस मैंन ।
अंग-अंग दीप अनंग मनौं, परत पतंग जु नैंन ।।20।।
अद्भुत अंगनि की झलकि, उठत तरंग सुभाइ ।
समुझि दसा पिय की प्रिया, रहत छिपाइ-छिपाइ ।।21।।
प्रीतम प्यासे रूप के, सो रस कह्यौ न जाइ ।
नैंन रूप ह्वै जाइ जौ, प्यास न तऊ सिराइ ।।22।।
अद्भुत रूप विलास सुख, चितवत भूले अंग ।
सहज सिंधु सुख में परे, नख-सिख प्रेम अभंग ।।23।।
नयौ नेह नेही नये, नयौ रूप सुखरासि ।
नयौ चाह विलसैं सहज, परे प्रेम की पासि ।।24।।
सहज प्रेम के सिंधु में, दोऊ करत कलोल ।
भरि-भरि रस हुलसत हियौ, सुख की उठति अलोल ।।25।।
रचि-रचि बीरी देत पिय, महा प्रेम की रासि ।
सर्वसु है जिनके इहै, चितवनि कै मृदु हासि ।।26।।
पिकदानी लीन्हें कुँवर, चितवत मुख की ओर ।
रहे उगार की आस धरि, ज्यौं प्रति चंद चकोर ।।27।।
मनवच काइक एक रस, धरै महा व्रत प्रेम ।
प्रान प्रियहिं सेवत कुँवर, याही सुख कौ नेम ।।28।।
प्यारी सर्वस लाल कैं, लाल प्रिया कैं प्रान ।
सहज प्रेम दुहुँ में बन्यौ, फीके भये रस आन ।।29।।
मंद-मंद मुसिकात जब, बेसर तरल तरंग ।
चितै चित्रवत रहे पिय, सिथिल भये सब अंग ।।30।।
मुकुर पानि लियैं लाड़िली, बैठी सहज सुभाइ ।
अनियारी अँखियन दियौ, अंजन रुचिर बनाइ ।।31।।
सोचि रही तेहिं छिन कछू, इत उत चितवत नाहिं ।
प्रीतम मन की मृदुलता, गड़ी आइ मन माहिं ।।32।।
प्रेम रूप कौ सुख सहज, सो ध्रुव कहत बनैं न ।
कै जानै मन तिहिं बिंध्यौ, कै समुझैं दोऊ नैंन ।।33।।
नित्य सहज दुलहु कुँवर, दुलहिनि अति सुकुँवारि ।
नयौ चाव नित ही रहै, अद्भुत रूप निहारि ।।34।।
नव किशोर उन्नत सदा, आनंद की निधि शोभ ।
नई अटक की चौंप ध्रुव, परे प्रेम के लोभ ।।35।।
और भोग नहिं प्रेम सम, सबकौ प्रेम सिंगार ।
तेहिं अवलंबे रसिक दोऊ, सकल रसन कौ सार ।।36।।
प्रेम मदन मद किये रद, और सकल सुख जेत ।
कुँवारि सुभाइनि रंग रंग्यौ, छिन-छिन होत अचेत ।।37।।
लाल नैंन भये लाल के, रँगे रंगीली लाग ।
अंतर भरि निकस्यौ चहत, इहिं मग मनु अनुराग ।।38।।
लै सुरंग जावक सुकर, चरननिं चित्र बनाइ ।
मृदु अँगुरिनि की छबि निरखि, पुतरिनु सौं रहे लाइ ।।39।।
दसन खंडि अति रीझि कै, पिय मुख बीरी दीन ।
सीवाँ दोऊ अनुराग की, भये एक रस लीन ।।40।।
पट भूषन जेहि कुँवरि के, प्रीतम के ते प्रान ।
अति अनन्य रस प्रेम में, परसत नहिं कछु आन ।।41।।
ते पट भूषन पहरि पिय, सहचरि कौ वपु बानि ।
फिरत लियैं अनुराग सौं, कुसुम-बीजना पाँनि ।।42।।
प्रेम कुँवर कौ समुझि कै, प्रेम वारि भरि नैंन ।
रही लपटि पिय के हियैं, सो सुख कहत बनै न ।।43।।
अमित कोटि जुग कलप लौं, राखे उरजन माहिं ।
ते सब लव त्रिसरैनु सम, बीतत जानें नाहि ।।44।।
प्रिया प्रेम आसव महा, मादिक रहैं दिन रैंन ।
कैसैं छूटै बिबसता, भरि-भरि पीवत नैंन ।।45।।
महा मोहनी मन हर्यौ, तन डोलत तिन संग ।
बोलत नहिं चितवत मनहि, बस्यौ जाइ किहिं अंग ।।46।।
बिनु देखे देखत न कछु, छबि छायौ उर ऐंन ।
कुँवरि राधिका लाड़िली, पिय नैननिं के नैंन ।।47।।
जहँ लगि सुख कहियत सकल, सुनि ध्रुव कहत विचारि ।
सहज प्रेम के निमिष पर, ते सब डारे वारि ।।48।।
यह सुख समुझन कौं कछू, नाहिंन आन उपाइ ।
प्रेम दरीची जौ कबहुँ, सहज कृपा खुलि जाइ ।।49।।
एकै प्रेमी एक रस, श्री राधावल्लभ आहि ।
भूलि कहै कोऊ और ठाँ, झूठौ जानौं ताहि ।।50।।
तीन लोक चौदह भुवन, प्रेम कहूँ 'ध्रुव' नाहिं ।
जगमगि रह्यौ जराव सौं, श्री वृंदाबन माहिं ।।51।।
प्रेमी बिछुरत नाहिं कहुँ, मिल्यौ न सो पुनि आहि ।
कौन एक रस प्रेम कौ, कहि न सकत ध्रुव ताहि ।।52।।
ढूँढ़ि फिरै त्रैलोक जो, बसत कहूँ ध्रुव नाहिं।
प्रेम रूप दोऊ एक रस, बसत निकुंजनि माहिं ।।53।।
नित्य भूमि मडंल सहज, श्री वृंदावन ऐंन ।
रतन जटित जगमगि रह्यौ, रसिकनि मन सुख दैंन ।।54।।
तरनि-सुता चहुँ दिसि बहै, सोभा लियैं अथाह ।
मनौं ढर्यौ सिंगार रस, कुंडल बाँधि प्रवाह ।।55।।
आवत उपमा और उर, अद्भुत परम रसाल ।
वृंदावन पहिरी मनौं, नील मनिनु की माल ।।56।।
हेम बरन अद्भुत धरनि, मनिनु खचित बहुरंग ।
बिच-बिच हीरनि की झलक, मानौं उठति तरंग ।।57।।
मृगी मयूरी हंसिनी, भरी प्रेम आनंद ।
मत्त मुदित पीवत रहैं, जुगल कमल मकरंद ।।58।।
कुंज-कुंज प्रति झलमलै, आसन सेज सुदेस ।
सहज सौंज छिन छिन नई, कहि न सकत छबि लेस ।।59।।
आनंद बन बरसत कुँवरि, कुँजनि में जहाँ नित्य ।
सुरँग लता द्रुम फूल फल, झूमि रहे जित कित्य ।।60।।
नेकु होत ठाढ़ी कुँवरि, जेहि फुलवारी माहिं ।
पत्र फूल तहँ के सबै, पीत बरन ह्वै जाहिं ।।61।।
प्रेम रूप के मोद की, सोभा बढ़ी विशाल ।
सोई लड़ैती लाल जी, कीनी ह्वै उर माल ।।62।।
रोम-रोम प्रति लाड़िली, सहज रूप की खाानि ।
प्रीतम की जीवन यहै, सरस मंद मुसिकाँनि ।।63।।
अति सलज्ज अनुराग भरे, अनियारे छबि ऐंन ।
अरुन विशद सित सोहने, काजर भींने नैंन ।।64।।
श्रवनाइत बाँके चपल, घूँघट पट न समात ।
अवलोकत जेहि ओर को, छबि बरषा ह्वै जात ।।65।।
हाव भाव लावन्यता, कही सकल जे कोक ।
निसि दिन कर जोरे तहाँ, सेवतिं नैंननि नौंक ।।66।।
अति सुदेस रह्यौं झलकि कै, बेंदा सुरंग रसाल ।
मनौं सुहाग अनुराग कौ, प्रगट बिराजत भाल ।।67।।
नख सिख पट भूषन बने, कहि न सकत कछु रूप ।
सीस फूल सिंगार कौ, मानौं छत्र अनूप ।।68।।
झलक कपोलनि कहा कहौं, मुख पानिप बहु भाँति ।
अखियाँ रपटत चितै तहँ, डीठि नाहिं ठहरात ।।69।।
नासा बेसरि फबि रही, सोभा की मित नाहिं ।
मनौं मीन तहाँ थरहरै, पर्यौ रूप जल माहिं ।।70।।
बन्यौ कपोल पर असित तिल, अलक रही तहँ आइ ।
प्रगट लाल कौ मन मनौं, परयौ फंद बिच जाइ ।।71।।
नैंन अधर कुच कर चरन, झलकत नये तरंग ।
कनक बेलि मनौं फूलि रही, नख सिख कमल सुरंग ।।72।।
प्रिया बदन वर कंज पर, भ्रमर भृंग पिय नैन ।
छबि पराग रस माधुरी, पीवत हू नहिं चैन ।।73।।
ठौर-ठौर पिय रचत हैं, आसन कुसुम रसाल ।
को जानैं कहाँ बैठि हैं, अलबेली नव बाल ।।74।।
समुझि हेत पिय कौ जबहिं, बैठी तहँ मुसिकाइ ।
पिय ग्रीवाँ भुज मेलि कै, अंग-अंग रहे लपटाइ ।।75।।
रची सेज मृदु दलनि लै, अरुन पीत अरु सेत ।
ता पर राजै लाड़िली, इतनौ मन कौ हेत ।।76।।
रंग रंग के सुमन पिय, लै रचि माल बनाइ ।
तन मन कौ सुख को कहै, जब देखत पहिराइ ।।77।।
रूप माधुरी की झलक, निरखि रीझि सुख पाइ ।
चहुँ दिसि फिरि आपुन कुँवरि, पगनि सीस रहे लाइ ।।78।।
रूप सिंधु में मन पर्यौ, ढरत नैंन दुहुँ नीर ।
डगमगात सखियनि गहे, देखे लाल अधीर ।।79।।
लिये अंक भरि लाड़िली, बिबस लाल कौं जानि ।
कही परत सखि कौन पै, बिबि मन की अरुझानि ।।80।।
प्रेम-प्रेम मन-मन समुझि, नैन सजल झलकाति ।
मुख निसरत नहिं बैंन कछु, बिबस दोऊ ह्वै जाति ।।81।।
पिय प्यारी दोऊ रँग भरे, ढरे सेज पर आनि ।
बिबस सखी चितवतिं खरी, महा प्रेम लपटानि ।।82।।
परे प्रेम सुख रंग में, दोऊ नवल किशोर ।
इतनी नहिं जानति सखी, निसा होत कब भोर ।।83।।
पीक कहूँ अंजन कहूँ, मुक्तावलि रही टूटि ।
सिथिल बसन भूषन कहूँ, अलकावलि रही छूटि ।।84।।
श्रम जलकन छबि बदन पर, चितवत प्रीतम ताहि ।
पानिप कौ पानी मनौं, प्रकट देखियत आहि ।।85।।
अंजन तिल रह्यौ अधर पर, नैननिं पर लगी पीक ।
इत हद करी सिंगार की, उत दई प्रेम की लीक ।।86।।
एक प्रेम विवि मन हरे, अरुझी मृदु भुज-ग्रींव ।
उभै सिंधु मिलि उमड़ि चले, रहत तहाँ क्यौं सींव ।।87।।
पीवत मुख छबि माधुरी, व्याकुल रहैं दोउ नैंन ।
रौंम-रौंम बाढ़ी त्रिषा, जहाँ प्रेम कौ मैंन ।।88।।
रस-रंगी रस-रंग में, भींजे सहज सनेह ।
परत प्रेम आनंद में, दोउनि भूलि गई देह ।।89।।
भये अचेत पुनि चेति कै, उठे कुँवर सुकुँवार ।
नैंना प्यासे रूप के, पिवत डीठि भई धार ।।90।।
कहि न सकत तिन की दसा, छिन-छिन नौतन नेह ।
एक प्रान ह्वै रहे तहँ, देखन कौं, द्वै देहु ।।91।।
एक स्वाद 'ध्रुव' एक रस, प्रेम अखंडित धार ।
इकछत प्रेम दसा रहै, सकल सुखनि कौ सार ।।92।।
प्रेम-तरंगनि में परे, छिन छिन प्रति यह केलि ।
महामत्त घूमत फिरैं, दोऊ कंठ-भुज मेलि ।।93।।
बिलसत नित्य-विहार दोऊ, प्रेम खेलि तिहि ठौर ।
और कछु परसत नहीं, महा रसिक सिरमौर ।।94।।
प्रेम पगी तैसी सखी, रँगी दुहुँनि के हेत ।
सहज माधुरी रूप की, नैननिं भरि भरि लेत ।।95।।
अद्भुत प्रेम सखीनि कौ, बिमल अखंडित धार ।
रसिक कुँवर दोऊ लाड़िले, करि राखे उर-हार ।।96।।
सहज प्रेम की सींव दोऊ, नव किशोर वर जोर ।
प्रेम कौ प्रेम सखीन कैं, तेहि सुख कौ नहिं ओर ।।97।।
हारि-हारि जीतत दोऊ, जीति-जीति रहे हारि ।
महा प्रेम देखत सखी, जहँ तहँ रहीं बिचारि ।।98।।
नैंकु भौंह की मुरनि में, लाल दीन ह्वै जात ।
जल सूखे जलजात ज्यौं, बदन मृदुल कुँभिलात ।।99।।
भर्यौ हियौ अनुराग सौं, रहि न सकी अकुलाइ ।
लये लाइ पिय हीय सौं, अधर सुधा रस प्याइ ।।100।।
मान मनावन छुटि गयौ, पर्यौ लपटि तहाँ प्रेम ।
अतंर भरि बाहिर भरयौ, रहे लीन ह्वै नेम ।।101।।
सहज रूप कौ कंज मुख, तामें मुसिकनि मंद ।
जीवन पिय दृग सखिनु के, सोइ तहाँ मकरंद ।।102।।
अलबेली हँसि कैं जबहि, पिय सौं कहै कछु बात ।
धनि-धनि कै मानत सखी, तेहि छिन की बलिजात ।।103।।
रह्यौ झलकि वृंदा-विपिन, कुँवरि रूप के तेज ।
रहे कुँवर छकि कै तहाँ, धरि न सकत पग सेज ।।104।।
लीने कर गहि लाड़िली, लै बैठी बर अंक ।
बदन-बदन यौं जुरि रहे, मनु मिले कंज मयंक ।।105।।
परम रसिक आसक्त दोऊ, भूली तिनहिं निहारि ।
अंग-अंग मिली उरझि रहे, सकत नाहिं निरवारि ।।106।।
प्रेम मदन कौ सुख जहाँ, सहज प्रेम सिंगार ।
आदि मध्य अवसानि इक, इक रस बिमल बिहार ।।107।।
वृंदावन सरवर भरयौ, प्रेम नीर गंभीर ।
तामें मज्जत रसिक दोऊ, बिसरे नैननिं चीर ।।108।।
सहज सघन छबि हरन मन, श्री वृंदावन बाग ।
रह्यौ झूमि फलिकैं तहाँ, रसमय फल अनुराग ।।109।।
प्रिया बदन तहाँ झलमलै, सहज रूप कौ चंद ।
बिमल प्रकास अखंड भरयौ, सुधा प्रेम मकरंद ।।110।।
श्रवत सोई मकरंद दिन, प्रीतम नैन चकोर ।
प्रेम अमी रस माधुरी, पान करत निसि भोर ।।111।।
सघन निकुंजनि खोर प्रति, सुख कौ सहज निवास ।
रही झूमि जहाँ फूलि कै, लता सुरंग सुवास ।।112।।
परति दृष्टि जेहि सुमन पर, पिय प्रवीन यह जानि ।
धाइ कुँवर सोई फूल लै, देत कुँवरि कौं आनि ।।113।।
बिहरत दोऊ अनुराग में, नवलासी लियैं पानि ।
न्यारे तन देखत सखी, छुटति न मन लपटानि ।।114।।
घटत न मन की चाह ध्रुव, हारत नहिं दृग चाहि ।
तृषित तऊ पिय लाड़िलौ, कौन प्रेम रस आहि ।।115।।
प्रेम फूल प्यारी प्रिया, सुरँग सरूप सुवास ।
इक जीवन आसक्त पुनि, मधुप लाल रहैं पास ।।116।।
अति सुकुँवारी लाड़िली, धरत चरन तेहिं ठौर ।
नैंन कमल के दल तहाँ, रचत रसिक सिर मौर ।।117।।
प्रेम अंबु सर विपिन वर, अति अगाधि मित नाहिं ।
कमल कमलिनी रसिक दोऊ, रहे फूलि तिहिं माहिं ।।118।।
भ्रमत सखी भँवरी तहाँ, पीवत रूप पराग ।
पलु-पलु प्रति बाढ़त रहै, मादिक नव अनुराग ।।119।।
प्रेम खेत वृंदाविपिन, सुभट नागरी स्याम ।
हाव भाव आयुध लियैं, करत सुरत-संग्राम ।।120।।
कुंडलिया
पिय नैंननिं को मोद सखी, प्रिया नैंन को मोद ।
रहत मत्त विलसत दोऊ, सहजहि प्रेम विनोद ।।
सहजहि प्रेम-विनोद, रूप देखत दोऊ प्यारे ।
लोइनि मानत जीति, दुहुँनि जद्यपि मन हारे ।।
परे नवल नव केलि, सरस हुलसत हिय सैंननि ।
छिन-छिन प्रति रुचि होइ अधिक सुंदर पिय-नैंननि ।।121।।
दोहा
नित्य नवल वृंदा-विपिन, नित्य नवल धर-हेम ।
नित्य नवल दोऊ लाड़िले, नित्य नवल तहँ प्रेम ।।122।।
वृंदा विपनि बिसात पर प्रेम कौ खेल अपार ।
निवरत नहिं छिन छिन बढ़ै तैसेहिं खेलनहार ।।123।।
बिनु रसिकनि वृंदाविपिन, को है सकत निहारि ।
ब्रह्म-कोटि ऐश्वर्ज के, वैभव की तहँ वारि ।।124।।
पीवत मुख छबि-माधुरी, व्याकुल रहैं तन-नैंन ।
रौंम-रौंम बाढ़ी तृषा, जहाँ प्रेम कौ मैंन ।।125।।
श्री राधावल्लभ प्रेम की, प्रेमावलि गुहि लीन ।
हित ध्रुव' जेतिक बुद्धि ही, तासौं रचि-पचि कीन ।।126।।
घटि-बढ़ि अक्षर हौंइ जौ, तहाँ दृष्टि जिनि देहु ।
श्री राधावल्लभ लाल जस, यहै जानि उर लेहु ।।127।।
प्रेम सार 'ध्रुव' कछु कह्यौ, अपनी मति अनुमान ।
अति अगाध सुख सिंधु रस, ताकौ नाहिं प्रमान ।।128।।
मन वच जो उर धारि है, प्रेमावलि कौं नित्य ।
प्रेम छटा 'ध्रुव' सहज ही, उपजैगी तिहिं चित्त ।।129।।
हित ध्रुव' भई "प्रेमावली", सुनत जुगल दरसाहिं ।
सोलह सै इकहत्तरा, श्री वृंदावन माहिं ।।130।।
श्री प्रेमवाली लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
दोहा
प्रगट प्रेम कौ रूप धरि, श्री हरिवंश उदार ।
श्री राधावल्लभ लाल कौ प्रगट कियौ रस सार ।।1।।
हरिवंश चंद सब रसिकजन, राखे रस में बोरि ।
प्रेम-सिंधु विस्तारि कैं, नेम-मेंड़ दई तोरि ।।2।।
रूप-बेलि प्यारी बनी, प्रीतम प्रेम-तमाल ।
द्वै मन मिलि एकै भये, श्री राधावल्लभलाल ।।3।।
लपटि रहे दोऊ लाड़िले, अलबेली लपटानि ।
रूप-बेलि बिबि अरुझि परी, प्रेम सेज पर आनि ।।4।।
प्रेम रीति निज आहि जो, तामें लाल प्रवीन ।
अंग-अंग सब हारि कैं, रहे आप ह्वै दीन ।।5।।
अलबेली नागरि जहाँ, धरत चरन छबि पुँज ।
पलकनि की करि सोहनी, देत कुँवर तेहि कुंज ।।6।।
धरति भाँवती पग जहाँ, रहत देखि तिहिं ठौर ।
को समुझै यह सुख सखी, बिना रसिक सिरमौर ।।7।।
भरि आए दोऊ नैंन जहँ, रहे नेह बस झूमि ।
तिहि-तिहि ठाँ काहे न भई, इन प्राननि की भूमि ।।8।।
देखि प्रेम पिय कौ सखी, नैंन भरे जल आइ ।
समुझि दसा पिय की तबहिं, पुतरिनु लियौ समाइ ।।9।।
लिये दीनता एक रस, महा प्रेम रंग-रात ।
ऐसी प्यारी पीय कौं, देखत हूँ न अघात ।।10।।
जावक रंग भीने चरन, गौर बरन छबि सींब ।
निरखत पिय अनुराग सौं, ढ़री जात अधि ग्रींव ।।11।।
अंग-अंग सब लाल के, झुकत प्रिया की ओर ।
सहज प्रेम कौ ढार पर्यौ, बँधे नेह की डोर ।।12।।
जिनके है यह प्रेम रस, सोई जानत रीति ।
जो हारै तौ पाइयै, नेह खेत में जीति ।।13।।
मन के पाछैं मन फिरै, नैननिं पाछैं नैंन ।
इहै एक सुख लाल के, रह्यौ पूरि उर ऐंन ।।14।।
नैननिं छवात फिरत पिय, पत्र फूल बन जेत ।
प्रान प्रिया दृग छटा जल, सींचे सखि यह हेत ।।15।।
नैननिं बाढ़ी तृषा अति, ज्यौं-ज्यौं देखत रूप ।
पानिहि लागै प्यास ज़्यौं, कहा करै ढिग कूप ।।16।।
विटप डारि अवलंब पिय, ठाढ़े चितहि नहिं चैन ।
झलमलात भरे प्रेम रस, झलकत सुदंर नैन ।।17।।
और सबै सुख देह के, पिय मन तें गये भूलि ।
अवलोकत मुख माधुरी, रहे प्रेम रस झूलि ।।18।।
हेरि-हेरि हियौ गहवरयौ, भरि भरि आवत नैंन ।
कौन अटपटी मन परी, ध्रुव पै कहत बनैं न ।।19।।
चितवनि सौं चित रँगि रह्यौ, मुसिकनि रस बस मैंन ।
अंग-अंग दीप अनंग मनौं, परत पतंग जु नैंन ।।20।।
अद्भुत अंगनि की झलकि, उठत तरंग सुभाइ ।
समुझि दसा पिय की प्रिया, रहत छिपाइ-छिपाइ ।।21।।
प्रीतम प्यासे रूप के, सो रस कह्यौ न जाइ ।
नैंन रूप ह्वै जाइ जौ, प्यास न तऊ सिराइ ।।22।।
अद्भुत रूप विलास सुख, चितवत भूले अंग ।
सहज सिंधु सुख में परे, नख-सिख प्रेम अभंग ।।23।।
नयौ नेह नेही नये, नयौ रूप सुखरासि ।
नयौ चाह विलसैं सहज, परे प्रेम की पासि ।।24।।
सहज प्रेम के सिंधु में, दोऊ करत कलोल ।
भरि-भरि रस हुलसत हियौ, सुख की उठति अलोल ।।25।।
रचि-रचि बीरी देत पिय, महा प्रेम की रासि ।
सर्वसु है जिनके इहै, चितवनि कै मृदु हासि ।।26।।
पिकदानी लीन्हें कुँवर, चितवत मुख की ओर ।
रहे उगार की आस धरि, ज्यौं प्रति चंद चकोर ।।27।।
मनवच काइक एक रस, धरै महा व्रत प्रेम ।
प्रान प्रियहिं सेवत कुँवर, याही सुख कौ नेम ।।28।।
प्यारी सर्वस लाल कैं, लाल प्रिया कैं प्रान ।
सहज प्रेम दुहुँ में बन्यौ, फीके भये रस आन ।।29।।
मंद-मंद मुसिकात जब, बेसर तरल तरंग ।
चितै चित्रवत रहे पिय, सिथिल भये सब अंग ।।30।।
मुकुर पानि लियैं लाड़िली, बैठी सहज सुभाइ ।
अनियारी अँखियन दियौ, अंजन रुचिर बनाइ ।।31।।
सोचि रही तेहिं छिन कछू, इत उत चितवत नाहिं ।
प्रीतम मन की मृदुलता, गड़ी आइ मन माहिं ।।32।।
प्रेम रूप कौ सुख सहज, सो ध्रुव कहत बनैं न ।
कै जानै मन तिहिं बिंध्यौ, कै समुझैं दोऊ नैंन ।।33।।
नित्य सहज दुलहु कुँवर, दुलहिनि अति सुकुँवारि ।
नयौ चाव नित ही रहै, अद्भुत रूप निहारि ।।34।।
नव किशोर उन्नत सदा, आनंद की निधि शोभ ।
नई अटक की चौंप ध्रुव, परे प्रेम के लोभ ।।35।।
और भोग नहिं प्रेम सम, सबकौ प्रेम सिंगार ।
तेहिं अवलंबे रसिक दोऊ, सकल रसन कौ सार ।।36।।
प्रेम मदन मद किये रद, और सकल सुख जेत ।
कुँवारि सुभाइनि रंग रंग्यौ, छिन-छिन होत अचेत ।।37।।
लाल नैंन भये लाल के, रँगे रंगीली लाग ।
अंतर भरि निकस्यौ चहत, इहिं मग मनु अनुराग ।।38।।
लै सुरंग जावक सुकर, चरननिं चित्र बनाइ ।
मृदु अँगुरिनि की छबि निरखि, पुतरिनु सौं रहे लाइ ।।39।।
दसन खंडि अति रीझि कै, पिय मुख बीरी दीन ।
सीवाँ दोऊ अनुराग की, भये एक रस लीन ।।40।।
पट भूषन जेहि कुँवरि के, प्रीतम के ते प्रान ।
अति अनन्य रस प्रेम में, परसत नहिं कछु आन ।।41।।
ते पट भूषन पहरि पिय, सहचरि कौ वपु बानि ।
फिरत लियैं अनुराग सौं, कुसुम-बीजना पाँनि ।।42।।
प्रेम कुँवर कौ समुझि कै, प्रेम वारि भरि नैंन ।
रही लपटि पिय के हियैं, सो सुख कहत बनै न ।।43।।
अमित कोटि जुग कलप लौं, राखे उरजन माहिं ।
ते सब लव त्रिसरैनु सम, बीतत जानें नाहि ।।44।।
प्रिया प्रेम आसव महा, मादिक रहैं दिन रैंन ।
कैसैं छूटै बिबसता, भरि-भरि पीवत नैंन ।।45।।
महा मोहनी मन हर्यौ, तन डोलत तिन संग ।
बोलत नहिं चितवत मनहि, बस्यौ जाइ किहिं अंग ।।46।।
बिनु देखे देखत न कछु, छबि छायौ उर ऐंन ।
कुँवरि राधिका लाड़िली, पिय नैननिं के नैंन ।।47।।
जहँ लगि सुख कहियत सकल, सुनि ध्रुव कहत विचारि ।
सहज प्रेम के निमिष पर, ते सब डारे वारि ।।48।।
यह सुख समुझन कौं कछू, नाहिंन आन उपाइ ।
प्रेम दरीची जौ कबहुँ, सहज कृपा खुलि जाइ ।।49।।
एकै प्रेमी एक रस, श्री राधावल्लभ आहि ।
भूलि कहै कोऊ और ठाँ, झूठौ जानौं ताहि ।।50।।
तीन लोक चौदह भुवन, प्रेम कहूँ 'ध्रुव' नाहिं ।
जगमगि रह्यौ जराव सौं, श्री वृंदाबन माहिं ।।51।।
प्रेमी बिछुरत नाहिं कहुँ, मिल्यौ न सो पुनि आहि ।
कौन एक रस प्रेम कौ, कहि न सकत ध्रुव ताहि ।।52।।
ढूँढ़ि फिरै त्रैलोक जो, बसत कहूँ ध्रुव नाहिं।
प्रेम रूप दोऊ एक रस, बसत निकुंजनि माहिं ।।53।।
नित्य भूमि मडंल सहज, श्री वृंदावन ऐंन ।
रतन जटित जगमगि रह्यौ, रसिकनि मन सुख दैंन ।।54।।
तरनि-सुता चहुँ दिसि बहै, सोभा लियैं अथाह ।
मनौं ढर्यौ सिंगार रस, कुंडल बाँधि प्रवाह ।।55।।
आवत उपमा और उर, अद्भुत परम रसाल ।
वृंदावन पहिरी मनौं, नील मनिनु की माल ।।56।।
हेम बरन अद्भुत धरनि, मनिनु खचित बहुरंग ।
बिच-बिच हीरनि की झलक, मानौं उठति तरंग ।।57।।
मृगी मयूरी हंसिनी, भरी प्रेम आनंद ।
मत्त मुदित पीवत रहैं, जुगल कमल मकरंद ।।58।।
कुंज-कुंज प्रति झलमलै, आसन सेज सुदेस ।
सहज सौंज छिन छिन नई, कहि न सकत छबि लेस ।।59।।
आनंद बन बरसत कुँवरि, कुँजनि में जहाँ नित्य ।
सुरँग लता द्रुम फूल फल, झूमि रहे जित कित्य ।।60।।
नेकु होत ठाढ़ी कुँवरि, जेहि फुलवारी माहिं ।
पत्र फूल तहँ के सबै, पीत बरन ह्वै जाहिं ।।61।।
प्रेम रूप के मोद की, सोभा बढ़ी विशाल ।
सोई लड़ैती लाल जी, कीनी ह्वै उर माल ।।62।।
रोम-रोम प्रति लाड़िली, सहज रूप की खाानि ।
प्रीतम की जीवन यहै, सरस मंद मुसिकाँनि ।।63।।
अति सलज्ज अनुराग भरे, अनियारे छबि ऐंन ।
अरुन विशद सित सोहने, काजर भींने नैंन ।।64।।
श्रवनाइत बाँके चपल, घूँघट पट न समात ।
अवलोकत जेहि ओर को, छबि बरषा ह्वै जात ।।65।।
हाव भाव लावन्यता, कही सकल जे कोक ।
निसि दिन कर जोरे तहाँ, सेवतिं नैंननि नौंक ।।66।।
अति सुदेस रह्यौं झलकि कै, बेंदा सुरंग रसाल ।
मनौं सुहाग अनुराग कौ, प्रगट बिराजत भाल ।।67।।
नख सिख पट भूषन बने, कहि न सकत कछु रूप ।
सीस फूल सिंगार कौ, मानौं छत्र अनूप ।।68।।
झलक कपोलनि कहा कहौं, मुख पानिप बहु भाँति ।
अखियाँ रपटत चितै तहँ, डीठि नाहिं ठहरात ।।69।।
नासा बेसरि फबि रही, सोभा की मित नाहिं ।
मनौं मीन तहाँ थरहरै, पर्यौ रूप जल माहिं ।।70।।
बन्यौ कपोल पर असित तिल, अलक रही तहँ आइ ।
प्रगट लाल कौ मन मनौं, परयौ फंद बिच जाइ ।।71।।
नैंन अधर कुच कर चरन, झलकत नये तरंग ।
कनक बेलि मनौं फूलि रही, नख सिख कमल सुरंग ।।72।।
प्रिया बदन वर कंज पर, भ्रमर भृंग पिय नैन ।
छबि पराग रस माधुरी, पीवत हू नहिं चैन ।।73।।
ठौर-ठौर पिय रचत हैं, आसन कुसुम रसाल ।
को जानैं कहाँ बैठि हैं, अलबेली नव बाल ।।74।।
समुझि हेत पिय कौ जबहिं, बैठी तहँ मुसिकाइ ।
पिय ग्रीवाँ भुज मेलि कै, अंग-अंग रहे लपटाइ ।।75।।
रची सेज मृदु दलनि लै, अरुन पीत अरु सेत ।
ता पर राजै लाड़िली, इतनौ मन कौ हेत ।।76।।
रंग रंग के सुमन पिय, लै रचि माल बनाइ ।
तन मन कौ सुख को कहै, जब देखत पहिराइ ।।77।।
रूप माधुरी की झलक, निरखि रीझि सुख पाइ ।
चहुँ दिसि फिरि आपुन कुँवरि, पगनि सीस रहे लाइ ।।78।।
रूप सिंधु में मन पर्यौ, ढरत नैंन दुहुँ नीर ।
डगमगात सखियनि गहे, देखे लाल अधीर ।।79।।
लिये अंक भरि लाड़िली, बिबस लाल कौं जानि ।
कही परत सखि कौन पै, बिबि मन की अरुझानि ।।80।।
प्रेम-प्रेम मन-मन समुझि, नैन सजल झलकाति ।
मुख निसरत नहिं बैंन कछु, बिबस दोऊ ह्वै जाति ।।81।।
पिय प्यारी दोऊ रँग भरे, ढरे सेज पर आनि ।
बिबस सखी चितवतिं खरी, महा प्रेम लपटानि ।।82।।
परे प्रेम सुख रंग में, दोऊ नवल किशोर ।
इतनी नहिं जानति सखी, निसा होत कब भोर ।।83।।
पीक कहूँ अंजन कहूँ, मुक्तावलि रही टूटि ।
सिथिल बसन भूषन कहूँ, अलकावलि रही छूटि ।।84।।
श्रम जलकन छबि बदन पर, चितवत प्रीतम ताहि ।
पानिप कौ पानी मनौं, प्रकट देखियत आहि ।।85।।
अंजन तिल रह्यौ अधर पर, नैननिं पर लगी पीक ।
इत हद करी सिंगार की, उत दई प्रेम की लीक ।।86।।
एक प्रेम विवि मन हरे, अरुझी मृदु भुज-ग्रींव ।
उभै सिंधु मिलि उमड़ि चले, रहत तहाँ क्यौं सींव ।।87।।
पीवत मुख छबि माधुरी, व्याकुल रहैं दोउ नैंन ।
रौंम-रौंम बाढ़ी त्रिषा, जहाँ प्रेम कौ मैंन ।।88।।
रस-रंगी रस-रंग में, भींजे सहज सनेह ।
परत प्रेम आनंद में, दोउनि भूलि गई देह ।।89।।
भये अचेत पुनि चेति कै, उठे कुँवर सुकुँवार ।
नैंना प्यासे रूप के, पिवत डीठि भई धार ।।90।।
कहि न सकत तिन की दसा, छिन-छिन नौतन नेह ।
एक प्रान ह्वै रहे तहँ, देखन कौं, द्वै देहु ।।91।।
एक स्वाद 'ध्रुव' एक रस, प्रेम अखंडित धार ।
इकछत प्रेम दसा रहै, सकल सुखनि कौ सार ।।92।।
प्रेम-तरंगनि में परे, छिन छिन प्रति यह केलि ।
महामत्त घूमत फिरैं, दोऊ कंठ-भुज मेलि ।।93।।
बिलसत नित्य-विहार दोऊ, प्रेम खेलि तिहि ठौर ।
और कछु परसत नहीं, महा रसिक सिरमौर ।।94।।
प्रेम पगी तैसी सखी, रँगी दुहुँनि के हेत ।
सहज माधुरी रूप की, नैननिं भरि भरि लेत ।।95।।
अद्भुत प्रेम सखीनि कौ, बिमल अखंडित धार ।
रसिक कुँवर दोऊ लाड़िले, करि राखे उर-हार ।।96।।
सहज प्रेम की सींव दोऊ, नव किशोर वर जोर ।
प्रेम कौ प्रेम सखीन कैं, तेहि सुख कौ नहिं ओर ।।97।।
हारि-हारि जीतत दोऊ, जीति-जीति रहे हारि ।
महा प्रेम देखत सखी, जहँ तहँ रहीं बिचारि ।।98।।
नैंकु भौंह की मुरनि में, लाल दीन ह्वै जात ।
जल सूखे जलजात ज्यौं, बदन मृदुल कुँभिलात ।।99।।
भर्यौ हियौ अनुराग सौं, रहि न सकी अकुलाइ ।
लये लाइ पिय हीय सौं, अधर सुधा रस प्याइ ।।100।।
मान मनावन छुटि गयौ, पर्यौ लपटि तहाँ प्रेम ।
अतंर भरि बाहिर भरयौ, रहे लीन ह्वै नेम ।।101।।
सहज रूप कौ कंज मुख, तामें मुसिकनि मंद ।
जीवन पिय दृग सखिनु के, सोइ तहाँ मकरंद ।।102।।
अलबेली हँसि कैं जबहि, पिय सौं कहै कछु बात ।
धनि-धनि कै मानत सखी, तेहि छिन की बलिजात ।।103।।
रह्यौ झलकि वृंदा-विपिन, कुँवरि रूप के तेज ।
रहे कुँवर छकि कै तहाँ, धरि न सकत पग सेज ।।104।।
लीने कर गहि लाड़िली, लै बैठी बर अंक ।
बदन-बदन यौं जुरि रहे, मनु मिले कंज मयंक ।।105।।
परम रसिक आसक्त दोऊ, भूली तिनहिं निहारि ।
अंग-अंग मिली उरझि रहे, सकत नाहिं निरवारि ।।106।।
प्रेम मदन कौ सुख जहाँ, सहज प्रेम सिंगार ।
आदि मध्य अवसानि इक, इक रस बिमल बिहार ।।107।।
वृंदावन सरवर भरयौ, प्रेम नीर गंभीर ।
तामें मज्जत रसिक दोऊ, बिसरे नैननिं चीर ।।108।।
सहज सघन छबि हरन मन, श्री वृंदावन बाग ।
रह्यौ झूमि फलिकैं तहाँ, रसमय फल अनुराग ।।109।।
प्रिया बदन तहाँ झलमलै, सहज रूप कौ चंद ।
बिमल प्रकास अखंड भरयौ, सुधा प्रेम मकरंद ।।110।।
श्रवत सोई मकरंद दिन, प्रीतम नैन चकोर ।
प्रेम अमी रस माधुरी, पान करत निसि भोर ।।111।।
सघन निकुंजनि खोर प्रति, सुख कौ सहज निवास ।
रही झूमि जहाँ फूलि कै, लता सुरंग सुवास ।।112।।
परति दृष्टि जेहि सुमन पर, पिय प्रवीन यह जानि ।
धाइ कुँवर सोई फूल लै, देत कुँवरि कौं आनि ।।113।।
बिहरत दोऊ अनुराग में, नवलासी लियैं पानि ।
न्यारे तन देखत सखी, छुटति न मन लपटानि ।।114।।
घटत न मन की चाह ध्रुव, हारत नहिं दृग चाहि ।
तृषित तऊ पिय लाड़िलौ, कौन प्रेम रस आहि ।।115।।
प्रेम फूल प्यारी प्रिया, सुरँग सरूप सुवास ।
इक जीवन आसक्त पुनि, मधुप लाल रहैं पास ।।116।।
अति सुकुँवारी लाड़िली, धरत चरन तेहिं ठौर ।
नैंन कमल के दल तहाँ, रचत रसिक सिर मौर ।।117।।
प्रेम अंबु सर विपिन वर, अति अगाधि मित नाहिं ।
कमल कमलिनी रसिक दोऊ, रहे फूलि तिहिं माहिं ।।118।।
भ्रमत सखी भँवरी तहाँ, पीवत रूप पराग ।
पलु-पलु प्रति बाढ़त रहै, मादिक नव अनुराग ।।119।।
प्रेम खेत वृंदाविपिन, सुभट नागरी स्याम ।
हाव भाव आयुध लियैं, करत सुरत-संग्राम ।।120।।
कुंडलिया
पिय नैंननिं को मोद सखी, प्रिया नैंन को मोद ।
रहत मत्त विलसत दोऊ, सहजहि प्रेम विनोद ।।
सहजहि प्रेम-विनोद, रूप देखत दोऊ प्यारे ।
लोइनि मानत जीति, दुहुँनि जद्यपि मन हारे ।।
परे नवल नव केलि, सरस हुलसत हिय सैंननि ।
छिन-छिन प्रति रुचि होइ अधिक सुंदर पिय-नैंननि ।।121।।
दोहा
नित्य नवल वृंदा-विपिन, नित्य नवल धर-हेम ।
नित्य नवल दोऊ लाड़िले, नित्य नवल तहँ प्रेम ।।122।।
वृंदा विपनि बिसात पर प्रेम कौ खेल अपार ।
निवरत नहिं छिन छिन बढ़ै तैसेहिं खेलनहार ।।123।।
बिनु रसिकनि वृंदाविपिन, को है सकत निहारि ।
ब्रह्म-कोटि ऐश्वर्ज के, वैभव की तहँ वारि ।।124।।
पीवत मुख छबि-माधुरी, व्याकुल रहैं तन-नैंन ।
रौंम-रौंम बाढ़ी तृषा, जहाँ प्रेम कौ मैंन ।।125।।
श्री राधावल्लभ प्रेम की, प्रेमावलि गुहि लीन ।
हित ध्रुव' जेतिक बुद्धि ही, तासौं रचि-पचि कीन ।।126।।
घटि-बढ़ि अक्षर हौंइ जौ, तहाँ दृष्टि जिनि देहु ।
श्री राधावल्लभ लाल जस, यहै जानि उर लेहु ।।127।।
प्रेम सार 'ध्रुव' कछु कह्यौ, अपनी मति अनुमान ।
अति अगाध सुख सिंधु रस, ताकौ नाहिं प्रमान ।।128।।
मन वच जो उर धारि है, प्रेमावलि कौं नित्य ।
प्रेम छटा 'ध्रुव' सहज ही, उपजैगी तिहिं चित्त ।।129।।
हित ध्रुव' भई "प्रेमावली", सुनत जुगल दरसाहिं ।
सोलह सै इकहत्तरा, श्री वृंदावन माहिं ।।130।।
श्री प्रेमवाली लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
24. श्री प्रिया जी की नामावली लीला
श्री राधे । नित्य किशोरी । वृन्दावन विहारिनि । बनराज रानी । निकुंजेश्वरी ।
रूप रँगीली । छबीली । रसीली । रस नागरी । लाड़िली । प्यारी ।
सुकुँवारी । रसिकनी । मोहिनी । लाल-मुखजोहिनी । मोहन-मन-मोहिनी ।
रति-विलास-विनोदिनी । लाल-लाड़-लड़ावनी । रंग-केलि बढ़ावनी । सुरत-चंदन-चर्चिनी ।
कोटि-कोटि दामिनी-दमकनी । लाल पर लटकनी । नवल नासा-चटकनी ।
रहसि पुंजे । वृंदावन प्रकासिनि । रंग-विहार-विलासिनी । सखी-सुख-निवासिनी ।
सौंदर्य रासिनी । दुलहिनी । मृदु हाँसिनी । प्रीतम-नैन-निवासिनी । नित्यानन्द-दर्शिनी ।
उरजनि पिय-परसिनी । अधर-सुधारस बरसिनी । प्राणनिं रस-सरसिनी । रंग-विहारिनि ।
नेह-निहारनि । पिय-हित-सिंगार-सिंगारिनी । प्यार सौं प्यारे कौं लै उर धारिनि ।
मोहन-मैंन-विथा-निवारनि । जानि प्रवीन उदार सँभारनी । अनुराग सिंधे । स्यामा ।
भामा । बामा । भाँवती । जुवतिन-जूथ-तिलका । वृन्दावन-चंद्र-चंद्रिका । हास-परिहास-रसिका ।
नवरंगिनी । अलकावलि-छवि-फंदिनी । मोहनी मुसिकिनी मंदिनी । सहज आनन्द-कंदिनी ।
नेह-कुरंगिनी । नैंन विसाला । महामधुर रस-कंदिनी । चंचल चित-आकर्षिनी । मदन-मान-खंडिनी ।
प्रेम-रंग-रंगिनी । बंक- कटाक्षिनी । सकल विद्या-विचक्षनी । कुँवर अंक-विराजनी ।
प्यार-पट-निवाजिनी । सुरत-समर-दल-साजिनी । मृगनैंनी । पिकबैंनी । सलज्ज अंचला ।
सहज चंचला । कोक कलानि-कुशला । हाव-भाव चपला । चातुर्य चतुरा। माधुर्य मधुरा । बिनु भूषन भूषिता ।
अवधि सौन्दर्यता । प्राण-वल्लभा । रसिक रवनी । कामिनी । भामिनी । हंस कल-गामिनी ।
घनश्याम अभिरामिनी । चंद-विपनी । मदन-दवनी । रसिक-रवनी । केलि-कमनी । चित्तहरनी ।
ललन-उर पर चरनधरनी । छवि कंज-वदनी । रसिक आनंदिनी । रूप-मंजरी । सौभाग्य-रसभरी ।
सर्वांग सुन्दरी । गौरांगी । रतिरस रंगी। विचित्र कोक कला अंगी । छबि-चंद-वदनी । रसिक लाल बंदिनी ।
रसिक रस-रंगिनी । सखिनु सभामंडिनी । आनंद-कंदिनी ।
चतुर अरु भोरी । सकल सुख-रासि-सदने ।
प्रेम सिंधु के रतन ये, अद्भुत कुँवरि के नाम ।
जाकी रसना रटै 'ध्रुव', सो पावै विश्राम ।।1।।
ललित नाम नामावली, जाके उर झलकंत ।
ताके हिय में बसत रहैं, स्यामा-स्यामल कंत ।।2।।
जै जै श्री प्रिया जी की नामावली लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
श्री राधे । नित्य किशोरी । वृन्दावन विहारिनि । बनराज रानी । निकुंजेश्वरी ।
रूप रँगीली । छबीली । रसीली । रस नागरी । लाड़िली । प्यारी ।
सुकुँवारी । रसिकनी । मोहिनी । लाल-मुखजोहिनी । मोहन-मन-मोहिनी ।
रति-विलास-विनोदिनी । लाल-लाड़-लड़ावनी । रंग-केलि बढ़ावनी । सुरत-चंदन-चर्चिनी ।
कोटि-कोटि दामिनी-दमकनी । लाल पर लटकनी । नवल नासा-चटकनी ।
रहसि पुंजे । वृंदावन प्रकासिनि । रंग-विहार-विलासिनी । सखी-सुख-निवासिनी ।
सौंदर्य रासिनी । दुलहिनी । मृदु हाँसिनी । प्रीतम-नैन-निवासिनी । नित्यानन्द-दर्शिनी ।
उरजनि पिय-परसिनी । अधर-सुधारस बरसिनी । प्राणनिं रस-सरसिनी । रंग-विहारिनि ।
नेह-निहारनि । पिय-हित-सिंगार-सिंगारिनी । प्यार सौं प्यारे कौं लै उर धारिनि ।
मोहन-मैंन-विथा-निवारनि । जानि प्रवीन उदार सँभारनी । अनुराग सिंधे । स्यामा ।
भामा । बामा । भाँवती । जुवतिन-जूथ-तिलका । वृन्दावन-चंद्र-चंद्रिका । हास-परिहास-रसिका ।
नवरंगिनी । अलकावलि-छवि-फंदिनी । मोहनी मुसिकिनी मंदिनी । सहज आनन्द-कंदिनी ।
नेह-कुरंगिनी । नैंन विसाला । महामधुर रस-कंदिनी । चंचल चित-आकर्षिनी । मदन-मान-खंडिनी ।
प्रेम-रंग-रंगिनी । बंक- कटाक्षिनी । सकल विद्या-विचक्षनी । कुँवर अंक-विराजनी ।
प्यार-पट-निवाजिनी । सुरत-समर-दल-साजिनी । मृगनैंनी । पिकबैंनी । सलज्ज अंचला ।
सहज चंचला । कोक कलानि-कुशला । हाव-भाव चपला । चातुर्य चतुरा। माधुर्य मधुरा । बिनु भूषन भूषिता ।
अवधि सौन्दर्यता । प्राण-वल्लभा । रसिक रवनी । कामिनी । भामिनी । हंस कल-गामिनी ।
घनश्याम अभिरामिनी । चंद-विपनी । मदन-दवनी । रसिक-रवनी । केलि-कमनी । चित्तहरनी ।
ललन-उर पर चरनधरनी । छवि कंज-वदनी । रसिक आनंदिनी । रूप-मंजरी । सौभाग्य-रसभरी ।
सर्वांग सुन्दरी । गौरांगी । रतिरस रंगी। विचित्र कोक कला अंगी । छबि-चंद-वदनी । रसिक लाल बंदिनी ।
रसिक रस-रंगिनी । सखिनु सभामंडिनी । आनंद-कंदिनी ।
चतुर अरु भोरी । सकल सुख-रासि-सदने ।
प्रेम सिंधु के रतन ये, अद्भुत कुँवरि के नाम ।
जाकी रसना रटै 'ध्रुव', सो पावै विश्राम ।।1।।
ललित नाम नामावली, जाके उर झलकंत ।
ताके हिय में बसत रहैं, स्यामा-स्यामल कंत ।।2।।
जै जै श्री प्रिया जी की नामावली लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
25. रहस्य मंजरी लीला
दोहा
करुनानिधि अरु कृपानिधि, श्री हरिवंश उदार ।
वृंदावन-रस कहन कौं, प्रकट धरयौ अवतार ।।1।।
चौपाई
वृंदावन-रस सबकौ सारा ।
नित सर्वोपर जुगल-बिहारा ।।2।।
नित्य किसोर रूप की रासि ।
नित्य विनोद मंद मृदु हासि ।।3।।
नित ललितादिक भरी अनंद ।
नित प्रकास वृंदावन चंद ।।4।।
कुंजनि सोभा कहा बखानौं ।
छबि फूलनि सौं छाई मानौं ।।5।।
राजत सुमन द्रुमन बहुरंगा ।
मानौं पहिरैं बसन सुरंगा ।।6।।
नाचत हंस मयूरी मोर ।
शुक सारिक पिक नाद चहुँ ओर ।।7।।
झलमलात छबि कही न जाई ।
चिंतामनि मय हेम जराई ।।8।।
सोभा दुतिय बढ़ी अधिकाई ।
फूलनि की जनौं अवनी बनाई ।।9।।
छबि सौं जमुना बहै सुहाई ।
मानौं आनँद द्रय चल्यौ माई ।।10।।
जहाँ-तहाँ पुलिन नलिन कल कूला ।
फूले सबके मनोरथ फूला ।।11।।
फूले फिरत मधुप मदमाते ।
जलजनिं सौरभ के रस राते ।।12।।
सीतल मंद समीर सुवासा ।
वृंदा कानन रंग हुलासा ।।13।।
सुख की अवधि प्रेम कौ ऐंना ।
सेवत मैंननि की सत सैंना ।।14।।
दोहा
वृंदावन छबि कहा कहौं, कैसेहुँ कहत बनैं न ।
नैननिं के रसना नहीं, रसना के नहिं नैंन ।।15।।
चौपाई
विहरत तहाँ परम सुकुँवारा ।
रूप-माधुरी कौ नहिं पारा ।।16।।
प्रेम मगन अलबेली भाँति ।
जगिमगि रह्यौ बन अंगनि कांति ।।17।।
सखी सबै हित की हितकारनि ।
जीवनि जिनकै रंग-बिहारनि ।।18।।
तिनहीं के रँग सौं अनुरागी ।
महा मधुर सेवा रस पागी ।।19।।
रुचि लै रुचि सौं दुहुँनि लड़ावैं ।
पलु-पलु सुख कौ रंग बढ़ावैं ।।20।।
फूल सौं भाजन भरि मधु आनैं ।
फूल चंदोवा छबि सौं तानैं ।।21।।
फूल सौं फूलनि सेज बनाई ।
अति सुगंध सौंधे छिरकाई ।।22।।
तापर राजत रँग विवि ओर ।
मुख जोवत ज्यौं चंद-चकोर ।।23।।
नैंक चितै तिरछै मुसिकानी ।
लालहि सुधि-बुधि सबै भुलानी ।।24।।
दोहा
बसी जु प्यारे लाल उर, वह चितवनि मुसिकानि ।
तबतें कबहूँ छुटी नहिं, चुभी जु उर में आनि ।।25।।
चौपाई
तिनकौ प्रेम और ही भाँति ।
अद्भुत रीति कही नहिं जाति ।।26।।
जौ करुना करि बे उर आनैं ।
तब रसना कै कछुक बखानैं ।।27।।
जाकौ हियौ सरस अति होई ।
यह रस रीतिहि समुझै सोई ।।28।।
सूक्षम प्रेम विरह सुखदाई ।
दिन संयोग में रहत हैं माई ।।29।।
देखत ही अनदेखी मानैं ।
तिनकी प्रीतिहि कहा बखानैं ।।30।।
प्रेम लालची लाल रँगीलौ ।
अवधि प्यार की रसिक रसीलौ ।।31।।
कर अँगुरिनु भुजमूलनि परसै ।
अधर-पान रस कौं जिय तरसै ।।32।।
छवै न सकत उरजनि कर काँपै ।
चतुर कुँवरि अंचल सौं ढाँपै ।।33।।
सो वह छटा प्रेम की न्यारी ।
लालहि विवस करति अति भारी ।।34।।
तबहि सँभारि लेति सुकुँवारी ।
अधर कपोलनि चूँवति प्यारी ।।35।।
जब देखी अखियाँनि उघारी ।
प्याइ जिवाये अधर-सुधारी ।।36।।
जबही उर सौं घुरि लपटाँही ।
तब नैंना विरही ह्वै जाँही ।।37।।
छुटैं जबहि छबि देख्यौ करें।
विरह आनि अंगनि संचरै ।।38।।
भाँति अटपटी सौं चित हर्यौ ।
जात नहीं उर धीरज धरयौ ।।39।।
छिन छिन दसा और की औरै ।
थांभै रहत सखी सिरमौरै ।।40।।
दोहा
प्रेम-अटपटी चटपटी, रही लाल उर पूरि ।
और जतन ताकौ न कछु, प्रिया सँजीवनि-मूरि ।।41।।
चौपाई
बिरह-संयोग छिनहि छिन माँही ।
जद्दपि ग्रीवनिं मेले वाँही ।।42।।
इहि विधि खेलत कलप विहाने ।
परम रसिक कबहूँ न अघाने ।।43।।
एक समै मुख की छबि पानिप ।
निरखत भूली सबै सयानिप ।।44।।
चाह प्यार की यौं फिर गई ।
सोइ आनि बिच अंतर भई ।।45।।
कुँवरि छबीली मनधरि आगै ।
विवस होइ पिय विलपन लागै ।।46।।
चितवत-चितवत लाल बिहारी ।
कहत यहै कहाँ-कहाँ सुकुँवारी ।।47।।
प्रेम-तरंग कहे नहिं जाँही ।
छिन छिन जे उपजत मन माँही ।।48।।
दोहा
कौन प्रेम के फँद परे, मोहन नवल किशोर ।
भूलि रही चितवत खरी, सखी-माल चहूँ ओर ।।49।।
चौपाई
रसनिधि रसिक प्रवीन पियारी ।
लालहि राखत ज्यौं फुलवारी ।।50।।
प्रेम प्यार जल सींच्यौ करही ।
पल-पल प्रति तिनके सँग ढरही ।।51।।
दोहा
फूल पान ज्यौं राखही, ढाँपि प्यार के चीर ।
छिन-छिन तिनकौं छिरकही, नेह-कटाच्छनि नीर ।।52।।
चौपाई
रसिक-मौलि मनि लाल बिहारी ।
जिनकैं सर्बसु प्रॉन-पियारी ।।53।।
नैंन जोरि देखति पिय रूपहि ।
मैंन माधुरी झलक अनूपहि ।।54।।
कौंन भाँति मुख की छबि कहिये ।
चितवत सखी भूलही रहियै ।।55।।
भौंहनि भाइ कटाक्ष तरंगा ।
गह्यौ लाल-मन प्रेम अनंगा ।।56।।
स्वेद कंप वेपथ अंग-अंगा ।
प्रान प्रिया भरि लेति उछंगा ।।57।।
परसत हूँ परस्यौ नहि जानै ।
छिन छिन नई-नई रुचि मानै ।।58।।
सो गति चितै सखी मुसिकाँहीं ।
वारि फेरि अंचल बलि जाहीं ।।59।।
प्रेम प्यार वन तन मन सरस्यौ ।
और स्वाद कबहूँ नहि परस्यौ ।।60।।
रूप रंग सौरभता तनकी ।
जीवन यहै दिनहि पिय मन की ।।61।।
देखिवौ जहाँ बिरह सम होई ।
तहाँ कौ प्रेम कहा कहै कोई ।।62।।
दोहा
अटपटी भाँति कौ बिरह सुनि, भूलि रह्यौ सब कोइ ।
जल पीवत हे प्यास कौं, प्यास भयौ जल सोइ ।।63।।
चौपाई
महाभाग सुखसार सरूपा ।
कोमल सील सुभाव अनूपा ।।64।।
सखी हेत उदवर्तन लावैं।
आनँद रस सौं सबै न्हवावैं ।।65।।
सारी लाज की अतिही बनी ।
अँगिया प्रीति हियैं कसि तनी ।।66।।
हाव-भाव भूषन तन बने ।
सौरभ गुनगन जात न गने ।।67।।
रसपति रसकौ रचि-पचि कीनौ ।
सो अंजन लै नैंनन दीनौ ।।68।।
मैंहदी रँग अनुराग सुरंगा ।
कर अरु चरन रचे तेहि रंगा ।।69।।
बंक चितवनी रस सौं भीनीं ।
मनौं करुना की बरसा कीनी ।।70।।
झलमल रही सुहाग की जोती ।
नासा फबि रह्यौ पानिप मोती ।।71।।
नेह फुलेल बार वर भीनें ।
फूल के फूलनि सौं गुहि लीनें ।।72।।
मौरी रँग अनुराग की डोरी ।
तिय कर बाँध्यौ पिय मन गोरी ।।73।।
दोहा
हास झलक हिरावली, अधर-बिंब अनुराग ।
त्रिवली सीवाँ रूप की, नवसत-पोति सुहाग ।।74।।
चौपाई
ऐसी प्यारी पिय उर बसै ।
ज्यौं घन में दिन दामिनि लसै ।।75।।
अद्भुत वृंदावन रजधानी ।
अद्भुत दुलहिनि राधा रानी ।।76।।
अद्भुत दूलहु नित्य किशोर ।
अद्भुत रस के चंद-चकोर ।।77।।
अद्भुत जहाँ प्रेम कौ रंग ।
अद्भुत बन्यौ दुहुनि कौ संग ।।78।।
अद्भुत रूप सहज सुकुँवारी ।
वृंदावन की मनि उजियारी ।।79।।
तिनकौं सेवत लाल बिहारी ।
तन मन बचन रहे तहाँ हारी ।।80।।
अद्भुत प्रेम एक व्रत लीनौं ।
छाँड़ि प्रिया मन अनत न दीनौं ।।81।।
छिन छिन औरै-और सिंगार ।
गुहि फूलनि पहिरावत हार ।।82।।
ठाढ़े होइ रहत कर जोरैं ।
लै बलाइ बारत तृन तोरैं ।।83।।
दोहा
चितवति जितही लाड़िली, तित ही मोहन लाल ।
सो ठाँ प्यारी ह्वै गई, देखौ प्रीति की चाल ।।84।।
चौपाई
तब मुसिकाइ लियै उर लाई ।
रीझि प्रेम माला पहिराई ।।85।।
अद्भुत प्रेम विलास अनंगा ।
अद्भुत रुचि के उठत तरंगा ।।86।।
अद्भुत प्रेम कह्यौ नहिं जाती ।
रसिक रँगीली तेहि रँग राती ।।87।।
ललित विशाखा सखी पियारी ।
दंपति सुख मन समुझनि हारी ।।88।।
सब सखियनि कौं दोऊ प्यारे ।
जीवन प्रान चखनि के तारे ।।89।।
दोहा
भुज सौं भुज उर सौं उरज, अधर अधर जुरे नैंन ।
ऐसी विधि जौ रहैं तौ, कछुक होइ चित चैंन ।।90।।
चौपाई
या सुख पर नाहिंन सुख औरै ।
जेहि उर रचे रसिक सिरमौरै ।।91।।
या रस सौं 'ध्रुव' जो मन लावै ।
ताकौ भाग कहत नहिं आवै ।।92।।
ऐसै अद्भुत भक्त अनूपा ।
जिनके हिये रहत यह रूपा ।।93।।
श्री हरिवंश चरन उर धारै ।
सो या रस में ह्वै अनुसारै ।।94।।
श्री हरिवंशहि हित सौं गावै।
जुगल-बिहार प्रेम रस पावै ।।95।।
जापर श्री हरिवंश कृपाला ।
ताकी बाँह गहैं दोऊ लाला ।।96।।
श्री हरिवंश हियै जो आनै ।
ताहि कुँवरि अपनौ करि मानै ।।97।।
यह रस गायौ श्री हरिवंश ।
मुक्ता कौन चुनै बिनु हंस ।।98।।
रसद 'रहस्य मंजरी' भई ।
छिन-छिन जोत होति है नई ।।99।।
दुहुँनि मध्य सखियनि लै बई ।
आनँद बेलि बढ़ी रस मई ।।100।।
श्री हरिवंश प्रकट करि दई ।
जाकौ भाग तिनहि 'ध्रुव' लई ।।101।।
दोहा
नित्यहि नित्य-बिहार दोऊ, करत लाड़िली-लाल ।
वृंदावन आनंद जल, बरसत हैं सब काल ।।102।।
रूप-रँगीली सभा सो, प्रेम- रँगीलौ राज ।
सखी सहेली संग रँग, अद्भुत सहज समाज ।।103।।
यह सुख देखत कंठ दृग, रुकै न आनँद-वारि ।
और अंग हारे सबै, नैंन न मानत हारि ।।104।।
सत्रह सै द्वै ऊन अरु, अगहन पछि उजियार ।
दोहा चौपाइ कहे 'ध्रुव', इकसत ऊपर चार ।।105।।
जै जै श्री रहस्यमंजरी लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
दोहा
करुनानिधि अरु कृपानिधि, श्री हरिवंश उदार ।
वृंदावन-रस कहन कौं, प्रकट धरयौ अवतार ।।1।।
चौपाई
वृंदावन-रस सबकौ सारा ।
नित सर्वोपर जुगल-बिहारा ।।2।।
नित्य किसोर रूप की रासि ।
नित्य विनोद मंद मृदु हासि ।।3।।
नित ललितादिक भरी अनंद ।
नित प्रकास वृंदावन चंद ।।4।।
कुंजनि सोभा कहा बखानौं ।
छबि फूलनि सौं छाई मानौं ।।5।।
राजत सुमन द्रुमन बहुरंगा ।
मानौं पहिरैं बसन सुरंगा ।।6।।
नाचत हंस मयूरी मोर ।
शुक सारिक पिक नाद चहुँ ओर ।।7।।
झलमलात छबि कही न जाई ।
चिंतामनि मय हेम जराई ।।8।।
सोभा दुतिय बढ़ी अधिकाई ।
फूलनि की जनौं अवनी बनाई ।।9।।
छबि सौं जमुना बहै सुहाई ।
मानौं आनँद द्रय चल्यौ माई ।।10।।
जहाँ-तहाँ पुलिन नलिन कल कूला ।
फूले सबके मनोरथ फूला ।।11।।
फूले फिरत मधुप मदमाते ।
जलजनिं सौरभ के रस राते ।।12।।
सीतल मंद समीर सुवासा ।
वृंदा कानन रंग हुलासा ।।13।।
सुख की अवधि प्रेम कौ ऐंना ।
सेवत मैंननि की सत सैंना ।।14।।
दोहा
वृंदावन छबि कहा कहौं, कैसेहुँ कहत बनैं न ।
नैननिं के रसना नहीं, रसना के नहिं नैंन ।।15।।
चौपाई
विहरत तहाँ परम सुकुँवारा ।
रूप-माधुरी कौ नहिं पारा ।।16।।
प्रेम मगन अलबेली भाँति ।
जगिमगि रह्यौ बन अंगनि कांति ।।17।।
सखी सबै हित की हितकारनि ।
जीवनि जिनकै रंग-बिहारनि ।।18।।
तिनहीं के रँग सौं अनुरागी ।
महा मधुर सेवा रस पागी ।।19।।
रुचि लै रुचि सौं दुहुँनि लड़ावैं ।
पलु-पलु सुख कौ रंग बढ़ावैं ।।20।।
फूल सौं भाजन भरि मधु आनैं ।
फूल चंदोवा छबि सौं तानैं ।।21।।
फूल सौं फूलनि सेज बनाई ।
अति सुगंध सौंधे छिरकाई ।।22।।
तापर राजत रँग विवि ओर ।
मुख जोवत ज्यौं चंद-चकोर ।।23।।
नैंक चितै तिरछै मुसिकानी ।
लालहि सुधि-बुधि सबै भुलानी ।।24।।
दोहा
बसी जु प्यारे लाल उर, वह चितवनि मुसिकानि ।
तबतें कबहूँ छुटी नहिं, चुभी जु उर में आनि ।।25।।
चौपाई
तिनकौ प्रेम और ही भाँति ।
अद्भुत रीति कही नहिं जाति ।।26।।
जौ करुना करि बे उर आनैं ।
तब रसना कै कछुक बखानैं ।।27।।
जाकौ हियौ सरस अति होई ।
यह रस रीतिहि समुझै सोई ।।28।।
सूक्षम प्रेम विरह सुखदाई ।
दिन संयोग में रहत हैं माई ।।29।।
देखत ही अनदेखी मानैं ।
तिनकी प्रीतिहि कहा बखानैं ।।30।।
प्रेम लालची लाल रँगीलौ ।
अवधि प्यार की रसिक रसीलौ ।।31।।
कर अँगुरिनु भुजमूलनि परसै ।
अधर-पान रस कौं जिय तरसै ।।32।।
छवै न सकत उरजनि कर काँपै ।
चतुर कुँवरि अंचल सौं ढाँपै ।।33।।
सो वह छटा प्रेम की न्यारी ।
लालहि विवस करति अति भारी ।।34।।
तबहि सँभारि लेति सुकुँवारी ।
अधर कपोलनि चूँवति प्यारी ।।35।।
जब देखी अखियाँनि उघारी ।
प्याइ जिवाये अधर-सुधारी ।।36।।
जबही उर सौं घुरि लपटाँही ।
तब नैंना विरही ह्वै जाँही ।।37।।
छुटैं जबहि छबि देख्यौ करें।
विरह आनि अंगनि संचरै ।।38।।
भाँति अटपटी सौं चित हर्यौ ।
जात नहीं उर धीरज धरयौ ।।39।।
छिन छिन दसा और की औरै ।
थांभै रहत सखी सिरमौरै ।।40।।
दोहा
प्रेम-अटपटी चटपटी, रही लाल उर पूरि ।
और जतन ताकौ न कछु, प्रिया सँजीवनि-मूरि ।।41।।
चौपाई
बिरह-संयोग छिनहि छिन माँही ।
जद्दपि ग्रीवनिं मेले वाँही ।।42।।
इहि विधि खेलत कलप विहाने ।
परम रसिक कबहूँ न अघाने ।।43।।
एक समै मुख की छबि पानिप ।
निरखत भूली सबै सयानिप ।।44।।
चाह प्यार की यौं फिर गई ।
सोइ आनि बिच अंतर भई ।।45।।
कुँवरि छबीली मनधरि आगै ।
विवस होइ पिय विलपन लागै ।।46।।
चितवत-चितवत लाल बिहारी ।
कहत यहै कहाँ-कहाँ सुकुँवारी ।।47।।
प्रेम-तरंग कहे नहिं जाँही ।
छिन छिन जे उपजत मन माँही ।।48।।
दोहा
कौन प्रेम के फँद परे, मोहन नवल किशोर ।
भूलि रही चितवत खरी, सखी-माल चहूँ ओर ।।49।।
चौपाई
रसनिधि रसिक प्रवीन पियारी ।
लालहि राखत ज्यौं फुलवारी ।।50।।
प्रेम प्यार जल सींच्यौ करही ।
पल-पल प्रति तिनके सँग ढरही ।।51।।
दोहा
फूल पान ज्यौं राखही, ढाँपि प्यार के चीर ।
छिन-छिन तिनकौं छिरकही, नेह-कटाच्छनि नीर ।।52।।
चौपाई
रसिक-मौलि मनि लाल बिहारी ।
जिनकैं सर्बसु प्रॉन-पियारी ।।53।।
नैंन जोरि देखति पिय रूपहि ।
मैंन माधुरी झलक अनूपहि ।।54।।
कौंन भाँति मुख की छबि कहिये ।
चितवत सखी भूलही रहियै ।।55।।
भौंहनि भाइ कटाक्ष तरंगा ।
गह्यौ लाल-मन प्रेम अनंगा ।।56।।
स्वेद कंप वेपथ अंग-अंगा ।
प्रान प्रिया भरि लेति उछंगा ।।57।।
परसत हूँ परस्यौ नहि जानै ।
छिन छिन नई-नई रुचि मानै ।।58।।
सो गति चितै सखी मुसिकाँहीं ।
वारि फेरि अंचल बलि जाहीं ।।59।।
प्रेम प्यार वन तन मन सरस्यौ ।
और स्वाद कबहूँ नहि परस्यौ ।।60।।
रूप रंग सौरभता तनकी ।
जीवन यहै दिनहि पिय मन की ।।61।।
देखिवौ जहाँ बिरह सम होई ।
तहाँ कौ प्रेम कहा कहै कोई ।।62।।
दोहा
अटपटी भाँति कौ बिरह सुनि, भूलि रह्यौ सब कोइ ।
जल पीवत हे प्यास कौं, प्यास भयौ जल सोइ ।।63।।
चौपाई
महाभाग सुखसार सरूपा ।
कोमल सील सुभाव अनूपा ।।64।।
सखी हेत उदवर्तन लावैं।
आनँद रस सौं सबै न्हवावैं ।।65।।
सारी लाज की अतिही बनी ।
अँगिया प्रीति हियैं कसि तनी ।।66।।
हाव-भाव भूषन तन बने ।
सौरभ गुनगन जात न गने ।।67।।
रसपति रसकौ रचि-पचि कीनौ ।
सो अंजन लै नैंनन दीनौ ।।68।।
मैंहदी रँग अनुराग सुरंगा ।
कर अरु चरन रचे तेहि रंगा ।।69।।
बंक चितवनी रस सौं भीनीं ।
मनौं करुना की बरसा कीनी ।।70।।
झलमल रही सुहाग की जोती ।
नासा फबि रह्यौ पानिप मोती ।।71।।
नेह फुलेल बार वर भीनें ।
फूल के फूलनि सौं गुहि लीनें ।।72।।
मौरी रँग अनुराग की डोरी ।
तिय कर बाँध्यौ पिय मन गोरी ।।73।।
दोहा
हास झलक हिरावली, अधर-बिंब अनुराग ।
त्रिवली सीवाँ रूप की, नवसत-पोति सुहाग ।।74।।
चौपाई
ऐसी प्यारी पिय उर बसै ।
ज्यौं घन में दिन दामिनि लसै ।।75।।
अद्भुत वृंदावन रजधानी ।
अद्भुत दुलहिनि राधा रानी ।।76।।
अद्भुत दूलहु नित्य किशोर ।
अद्भुत रस के चंद-चकोर ।।77।।
अद्भुत जहाँ प्रेम कौ रंग ।
अद्भुत बन्यौ दुहुनि कौ संग ।।78।।
अद्भुत रूप सहज सुकुँवारी ।
वृंदावन की मनि उजियारी ।।79।।
तिनकौं सेवत लाल बिहारी ।
तन मन बचन रहे तहाँ हारी ।।80।।
अद्भुत प्रेम एक व्रत लीनौं ।
छाँड़ि प्रिया मन अनत न दीनौं ।।81।।
छिन छिन औरै-और सिंगार ।
गुहि फूलनि पहिरावत हार ।।82।।
ठाढ़े होइ रहत कर जोरैं ।
लै बलाइ बारत तृन तोरैं ।।83।।
दोहा
चितवति जितही लाड़िली, तित ही मोहन लाल ।
सो ठाँ प्यारी ह्वै गई, देखौ प्रीति की चाल ।।84।।
चौपाई
तब मुसिकाइ लियै उर लाई ।
रीझि प्रेम माला पहिराई ।।85।।
अद्भुत प्रेम विलास अनंगा ।
अद्भुत रुचि के उठत तरंगा ।।86।।
अद्भुत प्रेम कह्यौ नहिं जाती ।
रसिक रँगीली तेहि रँग राती ।।87।।
ललित विशाखा सखी पियारी ।
दंपति सुख मन समुझनि हारी ।।88।।
सब सखियनि कौं दोऊ प्यारे ।
जीवन प्रान चखनि के तारे ।।89।।
दोहा
भुज सौं भुज उर सौं उरज, अधर अधर जुरे नैंन ।
ऐसी विधि जौ रहैं तौ, कछुक होइ चित चैंन ।।90।।
चौपाई
या सुख पर नाहिंन सुख औरै ।
जेहि उर रचे रसिक सिरमौरै ।।91।।
या रस सौं 'ध्रुव' जो मन लावै ।
ताकौ भाग कहत नहिं आवै ।।92।।
ऐसै अद्भुत भक्त अनूपा ।
जिनके हिये रहत यह रूपा ।।93।।
श्री हरिवंश चरन उर धारै ।
सो या रस में ह्वै अनुसारै ।।94।।
श्री हरिवंशहि हित सौं गावै।
जुगल-बिहार प्रेम रस पावै ।।95।।
जापर श्री हरिवंश कृपाला ।
ताकी बाँह गहैं दोऊ लाला ।।96।।
श्री हरिवंश हियै जो आनै ।
ताहि कुँवरि अपनौ करि मानै ।।97।।
यह रस गायौ श्री हरिवंश ।
मुक्ता कौन चुनै बिनु हंस ।।98।।
रसद 'रहस्य मंजरी' भई ।
छिन-छिन जोत होति है नई ।।99।।
दुहुँनि मध्य सखियनि लै बई ।
आनँद बेलि बढ़ी रस मई ।।100।।
श्री हरिवंश प्रकट करि दई ।
जाकौ भाग तिनहि 'ध्रुव' लई ।।101।।
दोहा
नित्यहि नित्य-बिहार दोऊ, करत लाड़िली-लाल ।
वृंदावन आनंद जल, बरसत हैं सब काल ।।102।।
रूप-रँगीली सभा सो, प्रेम- रँगीलौ राज ।
सखी सहेली संग रँग, अद्भुत सहज समाज ।।103।।
यह सुख देखत कंठ दृग, रुकै न आनँद-वारि ।
और अंग हारे सबै, नैंन न मानत हारि ।।104।।
सत्रह सै द्वै ऊन अरु, अगहन पछि उजियार ।
दोहा चौपाइ कहे 'ध्रुव', इकसत ऊपर चार ।।105।।
जै जै श्री रहस्यमंजरी लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
26. सुख मंजरी लीला
दोहा
सखी एक हितकी अधिक, आनँद कौ समै पाइ ।
दसा कुँवर की प्रिया सौं, कहति बनाइ बनाइ ।।1।।
चाह मदन की बिथा कौ, नाहिंन है कछु ओर ।
पलु-पलु पिय-हिय में बढ़ै, यहै सोच मन मोर ।।2।।
सिथल अंग बलहीन सखि, कछुक भयौ तन छीन ।
करि उपाइ प्यारी प्रिया, तुम जल हौ वे मीन ।।3।।
सोरठा
मिटत नहीं यह रोग, तुम हौ मूरि-सजीवनी ।
बन्यौ आनि संजोग, अब विलंब कीजै न बलि ।।4।।
दोहा
उनके लछन कहौं कछु, चित्त दै सुनि सुकुँवारि ।
नारी में पिय प्रान बसैं, नारी नारि निहारि ।।5।।
जैसैं बिथा बढ़ै नहीं, कीजै जतन बिचारि ।
देवै कौं कछु और नहिं, दैहैं प्राननिं वारि ।।6।।
सुनत सखी के बचन ये, करुना बढ़ी अपार ।
तबहि कुँवरि अति हेत सौं, करन लगी उपचार ।।7।।
प्रथमहिं नारी देखिकैं, हिय पर कर धर्यौ आनि ।
रौंम रौंम आनँद भयौ, परस होत ही पानि ।।8।।
बहुत भाँति की औषधी, चितवनि मुसिकनि भाइ ।
सँभराये तेहि छिन सखी, अधर-सुधा रस प्याइ ।।9।।
कोक-कलनि के रस विविध, जानत परम उदारि ।
दियौ किशोरी प्यार सौं, अंग मृगांग सँवारि ।।10।।
नैंन-कटाक्ष सुवास अँग, चितवनि प्यार की कीन ।
अति प्रवीन रस लाड़िली, लालहि पथ मनौ दीन ।।11।।
परिरंभन चुबंन अधिक, करत विलास अहार ।
तुष्ट-पुष्ट बल रुचि भई, बाढ़ी चाह अपार ।।12।।
गरैं पीताबंर मेलि कै, चरननि पर धर्यौ सीस ।
दयौ अपनपौ रीझि तब, श्री वृंदावन ईस ।।13।।
पुनि पग परसे सखिनु के, कीनौं बड़ उपकार ।
तासौं इतनी कहि कुँवर, पहिरायौ उर हार ।।14।।
मदन छुधा पानिप त्रिषा, सरिता बढ़ी गंभीर ।
प्रेम मगन बिलसत रहैं, पावत नाहिंन तीर ।।15।।
विविध बिहार विनोद रँग, उठत है मदन तरंग ।
अंग-अंग सब चपल भये, निर्त्तत मनहु सुधंग ।।16।।
हार बलय किंकिनि झनक, नूपुर की झनकार ।
परे मीन मन दुहुँनि के, रस प्रवाह की धार ।।17।।
हाव-भाव लावन्यता, अद्भुत प्रेम-विहार ।
केलि खेलि निवरत नहीं, तैसेई खेलनहार ।।18।।
रूप-रसासव पिवत दोऊ, नहिं जानत दिन-रैंन ।
पल कौ अंतर परत नहिं, जुरे नैंन सौं नैंन ।।19।।
त्रिपित न कबहूँ भये हैं, जदपि मिले अंग-अंग ।
रुचि न घटै छिन-छिन बढ़ै, प्रेम अनंग-तरंग ।।20।।
छके रहत दोउ लाड़िले, यह रस रंग-विहार ।
सँभरावति छिन-छिन सखी, तब कछु होत सँभार ।।21।।
ज्यौं-ज्यौं करत विहार दोऊ, बाढ़त चाह बिलास ।
जल पीवत हैं प्यास कौं, सोई जल भयौ प्यास ।।22।।
रहे लपटि आनंद सौं, आनँद कौ पट तानि ।
हित ध्रुव' आनँद कुंज में, रमि रह्यौ आनँद आनि ।।23।।
यह सुख निरखत सहचरी, जिनके यहै अहार ।
प्रेम मगन आनंद रस, रही न देह सँभार ।।24।।
अद्भुत बैदक मधुर रस, दोहा कहे पचीस ।
सुनत मिटै हृद रोग 'ध्रुव', झलकहिं उर बन ईस ।।25।।
जै जै श्री सुख मंजरी लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
दोहा
सखी एक हितकी अधिक, आनँद कौ समै पाइ ।
दसा कुँवर की प्रिया सौं, कहति बनाइ बनाइ ।।1।।
चाह मदन की बिथा कौ, नाहिंन है कछु ओर ।
पलु-पलु पिय-हिय में बढ़ै, यहै सोच मन मोर ।।2।।
सिथल अंग बलहीन सखि, कछुक भयौ तन छीन ।
करि उपाइ प्यारी प्रिया, तुम जल हौ वे मीन ।।3।।
सोरठा
मिटत नहीं यह रोग, तुम हौ मूरि-सजीवनी ।
बन्यौ आनि संजोग, अब विलंब कीजै न बलि ।।4।।
दोहा
उनके लछन कहौं कछु, चित्त दै सुनि सुकुँवारि ।
नारी में पिय प्रान बसैं, नारी नारि निहारि ।।5।।
जैसैं बिथा बढ़ै नहीं, कीजै जतन बिचारि ।
देवै कौं कछु और नहिं, दैहैं प्राननिं वारि ।।6।।
सुनत सखी के बचन ये, करुना बढ़ी अपार ।
तबहि कुँवरि अति हेत सौं, करन लगी उपचार ।।7।।
प्रथमहिं नारी देखिकैं, हिय पर कर धर्यौ आनि ।
रौंम रौंम आनँद भयौ, परस होत ही पानि ।।8।।
बहुत भाँति की औषधी, चितवनि मुसिकनि भाइ ।
सँभराये तेहि छिन सखी, अधर-सुधा रस प्याइ ।।9।।
कोक-कलनि के रस विविध, जानत परम उदारि ।
दियौ किशोरी प्यार सौं, अंग मृगांग सँवारि ।।10।।
नैंन-कटाक्ष सुवास अँग, चितवनि प्यार की कीन ।
अति प्रवीन रस लाड़िली, लालहि पथ मनौ दीन ।।11।।
परिरंभन चुबंन अधिक, करत विलास अहार ।
तुष्ट-पुष्ट बल रुचि भई, बाढ़ी चाह अपार ।।12।।
गरैं पीताबंर मेलि कै, चरननि पर धर्यौ सीस ।
दयौ अपनपौ रीझि तब, श्री वृंदावन ईस ।।13।।
पुनि पग परसे सखिनु के, कीनौं बड़ उपकार ।
तासौं इतनी कहि कुँवर, पहिरायौ उर हार ।।14।।
मदन छुधा पानिप त्रिषा, सरिता बढ़ी गंभीर ।
प्रेम मगन बिलसत रहैं, पावत नाहिंन तीर ।।15।।
विविध बिहार विनोद रँग, उठत है मदन तरंग ।
अंग-अंग सब चपल भये, निर्त्तत मनहु सुधंग ।।16।।
हार बलय किंकिनि झनक, नूपुर की झनकार ।
परे मीन मन दुहुँनि के, रस प्रवाह की धार ।।17।।
हाव-भाव लावन्यता, अद्भुत प्रेम-विहार ।
केलि खेलि निवरत नहीं, तैसेई खेलनहार ।।18।।
रूप-रसासव पिवत दोऊ, नहिं जानत दिन-रैंन ।
पल कौ अंतर परत नहिं, जुरे नैंन सौं नैंन ।।19।।
त्रिपित न कबहूँ भये हैं, जदपि मिले अंग-अंग ।
रुचि न घटै छिन-छिन बढ़ै, प्रेम अनंग-तरंग ।।20।।
छके रहत दोउ लाड़िले, यह रस रंग-विहार ।
सँभरावति छिन-छिन सखी, तब कछु होत सँभार ।।21।।
ज्यौं-ज्यौं करत विहार दोऊ, बाढ़त चाह बिलास ।
जल पीवत हैं प्यास कौं, सोई जल भयौ प्यास ।।22।।
रहे लपटि आनंद सौं, आनँद कौ पट तानि ।
हित ध्रुव' आनँद कुंज में, रमि रह्यौ आनँद आनि ।।23।।
यह सुख निरखत सहचरी, जिनके यहै अहार ।
प्रेम मगन आनंद रस, रही न देह सँभार ।।24।।
अद्भुत बैदक मधुर रस, दोहा कहे पचीस ।
सुनत मिटै हृद रोग 'ध्रुव', झलकहिं उर बन ईस ।।25।।
जै जै श्री सुख मंजरी लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
27. रति मंजरी लीला
दोहा
हरिवंश नाम ध्रुव कहत ही, बाढै आनँद-बेलि ।
प्रेम रंग उर जगमगै, जुगल नवल रस-केलि ।।1।।
(श्री) हरिवंश चंद पद बंदिकै, करत बुद्धि अनुसार ।
ललित विसाखा सखिनु के, यह रस प्रान-अधार ।।2।।
एती मति मोपै कहाँ, सिंधु न सीप समात ।
रसिक अनन्यनि कृपा बल, जो कछु बरन्यौ जात ।।3।।
चौपाई
प्रथमहिं सुमिरौं श्री वृंदावन ।
जा देखत फूलै यह तन-मन ।।4।।
कुंदन रचित खचित धर बनी ।
सो छवि कैसैं जाति है भनी ।।5।।
रज कपूर की झलकनि न्यारी ।
हियौ सिराइ निरखि सोभा री ।।6।।
ललित तमाल लता लपटानी ।
कूँजत कोकिल अति कल वानी ।।7।।
तपन-सुता छबि जात न बरनी ।
रस-पति रस ढारयौ मनु धरनी ।।8।।
कुंज सुरंग सुदेस सुहाई ।
रति-पति रचि-रचि रुचिर बनाई ।।9।।
दोहा
कुंकुम अंबर अगरसत, बेलि चँबेली फूल ।
सखियनि सबकौ मोद लै, रची कुंज सुख मूल ।।10।।
रूप-पुंज रस पुंज दोऊ, पौढ़े प्रेम-प्रजंक ।
बिलसत नवल बिहार निजु, सब विधि होइ निसंक ।।11।।
चौपाई
अब बरनौं निज रस सिंगारा ।
सुख निधि सरस निकुंज बिहारा ।।12।।
नवल नाइका अति सुकुँवारी ।
नाइक रसिक निकुंज बिहारी ।।13।।
अति प्रवीन रस कोक में दोऊ ।
राज हंस गति घटि नहिं कोऊ ।।14।।
दोहा
रूप मदन रस मोद की, सहज जुगल वर देह ।
बैठे प्यार की सेज पर, भरे मोद मृदु नेह ।।15।।
एक रंग रुचि एक वय, एक प्रान द्वै देह ।
पल-पल पिय हुलसत रहत, अरुझे सरस सनेह ।।16।।
चौपाई
सब बिधि नागर नवल किशोरी ।
सील सुभाव नेह निधि गोरी ।।17।।
अति गंभीर धीर वर बाला ।
परम सलज्ज रूप की माला ।।18।।
नवल रँगीली राजत खरी ।
रंग-लता रस भाइनि भरी ।।19।।
दोहा
कोमल कुंदन बेलि मनौं, सींची रंग सुहाग ।
मुसिकनि लागे फूल फल, उरज भरे अनुराग ।।20।।
चौपाई
बरसत छबि बरसा सी माई ।
चातिक लाल न पिवत अघाई ।।21।।
आतुर पिय आधीन अधीरा ।
जाँचत रहत दसन वर चीरा ।।22।।
छिन छिन नई-नई छबि औरे ।
सुधि नहिं रहन देति सिरमोरै ।।23।।
जेहि अँग ओर परै मन जाई ।
छुटै न तहाँ ते रहत लुभाई ।।24।।
दोहा
ज्यौं-ज्यौं सर में जल बढ़ै, कमल बढ़ै तेहि भाँति ।
ऐसी पिय की रुचि बढ़ै, निरखि प्रिया-तन-काँति ।।25।।
चौपाई
अद्भुत सहज माधुरी अंगा ।
चितै रीझि भरि लेत उछंगा ।।26।।
झटकनि लटकनि की छबि न्यारी ।
यह सुख जानत देखनहारी ।।27।।
चितई नेक चपल भ्रू-भंगा ।
काँपत लाल सकल अँग-अंगा ।।28।।
बचन सगर्व सुनत हुंकारा ।
प्रीतम देह रही न सँभारा ।।29।।
बिवस भये विरहज-दुख भारी ।
लटकि परे गहि चरन बिहारी ।।30।।
प्रेम-प्यार की मूरति प्यारी ।
लये लाल भरि कैं अँकवारी ।।31।।
रही लाइ हित सौं उर ऐसैं ।
खची नील-मनि-कंचन जैसैं ।।32।।
दोहा
बदन कमल सुठि सोहनौ, रस भरे अधर-सुरंग ।
पल-पल प्यावति लाड़िली, उठत सुगंध तरंग ।।33।।
चौपाई
अधरनि रस सींच्यौ जब बाला ।
फूल्यौ मन मनु मैंन-तमाला ।।34।।
अति सुकुँवार केलि-रँग भीने ।
छिन छिन उपजत भाइ नवीने ।।35।।
प्रबल चौंप बाढ़ी दुहुँ माहीं ।
रस समतूल कोऊ घटि नाहीं ।।36।।
सुरत-समुद्र परे दोऊ प्यारे ।
अंबर लाज दूरि करि डारे ।।37।।
भूषन सब दूषन करि जानैं ।
तन-मन एक होइ लपटानैं ।।38।।
दोहा
सुख वारिधि में परत ही, गये छूटि पट नेम ।
मैंड़ तहाँ कैसैं रहै, उमड़त है जहाँ प्रेम ।।39।।
बढ़ी त्रिषा निज केलि की, रस-लंपट न अघात ।
चरन छुवत हा-हा करत, रीझि-रीझि बलि जात ।।40।।
चौपाई
अति उदार नागरि सुकुँवारी ।
पिय रुचि जानि केलि बिस्तारी ।।41।।
रति विपरित बिलसत वर भाँती ।
चुंबन अधर नैंन मुसकाँती ।।42।।
रस के बस ह्वै रस में झूले ।
बात नेम की ते सब भूले ।।43।।
बिरमि-बिरमि बानी पिय बोलैं।
श्रमित जानि अंचल झकझोलैं ।।44।।
दोहा
नाइक तहाँ न नाइका, रस करवावति केलि ।
सखी उभै संगम सरस, पियत नैंन-पुट झेलि ।।45।।
चौपाई
तजि मर्याद बिलास जु करहीं ।
रति जुत मदन कोटि दुति हरहीं ।।46।।
आलिंगन चुंबन जब दये ।
अंगनि के भूषन अँग भये ।।47।।
अंजनि अधर पीक लगी नैंननिं ।
सुख में कहत अटपटे बैननिं ।।48।।
आनँद मोद बढ्यौ अधिकाई ।
बिच-बिच लाल बिबस ह्वै जाई ।।49।।
दुहुँ मन रुचि एकै ह्वै जबहीं ।
सुख की बेलि बढ़ै 'ध्रुव' तबहीं ।।50।।
गौर-स्याम अँग मिलि रहे ऐसैं ।
सीस रंग झलकत तन जैसैं ।।51।।
रस की अवधि इहाँ लौं माई ।
विवि तन-मन एकै ह्वै जाई ।।52।।
दोहा
एक रंग रुचि एक वय, एकै भाँति सनेह ।
एकै सील सुभाव मृदु, रस के हित द्वै देह ।।53।।
चहूँ ओर रही छाइ प्रेम के प्यार सौं ।
पिय हिय सौं रही लाइ हिये के हार सौं ।।
तिनके रस की बात कही नहिं जात है ।
(हरि हाँ) जानत नाहिंन राति किधौं 'ध्रुव' प्रात है ।।54।।
चौपाई
मादिक मधुर अधर रस प्यावै ।
नैंन चूँमि नासा चटकावै ।।55।।
ऐसै जतननि पियहि जगावै ।
रति नागरि रति केलि बढ़ावै ।।56।।
अधरनि दसन लगे जब जानैं ।
रौंम-रौंम रति-पति रससानैं ।।57।।
देखि रसिक रति रीझि भुलानी ।
हियौ खोलि हिय सौं लपटानी ।।58।।
दोहा
प्यावति प्यारी प्यार सौं, प्रेम रसासव सार ।
त्यों-त्यों प्यारे लाल के, बाढ़त त्रिषा अपार ।।59।।
चौपाई
सुख- सरिता उमड़ी चहूँ ओरैं ।
झलमलात सोभा तन गोरैं ।।60।।
कंचुकि दरकि तनी सब टूटी ।
सगबगी अलकैं सोभित छूटी ।।61।।
श्रम-जल-कन दुति कहा बखानौं ।
छबि के मोती राजत मानौं ।।62।।
रति-बिलास की उठत झकोरैं ।
चंचल दृग अंचल चल कोरैं ।।63।।
सुख सर में दोउ करत अलोलैं ।
मानौं छबि के हंस कलोलैं ।।64।।
ऐसैं उमड़ि महा रस ढरी ।
मानौं प्यार की बरसा करी ।।65।।
रस फिरि गयौ दुँहुनिं पर माई ।
भूली तन गति रति न भुलाई ।।66।।
दोहा
लाल त्रिषा कौ सिंधु है, प्रेम-उदधि सुकुँवारि ।
इक रस प्यावत पिवत दोऊ, मानत नहिं कोऊ हारि ।।67।।
चौपाई
होत बिवस तबहीं पिय-प्यारी ।
सावधान तहाँ सखि हितकारी ।।68।।
कुँवरि अधर पिय-अधरनि लावैं ।
रूप बदन नैंननिं दरसावैं ।।69।।
पिय के कर लै उरज छुवावैं ।
मनौं मैंन कों खेल खिलावैं ।।70।।
उर सौं उर मिलि भुजनि भरावैं ।
चरन पलोट सेज पौढ़ावैं ।।71।।
ऐसी भाँति नव लाड़ लड़ावैं ।
ताही सौं अपनौं जिय ज्यावैं ।।72।।
दोहा
प्रेम रसांसव छके दोऊ, करत बिलास-विनोद ।
बढ़त रहत उतरत नहीं, गौर-स्याम छबि मोद ।।73।।
चौपाई
मैंड़ तोरि रस चल्यौ अपारा ।
रही न तन-मन कछू सँभारा ।।74।।
सो रस कहौ कहाँ ठहरानौं ।
सखियनि के उर-नैंन समानौं ।।75।।
तेहि अवलंब सबै सहचरी ।
मत्त रहतिं ठाढ़ी रँग-भरी ।।76।।
या रस की जाके रुचि रहै ।
भाग पाइ सो कछु इक कहै ।।77।।
सखियनि सरनि भाव धरि आवै ।
सो या रसके स्वादहि पावै ।।78।।
छाँड़ि कपट भ्रम दिन दुलरावै ।
ताकौ भाग कहत नहिं आवै ।।79।।
रति-मंजरि रँग लागै जाकै ।
प्रेम कमल फूलै हिय ताके ।।80।।
यह रस जाके उर न सुहाई ।
ताकौ संग बेगि तजि भाई ।।81।।
दोहा
या रस सौं लाग्यौ रहै, निसि दिन जाकौ चित्त ।
ताकी पद-रज सीस धरि, बंदत रहौ 'ध्रुव' नित्त ।।82।।
जै जै श्री रतिमंजरी लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
दोहा
हरिवंश नाम ध्रुव कहत ही, बाढै आनँद-बेलि ।
प्रेम रंग उर जगमगै, जुगल नवल रस-केलि ।।1।।
(श्री) हरिवंश चंद पद बंदिकै, करत बुद्धि अनुसार ।
ललित विसाखा सखिनु के, यह रस प्रान-अधार ।।2।।
एती मति मोपै कहाँ, सिंधु न सीप समात ।
रसिक अनन्यनि कृपा बल, जो कछु बरन्यौ जात ।।3।।
चौपाई
प्रथमहिं सुमिरौं श्री वृंदावन ।
जा देखत फूलै यह तन-मन ।।4।।
कुंदन रचित खचित धर बनी ।
सो छवि कैसैं जाति है भनी ।।5।।
रज कपूर की झलकनि न्यारी ।
हियौ सिराइ निरखि सोभा री ।।6।।
ललित तमाल लता लपटानी ।
कूँजत कोकिल अति कल वानी ।।7।।
तपन-सुता छबि जात न बरनी ।
रस-पति रस ढारयौ मनु धरनी ।।8।।
कुंज सुरंग सुदेस सुहाई ।
रति-पति रचि-रचि रुचिर बनाई ।।9।।
दोहा
कुंकुम अंबर अगरसत, बेलि चँबेली फूल ।
सखियनि सबकौ मोद लै, रची कुंज सुख मूल ।।10।।
रूप-पुंज रस पुंज दोऊ, पौढ़े प्रेम-प्रजंक ।
बिलसत नवल बिहार निजु, सब विधि होइ निसंक ।।11।।
चौपाई
अब बरनौं निज रस सिंगारा ।
सुख निधि सरस निकुंज बिहारा ।।12।।
नवल नाइका अति सुकुँवारी ।
नाइक रसिक निकुंज बिहारी ।।13।।
अति प्रवीन रस कोक में दोऊ ।
राज हंस गति घटि नहिं कोऊ ।।14।।
दोहा
रूप मदन रस मोद की, सहज जुगल वर देह ।
बैठे प्यार की सेज पर, भरे मोद मृदु नेह ।।15।।
एक रंग रुचि एक वय, एक प्रान द्वै देह ।
पल-पल पिय हुलसत रहत, अरुझे सरस सनेह ।।16।।
चौपाई
सब बिधि नागर नवल किशोरी ।
सील सुभाव नेह निधि गोरी ।।17।।
अति गंभीर धीर वर बाला ।
परम सलज्ज रूप की माला ।।18।।
नवल रँगीली राजत खरी ।
रंग-लता रस भाइनि भरी ।।19।।
दोहा
कोमल कुंदन बेलि मनौं, सींची रंग सुहाग ।
मुसिकनि लागे फूल फल, उरज भरे अनुराग ।।20।।
चौपाई
बरसत छबि बरसा सी माई ।
चातिक लाल न पिवत अघाई ।।21।।
आतुर पिय आधीन अधीरा ।
जाँचत रहत दसन वर चीरा ।।22।।
छिन छिन नई-नई छबि औरे ।
सुधि नहिं रहन देति सिरमोरै ।।23।।
जेहि अँग ओर परै मन जाई ।
छुटै न तहाँ ते रहत लुभाई ।।24।।
दोहा
ज्यौं-ज्यौं सर में जल बढ़ै, कमल बढ़ै तेहि भाँति ।
ऐसी पिय की रुचि बढ़ै, निरखि प्रिया-तन-काँति ।।25।।
चौपाई
अद्भुत सहज माधुरी अंगा ।
चितै रीझि भरि लेत उछंगा ।।26।।
झटकनि लटकनि की छबि न्यारी ।
यह सुख जानत देखनहारी ।।27।।
चितई नेक चपल भ्रू-भंगा ।
काँपत लाल सकल अँग-अंगा ।।28।।
बचन सगर्व सुनत हुंकारा ।
प्रीतम देह रही न सँभारा ।।29।।
बिवस भये विरहज-दुख भारी ।
लटकि परे गहि चरन बिहारी ।।30।।
प्रेम-प्यार की मूरति प्यारी ।
लये लाल भरि कैं अँकवारी ।।31।।
रही लाइ हित सौं उर ऐसैं ।
खची नील-मनि-कंचन जैसैं ।।32।।
दोहा
बदन कमल सुठि सोहनौ, रस भरे अधर-सुरंग ।
पल-पल प्यावति लाड़िली, उठत सुगंध तरंग ।।33।।
चौपाई
अधरनि रस सींच्यौ जब बाला ।
फूल्यौ मन मनु मैंन-तमाला ।।34।।
अति सुकुँवार केलि-रँग भीने ।
छिन छिन उपजत भाइ नवीने ।।35।।
प्रबल चौंप बाढ़ी दुहुँ माहीं ।
रस समतूल कोऊ घटि नाहीं ।।36।।
सुरत-समुद्र परे दोऊ प्यारे ।
अंबर लाज दूरि करि डारे ।।37।।
भूषन सब दूषन करि जानैं ।
तन-मन एक होइ लपटानैं ।।38।।
दोहा
सुख वारिधि में परत ही, गये छूटि पट नेम ।
मैंड़ तहाँ कैसैं रहै, उमड़त है जहाँ प्रेम ।।39।।
बढ़ी त्रिषा निज केलि की, रस-लंपट न अघात ।
चरन छुवत हा-हा करत, रीझि-रीझि बलि जात ।।40।।
चौपाई
अति उदार नागरि सुकुँवारी ।
पिय रुचि जानि केलि बिस्तारी ।।41।।
रति विपरित बिलसत वर भाँती ।
चुंबन अधर नैंन मुसकाँती ।।42।।
रस के बस ह्वै रस में झूले ।
बात नेम की ते सब भूले ।।43।।
बिरमि-बिरमि बानी पिय बोलैं।
श्रमित जानि अंचल झकझोलैं ।।44।।
दोहा
नाइक तहाँ न नाइका, रस करवावति केलि ।
सखी उभै संगम सरस, पियत नैंन-पुट झेलि ।।45।।
चौपाई
तजि मर्याद बिलास जु करहीं ।
रति जुत मदन कोटि दुति हरहीं ।।46।।
आलिंगन चुंबन जब दये ।
अंगनि के भूषन अँग भये ।।47।।
अंजनि अधर पीक लगी नैंननिं ।
सुख में कहत अटपटे बैननिं ।।48।।
आनँद मोद बढ्यौ अधिकाई ।
बिच-बिच लाल बिबस ह्वै जाई ।।49।।
दुहुँ मन रुचि एकै ह्वै जबहीं ।
सुख की बेलि बढ़ै 'ध्रुव' तबहीं ।।50।।
गौर-स्याम अँग मिलि रहे ऐसैं ।
सीस रंग झलकत तन जैसैं ।।51।।
रस की अवधि इहाँ लौं माई ।
विवि तन-मन एकै ह्वै जाई ।।52।।
दोहा
एक रंग रुचि एक वय, एकै भाँति सनेह ।
एकै सील सुभाव मृदु, रस के हित द्वै देह ।।53।।
चहूँ ओर रही छाइ प्रेम के प्यार सौं ।
पिय हिय सौं रही लाइ हिये के हार सौं ।।
तिनके रस की बात कही नहिं जात है ।
(हरि हाँ) जानत नाहिंन राति किधौं 'ध्रुव' प्रात है ।।54।।
चौपाई
मादिक मधुर अधर रस प्यावै ।
नैंन चूँमि नासा चटकावै ।।55।।
ऐसै जतननि पियहि जगावै ।
रति नागरि रति केलि बढ़ावै ।।56।।
अधरनि दसन लगे जब जानैं ।
रौंम-रौंम रति-पति रससानैं ।।57।।
देखि रसिक रति रीझि भुलानी ।
हियौ खोलि हिय सौं लपटानी ।।58।।
दोहा
प्यावति प्यारी प्यार सौं, प्रेम रसासव सार ।
त्यों-त्यों प्यारे लाल के, बाढ़त त्रिषा अपार ।।59।।
चौपाई
सुख- सरिता उमड़ी चहूँ ओरैं ।
झलमलात सोभा तन गोरैं ।।60।।
कंचुकि दरकि तनी सब टूटी ।
सगबगी अलकैं सोभित छूटी ।।61।।
श्रम-जल-कन दुति कहा बखानौं ।
छबि के मोती राजत मानौं ।।62।।
रति-बिलास की उठत झकोरैं ।
चंचल दृग अंचल चल कोरैं ।।63।।
सुख सर में दोउ करत अलोलैं ।
मानौं छबि के हंस कलोलैं ।।64।।
ऐसैं उमड़ि महा रस ढरी ।
मानौं प्यार की बरसा करी ।।65।।
रस फिरि गयौ दुँहुनिं पर माई ।
भूली तन गति रति न भुलाई ।।66।।
दोहा
लाल त्रिषा कौ सिंधु है, प्रेम-उदधि सुकुँवारि ।
इक रस प्यावत पिवत दोऊ, मानत नहिं कोऊ हारि ।।67।।
चौपाई
होत बिवस तबहीं पिय-प्यारी ।
सावधान तहाँ सखि हितकारी ।।68।।
कुँवरि अधर पिय-अधरनि लावैं ।
रूप बदन नैंननिं दरसावैं ।।69।।
पिय के कर लै उरज छुवावैं ।
मनौं मैंन कों खेल खिलावैं ।।70।।
उर सौं उर मिलि भुजनि भरावैं ।
चरन पलोट सेज पौढ़ावैं ।।71।।
ऐसी भाँति नव लाड़ लड़ावैं ।
ताही सौं अपनौं जिय ज्यावैं ।।72।।
दोहा
प्रेम रसांसव छके दोऊ, करत बिलास-विनोद ।
बढ़त रहत उतरत नहीं, गौर-स्याम छबि मोद ।।73।।
चौपाई
मैंड़ तोरि रस चल्यौ अपारा ।
रही न तन-मन कछू सँभारा ।।74।।
सो रस कहौ कहाँ ठहरानौं ।
सखियनि के उर-नैंन समानौं ।।75।।
तेहि अवलंब सबै सहचरी ।
मत्त रहतिं ठाढ़ी रँग-भरी ।।76।।
या रस की जाके रुचि रहै ।
भाग पाइ सो कछु इक कहै ।।77।।
सखियनि सरनि भाव धरि आवै ।
सो या रसके स्वादहि पावै ।।78।।
छाँड़ि कपट भ्रम दिन दुलरावै ।
ताकौ भाग कहत नहिं आवै ।।79।।
रति-मंजरि रँग लागै जाकै ।
प्रेम कमल फूलै हिय ताके ।।80।।
यह रस जाके उर न सुहाई ।
ताकौ संग बेगि तजि भाई ।।81।।
दोहा
या रस सौं लाग्यौ रहै, निसि दिन जाकौ चित्त ।
ताकी पद-रज सीस धरि, बंदत रहौ 'ध्रुव' नित्त ।।82।।
जै जै श्री रतिमंजरी लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
28. नेह मंजरी लीला
चौपाई
वृंदावन सोभा की सींवाँ ।
विहरत दोउ मेलि भुज ग्रीवाँ ।।1।।
राजत तरुन किशोर तमाला ।
लपटी कंचन-बेलि रसाला ।।2।।
अरुन पीत सित फूलनि छाये ।
मनौं बसंत निज धाम बनाये ।।3।।
बरन-बरन के फूलनि फूली ।
जहाँ-तहाँ लता प्रेम-रस झूली ।।4।।
तीन भाँति के कमल सुहाये ।
जल थल विकसि रहे मन भाये ।।5।।
बहुत भाँति के पंछी बोलैं ।
मोर मराल भरे रस डोलैं ।।6।।
त्रिविध पवन संतत तहाँ रहहीं ।
जैसी रुचि तैसी ही बहहीं ।।7।।
हेम बरन अद्भुत धर माई ।
हीरनि खचित अधिक झलकाई ।।8।।
रज कपूर की तहाँ सुहाई ।
सौरभ मय संतत सुखदाई ।।9।।
तरनि-सुता चहुँ दिशि फिरि आई ।
मनौं नीलमणि-माल बनाई ।।10।।
(श्री) वृंदावन की छबि है जैसी ।
कापै कही जात है तैसी ।।11।।
दोहा
फूल जहाँ-तहाँ देखिये, श्रीवृंदावन माँहि ।
द्रुम बेली खग सहचरी, बिना फूल कोउ नाहिं ।।12।।
चौपाई
सुंदर सहज छबीली जोरी ।
सहज प्रेम के रँग में बोरी ।।13।।
खेलत फिरत निकुंजनि खोरी ।
एक वैस पिय कुँवरि किशोरी ।।14।।
तैसीय संग सहचरी भोरी ।
बँधी बंक चितवनि की डोरी ।।15।।
बिनु प्राननि डोलति सँग लागी ।
प्रेम रूप के रँग अनुरागी ।।16।।
महा प्रेम की रासि रँगीले ।
चित्त हरन दोऊ छैल छबीले ।।17।।
जहाँ-जहाँ चरन धरत सुखदाई ।
झरि-झरि रूप परत तहाँ माई ।।18।।
जो तेहि ठाँ ह्वै देखै आई ।
तन की ताहि भूलि सुधि जाई ।।19।।
नव किशोर बरनैं क्यौं जाँही ।
प्रेम रूप की सींवा नाहीं ।।20।।
तिनकौ रूप कहन को पारै ।
जो देखै सो पहिलै हारै ।।21।।
ऐसै दोऊ आप में राते ।
अहर्निसि रहत एक रस माते ।।22।।
अंग-अंग बिवस और सुधि नाँही ।
प्रेम रसासव पान कराहीं ।।23।।
अद्भुत रस पीवत हैं दोऊ ।
तिन में त्रिपित होत नहिं कोऊ ।।24।।
दोहा
मत्त परस्पर रहत 'ध्रुव', एक प्रेम रँग-रात ।
अति सुरंग लोइनि रहे, दिन अनुराग चुचात ।।25।।
चौपाई
हाव-भाव गुन सींव रँगीली ।
मुख पर पानिप झलक छबीली ।।26।।
बैठे कुँवर सोई छबि देखैं ।
लोभी नैंन न परत निमेषैं ।।27।।
रहे चकित ह्वै रसिक बिहारी ।
रूप-छटा नहिं जात संभारी ।।28।।
सहजहि प्रेम ढार ढरि जाँही ।
तेहि रस जानत घाम न छाँही ।।29।।
छिन-छिन प्रति रुचि बाढ़ै भारी ।
रही भूलि सो प्रेम निहारी ।।30।।
कबहूँ लै मृदु कुसुम सुरंगनि ।
गुहि भूषन बानत सब अंगनि ।।31।।
वारि-वारि पीवत पिय पानी ।
चितै कुँवरि कछु इक मुसिकानी ।।32।।
छबि सींवाँ भुज-लतनि पियारी ।
छबि तमाल पिय भरे अंकवारी ।।33।।
महा मधुर रस जुगल-बिहारा ।
जहाँ लगि प्रेम सबनि कौ सारा ।।34।।
रहत लीन ह्वै दीन रँगीलौ ।
नख सिख सुंदर रसिक रसीलौ ।।35।।
तिनके प्रेम प्रेम बस कीनी ।
सखि सौं सखी कहत रँग भीनी ।।36।।
दोहा
जद्दपि मन चंचल हुतौ, मोहयौ अद्भुत रूप ।
बिसरि गई सब चतुरता, परत प्रेम के कूप ।।37।।
चौपाई
प्रिया वदन सुंदर अति राजै ।
सहज रूप कौ चंद बिराजै ।।38।।
मुसिकनि मंद दसन दुति न्यारी ।
तापर दामिनि कोटिक वारी ।।39।।
झलक कपोलनि की चिकनाई ।
अँखिया रपटि गिरतिं तहाँ माई ।।40।।
अरुण असित सित नैंन सलौनैं ।
छ्वै-छ्वै जात हैं काननिं कौंनैं ।।41।।
सहज चपल इत उतहि निहारैं ।
बरसत मनु अनुराग की धारैं ।।42।।
दोहा
रंग भरे अरु रस भरे, सरस छबीले नैंन ।
सींचत पिय हिय कमल कौं, नेह-नीर मृदु सैंन ।।43।।
चौपाई
अति अनूप बैंदी जगमगै ।
चितै-चितै पिय पाँइनि लगै ।।44।।
नासा बेसरि मोती झलकै ।
मनौं रूप की आभा छलकै ।।45।।
अद्भुत रूप मेह सो बरसै ।
तऊ कुँवर चातिक ज्यौं तरसै ।।46।।
छबि डोलै चरननि सौं लागी ।
उपमा सबै देखि यह भागी ।।47।।
अद्भुत सहज रूप की माला ।
ऐसी कुँवरि किसोरी बाला ।।48।।
पहिरि कुँवर छिन छिनहि सँभारै ।
ऐसौ लोभ न नैंक उतारै ।।49।।
कुँवर प्रेम कौ सागर राजै ।
प्रिया-प्रेम तहँ भँवर बिराजै ।।50।।
ज्यौं सब जल फिरि-फिरि तहाँ परही ।
ऐसैं लाल प्रिया दिस ढरही ।।51।।
दोहा
प्राननि हूँ के प्रान, पिय की सर्वस लाड़िली ।
तिनकैं नहिं गति आँनि, देखि-देखि जीवत सखी ।।52।।
चौपाई
लालहि प्रिया लगति अति प्यारी ।
तापर प्रान करत बलिहारी ।।53।।
जहँ-जहँ चरन धरति सुकुँवारी ।
सो ठाँ चूँबत लाल बिहारी ।।54।।
प्रेम अटक की अटपटी रीती ।
जाने सो जाके उर बीती ।।55।।
कहिबै कौं नहिं प्रेम के बैंना ।
मन समुझै कै दोऊ नैंना ।।56।।
जेहि-जेहि सुमन सुरंग की ओरैं ।
चितवत नैंकु नैंन की कोरैं ।।57।।
धाइ कुँवर तेहि फूलहि लावै ।
मन सेवा कै प्रियहि रिझावै ।।58।।
प्रीति रीति को जानै माई ।
बिन पिय कुँवर रसिक सुखदाई ।।59।।
मानत है धनि भाग बड़ाई ।
ऐसी कुँवरि किशोरी पाई ।।60।।
भये दीन यौं तजी बड़ाई ।
पुनि ताकी बातैं न सुहाई ।।61।।
अब मोकौं कछु और न चहिये ।
नैंननिं में अंजन है रहियै ।।62।।
ऐसै नैंन लगैं सखि प्यारे ।
कैसैं रहैं आप ते न्यारे ।।63।।
ऐसी न होइ तौ यह उर धरहीं ।
मोही तन वे चितयौ करहीं ।।64।।
घन्य सोई छिन पल सखि मेरैं ।
कुँवरि नैंन भरि मोतन हेरैं ।।65।।
दोहा
कोटि काम सुख होत हैं, हँसि चितवति पिय ओर ।
भूलि जात तन की दसा, परसे प्रेम- झकोर ।।66।।
चौपाई
कुँवर-प्रेम जब मन में आयौ ।
बचन किशोरी कहन न पायौ ।।67।।
भरि हीयौ अति ही अकुलानी ।
पिय किशोर के उर लपटानी ।।68।।
फिरि गयौ प्रेम दुहुँनि पर माई ।
अपनी-अपनी सुधि बिसराई ।।69।।
पिय-पिय प्रिया कहत सुकुँवारी ।
रहि गये ऐसैं भरि अँकवारी ।।70।।
प्रेम-नीर उर अंचल भीनें ।
चितवत नैंन चकोरहिं कीनें ।।71।।
दोहा
सहज रँगीली लाड़िली, सहज रँगीलौ लाल ।
सहज प्रेम की बेलि मनौं, लपटी प्रेम-तमाल ।।72।।
चौपाई
देखि सखी तहँ सबै भुलानी ।
एक रही मनौं चित्र की बानी ।।73।।
एकनि के नैंननिं जल ढरहीं ।
मनौं प्रेम के झरना झरहीं ।।74।।
एक गिरी धर अति मुरझाँनी ।
रहि गई एक लता लपटानी ।।75।।
भइ अचेत पुनि चेत निहारै ।
तब सबहिन मिलि आइ सँभारे ।।76।।
देखे दोऊ उर में उरझाने ।
तब सबहिनि के नैंन सिराने ।।77।।
दोहा
जुगल रसिक सिरमौर, सब सखियनि के प्रान हैं ।
नाहिंन है गति और, तिनहीं के सुख सौं रँगी ।।78।।
चौपाई
महा प्रेम गति सब तें न्यारी ।
पिय जानै कै प्रॉन पियारी ।।79।।
अरुझे मन सुरझत नहि कैहूँ ।
जेहि अँग ढरत होत सुख तैहूँ ।।80।।
एकै रुचि दुहुँ में सखि बाढ़ी ।
परि गई प्रेम ग्रंथि अति गाढ़ी ।।81।।
देखत-देखत कल नहिं माई ।
तिनकौ प्रेम कयौ नहि जाई ।।82।।
सहज सुभाइ अनमनी देखैं ।
निमिषनि कोटि कलप सम लेखैं ।।83।।
हँसि चितवत जब प्रीतम माँहीं ।
सोई कलप निमष ह्वै जाँहीं ।।84।।
खेलन हँसन लाल कौं भावै ।
नेह की देवी नितहि मनावै ।।85।।
कौतुक प्रेम छिनहि-छिन होई ।
यह रस समुझै बिरला कोई ।।86।।
ज्यौं-ज्यौं रूपहि देखत माई ।
प्रेम-तृषा की ताप न जाई ।।87।।
दोहा
प्रेम तृषा की ताप ध्रुव, कैसे हुँ कही न जाइ ।
रूप-नीर छिरकत रहैं, तऊ न नैंन अघाँइ ।।88।।
चौपाई
बिच-बिच उठत हैं प्रेम तरंगा ।
खेलत हँसत मिलत अँग- अंगा ।।89।।
नवल राधिका-वल्लभ जोरी ।
दूलहु नित्य दुलहिनी गोरी ।।90।।
सोभित नित्य सहाने बागे ।
नये नेह के रस अनुरागे ।।91।।
खेलत-खेल तहाँ मन भाये ।
यह कौतुक कबहूँ न अघाये ।।92।।
नेह-मंजरी सहजहि भई ।
हरी एक रस छिन-छिन नई ।।93।।
सींचत चाह चौंप के जल सौं ।
लगि रहे दृग कमलनि के दल सौं ।।94।।
दोहा
श्री राधावल्लभ लाल, रसिक रँगीले विवि कुँवर ।
परे प्रेम के ख्याल, रुचत न तिनकौं और कछु ।।95।।
चौपाई
नव निकुंज रँग-सँग चित्रसारी ।
राजत नवल कुँवरि सुकुँवारी ।।96।।
रस-बिहार की चौपर खेलैं ।
दोउ प्रवीन अंसनि भुज मेलैं ।।97।।
सखियनि तलप बिसात बनाई ।
कहि न जाइ सोभा कछु माई ।।98।।
प्यासे नैंन कटाछनि ढारैं ।
हाव-भाव रँग-रंग की सारैं ।।99।।
जो अँग लालहि परस्यौ भावै ।
समुझि किशोरी ताहि दुरावै ।।100।।
घात अनेक मन में उपजावै ।
हँसै कुँवरि जब नहिं बनि आवै ।।101।।
हारि मानि पग परत बिहारी ।
रसिक सिरोमनि की बलिहारी ।।102।।
नैंननिं सैंन कछुक मुसिकानी ।
मैंन खेल रस रैंन न जाँनी ।।103।।
उरज कपोल झलक छबि छाई ।
चितवत लाल विवस ह्वै जाई ।।104।।
तबहि कुँवरि भरि लिये अँकवारी ।
करुना करि दियौ अधर सुधारी ।।105।।
दोहा
नागरि कोक कलानि में, बिलसत सुरत-बिहार ।
रोचक रव रसना तहाँ, अरु नूपुर झनकार ।।106।।
चौपाई
नवल निकुंज रँगीले दोऊ ।
तेहि ठाँ सखी नाहिनैं कोऊ ।।107।।
रसिक लाल ऐसै रँग भीनें ।
तन-मन प्रॉन प्रिया कर दीनें ।।108।।
कबहूँ रूप सखी कौ धरही ।
रुचि लै सब बातनिं कौं करही ।।109।।
नख-शिख लौं सिंगार बनावै ।
याही सेवा में सुख पावै ।।110।।
अद्भुत बैंनी गूँथि बनाई ।
मनौं अलिनु की सरैंनी आई ।।111।।
दोहा
बिच-बिच फूल सुरंग दै, गूँथी कबरि बनाइ ।
मिलि अनुराग सिँगार दोउ, गही सरन मनौं आइ ।।112।।
चौपाई
नैंननिं अंजन रेखा दीनी ।
तबहि कुँवरि कर आरसी लीनी ।।113।।
रीझि अंक लालन भरि लीनौ ।
अति हित सौं अधरामृत दीनौ ।।114।।
समुझि सनेह नैंन भरि आये ।
मनौ कंज आनँद जल छाये ।।115।।
बिवस होइ तब उर लपटाने ।
बीते कलप न नैंकु अघाने ।।116।।
रहत यहै भ्रम पिय मन माँही ।
प्रान-प्रिया मोहिं मिली कि नाहीं ।।117।।
दोहा
देखत-देखत हँसत ही, गये कलप बहु बीति ।
पल समान जाने नहीं, बिलसत दिन यह रीति ।।118।।
चौपाई
कौन प्रेम तेहि ठाँ कौ कहियै ।
दुहूँ कोद चितवत सखि रहियै ।।119।।
नित्त प्रेम एकै रस धारा ।
अति अगाध तेहि नाहिंन पारा ।।120।।
महा-मधुर रस प्रेम कौ प्रेमा ।
पीवत ताहि भूलि गये नेमा ।।121।।
तैसी सखी रहैं दिन-राती ।
हित 'ध्रुव' जुगल नेह मदमाती ।।122।।
दोहा
रसनिधि रसिक किशोर विवि, सहचरि परम प्रवीन ।
महा प्रेम रस मोद में, रहत निरंतर लीन ।।123।।
चौपाई
प्रेम बात कछु कही न जाई ।
उलटी चाल तहाँ सब माई ।।124।।
प्रेम बात सुनि बौरा होई ।
तहाँ सयान रहै नहिं कोई ।।125।।
तन-मन-प्रान तिही छिन हारै ।
भली बुरी कछुवै न बिचारै ।।126।।
ऐसौ प्रेम उपजिहै जबही ।
हित 'ध्रुव' बात बनैंगी तबही ।।127।।
ताकौ जतन न दीसत कोई ।
कुँवरि कृपा तें कहा न होई ।।128।।
वृंदावन रस सब तें न्यारौ ।
प्रीतम तहाँ अपुनपौ हारौ ।।129।।
श्रीहरिवंश चरन उर धरई ।
तब या रस में मन अनुसरई ।।130।।
मो मति कवन कहै यह वानी ।
हरिवंश चरन बल कछुक बखानी ।।131।।
जुगल प्रेम मन ही में राखै ।
अनमिलि सौं कबहूँ नहिं भाषै ।।132।।
दोहा
पिय प्यारी कौ प्रेम रस, सकहि तौ मन में राखि ।
या रस के भेदी बिना, काहू सौं जिनि भाखि ।।133।।
चौपाई
प्रेम बात आनँद मय माई ।
ताहि सुनत हिय नैंन सिराई ।।134।।
जहाँ लगि सुख कहियत जग माँहीं ।
प्रेम समान और कछु नाँहीं ।।135।।
यह रस जाके उर नहिं आयौ ।
तेहि जग जनम लै वृथा गमायौ ।।136।।
सब रस में देखै अवगाही ।
सबकौ सार प्रेम रस आही ।।137।।
प्रेम छटा जेहि उर पर परई ।
सो सुख स्वाद सबै परिहरई ।।138।।
दोहा
जेहि दुख सम नहि और सुख, सुख की गति कहै कौन ।
वारि डारि 'ध्रुव' प्रेम पर, राज चतुर्दश भौंन ।।139।।
चौपाई
जहाँ लगि उज्ज्वल निर्मलताई ।
सरस सनिग्ध सहज मृदुलाई ।।140।।
मादिक मधुर माधुरी अंगा ।
दुर्लभता के उठत तरंगा ।।141।।
नौतन नित्य छिनहि-छिन माँहीं।
इक रस रहत घटत रुचि नाँहीं ।।142।।
अतिहि अनूप सहज स्वछंदा ।
पूरन कला प्रेम वर चंदा ।।143।।
सब गुन तें ताकी गति न्यारी ।
जाके बस भये लाल विहारी ।।144।।
दोहा
कहि न सकत रसना कछू, प्रेम सार आनंद ।
को जानै ध्रुव प्रेम रस, बिनु वृंदावन-चंद ।।145।।
चौपाई
प्रेम की छटा बहुत विधि आही ।
समुझि लई जिन जैसी चाही ।।146।।
अद्भुत सरस प्रेम निज सोई ।
चित्त चलन की जेहि गति खोई ।।147।।
रसिक-रसिकनी गुन अनुरागे ।
एक प्रेम दंपति मन पागे ।।148।।
इक छत सार प्रेम रस धारा ।
जुगल किशोर निकुंज-विहारा ।।149।।
यह विहार जाके उर आवै ।
ताहि न बात दूसरी भावै ।।150।।
औरौ भजन आहिं बहुतेरे ।
ते सब प्रेम-भजन के चेरे ।।151।।
दोहा
नारदादि सनकादि सब, उद्धव अरु ब्रह्मादि ।
गोपिन कौ सुख देखि किये, भजन आपनौ बादि ।।152।।
चौपाई
तिन गोपिनु ते दुर्लभ माई ।
नित्य-विहार सहज सुखदाई ।।153।।
शिव श्री पति जद्दपि ललचाहीं ।
मन प्रवेस तिनहूँ कौ नाहीं ।।154।।
ऐसै रसिक किशोर विहारी ।
उज्वल प्रेम विहार अहारी ।।155।।
अति आसक्त परस्पर प्यारे ।
एक सुभाव दुहुँनि मन हारे ।।156।।
रस में बढ़ी नेह की बेली ।
तेहि अवलंबे नवल-नवेली ।।157।।
दोहा
हित 'ध्रुव' दुर्लभ सबनि तें, नित्य विहार सरूप ।
ललितादिक निज सहचरी, सो सुख लहति अनूप ।।158।।
चौपाई
दुर्लभ कौं दुर्लभ अति माई ।
वृंदाविपिन सहज सुखदाई ।।159।।
बेलि फूल फल ललित तमाला ।
प्रेम सुधा सींचत सब काला ।।160।।
मृगी विहंगी सखी अपारा ।
सबकै यहि ठाँ यहै अहारा ।।161।।
नित्य किशोर एक रस भीने ।
तन-मन प्रॉन नेह बस कीने ।।162।।
इहि बिधि बिलसत प्रेमहि सजनी।
जानत नहिं कित बासर-रजनी ।।163।।
नेह मंजरी' हित 'ध्रुव' गावै ।
दंपति प्रेम माधुरी पावै ।।164।।
दोहा
प्रेम धाम वृंदाविपिन, मध्य मधुर वर जोर ।
सरिता रस सिंगार की, जगमगात चहूँ ओर ।।165।।
प्रेममई दोऊ लाल, प्रेममई सहचरि जहाँ ।
सेवत हैं सब काल, प्रेम मई वृंदाविपिन ।।166।।
सब सब पावत ईश्वर्यता, ठाढ़ी सेवत दूर ।
परसन पावत कबहूँ नहिं, श्रीवृंदावन-धूरि ।।167।।
ब्रह्म जोति को तेज जहाँ, जोगेश्वर धरैं ध्यान ।
ताही कौ आवरन तहाँ, नहिं पावै कोऊ जान ।।168।।
नेह मंजरी' मंजु रस, मंजुल कुंज-विलास ।
जेहि रस के गावत सुनत, रसिकनि होत हुलास ।।169।।
रूप रंग की बेलि मृदु, छबि के लाल तमाल ।
नेह मंजरी' दुहुँनि में, हरी रहत सब काल ।।170।।
जै जै श्री नेहमंजरी लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
चौपाई
वृंदावन सोभा की सींवाँ ।
विहरत दोउ मेलि भुज ग्रीवाँ ।।1।।
राजत तरुन किशोर तमाला ।
लपटी कंचन-बेलि रसाला ।।2।।
अरुन पीत सित फूलनि छाये ।
मनौं बसंत निज धाम बनाये ।।3।।
बरन-बरन के फूलनि फूली ।
जहाँ-तहाँ लता प्रेम-रस झूली ।।4।।
तीन भाँति के कमल सुहाये ।
जल थल विकसि रहे मन भाये ।।5।।
बहुत भाँति के पंछी बोलैं ।
मोर मराल भरे रस डोलैं ।।6।।
त्रिविध पवन संतत तहाँ रहहीं ।
जैसी रुचि तैसी ही बहहीं ।।7।।
हेम बरन अद्भुत धर माई ।
हीरनि खचित अधिक झलकाई ।।8।।
रज कपूर की तहाँ सुहाई ।
सौरभ मय संतत सुखदाई ।।9।।
तरनि-सुता चहुँ दिशि फिरि आई ।
मनौं नीलमणि-माल बनाई ।।10।।
(श्री) वृंदावन की छबि है जैसी ।
कापै कही जात है तैसी ।।11।।
दोहा
फूल जहाँ-तहाँ देखिये, श्रीवृंदावन माँहि ।
द्रुम बेली खग सहचरी, बिना फूल कोउ नाहिं ।।12।।
चौपाई
सुंदर सहज छबीली जोरी ।
सहज प्रेम के रँग में बोरी ।।13।।
खेलत फिरत निकुंजनि खोरी ।
एक वैस पिय कुँवरि किशोरी ।।14।।
तैसीय संग सहचरी भोरी ।
बँधी बंक चितवनि की डोरी ।।15।।
बिनु प्राननि डोलति सँग लागी ।
प्रेम रूप के रँग अनुरागी ।।16।।
महा प्रेम की रासि रँगीले ।
चित्त हरन दोऊ छैल छबीले ।।17।।
जहाँ-जहाँ चरन धरत सुखदाई ।
झरि-झरि रूप परत तहाँ माई ।।18।।
जो तेहि ठाँ ह्वै देखै आई ।
तन की ताहि भूलि सुधि जाई ।।19।।
नव किशोर बरनैं क्यौं जाँही ।
प्रेम रूप की सींवा नाहीं ।।20।।
तिनकौ रूप कहन को पारै ।
जो देखै सो पहिलै हारै ।।21।।
ऐसै दोऊ आप में राते ।
अहर्निसि रहत एक रस माते ।।22।।
अंग-अंग बिवस और सुधि नाँही ।
प्रेम रसासव पान कराहीं ।।23।।
अद्भुत रस पीवत हैं दोऊ ।
तिन में त्रिपित होत नहिं कोऊ ।।24।।
दोहा
मत्त परस्पर रहत 'ध्रुव', एक प्रेम रँग-रात ।
अति सुरंग लोइनि रहे, दिन अनुराग चुचात ।।25।।
चौपाई
हाव-भाव गुन सींव रँगीली ।
मुख पर पानिप झलक छबीली ।।26।।
बैठे कुँवर सोई छबि देखैं ।
लोभी नैंन न परत निमेषैं ।।27।।
रहे चकित ह्वै रसिक बिहारी ।
रूप-छटा नहिं जात संभारी ।।28।।
सहजहि प्रेम ढार ढरि जाँही ।
तेहि रस जानत घाम न छाँही ।।29।।
छिन-छिन प्रति रुचि बाढ़ै भारी ।
रही भूलि सो प्रेम निहारी ।।30।।
कबहूँ लै मृदु कुसुम सुरंगनि ।
गुहि भूषन बानत सब अंगनि ।।31।।
वारि-वारि पीवत पिय पानी ।
चितै कुँवरि कछु इक मुसिकानी ।।32।।
छबि सींवाँ भुज-लतनि पियारी ।
छबि तमाल पिय भरे अंकवारी ।।33।।
महा मधुर रस जुगल-बिहारा ।
जहाँ लगि प्रेम सबनि कौ सारा ।।34।।
रहत लीन ह्वै दीन रँगीलौ ।
नख सिख सुंदर रसिक रसीलौ ।।35।।
तिनके प्रेम प्रेम बस कीनी ।
सखि सौं सखी कहत रँग भीनी ।।36।।
दोहा
जद्दपि मन चंचल हुतौ, मोहयौ अद्भुत रूप ।
बिसरि गई सब चतुरता, परत प्रेम के कूप ।।37।।
चौपाई
प्रिया वदन सुंदर अति राजै ।
सहज रूप कौ चंद बिराजै ।।38।।
मुसिकनि मंद दसन दुति न्यारी ।
तापर दामिनि कोटिक वारी ।।39।।
झलक कपोलनि की चिकनाई ।
अँखिया रपटि गिरतिं तहाँ माई ।।40।।
अरुण असित सित नैंन सलौनैं ।
छ्वै-छ्वै जात हैं काननिं कौंनैं ।।41।।
सहज चपल इत उतहि निहारैं ।
बरसत मनु अनुराग की धारैं ।।42।।
दोहा
रंग भरे अरु रस भरे, सरस छबीले नैंन ।
सींचत पिय हिय कमल कौं, नेह-नीर मृदु सैंन ।।43।।
चौपाई
अति अनूप बैंदी जगमगै ।
चितै-चितै पिय पाँइनि लगै ।।44।।
नासा बेसरि मोती झलकै ।
मनौं रूप की आभा छलकै ।।45।।
अद्भुत रूप मेह सो बरसै ।
तऊ कुँवर चातिक ज्यौं तरसै ।।46।।
छबि डोलै चरननि सौं लागी ।
उपमा सबै देखि यह भागी ।।47।।
अद्भुत सहज रूप की माला ।
ऐसी कुँवरि किसोरी बाला ।।48।।
पहिरि कुँवर छिन छिनहि सँभारै ।
ऐसौ लोभ न नैंक उतारै ।।49।।
कुँवर प्रेम कौ सागर राजै ।
प्रिया-प्रेम तहँ भँवर बिराजै ।।50।।
ज्यौं सब जल फिरि-फिरि तहाँ परही ।
ऐसैं लाल प्रिया दिस ढरही ।।51।।
दोहा
प्राननि हूँ के प्रान, पिय की सर्वस लाड़िली ।
तिनकैं नहिं गति आँनि, देखि-देखि जीवत सखी ।।52।।
चौपाई
लालहि प्रिया लगति अति प्यारी ।
तापर प्रान करत बलिहारी ।।53।।
जहँ-जहँ चरन धरति सुकुँवारी ।
सो ठाँ चूँबत लाल बिहारी ।।54।।
प्रेम अटक की अटपटी रीती ।
जाने सो जाके उर बीती ।।55।।
कहिबै कौं नहिं प्रेम के बैंना ।
मन समुझै कै दोऊ नैंना ।।56।।
जेहि-जेहि सुमन सुरंग की ओरैं ।
चितवत नैंकु नैंन की कोरैं ।।57।।
धाइ कुँवर तेहि फूलहि लावै ।
मन सेवा कै प्रियहि रिझावै ।।58।।
प्रीति रीति को जानै माई ।
बिन पिय कुँवर रसिक सुखदाई ।।59।।
मानत है धनि भाग बड़ाई ।
ऐसी कुँवरि किशोरी पाई ।।60।।
भये दीन यौं तजी बड़ाई ।
पुनि ताकी बातैं न सुहाई ।।61।।
अब मोकौं कछु और न चहिये ।
नैंननिं में अंजन है रहियै ।।62।।
ऐसै नैंन लगैं सखि प्यारे ।
कैसैं रहैं आप ते न्यारे ।।63।।
ऐसी न होइ तौ यह उर धरहीं ।
मोही तन वे चितयौ करहीं ।।64।।
घन्य सोई छिन पल सखि मेरैं ।
कुँवरि नैंन भरि मोतन हेरैं ।।65।।
दोहा
कोटि काम सुख होत हैं, हँसि चितवति पिय ओर ।
भूलि जात तन की दसा, परसे प्रेम- झकोर ।।66।।
चौपाई
कुँवर-प्रेम जब मन में आयौ ।
बचन किशोरी कहन न पायौ ।।67।।
भरि हीयौ अति ही अकुलानी ।
पिय किशोर के उर लपटानी ।।68।।
फिरि गयौ प्रेम दुहुँनि पर माई ।
अपनी-अपनी सुधि बिसराई ।।69।।
पिय-पिय प्रिया कहत सुकुँवारी ।
रहि गये ऐसैं भरि अँकवारी ।।70।।
प्रेम-नीर उर अंचल भीनें ।
चितवत नैंन चकोरहिं कीनें ।।71।।
दोहा
सहज रँगीली लाड़िली, सहज रँगीलौ लाल ।
सहज प्रेम की बेलि मनौं, लपटी प्रेम-तमाल ।।72।।
चौपाई
देखि सखी तहँ सबै भुलानी ।
एक रही मनौं चित्र की बानी ।।73।।
एकनि के नैंननिं जल ढरहीं ।
मनौं प्रेम के झरना झरहीं ।।74।।
एक गिरी धर अति मुरझाँनी ।
रहि गई एक लता लपटानी ।।75।।
भइ अचेत पुनि चेत निहारै ।
तब सबहिन मिलि आइ सँभारे ।।76।।
देखे दोऊ उर में उरझाने ।
तब सबहिनि के नैंन सिराने ।।77।।
दोहा
जुगल रसिक सिरमौर, सब सखियनि के प्रान हैं ।
नाहिंन है गति और, तिनहीं के सुख सौं रँगी ।।78।।
चौपाई
महा प्रेम गति सब तें न्यारी ।
पिय जानै कै प्रॉन पियारी ।।79।।
अरुझे मन सुरझत नहि कैहूँ ।
जेहि अँग ढरत होत सुख तैहूँ ।।80।।
एकै रुचि दुहुँ में सखि बाढ़ी ।
परि गई प्रेम ग्रंथि अति गाढ़ी ।।81।।
देखत-देखत कल नहिं माई ।
तिनकौ प्रेम कयौ नहि जाई ।।82।।
सहज सुभाइ अनमनी देखैं ।
निमिषनि कोटि कलप सम लेखैं ।।83।।
हँसि चितवत जब प्रीतम माँहीं ।
सोई कलप निमष ह्वै जाँहीं ।।84।।
खेलन हँसन लाल कौं भावै ।
नेह की देवी नितहि मनावै ।।85।।
कौतुक प्रेम छिनहि-छिन होई ।
यह रस समुझै बिरला कोई ।।86।।
ज्यौं-ज्यौं रूपहि देखत माई ।
प्रेम-तृषा की ताप न जाई ।।87।।
दोहा
प्रेम तृषा की ताप ध्रुव, कैसे हुँ कही न जाइ ।
रूप-नीर छिरकत रहैं, तऊ न नैंन अघाँइ ।।88।।
चौपाई
बिच-बिच उठत हैं प्रेम तरंगा ।
खेलत हँसत मिलत अँग- अंगा ।।89।।
नवल राधिका-वल्लभ जोरी ।
दूलहु नित्य दुलहिनी गोरी ।।90।।
सोभित नित्य सहाने बागे ।
नये नेह के रस अनुरागे ।।91।।
खेलत-खेल तहाँ मन भाये ।
यह कौतुक कबहूँ न अघाये ।।92।।
नेह-मंजरी सहजहि भई ।
हरी एक रस छिन-छिन नई ।।93।।
सींचत चाह चौंप के जल सौं ।
लगि रहे दृग कमलनि के दल सौं ।।94।।
दोहा
श्री राधावल्लभ लाल, रसिक रँगीले विवि कुँवर ।
परे प्रेम के ख्याल, रुचत न तिनकौं और कछु ।।95।।
चौपाई
नव निकुंज रँग-सँग चित्रसारी ।
राजत नवल कुँवरि सुकुँवारी ।।96।।
रस-बिहार की चौपर खेलैं ।
दोउ प्रवीन अंसनि भुज मेलैं ।।97।।
सखियनि तलप बिसात बनाई ।
कहि न जाइ सोभा कछु माई ।।98।।
प्यासे नैंन कटाछनि ढारैं ।
हाव-भाव रँग-रंग की सारैं ।।99।।
जो अँग लालहि परस्यौ भावै ।
समुझि किशोरी ताहि दुरावै ।।100।।
घात अनेक मन में उपजावै ।
हँसै कुँवरि जब नहिं बनि आवै ।।101।।
हारि मानि पग परत बिहारी ।
रसिक सिरोमनि की बलिहारी ।।102।।
नैंननिं सैंन कछुक मुसिकानी ।
मैंन खेल रस रैंन न जाँनी ।।103।।
उरज कपोल झलक छबि छाई ।
चितवत लाल विवस ह्वै जाई ।।104।।
तबहि कुँवरि भरि लिये अँकवारी ।
करुना करि दियौ अधर सुधारी ।।105।।
दोहा
नागरि कोक कलानि में, बिलसत सुरत-बिहार ।
रोचक रव रसना तहाँ, अरु नूपुर झनकार ।।106।।
चौपाई
नवल निकुंज रँगीले दोऊ ।
तेहि ठाँ सखी नाहिनैं कोऊ ।।107।।
रसिक लाल ऐसै रँग भीनें ।
तन-मन प्रॉन प्रिया कर दीनें ।।108।।
कबहूँ रूप सखी कौ धरही ।
रुचि लै सब बातनिं कौं करही ।।109।।
नख-शिख लौं सिंगार बनावै ।
याही सेवा में सुख पावै ।।110।।
अद्भुत बैंनी गूँथि बनाई ।
मनौं अलिनु की सरैंनी आई ।।111।।
दोहा
बिच-बिच फूल सुरंग दै, गूँथी कबरि बनाइ ।
मिलि अनुराग सिँगार दोउ, गही सरन मनौं आइ ।।112।।
चौपाई
नैंननिं अंजन रेखा दीनी ।
तबहि कुँवरि कर आरसी लीनी ।।113।।
रीझि अंक लालन भरि लीनौ ।
अति हित सौं अधरामृत दीनौ ।।114।।
समुझि सनेह नैंन भरि आये ।
मनौ कंज आनँद जल छाये ।।115।।
बिवस होइ तब उर लपटाने ।
बीते कलप न नैंकु अघाने ।।116।।
रहत यहै भ्रम पिय मन माँही ।
प्रान-प्रिया मोहिं मिली कि नाहीं ।।117।।
दोहा
देखत-देखत हँसत ही, गये कलप बहु बीति ।
पल समान जाने नहीं, बिलसत दिन यह रीति ।।118।।
चौपाई
कौन प्रेम तेहि ठाँ कौ कहियै ।
दुहूँ कोद चितवत सखि रहियै ।।119।।
नित्त प्रेम एकै रस धारा ।
अति अगाध तेहि नाहिंन पारा ।।120।।
महा-मधुर रस प्रेम कौ प्रेमा ।
पीवत ताहि भूलि गये नेमा ।।121।।
तैसी सखी रहैं दिन-राती ।
हित 'ध्रुव' जुगल नेह मदमाती ।।122।।
दोहा
रसनिधि रसिक किशोर विवि, सहचरि परम प्रवीन ।
महा प्रेम रस मोद में, रहत निरंतर लीन ।।123।।
चौपाई
प्रेम बात कछु कही न जाई ।
उलटी चाल तहाँ सब माई ।।124।।
प्रेम बात सुनि बौरा होई ।
तहाँ सयान रहै नहिं कोई ।।125।।
तन-मन-प्रान तिही छिन हारै ।
भली बुरी कछुवै न बिचारै ।।126।।
ऐसौ प्रेम उपजिहै जबही ।
हित 'ध्रुव' बात बनैंगी तबही ।।127।।
ताकौ जतन न दीसत कोई ।
कुँवरि कृपा तें कहा न होई ।।128।।
वृंदावन रस सब तें न्यारौ ।
प्रीतम तहाँ अपुनपौ हारौ ।।129।।
श्रीहरिवंश चरन उर धरई ।
तब या रस में मन अनुसरई ।।130।।
मो मति कवन कहै यह वानी ।
हरिवंश चरन बल कछुक बखानी ।।131।।
जुगल प्रेम मन ही में राखै ।
अनमिलि सौं कबहूँ नहिं भाषै ।।132।।
दोहा
पिय प्यारी कौ प्रेम रस, सकहि तौ मन में राखि ।
या रस के भेदी बिना, काहू सौं जिनि भाखि ।।133।।
चौपाई
प्रेम बात आनँद मय माई ।
ताहि सुनत हिय नैंन सिराई ।।134।।
जहाँ लगि सुख कहियत जग माँहीं ।
प्रेम समान और कछु नाँहीं ।।135।।
यह रस जाके उर नहिं आयौ ।
तेहि जग जनम लै वृथा गमायौ ।।136।।
सब रस में देखै अवगाही ।
सबकौ सार प्रेम रस आही ।।137।।
प्रेम छटा जेहि उर पर परई ।
सो सुख स्वाद सबै परिहरई ।।138।।
दोहा
जेहि दुख सम नहि और सुख, सुख की गति कहै कौन ।
वारि डारि 'ध्रुव' प्रेम पर, राज चतुर्दश भौंन ।।139।।
चौपाई
जहाँ लगि उज्ज्वल निर्मलताई ।
सरस सनिग्ध सहज मृदुलाई ।।140।।
मादिक मधुर माधुरी अंगा ।
दुर्लभता के उठत तरंगा ।।141।।
नौतन नित्य छिनहि-छिन माँहीं।
इक रस रहत घटत रुचि नाँहीं ।।142।।
अतिहि अनूप सहज स्वछंदा ।
पूरन कला प्रेम वर चंदा ।।143।।
सब गुन तें ताकी गति न्यारी ।
जाके बस भये लाल विहारी ।।144।।
दोहा
कहि न सकत रसना कछू, प्रेम सार आनंद ।
को जानै ध्रुव प्रेम रस, बिनु वृंदावन-चंद ।।145।।
चौपाई
प्रेम की छटा बहुत विधि आही ।
समुझि लई जिन जैसी चाही ।।146।।
अद्भुत सरस प्रेम निज सोई ।
चित्त चलन की जेहि गति खोई ।।147।।
रसिक-रसिकनी गुन अनुरागे ।
एक प्रेम दंपति मन पागे ।।148।।
इक छत सार प्रेम रस धारा ।
जुगल किशोर निकुंज-विहारा ।।149।।
यह विहार जाके उर आवै ।
ताहि न बात दूसरी भावै ।।150।।
औरौ भजन आहिं बहुतेरे ।
ते सब प्रेम-भजन के चेरे ।।151।।
दोहा
नारदादि सनकादि सब, उद्धव अरु ब्रह्मादि ।
गोपिन कौ सुख देखि किये, भजन आपनौ बादि ।।152।।
चौपाई
तिन गोपिनु ते दुर्लभ माई ।
नित्य-विहार सहज सुखदाई ।।153।।
शिव श्री पति जद्दपि ललचाहीं ।
मन प्रवेस तिनहूँ कौ नाहीं ।।154।।
ऐसै रसिक किशोर विहारी ।
उज्वल प्रेम विहार अहारी ।।155।।
अति आसक्त परस्पर प्यारे ।
एक सुभाव दुहुँनि मन हारे ।।156।।
रस में बढ़ी नेह की बेली ।
तेहि अवलंबे नवल-नवेली ।।157।।
दोहा
हित 'ध्रुव' दुर्लभ सबनि तें, नित्य विहार सरूप ।
ललितादिक निज सहचरी, सो सुख लहति अनूप ।।158।।
चौपाई
दुर्लभ कौं दुर्लभ अति माई ।
वृंदाविपिन सहज सुखदाई ।।159।।
बेलि फूल फल ललित तमाला ।
प्रेम सुधा सींचत सब काला ।।160।।
मृगी विहंगी सखी अपारा ।
सबकै यहि ठाँ यहै अहारा ।।161।।
नित्य किशोर एक रस भीने ।
तन-मन प्रॉन नेह बस कीने ।।162।।
इहि बिधि बिलसत प्रेमहि सजनी।
जानत नहिं कित बासर-रजनी ।।163।।
नेह मंजरी' हित 'ध्रुव' गावै ।
दंपति प्रेम माधुरी पावै ।।164।।
दोहा
प्रेम धाम वृंदाविपिन, मध्य मधुर वर जोर ।
सरिता रस सिंगार की, जगमगात चहूँ ओर ।।165।।
प्रेममई दोऊ लाल, प्रेममई सहचरि जहाँ ।
सेवत हैं सब काल, प्रेम मई वृंदाविपिन ।।166।।
सब सब पावत ईश्वर्यता, ठाढ़ी सेवत दूर ।
परसन पावत कबहूँ नहिं, श्रीवृंदावन-धूरि ।।167।।
ब्रह्म जोति को तेज जहाँ, जोगेश्वर धरैं ध्यान ।
ताही कौ आवरन तहाँ, नहिं पावै कोऊ जान ।।168।।
नेह मंजरी' मंजु रस, मंजुल कुंज-विलास ।
जेहि रस के गावत सुनत, रसिकनि होत हुलास ।।169।।
रूप रंग की बेलि मृदु, छबि के लाल तमाल ।
नेह मंजरी' दुहुँनि में, हरी रहत सब काल ।।170।।
जै जै श्री नेहमंजरी लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
29. वन विहार लीला
दोहा
रसिक नृपति हरिवंश जू, परम कृपाल उदार ।
श्री राधावल्लभ लाल जस, प्रगट कियौ रस सार ।।1।।
वन विहार छवि कहा कहौं, सोभा बढ़ी बिशाल ।
मानौं ब्याहन चढ़े हैं, श्रीराधावल्लभ लाल ।।2।।
मौरी-मौर जराव के, अरु मोतिनु के हार ।
दुलहिनि दूलहु अति बने, रूप-सींव सुकुँवार ।।3।।
फूलनि के बने सेहरे, झलकत प्रगट सुहाग ।
बसन सहाने फबे तनु, मनु पहिर्यौ अनुराग ।।4।।
नख-सिख लौं भूषन सजे, फबे छबीली भाँति ।
झलमलात अंग-अंग प्रति, मनि-रतननि की काँति ।।5।।
कहा कहौं बानिक बनक, सुंदर परम उदार ।
चरननि तर लोटत बिवस, निरखि रूप सिंगार ।।6।।
जुरी बरात सखीनु की, कोटिन जूथ अपार ।
उमड़े छबि के सिंधु मनु, मधि दूलहु सुकुँवार ।।7।।
सब के सीसनि रही फबि, सीस-फूलनि की पाँति ।
मनौं छत्र सिंगार के, झलकि रहे बहु भाँति ।।8।।
किंकिनि धुनि मनौं दुंदुभी, बाजत है चहुँ ओर ।
कहा कहौं कहि सकत नहिं, आनँद बढ्यौ न थोर ।।9।।
अंगनि छबि भूषन झलक, फैलि रही बन माहिं ।
ससि-सूरज दुति जहाँ लगि, निरखत सबै लजाहिं ।।10।।
छाँड़त छबि की फुलझरी, मदन हवाई-दार ।
निसि तैं मानौं दिन भयौ, कोटि भान उजियार ।।11।।
छुटत अलौकिक भौंचपा, जहँ-तहँ फैली जोति ।
कंचन की बरसा मनौं, वृंदावन में होति ।।12।।
कुंज-कुंज ऐसी बनी, मानौं मत्त मतंग ।
लागत ही जनौं पवन के, निर्त्तत लता सुरंग ।।13।।
फूले द्रुम फूली लता, फूले जहाँ-तहाँ फूल ।
बहुत रंग वृंदा-विपिन, पहिरैं मनौं दुकूल ।।14।।
उज्ज्वल परम सुरंग अति, नव कपूर की धूरि ।
बढ़ी धूँधि कहत न बनै, रह्यौ अकास सब पूरि ।।15।।
बरसा रूप-सुहाग की, बरसत बन चहुँ ओर ।
जहाँ-तहाँ आनंद भरि, निर्त्तत मोरी-मोर ।।16।।
रितुराज पखावज लियैं कर, बीना शरद प्रवीन ।
ग्रीषम ताल रसाल धरैं, पावस छाया कीन ।।17।।
कीर कपोती भँवर पिक, करत मधुर सुर गान ।
भींजे सब आनंद में, उपजत नव-नव तान ।।18।।
उड्यौ गुलाल सुरंग बहु, सब बन छयौ सुहाग ।
मानौं द्रुम-द्रुम तें भयौ, प्रगट रंग अनुराग ।।19।।
कोलाहल सब द्विजनि कौ, तहाँ नाहिनैं थोर ।
स्रवननि सुनियत नाहिं कछु, ऐसौ ह्वै रह्यौ सोर ।।20।।
चौंर चलत सखियनि करनि, धुज पताक बहुरंग ।
सोभा कौ सागर बढ्यौ, मानौं उठत तरंग ।।21।।
फूलि-फूलि फूली फिरैं, देखत जहाँ-तहाँ फूल ।
झलमलात दीपावली, मनिमय जमुना- कूल ।।22।।
कुंज-कुंज उजियार मनौं, कोटिक भान प्रकास ।
मंद सुगंध समीर बहै, सब बन भयौ सुवास ।।23।।
बंदी जन सब खग मनौं, कहत हैं बिरद रसाल ।
गावत रागिनि-राग मिलि, गुहि रागनि की माल ।।24।।
चतुरई चित्र करत फिरत, भींनी रँग अनुराग ।
उज्जलता कौं सँग लिये, बँधी प्यार के ताग ।।25।।
कुंज महल रतननि खच्यौ, कीने चित्र रसाल ।
चहूँ ओर रही झलकि कै, झालरि मोतिनु-माल ।।26।।
झूमि रही फूलनि लता, बहु विधि रंग अनेक ।
फूले आनँद रंग भरि, निर्त्तत केकी-केक ।।27।।
ललितादिक निज सहचरी, जुरी तहाँ सब आनि ।
कोलाहल आनंद कौ, कहाँ लगि सकौं बखानि ।।28।।
बेदी सेज सुदेस रचि, फूलनि आसन बानि ।
नव दूलहु दुलहिनि नवल, बैठाए तहाँ आनि ।।29।।
सखियन अंचल दुहुँनिं के, लै गठजोरौ कीन ।
मिलवाई ग्रीवनिं भुजनि, छबि सौं भाँवरि दीन ।।30।।
सोभा 'ध्रुव' तेहि समैं की, बरनै ऐसौ कौन ।
रसना कोटि धरै सरसुती, तऊ ह्वै रहै मौन ।।31।।
झीने अंचल में चपल, कजरारे कल नैंन ।
निरखत पिय व्याकुल भये, गहयौ आइ मन मैंन ।।32।।
अति सलज्ज सुकुँवारि रही, नख-सिख लौं अँग ढाँपि ।
छुयौ चहत छ्वै सकत नहिं, उठत नवल कर काँपि ।।33।।
सखियनि के उर फूल भई, दूधा-भाती हेत ।
ऐसी बैठी मुरि कुँवर, अंचल छुवन न देत ।।34।।
सखियनि कीने जतन बहु, जुरवाये चख चारि ।
रहि गये चितवत चित्र से, मोहन वदन निहारि ।।35।।
निरखत छवि कौ ससि-वदन, बाढ़ी फूल अपार ।
सुंदर मुख दिखरावनी, पहिरायौ हित-हारि ।।36।।
घूँघट पट के छुवत ही, मुरि बैठि सुकुँवारि ।
रसिक लाल पाइनि परत, सकत न धीरज धार ।।37।।
समुझि दसा पिय की तबहिं, चितई कछु मुसिकाइ ।
फूल्यौ पिय कौ हिय कमल, सो सुख कह्यौ न जाइ ।।38।।
नेकहिं घूँघट के खुलत, भयौ प्रकासित चंद ।
भई किशोर चकोर गति, परे प्रेम के फंद ।।39।।
रतननि के भाजन विविध, धरे सेज ढिंग आँनि ।
मधु मेवा फल अमृतमय, धरि-धरि राखे बाँनि ।।40।।
सौंधो पाँन सुगंध सब, रचि-रचि धरे बनाइ ।
सखियनि कौ सुख कहा कहौं, तेहि रस रहीं समाइ ।।41।।
मंगल रैंन सुहाग कौ, गावत सखी प्रवीन ।
प्रथम बिलास अनंग रस, बाढ्यौ रंग नवीन ।।42।।
लई लाड़िली अंक भरि, कहा कहौं आनंद ।
मानौं छबि की चंद्रिका, लीनी गहि छबि-चंद ।।43।।
बढ़ गयौ ऐसौ प्रेम-रस, बिदा लाज की कीन ।
चितवनि मुसिकनि सहज की, बतियनि माँहि प्रवीन ।।44।।
कोक-विलास कलानि में, दोऊ प्रिय समतूल ।
कहा कहौं तेहि समय की, बाढ़ी जो उर फूल ।।45।।
बर बिहार रस रंग में, नागरि परम उदारि ।
सींचत पिय-हिय प्यार सौं लालच-लाल निहार ।।46।।
नवल रँगीली रँग भरी, रँग भरयौ मोहन लाल ।
बढ़ी दुहुँनि के हीय तें, केलि की बेलि रसाल ।।47।।
बतबतात मुसिकात दोऊ, अति छबि सौं लपटात ।
गौर स्याम तन रहे मिलि, अंग-अंग झलकात ।।48।।
दसनांचल अंजन लग्यौ, पलक पीक रस सार ।
दयौ बदले अनुराग के, अधरनि कौ सिंगार ।।49।।
बारनि हारनि की अरुझ, तन मन की अरुझानि ।
मानौं हाँसि सिंगार दोउ, मिली आपु में आनि ।।50।।
निसि बीती सब रंग में, उठे भोर सुकुँवार ।
सखी सबै अति सोहनी, राजति संग अपार ।।51।।
सुरँग सहाने तिलक पर, सुरंग चूनरी पाग ।
बाँहाँ-जोरी फिरत दोउ, भीने रस- अनुराग ।।52।।
लै-लै फूल सुरंग पिय, प्रियहि बनावत जात ।
अंगनि उरजनि छुवनि कौं, अति आतुर अकुलात ।।53।।
देखि विपिन जमुना पुलिन, ढरे कुटी की ओर ।
सोभा आवनि-चलनि फिर, जो 'ध्रुव' कहै सो थोर ।।54।।
दोहा कहे पचास पर, चारि विचारि निहारि ।
श्री राधावल्लभ लाल जस, पल-पल 'ध्रुव' उर धारि ।।55।।
वन-विहार लीला कही, जो सुनि है करि प्रीति ।
सहजहि ताके उपजिहै, श्री वृंदावन रस-रीति ।।56।।
जै जै श्री वन-विहार लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
दोहा
रसिक नृपति हरिवंश जू, परम कृपाल उदार ।
श्री राधावल्लभ लाल जस, प्रगट कियौ रस सार ।।1।।
वन विहार छवि कहा कहौं, सोभा बढ़ी बिशाल ।
मानौं ब्याहन चढ़े हैं, श्रीराधावल्लभ लाल ।।2।।
मौरी-मौर जराव के, अरु मोतिनु के हार ।
दुलहिनि दूलहु अति बने, रूप-सींव सुकुँवार ।।3।।
फूलनि के बने सेहरे, झलकत प्रगट सुहाग ।
बसन सहाने फबे तनु, मनु पहिर्यौ अनुराग ।।4।।
नख-सिख लौं भूषन सजे, फबे छबीली भाँति ।
झलमलात अंग-अंग प्रति, मनि-रतननि की काँति ।।5।।
कहा कहौं बानिक बनक, सुंदर परम उदार ।
चरननि तर लोटत बिवस, निरखि रूप सिंगार ।।6।।
जुरी बरात सखीनु की, कोटिन जूथ अपार ।
उमड़े छबि के सिंधु मनु, मधि दूलहु सुकुँवार ।।7।।
सब के सीसनि रही फबि, सीस-फूलनि की पाँति ।
मनौं छत्र सिंगार के, झलकि रहे बहु भाँति ।।8।।
किंकिनि धुनि मनौं दुंदुभी, बाजत है चहुँ ओर ।
कहा कहौं कहि सकत नहिं, आनँद बढ्यौ न थोर ।।9।।
अंगनि छबि भूषन झलक, फैलि रही बन माहिं ।
ससि-सूरज दुति जहाँ लगि, निरखत सबै लजाहिं ।।10।।
छाँड़त छबि की फुलझरी, मदन हवाई-दार ।
निसि तैं मानौं दिन भयौ, कोटि भान उजियार ।।11।।
छुटत अलौकिक भौंचपा, जहँ-तहँ फैली जोति ।
कंचन की बरसा मनौं, वृंदावन में होति ।।12।।
कुंज-कुंज ऐसी बनी, मानौं मत्त मतंग ।
लागत ही जनौं पवन के, निर्त्तत लता सुरंग ।।13।।
फूले द्रुम फूली लता, फूले जहाँ-तहाँ फूल ।
बहुत रंग वृंदा-विपिन, पहिरैं मनौं दुकूल ।।14।।
उज्ज्वल परम सुरंग अति, नव कपूर की धूरि ।
बढ़ी धूँधि कहत न बनै, रह्यौ अकास सब पूरि ।।15।।
बरसा रूप-सुहाग की, बरसत बन चहुँ ओर ।
जहाँ-तहाँ आनंद भरि, निर्त्तत मोरी-मोर ।।16।।
रितुराज पखावज लियैं कर, बीना शरद प्रवीन ।
ग्रीषम ताल रसाल धरैं, पावस छाया कीन ।।17।।
कीर कपोती भँवर पिक, करत मधुर सुर गान ।
भींजे सब आनंद में, उपजत नव-नव तान ।।18।।
उड्यौ गुलाल सुरंग बहु, सब बन छयौ सुहाग ।
मानौं द्रुम-द्रुम तें भयौ, प्रगट रंग अनुराग ।।19।।
कोलाहल सब द्विजनि कौ, तहाँ नाहिनैं थोर ।
स्रवननि सुनियत नाहिं कछु, ऐसौ ह्वै रह्यौ सोर ।।20।।
चौंर चलत सखियनि करनि, धुज पताक बहुरंग ।
सोभा कौ सागर बढ्यौ, मानौं उठत तरंग ।।21।।
फूलि-फूलि फूली फिरैं, देखत जहाँ-तहाँ फूल ।
झलमलात दीपावली, मनिमय जमुना- कूल ।।22।।
कुंज-कुंज उजियार मनौं, कोटिक भान प्रकास ।
मंद सुगंध समीर बहै, सब बन भयौ सुवास ।।23।।
बंदी जन सब खग मनौं, कहत हैं बिरद रसाल ।
गावत रागिनि-राग मिलि, गुहि रागनि की माल ।।24।।
चतुरई चित्र करत फिरत, भींनी रँग अनुराग ।
उज्जलता कौं सँग लिये, बँधी प्यार के ताग ।।25।।
कुंज महल रतननि खच्यौ, कीने चित्र रसाल ।
चहूँ ओर रही झलकि कै, झालरि मोतिनु-माल ।।26।।
झूमि रही फूलनि लता, बहु विधि रंग अनेक ।
फूले आनँद रंग भरि, निर्त्तत केकी-केक ।।27।।
ललितादिक निज सहचरी, जुरी तहाँ सब आनि ।
कोलाहल आनंद कौ, कहाँ लगि सकौं बखानि ।।28।।
बेदी सेज सुदेस रचि, फूलनि आसन बानि ।
नव दूलहु दुलहिनि नवल, बैठाए तहाँ आनि ।।29।।
सखियन अंचल दुहुँनिं के, लै गठजोरौ कीन ।
मिलवाई ग्रीवनिं भुजनि, छबि सौं भाँवरि दीन ।।30।।
सोभा 'ध्रुव' तेहि समैं की, बरनै ऐसौ कौन ।
रसना कोटि धरै सरसुती, तऊ ह्वै रहै मौन ।।31।।
झीने अंचल में चपल, कजरारे कल नैंन ।
निरखत पिय व्याकुल भये, गहयौ आइ मन मैंन ।।32।।
अति सलज्ज सुकुँवारि रही, नख-सिख लौं अँग ढाँपि ।
छुयौ चहत छ्वै सकत नहिं, उठत नवल कर काँपि ।।33।।
सखियनि के उर फूल भई, दूधा-भाती हेत ।
ऐसी बैठी मुरि कुँवर, अंचल छुवन न देत ।।34।।
सखियनि कीने जतन बहु, जुरवाये चख चारि ।
रहि गये चितवत चित्र से, मोहन वदन निहारि ।।35।।
निरखत छवि कौ ससि-वदन, बाढ़ी फूल अपार ।
सुंदर मुख दिखरावनी, पहिरायौ हित-हारि ।।36।।
घूँघट पट के छुवत ही, मुरि बैठि सुकुँवारि ।
रसिक लाल पाइनि परत, सकत न धीरज धार ।।37।।
समुझि दसा पिय की तबहिं, चितई कछु मुसिकाइ ।
फूल्यौ पिय कौ हिय कमल, सो सुख कह्यौ न जाइ ।।38।।
नेकहिं घूँघट के खुलत, भयौ प्रकासित चंद ।
भई किशोर चकोर गति, परे प्रेम के फंद ।।39।।
रतननि के भाजन विविध, धरे सेज ढिंग आँनि ।
मधु मेवा फल अमृतमय, धरि-धरि राखे बाँनि ।।40।।
सौंधो पाँन सुगंध सब, रचि-रचि धरे बनाइ ।
सखियनि कौ सुख कहा कहौं, तेहि रस रहीं समाइ ।।41।।
मंगल रैंन सुहाग कौ, गावत सखी प्रवीन ।
प्रथम बिलास अनंग रस, बाढ्यौ रंग नवीन ।।42।।
लई लाड़िली अंक भरि, कहा कहौं आनंद ।
मानौं छबि की चंद्रिका, लीनी गहि छबि-चंद ।।43।।
बढ़ गयौ ऐसौ प्रेम-रस, बिदा लाज की कीन ।
चितवनि मुसिकनि सहज की, बतियनि माँहि प्रवीन ।।44।।
कोक-विलास कलानि में, दोऊ प्रिय समतूल ।
कहा कहौं तेहि समय की, बाढ़ी जो उर फूल ।।45।।
बर बिहार रस रंग में, नागरि परम उदारि ।
सींचत पिय-हिय प्यार सौं लालच-लाल निहार ।।46।।
नवल रँगीली रँग भरी, रँग भरयौ मोहन लाल ।
बढ़ी दुहुँनि के हीय तें, केलि की बेलि रसाल ।।47।।
बतबतात मुसिकात दोऊ, अति छबि सौं लपटात ।
गौर स्याम तन रहे मिलि, अंग-अंग झलकात ।।48।।
दसनांचल अंजन लग्यौ, पलक पीक रस सार ।
दयौ बदले अनुराग के, अधरनि कौ सिंगार ।।49।।
बारनि हारनि की अरुझ, तन मन की अरुझानि ।
मानौं हाँसि सिंगार दोउ, मिली आपु में आनि ।।50।।
निसि बीती सब रंग में, उठे भोर सुकुँवार ।
सखी सबै अति सोहनी, राजति संग अपार ।।51।।
सुरँग सहाने तिलक पर, सुरंग चूनरी पाग ।
बाँहाँ-जोरी फिरत दोउ, भीने रस- अनुराग ।।52।।
लै-लै फूल सुरंग पिय, प्रियहि बनावत जात ।
अंगनि उरजनि छुवनि कौं, अति आतुर अकुलात ।।53।।
देखि विपिन जमुना पुलिन, ढरे कुटी की ओर ।
सोभा आवनि-चलनि फिर, जो 'ध्रुव' कहै सो थोर ।।54।।
दोहा कहे पचास पर, चारि विचारि निहारि ।
श्री राधावल्लभ लाल जस, पल-पल 'ध्रुव' उर धारि ।।55।।
वन-विहार लीला कही, जो सुनि है करि प्रीति ।
सहजहि ताके उपजिहै, श्री वृंदावन रस-रीति ।।56।।
जै जै श्री वन-विहार लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
30. रङ्गविहार लीला
दोहा
राजत छबि सौं रँगमगे, रँगमग्यौ सहज सिंगार ।
बैठे रँगमगी सेज पर, रँगमग्यौ रूप अपार ।।1।।
सखी एक दई आरसी, ललित लाड़िली पाँनि ।
तेहि छिन पिय कौ मन परयौ, द्वै छबि के बिच आनि ।।2।।
बढ़ी अधिक सोभा झलक, कुंज भवन रह्यौ छाइ ।
मानौं कोटिक रूप के, चंद उदै भये आइ ।।3।।
निरखि माधुरी सहज की, नैंन न मानत हार ।
बढ़ी तहाँ रुचि की नदी, धीरज कूल बिदार ।।4।।
पिय प्रवीन रस प्रेम में, चितवत भौंहनि भाइ ।
जिहि छिन जैसी होति रुचि, जानत त्यौंहि लड़ाइ ।।5।।
छिन छिन औरै-और छबि, पल-पल में गति और ।
नागर सागर रूप के, परम रसिक सिरमौर ।।6।।
कबहुँ लाड़िली होति पिय, लाल प्रिया ह्वै जात ।
नहिं जानत यह प्रेम रस, निसि-दिन कितहि विहात ।।7।।
सुरंग चूनरी एक में, रँग-भींने सुकुँवर ।
लपटे ऐसी भाँति सौं, नहिं समात बिच हार ।।8।।
इंद्रनील मनि पिय प्रिया, कोमल कुंदन-बेलि ।
लसति छबीली भाँति सौं, सुरत समर रस-केलि ।।9।।
लाल मगन सुख सेज पर, लटकत रही न सँभारि ।
रति नागरि अधरनि सुधा, प्यावति वदन निहारि ।।10।।
नैंन कटोरी रूप की, भरी प्रेम सद मोद ।
अद्भुत रुचि पीवत बढ़ी, आनँद रँग दुहुँ कोद ।।11।।
अंगनि की छबि माधुरी, निरखतहूँ न अघाहिं ।
नैंन-भँवर भूले फिरैं, रूप-कमल-बन माहिं ।।12।।
ऐसौ छिन ह्वै है कबहिं, कुँवरि अंक भरि लेहि ।
दसन खंड अति हेत हँसि, पिय मुख बीरी देहि ।।13।।
यह सोचत रहैं चित्त में, भूषन बसन बनाइ ।
पहिराऊँ अपने करनि, रहौं रीझि सुख पाइ ।।14।।
जद्दपि पिय देखत रहै, मन की सोच न जाइ ।
कैसैहूँ एक बार ये, देखैं नैंन अघाइ ।।15।।
अति आसक्त सनेह बस, मोहन रूप-निधान ।
तजि स्यानप राख्यौ न कछु, अपने तन-मन-प्राँन ।।16।।
सौरभता सुकुँवारि की, जब पावत सुकुँवार ।
फैलि परत जनु प्रेम रस, रहत न देह सँभार ।।17।।
अतिहि विवस ह्वै जात पिय, ऐसी भाँति अनूप ।
सुनि सखि तब ह्वै है कहा, जबहि देखिहै रूप ।।18।।
अधरनि अंगनि परसिवौ, तिनकौ यहै उपाय ।
चितवनि अति अनुराग की, लेत है पियहि जगाय ।।19।।
छिन छिन माँहिं अचेत है, पल-पल माँहिं सचेत ।
नहिं जानत या रंग में, गये कलप जुग केत ।।20।।
कुंडलिया
एक लाड़िली लाल में, अद्भुत सरस सनेह ।
रुचि तरंग पल पल बढ़ै, बरषत रस कौ मेह ।।
बरषत रस कौ मेह, बढ़ी सुख-सरिता भारी ।
मुसिकनि मनु छबि कमल, अंग फूली फुलवारी ।।
हाव भाव अंकुर नये, उपजत रंग अनेक ।
हित ध्रुव हितसौं बात करैं, तन-मन भये दोऊ एक ।।21।।
दोहा
अलक लड़ी सुख लाड़िली, अद्भुत रूप-निधान ।
मोहि रहे मोहन निरखि, भूले सबै सयान ।।22।।
तिनके रूपहि कहनि कौं, कितकि बुद्धि है मोर ।
रस गुन सींवा रूप की, बँधे नैंन की कोर ।।23।।
अति सुरंग मोतिनु सहित, बनी माँग रस-दैंन ।
मनौ हाँस अनुराग मिलि, राजत रसपति ऐंन ।।24।।
फबि रही गौर लिलाट पर, बैंदी की झलकानि ।
मनि अनुराग सुहाग की, मानौं प्रगटी आनि ।।25।।
उज्ज्वल स्याम सुरंग दृग, सने सनेह सलौंन ।
बार-बार परसत रहैं, अंचल स्रवननि-कौंन ।।26।।
कहि न सकत नासा बनिक, उन्नत सुमिलि अनूप ।
चितवत मोती की छबिहि, भूल्यौ रूपहि रूप ।।27।।
मधुमय अधर सुरंग मृदु, छबि सींवा सुकुँवारि ।
दसननि पंकति जोति पर, दामिनि अगनित वारि ।।28।।
उपमा सुंदर चिबुक की, सकत न उर में आनि ।
सोभा निधि अद्भुत मनौं, हरि-मन हीरा खानि ।।29।।
मुसिकनि आनँद फूल मनौं, चितवन सुख की सींव ।
द्वै लर मोतिनु पोत छबि, झलक रही मृदु ग्रींव ।।30।।
उरजनि की छबि कहा कहौं, तैसी झलकनि हीय ।
भूलत नहिं मन के करनि, धरे रहत है पीय ।।31।।
तन सौं सारी मिलि रही, सौंधे सनी सुरंग ।
मानौं सोभा छाइ रही, झलमलात अंग-अंग ।।32।।
रस भीनी झींनी बनी, अँगिया गोरे गात ।
अति सुदेस गाढ़ी कसनि, लसनि ललित उरजात ।।33।।
प्रीतम कौ चित मीन मनौं, परयौ नाभि-हृद माँहि ।
अति स्वादी सुख स्वाद रस, कैसैहुँ निकसत नाहिं ।।34।।
नख-सिख लौं दोउ अरुझि रहे, नैंकहुँ सुरझत नाहिं ।
ज्यौं-ज्यौं रुचि बाढ़ै अधिक, त्यौं-त्यौं अति उरझाहिं ।।35।।
जेहरि रीझे नूपुरनि, निमिष न छाँड़त पाइ ।
पाइल सुख की रासि तहँ, ते हरि रहे लुभाइ ।।36।।
चरननि हित जावक लियैं, ललन रहे अति सोहि ।
चित्र करत चित चित्र भयौ, छबि-चरित्र रहे जोहि ।।37।।
चाहि रहे छ्वावत चखनि, बढ्यौ प्रेम कौ प्यार ।
रुचि प्रवाह में परयौ मन, चूंबत बारंबार ।।38।।
रस भरी चितवनि नेह की, रँग भीनी मुसिकानि ।
जीवन कौ सुख सहज फल, यहै लेत पिय मानि ।।39।।
नैंकु कुँवरि मुरि सखी सौं, बात कही लगि कान ।
पिय की गति औरे भई, कोटिक विरह समान ।।40।।
पुनि-पुनि प्यारी प्यार सौं, रँवकि लिये उर लाइ ।
देखत मुख हिय दुख भयौ, नैंननिं जल भरे आइ ।।41।।
गहि कपोल सुंदर करनि, नैंननिं नैंन मिलाइ ।
अधरनि रस प्यावति पियहि, लाज नेम बिसराइ ।।42।।
छुटी मूरछा चेत भयौ, चितवत मुख की ओर ।
रटत पपीहा तृषित मनौं, व्याकुल तृषित चकोर ।।43।।
चरन कमल कौ निज महल, तहाँ बसत मन प्रान ।
इतनौ नातौ मानि कै, देहु अधर रस पान ।।44।।
हारी प्यारी देत रस, पिय पीवत न अघात ।
देखि लाड़िली लाल रुचि, रीझि-रीझि मुसिकात ।।45।।
करुना निधि मृदु चित्त अति, उरजनि सौं रही लाइ ।
लज्जित ह्वै रहे विवस तहाँ, मदन-केलि सिर नाइ ।।46।।
सोरठा
पिय सौं कहै जु बात, अलबेली अति फूल सौं ।
हँसि मृदु उर लपटात, पिय के जीवन यहै सुख ।।47।।
दोहा
प्रेम रासि दोउ रसिक वर, एक वैस रस एक ।
निमिष न छूटत अंग-अँग, यहै दुहुँनि की टेक ।।48।।
अद्भुत गति सखि प्रीति की, कैसेहूँ कहत बनैं न ।
थोरेहुँ अंतर निमिष कौ, सहि न सकत पिय-नैंन ।।49।।
अद्भुत रुचि सखि प्रेम की, सहज परस्पर होइ ।
जैसैं एकहि ही रंग सौं, भरिये सीसी दोइ ।।50।।
स्याम रंग स्यामा रँगी, स्यामा के रँग स्याम ।
एक प्रान तन मन सहज, कहिवें कौं द्वै नाम ।।51।।
सखियनि के नैंना रँगे, नवल विहार सुरंग ।
माती नेह आनंद मद, दंपति केलि-अनंग ।।52।।
प्रेम मदन मद नैंन भरे, हियैं भरयौ आनंद ।
सुरत रंग के रँग रँगे, विवि वृंदावन-चंद ।।53।।
रस समुद्र दोउ लाड़िले, नव-नव भाव-तरंग ।
तामें मज्जन करत रहु, 'ध्रुव' दिन मनहिं अभंग ।।54।।
अद्भुत रंग-विहार जस, जो सुनिहै चित लाइ ।
रसिक रँगीले विवि कुँवर, तेहि उर झलकैं आइ ।।55।।
छप्पन दोहा कहे 'ध्रुव' रंग-बिहार अनंग ।
या रस सौं जे रँगि रहे, तिनही सौं करि संग ।।56।।
जै जै श्री रङ्ग-विहार लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
दोहा
राजत छबि सौं रँगमगे, रँगमग्यौ सहज सिंगार ।
बैठे रँगमगी सेज पर, रँगमग्यौ रूप अपार ।।1।।
सखी एक दई आरसी, ललित लाड़िली पाँनि ।
तेहि छिन पिय कौ मन परयौ, द्वै छबि के बिच आनि ।।2।।
बढ़ी अधिक सोभा झलक, कुंज भवन रह्यौ छाइ ।
मानौं कोटिक रूप के, चंद उदै भये आइ ।।3।।
निरखि माधुरी सहज की, नैंन न मानत हार ।
बढ़ी तहाँ रुचि की नदी, धीरज कूल बिदार ।।4।।
पिय प्रवीन रस प्रेम में, चितवत भौंहनि भाइ ।
जिहि छिन जैसी होति रुचि, जानत त्यौंहि लड़ाइ ।।5।।
छिन छिन औरै-और छबि, पल-पल में गति और ।
नागर सागर रूप के, परम रसिक सिरमौर ।।6।।
कबहुँ लाड़िली होति पिय, लाल प्रिया ह्वै जात ।
नहिं जानत यह प्रेम रस, निसि-दिन कितहि विहात ।।7।।
सुरंग चूनरी एक में, रँग-भींने सुकुँवर ।
लपटे ऐसी भाँति सौं, नहिं समात बिच हार ।।8।।
इंद्रनील मनि पिय प्रिया, कोमल कुंदन-बेलि ।
लसति छबीली भाँति सौं, सुरत समर रस-केलि ।।9।।
लाल मगन सुख सेज पर, लटकत रही न सँभारि ।
रति नागरि अधरनि सुधा, प्यावति वदन निहारि ।।10।।
नैंन कटोरी रूप की, भरी प्रेम सद मोद ।
अद्भुत रुचि पीवत बढ़ी, आनँद रँग दुहुँ कोद ।।11।।
अंगनि की छबि माधुरी, निरखतहूँ न अघाहिं ।
नैंन-भँवर भूले फिरैं, रूप-कमल-बन माहिं ।।12।।
ऐसौ छिन ह्वै है कबहिं, कुँवरि अंक भरि लेहि ।
दसन खंड अति हेत हँसि, पिय मुख बीरी देहि ।।13।।
यह सोचत रहैं चित्त में, भूषन बसन बनाइ ।
पहिराऊँ अपने करनि, रहौं रीझि सुख पाइ ।।14।।
जद्दपि पिय देखत रहै, मन की सोच न जाइ ।
कैसैहूँ एक बार ये, देखैं नैंन अघाइ ।।15।।
अति आसक्त सनेह बस, मोहन रूप-निधान ।
तजि स्यानप राख्यौ न कछु, अपने तन-मन-प्राँन ।।16।।
सौरभता सुकुँवारि की, जब पावत सुकुँवार ।
फैलि परत जनु प्रेम रस, रहत न देह सँभार ।।17।।
अतिहि विवस ह्वै जात पिय, ऐसी भाँति अनूप ।
सुनि सखि तब ह्वै है कहा, जबहि देखिहै रूप ।।18।।
अधरनि अंगनि परसिवौ, तिनकौ यहै उपाय ।
चितवनि अति अनुराग की, लेत है पियहि जगाय ।।19।।
छिन छिन माँहिं अचेत है, पल-पल माँहिं सचेत ।
नहिं जानत या रंग में, गये कलप जुग केत ।।20।।
कुंडलिया
एक लाड़िली लाल में, अद्भुत सरस सनेह ।
रुचि तरंग पल पल बढ़ै, बरषत रस कौ मेह ।।
बरषत रस कौ मेह, बढ़ी सुख-सरिता भारी ।
मुसिकनि मनु छबि कमल, अंग फूली फुलवारी ।।
हाव भाव अंकुर नये, उपजत रंग अनेक ।
हित ध्रुव हितसौं बात करैं, तन-मन भये दोऊ एक ।।21।।
दोहा
अलक लड़ी सुख लाड़िली, अद्भुत रूप-निधान ।
मोहि रहे मोहन निरखि, भूले सबै सयान ।।22।।
तिनके रूपहि कहनि कौं, कितकि बुद्धि है मोर ।
रस गुन सींवा रूप की, बँधे नैंन की कोर ।।23।।
अति सुरंग मोतिनु सहित, बनी माँग रस-दैंन ।
मनौ हाँस अनुराग मिलि, राजत रसपति ऐंन ।।24।।
फबि रही गौर लिलाट पर, बैंदी की झलकानि ।
मनि अनुराग सुहाग की, मानौं प्रगटी आनि ।।25।।
उज्ज्वल स्याम सुरंग दृग, सने सनेह सलौंन ।
बार-बार परसत रहैं, अंचल स्रवननि-कौंन ।।26।।
कहि न सकत नासा बनिक, उन्नत सुमिलि अनूप ।
चितवत मोती की छबिहि, भूल्यौ रूपहि रूप ।।27।।
मधुमय अधर सुरंग मृदु, छबि सींवा सुकुँवारि ।
दसननि पंकति जोति पर, दामिनि अगनित वारि ।।28।।
उपमा सुंदर चिबुक की, सकत न उर में आनि ।
सोभा निधि अद्भुत मनौं, हरि-मन हीरा खानि ।।29।।
मुसिकनि आनँद फूल मनौं, चितवन सुख की सींव ।
द्वै लर मोतिनु पोत छबि, झलक रही मृदु ग्रींव ।।30।।
उरजनि की छबि कहा कहौं, तैसी झलकनि हीय ।
भूलत नहिं मन के करनि, धरे रहत है पीय ।।31।।
तन सौं सारी मिलि रही, सौंधे सनी सुरंग ।
मानौं सोभा छाइ रही, झलमलात अंग-अंग ।।32।।
रस भीनी झींनी बनी, अँगिया गोरे गात ।
अति सुदेस गाढ़ी कसनि, लसनि ललित उरजात ।।33।।
प्रीतम कौ चित मीन मनौं, परयौ नाभि-हृद माँहि ।
अति स्वादी सुख स्वाद रस, कैसैहुँ निकसत नाहिं ।।34।।
नख-सिख लौं दोउ अरुझि रहे, नैंकहुँ सुरझत नाहिं ।
ज्यौं-ज्यौं रुचि बाढ़ै अधिक, त्यौं-त्यौं अति उरझाहिं ।।35।।
जेहरि रीझे नूपुरनि, निमिष न छाँड़त पाइ ।
पाइल सुख की रासि तहँ, ते हरि रहे लुभाइ ।।36।।
चरननि हित जावक लियैं, ललन रहे अति सोहि ।
चित्र करत चित चित्र भयौ, छबि-चरित्र रहे जोहि ।।37।।
चाहि रहे छ्वावत चखनि, बढ्यौ प्रेम कौ प्यार ।
रुचि प्रवाह में परयौ मन, चूंबत बारंबार ।।38।।
रस भरी चितवनि नेह की, रँग भीनी मुसिकानि ।
जीवन कौ सुख सहज फल, यहै लेत पिय मानि ।।39।।
नैंकु कुँवरि मुरि सखी सौं, बात कही लगि कान ।
पिय की गति औरे भई, कोटिक विरह समान ।।40।।
पुनि-पुनि प्यारी प्यार सौं, रँवकि लिये उर लाइ ।
देखत मुख हिय दुख भयौ, नैंननिं जल भरे आइ ।।41।।
गहि कपोल सुंदर करनि, नैंननिं नैंन मिलाइ ।
अधरनि रस प्यावति पियहि, लाज नेम बिसराइ ।।42।।
छुटी मूरछा चेत भयौ, चितवत मुख की ओर ।
रटत पपीहा तृषित मनौं, व्याकुल तृषित चकोर ।।43।।
चरन कमल कौ निज महल, तहाँ बसत मन प्रान ।
इतनौ नातौ मानि कै, देहु अधर रस पान ।।44।।
हारी प्यारी देत रस, पिय पीवत न अघात ।
देखि लाड़िली लाल रुचि, रीझि-रीझि मुसिकात ।।45।।
करुना निधि मृदु चित्त अति, उरजनि सौं रही लाइ ।
लज्जित ह्वै रहे विवस तहाँ, मदन-केलि सिर नाइ ।।46।।
सोरठा
पिय सौं कहै जु बात, अलबेली अति फूल सौं ।
हँसि मृदु उर लपटात, पिय के जीवन यहै सुख ।।47।।
दोहा
प्रेम रासि दोउ रसिक वर, एक वैस रस एक ।
निमिष न छूटत अंग-अँग, यहै दुहुँनि की टेक ।।48।।
अद्भुत गति सखि प्रीति की, कैसेहूँ कहत बनैं न ।
थोरेहुँ अंतर निमिष कौ, सहि न सकत पिय-नैंन ।।49।।
अद्भुत रुचि सखि प्रेम की, सहज परस्पर होइ ।
जैसैं एकहि ही रंग सौं, भरिये सीसी दोइ ।।50।।
स्याम रंग स्यामा रँगी, स्यामा के रँग स्याम ।
एक प्रान तन मन सहज, कहिवें कौं द्वै नाम ।।51।।
सखियनि के नैंना रँगे, नवल विहार सुरंग ।
माती नेह आनंद मद, दंपति केलि-अनंग ।।52।।
प्रेम मदन मद नैंन भरे, हियैं भरयौ आनंद ।
सुरत रंग के रँग रँगे, विवि वृंदावन-चंद ।।53।।
रस समुद्र दोउ लाड़िले, नव-नव भाव-तरंग ।
तामें मज्जन करत रहु, 'ध्रुव' दिन मनहिं अभंग ।।54।।
अद्भुत रंग-विहार जस, जो सुनिहै चित लाइ ।
रसिक रँगीले विवि कुँवर, तेहि उर झलकैं आइ ।।55।।
छप्पन दोहा कहे 'ध्रुव' रंग-बिहार अनंग ।
या रस सौं जे रँगि रहे, तिनही सौं करि संग ।।56।।
जै जै श्री रङ्ग-विहार लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
31. रस विहार लीला
दोहा
रूप नदी करिया मदन, नवल नेह की नाव ।
चढ़े फिरत दोऊ लाड़िले, छिन छिन उपजत चाव ।।1।।
रस बिहार कछु प्रकट कहौं, सुनहु रसिक चितलाइ ।
नावनिं चढ़ि वन विहरिवौ, यह उपजी उर आइ ।।2।।
कंचन की रतननि खची, रची अनेक अनंग ।
जमुना जल में झलक रही, गुमटी नाना रंग ।।3।।
मनिमय छत्री सबनि पर, रहीं अधिक झलकाइ ।
कहुँ-कहुँ फूलनि की लता, रहि गइँ सहज सुभाइ ।।4।।
नाव बनाव जु कहन कौं, ऐसी मति धरै कौंन ।
कुंदन के हीरनि खचे, दुखने तिखने भौंन ।।5।।
लै-लै कंज गुलाब दल, आसन सेज रचाइ ।
अँबर अरगजा सौं छिरकि, राखी सखिनि बिछाइ ।।6।।
तापर रसिकनि रसिक दोऊ, नागर नवल किशोर ।
अवलोकत मुख माधुरी, जैसें चंद चकोर ।।7।।
ललितादिक निज सहचरी, तेई राजत पास ।
आनंद के अनुराग रंगि, लूटत सुख की रासि ।।8।।
और सतेसनि पर चढ़ीं, लीने सौंज सिँगार ।
चंदन बंदन अगरसत, और विविध उपहार ।।9।।
एकनि कर पाननि डबा, एकनि के कर चौंर ।
रस सुगंध भींजी सबै, भ्रमत चहूँ दिस भौंर ।।10।।
जहाँ-जहाँ जल में झलमलै, अंगनि भूषन जोति ।
मानौं बरसा रूप की, कालिंदी पर होति ।।11।।
भूलि रही नहिं कहि सकति, मति की गति भई पंग ।
कोटि भान ससि कमल मनौं, जुरे आइ इक संग ।।12।।
अति प्रवीन सब सहचरी, रंगी राग के रंग ।
कोऊ बीना कोऊ सारँगी, कोऊ लिये हुड़क मृदंग ।।13।।
एक लिये किन्नरि मुरज, एक तार कठतार ।
सरस एक तें एक सखि, गुन की अवधि अपार ।।14।।
एक मधुर सुर गावहीं, अद्भुत बाँकी तान ।
रीझि लाड़िली लाल दोऊ, देत सबनि कौं पान ।।15।।
चलन फिरन छबि कहा कहौं, नैंना रहे लुभाइ ।
मानौं रूप छटानि कै, लइ रविजा सब छाइ ।।16।।
सुरँग सुगंध गुलाल अति, सखियनि दियौ उड़ाइ ।
अंबर मनौं अनुराग कौ, तेहि छिन लियौ उढ़ाइ ।।17।।
कुसुमनि के गैंदुक लियैं, खेलत दोउ सुकुँवार ।
आलिंगन चुंबन चपल, छुवत उरज उर हार ।।18।।
हाव-भाव चितवनि चपल, बिच-बिच मृदु मुसिकानि ।
अति विचित्र घटि नाहिं कोऊ, कोक कलनि की खाँनि ।।19।।
जबहि कुँवर नीवी गहत, भौंह भंग ह्वै जात ।
वेपथ बात न कहि सकत, पद कमलनि लपटात ।।20।।
देखि दीन आतुर पियहि, है कृपाल रस ऐंन ।
अधर- सुधा प्यावत पियहि, जुरे नैंन सौं नैंन ।।21।।
रस विहार के सुनत ही, उपजै जिनकै रंग ।
हित ध्रुव' तौ जाँचत यहै, तिनही सौं ह्वै संग ।।22।।
जै जै श्री रस विहार लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
दोहा
रूप नदी करिया मदन, नवल नेह की नाव ।
चढ़े फिरत दोऊ लाड़िले, छिन छिन उपजत चाव ।।1।।
रस बिहार कछु प्रकट कहौं, सुनहु रसिक चितलाइ ।
नावनिं चढ़ि वन विहरिवौ, यह उपजी उर आइ ।।2।।
कंचन की रतननि खची, रची अनेक अनंग ।
जमुना जल में झलक रही, गुमटी नाना रंग ।।3।।
मनिमय छत्री सबनि पर, रहीं अधिक झलकाइ ।
कहुँ-कहुँ फूलनि की लता, रहि गइँ सहज सुभाइ ।।4।।
नाव बनाव जु कहन कौं, ऐसी मति धरै कौंन ।
कुंदन के हीरनि खचे, दुखने तिखने भौंन ।।5।।
लै-लै कंज गुलाब दल, आसन सेज रचाइ ।
अँबर अरगजा सौं छिरकि, राखी सखिनि बिछाइ ।।6।।
तापर रसिकनि रसिक दोऊ, नागर नवल किशोर ।
अवलोकत मुख माधुरी, जैसें चंद चकोर ।।7।।
ललितादिक निज सहचरी, तेई राजत पास ।
आनंद के अनुराग रंगि, लूटत सुख की रासि ।।8।।
और सतेसनि पर चढ़ीं, लीने सौंज सिँगार ।
चंदन बंदन अगरसत, और विविध उपहार ।।9।।
एकनि कर पाननि डबा, एकनि के कर चौंर ।
रस सुगंध भींजी सबै, भ्रमत चहूँ दिस भौंर ।।10।।
जहाँ-जहाँ जल में झलमलै, अंगनि भूषन जोति ।
मानौं बरसा रूप की, कालिंदी पर होति ।।11।।
भूलि रही नहिं कहि सकति, मति की गति भई पंग ।
कोटि भान ससि कमल मनौं, जुरे आइ इक संग ।।12।।
अति प्रवीन सब सहचरी, रंगी राग के रंग ।
कोऊ बीना कोऊ सारँगी, कोऊ लिये हुड़क मृदंग ।।13।।
एक लिये किन्नरि मुरज, एक तार कठतार ।
सरस एक तें एक सखि, गुन की अवधि अपार ।।14।।
एक मधुर सुर गावहीं, अद्भुत बाँकी तान ।
रीझि लाड़िली लाल दोऊ, देत सबनि कौं पान ।।15।।
चलन फिरन छबि कहा कहौं, नैंना रहे लुभाइ ।
मानौं रूप छटानि कै, लइ रविजा सब छाइ ।।16।।
सुरँग सुगंध गुलाल अति, सखियनि दियौ उड़ाइ ।
अंबर मनौं अनुराग कौ, तेहि छिन लियौ उढ़ाइ ।।17।।
कुसुमनि के गैंदुक लियैं, खेलत दोउ सुकुँवार ।
आलिंगन चुंबन चपल, छुवत उरज उर हार ।।18।।
हाव-भाव चितवनि चपल, बिच-बिच मृदु मुसिकानि ।
अति विचित्र घटि नाहिं कोऊ, कोक कलनि की खाँनि ।।19।।
जबहि कुँवर नीवी गहत, भौंह भंग ह्वै जात ।
वेपथ बात न कहि सकत, पद कमलनि लपटात ।।20।।
देखि दीन आतुर पियहि, है कृपाल रस ऐंन ।
अधर- सुधा प्यावत पियहि, जुरे नैंन सौं नैंन ।।21।।
रस विहार के सुनत ही, उपजै जिनकै रंग ।
हित ध्रुव' तौ जाँचत यहै, तिनही सौं ह्वै संग ।।22।।
जै जै श्री रस विहार लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
32. रंग हुलास लीला
दोहा
सखी सबै सेवा करैं, जिनके प्रेम अपार ।
जैसी रुचि ह्वै दुहुँनि की, तैसैं करतिं सिंगार ।।1।।
सौरभ सौं तन उबटि कैं, मंजन कियौ सुकुँवारि ।
अंगनि की छबि कहा कहौं, मति सरसुति रही हारि ।।2।।
मुख तँबोल की अरुनई, झलकनि सहज सुहाग ।
मनौं कमल के मध्य तें प्रगट भयौ अनुराग ।।3।।
रची सचिक्कन चंद्रिका, फबि रही मंग सुरंग ।
मनु अनुराग सिंगार की, सीवाँ रची अनंग ।।4।।
बैंदी नथ अरु तिलक पर, सुरंग चूँनरी सोहि ।
निरखतिं धीरज धरैं सखी, तऊ रहीं सब मोहि ।।5।।
चिलकनि कच चमकनि दसन, चितवनि मुसिकनि फूल ।
झरत रहैं पिय लाल पर, सुख-निधि आनंद मूल ।।6।।
कजरारे उज्ज्वल सुरँग, अनियारे दोऊ नैंन ।
उपमा और कहा कहौं, मोहन-मन हरि लैन ।।7।।
अधरनि की छबि कहा कहौं, रसमय मधुर सुरंग ।
सींचत पिय हिय लोचननि, पानिप वारि तरंग ।।8।।
अति सुंदर वर चिबुक पर, साँवल बिंदु सलौंन ।
मनहुँ स्याम मन अलप ह्वै, बैठ्यौ तहाँ धरि मौंन ।।9।।
कैसैं कै बरनौं सखी, सहजहि भाँति अनूप ।
चलै ढरकि मन मैंन ज्यौं, लागति छबि रवि धूप ।।10।।
पानिप झलक कपोल पर, छुटि रही अलक रसाल ।
बेसरि कौ मुक्ता चपल, चंचल नैंन बिशाल ।।11।।
विविध भाँति भूषन बसन, प्रतिबिंबित अंग-अंग ।
रूपनि मनि गन में मनौं, झलकत उठत तरंग ।।12।।
झलकनि झमकनि कहा कहौं, सोभा बढ़ी सुभाइ ।
मानौं कोटिक दामिनी छबि सौं चमकीं आइ ।।13।।
मिहँदी परम सुरंग सौं, रचे चरन मृदु पानि ।
मनौं रैनी अनुराग की, रँगे कमल दल बानि ।।14।।
नैंननिं अंजन देत सखी, काँपत कर अरु हीय ।
अति विशाल चंचल चितै, विवस होत हैं पीय ।।15।।
अति प्रवीन सब अंग में, रूप सींव सुकुँवारि ।
बाढ़त है छबि अधिक तब, लालहि लेत सँभारि ।।16।।
प्रेम प्रिया कौ कहा कहौं, राखे छबि सौं छाइ ।
पिय के सर्बस लाड़िली, रहे बिन मोल बिकाइ ।।17।।
उरजनि छवि हारावली, लालन रहे निहारि ।
तृपति न कबहूँ भये हैं, पिवत प्रेम रस वारि ।।18।।
नख-सिख मोहनि सोहनी, बारी रति श्री कोटि ।
जद्दपि पिय मोहन हुते, रहे चरन तरि लोटि ।।19।।
सखियनि मंडल में खरी, तैसीयै झलक सिंगार ।
मनु सेवत छबि चंद कौं, रूप के कमल अपार ।।20।।
अब सुनि प्यारे लाल की, रुचि कौ रच्यौ सिंगार ।
बेसरि सारी कंचुकी, बैंनी गुही सुढार ।।21।।
बैंदी दई अति प्यार सौं, हँसि लाड़िलि सुकुँवारि ।
बाढ़ी ऐसी फूल उर, सकत न लाल सँभारि ।।22।।
कुंदन के रतननि खचे, बने तरौना कान ।
मानौं छबि के कमल ढिंग, झलकत छबि के भान ।।23।।
जहाँ लगि भूषन कुँवरि के, पहिरे तेइ बनाइ ।
कौन भाँति अति लाज सौं, चितई मुरि मुसिकाइ ।।24।।
वेष प्रिया कौ करत ही, पानिप बढ़ी अनूप ।
मनौं सबके मन हरन कौं, प्रगटी मूरति रूप ।।25।।
नवल सखी छवि नई-नई, अंग-अंग झलकंत ।
मनु सुहाग अनुराग की, सींव सुरँग सीमंत ।।26।।
अति बिसाल चंचल दृगनि, अंजन दियौ बनाय ।
रेख सेख कोरहि लगी, चित्तहि लियौ चुराइ ।।27।।
नासा बेसरि फबि रही, थिरकनि मुक्ता मंग ।
मनहुँ खिलावत विधु बुधहि, हित सौं लियैं उछंग ।।28।।
बनी सहेली साँवरी, सोभा रही सुभाइ ।
उपमा और कहा कहौं, लाड़िली रही लुभाइ ।।29।।
चितवन अति अनुराग की, रँग भीनी मुसिकानि ।
देखि छबीली छबिहि छबि, पाइनि में परी आनि ।।30।।
मोहन तें भई मोहनी, लई सखी सब मोहि ।
अति सुठौंन बानिक बनक, रही कुँवरि मुख जोहि ।।31।।
बीन कुँवरि कौ लियौ कर, बजई बाँकी तान ।
अति प्रवीन लीनी रिझै, गाई सुर बंधान ।।32।।
रीझि लाड़िली अंक भरि, लीनी उर सौं लाइ ।
द्वै सरिता छबि की मनौं, मिलीं आपु में आइ ।।33।।
बाढ़ी रुचि या वेष पर, उपज्यौ नौतन चाव ।
मिटी न मन की चपलता, भूले और सुभाव ।।34।।
पियहि पिया कौ वेष रुचै, प्यारी कौं पिय वेष ।
हिय तें हिय टूटत नहीं, परि गई प्रेम की रेख ।।35।।
ठाढ़ी जुवती-जूथ में, छबि की उठत झकोर ।
मानौं चंदहि घेरि रहे, सब के नैंन-चकोर ।।36।।
करि सिंगार सहचरि सबै, रूपहि रहीं निहारि ।
बैठे कुंज सिंगार में, सेज सिंगार सवारि ।।37।।
राजत नवल निकुंज में, नव किशोर चित चोर ।
सखी सहेली सहचरी, झमकि रही चहुँ ओर ।।38।।
प्रेम मदन रस कौ सदन, रदन अदन धरैं पीय ।
रस समुद्र में परे दोऊ, जुरे नैंन अरु हीय ।।39।।
लटकनि ललित सुहावनी, सो तौ बसि रही हीय ।
जब लावति उर प्यार सौं, हँसि-हँसि प्यारी पीय ।।40।।
कजरारे सुठि सोहने, उज्ज्वल स्याम सुरंग ।
नैंननिं छबि पर वारि सत, खंजन कंज कुरंग ।।41।।
जिहि-जिहि चितवन चित हर्यौ, तेहि चितवन की आस ।
रसिक लाल छाँड़त नहीं, निमिष लाड़िली पास ।।42।।
कुँवरि चाल सखि देखि कै, कुँवरहि भूली चाल ।
रहि गये ठाढ़े चित्र से, चितवनि नैंन बिसाल ।।43।।
जो फिरि चितवै लाड़िली, ठाढ़ी यमुना कूल ।
फिरि आई अति प्यार सौं, लीने गहि भुज मूल ।।44।।
अद्भुत जोरी रूप निधि, नवल लाड़िली लाल ।
ऐसैं रहौ 'ध्रुव' हीय में, जैसैं कंठ की माल ।।45।।
जोरी गोरी स्याम की, सोभा निधि सुकुँवारि ।
अटके दोऊ आप में, उमड़ी प्रेम की धार ।।46।।
तेहि धारा की बूँद इक, कैसैं बरनी जाइ ।
और जतन कछु नाहिं 'ध्रुव', रसिकन संग उपाइ ।।47।।
मदन मोद मद रस मगन, रहत मुदित मन माँहि ।
दरसत परसत उरज उर, लपटत हूँ न अघाँहि ।।48।।
कुँवरि कटाछनि की छटा, मनु अनियारे बान ।
पिय हिय में 'ध्रुव' लगत रहैं, सोई ह्वै गये प्रांन ।।49।।
प्रीतम के जीवनि यहै, नैंन-कटाछनि पात ।
त्यौं-त्यौं पिय कौ सीस सखि, चरननि तर ढर्यो जात ।।50।।
ऐसैं रस में परै मन, जनम सफल 'ध्रुव' होइ ।
नैंन सैंन मुसिकनि रतन, हिय गुन सौं लै पोइ ।।51।।
लाड़िली लाल के प्रेम कौ, जिनकै रहै विचार ।
सुनि ध्रुव तिनकी चरन रज, वंदन करि सिर धार ।।52।।
जै जै श्री रङ्ग हुलास लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
दोहा
सखी सबै सेवा करैं, जिनके प्रेम अपार ।
जैसी रुचि ह्वै दुहुँनि की, तैसैं करतिं सिंगार ।।1।।
सौरभ सौं तन उबटि कैं, मंजन कियौ सुकुँवारि ।
अंगनि की छबि कहा कहौं, मति सरसुति रही हारि ।।2।।
मुख तँबोल की अरुनई, झलकनि सहज सुहाग ।
मनौं कमल के मध्य तें प्रगट भयौ अनुराग ।।3।।
रची सचिक्कन चंद्रिका, फबि रही मंग सुरंग ।
मनु अनुराग सिंगार की, सीवाँ रची अनंग ।।4।।
बैंदी नथ अरु तिलक पर, सुरंग चूँनरी सोहि ।
निरखतिं धीरज धरैं सखी, तऊ रहीं सब मोहि ।।5।।
चिलकनि कच चमकनि दसन, चितवनि मुसिकनि फूल ।
झरत रहैं पिय लाल पर, सुख-निधि आनंद मूल ।।6।।
कजरारे उज्ज्वल सुरँग, अनियारे दोऊ नैंन ।
उपमा और कहा कहौं, मोहन-मन हरि लैन ।।7।।
अधरनि की छबि कहा कहौं, रसमय मधुर सुरंग ।
सींचत पिय हिय लोचननि, पानिप वारि तरंग ।।8।।
अति सुंदर वर चिबुक पर, साँवल बिंदु सलौंन ।
मनहुँ स्याम मन अलप ह्वै, बैठ्यौ तहाँ धरि मौंन ।।9।।
कैसैं कै बरनौं सखी, सहजहि भाँति अनूप ।
चलै ढरकि मन मैंन ज्यौं, लागति छबि रवि धूप ।।10।।
पानिप झलक कपोल पर, छुटि रही अलक रसाल ।
बेसरि कौ मुक्ता चपल, चंचल नैंन बिशाल ।।11।।
विविध भाँति भूषन बसन, प्रतिबिंबित अंग-अंग ।
रूपनि मनि गन में मनौं, झलकत उठत तरंग ।।12।।
झलकनि झमकनि कहा कहौं, सोभा बढ़ी सुभाइ ।
मानौं कोटिक दामिनी छबि सौं चमकीं आइ ।।13।।
मिहँदी परम सुरंग सौं, रचे चरन मृदु पानि ।
मनौं रैनी अनुराग की, रँगे कमल दल बानि ।।14।।
नैंननिं अंजन देत सखी, काँपत कर अरु हीय ।
अति विशाल चंचल चितै, विवस होत हैं पीय ।।15।।
अति प्रवीन सब अंग में, रूप सींव सुकुँवारि ।
बाढ़त है छबि अधिक तब, लालहि लेत सँभारि ।।16।।
प्रेम प्रिया कौ कहा कहौं, राखे छबि सौं छाइ ।
पिय के सर्बस लाड़िली, रहे बिन मोल बिकाइ ।।17।।
उरजनि छवि हारावली, लालन रहे निहारि ।
तृपति न कबहूँ भये हैं, पिवत प्रेम रस वारि ।।18।।
नख-सिख मोहनि सोहनी, बारी रति श्री कोटि ।
जद्दपि पिय मोहन हुते, रहे चरन तरि लोटि ।।19।।
सखियनि मंडल में खरी, तैसीयै झलक सिंगार ।
मनु सेवत छबि चंद कौं, रूप के कमल अपार ।।20।।
अब सुनि प्यारे लाल की, रुचि कौ रच्यौ सिंगार ।
बेसरि सारी कंचुकी, बैंनी गुही सुढार ।।21।।
बैंदी दई अति प्यार सौं, हँसि लाड़िलि सुकुँवारि ।
बाढ़ी ऐसी फूल उर, सकत न लाल सँभारि ।।22।।
कुंदन के रतननि खचे, बने तरौना कान ।
मानौं छबि के कमल ढिंग, झलकत छबि के भान ।।23।।
जहाँ लगि भूषन कुँवरि के, पहिरे तेइ बनाइ ।
कौन भाँति अति लाज सौं, चितई मुरि मुसिकाइ ।।24।।
वेष प्रिया कौ करत ही, पानिप बढ़ी अनूप ।
मनौं सबके मन हरन कौं, प्रगटी मूरति रूप ।।25।।
नवल सखी छवि नई-नई, अंग-अंग झलकंत ।
मनु सुहाग अनुराग की, सींव सुरँग सीमंत ।।26।।
अति बिसाल चंचल दृगनि, अंजन दियौ बनाय ।
रेख सेख कोरहि लगी, चित्तहि लियौ चुराइ ।।27।।
नासा बेसरि फबि रही, थिरकनि मुक्ता मंग ।
मनहुँ खिलावत विधु बुधहि, हित सौं लियैं उछंग ।।28।।
बनी सहेली साँवरी, सोभा रही सुभाइ ।
उपमा और कहा कहौं, लाड़िली रही लुभाइ ।।29।।
चितवन अति अनुराग की, रँग भीनी मुसिकानि ।
देखि छबीली छबिहि छबि, पाइनि में परी आनि ।।30।।
मोहन तें भई मोहनी, लई सखी सब मोहि ।
अति सुठौंन बानिक बनक, रही कुँवरि मुख जोहि ।।31।।
बीन कुँवरि कौ लियौ कर, बजई बाँकी तान ।
अति प्रवीन लीनी रिझै, गाई सुर बंधान ।।32।।
रीझि लाड़िली अंक भरि, लीनी उर सौं लाइ ।
द्वै सरिता छबि की मनौं, मिलीं आपु में आइ ।।33।।
बाढ़ी रुचि या वेष पर, उपज्यौ नौतन चाव ।
मिटी न मन की चपलता, भूले और सुभाव ।।34।।
पियहि पिया कौ वेष रुचै, प्यारी कौं पिय वेष ।
हिय तें हिय टूटत नहीं, परि गई प्रेम की रेख ।।35।।
ठाढ़ी जुवती-जूथ में, छबि की उठत झकोर ।
मानौं चंदहि घेरि रहे, सब के नैंन-चकोर ।।36।।
करि सिंगार सहचरि सबै, रूपहि रहीं निहारि ।
बैठे कुंज सिंगार में, सेज सिंगार सवारि ।।37।।
राजत नवल निकुंज में, नव किशोर चित चोर ।
सखी सहेली सहचरी, झमकि रही चहुँ ओर ।।38।।
प्रेम मदन रस कौ सदन, रदन अदन धरैं पीय ।
रस समुद्र में परे दोऊ, जुरे नैंन अरु हीय ।।39।।
लटकनि ललित सुहावनी, सो तौ बसि रही हीय ।
जब लावति उर प्यार सौं, हँसि-हँसि प्यारी पीय ।।40।।
कजरारे सुठि सोहने, उज्ज्वल स्याम सुरंग ।
नैंननिं छबि पर वारि सत, खंजन कंज कुरंग ।।41।।
जिहि-जिहि चितवन चित हर्यौ, तेहि चितवन की आस ।
रसिक लाल छाँड़त नहीं, निमिष लाड़िली पास ।।42।।
कुँवरि चाल सखि देखि कै, कुँवरहि भूली चाल ।
रहि गये ठाढ़े चित्र से, चितवनि नैंन बिसाल ।।43।।
जो फिरि चितवै लाड़िली, ठाढ़ी यमुना कूल ।
फिरि आई अति प्यार सौं, लीने गहि भुज मूल ।।44।।
अद्भुत जोरी रूप निधि, नवल लाड़िली लाल ।
ऐसैं रहौ 'ध्रुव' हीय में, जैसैं कंठ की माल ।।45।।
जोरी गोरी स्याम की, सोभा निधि सुकुँवारि ।
अटके दोऊ आप में, उमड़ी प्रेम की धार ।।46।।
तेहि धारा की बूँद इक, कैसैं बरनी जाइ ।
और जतन कछु नाहिं 'ध्रुव', रसिकन संग उपाइ ।।47।।
मदन मोद मद रस मगन, रहत मुदित मन माँहि ।
दरसत परसत उरज उर, लपटत हूँ न अघाँहि ।।48।।
कुँवरि कटाछनि की छटा, मनु अनियारे बान ।
पिय हिय में 'ध्रुव' लगत रहैं, सोई ह्वै गये प्रांन ।।49।।
प्रीतम के जीवनि यहै, नैंन-कटाछनि पात ।
त्यौं-त्यौं पिय कौ सीस सखि, चरननि तर ढर्यो जात ।।50।।
ऐसैं रस में परै मन, जनम सफल 'ध्रुव' होइ ।
नैंन सैंन मुसिकनि रतन, हिय गुन सौं लै पोइ ।।51।।
लाड़िली लाल के प्रेम कौ, जिनकै रहै विचार ।
सुनि ध्रुव तिनकी चरन रज, वंदन करि सिर धार ।।52।।
जै जै श्री रङ्ग हुलास लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
34. आनंद दशा विनोद लीला
दोहा
प्रथमहिं श्रीगुरु कृपा तें, नित्य-विहार सुरंग ।
बरनौं कछु इक जथामति, दंपति-केलि अनंग ।।1।।
नायिका तीन प्रकार की, बरनी कोक-कलानि ।
प्रिया चरन उर में धरैं, ठाढ़ी जोरैं पानि ।।2।।
नौढ़ा मध्या अति चतुर, प्रौढ़ा परम प्रवीन ।
कुँवरि चरन-नख-चंद्रिकनि, सेवत ज्यौं जल मीन ।।3।।
एकै वय क्रम नाहिं कछु, सहज अलौकिक रीति ।
बिलसत विविध विनोद रति, उपजावत निज प्रीति ।।4।।
अपनी-अपनी समै सब, रुचि लै करैं अनुसार ।
फिरत रहैं छिन-छिन नई, आनंद-दसा बिहार ।।5।।
कहा कहौं छबि-माधुरी, छिन-छिन चाह नवीन ।
अद्भुत सुखमै मधुर मृदु, प्रेम-मदन-रस लीन ।।6।।
पल-पल औरै और विधि, उपजत नाना रंग ।
सब अंगनि कौ देत सुख, यह कौतुक बिनु अंग ।।7।।
प्रेम-सिंधु उमड़े रहैं, कबहूँ घटत जु नाँहिं ।
तेहि सुख कौ सुख कहा कहौं, जो उपजत दुँहु माँहिं ।।8।।
प्रथमहि नौढ़ा की दसा, रुचि लै प्रगटी आइ ।
नख-सिख अंबर लाज कौ, मानौं लियौ उढ़ाइ ।।9।।
नमित ग्रींव छवि सींव रही, अंग छुवन नहिं देत ।
आतुर पिय अनुराग बस, मृदु भुज भरि-भरि लेत ।।10।।
चाहत उरजनि छुयौ जब, उठत नवल कर काँपि ।
समुझि लाड़िली जोरि भुज, कर कमलनि रही ढाँपि ।।11।।
परम चतुर चंचल सहज, अंचल में दोऊ नैंन ।
रौंम-रौंम पिय के बढ्यौ, निरखि प्रेम-रस-मैंन ।।12।।
भये अधीर आधीन अति, कहि न सकत कछु बात ।
फिरि-फिरि पाँइनि में परत, मृदु मुख हा-हा खात ।।13।।
यह गति देखत पीय की, चितई कछु मुसिकाइ ।
करुना करि चूँवत मुखहि, अधर-सुधा-रस प्याइ ।।14।।
लटकि लाल-उर सौं लगी, उपजे अगनित भाइ ।
बचन रचन सुख कहा कहौं, प्रीतम रहे लुभाइ ।।15।।
हाव-भाव में अति चतुर, रति-विलास रस-रासि ।
चंचल नैंननिं चितवनी, करत मंद मृदु हाँसि ।।16।।
राखै लै अति प्यार सौं, उरजनि मधि भुज-मूल ।
रुचि-प्रवाह में परे दोऊ, तजि कै लाज-दुकूल ।।17।।
प्रेम-मदन-रस-रंग करि, भरे रहत विवि हीय ।
लपटे ऐसी भाँति सौं, द्वै तन-मन इक कीय ।।18।।
अंग-अंग मन-मन मिले, प्रेम-मदन-रस-सार ।
ऐसै रंग विहार पै, ‘ध्रुव’ कीनौ बलिहार ।।19।।
बिवस लाल सुख-रंग में, रही न देह सँभार ।
प्रगट भई प्रौढ़ा-दसा, जाके प्रेम अपार ।।20।।
लये अंक भरि प्यार सौं, उरजन सौं रही लाइ ।
सावधान कीने जबै, नासा-पुट चटकाइ ।।21।।
परिरंभन चुंबन अधिक, आलिंगन बहु रीति ।
रति-विपरति विलसत विविध, लये मीत रस जीति ।।22।।
बंक कटाक्षिनि हरत मन, बिच-बिच मृदु मुसिकाति ।
पिय के उर पर लसत मनौ, छबि दामिनि झलकांति ।।23।।
श्रम जलकन मुख गौर पर, अंजन लसत सुदेस ।
कहा कहौं छबि सहज की, खुलि रहे सगबगे केस ।।24।।
पीक कपोलन फबि रही, कहुँ-कहुँ अंजन-लीक ।
मनु अनुराग सिंगार मिलि, चित्र रचे अति नीक ।।25।।
जेती कोक-कला कही, अद्भुत प्रेम अनंग ।
छिन छिन औरै और विधि, उपजत अंगनि अंग ।।26।।
प्रेम-चाह-रस-सिंधु में मगन रहत दिन-रैन ।
उर सौं उर अधरनि अधर, जुरे नैंन सौं नैंन ।।27।।
रस-समुद्र गहरे परे, त्रिपित होत तऊ नाहिं ।
नैंन-मीन ललितादिकनि, तिरत फिरत तेहि माँहि ।।28।।
न्यारी-न्यारी दशा कही, एक स्वाद हित जाँनि ।
जैसे एकै बात के कीने विंजन वाँनि ।।29।।
रति-विलास रस सींव करैं, मदन-विनोद बहु भाँति ।
आतुरता पिय दृगन की, निरखि कुँवरि मुसिकाँति ।।30।।
निरखि-निरखि ऐसे सुखहिं, सखी सबै बलि जात ।
तिनहूँ तैं फूली अधिक, आनंद उर न समात ।।31।।
सहजहिं शील सुभाव मृदु, रहैं प्रसन्न सब काल ।
एक लाल सुख-स्वाद हित, करैं विलास नव बाल ।।32।।
प्यारी भौंहनि चितै रहे, परम रसिक सिरमौर ।
चलत भाँवती रुचि लियैं, रुचत नहीं कछु और ।।33।।
रुचि-रुचि रस के रचे रुचि, मानौं प्यारी-पीय ।
सहज प्रेम के रँग रँगे, द्वै तन-मन इक जीय ।।34।।
दैबैं कौं राख्यौ न कछु, अति उदार सुकुँवारि ।
अधर-सुधा प्यावत पियहि, मुख-छबि रही निहारि ।।35।।
अति प्रवीन सब अंग में, जानत बहुत लड़ाइ ।
सुख समुद्र में लाड़िली, लिये जनु लाल न्हवाइ ।।36।।
रुचि फुलवारी फूलि रही, प्रीतम के उर ऐंन ।
सींचत प्यारी प्यार-जल, चितवनि मुसिकनि सैंन ।।37।।
अलक लड़ी पिय पर लटकि, प्यार सौं रही भुज डारि ।
यातैं चित्र से ह्वै रहे, जिन भुज लेहिं उतारि ।।38।।
अंग-अंग छवि माधुरी, निरखत पिय न अघाइ ।
देखि लाल के लालचहिं, लालच रहि ललचाइ ।।39।।
कहा कहौं या प्रेम की, पिय के गति नहिं आँन ।
एक लाड़िली संग ही, जिनके जीवन प्रान ।।40।।
कवित्त
अलबेली सुकुँवारी नैंननिं के आगे रहै, तब लगि प्रीतम के प्रान रहैं तन में ।
यहै जिय जानि प्यारी रंचकौ न होत न्यारी, तिनहीं के प्रेम-रंग रँगि रही मन में ।।
परम प्रवीन गोरी हाव-भाव में किशोरी, नये-नये छवि के तरंग उठैं छिन में ।
‘हित ध्रुव’ प्रीतम के नैंन-मीन रस लीन, खेलिबौ करत दिन-प्रति रूप-वन में ।।41।।
दोहा
स्थूल मदन रस कछु कह्यौ, अब सुनि सूक्षम रूप ।
जहाँ विराजत एक रस, रहत हैं प्रेम सरूप ।।42।।
भीने दोऊ आसक्ति रस, तन-मन रहे अरुझाइ ।
एक प्यार ही दुहुँनि पर, रह्यौ सहज ही छाइ ।।43।।
कवित्त
प्यार ही की कुंज और प्यार ही की सेज रची, प्यार ही सौं प्यारे लाल प्यारी बात करहीं ।
प्यार ही की चितवनि मुसिकनि प्यार ही की, प्यार ही सौं प्यारी जू कौं प्यारौ अंक धरहीं ।।
प्यार सौं लटकि रहैं प्यार ही सौं मुख चहैं, प्यार ही सौं प्यारौ प्रिया अंक भुज भरहीं ।
‘हित ध्रुव’ प्यार भरी प्यारी सखी देखैं खरी, प्यारै-प्यार रह्यौ छाइ, प्यार-रस ढरहीं ।।44।।
दोहा
चितवनि मुसिकनि सौं रँगे, प्रेम-रंग रस-सार ।
छके रहत मद मत्त गति, आनँद नेह सिंगार ।।45।।
दरसत परसत उरज उर, छुवनि कचनि भुजमूल ।
पहिरैं पट दोऊ प्रेम के, बिसरे नेम दुकूल ।।46।।
बूड़यौ मन रस प्रेम में, धीरज धरि सकैं नाहिं ।
नैंन-कमल हरुवे हुते, तिरत रूप-जल माहिं ।।47।।
फूल सुरँग अनुराग के, उर-उर में रहे फूलि ।
मनहुँ भ्रमर मन दुहुँनि के, छबि-सुगंध रहे झूलि ।।48।।
जीवन मुसिकनि चितैवौ, अधर सुधा-रस स्वास ।
लेत मधुप मन पिय मनौं, कोमल कमल सुवास ।।49।।
पहिरैं दोऊ अति फूल सौं, फूल-बिलास कौ हार ।
केलिहुँ तहाँ भारी लगत, ऐसै दोऊ सुकुँवार ।।50।।
कवित्त
माधुरी की कुंज तामें मोद की लै सेज रची, तेहि पर राजैं अलबेले सुकुमार री ।
रूप तेज मोद के जुगल तन जगमगैं, हाव-भाव चातुरी के भूषन सुढार री ।।
नेह-नीर नैंननिं की सैंननिं में रहे भींजि, कौन रंग बाढ्यौ जहाँ बोलिबोऊ भार री ।
अति ही आसक्त सखी रहीं मोहि जोहि-जोहि, ‘हित ध्रुव’ प्राननिं कौ यहै है अहार री ।।51।।
दोहा
रस ही की मूरति दोऊ, रसिक लाडिली लाल ।
रस ही सौं चितवत रहैं, रस भरे नैंन बिसाल ।।52।।
पिय परसत भुज मूल कर, और उरज हिय-हार ।
बूड़ि जात मन रूप में, रहत न देह सँभार ।।53।।
प्रेम-नेम की दसा जिती, उपजत आनहिं आँन ।
रस-निधान विलसत रहैं, सुख कौं नाहिं प्रमाँन ।।54।।
और न कछू सुहाइ मन, यह जाँचत निसि-भोर ।
या सुख-धन सौं लगे रहौ, ‘ध्रुव’ लोइन दिन मोर ।।55।।
यह सुख निरखत सखिनु के, आनँद बढ्यौ न थोर ।
हेमलता फूली मनौं, झूँमि रही चहूँ ओर ।।56।।
छप्पन दोहा कहे ‘ध्रुव’, आनँद-दशा-विनोद ।
रूप-माधुरी रँग रंगे, पगे प्रेम-रस-मोद ।।57।।
।।जै जै श्री आनन्द दशा विनोद लीला की जै जै श्री हित हरिवंश।।
दोहा
प्रथमहिं श्रीगुरु कृपा तें, नित्य-विहार सुरंग ।
बरनौं कछु इक जथामति, दंपति-केलि अनंग ।।1।।
नायिका तीन प्रकार की, बरनी कोक-कलानि ।
प्रिया चरन उर में धरैं, ठाढ़ी जोरैं पानि ।।2।।
नौढ़ा मध्या अति चतुर, प्रौढ़ा परम प्रवीन ।
कुँवरि चरन-नख-चंद्रिकनि, सेवत ज्यौं जल मीन ।।3।।
एकै वय क्रम नाहिं कछु, सहज अलौकिक रीति ।
बिलसत विविध विनोद रति, उपजावत निज प्रीति ।।4।।
अपनी-अपनी समै सब, रुचि लै करैं अनुसार ।
फिरत रहैं छिन-छिन नई, आनंद-दसा बिहार ।।5।।
कहा कहौं छबि-माधुरी, छिन-छिन चाह नवीन ।
अद्भुत सुखमै मधुर मृदु, प्रेम-मदन-रस लीन ।।6।।
पल-पल औरै और विधि, उपजत नाना रंग ।
सब अंगनि कौ देत सुख, यह कौतुक बिनु अंग ।।7।।
प्रेम-सिंधु उमड़े रहैं, कबहूँ घटत जु नाँहिं ।
तेहि सुख कौ सुख कहा कहौं, जो उपजत दुँहु माँहिं ।।8।।
प्रथमहि नौढ़ा की दसा, रुचि लै प्रगटी आइ ।
नख-सिख अंबर लाज कौ, मानौं लियौ उढ़ाइ ।।9।।
नमित ग्रींव छवि सींव रही, अंग छुवन नहिं देत ।
आतुर पिय अनुराग बस, मृदु भुज भरि-भरि लेत ।।10।।
चाहत उरजनि छुयौ जब, उठत नवल कर काँपि ।
समुझि लाड़िली जोरि भुज, कर कमलनि रही ढाँपि ।।11।।
परम चतुर चंचल सहज, अंचल में दोऊ नैंन ।
रौंम-रौंम पिय के बढ्यौ, निरखि प्रेम-रस-मैंन ।।12।।
भये अधीर आधीन अति, कहि न सकत कछु बात ।
फिरि-फिरि पाँइनि में परत, मृदु मुख हा-हा खात ।।13।।
यह गति देखत पीय की, चितई कछु मुसिकाइ ।
करुना करि चूँवत मुखहि, अधर-सुधा-रस प्याइ ।।14।।
लटकि लाल-उर सौं लगी, उपजे अगनित भाइ ।
बचन रचन सुख कहा कहौं, प्रीतम रहे लुभाइ ।।15।।
हाव-भाव में अति चतुर, रति-विलास रस-रासि ।
चंचल नैंननिं चितवनी, करत मंद मृदु हाँसि ।।16।।
राखै लै अति प्यार सौं, उरजनि मधि भुज-मूल ।
रुचि-प्रवाह में परे दोऊ, तजि कै लाज-दुकूल ।।17।।
प्रेम-मदन-रस-रंग करि, भरे रहत विवि हीय ।
लपटे ऐसी भाँति सौं, द्वै तन-मन इक कीय ।।18।।
अंग-अंग मन-मन मिले, प्रेम-मदन-रस-सार ।
ऐसै रंग विहार पै, ‘ध्रुव’ कीनौ बलिहार ।।19।।
बिवस लाल सुख-रंग में, रही न देह सँभार ।
प्रगट भई प्रौढ़ा-दसा, जाके प्रेम अपार ।।20।।
लये अंक भरि प्यार सौं, उरजन सौं रही लाइ ।
सावधान कीने जबै, नासा-पुट चटकाइ ।।21।।
परिरंभन चुंबन अधिक, आलिंगन बहु रीति ।
रति-विपरति विलसत विविध, लये मीत रस जीति ।।22।।
बंक कटाक्षिनि हरत मन, बिच-बिच मृदु मुसिकाति ।
पिय के उर पर लसत मनौ, छबि दामिनि झलकांति ।।23।।
श्रम जलकन मुख गौर पर, अंजन लसत सुदेस ।
कहा कहौं छबि सहज की, खुलि रहे सगबगे केस ।।24।।
पीक कपोलन फबि रही, कहुँ-कहुँ अंजन-लीक ।
मनु अनुराग सिंगार मिलि, चित्र रचे अति नीक ।।25।।
जेती कोक-कला कही, अद्भुत प्रेम अनंग ।
छिन छिन औरै और विधि, उपजत अंगनि अंग ।।26।।
प्रेम-चाह-रस-सिंधु में मगन रहत दिन-रैन ।
उर सौं उर अधरनि अधर, जुरे नैंन सौं नैंन ।।27।।
रस-समुद्र गहरे परे, त्रिपित होत तऊ नाहिं ।
नैंन-मीन ललितादिकनि, तिरत फिरत तेहि माँहि ।।28।।
न्यारी-न्यारी दशा कही, एक स्वाद हित जाँनि ।
जैसे एकै बात के कीने विंजन वाँनि ।।29।।
रति-विलास रस सींव करैं, मदन-विनोद बहु भाँति ।
आतुरता पिय दृगन की, निरखि कुँवरि मुसिकाँति ।।30।।
निरखि-निरखि ऐसे सुखहिं, सखी सबै बलि जात ।
तिनहूँ तैं फूली अधिक, आनंद उर न समात ।।31।।
सहजहिं शील सुभाव मृदु, रहैं प्रसन्न सब काल ।
एक लाल सुख-स्वाद हित, करैं विलास नव बाल ।।32।।
प्यारी भौंहनि चितै रहे, परम रसिक सिरमौर ।
चलत भाँवती रुचि लियैं, रुचत नहीं कछु और ।।33।।
रुचि-रुचि रस के रचे रुचि, मानौं प्यारी-पीय ।
सहज प्रेम के रँग रँगे, द्वै तन-मन इक जीय ।।34।।
दैबैं कौं राख्यौ न कछु, अति उदार सुकुँवारि ।
अधर-सुधा प्यावत पियहि, मुख-छबि रही निहारि ।।35।।
अति प्रवीन सब अंग में, जानत बहुत लड़ाइ ।
सुख समुद्र में लाड़िली, लिये जनु लाल न्हवाइ ।।36।।
रुचि फुलवारी फूलि रही, प्रीतम के उर ऐंन ।
सींचत प्यारी प्यार-जल, चितवनि मुसिकनि सैंन ।।37।।
अलक लड़ी पिय पर लटकि, प्यार सौं रही भुज डारि ।
यातैं चित्र से ह्वै रहे, जिन भुज लेहिं उतारि ।।38।।
अंग-अंग छवि माधुरी, निरखत पिय न अघाइ ।
देखि लाल के लालचहिं, लालच रहि ललचाइ ।।39।।
कहा कहौं या प्रेम की, पिय के गति नहिं आँन ।
एक लाड़िली संग ही, जिनके जीवन प्रान ।।40।।
कवित्त
अलबेली सुकुँवारी नैंननिं के आगे रहै, तब लगि प्रीतम के प्रान रहैं तन में ।
यहै जिय जानि प्यारी रंचकौ न होत न्यारी, तिनहीं के प्रेम-रंग रँगि रही मन में ।।
परम प्रवीन गोरी हाव-भाव में किशोरी, नये-नये छवि के तरंग उठैं छिन में ।
‘हित ध्रुव’ प्रीतम के नैंन-मीन रस लीन, खेलिबौ करत दिन-प्रति रूप-वन में ।।41।।
दोहा
स्थूल मदन रस कछु कह्यौ, अब सुनि सूक्षम रूप ।
जहाँ विराजत एक रस, रहत हैं प्रेम सरूप ।।42।।
भीने दोऊ आसक्ति रस, तन-मन रहे अरुझाइ ।
एक प्यार ही दुहुँनि पर, रह्यौ सहज ही छाइ ।।43।।
कवित्त
प्यार ही की कुंज और प्यार ही की सेज रची, प्यार ही सौं प्यारे लाल प्यारी बात करहीं ।
प्यार ही की चितवनि मुसिकनि प्यार ही की, प्यार ही सौं प्यारी जू कौं प्यारौ अंक धरहीं ।।
प्यार सौं लटकि रहैं प्यार ही सौं मुख चहैं, प्यार ही सौं प्यारौ प्रिया अंक भुज भरहीं ।
‘हित ध्रुव’ प्यार भरी प्यारी सखी देखैं खरी, प्यारै-प्यार रह्यौ छाइ, प्यार-रस ढरहीं ।।44।।
दोहा
चितवनि मुसिकनि सौं रँगे, प्रेम-रंग रस-सार ।
छके रहत मद मत्त गति, आनँद नेह सिंगार ।।45।।
दरसत परसत उरज उर, छुवनि कचनि भुजमूल ।
पहिरैं पट दोऊ प्रेम के, बिसरे नेम दुकूल ।।46।।
बूड़यौ मन रस प्रेम में, धीरज धरि सकैं नाहिं ।
नैंन-कमल हरुवे हुते, तिरत रूप-जल माहिं ।।47।।
फूल सुरँग अनुराग के, उर-उर में रहे फूलि ।
मनहुँ भ्रमर मन दुहुँनि के, छबि-सुगंध रहे झूलि ।।48।।
जीवन मुसिकनि चितैवौ, अधर सुधा-रस स्वास ।
लेत मधुप मन पिय मनौं, कोमल कमल सुवास ।।49।।
पहिरैं दोऊ अति फूल सौं, फूल-बिलास कौ हार ।
केलिहुँ तहाँ भारी लगत, ऐसै दोऊ सुकुँवार ।।50।।
कवित्त
माधुरी की कुंज तामें मोद की लै सेज रची, तेहि पर राजैं अलबेले सुकुमार री ।
रूप तेज मोद के जुगल तन जगमगैं, हाव-भाव चातुरी के भूषन सुढार री ।।
नेह-नीर नैंननिं की सैंननिं में रहे भींजि, कौन रंग बाढ्यौ जहाँ बोलिबोऊ भार री ।
अति ही आसक्त सखी रहीं मोहि जोहि-जोहि, ‘हित ध्रुव’ प्राननिं कौ यहै है अहार री ।।51।।
दोहा
रस ही की मूरति दोऊ, रसिक लाडिली लाल ।
रस ही सौं चितवत रहैं, रस भरे नैंन बिसाल ।।52।।
पिय परसत भुज मूल कर, और उरज हिय-हार ।
बूड़ि जात मन रूप में, रहत न देह सँभार ।।53।।
प्रेम-नेम की दसा जिती, उपजत आनहिं आँन ।
रस-निधान विलसत रहैं, सुख कौं नाहिं प्रमाँन ।।54।।
और न कछू सुहाइ मन, यह जाँचत निसि-भोर ।
या सुख-धन सौं लगे रहौ, ‘ध्रुव’ लोइन दिन मोर ।।55।।
यह सुख निरखत सखिनु के, आनँद बढ्यौ न थोर ।
हेमलता फूली मनौं, झूँमि रही चहूँ ओर ।।56।।
छप्पन दोहा कहे ‘ध्रुव’, आनँद-दशा-विनोद ।
रूप-माधुरी रँग रंगे, पगे प्रेम-रस-मोद ।।57।।
।।जै जै श्री आनन्द दशा विनोद लीला की जै जै श्री हित हरिवंश।।
35. रहस्यलता लीला
दोहा
जो कह्यौ श्री हरिवंश रस, बिरलौ समुझनहार ।
एक दोइ जो पाइयै, खोजत सब संसार ।।1।।
नव किशोर सुकुँवार तन, मृदु भुज मेले अंश ।
जोरी सनी सनेह रस, प्रगट करी हरिवंश ।।2।।
नव दूलहु नव दुलहिनी, एक प्रान द्वै देह ।
वृंदावन बरसत रहैं, नवल नेह कौ मेह ।।3।।
कहा कहौं पानिप मुखनि की, छबिहिं नाहिं कहुँ ओर ।
राजत ऐसी भाँति मनौं, द्वै ससि चतुर चकोर ।।4।।
सीस फूल सिखि-चंद्रिका, छबि की उठत झकोर ।
मानौं छबि सिंगार ढिंग, निर्त्तत आनँद-मोर ।।5।।
विवि भालनि विवि बरन की, बैंदी दई अनूप ।
मनु अनुराग सिंगार की, जोरी बनी सरूप ।।6।।
सोरठा
लोचन परम रसाल, कजरारे सुठि सोहने ।
चंचल नैंन विशाल, अनियारे मन-मोहने ।।7।।
अरिल्ल
देखत आप में रूप न कबहूँ अघात हैं ।
दोऊ इक रस रीति न प्रेम समात हैं ।।
पलु-पलु में रुचि बढ़ै सखी मुसिकात हैं ।
हरि हाँ, मुख सौं मुख रहे जोरि तऊ ललचात हैं ।।8।।
दोहा
झलकनि बेसरि दुहुँनि की, उपमा कही न जाइ ।
स्वाँस पवन मुक्तनि डुलनि, सो छबि रही उर छाइ ।।9।।
कहा कहौं छबि नासिकनि, शुक तिल फूलनि डारि ।
अधर सुरंग बंधूक तें, बिंब पँवारनि वारि ।।10।।
चिबुक मध्य बन्यौ सहजहीं, बिंदुकन अतिहि अनूप ।
पिय साँवल कौ मन मनौं, पर्यो रूप के कूप ।।11।।
बंक चितवनी रस भरी, बेधे प्रीतम प्रान ।
जद्दपि सूर प्रवीन हैं, भूले सबै सयान ।।12।।
रूप-छटा छबि की छटा, उमड़ी रहतिं अनेक ।
कैसैं सकै सँभारि सखि, पिय-मन-चातिक एक ।।13।।
छुटे बार सौंधे सने, श्रम-जलकन मुख जोति ।
मानौं सींव सिंगार की, बनी कंठ पर पोत ।।14।।
जलज हार हीरावली, रतनावली सुरंग ।
अनुराग सरोवर में मनौं, उठत हैं रूप तरंग ।।15।।
पानिप झलक कपोल पर, अलक रही सुठि सोहि ।
रसिक लाल पाइनिं परत, छिन-छिन यह छबि जोहि ।।16।।
कहि न सकत अंगनि-प्रभा, मेरी मति अति हीन ।
चंद्र सिमंतक दामिनी, जंबूनद रद कीन ।।17।।
मोतिन की लर बीच-बिच, कंठ गुराई रेष ।
निरखि फँस्यौ मन मोद-फँद, बिसर्यौ मोहन वेष ।।18।।
कुच कमलनि की छबि निरखि, रहे लाल ललचाइ ।
अति विशाल अँखियन निरखि, चितई मुरि मुसिकाइ ।।19।।
अति सुदेश अँगिया बनी, कसनि कसी छबि देति ।
भुज मूलनि की गौरता, पिय प्रानँनि हरि लेत ।।20।।
सोभा की सरिता उदर, नाभि भँवर रस ऐंन ।
परे तहाँ निकसत नहीं, प्रीतम के मन-नैंन ।।21।।
बसन सहाने अति सुरँग, चुनि पहिराये बानि ।
मिहँदी परम सुरंग सौं, रचे चरन मृदु-पानि ।।22।।
प्रेम बेलि दुहुँ में बढ़ी, फूली फूल-बिलास ।
निसि-दिन पहिरे रहत उर, दंपति हार-हुलास ।।23।।
पिय नैंननिं में प्रिया बसै, प्रिया नैंननिं में पीय ।
हिय सौं हिय लागे रहैं, मिलि रहे जिय सौं जीय ।।24।।
दरसत परसत हँसत ही, बीते कलप अनेक ।
कबहुँ न आई पिय हियैं, मिलि बैठे घरी एक ।।25।।
अति उदार सुकुँवार दोऊ, रसिक सूर रस माँहिं ।
छिन-छिन बाढ़त चौंप नई, नैंकु मुरत मन नाँहिं ।।26।।
रसिक रँगीले रँग भरे, अति ही रसीले आहि ।
अद्भुत छबि की माधुरी, जीवत हैं दोऊ चाहि ।।27।।
बदन किशोरी चंद मनौं, भये किशोर चकोर ।
पल न परत निरखत रहैं, नवल नैंन की कोर ।।28।।
बंक भृकुटी अति सोहनी, बिच-बिच मुसिकनि मंद ।
कैसैं निकसै पर्यो मन, रचे जहाँ इते फंद ।।29।।
देखि दसा पिय लाल की, रही वाम तन घूँमि ।
कोमल हिय अति हेत सौं, लागी पिय हिय झूँमि ।।30।।
सोरठा
अद्भुत प्रेम विहार, रह्यौ प्यार ध्रुव छाइ कै ।
तैसेई दोऊ सुकुँवार, और सखीनु गति एकही ।।31।।
दोहा
पिय कौ मन प्यारी प्रिया, प्यारी कौ मन लाल ।
पहिरैं पट तन-तन बरन, चलत एक ही चाल ।।32।।
शील सुभाव सनेह गुन, वय अरु रूप समान ।
रँगे परस्पर एक रँग, अति प्रवीन रसजान ।।33।।
छिन छिन बाढत नेह नव, पल-पल रूप-तरंग ।
इक रस प्रेम छके रहैं, भीने रंग अनंग ।।34।।
मोहे मोहन मैंन-रँग, चितवनि भौंहनि भाइ ।
कबहुँ बिवस चेतत कबहुँ, प्यारी प्यार उपाइ ।।35।।
खेलत रहसि निकुंज में, अतिहि रहसि निजु-केलि ।
लपटी प्रेम-तमाल सौं, मनौं रूप की बेलि ।।36।।
नूपुर भूषन मनि झलक, किंकिनि शब्द अपार ।
सखियनि हियौ सिरात सुनि, झनक-झनक झनकार ।।37।।
कबहुँ बात मुसिकात बिच, फिरि-फिरि फिरि लपटात ।
ऐसै रंग बिहार में, तदपि न सखी अघात ।।38।।
रीति दुहुँनि की एक ही, हारत नाहिंन कोइ ।
जो छिन आवत है सखी, चौंप चौगुनी होइ ।।39।।
लागे आनँद बेलि सौं, चितवनि मुसिकनि फूल ।
लाज बसन तजि कैं मनौं, पहिरैं फूल-दुकूल ।।40।।
नैंन-कटाक्षनि की चलनि, चितै रहे मुसिकाइ ।
तबहिं कुवँरि दै अधर-रस, लीने उर सौं लाइ ।।41।।
पिय कै औषध यहै है, अधर-सुधा-रस पान ।
एक लाड़िली सहज ही, जिनकैं जीवन-प्रान ।।42।।
अंगनि की छबि चितैवौ, यह जीवन पिय जीय ।
और भुजनि भरि हेत सौं, रहत लाइ जब हीय ।।43।।
रस-पति रति-पति भूलि रहे, देखत अद्भुत रीति ।
घटत न कबहुँ बढ़त रहै, छिन छिन नव-नव प्रीति ।।44।।
हँसि चितवति जब लाड़िली, डगमगात सुकुमार ।
अति प्रवीन रस नागरी, थाँभि लेति तेहि बार ।।45।।
बिवस होत जब दोऊ प्रिय, माते प्रेम-अनंग ।
रहति सहेली-सहचरी, सावधान तिन संग ।।46।।
अधर-अधर हिय सौं हियौ, उरजनि सौं पिय-पान ।
अंगनि छ्वावत चेत भये, समुझत सखी सुजान ।।47।।
कबहुँ प्रिया पट पीय के, पिय प्यारी के वास ।
पहिरैं दोऊ आनंद में, निर्त्तत रास-बिलास ।।48।।
हावभाव निर्त्तत मनौं, चितवनि सुलप सुदेस ।
उरप-तिरप झटकनि भुजनि, खुले सगबगे केस ।।49।।
अधरनि की जुरी मंडली, करनि फिरनि सुख मूल ।
नैंन सैंन देसी सरस, मुसिकनि बरसत फूल ।।50।।
राग बचन धुनि भूषननि, बाजे बजत अनंग ।
सखी मृगी रहीं मोहि कै, जिनकै प्रेम अभंग ।।51।।
निसि दिन है अवलंब यह, अद्भुत जुगल-बिहार ।
ललितादिक निज सहचरी, छिन छिन करतिं सिंगार ।।52।।
सह रस तौ कछु सुगम नहिं, तन-मन तें अति दूरि ।
जानत तेई रसिक जन, जिनके जीवन-मूरि ।।53।।
ब्रह्मादिक मुकटनिं सहित, जिनकौं घसत है सींस ।
प्रिया-चरन जावक रचत, तेइ वृंदावन-ईस ।।54।।
यह बिलास जो चिंतवत, चिंता मन मिटि जाहि ।
आनंद कौ दीपक दिपै, निसि-दिन तेहि उर माँहि ।।55।।
यह रस परस्यौ नाँहिं जिन, तिनहिं न नैंकु जताइ ।
जैसैं धन कौ धनी ‘ध्रुव’, राखत दूरि दुराइ ।।56।।
सहज अलौकिक प्रेम वर, दंपति रहे लुभाइ ।
लौकिक रसना कै कहौ, कैसैं बरन्यौ जाइ ।।57।।
वृंदावन वर कल्पतरु, सर्वोपरि ‘ध्रुव’ आहि ।
मनहूँ कै जो चिंतवत, देत तबहिं फल ताहि ।।58।।
दोहा रहसि लतानि के, अष्ट ऊपरि पंचास ।
सुनत सुनावत बढ़त उर, ‘हित ध्रुव’ प्रेम-विलास ।।59।।
कुंडलिया
बार-बार तो बनत नहिं, यह संजोग अनूप ।
मानुष तन वृंदाविपिन, रसिकनि सँग विवि रूप ।।
रसिकनि सँग विवि रूप, भजन सर्वोपरि आही ।
मन दै ‘ध्रुव’ यह रंग, लेहु पल-पल अवगाही ।।
जो छिन जात सो फिरत नहीं, करहु उपाइ अपार ।
सकल सयानप छाँड़ि भजि, दुर्लभ है यह बार ।।60।।
।।जै जै श्री रहस्य लता लीला की जै जै श्री हित हरिवंश।।
दोहा
जो कह्यौ श्री हरिवंश रस, बिरलौ समुझनहार ।
एक दोइ जो पाइयै, खोजत सब संसार ।।1।।
नव किशोर सुकुँवार तन, मृदु भुज मेले अंश ।
जोरी सनी सनेह रस, प्रगट करी हरिवंश ।।2।।
नव दूलहु नव दुलहिनी, एक प्रान द्वै देह ।
वृंदावन बरसत रहैं, नवल नेह कौ मेह ।।3।।
कहा कहौं पानिप मुखनि की, छबिहिं नाहिं कहुँ ओर ।
राजत ऐसी भाँति मनौं, द्वै ससि चतुर चकोर ।।4।।
सीस फूल सिखि-चंद्रिका, छबि की उठत झकोर ।
मानौं छबि सिंगार ढिंग, निर्त्तत आनँद-मोर ।।5।।
विवि भालनि विवि बरन की, बैंदी दई अनूप ।
मनु अनुराग सिंगार की, जोरी बनी सरूप ।।6।।
सोरठा
लोचन परम रसाल, कजरारे सुठि सोहने ।
चंचल नैंन विशाल, अनियारे मन-मोहने ।।7।।
अरिल्ल
देखत आप में रूप न कबहूँ अघात हैं ।
दोऊ इक रस रीति न प्रेम समात हैं ।।
पलु-पलु में रुचि बढ़ै सखी मुसिकात हैं ।
हरि हाँ, मुख सौं मुख रहे जोरि तऊ ललचात हैं ।।8।।
दोहा
झलकनि बेसरि दुहुँनि की, उपमा कही न जाइ ।
स्वाँस पवन मुक्तनि डुलनि, सो छबि रही उर छाइ ।।9।।
कहा कहौं छबि नासिकनि, शुक तिल फूलनि डारि ।
अधर सुरंग बंधूक तें, बिंब पँवारनि वारि ।।10।।
चिबुक मध्य बन्यौ सहजहीं, बिंदुकन अतिहि अनूप ।
पिय साँवल कौ मन मनौं, पर्यो रूप के कूप ।।11।।
बंक चितवनी रस भरी, बेधे प्रीतम प्रान ।
जद्दपि सूर प्रवीन हैं, भूले सबै सयान ।।12।।
रूप-छटा छबि की छटा, उमड़ी रहतिं अनेक ।
कैसैं सकै सँभारि सखि, पिय-मन-चातिक एक ।।13।।
छुटे बार सौंधे सने, श्रम-जलकन मुख जोति ।
मानौं सींव सिंगार की, बनी कंठ पर पोत ।।14।।
जलज हार हीरावली, रतनावली सुरंग ।
अनुराग सरोवर में मनौं, उठत हैं रूप तरंग ।।15।।
पानिप झलक कपोल पर, अलक रही सुठि सोहि ।
रसिक लाल पाइनिं परत, छिन-छिन यह छबि जोहि ।।16।।
कहि न सकत अंगनि-प्रभा, मेरी मति अति हीन ।
चंद्र सिमंतक दामिनी, जंबूनद रद कीन ।।17।।
मोतिन की लर बीच-बिच, कंठ गुराई रेष ।
निरखि फँस्यौ मन मोद-फँद, बिसर्यौ मोहन वेष ।।18।।
कुच कमलनि की छबि निरखि, रहे लाल ललचाइ ।
अति विशाल अँखियन निरखि, चितई मुरि मुसिकाइ ।।19।।
अति सुदेश अँगिया बनी, कसनि कसी छबि देति ।
भुज मूलनि की गौरता, पिय प्रानँनि हरि लेत ।।20।।
सोभा की सरिता उदर, नाभि भँवर रस ऐंन ।
परे तहाँ निकसत नहीं, प्रीतम के मन-नैंन ।।21।।
बसन सहाने अति सुरँग, चुनि पहिराये बानि ।
मिहँदी परम सुरंग सौं, रचे चरन मृदु-पानि ।।22।।
प्रेम बेलि दुहुँ में बढ़ी, फूली फूल-बिलास ।
निसि-दिन पहिरे रहत उर, दंपति हार-हुलास ।।23।।
पिय नैंननिं में प्रिया बसै, प्रिया नैंननिं में पीय ।
हिय सौं हिय लागे रहैं, मिलि रहे जिय सौं जीय ।।24।।
दरसत परसत हँसत ही, बीते कलप अनेक ।
कबहुँ न आई पिय हियैं, मिलि बैठे घरी एक ।।25।।
अति उदार सुकुँवार दोऊ, रसिक सूर रस माँहिं ।
छिन-छिन बाढ़त चौंप नई, नैंकु मुरत मन नाँहिं ।।26।।
रसिक रँगीले रँग भरे, अति ही रसीले आहि ।
अद्भुत छबि की माधुरी, जीवत हैं दोऊ चाहि ।।27।।
बदन किशोरी चंद मनौं, भये किशोर चकोर ।
पल न परत निरखत रहैं, नवल नैंन की कोर ।।28।।
बंक भृकुटी अति सोहनी, बिच-बिच मुसिकनि मंद ।
कैसैं निकसै पर्यो मन, रचे जहाँ इते फंद ।।29।।
देखि दसा पिय लाल की, रही वाम तन घूँमि ।
कोमल हिय अति हेत सौं, लागी पिय हिय झूँमि ।।30।।
सोरठा
अद्भुत प्रेम विहार, रह्यौ प्यार ध्रुव छाइ कै ।
तैसेई दोऊ सुकुँवार, और सखीनु गति एकही ।।31।।
दोहा
पिय कौ मन प्यारी प्रिया, प्यारी कौ मन लाल ।
पहिरैं पट तन-तन बरन, चलत एक ही चाल ।।32।।
शील सुभाव सनेह गुन, वय अरु रूप समान ।
रँगे परस्पर एक रँग, अति प्रवीन रसजान ।।33।।
छिन छिन बाढत नेह नव, पल-पल रूप-तरंग ।
इक रस प्रेम छके रहैं, भीने रंग अनंग ।।34।।
मोहे मोहन मैंन-रँग, चितवनि भौंहनि भाइ ।
कबहुँ बिवस चेतत कबहुँ, प्यारी प्यार उपाइ ।।35।।
खेलत रहसि निकुंज में, अतिहि रहसि निजु-केलि ।
लपटी प्रेम-तमाल सौं, मनौं रूप की बेलि ।।36।।
नूपुर भूषन मनि झलक, किंकिनि शब्द अपार ।
सखियनि हियौ सिरात सुनि, झनक-झनक झनकार ।।37।।
कबहुँ बात मुसिकात बिच, फिरि-फिरि फिरि लपटात ।
ऐसै रंग बिहार में, तदपि न सखी अघात ।।38।।
रीति दुहुँनि की एक ही, हारत नाहिंन कोइ ।
जो छिन आवत है सखी, चौंप चौगुनी होइ ।।39।।
लागे आनँद बेलि सौं, चितवनि मुसिकनि फूल ।
लाज बसन तजि कैं मनौं, पहिरैं फूल-दुकूल ।।40।।
नैंन-कटाक्षनि की चलनि, चितै रहे मुसिकाइ ।
तबहिं कुवँरि दै अधर-रस, लीने उर सौं लाइ ।।41।।
पिय कै औषध यहै है, अधर-सुधा-रस पान ।
एक लाड़िली सहज ही, जिनकैं जीवन-प्रान ।।42।।
अंगनि की छबि चितैवौ, यह जीवन पिय जीय ।
और भुजनि भरि हेत सौं, रहत लाइ जब हीय ।।43।।
रस-पति रति-पति भूलि रहे, देखत अद्भुत रीति ।
घटत न कबहुँ बढ़त रहै, छिन छिन नव-नव प्रीति ।।44।।
हँसि चितवति जब लाड़िली, डगमगात सुकुमार ।
अति प्रवीन रस नागरी, थाँभि लेति तेहि बार ।।45।।
बिवस होत जब दोऊ प्रिय, माते प्रेम-अनंग ।
रहति सहेली-सहचरी, सावधान तिन संग ।।46।।
अधर-अधर हिय सौं हियौ, उरजनि सौं पिय-पान ।
अंगनि छ्वावत चेत भये, समुझत सखी सुजान ।।47।।
कबहुँ प्रिया पट पीय के, पिय प्यारी के वास ।
पहिरैं दोऊ आनंद में, निर्त्तत रास-बिलास ।।48।।
हावभाव निर्त्तत मनौं, चितवनि सुलप सुदेस ।
उरप-तिरप झटकनि भुजनि, खुले सगबगे केस ।।49।।
अधरनि की जुरी मंडली, करनि फिरनि सुख मूल ।
नैंन सैंन देसी सरस, मुसिकनि बरसत फूल ।।50।।
राग बचन धुनि भूषननि, बाजे बजत अनंग ।
सखी मृगी रहीं मोहि कै, जिनकै प्रेम अभंग ।।51।।
निसि दिन है अवलंब यह, अद्भुत जुगल-बिहार ।
ललितादिक निज सहचरी, छिन छिन करतिं सिंगार ।।52।।
सह रस तौ कछु सुगम नहिं, तन-मन तें अति दूरि ।
जानत तेई रसिक जन, जिनके जीवन-मूरि ।।53।।
ब्रह्मादिक मुकटनिं सहित, जिनकौं घसत है सींस ।
प्रिया-चरन जावक रचत, तेइ वृंदावन-ईस ।।54।।
यह बिलास जो चिंतवत, चिंता मन मिटि जाहि ।
आनंद कौ दीपक दिपै, निसि-दिन तेहि उर माँहि ।।55।।
यह रस परस्यौ नाँहिं जिन, तिनहिं न नैंकु जताइ ।
जैसैं धन कौ धनी ‘ध्रुव’, राखत दूरि दुराइ ।।56।।
सहज अलौकिक प्रेम वर, दंपति रहे लुभाइ ।
लौकिक रसना कै कहौ, कैसैं बरन्यौ जाइ ।।57।।
वृंदावन वर कल्पतरु, सर्वोपरि ‘ध्रुव’ आहि ।
मनहूँ कै जो चिंतवत, देत तबहिं फल ताहि ।।58।।
दोहा रहसि लतानि के, अष्ट ऊपरि पंचास ।
सुनत सुनावत बढ़त उर, ‘हित ध्रुव’ प्रेम-विलास ।।59।।
कुंडलिया
बार-बार तो बनत नहिं, यह संजोग अनूप ।
मानुष तन वृंदाविपिन, रसिकनि सँग विवि रूप ।।
रसिकनि सँग विवि रूप, भजन सर्वोपरि आही ।
मन दै ‘ध्रुव’ यह रंग, लेहु पल-पल अवगाही ।।
जो छिन जात सो फिरत नहीं, करहु उपाइ अपार ।
सकल सयानप छाँड़ि भजि, दुर्लभ है यह बार ।।60।।
।।जै जै श्री रहस्य लता लीला की जै जै श्री हित हरिवंश।।
36. आनन्द लता लीला
दोहा
आनँद कौ रँग नित जहाँ, सोच न दुचितई लेस ।
इक-छत विलसत राज-रस, वृंदा विपिन नरेस ।।1।।
खेलत फूलनि-कुंज में, बाढ्यौ रंग अनंद ।
आनँद में सब सहचरी, आनँद के विवि चंद ।।2।।
बास रँगीली लाड़िली, फूल रँगीलौ पीय ।
नेह-देह नागर नवल, नागरि आनँद-हीय ।।3।।
आनँद-द्रुम आनंद-लता, फूले आनँद-फूल ।
आनँद-रस जमुना बहै, मनिमय आनँद-कूल ।।4।।
सर्वोपरि आनंद-निधि, वृंदावन सुख-पुंज ।
द्रुम-द्रुम बोलत खग मधुर, कुंज-कुंज अलि गुंज ।।5।।
जहँ-तहँ फूले कमल वर, और फूल चहूँ ओर ।
फूले-फूले फिरत तहाँ, रस में मधुपनि-दौर ।।6।।
राजत हैं दोऊ रँग भरे, रूप-सींव सुकुँवार ।
तन-मन अरुझे प्रेम-रँग, आनँद-रंग सिंगार ।।7।।
मदन-हुलास विलास रँग, आनँद-रस को कंद ।
कहा कहौं चहुँ ओर सखि, लुठत फिरत आनंद ।।8।।
नव किशोरता माधुरी, छबि-विद्या सब आनि ।
प्रिया-चरन सेवत रहैं, ठाढ़ी जोरैं पानि ।।9।।
अधर जुरनि उर-उर घुरनि, मुरनि अंग कोऊ भाँति ।
सो छबि अद्भुत सहज की, कैसैं बरनी जाति ।।10।।
छुवनि कुचनि मन-मन रुचनि, प्रीतम कर धरैं आनि ।
कंचन के श्रीफल मनौं, ढँके कमल-दल बानि ।।11।।
उरज कलस कुंदन बने, मानौं मंगल साज ।
कुँवरि रूप के नगर कौ, पिय पायौ सुख-राज ।।12।।
कजरारे चंचल नैंन, निरखत अति सुख होइ ।
मानौं छबि के कंज पर, खेलत खंजन दोइ ।।13।।
नैंन जुरनि भौंहनि मुरनि, संधि छबीली ठौर ।
कैसै निकसै पर्यौ जहँ, चित्त रसिक सिरमौर ।।14।।
प्यारौ तन प्यारौ सबै, करत नैंन मग पान ।
अधर नाभि भुज मूल कुच, तहाँ बसत पिय प्रान ।।15।।
ललित लड़ैती कुँवरि की, चलनि छबीली भाँति ।
विवस लाल पाछैं फिरत, अवलोकत तन काँति ।।16।।
जहँ-जहँ मनिमय धरनि पर, चरन धरति सुकुँवारि ।
तहँ-तहँ पिय दृग-अंचलनि, पहिलेहिं धरहिं सँवारि ।।17।।
सोरठा
श्री वृंदावन माँहि आनंद-सिंधु तरंग उठैं।
घन अनुराग चुचाँहि, फूले छबि के फूल द्वै ।।18।।
सवैया
रूप कौ फूल रसीली विहारनि, मैंन कौ फूल रसीलौ बिहारी ।
फूलि रहे अनुराग के बाग में, राग कौ रंग बढ्यौ रुचिकारी ।।
भावै यहै पिय के मन कौं, सुख खेलैं हँसैं रस में सुकुवाँरी ।
सखी चहूँ ओर विलोकति हैं ‘ध्रुव’,आनँद वारि किधौं फुलवारी।।19।।
दोहा
भुजनि भरत मन मन हरत, करत रंग रस-केलि ।
आनँद-स्याम तमाल सौं, लपटी आनँद-बेलि ।।20।।
नख-सिख भूषन झलकि रहे, प्रतिबिंबित अंग-अंग ।
झलमलात अगनित मनौं, दर्पण दीप- अनंग ।।21।।
अद्भुत रंग अनंग-रस, बिच-बिच प्रेम-तरंग ।
इहि कौतुक न अघात कोऊ, जदपि मिले अंग-अंग ।।22।।
श्रम-जलकन मुख गौर पर, छुटे बार अरु हार ।
पलटि परे पट सहजहीं, सोभा बढ़ी अपार ।।23।।
यह सुख निरखत सहचरी, भरी रंग दुहुँ ओर ।
अँखियाँ तो दुचिती भईं, परीं रूप-झकझोर ।।24।।
नैंन श्रमित मुद्रित मनौं, प्रीतम रहे छबि जोहि ।
मानौं कंचन माल में, छबि के अलि रहे सोहि ।।25।।
निरखत छबि मुख-माधुरी, बाढ्यौ प्रेम-अनंग ।
जैसैं सिंधु-तरंग उठैं, बिधु तन अतिहि उतंग ।।26।।
तबहिं लाड़िली लाल तन, हँसि चितवति मुख ओर ।
मानौं प्यावत प्यार सौं, प्रेम-रसासव घोर ।।27।।
निरखत मोहन रूप तन, छिन छिन होत अचेत ।
प्याइ अधर-रस-माधुरी, करवावत है चेत ।।28।।
सोरठा
रुचि कौ यहै अहार, प्यारी की उनहारि सखि ।
जीवत तेहि आधार, प्रान-प्रिया हिरदै बसै ।।29।।
दोहा
परम रसिक नागर नवल, और न कछू सुहात ।
कै भावै छवि देखिबौ, कै सुन्यौ चाहत बात ।।30।।
पानिप कौ पानी पियत, त्रिपित होत नहिं नैंन ।
उमड़यौ रहत है एक रस, प्रेम-रंग उर ऐंन ।।31।।
जब-जब मुख देखत रहैं, कज्जल नैंननिं कोर ।
पिय-लोइनि निर्त्तत मनौं, आनँद के द्वै मोर ।।32।।
मेघ महल परदा फुँही, राजत कुंज-निकुंज ।
बैठे नेह की सेज पर, करत केलि सुख पुंज ।।33।।
अतिहिं लालची लाल पिय, निरखत हूँ न अघात ।
प्रिया-रूप तन-विपिन में, रहे नैंन उरझात ।।34।।
फूलनि देखत फिरत हैं, तदाकार इहि भाइ ।
प्रिया-चरन पावत जहाँ, तह-तहँ रहत लुभाइ ।।35।।
महाभाव-गति अति सरस, उपजत नव-नव भाव ।
मोहन छबि निरख्यौ करत, बढ्यौ प्रेम कौ चाव ।।36।।
राजति अंक में लाड़िली, प्रीतम जानत नाँहिं ।
विलपत रुदन बढ्यौ जहाँ, महाभाव उर माहिं ।।37।।
अति प्रवीन सब सहचरी, जानत रस की रीति ।
अंगनि छ्वावतिं करनि पिय, होत न तऊ प्रतीति ।।38।।
हँसि लागी जब कंठ सौं, लये जगाइ अनुराग ।
मानौं दीनौं रीझि कै आनंद-हार सुहाग ।।39।।
एक समैं भ्रम प्रेम कौ, बढ्यौ दुहुनिं के हीय।
पीय कहत हौं ही प्रिया, प्रिया कहति हौं पीय ।।40।।
अटपटी चाल है प्रेम की, को समुझै यह बात ।
रंगे परस्पर एक रंग, अदल-बदल ह्वै जात ।।41।।
उपजत अंगनि-अंग रँग, छिन छिन औरै और।
अति प्रवीन विलसत रहैं, परम रसिक सिरमौर ।।42।।
वृंदावन आनंद की, बारि सुदृढ़ ‘ध्रुव’ आहि ।
माया काल प्रपंच की, पवन न परसति ताहि ।।43।।
दुःख निसानी नैंकु नहिं, इक छत सुख कौ राज ।
मत्त भये खेलत दोऊ, सखियनि संग समाज ।।44।।
छबि-विताँन आनंद कौ, वृंदावन रह्यौ छाइ ।
सोच-धूप कौ ताप तहाँ, कबहूँ न परसत आइ ।।45।।
वृंदावन-छबि झलक की, उपमा नहिं कछु आँन ।
जेहि आगे ससि-भान दोऊ, होत हैं तिमिर समान ।।46।।
भूली छबि श्री मोहनी, सोहनी रह गई पानि ।
झनक-भनक श्रवननि परी, नैंननिं मृदु मुसिकाँनि ।।47।।
भजन आहिं बहु भाँति के, नहिं आवत उर-ऐंन ।
जुगल-रूप-घन विपिन-तन, तहाँ उरझैं ‘ध्रुव’ नैंन ।।48।।
दोहा तीस उन्नीस कहे, “आनँद लता अनंग”।
सुनत हिये ‘ध्रुव’ प्रेम कौ, फूलै कमल-सुरंग ।।49।।
।।जै जै श्री आनन्द लता लीला की जै जै श्री हरिवंश।।
दोहा
आनँद कौ रँग नित जहाँ, सोच न दुचितई लेस ।
इक-छत विलसत राज-रस, वृंदा विपिन नरेस ।।1।।
खेलत फूलनि-कुंज में, बाढ्यौ रंग अनंद ।
आनँद में सब सहचरी, आनँद के विवि चंद ।।2।।
बास रँगीली लाड़िली, फूल रँगीलौ पीय ।
नेह-देह नागर नवल, नागरि आनँद-हीय ।।3।।
आनँद-द्रुम आनंद-लता, फूले आनँद-फूल ।
आनँद-रस जमुना बहै, मनिमय आनँद-कूल ।।4।।
सर्वोपरि आनंद-निधि, वृंदावन सुख-पुंज ।
द्रुम-द्रुम बोलत खग मधुर, कुंज-कुंज अलि गुंज ।।5।।
जहँ-तहँ फूले कमल वर, और फूल चहूँ ओर ।
फूले-फूले फिरत तहाँ, रस में मधुपनि-दौर ।।6।।
राजत हैं दोऊ रँग भरे, रूप-सींव सुकुँवार ।
तन-मन अरुझे प्रेम-रँग, आनँद-रंग सिंगार ।।7।।
मदन-हुलास विलास रँग, आनँद-रस को कंद ।
कहा कहौं चहुँ ओर सखि, लुठत फिरत आनंद ।।8।।
नव किशोरता माधुरी, छबि-विद्या सब आनि ।
प्रिया-चरन सेवत रहैं, ठाढ़ी जोरैं पानि ।।9।।
अधर जुरनि उर-उर घुरनि, मुरनि अंग कोऊ भाँति ।
सो छबि अद्भुत सहज की, कैसैं बरनी जाति ।।10।।
छुवनि कुचनि मन-मन रुचनि, प्रीतम कर धरैं आनि ।
कंचन के श्रीफल मनौं, ढँके कमल-दल बानि ।।11।।
उरज कलस कुंदन बने, मानौं मंगल साज ।
कुँवरि रूप के नगर कौ, पिय पायौ सुख-राज ।।12।।
कजरारे चंचल नैंन, निरखत अति सुख होइ ।
मानौं छबि के कंज पर, खेलत खंजन दोइ ।।13।।
नैंन जुरनि भौंहनि मुरनि, संधि छबीली ठौर ।
कैसै निकसै पर्यौ जहँ, चित्त रसिक सिरमौर ।।14।।
प्यारौ तन प्यारौ सबै, करत नैंन मग पान ।
अधर नाभि भुज मूल कुच, तहाँ बसत पिय प्रान ।।15।।
ललित लड़ैती कुँवरि की, चलनि छबीली भाँति ।
विवस लाल पाछैं फिरत, अवलोकत तन काँति ।।16।।
जहँ-जहँ मनिमय धरनि पर, चरन धरति सुकुँवारि ।
तहँ-तहँ पिय दृग-अंचलनि, पहिलेहिं धरहिं सँवारि ।।17।।
सोरठा
श्री वृंदावन माँहि आनंद-सिंधु तरंग उठैं।
घन अनुराग चुचाँहि, फूले छबि के फूल द्वै ।।18।।
सवैया
रूप कौ फूल रसीली विहारनि, मैंन कौ फूल रसीलौ बिहारी ।
फूलि रहे अनुराग के बाग में, राग कौ रंग बढ्यौ रुचिकारी ।।
भावै यहै पिय के मन कौं, सुख खेलैं हँसैं रस में सुकुवाँरी ।
सखी चहूँ ओर विलोकति हैं ‘ध्रुव’,आनँद वारि किधौं फुलवारी।।19।।
दोहा
भुजनि भरत मन मन हरत, करत रंग रस-केलि ।
आनँद-स्याम तमाल सौं, लपटी आनँद-बेलि ।।20।।
नख-सिख भूषन झलकि रहे, प्रतिबिंबित अंग-अंग ।
झलमलात अगनित मनौं, दर्पण दीप- अनंग ।।21।।
अद्भुत रंग अनंग-रस, बिच-बिच प्रेम-तरंग ।
इहि कौतुक न अघात कोऊ, जदपि मिले अंग-अंग ।।22।।
श्रम-जलकन मुख गौर पर, छुटे बार अरु हार ।
पलटि परे पट सहजहीं, सोभा बढ़ी अपार ।।23।।
यह सुख निरखत सहचरी, भरी रंग दुहुँ ओर ।
अँखियाँ तो दुचिती भईं, परीं रूप-झकझोर ।।24।।
नैंन श्रमित मुद्रित मनौं, प्रीतम रहे छबि जोहि ।
मानौं कंचन माल में, छबि के अलि रहे सोहि ।।25।।
निरखत छबि मुख-माधुरी, बाढ्यौ प्रेम-अनंग ।
जैसैं सिंधु-तरंग उठैं, बिधु तन अतिहि उतंग ।।26।।
तबहिं लाड़िली लाल तन, हँसि चितवति मुख ओर ।
मानौं प्यावत प्यार सौं, प्रेम-रसासव घोर ।।27।।
निरखत मोहन रूप तन, छिन छिन होत अचेत ।
प्याइ अधर-रस-माधुरी, करवावत है चेत ।।28।।
सोरठा
रुचि कौ यहै अहार, प्यारी की उनहारि सखि ।
जीवत तेहि आधार, प्रान-प्रिया हिरदै बसै ।।29।।
दोहा
परम रसिक नागर नवल, और न कछू सुहात ।
कै भावै छवि देखिबौ, कै सुन्यौ चाहत बात ।।30।।
पानिप कौ पानी पियत, त्रिपित होत नहिं नैंन ।
उमड़यौ रहत है एक रस, प्रेम-रंग उर ऐंन ।।31।।
जब-जब मुख देखत रहैं, कज्जल नैंननिं कोर ।
पिय-लोइनि निर्त्तत मनौं, आनँद के द्वै मोर ।।32।।
मेघ महल परदा फुँही, राजत कुंज-निकुंज ।
बैठे नेह की सेज पर, करत केलि सुख पुंज ।।33।।
अतिहिं लालची लाल पिय, निरखत हूँ न अघात ।
प्रिया-रूप तन-विपिन में, रहे नैंन उरझात ।।34।।
फूलनि देखत फिरत हैं, तदाकार इहि भाइ ।
प्रिया-चरन पावत जहाँ, तह-तहँ रहत लुभाइ ।।35।।
महाभाव-गति अति सरस, उपजत नव-नव भाव ।
मोहन छबि निरख्यौ करत, बढ्यौ प्रेम कौ चाव ।।36।।
राजति अंक में लाड़िली, प्रीतम जानत नाँहिं ।
विलपत रुदन बढ्यौ जहाँ, महाभाव उर माहिं ।।37।।
अति प्रवीन सब सहचरी, जानत रस की रीति ।
अंगनि छ्वावतिं करनि पिय, होत न तऊ प्रतीति ।।38।।
हँसि लागी जब कंठ सौं, लये जगाइ अनुराग ।
मानौं दीनौं रीझि कै आनंद-हार सुहाग ।।39।।
एक समैं भ्रम प्रेम कौ, बढ्यौ दुहुनिं के हीय।
पीय कहत हौं ही प्रिया, प्रिया कहति हौं पीय ।।40।।
अटपटी चाल है प्रेम की, को समुझै यह बात ।
रंगे परस्पर एक रंग, अदल-बदल ह्वै जात ।।41।।
उपजत अंगनि-अंग रँग, छिन छिन औरै और।
अति प्रवीन विलसत रहैं, परम रसिक सिरमौर ।।42।।
वृंदावन आनंद की, बारि सुदृढ़ ‘ध्रुव’ आहि ।
माया काल प्रपंच की, पवन न परसति ताहि ।।43।।
दुःख निसानी नैंकु नहिं, इक छत सुख कौ राज ।
मत्त भये खेलत दोऊ, सखियनि संग समाज ।।44।।
छबि-विताँन आनंद कौ, वृंदावन रह्यौ छाइ ।
सोच-धूप कौ ताप तहाँ, कबहूँ न परसत आइ ।।45।।
वृंदावन-छबि झलक की, उपमा नहिं कछु आँन ।
जेहि आगे ससि-भान दोऊ, होत हैं तिमिर समान ।।46।।
भूली छबि श्री मोहनी, सोहनी रह गई पानि ।
झनक-भनक श्रवननि परी, नैंननिं मृदु मुसिकाँनि ।।47।।
भजन आहिं बहु भाँति के, नहिं आवत उर-ऐंन ।
जुगल-रूप-घन विपिन-तन, तहाँ उरझैं ‘ध्रुव’ नैंन ।।48।।
दोहा तीस उन्नीस कहे, “आनँद लता अनंग”।
सुनत हिये ‘ध्रुव’ प्रेम कौ, फूलै कमल-सुरंग ।।49।।
।।जै जै श्री आनन्द लता लीला की जै जै श्री हरिवंश।।
37. अनुराग लता लीला
चौपाई
प्रेम-बीज उपजै मन माँहीं ।
तब सब विषै-वासना जाँहीं ।।1।।
जग तें भयौ फिरै वैरागी ।
वृंदावन-रस में अनुरागी ।।2।।
सो अनुराग परम सुखदाई ।
तेहि बिनु ताहि न और सुहाई ।।3।।
नवल प्रेम-रस अटक्यौ जोई ।
धनि वैराग ताहि कौ होई ।।4।।
निस्प्रेही होइ देह तें न्यारौ ।
जहाँ मन लाग्यौ सोई प्यारौ ।।5।।
ताही के रस घूमत डोलै ।
भरे नैंन जल मुख नहिं बोलै ।।6।।
दोहा
तीन लोक कौ राज सुख, देखौ तुला चढ़ाई ।
निमिष प्रेम सुख गरुव अति, तेहि आगैं घटि जाइ ।।7।।
चौपाई
याही रस जाकौ मन भीनौं ।
देह धरे कौ तेहि फल लीनौं ।।8।।
रहै भूलि विवि-रूप मँझारी ।
छिन-छिन चाह बढ़ै अति भारी ।।9।।
या रस कौ साधन नहिं कोई ।
एक कृपा तें जो कछु होई ।।10।।
कहौ कृपा उपजै किहि भाँती ।
रसिकनि-संग फिरै दिन-राती ।।11।।
भक्त-कृपा सँग एकै मानौं ।
बृच्छ बीज फल भिन्न न जानौं ।।12।।
बहुत कहत विस्तारहि करई ।
प्रेम-कथा में अंतर परई ।।13।।
मान-अपमान न मन में आनैं ।
चित्त जुगल-छबि-रस में सानैं ।।14।।
रुदत हँसत नाँचत कछु गावै ।
प्रेम मगन दोऊ लाल लड़ावै ।।15।।
इहि विधि कौ जब ह्वै वैरागी ।
तेहि समान नाहिं कोऊ बड़भागी ।।16।।
दोहा
बिनु नैंननिं लै मुकुर अरु, बिना लवन रस साग ।
बिनु पिय तिय सिंगार सजि, बिना प्रेम वैराग ।।17।।
चौपाई
ऐसी विधि कब फिरि है वन में।
तन अति छीन प्रेम रंग मन में।।18।।
जहँ लगि स्वाद कहे जग माँहीं ।
सहजहि ते फीके ह्वै जाँहीं ।।19।।
जुगल रूप उर अंतर सचई ।
निसि-दिन एक प्रेम-रंग रचई ।।20।।
बिना नेम जहाँ प्रेम बिराजै ।
सो निहकाम एक रस गाजै ।।21।।
राई सम जो नेम मिलाई ।
काँजी दूध-प्रेम ह्वै जाई ।।22।।
गोपिनु के सम भक्त न आँही ।
उद्वव विधि तिनकी रज चाही ।।23।।
तिन मन कछु सकामता आई ।
तातें बिच अंतर पर्यौ माई ।।24।।
दोहा
दुख कौ मूल सकामता, सुख कौ मूल निहकाम ।
विरह वियोग न तहाँ कछु, रसमय 'ध्रुव' सुखधाम ।।25।।
चौपाई
अब सोई ठाँव कहौं सुनि लीजै ।
तहाँ सुप्रेम एक रस पीजै ।।26।।
वृंदाविपिन एक रस ऐंना ।
तहाँ सेवति मैंननिं की सैंना ।।27।।
नवल लता द्रुम नवल सुहाये ।
सुमन सुरंग सुवासनि छाये ।।28।।
तामें बिहरत नवल बिहारी ।
संग प्रिया प्राननिं तें प्यारी ।।29।।
जेहि द्रुम फूल बेलि तन हेरैं ।
मनौं मदन-रस सींचत फेरैं ।।30।।
चितवनि-मुसिकनि सहज सुहाई ।
जीवन यहै दुहुँनि की माई ।।31।।
प्रेम-मदन के मद में माते ।
मनौं गयंद अपने रँग राते ।।32।।
दोहा
तेज-पुंज रस-पुंज दोऊ, रूप-पुंज सुकुँवारि ।
मंजुल कुंज निकुंज तर, रचि रहे प्रेम-विहार ।।33।।
चौपाई
परे प्रेम एकै रस फंदा ।
विवि वृंदावन चंद स्वछंदा ।।34।।
अति रस बढ्यौ कह्यौ नहिं जाई ।
देखत-देखत कल नहि माई ।।35।।
तिनके प्रेम-रंग रस भरी ।
डोलत संग लगी सहचरी ।।36।।
प्रेम-मगन तन नेम बिसारे ।
सखियनि प्रान प्रान दोऊ प्यारे ।।37।।
छिन-छिन नवल रूप रस रंगा ।
तहाँ प्रेम कौ राज अभंगा ।।38।।
दोहा
प्रेम रासि दोऊ रसिक वर, बिलसत नित्य-विहार ।
ललितादिक निज लेति हैं, तेहि रस कौ सुखसार ।।39।।
चौपाई
नित्य किशोर रूप की रासी ।
विलसत प्रेम निकुंज विलासी ।।40।।
ऐसैं दोऊ रस में भीनैं ।
चंद-चकोर नैंन-मन कीनैं ।।41।।
एक प्रान द्वै देह बिहारी ।
तिनके बीच प्रेम अधिकारी ।।42।।
सहजहि ताके रस बस प्यारे ।
एक सुभाइ दुहुँनि मन हारे ।।43।।
तेहि रस कौ सुख अद्भुत आही ।
ललितादिक दिन लेति हैं ताही।।44।।
दोहा
अनुराग लता लागे सुफल, ललित लाड़िली लाल ।
ललितादिक निजु लेत हैं, तेहि रस सुरस रसाल ।।45।।
चौपाई
प्रीति की रीति सबनि तैं न्यारी ।
को समुझै बिनु लाल-बिहारी ।।46।।
तृन सम जहाँ राखी जु बड़ाई ।
तेहि रस आप गही सेवकाई ।।47।।
छिन-छिन नव सत नवल बनावै ।
रचि-रचि बीरी आपु खवावै ।।48।।
चरननिं जावक चित्र सुहाये ।
चतुर चतुरई सौं जु बनाये ।।49।।
ऐसौ रूप विचारत आही ।
मेरी डीठि लगौ जिन ताही ।।50।।
यातें साँवल सरस सलौंना ।
सुंदर मुख पर दिया दिठौंना ।।51।।
पुनि लै मुकर ठाड़े कर जोरैं ।
चितवत नवल-प्रिया दृग-कोरैं ।।52।।
तिनकौं प्रभुता देखि भुलानी ।
चितवत दूरि भई बिलखानी ।।53।।
जो कछु प्रीति लाल की गाई ।
तातें अधिक कुँवरि की माई ।।54।।
दोहा
प्रिया-प्रेम के सिंधु में, पैरत नवल किशोर ।
रहे हारि यातें तहाँ, पावत नहिं कहूँ ओर ।।55।।
चौपाई
शुक सनकादि न जानत भेवा ।
जद्दपि करत बहुत विधि सेवा ।।56।।
वैभवता में सब अरुझानैं ।
नित्य-विहारी नहिं पहिचानैं ।।57।।
यह रस जो समझै सो जानैं ।
और भजन विधि मन नहिं आनैं ।।58।।
प्रेम-सुभाव जाहि उर आवै ।
ताहि न बात दूसरी भावै ।।59।।
नवल राज नित रूप नवेला ।
तेहि ठाँ राजत प्रेम अकेला ।।60।।
बिना भाग अनुराग न आवै ।
बिनु अनुराग तिनहिं क्यौं पावै ।।61।।
दोहा
नागर दोऊ अनुराग बस, नवल नेह रंग-रात ।
अनुरागे तिनके भजन, और न दूजी बात ।।62।।
चौपाई
माया भ्रम सब जग जंजाला ।
जात न जान्यौ दुर्लभ काला ।।63।।
जगत सगाई साँची जानी ।
माति पितु तिय सुत सौं अरुझानी ।।64।।
जैसे चित्र-पेखना पेखै ।
जग के सब सुख ऐसै देखै ।।65।।
जेतिक द्यौस जिवै जग माहीं ।
ते बितवै वृंदावन छाँहीं ।।66।।
तेई भये जगत तैं न्यारे ।
जिन वृंदावन-चंद संभारे ।।67।।
परम धन्य तिनही की देही ।
जिन भजे दंपति परम सनेही ।।68।।
यह अनुराग लता जो गावै ।
निश्चै सो अनुरागहि पावै।।69।।
अनुरागे जिनके भजन, जुगल किशोर-विहार ।
तिन रसिकनि की चरन रज, लै लै 'ध्रुव' सिर धार ।।70।।
दोहा
अनुरागे जिनके भजन, ते तौ पैयत थोर ।
जिनके हीयैं झलमलैं, रसमय मधुर किशोर ।।71।।
अनुरागे जिनके भजन, दूजी बात न और ।
तिन रसिकनि की चरन-रज, 'ध्रुव' के सिर को मौर ।।72।।
भाग पाइ जो पाइयै, ऐसे रसिक रसाल ।
जिनके हिय तें टरत नहिं, श्री राधावल्लभलाल ।।73।।
परम सनेही जुगल वर, जानत प्रीति की रीति ।
मन वच कै 'ध्रुव' जिन भजे, तेइ गये जग जीति ।।74।।
जै जै श्री अनुराग लता लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
चौपाई
प्रेम-बीज उपजै मन माँहीं ।
तब सब विषै-वासना जाँहीं ।।1।।
जग तें भयौ फिरै वैरागी ।
वृंदावन-रस में अनुरागी ।।2।।
सो अनुराग परम सुखदाई ।
तेहि बिनु ताहि न और सुहाई ।।3।।
नवल प्रेम-रस अटक्यौ जोई ।
धनि वैराग ताहि कौ होई ।।4।।
निस्प्रेही होइ देह तें न्यारौ ।
जहाँ मन लाग्यौ सोई प्यारौ ।।5।।
ताही के रस घूमत डोलै ।
भरे नैंन जल मुख नहिं बोलै ।।6।।
दोहा
तीन लोक कौ राज सुख, देखौ तुला चढ़ाई ।
निमिष प्रेम सुख गरुव अति, तेहि आगैं घटि जाइ ।।7।।
चौपाई
याही रस जाकौ मन भीनौं ।
देह धरे कौ तेहि फल लीनौं ।।8।।
रहै भूलि विवि-रूप मँझारी ।
छिन-छिन चाह बढ़ै अति भारी ।।9।।
या रस कौ साधन नहिं कोई ।
एक कृपा तें जो कछु होई ।।10।।
कहौ कृपा उपजै किहि भाँती ।
रसिकनि-संग फिरै दिन-राती ।।11।।
भक्त-कृपा सँग एकै मानौं ।
बृच्छ बीज फल भिन्न न जानौं ।।12।।
बहुत कहत विस्तारहि करई ।
प्रेम-कथा में अंतर परई ।।13।।
मान-अपमान न मन में आनैं ।
चित्त जुगल-छबि-रस में सानैं ।।14।।
रुदत हँसत नाँचत कछु गावै ।
प्रेम मगन दोऊ लाल लड़ावै ।।15।।
इहि विधि कौ जब ह्वै वैरागी ।
तेहि समान नाहिं कोऊ बड़भागी ।।16।।
दोहा
बिनु नैंननिं लै मुकुर अरु, बिना लवन रस साग ।
बिनु पिय तिय सिंगार सजि, बिना प्रेम वैराग ।।17।।
चौपाई
ऐसी विधि कब फिरि है वन में।
तन अति छीन प्रेम रंग मन में।।18।।
जहँ लगि स्वाद कहे जग माँहीं ।
सहजहि ते फीके ह्वै जाँहीं ।।19।।
जुगल रूप उर अंतर सचई ।
निसि-दिन एक प्रेम-रंग रचई ।।20।।
बिना नेम जहाँ प्रेम बिराजै ।
सो निहकाम एक रस गाजै ।।21।।
राई सम जो नेम मिलाई ।
काँजी दूध-प्रेम ह्वै जाई ।।22।।
गोपिनु के सम भक्त न आँही ।
उद्वव विधि तिनकी रज चाही ।।23।।
तिन मन कछु सकामता आई ।
तातें बिच अंतर पर्यौ माई ।।24।।
दोहा
दुख कौ मूल सकामता, सुख कौ मूल निहकाम ।
विरह वियोग न तहाँ कछु, रसमय 'ध्रुव' सुखधाम ।।25।।
चौपाई
अब सोई ठाँव कहौं सुनि लीजै ।
तहाँ सुप्रेम एक रस पीजै ।।26।।
वृंदाविपिन एक रस ऐंना ।
तहाँ सेवति मैंननिं की सैंना ।।27।।
नवल लता द्रुम नवल सुहाये ।
सुमन सुरंग सुवासनि छाये ।।28।।
तामें बिहरत नवल बिहारी ।
संग प्रिया प्राननिं तें प्यारी ।।29।।
जेहि द्रुम फूल बेलि तन हेरैं ।
मनौं मदन-रस सींचत फेरैं ।।30।।
चितवनि-मुसिकनि सहज सुहाई ।
जीवन यहै दुहुँनि की माई ।।31।।
प्रेम-मदन के मद में माते ।
मनौं गयंद अपने रँग राते ।।32।।
दोहा
तेज-पुंज रस-पुंज दोऊ, रूप-पुंज सुकुँवारि ।
मंजुल कुंज निकुंज तर, रचि रहे प्रेम-विहार ।।33।।
चौपाई
परे प्रेम एकै रस फंदा ।
विवि वृंदावन चंद स्वछंदा ।।34।।
अति रस बढ्यौ कह्यौ नहिं जाई ।
देखत-देखत कल नहि माई ।।35।।
तिनके प्रेम-रंग रस भरी ।
डोलत संग लगी सहचरी ।।36।।
प्रेम-मगन तन नेम बिसारे ।
सखियनि प्रान प्रान दोऊ प्यारे ।।37।।
छिन-छिन नवल रूप रस रंगा ।
तहाँ प्रेम कौ राज अभंगा ।।38।।
दोहा
प्रेम रासि दोऊ रसिक वर, बिलसत नित्य-विहार ।
ललितादिक निज लेति हैं, तेहि रस कौ सुखसार ।।39।।
चौपाई
नित्य किशोर रूप की रासी ।
विलसत प्रेम निकुंज विलासी ।।40।।
ऐसैं दोऊ रस में भीनैं ।
चंद-चकोर नैंन-मन कीनैं ।।41।।
एक प्रान द्वै देह बिहारी ।
तिनके बीच प्रेम अधिकारी ।।42।।
सहजहि ताके रस बस प्यारे ।
एक सुभाइ दुहुँनि मन हारे ।।43।।
तेहि रस कौ सुख अद्भुत आही ।
ललितादिक दिन लेति हैं ताही।।44।।
दोहा
अनुराग लता लागे सुफल, ललित लाड़िली लाल ।
ललितादिक निजु लेत हैं, तेहि रस सुरस रसाल ।।45।।
चौपाई
प्रीति की रीति सबनि तैं न्यारी ।
को समुझै बिनु लाल-बिहारी ।।46।।
तृन सम जहाँ राखी जु बड़ाई ।
तेहि रस आप गही सेवकाई ।।47।।
छिन-छिन नव सत नवल बनावै ।
रचि-रचि बीरी आपु खवावै ।।48।।
चरननिं जावक चित्र सुहाये ।
चतुर चतुरई सौं जु बनाये ।।49।।
ऐसौ रूप विचारत आही ।
मेरी डीठि लगौ जिन ताही ।।50।।
यातें साँवल सरस सलौंना ।
सुंदर मुख पर दिया दिठौंना ।।51।।
पुनि लै मुकर ठाड़े कर जोरैं ।
चितवत नवल-प्रिया दृग-कोरैं ।।52।।
तिनकौं प्रभुता देखि भुलानी ।
चितवत दूरि भई बिलखानी ।।53।।
जो कछु प्रीति लाल की गाई ।
तातें अधिक कुँवरि की माई ।।54।।
दोहा
प्रिया-प्रेम के सिंधु में, पैरत नवल किशोर ।
रहे हारि यातें तहाँ, पावत नहिं कहूँ ओर ।।55।।
चौपाई
शुक सनकादि न जानत भेवा ।
जद्दपि करत बहुत विधि सेवा ।।56।।
वैभवता में सब अरुझानैं ।
नित्य-विहारी नहिं पहिचानैं ।।57।।
यह रस जो समझै सो जानैं ।
और भजन विधि मन नहिं आनैं ।।58।।
प्रेम-सुभाव जाहि उर आवै ।
ताहि न बात दूसरी भावै ।।59।।
नवल राज नित रूप नवेला ।
तेहि ठाँ राजत प्रेम अकेला ।।60।।
बिना भाग अनुराग न आवै ।
बिनु अनुराग तिनहिं क्यौं पावै ।।61।।
दोहा
नागर दोऊ अनुराग बस, नवल नेह रंग-रात ।
अनुरागे तिनके भजन, और न दूजी बात ।।62।।
चौपाई
माया भ्रम सब जग जंजाला ।
जात न जान्यौ दुर्लभ काला ।।63।।
जगत सगाई साँची जानी ।
माति पितु तिय सुत सौं अरुझानी ।।64।।
जैसे चित्र-पेखना पेखै ।
जग के सब सुख ऐसै देखै ।।65।।
जेतिक द्यौस जिवै जग माहीं ।
ते बितवै वृंदावन छाँहीं ।।66।।
तेई भये जगत तैं न्यारे ।
जिन वृंदावन-चंद संभारे ।।67।।
परम धन्य तिनही की देही ।
जिन भजे दंपति परम सनेही ।।68।।
यह अनुराग लता जो गावै ।
निश्चै सो अनुरागहि पावै।।69।।
अनुरागे जिनके भजन, जुगल किशोर-विहार ।
तिन रसिकनि की चरन रज, लै लै 'ध्रुव' सिर धार ।।70।।
दोहा
अनुरागे जिनके भजन, ते तौ पैयत थोर ।
जिनके हीयैं झलमलैं, रसमय मधुर किशोर ।।71।।
अनुरागे जिनके भजन, दूजी बात न और ।
तिन रसिकनि की चरन-रज, 'ध्रुव' के सिर को मौर ।।72।।
भाग पाइ जो पाइयै, ऐसे रसिक रसाल ।
जिनके हिय तें टरत नहिं, श्री राधावल्लभलाल ।।73।।
परम सनेही जुगल वर, जानत प्रीति की रीति ।
मन वच कै 'ध्रुव' जिन भजे, तेइ गये जग जीति ।।74।।
जै जै श्री अनुराग लता लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश
38.प्रेमलता लीला
चौपाई
प्रथमहि शुभ गुरु-पद उर आनौं ।
बात प्रेम की कछुक बखानौं ।।1।।
और कृपा रसिकनि की चाहौं ।
तब या रस कौ सर अवगाहौं ।।2।।
लाल-लाड़िली जो उर आनी ।
तैसी मोपै जात बखानी ।।3।।
घटि बढ़ि अक्षर जो कहुँ होई ।
लेहु बनाइ कृपा करि सोई ।।4।।
रसिक-रसिकनी कौ जस जानौं ।
और कछू जिय जिन उर आनौं ।।5।।
कही प्रेम की गति 'ध्रुव' यातैं ।
सुनतहि सरस होत हिय तातैं ।।6।।
अरु रस-रीति पंथ पहिचानै ।
तब या रस के स्वादहि जानै ।।7।।
दोहा
जिन नहि समुझ्यौ प्रेम-रस, तिन सौं कौंन अलाप ।
दादुर हूँ जल में रहै, जानै मीन मिलाप ।।8।।
चौपाई
खान-पान सुख चाहत अपनै ।
तिनको प्रेम छुवत नहिं सपनै ।।9।।
जो या प्रेम-हिंडोरे झूलै ।
तिनकौं और सबै सुख भूलै ।।10।।
प्रेम-रसासव चाख्यौ जबहीं ।
औरे रंग चढ़ै 'ध्रुव' तबहीं ।।11।।
या रस-प्रेम परै मन आई ।
मीन-नीर की गति ह्वै जाई ।।12।।
निसि-दिन ताहि न कछु सुहाई ।
प्रीतम के रस रहै समाई ।।13।।
जाकौ है जासौं मन मान्यौ ।
सो है ताके हाथ बिकान्यौ ।।14।।
अरु ताके अँग-सँग की बातैं ।
प्यारी लगत सबै तेहि नातैं ।।15।।
रुचै सोई जो ताकौं भावै ।
ऐसी नेह की रीति कहावै ।।16।।
जो रस लाल-लड़ैती माँहीं ।
ऐसौ प्रेम और कहुँ नाहीं ।।17।।
दोहा
ब्रज-देविनु के प्रेम की, बँधी धुजा अति दूरि ।
ब्रह्मादिक बांछित रहैं, तिनके पद की धूरि ।।18।।
चौपाई
तिनहूँ कौ मन तहाँ न परसै ।
ललितादिक जेहि ठाँ छबि दरसै ।।19।।
नित्य-विहार अखंडित धारा ।
एक वैस रस मधुर विहारा ।।20।।
नित्य-किशोर रूप-निधि सीवाँ ।
विलसत सहज मेलि भुज-ग्रीवाँ ।।21।।
तिन बिच अंतर पल कौ नाहीं ।
तऊ तृषित प्रीतम मन माहीं ।।22।।
अद्भुत सहज रंग सुखदाई ।
तहाँ प्रेम की एक दुहाई ।।23।।
पिय गज मत्त न अंकुस के बस ।
परम स्वछंद फिरत अपने रस ।।24।।
देखतहीं तिनकी परछाँहीं ।
मदन कोटि व्याकुल ह्वै जाहीं ।।25।।
ते मोहन बस कीनें गोरी ।
राखे बाँधि प्रेम की डोरी ।।26।।
छुटत न क्यौं हूँ ऐसै अटके ।
प्रान हारि चरननि तर लटके ।।27।।
प्रीति की रीति लाल ही जानैं।
तजि प्रभुता बिन मोल बिकानैं ।।28।।
तैसीय रसिक प्रवीन किशोरी ।
रस निधि नेह के सिंधु झकोरी ।।29।।
पिय कौं राखत नैंननिं आगै ।
हुलसि-हुलसि प्रीतम उर लागै ।।30।।
अवधि प्रेम की सहजहि प्यारे ।
परबस प्रेम दुहुँनि मन हारे ।।31।।
एक रंग रुचि है सब काला ।
उज्ज्वल प्रेम लाड़िली-लाला ।।32।।
दोहा
तन मन रूप सुभाव मिलि, ह्वै रहे एकै प्रान ।
जीवनि मुसिकनि चितैवौ, अधर-रसासव-पान ।।33।।
चौपाई
वृंदावन घन राजत कुंजैं।
विहरत तहाँ रसिक रस-पुंजैं ।।34।।
एक प्रान विवि देह हैं दोऊ ।
तिन समान प्रेमी नहिं कोऊ ।।35।।
सब पर अधिक जान यह प्रेमा ।
ताके बस भए तजि सब नेमा ।।36।।
या सुख पर नाहिन सुख कोई ।
जानै सो जो भेदी होई ।।37।।
दोहा
अद्भुत नित्य अभूत रस, लाल-लाड़िली प्रेम ।
छिन-छिन नख मनि चंद्रिकनि, सेवत है सुख नेम ।।38।।
चौपाई
प्रेममयी रस मैंन विनोदा ।
नव-नव उपजत हैं दुहुँ कोदा ।।39।।
रस तेहि विहार रस मगन बिहारी ।
जानत नहिं कित द्यौस निसा री ।।40।।
जो कोऊ कोटिक भाँति बखाँनैं ।
बिनु स्वादी या रसहि न जानैं ।।41।।
रहत है दिनहि प्रेम सरसाई ।
तहाँ मान की नहिं समाई ।।42।।
सूच्छम प्रेम न मन में आवै ।
स्थूल प्रेम सब ही कौं भावै ।।43।।
महा मधुर रस सब तैं न्यारौ ।
जिहिं ठाँ दुहुँनि अपुनपौ हारौ ।।44।।
तिनहिं देखि आसक्ति हूँ भूली ।
ह्वै आसक्त सुरस में झूली ।।45।।
दोहा
लाल-लाड़िली प्रेम तें, सरस सखिनु कौ प्रेम ।
अटकी हैं निज प्रीति रस, परसत तिनहिं न नेम ।।46।।
चौपाई
सखियनि के सुख पर सुख नाहीं ।
आनंद मोद रँगी मन माँहीं ।।47।।
रूप रसासव यहै अहारा ।
तन मन की कछु नाहिं सँभारा ।।48।।
एकै रस नित भींजी रहहीं ।
साँझ-भोर समुझ्यौ नहिं कबहीं ।।49।।
सो रस करतिं रहतिं नित पानैं ।
निसि-वासर बीतत नहिं जानैं ।।50।।
या रस सौं जाकौ मन मान्यौ ।
सोइ 'ध्रुव' रसिकनि प्रान समान्यौ ।।51।।
दोहा
छिन-छिन नवल विहार में, करत हैं नवल सिंगार ।
रुचि तरंग पल-पल तहाँ, बाढ़ति रहति अपार ।।52।।
चौपाई
करि सिंगार जबै दोऊ निबरे ।
छबि सौं नव निकुंज ते निकरे ।।53।।
भयौ प्रकाश नख-मनि दुति ऐसी ।
कोटि चंद-आभा नहिं तैसी ।।54।।
तिनके रूप न बरने जाहीं ।
मोहत मैंन देखि परछाहीं ।।55।।
हित की सींव सहेली सोहैं ।
चहुँ दिसि मनौं चकोरी जोहै ।।56।।
अंगनि की निज सौरभताई ।
जहँ-तहँ पूरि रही बन माई ।।57।।
सो सुवास जो नैंकहुँ पावै ।
प्रेम-विवस तन सुधि बिसरावै ।।58।।
परै प्रेम के फंद मंझारी ।
सर्वसु प्रान रहै तहाँ हारी ।।59।।
तेहि बिन ताहि न और सुहाई ।
बिनु देखैं हीयौ अकुलाई ।।60।।
सुनत स्रवन भूषन-झनकारा ।
खग-मृग चकित थकित जलधारा ।।61।।
मेहँदी रँग पद-अंबुज बनै ।
धरत अवनि पर छबि को गनै ।।62।।
लटकि-लटकि अलबेली भाँति ।
लपटि लाल-उर मृदु मुसिकाति ।।63।।
ऐसी छबि 'ध्रुव' नैंननिं माँझ ।
रहौ निरंतर भोर और साँझ ।।64।।
प्रेम-बेलि वृंदावन फूली ।
पिय-तमाल-अंसनि पर झूली ।।65।।
देखि महा छबि सुधि-बुधि भूली ।
सब सखियनि की जीवन-मूली ।।66।।
तिन सखियनि की कृपा मनाऊँ ।
या रस की कनिका जौ पाऊँ ।।67।।
दोहा
निसि दिन तौ जाँचत रहौ, वृंदावन रस-रैन ।
छिन-छिन दंपति छबि छटा, छाइ रहौ 'ध्रुव' नैंन ।।68।।
जै जै श्री प्रेम लता लीला की जै जै श्री हरिवंश
चौपाई
प्रथमहि शुभ गुरु-पद उर आनौं ।
बात प्रेम की कछुक बखानौं ।।1।।
और कृपा रसिकनि की चाहौं ।
तब या रस कौ सर अवगाहौं ।।2।।
लाल-लाड़िली जो उर आनी ।
तैसी मोपै जात बखानी ।।3।।
घटि बढ़ि अक्षर जो कहुँ होई ।
लेहु बनाइ कृपा करि सोई ।।4।।
रसिक-रसिकनी कौ जस जानौं ।
और कछू जिय जिन उर आनौं ।।5।।
कही प्रेम की गति 'ध्रुव' यातैं ।
सुनतहि सरस होत हिय तातैं ।।6।।
अरु रस-रीति पंथ पहिचानै ।
तब या रस के स्वादहि जानै ।।7।।
दोहा
जिन नहि समुझ्यौ प्रेम-रस, तिन सौं कौंन अलाप ।
दादुर हूँ जल में रहै, जानै मीन मिलाप ।।8।।
चौपाई
खान-पान सुख चाहत अपनै ।
तिनको प्रेम छुवत नहिं सपनै ।।9।।
जो या प्रेम-हिंडोरे झूलै ।
तिनकौं और सबै सुख भूलै ।।10।।
प्रेम-रसासव चाख्यौ जबहीं ।
औरे रंग चढ़ै 'ध्रुव' तबहीं ।।11।।
या रस-प्रेम परै मन आई ।
मीन-नीर की गति ह्वै जाई ।।12।।
निसि-दिन ताहि न कछु सुहाई ।
प्रीतम के रस रहै समाई ।।13।।
जाकौ है जासौं मन मान्यौ ।
सो है ताके हाथ बिकान्यौ ।।14।।
अरु ताके अँग-सँग की बातैं ।
प्यारी लगत सबै तेहि नातैं ।।15।।
रुचै सोई जो ताकौं भावै ।
ऐसी नेह की रीति कहावै ।।16।।
जो रस लाल-लड़ैती माँहीं ।
ऐसौ प्रेम और कहुँ नाहीं ।।17।।
दोहा
ब्रज-देविनु के प्रेम की, बँधी धुजा अति दूरि ।
ब्रह्मादिक बांछित रहैं, तिनके पद की धूरि ।।18।।
चौपाई
तिनहूँ कौ मन तहाँ न परसै ।
ललितादिक जेहि ठाँ छबि दरसै ।।19।।
नित्य-विहार अखंडित धारा ।
एक वैस रस मधुर विहारा ।।20।।
नित्य-किशोर रूप-निधि सीवाँ ।
विलसत सहज मेलि भुज-ग्रीवाँ ।।21।।
तिन बिच अंतर पल कौ नाहीं ।
तऊ तृषित प्रीतम मन माहीं ।।22।।
अद्भुत सहज रंग सुखदाई ।
तहाँ प्रेम की एक दुहाई ।।23।।
पिय गज मत्त न अंकुस के बस ।
परम स्वछंद फिरत अपने रस ।।24।।
देखतहीं तिनकी परछाँहीं ।
मदन कोटि व्याकुल ह्वै जाहीं ।।25।।
ते मोहन बस कीनें गोरी ।
राखे बाँधि प्रेम की डोरी ।।26।।
छुटत न क्यौं हूँ ऐसै अटके ।
प्रान हारि चरननि तर लटके ।।27।।
प्रीति की रीति लाल ही जानैं।
तजि प्रभुता बिन मोल बिकानैं ।।28।।
तैसीय रसिक प्रवीन किशोरी ।
रस निधि नेह के सिंधु झकोरी ।।29।।
पिय कौं राखत नैंननिं आगै ।
हुलसि-हुलसि प्रीतम उर लागै ।।30।।
अवधि प्रेम की सहजहि प्यारे ।
परबस प्रेम दुहुँनि मन हारे ।।31।।
एक रंग रुचि है सब काला ।
उज्ज्वल प्रेम लाड़िली-लाला ।।32।।
दोहा
तन मन रूप सुभाव मिलि, ह्वै रहे एकै प्रान ।
जीवनि मुसिकनि चितैवौ, अधर-रसासव-पान ।।33।।
चौपाई
वृंदावन घन राजत कुंजैं।
विहरत तहाँ रसिक रस-पुंजैं ।।34।।
एक प्रान विवि देह हैं दोऊ ।
तिन समान प्रेमी नहिं कोऊ ।।35।।
सब पर अधिक जान यह प्रेमा ।
ताके बस भए तजि सब नेमा ।।36।।
या सुख पर नाहिन सुख कोई ।
जानै सो जो भेदी होई ।।37।।
दोहा
अद्भुत नित्य अभूत रस, लाल-लाड़िली प्रेम ।
छिन-छिन नख मनि चंद्रिकनि, सेवत है सुख नेम ।।38।।
चौपाई
प्रेममयी रस मैंन विनोदा ।
नव-नव उपजत हैं दुहुँ कोदा ।।39।।
रस तेहि विहार रस मगन बिहारी ।
जानत नहिं कित द्यौस निसा री ।।40।।
जो कोऊ कोटिक भाँति बखाँनैं ।
बिनु स्वादी या रसहि न जानैं ।।41।।
रहत है दिनहि प्रेम सरसाई ।
तहाँ मान की नहिं समाई ।।42।।
सूच्छम प्रेम न मन में आवै ।
स्थूल प्रेम सब ही कौं भावै ।।43।।
महा मधुर रस सब तैं न्यारौ ।
जिहिं ठाँ दुहुँनि अपुनपौ हारौ ।।44।।
तिनहिं देखि आसक्ति हूँ भूली ।
ह्वै आसक्त सुरस में झूली ।।45।।
दोहा
लाल-लाड़िली प्रेम तें, सरस सखिनु कौ प्रेम ।
अटकी हैं निज प्रीति रस, परसत तिनहिं न नेम ।।46।।
चौपाई
सखियनि के सुख पर सुख नाहीं ।
आनंद मोद रँगी मन माँहीं ।।47।।
रूप रसासव यहै अहारा ।
तन मन की कछु नाहिं सँभारा ।।48।।
एकै रस नित भींजी रहहीं ।
साँझ-भोर समुझ्यौ नहिं कबहीं ।।49।।
सो रस करतिं रहतिं नित पानैं ।
निसि-वासर बीतत नहिं जानैं ।।50।।
या रस सौं जाकौ मन मान्यौ ।
सोइ 'ध्रुव' रसिकनि प्रान समान्यौ ।।51।।
दोहा
छिन-छिन नवल विहार में, करत हैं नवल सिंगार ।
रुचि तरंग पल-पल तहाँ, बाढ़ति रहति अपार ।।52।।
चौपाई
करि सिंगार जबै दोऊ निबरे ।
छबि सौं नव निकुंज ते निकरे ।।53।।
भयौ प्रकाश नख-मनि दुति ऐसी ।
कोटि चंद-आभा नहिं तैसी ।।54।।
तिनके रूप न बरने जाहीं ।
मोहत मैंन देखि परछाहीं ।।55।।
हित की सींव सहेली सोहैं ।
चहुँ दिसि मनौं चकोरी जोहै ।।56।।
अंगनि की निज सौरभताई ।
जहँ-तहँ पूरि रही बन माई ।।57।।
सो सुवास जो नैंकहुँ पावै ।
प्रेम-विवस तन सुधि बिसरावै ।।58।।
परै प्रेम के फंद मंझारी ।
सर्वसु प्रान रहै तहाँ हारी ।।59।।
तेहि बिन ताहि न और सुहाई ।
बिनु देखैं हीयौ अकुलाई ।।60।।
सुनत स्रवन भूषन-झनकारा ।
खग-मृग चकित थकित जलधारा ।।61।।
मेहँदी रँग पद-अंबुज बनै ।
धरत अवनि पर छबि को गनै ।।62।।
लटकि-लटकि अलबेली भाँति ।
लपटि लाल-उर मृदु मुसिकाति ।।63।।
ऐसी छबि 'ध्रुव' नैंननिं माँझ ।
रहौ निरंतर भोर और साँझ ।।64।।
प्रेम-बेलि वृंदावन फूली ।
पिय-तमाल-अंसनि पर झूली ।।65।।
देखि महा छबि सुधि-बुधि भूली ।
सब सखियनि की जीवन-मूली ।।66।।
तिन सखियनि की कृपा मनाऊँ ।
या रस की कनिका जौ पाऊँ ।।67।।
दोहा
निसि दिन तौ जाँचत रहौ, वृंदावन रस-रैन ।
छिन-छिन दंपति छबि छटा, छाइ रहौ 'ध्रुव' नैंन ।।68।।
जै जै श्री प्रेम लता लीला की जै जै श्री हरिवंश
39. रसानन्द लीला
दोहा
हरिवंश हंस उद्दित दिनहिं, परम रसिक रस- रासि ।
उभै प्रेम-रस किरन मनौं, करी जु जगत प्रकासि ।।1।।
चौपाई
प्रथम चरण हरिवंश जी ध्याऊँ ।
तातैं कछुक प्रेम रस पाऊँ ।।2।।
प्रेमारस तबहिं पै पावै ।
श्री हरिवंश नाम गुन गावै ।।3।।
नित्य-विहार तबहिं तौ जानैं ।
श्री हरिवंश-पदनि उर आनैं ।।4।।
जो रस श्री हरिवंश जी गायौ ।
सो रस तौ काहूँ नहिं पायौ ।।5।।
अगम-निगम की कौन चलावै ।
महा विष्णु के मन नहिं आवै ।।6।।
या रस कौ तबही अधिकारी ।
करहिं कृपा श्री राधा प्यारी ।।7।।
कृपा नागरी तबहीं करै।
श्री हरिवंश सुकर सिर धरै ।।8।।
सोरठा
भजि रे मन दिन-रैन, श्री हरिवंश जु पद-कमल ।
देखौ भरि जुग नैंन, तेहि प्रताप तें जुग़ल-छबि ।।9।।
चौपाई
यह उपजी मन अति अभिलाषा ।
करहु कृपा जु करौं कछु भाषा ।।10।।
मौपै है अबहीं मति थोरी ।
कैसैं बरनौं यह रस-जोरी ।।11।।
दीजै मोहि बुद्धि-परकासा ।
यह पुरवौ तुम मेरी आसा ।।12।।
रसिक-अनन्य चरन-रज पाऊँ ।
सहज केलि नव-दंपति गाऊँ ।।13।।
दोहा
अगम ते अगम अगाधि अति, पहुँचत नहिं मन वेद ।
श्री हरिवंश प्रताप-बल, पावत सुगम सु भेद ।।14।।
चौपाई
वृन्दावन-रस अतिहि अगाधा ।
नित्य-केलि मोहन श्री राधा ।।15।।
वृंदा-विपिन करैं नित-केली ।
पिय मोहन अरु प्रिया नवेली ।।16।।
सोभित कंचन-भूमि सुहाई ।
हंस-सुता-छबि कही न जाई ।।17।।
मनिनु जटित विवि कूल विराजैं।
नव मराल नव कुंजनिं राजैं ।।18।।
अति कमनीय बनी नव कुंजा ।
मधुकर तहाँ करत मधु-गुंजा ।।19।।
बिच-बिच कनक कंज छबि न्यारी ।
अति अनूप झलकत सोभा री ।।20।।
वल्लिनु कुसुम बने बहु भाँती ।
बरन-बरन सुंदर इक पाँती ।।21।।
वृंदा सकल रची वन-संपति।
निरखि-निरखि आनंद मन-दंपति ।।22।।
फूले सुमन विविध नव रंगा ।
अति अनुराग होत प्रिय संगा ।।23।।
त्रिविध पवन तहँ बहै सुहाई ।
शुक कपोत कोकिल कुहकाई ।।24।।
दोहा
सहज कुंज अतिही बनी, मधुप करत गुंजार ।
सकल सुगंधनि लै रच्यौ, अद्भुत मदन-अगार ।।25।।
चौपाई
सखियनि सिज्या रुचिर बनाई ।
विविध भाँति सौरभ बुरकाई ।।26।।
तापर बैठे नवल दंपती ।
सखियनि हित सुख सदा संपती ।।27।।
अंसनि भुजा परस्पर धारी ।
मोहन-लाल राधिका-प्यारी ।।28।।
ईषद हासि दोऊ मुसिकाँहीं ।
अति अनुराग भरे मन माँहीं ।।29।।
सोरठा
मोहन जू निजु पानि, प्रिया अंग भूषन सजे ।
सुभग मनोहर ठाँनि, विविध कुसुम बैंनी गुही ।।30।।
चौपाई
मौरी सीस सुरंग सुहाई ।
मोतिन माँग रची सुखदाई ।।31।।
बैंनी फूल देखि छबि न्यारी ।
मनौं घन में प्रगटी उजियारी ।।32।।
मृगमद-तिलक भाल पर कियौ।
मधि बिंदुका कुंकुम कौ दियौ ।।33।।
खुटिला खुभी श्रवन झलकाई ।
बने नैंन प्रतिबिंब की झाँई ।।34।।
दोहा
नैंन सुरंग अनूप अति, चंचल बंक बिशाल ।
रुचिर रेख अंजन बनी, चितवनि चपल रसाल ।।35।।
चौपाई
वाम कपोल श्याम बिंदु सोहै ।
अलप अलक मोहन-मन मोहै ।।36।।
चितवनि चंचल परम सुहाई ।
खंजन मीन लजी चपलाई ।।37।।
वेसरि-झलक अधिक छबि पाई ।
मुसिकनि बरषत सुंदरताई ।।38।।
अरुन अधर दसननि की शोभा ।
निरखि-निरखि मोहन-मन लोभा ।।39।।
चिबुक मध्य श्यामल बिंदुकनी।
कहि न जात जैसी छबि बनी ।।40।।
कंचुकि कसुँभि विराजत प्यारी।
नील वसन शोभित तन सारी ।।41।।
कुंदन-दुलरी कंठ सुहाई ।
मनौं रूप की सींव बनाई ।।42।।
तापर झलकत मोतिनु माला ।
बीच पदिक झलमलत रसाला ।।43।।
भुजनि वलय अंगद सुठि सोहैं ।
रतन खचित पहुँची मनमोहैं ।।44।।
झलकि रहीं गोरी मृदु अँगुरी ।
रँग-रँग की सोभित हैं मुँदरी ।।45।।
त्रिबली उदर नाभि-हृद जहाँ ।
मीन रहत मोहन-मन तहाँ ।।46।।
कटि राजति रसना रस-ऐंनी।
झुनकति पिय मन कौं सुखदैनी ।।47।।
पाइल नूपुर की धुनि सोहै ।
गति पर गज-मराल-मन मोहै ।।48।।
चरननि जावक चित्र सुरंगा ।
छबि लागी डोलत तिहि संगा ।।49।।
सुंदर नवल नखनि के आगैं ।
अतनु रतन सब फीके लागै ।।50।।
दोहा
रूप-रासि अति नागरी, भूषन अग रसाल ।
निरखि नैंन मोहन फँदे, मनौं मीन छबि-जाल ।।51।।
चौपाई
कछु दृग सजल देखि निज रूपहि ।
पिय चित पर्यो प्रेम के कूपहिं ।।52।।
निरखि-निरखि सोभा सुंदर वर।
प्रेम विवस लटके सिज्या पर।।53।।
तब प्रिया लै मोहन उर लायौ।
होइ दयालु अधरन रस प्यायौ।।54।।
रति विपरित चुंबन इक संगा।
करत विविध नव-केलि अनंगा ।।55।।
नूपुर-रव किंकिनि रुचिदाई ।
उठत तरंग-मैंन अधिकाई ।।56।।
कोक-कला में निपुन विहारी ।
केलि-बेलि रति की विस्तारी ।।57।।
रति-रन-रंग रह्यौ अति भारी ।
बढी चौंप जद्यपि सुकुवाँरी ।।58।।
दोहा
सुरत-रंग विवि वदन पर, श्रम-जल-कन रहे सोहि ।
रसिक सखी ललितादि सब, छबि अनूप रहीं जोहि ।।59।।
चौपाई
कोमल अंचल पवन डुलावैं ।
अति आसक्त नैंन भरि आवैं ।।60।।
एक बैस सब सखी सहेली ।
मानौ नेह-बाग की बेली ।।61।।
सींची नवल कटाक्षनि जल सौं ।
फूल चाह फूल फल दल सौं ।।62।।
एक रूप तन-मन अनुरागी ।
जुगल हेत हित-रस सौं पागी ।।63।।
तिन में आठ सखी मन भाई ।
देखत रूप न कबहुँ अघाई ।।64।।
ललित विशाखा वृंदा श्यामा ।
चंद्रा मुदिता नंदिनि भामा ।।65।।
अपनी-अपनी टहल कराहीं ।
प्रेम-मगन आनंद रहाहीं ।।66।।
ललिता लड़िली-लाल लड़ावै ।
मधुर वचन कहि तिनहिं हँसावै ।।67।।
जुगल-मिलन-सुख अतिही भावै ।
नेह बढ़नि की बात चलावै ।।68।।
सखी विसाखा मन की प्यारी ।
कबहुँ न होति संग तें न्यारी ।।69।।
पाननिं बीरी रुचिर बनावै ।
लटकि कुँवरि तेहि पर ढरि आवै ।।70।।
वृंदावन कौं दिनहि सिंगारै ।
सोभा भरि-भरि नैंन निहारै ।।71।।
बहु विधि दल-फल-फूल सुहाये।
सुमन सुरंग दुहुँनिं मन भाये ।।72।।
श्यामा चीर विविध नव-रंगा ।
लियैं रहति अनुराग अभंगा ।।73।।
अंचल कचनि सँभार्यौ करई ।
षट-रस विंजन आगैं धरई ।।74।।
चंदा चन्दन ठाढी लीयैं ।
और अरगजा मृगमद कीयैं ।।75।।
अंगनि चित्र विचित्र बनावै ।
फूलनि माल फूल पहिरावै ।।76।।
मुदिता मदन-मोद उपजावै ।
हित सौं चरन-कमल सहरावै ।।77।।
बिच-बिच कहति है प्रेम-पहेली ।
हँसि हँसि समुझत नवल नवेली ।।78।।
नंदिनि अति आनन्द बढ़ावै ।
मधुर-मधुर सुर बीन बजावै ।।79।।
बिच-बिच मंद-मंद सुर गावै ।
सुनत हिये के श्रवन सिरावै ।।80।।
कुसुम-बीजना मृदु कर लीयैं।
करति पवन हुलसति अति हीयैं।।81।।
भामा भूषन दिनहिं सिंगारै ।
सोभा भरि-भरि नैंन निहारै ।।82।।
यह सुख निज सहचरी दिखाहीं ।
वारि-वारि अंचल बलि जाहीं।।83।।
दोहा
(श्री) राधा वल्लभ नव कुँवर, करत निकुंज-विहार ।
प्रवल चौंप तन-मन बढ़ी, रसमै दोऊ सुकुँवार ।।84।।
चौपाई
खेलत नवल नागरी नाइक ।
चौपर खेल महा सुखदायक ।।85।।
इक-इक सखी भई दुहुँ कोदा।
बढ्यौ युगल मन में अति मोदा।।86।।
अंगनि भूषन दाव लगावैं ।
कहुँ-कहुँ झगरत अति छबि पावैं ।।87।।
हारत लाल लगावत जोई ।
त्यौं-त्यौं चौंप चौगुनी होई ।।88।।
हारे मोतिनु-हार विहारी ।
तब कटि तें किंकिनी उतारी ।।89।।
पीत वसन वंशी पुनि हारी ।
छबि सौं हँसति मधुर सुकुँवारी ।।90।।
छके लाल मुख छबिहि निहारी ।
चलतहि छकि पर सार विसारी ।।91।।
दोहा
नैंना तो अटके रहैं, अद्भुत रूप निहारि ।
परत कछू खेलत कछू, छह कहि छाँड़त सारि ।।92।।
चौपाई
‘हित ध्रुव’ प्रेम खेल के आगे ।
और खेल सब फीके लागे ।।93।।
दोहा
प्रेम-स्वाद कैसैं कहौं, नाहिंन कछू समान ।
भूषन पट की को कहै, रहे हारि तहाँ प्रान ।।94।।
चौपाई
नवल कुँवरि दोऊ बाहाँ-जोरी ।
विहरत निपट साँक री खोरी ।।95।।
अति सुदेश भूषन-झनकारा ।
सुनत श्रवन सुख होत अपारा ।।96।।
सुभग मंद-गति कमल फिरावैं ।
बिच-बिच सरस चारु कल गावैं ।।97।।
दोहा
एक प्रान द्वै सहज तन, गौर-स्याम निज रूप ।
वृंदावन आनन्द सदन, विलसत विविध अनूप ।।98।।
चौपाई
कोमल बेलि द्रुमनि लपटानी ।
डोलतिं मृगी परम सुखदानी ।।99।।
मोतिनु-दुलरी कण्ठ बनाई ।
बिच-बिच मनि अनूप पहिराई ।।100।।
अति आनंद फिरैं बन माहीं ।
करतिं कलोल द्रुमनि की छाँहीं ।।101।।
नवल विपिन में सुमन सुरंगा ।
निरखत फिरैं दोऊ इक संगा ।।102।।
मान-सरोवर जबहीं आये ।
नाचत मोर देखि मुसिकाये ।।103।।
ठाढ़े भये सरोवर तटहीं ।
कोकिल कीर मधुर सुर रटहीं ।।104।।
अरुन असित-सित अंबुज सोहैं ।
चलत मराल मंद-गति मोहैं ।।105।।
कुंडलिया
नवल नवल मोहन बने, नव राधा वर नारि ।
नव वसंत तहाँ नित रहै, नवल पुहुप नव डारि ।।
नवल पुहुप नव डारि, रसिक मधुकर लपटाहीं ।
करत गुंज अति चारु, रागु सौरभ मन माहीं ।।
सुनत श्रवन रुचि होइ, रहत फूलत आनँद मन ।
परम रसिक जुग चंद, सदा विहरत मोहन-वन ।।106।।
चौपाई
खेलत फाग तहाँ रस-सागर ।
नव राधे अरु मोहन नागर ।।107।।
ताल मृदंग मधुर धुनि बाजैं ।
सखियनि वृंद माँहि दोउ राजैं ।।108।।
चंदन वंदन और अबीरा ।
सुरंगित भये दुहुँनि के चीरा ।।109।।
एकनि डफ इक बीन बजावैं ।
एक गुलाल सुरंग उड़ावैं ।।110।।
निर्त्तत फिरत किशोर-किशोरी ।
मधुर वचन कहि हो-हो होरी ।।111।।
ज्यौं-ज्यौं दोऊ तारी पटकैं ।
अति सुदेस पहुँची कर लटकैं ।।112।।
यह सोभा मन ही तौ जानै ।
बलि बलि दैहिं दासि निजु प्रानैं।।113।।
सोरठा
एक प्रान द्वै देह, नवल रसिक अरु रसिकनी ।
अति आसक्त सनेह, रँगे परस्पर प्रेम-रंग ।।114।।
चौपाई
कंचन रुचिर हिंडोरा बन्यौ ।
मनिमय जटित मनोहर ठन्यौ ।।115।।
झूलत रसिक राधिका-मोहन ।
निरखि नैंन भावत दिन जोहन ।।116।।
भूषन-दुति अंगनि दमकाई ।
नील-पीत अंचल फहराई ।।117।।
सखियनि नैंन-निमेष भुलाये ।
निरखत रूप अंबु भरि आये ।।118।।
दोहा
सहज इंदु दंपति वदन, सखियनि-नैंन चकोर ।
निरखि रूप इक-टक रहे, बँधे प्रेम दृढ़ डोर ।।119।।
चौपाई
तिनकौ रूप कहत नहिं आवै ।
जो देखै तन-सुधि बिसरावै ।।120।।
परै प्रेम के फंद मँझारी ।
सर्वसु प्रान रहै तहाँ हारी ।।121।।
निसि-दिन ताहि न और सुहाई ।
बिनु देखे हीयौ अकुलाई ।।122।।
यह रस जो मन वच कै गावै ।
निश्चै सो सहचरि-पद पावै ।।123।।
इनहीं नैननिं सब सुख देखै ।
जनम सफल अपनौं करि लेखै ।।124।।
नव मोहन श्री राधा प्यारी ।
हित ध्रुव निरखि जाइ बलिहारी ।।125।।
दोहा
दंपति वारिधि रूप के, उठतिं तरंग जु मैंन ।
दृग अगस्त नहिं तृपित ही, पान करत दिन-रैंन ।।126।।
चौपाई
आज बनी अति सुंदर जोरी ।
पिय मोहन अरु राधा गोरी ।।127।।
नवल कुँवर नटवर वपु कीने ।
सीस मुकट अंजन दृग दीने ।।128।।
नासा-जलज अधिक छबि पाई ।
मुसिकनि वरषत सुंदरताई ।।129।।
प्रिया सुभग काछनी कटि सोहै ।
कज्जल नैंन रेख मन मोहै।।130।।
बेसरि सुभग मंद गति डोलै ।
ईषद हँसनि सरस मृदु बोलै ।।131।।
बदन-कमल छबि कही न जाई ।
सखियनि अलि दृग रहे लुभाई ।।132।।
नील-पीत पट तरल सुहाई ।
भूषन झलक बरनि नहिं जाई ।।133।।
कुंडलिया
दंपति रूप अनूप अति, भूषन झलकत अंग ।
तरल झलक प्रतिबिंब अति, निरखि होत दृग पंग ।।
निरखि होत दृग पंग, सुभग अति सुंदरताई ।
सहज माधुरी अंग चितै, छिन पलक न लाई ।।
पानि सरस फेरत कमल, राजत परिमल रूप ।
मंद हाँस चितवनि चपल, मोहन दंपति रूप ।।134।।
चौपाई
पावन सुभग कलिंदी तीरा ।
कंचन रास खचित मनि- हीरा ।।135।।
कनक कंज तेहि मध्य विराजै।
सोभा निरखि कोटि रवि लाजै ।।136।।
चहुँ दिसि फूल रही फुलवारी ।
तैसी सरद निसा उजियारी ।।137।।
आनंद कौ घन बन में बरसै ।
खग मृग सब सखियन मन हरषैं ।।138।।
दोहा
सहज चंद निज सहजही, सहज वृंदावन रास ।
सहज पवन सुख सहजही, दंपति सहज विलास ।।139।।
चौपाई
खेलत रास तहाँ दोऊ नागर ।
निपुन सुधंग-कला रस-सागर ।।140।।
विविध वाद्य निजु सहचरि साजै ।
एकहि ताल मधुर धुनि बाजै ।।141।।
एक बीन लिये एक उपंगा ।
एक ताल लिये मधुर मृदंगा ।।142।।
अति कल मधुर दोऊ मिलि गावैं।
हस्तक भेद अनेक दिखावैं ।।143।।
उघटत शब्द थेई-थेई बोलैं ।
नासा बिच बेसरि अति डोलैं ।।144।।
लटकत अंग सुभग अति सोहैं ।
बंक विलोकनि मन कौं मोहैं ।।145।।
यह सोभा निज सखी निहारैं ।
प्रेम विवस प्राननिं कौं वारैं ।।146।।
दोहा
जेतिक अंग सुधंग के, अरु संगीत प्रमान ।
औरैं विधि निर्त्तत नवल, नवल-नवल सुर गान ।।147।।
चौपाई
अलग लाग जहँ लेहिं परस्पर।
अधिक चौंप सौं दोउ सुघरवर ।।148।।
निपट विकट गति लेति पियारी ।
निरखत रहे लजाइ विहारी ।।149।।
करहि जतन वह लाग न आवै ।
त्यौं-त्यौं हँसि-हँसि प्रिया बतावै ।।150।।
अति आनंद भरे मन माँहीं ।
कमल दलन पर निर्त कराँहीं ।।151।।
निर्त्तनि श्रमित भये अति भारी ।
नव किशोर नवला सुकुँवारी ।।152।।
श्रम जल बूँद जु मुखहि विराजैं ।
मनो कन ओस कमल पर राजैं ।।153।।
यह सुख तौ नैंना ही जानैं ।
रसना हित ध्रुव कहा बखानैं ।।154।।
सोरठा
रसना कोटिक पाइ, कोटि कलप लौं जीजियै ।
तऊ बरन नहिं जाइ, सहज माधुरी वदन की ।।155।।
चौपाई
मान-सरोवर निर्मल नीरा ।
कंचन-मनिमय जटित सुतीरा ।।156।।
क्रीड़त तहाँ नवल पिय-प्यारी ।
छिरकत हँसत बढ़ी सोभा री ।।157।।
सखियनि प्रिया सैंन जब पाई ।
छिरकत लालहि अति अधिकाई ।।158।।
अंबुधार छूटत अति भारी ।
परम सुगंध रुचिर सुखकारी ।।159।।
गज-करनी ज्यौं केलि कराहीं ।
प्रेम-मगन क्रीड़त जल माँहीं ।।160।।
दोहा
सहज सरोवर सुभग में, नव नागर विवि-चंद ।
खेलत अति आनंद मन, दोऊ परम सुछंद ।।161।।
चौपाई
मंदिर-कनक मध्य अति सोहै ।
निरखत चित्र सुचित्तहि मोहै ।।162।।
तापर लता मंजु नव कुंजा ।
अति अनूप सुंदर सुख पुंजा ।।163।।
परम रुचिर बहै त्रिविधि-समीरा ।
गुंजत भृंग रटत पिक कीरा ।।164।।
किसलय दलनि सुरंग सुहाई ।
रचित सैन कोमल सुखदाई ।।165।।
दोहा
सहज कुंज सुख पुंज में, रची कंज-दल-सैंन ।
रहत दिनहिं सेवत तहाँ, वृंद कोटि कुल मैंन ।।166।।
चौपाई
करि जल केलि तहाँ दोऊ आये ।
अंगनि चीर सुरंग बनाये ।।167।।
सरस सुगंध माँहिं दोऊ भीने ।
लटकत हँसत अंस-भुज दीने ।।168।।
अति विचित्र दंपति मन माँहीं ।
छिन छिन प्रति नव केलि कराँहीं ।।169।।
पलटि वेष पिय भये सुकुँवारी ।
भूषन पहिरि सुरंग तन सारी ।।170।।
बेसर खुभी झलक अति चमकै।
दुलरी जलज कंठ पर दमकै ।।171।।
मुसिकनि कछुक लाज की सोहै ।
चमकनि दसन चपल मन मोहै ।।172।।
खेलत हँसत किशोर-किशोरी ।
मानस मिथुन लेत छवि चोरी ।।173।।
बीरी खंड दसन वर गोरी ।
देत परस्पर प्रीति न थोरी ।।174।।
सखी भाँवती यह सुख देखैं ।
नैंन सफल अपने करि लेखैं ।।175।।
दोहा
रसिक कुँवर दंपति सदा, बसत रहौ मम चित्त ।
प्रेम-सजल ध्रुव नैंन दोऊ, रहें निरखि छवि नित्त ।।176।।
चौपाई
ऐसी भाँति नवल विवि नागर ।
करत विहार दिनहि सुख सागर ।।177।।
वृन्दा-विपिन प्रेम निज धामा।
संतत राजत तहाँ श्री श्यामा ।।178।।
जो यह रस मन-रुचि कै गावै ।
प्रेम-प्रसाद सहजही पावै ।।179।।
जो या रस में नित अनुरागी ।
परम धन्य तेई बड़भागी ।।180।।
यह रस तो मन ही में राखौ ।
भक्तिहीन सौं कबहुँ न भाषौ ।।181।।
जथा-बुद्धि तौ यह रस गायौ ।
रसिक-कृपा तें जो उर आयौ ।।182।।
रसानंद याकौ नाम कहावै ।
कहत सुनत आनंद-रस पावै ।।183।।
संवत् षोडस से पंचासा ।
बरनत जस ध्रुव युगल विलासा ।।184।।
दोहा
यह रस तौ अति अमल है, कह्यौ बुद्धि अनुमान ।
पंछी उड़ै आकास कौ, जाहि सक्ति परमाँन ।।185।।
दोहा
हरिवंश हंस उद्दित दिनहिं, परम रसिक रस- रासि ।
उभै प्रेम-रस किरन मनौं, करी जु जगत प्रकासि ।।1।।
चौपाई
प्रथम चरण हरिवंश जी ध्याऊँ ।
तातैं कछुक प्रेम रस पाऊँ ।।2।।
प्रेमारस तबहिं पै पावै ।
श्री हरिवंश नाम गुन गावै ।।3।।
नित्य-विहार तबहिं तौ जानैं ।
श्री हरिवंश-पदनि उर आनैं ।।4।।
जो रस श्री हरिवंश जी गायौ ।
सो रस तौ काहूँ नहिं पायौ ।।5।।
अगम-निगम की कौन चलावै ।
महा विष्णु के मन नहिं आवै ।।6।।
या रस कौ तबही अधिकारी ।
करहिं कृपा श्री राधा प्यारी ।।7।।
कृपा नागरी तबहीं करै।
श्री हरिवंश सुकर सिर धरै ।।8।।
सोरठा
भजि रे मन दिन-रैन, श्री हरिवंश जु पद-कमल ।
देखौ भरि जुग नैंन, तेहि प्रताप तें जुग़ल-छबि ।।9।।
चौपाई
यह उपजी मन अति अभिलाषा ।
करहु कृपा जु करौं कछु भाषा ।।10।।
मौपै है अबहीं मति थोरी ।
कैसैं बरनौं यह रस-जोरी ।।11।।
दीजै मोहि बुद्धि-परकासा ।
यह पुरवौ तुम मेरी आसा ।।12।।
रसिक-अनन्य चरन-रज पाऊँ ।
सहज केलि नव-दंपति गाऊँ ।।13।।
दोहा
अगम ते अगम अगाधि अति, पहुँचत नहिं मन वेद ।
श्री हरिवंश प्रताप-बल, पावत सुगम सु भेद ।।14।।
चौपाई
वृन्दावन-रस अतिहि अगाधा ।
नित्य-केलि मोहन श्री राधा ।।15।।
वृंदा-विपिन करैं नित-केली ।
पिय मोहन अरु प्रिया नवेली ।।16।।
सोभित कंचन-भूमि सुहाई ।
हंस-सुता-छबि कही न जाई ।।17।।
मनिनु जटित विवि कूल विराजैं।
नव मराल नव कुंजनिं राजैं ।।18।।
अति कमनीय बनी नव कुंजा ।
मधुकर तहाँ करत मधु-गुंजा ।।19।।
बिच-बिच कनक कंज छबि न्यारी ।
अति अनूप झलकत सोभा री ।।20।।
वल्लिनु कुसुम बने बहु भाँती ।
बरन-बरन सुंदर इक पाँती ।।21।।
वृंदा सकल रची वन-संपति।
निरखि-निरखि आनंद मन-दंपति ।।22।।
फूले सुमन विविध नव रंगा ।
अति अनुराग होत प्रिय संगा ।।23।।
त्रिविध पवन तहँ बहै सुहाई ।
शुक कपोत कोकिल कुहकाई ।।24।।
दोहा
सहज कुंज अतिही बनी, मधुप करत गुंजार ।
सकल सुगंधनि लै रच्यौ, अद्भुत मदन-अगार ।।25।।
चौपाई
सखियनि सिज्या रुचिर बनाई ।
विविध भाँति सौरभ बुरकाई ।।26।।
तापर बैठे नवल दंपती ।
सखियनि हित सुख सदा संपती ।।27।।
अंसनि भुजा परस्पर धारी ।
मोहन-लाल राधिका-प्यारी ।।28।।
ईषद हासि दोऊ मुसिकाँहीं ।
अति अनुराग भरे मन माँहीं ।।29।।
सोरठा
मोहन जू निजु पानि, प्रिया अंग भूषन सजे ।
सुभग मनोहर ठाँनि, विविध कुसुम बैंनी गुही ।।30।।
चौपाई
मौरी सीस सुरंग सुहाई ।
मोतिन माँग रची सुखदाई ।।31।।
बैंनी फूल देखि छबि न्यारी ।
मनौं घन में प्रगटी उजियारी ।।32।।
मृगमद-तिलक भाल पर कियौ।
मधि बिंदुका कुंकुम कौ दियौ ।।33।।
खुटिला खुभी श्रवन झलकाई ।
बने नैंन प्रतिबिंब की झाँई ।।34।।
दोहा
नैंन सुरंग अनूप अति, चंचल बंक बिशाल ।
रुचिर रेख अंजन बनी, चितवनि चपल रसाल ।।35।।
चौपाई
वाम कपोल श्याम बिंदु सोहै ।
अलप अलक मोहन-मन मोहै ।।36।।
चितवनि चंचल परम सुहाई ।
खंजन मीन लजी चपलाई ।।37।।
वेसरि-झलक अधिक छबि पाई ।
मुसिकनि बरषत सुंदरताई ।।38।।
अरुन अधर दसननि की शोभा ।
निरखि-निरखि मोहन-मन लोभा ।।39।।
चिबुक मध्य श्यामल बिंदुकनी।
कहि न जात जैसी छबि बनी ।।40।।
कंचुकि कसुँभि विराजत प्यारी।
नील वसन शोभित तन सारी ।।41।।
कुंदन-दुलरी कंठ सुहाई ।
मनौं रूप की सींव बनाई ।।42।।
तापर झलकत मोतिनु माला ।
बीच पदिक झलमलत रसाला ।।43।।
भुजनि वलय अंगद सुठि सोहैं ।
रतन खचित पहुँची मनमोहैं ।।44।।
झलकि रहीं गोरी मृदु अँगुरी ।
रँग-रँग की सोभित हैं मुँदरी ।।45।।
त्रिबली उदर नाभि-हृद जहाँ ।
मीन रहत मोहन-मन तहाँ ।।46।।
कटि राजति रसना रस-ऐंनी।
झुनकति पिय मन कौं सुखदैनी ।।47।।
पाइल नूपुर की धुनि सोहै ।
गति पर गज-मराल-मन मोहै ।।48।।
चरननि जावक चित्र सुरंगा ।
छबि लागी डोलत तिहि संगा ।।49।।
सुंदर नवल नखनि के आगैं ।
अतनु रतन सब फीके लागै ।।50।।
दोहा
रूप-रासि अति नागरी, भूषन अग रसाल ।
निरखि नैंन मोहन फँदे, मनौं मीन छबि-जाल ।।51।।
चौपाई
कछु दृग सजल देखि निज रूपहि ।
पिय चित पर्यो प्रेम के कूपहिं ।।52।।
निरखि-निरखि सोभा सुंदर वर।
प्रेम विवस लटके सिज्या पर।।53।।
तब प्रिया लै मोहन उर लायौ।
होइ दयालु अधरन रस प्यायौ।।54।।
रति विपरित चुंबन इक संगा।
करत विविध नव-केलि अनंगा ।।55।।
नूपुर-रव किंकिनि रुचिदाई ।
उठत तरंग-मैंन अधिकाई ।।56।।
कोक-कला में निपुन विहारी ।
केलि-बेलि रति की विस्तारी ।।57।।
रति-रन-रंग रह्यौ अति भारी ।
बढी चौंप जद्यपि सुकुवाँरी ।।58।।
दोहा
सुरत-रंग विवि वदन पर, श्रम-जल-कन रहे सोहि ।
रसिक सखी ललितादि सब, छबि अनूप रहीं जोहि ।।59।।
चौपाई
कोमल अंचल पवन डुलावैं ।
अति आसक्त नैंन भरि आवैं ।।60।।
एक बैस सब सखी सहेली ।
मानौ नेह-बाग की बेली ।।61।।
सींची नवल कटाक्षनि जल सौं ।
फूल चाह फूल फल दल सौं ।।62।।
एक रूप तन-मन अनुरागी ।
जुगल हेत हित-रस सौं पागी ।।63।।
तिन में आठ सखी मन भाई ।
देखत रूप न कबहुँ अघाई ।।64।।
ललित विशाखा वृंदा श्यामा ।
चंद्रा मुदिता नंदिनि भामा ।।65।।
अपनी-अपनी टहल कराहीं ।
प्रेम-मगन आनंद रहाहीं ।।66।।
ललिता लड़िली-लाल लड़ावै ।
मधुर वचन कहि तिनहिं हँसावै ।।67।।
जुगल-मिलन-सुख अतिही भावै ।
नेह बढ़नि की बात चलावै ।।68।।
सखी विसाखा मन की प्यारी ।
कबहुँ न होति संग तें न्यारी ।।69।।
पाननिं बीरी रुचिर बनावै ।
लटकि कुँवरि तेहि पर ढरि आवै ।।70।।
वृंदावन कौं दिनहि सिंगारै ।
सोभा भरि-भरि नैंन निहारै ।।71।।
बहु विधि दल-फल-फूल सुहाये।
सुमन सुरंग दुहुँनिं मन भाये ।।72।।
श्यामा चीर विविध नव-रंगा ।
लियैं रहति अनुराग अभंगा ।।73।।
अंचल कचनि सँभार्यौ करई ।
षट-रस विंजन आगैं धरई ।।74।।
चंदा चन्दन ठाढी लीयैं ।
और अरगजा मृगमद कीयैं ।।75।।
अंगनि चित्र विचित्र बनावै ।
फूलनि माल फूल पहिरावै ।।76।।
मुदिता मदन-मोद उपजावै ।
हित सौं चरन-कमल सहरावै ।।77।।
बिच-बिच कहति है प्रेम-पहेली ।
हँसि हँसि समुझत नवल नवेली ।।78।।
नंदिनि अति आनन्द बढ़ावै ।
मधुर-मधुर सुर बीन बजावै ।।79।।
बिच-बिच मंद-मंद सुर गावै ।
सुनत हिये के श्रवन सिरावै ।।80।।
कुसुम-बीजना मृदु कर लीयैं।
करति पवन हुलसति अति हीयैं।।81।।
भामा भूषन दिनहिं सिंगारै ।
सोभा भरि-भरि नैंन निहारै ।।82।।
यह सुख निज सहचरी दिखाहीं ।
वारि-वारि अंचल बलि जाहीं।।83।।
दोहा
(श्री) राधा वल्लभ नव कुँवर, करत निकुंज-विहार ।
प्रवल चौंप तन-मन बढ़ी, रसमै दोऊ सुकुँवार ।।84।।
चौपाई
खेलत नवल नागरी नाइक ।
चौपर खेल महा सुखदायक ।।85।।
इक-इक सखी भई दुहुँ कोदा।
बढ्यौ युगल मन में अति मोदा।।86।।
अंगनि भूषन दाव लगावैं ।
कहुँ-कहुँ झगरत अति छबि पावैं ।।87।।
हारत लाल लगावत जोई ।
त्यौं-त्यौं चौंप चौगुनी होई ।।88।।
हारे मोतिनु-हार विहारी ।
तब कटि तें किंकिनी उतारी ।।89।।
पीत वसन वंशी पुनि हारी ।
छबि सौं हँसति मधुर सुकुँवारी ।।90।।
छके लाल मुख छबिहि निहारी ।
चलतहि छकि पर सार विसारी ।।91।।
दोहा
नैंना तो अटके रहैं, अद्भुत रूप निहारि ।
परत कछू खेलत कछू, छह कहि छाँड़त सारि ।।92।।
चौपाई
‘हित ध्रुव’ प्रेम खेल के आगे ।
और खेल सब फीके लागे ।।93।।
दोहा
प्रेम-स्वाद कैसैं कहौं, नाहिंन कछू समान ।
भूषन पट की को कहै, रहे हारि तहाँ प्रान ।।94।।
चौपाई
नवल कुँवरि दोऊ बाहाँ-जोरी ।
विहरत निपट साँक री खोरी ।।95।।
अति सुदेश भूषन-झनकारा ।
सुनत श्रवन सुख होत अपारा ।।96।।
सुभग मंद-गति कमल फिरावैं ।
बिच-बिच सरस चारु कल गावैं ।।97।।
दोहा
एक प्रान द्वै सहज तन, गौर-स्याम निज रूप ।
वृंदावन आनन्द सदन, विलसत विविध अनूप ।।98।।
चौपाई
कोमल बेलि द्रुमनि लपटानी ।
डोलतिं मृगी परम सुखदानी ।।99।।
मोतिनु-दुलरी कण्ठ बनाई ।
बिच-बिच मनि अनूप पहिराई ।।100।।
अति आनंद फिरैं बन माहीं ।
करतिं कलोल द्रुमनि की छाँहीं ।।101।।
नवल विपिन में सुमन सुरंगा ।
निरखत फिरैं दोऊ इक संगा ।।102।।
मान-सरोवर जबहीं आये ।
नाचत मोर देखि मुसिकाये ।।103।।
ठाढ़े भये सरोवर तटहीं ।
कोकिल कीर मधुर सुर रटहीं ।।104।।
अरुन असित-सित अंबुज सोहैं ।
चलत मराल मंद-गति मोहैं ।।105।।
कुंडलिया
नवल नवल मोहन बने, नव राधा वर नारि ।
नव वसंत तहाँ नित रहै, नवल पुहुप नव डारि ।।
नवल पुहुप नव डारि, रसिक मधुकर लपटाहीं ।
करत गुंज अति चारु, रागु सौरभ मन माहीं ।।
सुनत श्रवन रुचि होइ, रहत फूलत आनँद मन ।
परम रसिक जुग चंद, सदा विहरत मोहन-वन ।।106।।
चौपाई
खेलत फाग तहाँ रस-सागर ।
नव राधे अरु मोहन नागर ।।107।।
ताल मृदंग मधुर धुनि बाजैं ।
सखियनि वृंद माँहि दोउ राजैं ।।108।।
चंदन वंदन और अबीरा ।
सुरंगित भये दुहुँनि के चीरा ।।109।।
एकनि डफ इक बीन बजावैं ।
एक गुलाल सुरंग उड़ावैं ।।110।।
निर्त्तत फिरत किशोर-किशोरी ।
मधुर वचन कहि हो-हो होरी ।।111।।
ज्यौं-ज्यौं दोऊ तारी पटकैं ।
अति सुदेस पहुँची कर लटकैं ।।112।।
यह सोभा मन ही तौ जानै ।
बलि बलि दैहिं दासि निजु प्रानैं।।113।।
सोरठा
एक प्रान द्वै देह, नवल रसिक अरु रसिकनी ।
अति आसक्त सनेह, रँगे परस्पर प्रेम-रंग ।।114।।
चौपाई
कंचन रुचिर हिंडोरा बन्यौ ।
मनिमय जटित मनोहर ठन्यौ ।।115।।
झूलत रसिक राधिका-मोहन ।
निरखि नैंन भावत दिन जोहन ।।116।।
भूषन-दुति अंगनि दमकाई ।
नील-पीत अंचल फहराई ।।117।।
सखियनि नैंन-निमेष भुलाये ।
निरखत रूप अंबु भरि आये ।।118।।
दोहा
सहज इंदु दंपति वदन, सखियनि-नैंन चकोर ।
निरखि रूप इक-टक रहे, बँधे प्रेम दृढ़ डोर ।।119।।
चौपाई
तिनकौ रूप कहत नहिं आवै ।
जो देखै तन-सुधि बिसरावै ।।120।।
परै प्रेम के फंद मँझारी ।
सर्वसु प्रान रहै तहाँ हारी ।।121।।
निसि-दिन ताहि न और सुहाई ।
बिनु देखे हीयौ अकुलाई ।।122।।
यह रस जो मन वच कै गावै ।
निश्चै सो सहचरि-पद पावै ।।123।।
इनहीं नैननिं सब सुख देखै ।
जनम सफल अपनौं करि लेखै ।।124।।
नव मोहन श्री राधा प्यारी ।
हित ध्रुव निरखि जाइ बलिहारी ।।125।।
दोहा
दंपति वारिधि रूप के, उठतिं तरंग जु मैंन ।
दृग अगस्त नहिं तृपित ही, पान करत दिन-रैंन ।।126।।
चौपाई
आज बनी अति सुंदर जोरी ।
पिय मोहन अरु राधा गोरी ।।127।।
नवल कुँवर नटवर वपु कीने ।
सीस मुकट अंजन दृग दीने ।।128।।
नासा-जलज अधिक छबि पाई ।
मुसिकनि वरषत सुंदरताई ।।129।।
प्रिया सुभग काछनी कटि सोहै ।
कज्जल नैंन रेख मन मोहै।।130।।
बेसरि सुभग मंद गति डोलै ।
ईषद हँसनि सरस मृदु बोलै ।।131।।
बदन-कमल छबि कही न जाई ।
सखियनि अलि दृग रहे लुभाई ।।132।।
नील-पीत पट तरल सुहाई ।
भूषन झलक बरनि नहिं जाई ।।133।।
कुंडलिया
दंपति रूप अनूप अति, भूषन झलकत अंग ।
तरल झलक प्रतिबिंब अति, निरखि होत दृग पंग ।।
निरखि होत दृग पंग, सुभग अति सुंदरताई ।
सहज माधुरी अंग चितै, छिन पलक न लाई ।।
पानि सरस फेरत कमल, राजत परिमल रूप ।
मंद हाँस चितवनि चपल, मोहन दंपति रूप ।।134।।
चौपाई
पावन सुभग कलिंदी तीरा ।
कंचन रास खचित मनि- हीरा ।।135।।
कनक कंज तेहि मध्य विराजै।
सोभा निरखि कोटि रवि लाजै ।।136।।
चहुँ दिसि फूल रही फुलवारी ।
तैसी सरद निसा उजियारी ।।137।।
आनंद कौ घन बन में बरसै ।
खग मृग सब सखियन मन हरषैं ।।138।।
दोहा
सहज चंद निज सहजही, सहज वृंदावन रास ।
सहज पवन सुख सहजही, दंपति सहज विलास ।।139।।
चौपाई
खेलत रास तहाँ दोऊ नागर ।
निपुन सुधंग-कला रस-सागर ।।140।।
विविध वाद्य निजु सहचरि साजै ।
एकहि ताल मधुर धुनि बाजै ।।141।।
एक बीन लिये एक उपंगा ।
एक ताल लिये मधुर मृदंगा ।।142।।
अति कल मधुर दोऊ मिलि गावैं।
हस्तक भेद अनेक दिखावैं ।।143।।
उघटत शब्द थेई-थेई बोलैं ।
नासा बिच बेसरि अति डोलैं ।।144।।
लटकत अंग सुभग अति सोहैं ।
बंक विलोकनि मन कौं मोहैं ।।145।।
यह सोभा निज सखी निहारैं ।
प्रेम विवस प्राननिं कौं वारैं ।।146।।
दोहा
जेतिक अंग सुधंग के, अरु संगीत प्रमान ।
औरैं विधि निर्त्तत नवल, नवल-नवल सुर गान ।।147।।
चौपाई
अलग लाग जहँ लेहिं परस्पर।
अधिक चौंप सौं दोउ सुघरवर ।।148।।
निपट विकट गति लेति पियारी ।
निरखत रहे लजाइ विहारी ।।149।।
करहि जतन वह लाग न आवै ।
त्यौं-त्यौं हँसि-हँसि प्रिया बतावै ।।150।।
अति आनंद भरे मन माँहीं ।
कमल दलन पर निर्त कराँहीं ।।151।।
निर्त्तनि श्रमित भये अति भारी ।
नव किशोर नवला सुकुँवारी ।।152।।
श्रम जल बूँद जु मुखहि विराजैं ।
मनो कन ओस कमल पर राजैं ।।153।।
यह सुख तौ नैंना ही जानैं ।
रसना हित ध्रुव कहा बखानैं ।।154।।
सोरठा
रसना कोटिक पाइ, कोटि कलप लौं जीजियै ।
तऊ बरन नहिं जाइ, सहज माधुरी वदन की ।।155।।
चौपाई
मान-सरोवर निर्मल नीरा ।
कंचन-मनिमय जटित सुतीरा ।।156।।
क्रीड़त तहाँ नवल पिय-प्यारी ।
छिरकत हँसत बढ़ी सोभा री ।।157।।
सखियनि प्रिया सैंन जब पाई ।
छिरकत लालहि अति अधिकाई ।।158।।
अंबुधार छूटत अति भारी ।
परम सुगंध रुचिर सुखकारी ।।159।।
गज-करनी ज्यौं केलि कराहीं ।
प्रेम-मगन क्रीड़त जल माँहीं ।।160।।
दोहा
सहज सरोवर सुभग में, नव नागर विवि-चंद ।
खेलत अति आनंद मन, दोऊ परम सुछंद ।।161।।
चौपाई
मंदिर-कनक मध्य अति सोहै ।
निरखत चित्र सुचित्तहि मोहै ।।162।।
तापर लता मंजु नव कुंजा ।
अति अनूप सुंदर सुख पुंजा ।।163।।
परम रुचिर बहै त्रिविधि-समीरा ।
गुंजत भृंग रटत पिक कीरा ।।164।।
किसलय दलनि सुरंग सुहाई ।
रचित सैन कोमल सुखदाई ।।165।।
दोहा
सहज कुंज सुख पुंज में, रची कंज-दल-सैंन ।
रहत दिनहिं सेवत तहाँ, वृंद कोटि कुल मैंन ।।166।।
चौपाई
करि जल केलि तहाँ दोऊ आये ।
अंगनि चीर सुरंग बनाये ।।167।।
सरस सुगंध माँहिं दोऊ भीने ।
लटकत हँसत अंस-भुज दीने ।।168।।
अति विचित्र दंपति मन माँहीं ।
छिन छिन प्रति नव केलि कराँहीं ।।169।।
पलटि वेष पिय भये सुकुँवारी ।
भूषन पहिरि सुरंग तन सारी ।।170।।
बेसर खुभी झलक अति चमकै।
दुलरी जलज कंठ पर दमकै ।।171।।
मुसिकनि कछुक लाज की सोहै ।
चमकनि दसन चपल मन मोहै ।।172।।
खेलत हँसत किशोर-किशोरी ।
मानस मिथुन लेत छवि चोरी ।।173।।
बीरी खंड दसन वर गोरी ।
देत परस्पर प्रीति न थोरी ।।174।।
सखी भाँवती यह सुख देखैं ।
नैंन सफल अपने करि लेखैं ।।175।।
दोहा
रसिक कुँवर दंपति सदा, बसत रहौ मम चित्त ।
प्रेम-सजल ध्रुव नैंन दोऊ, रहें निरखि छवि नित्त ।।176।।
चौपाई
ऐसी भाँति नवल विवि नागर ।
करत विहार दिनहि सुख सागर ।।177।।
वृन्दा-विपिन प्रेम निज धामा।
संतत राजत तहाँ श्री श्यामा ।।178।।
जो यह रस मन-रुचि कै गावै ।
प्रेम-प्रसाद सहजही पावै ।।179।।
जो या रस में नित अनुरागी ।
परम धन्य तेई बड़भागी ।।180।।
यह रस तो मन ही में राखौ ।
भक्तिहीन सौं कबहुँ न भाषौ ।।181।।
जथा-बुद्धि तौ यह रस गायौ ।
रसिक-कृपा तें जो उर आयौ ।।182।।
रसानंद याकौ नाम कहावै ।
कहत सुनत आनंद-रस पावै ।।183।।
संवत् षोडस से पंचासा ।
बरनत जस ध्रुव युगल विलासा ।।184।।
दोहा
यह रस तौ अति अमल है, कह्यौ बुद्धि अनुमान ।
पंछी उड़ै आकास कौ, जाहि सक्ति परमाँन ।।185।।
40. ब्रजलीला
चौपाई
एक समै विहरत बन माँही ।
कियौ मतौ विवि द्रुम की छाँही ।।1।।
यह निजु-रस कीजै विस्तारा ।
रसिक जननिं कौ अति ही प्यारा ।।2।।
नंदलाल वृषभान-किशोरी ।
रसिकनि हित प्रगटी यह जोरी ।।3।।
नित्य-केलि दिन ऐसे करहीं ।
अति आनंद प्रेम-रस ढरहीं ।।4।।
रस-निधि लीला ब्रज प्रगटाई ।
रसिक जननिं कौ अति सुखदाई ।।5।।
प्रथम-मिलन विधि जो उर आई ।
जथा-बुद्धि जैसी कछु गाई ।।6।।
रस-विहीन के मन नहिं भावै ।
पाहन चित्तहि को समुझावै ।।7।।
नवल नेह रस अद्भुत आही ।
रसिकनि बिन को समुझे ताही ।।8।।
दोहा
रसिकनि हित विवि कुँवर वर, भये प्रगट ब्रज आँनि ।
प्रथम-मिलन सुख कहत हौं, जहँ लगि बुद्धि प्रमाँनि ।।9।।
चौपाई
वैस किसोर भये मन-मोहन ।
अंग-अंग सुंदर अति सोहन ।।10।।
छवि-तरंग कछु कहे न जाहीं ।
मदन कोटि लुटै चरननि माहीं ।।11।।
इहि दिसि श्री वृषभाँन दुलारी ।
वैस किशोर भई सुकुँवारी ।।12।।
अद्भुत रूप कुँवरि कौ माई ।
सखी एक पिय पै कह्यौ जाई ।।13।।
अति सुकुँवारि नवीन किशोरी ।
जुवतिन के मन लेत है चोरी ।।14।।
अंग-अंग वानिक कही न जाई ।
जित चितवत वरषत छवि माई ।।15।।
रति कमला देवांगना नारी ।
पद-नख की दुति ऊपर वारी ।।16।।
याकौ रूप जु देखै आई ।
सोऊ रूपवंत ह्वै जाई ।।17।।
वट संकेत अनूप विराजै ।
ताके निकट सरोवर राजै ।।18।।
सुंदर ठौर सघन बन आही ।
फूलि रही वहु जूही जाही ।।19।।
कबहुँ-कबहुँ तहाँ खेलन आवै ।
खेलत-खेल जोई मन भावै ।।20।।
दोहा
कुँवरि रूप की बात सुनि, परम रसिक-सिरमौर ।
अंग-अंग सब सिथल भये, चित्त रह्यौ नहिं ठौर ।।21।।
चौपाई
सुनत चौंप प्रिय मन भई भारी ।
किहि विधि देखियै नवलकुँवारी ।।22।।
ताही तक अब लागे रहही ।
काहू सौं यह बात न कहही ।।23।।
नित उठि बरसाने तन जाँही ।
जित संकेत सघन वन माँहीं ।।24।।
सघन कुंज इक हुती सुहाई ।
बैठे लाल तहाँ अरगाई ।।25।।
उत देख्यौ इक कौतिक भारी ।
सुंदर सर अंबुज छबि न्यारी ।।26।।
तहाँ देखे जुवतिन के वृन्द ।
मानौं कोटि उदित भये चंद ।।27।।
तिनमें नवल किशोरी सोहै ।
मोहन मन लाये छबि जोहै ।।28।।
पहिरैं नील बरन तन सारी ।
मोतिन माँग बनाइ सँवारी ।।29।।
अति विशाल लोइन अनियारे ।
उज्वल अरुन सहज कजरारे ।।30।।
फगुवा सुभग सुरंग विराजै ।
तापर मृगमद बैंदी राजै ।।31।।
झलकि रह्यौ बेसरि कौ मोती ।
फीके भये धरैं जे जोती ।।32।।
ईषद हाँस दसन अति झलकैं ।
छुटि रही कहुँ-कहुँ मुख पर अलकै ।।33।।
चंचल चितवनि परम सुहाई ।
मुख-पानिप कछु कही न जाई ।।34।।
सहज नवेली अति अलबेली ।
तैसीय सोभित संग सहेली ।।35।।
सखियनि खेल रच्यौ सुखकारी ।
एक ते एक रहैं दुरि न्यारी ।।36।।
चली दुरन तिहि ठाँ सुकुँवारी ।
बैठे हे जहाँ कुंज-विहारी ।।37।।
दोहा
अद्भुत कौतुक अधिक इक, बढ्यौ सहज सुख पुंज ।
चली दुरनि तहाँ लाड़ली, हुते लाल जेहि कुंज ।।38।।
चौपाई
कुँवरि तहाँ अनजानत आई ।
जहाँ लाल ह्वै रहे लुभाई ।।39।।
चारौं नैंन एक भये ऐसे ।
विछुरे खंजन मिलत है जैसे ।।40।।
सकुचि कुँवरि पुनि घूँघट कीनौ ।
नवल लाल तिनके रँग भीनौ ।।41।।
पिय-मन मीन-पर्यो छबि-जाला ।
व्याकुल देह सनेह विशाला ।।42।।
नैंकहि चितवत रूप रसाला ।
मूर्छा आइ गई तेहि काला ।।43।।
तबही लाल गिरे घर माई ।
सो ठाँ मनौं प्रेम की छाई ।।44।।
दोहा
रूप-सिंधु में मन पर्यौ, ढरत नैंन दोउ नीर ।
डगमगाइ धरनी परे, रही न सुधि जु सरीर ।।45।।
चौपाई
पिय कौ मन आपुन हरि लीनौ ।
अपनौ चित प्रीतम कौं दीनौ ।।46।।
मन रह्यौ उही कुँवरि फिरि आई ।
और न कछुवै बात सुहाई ।।47।।
नैंननिं छाई पिय की सोभा ।
सुधि तन न रहि फिरै उह लोभा ।।48।।
दोहा
देखि बात आश्चर्ज की, भूलि रही सुकुवाँरि ।
सहजहि बाढ्यौ प्रेम रस, ह्वै गई नई चिन्हारि ।।49।।
चौपाई
भूल्यौ खेल कुँवरि कौं तबही ।
नवल नेह रस उपज्यौ जबही ।।50।।
यह सहचरि किनहूँ नहिं लेखी ।
कुँवरि-कुँवर की देखा-देखी ।।51।।
दोहा
चलीं सखी मिलि भवन कौं, लीनी कुँवरि सँभारि ।
येई सबके प्रान हैं, अलबेली सुकँवारि ।।52।।
चौपाई
पिय की गति सुनि अब मो पाहीं ।
नैंननिं नौंक चुभी मन माँहीं ।।53।।
भूली सुधि-बुधि मूर्छा आई ।
छवि अनूप नैंननिं उर छाई ।।54।।
घरी चारि सुख माँहि बितानी ।
पुनि चित चेत सुरति उर आनी ।।55।।
कहाँ देखौ जिनि दई दिखाई ।
हरि लिये प्राँन देह अकुलाई ।।56।।
वह सहचरि मन में अति मानी।
जिनि यह छबि मोपै जु बखानी ।।57।।
दोहा
जो कछु रूप कह्यौ हुतौ, ताते सतगुन आहि ।
बार-बार तेहि सखी कौं, लालन उठत सराहि ।।58।।
चौपाई
तबतें मोहन रहत उदासा ।
प्रेम-खटक तें भरैं उसाँसा ।।59।।
रूप-छटा करकै हिय माँहिं ।
छिन छिन माँहि विकल ह्वै जाँहीं ।।60।।
तन की गति ऐसी भइ माई ।
ज्यौं जल बिन वारिज कुमिलाई ।।61।।
भोजन-पान कछू न सुहाई ।
हृदै ध्यान नव-प्रिया रहाई ।।62।।
अति ही छीन जु भयौ सरीरा ।
दिनहिं नैंन भरि आवै नीरा ।।63।।
दोहा
नैंन सरोवर से भरे, नवल नेह के नीर ।
ढरि-ढरि मुक्ता से परत, रहे भीज तन-चीर ।।64।।
चौपाई
सीस चंद्रिका धरी न भावै ।
सौरभ परसत अति दुख पावै ।।65।।
रुचै न उर बैजंती-माला ।
मारुत भई पावक सम ज्वाला ।।66।।
पीत वसन बंसी बिसराई ।
बाढ्यौ प्रेम कह्यौ नहिं जाई ।।67।।
बरसाने तन चितवत रहहीं ।
मौन धरैं कछुवे नहिं कहहीं ।।68।।
उहि दिसि ते जु पवन सखि आवै ।
सो रज अधिक लाल मन भावै ।।69।।
मन अरु नैन कुँवरि के पासा ।
देह रहे मिलिवे की आसा ।।70।।
कल न परत तन व्याकुल भारी ।
जब ते श्यामा, श्याम निहारी ।।71।।
प्रेम की बात निपट अटपटी ।
सोई जानै जेहि लगै चटपटी ।।72।।
दोहा
प्रीति-रीति अति कठिन है, कहै न समझै कोइ ।
प्रेम-बान जेहि उर लगै, निसि-दिन जानै सोइ ।।73।।
चौपाई
इतहि अनमनी रहै किशोरी ।
चित्त पर्यो पिय-प्रेम की डोरी ।।74।।
छुटि गई नैंननिं तें चपलाई ।
उपजी अंग-अंग शिथिलाई ।।75।।
चितै रहै अवनी तन ठाढ़ी ।
नेह-बेलि उर-अंतर बाढ़ी ।।76।।
जे सखि साथ की खेलन-हारी ।
तेउन मनतैं सबै बिसारी ।।77।।
दोहा
भूल्यौ हँसिबौ खेलिबौ, भूल्यौ अंग-सिंगार ।
निसि-दिन रहैं या सोच में, रुचत नाहिं उर-हार ।।78।।
चौपाई
हित की सखी अधिक अकुलानी ।
देखी कुँवरि कछुक कुँभिलानी ।।79।।
गद-गद कंठ नेह-रस सानी ।
बोली तहाँ कछुक मृदु बानी ।।80।।
चलहुँ लाड़िली प्रिया नवेली ।
जाँहिं सरोवर कहैं सहेली ।।81।।
नाक सँकोर स्वाँस अति लेही ।
सहचरि कौ उत्तर को देही ।।82।।
प्रेम-विवस कछुवै न सुहाई ।
मोहन-मूरति हृदै बसाई ।।83।।
बढ़ि गई प्रीति कहत नहिं आवै ।
विसरत नहिं जेतिक बिसरावै ।।84।।
मन पर्यो प्रेम पेच में जाई ।
बल कियैं कैसैं निकसत माई ।।85।।
ठाढ़ी नखनि अवनि कौं खनैं ।
फिरत न कैहूँ फेरत मनैं ।।86।।
नैंना अति ही सजल रहाहीं ।
प्रीतम-प्रेम जानि मन माहीं ।।87।।
दोहा
अति विशाल लोइन सुरंग, सहज रसीले आहि ।
प्रेम-लाज जल सौं भरे, रही अवनि तन चाहि ।।88।।
चौपाई
और सखी ढिंग ते जब आई ।
आठौ रहीं कुँवरि मन भाई ।।89।।
ललिता कहै श्री राधा प्यारी ।
मोसौं बात कहौ सुकुँवारी ।।90।।
मैं हूँ तौ मन की कछु पाई ।
सो तुम मोहि कहौ समुझाई ।।91।।
अपने सौं दुराव नहिं कीजै ।
दिन-दिन देखत देही छीजै ।।92।।
जानी प्रिया सखी सुखदाई ।
तब मन में की बात चलाई ।।93।।
एक द्यौस खेलत बन माहीं ।
सखियन-संग सरोवर पाहीं ।।94।।
अतिही सघन कुंज है जहाँ ।
नवल कुँवर इक देख्यौ तहाँ ।।95।।
साँवल बरन पीत उपरैना ।
बड्ड़े आहि सलौने नैंना ।।96।।
अरुन अधर मुसिकनि छबि राजै ।
मोर-चंद्रिका सीस बिराजै ।।97।।
नासा बनि रह्यौ जलज सुढारा ।
कंचन दुलरी मोतिनु हारा ।।98।।
मुख पर पानिप झलक सुहाई ।
नेह रूप मनौं प्रगट चुचाई ।।99।।
मो तन चितें गिरे मुरझाई ।
वह खसि परन न बिसरत माई ।।100।।
तेहि छिन तें जु गयौ मन मेरौ ।
को सुधि कहै न कीयौ फेरौ ।।101।।
हौं नहिं बोली लाज की लई ।
तेहि पाछैं धौं कौंन गति भई ।।102।।
वहै करक तब तें मन माँहीं ।
खटकति पल-पल निकसति नाँहीं ।।103।।
इतनौ कहत हियौ भरि लीनौं ।
बहुरि न कछुवै उत्तर दीनौं ।।104।।
दोहा
प्रेम-सुरति पिय की हियै, तेहि छिन करकी आइ ।
मुख निरसत नहिं बैन कछु, रही कुँवरि सिर नाइ ।।105।।
चौपाई
यह गति देखत सखी भुलानी ।
भरि आये दोऊ लोइन पानी ।।106।।
पुनि धरि धीर विचारनि लागी ।
नवल कुँवरि के हित अनुरागी ।।107।।
करौं जतन नँद-लालहिं लाऊँ ।
पिय-प्यारी में रंग बढ़ाऊँ ।।108।।
मिलहिं दोऊ रस बाढ़ै भारी ।
बिरह-बिथा विचते होइ न्यारी ।।109।।
दोहा
सहचरि मन आनँद बढ्यौ, सुनत बचन अति सार ।
प्रेम-मगन आनँद भयौ, मिलवन नंद-कुमार ।।110।।
चौपाई
नन्दगाम तेही छिन आई ।
मनमोहन कौ सैंन जनाई ।।111।।
सैंन बूझ लालन उठि आये ।
ललिता देखि कछुक मुसिकाये ।।112।।
बूझत सखी चतुर तब बाता ।
काहे मोहन हौ कृस गाता ।।113।।
तब मोहन मन की सब कही ।
जो जो पाछैं ही गति भई ।।114।।
ललिता एक किशोरी देखी ।
मानौं रूप की सीवाँ पेखी ।।115।।
कौन भाँति मुख की छबि कहियै ।
चितवत सखी चित्र ह्वै रहियै ।।116।।
कहा कहौं अंग-अंग निकाई ।
छिनक माँहिं लियौ चित्त चुराई ।।117।।
मनौं मोहनी और ठगोरी ।
तीन लोक की करि इक ठौरी ।।118।।
नव-किशोरता कछुक भुराई ।
लाज भरी अँखियनि मुसिकाई ।।119।।
रूपहि कहत विवस भयौ प्यारौ ।
प्रेम-नीर नैंननि तें ढारौ ।।120।।
दोहा
नख-सिख तें अति सोहनी, नाँहिन कछु समतूल ।
रूप-लता लागे मनौं, चितवनि-मुसिकनि फूल ।।121।।
चौपाई
अब तो जतन करौ वर नारी ।
मिलै मोहि वृषभानु-दुलारी ।।122।।
तिनकी छबि उर नैंननिं छाई ।
अटपटी भाँति चटपटी लाई ।।123।।
तेहि छवि-पावक-प्रीति जरावै ।
चतुर सोई जो प्रिया मिलावै ।।124।।
दोहा
मैं तो यह जानी सखी, हितू न तोहि समान ।
यह गुन तेरौ मानि हौं, जब लगि घट में प्रान ।।125।।
चौपाई
जा दिन तें मोहि दई दिखाई ।
चकित चित्त कछुवै न सुहाई ।।126।।
अब लगि तौ दिन बितये ऐसैं ।
अब धौं प्रान रहैंगे कैसैं ।।127।।
दोहा
गहवर आई सहचरी, सुनत लाल की बात ।
प्रेम दुहुँनि कौ समुझि मन, रीझि-रीझि बलिजात ।।128।।
चौपाई
ललिता कहै सुनौ नँदलाला ।
मिलऊँ आज तुमैं नव बाला ।।129।।
इतनी सुनत सरस है आये ।
विछुरे प्रान फेरि मनौं पाये ।।130।।
सुनत बचन आनँद न समाई ।
पग ललिता के सिर धरयौ जाई ।।131।।
दोहा
रसिक-सिरोमनि रसिक पिय, जानत रस की रीति ।
प्रभुता राखी दूरि कै, भये दीन बस-प्रीति ।।132।।
चौपाई
सखि मोहन सौं जब बदि लई ।
तब भीतर जसुदा पै गई ।।133।।
पकरि चरन बैठी ढिंग जाई ।
घरी इक पाछै बात चलाई ।।134।।
कीरति जू पाइ लागन कहियाँ ।
कुँवरहिं न्यौंतन पठईं मईयाँ ।।135।।
पुनि मन में कछु आहि विचारी ।
देख्यौ चाहत कुँवर विहारी ।।136।।
भूषन बसन बनाइ सबेरैं ।
अबही संग देहु तुम मेरैं ।।137।।
दोहा
मुदित महरि अति चाव सौं, भूषन वसन सुरंग ।
नवल लाल अति बानि कै, दयौ सहचरी संग ।।138।।
चौपाई
अति आनंद बढ्यौ मन माहीं ।
बैठे जाइ निकुंजनि छाँहीं ।।139।।
सहचरि तब मन करत बिचारा ।
सोच-नदी तहाँ बढ़ी अपारा ।।140।।
अब किहि विधि बरसाने जैयै ।
जो न लखै सोई जु बनैयै ।।141।।
गुरुजन-भीर तहाँ अति भारी ।
सब के प्रान वहै सुकुँवारी ।।142।।
फनि मनि ज्यौं लिये रहैं सँवारी ।
जीवत हैं सब ताहि निहारी ।।143।।
ऐसी कठिन ठौर सुनि प्यारे ।
तेहि ठाँ लागे नैंन तिहारे ।।144।।
सुनत सखी की बानी मानी ।
प्यासौ माँगै पानी-पानी ।।145।।
सब विधि मोहि भरोसौ तेरौ ।
पूरन करौ मनोरथ मेरौ ।।146।।
एक बार कैसैहूँ दिखावौ ।
तौ ललिता मोहि जीव जिवावौ ।।147।।
नासा अग्र प्रान रहे आई ।
बुधिबल करि कछु बेगि उपाई ।।148।।
ऐसैं वचन सुनत गहवरी ।
सहचरि सोच-कूप में परी ।।149।।
धीरज धरहु जाउँ बलिहारी ।
तुमतें मोहि अधिक दुख भारी ।।150।।
बचन करौं तुम सौं दै तारी ।
मिलऊँगी बलि प्रान-पियारी ।।151।।
तजि कैं लोक-वेद की लाज ।
देहौं प्रान तिहारे काज ।।152।।
दोहा
नैंन भरैं धीरज धरैं, मन में थापि विचारि ।
पलटि वेष लै जाइयै, जहाँ कुँवरि सुकुँवारि ।।153।।
चौपाई
तब ललिता इक मतौ विचारयौ ।
पिय कौं तिय कौ वेष सिंगारयौ।।।।154।।
भये चाव सौं सखी विहारी ।
देखन हित श्री राधा-प्यारी ।।155।।
पहिरी लाल कसूँभी सारी ।
गुहि वेनी कल माँग सँवारी ।।156।।
लाल-भाल पर बैंदी फबी ।
त्रिभुवन की सोभा सब दबी ।।157।।
नासा बेसरि अतिहि सोहनी ।
प्रान हरन कौं मनौं मोहनी ।।158।।
नैंननि अंजन दियौ बनाई ।
चिबुक बिंदु अतिही सुखदाई ।।159।।
कंचन-मोतिन की गर दुलरी ।
तेहि छबि की कोउ नाहिंन तुलरी ।।160।।
कंचुकि उरज बनाइ सँवारे ।
मानौं श्रीफल नौतन धारे ।।161।।
जेहि विधि के भूषन शुभ गाये ।
सुमिलि सुदेस सोइ पहिराये ।।162।।
साजि लिये जब सब सिंगारा ।
निरखि रूप सुख भयौ अपारा ।।163।।
नवल सखी नव अधिक विराजै ।
जुवतिनि-वृंद देखि सब लाजै ।।164।।
दोहा
स्याम अंग पर अति बनी, सारि कसुँभी सुरंग ।
नख-सिख भूषन तियनि के, भूषित मोतिनु-मंग ।।165।।
चौपाई
तब ललिता बरसाने आई ।
सखी संग लै परम सुहाई ।।166।।
जब प्रवेस रावल में कीनौं ।
सकुच सहित मुख अंचल दीनौ ।।167।।
बूझतिं सकल जुवति जन हेरैं ।
यह को आई सखि सँग-तेरैं ।।168।।
ललिता परम चतुर अति स्यानी ।
उत्तर दियौ बेगि मृदु बानी ।।169।।
यह उपनंद गोप की बेटी ।
मोकौं खोरि साँकरी भेटी ।।170।।
जान अवार संग लै आई ।
कहिकै वचन ताहि समुझाई ।।171।।
गई लिवाइ तहाँ कर जोरैं ।
राजति जहाँ कुँवरि तन गोरैं ।।172।।
ललिता देखि कुँवरि मुसिकानी ।
सखी चतुरई मन में जानी ।।173।।
निरखि परस्पर आनँद भारी ।
विरह विथा बिचतें भई न्यारी ।।174।।
सखी दोइ आईं सँग लागी ।
अटक्यौ चित्त रूप अनुरागी ।।175।।
कछुक ब्याज ललिता तब कीनौ ।
नवल प्रिया-प्रीतम सुख दीनौ ।।176।।
उठी बेगि जानै नहिं कोई ।
लीनी संग सहचरी दोई ।।177।।
कहति है तिन सौं बचन बनाये ।
करहु न टहल आज मन भाये ।।178।।
माला सुमन सुरंग बनावौ ।
चित्र विचित्र गूंथि लै आवौ ।।179।।
ऐसी चतुर चतुराई कीनी ।
टहल ब्याज सबही कौं दीनी ।।180।।
मिले मोहन श्री राधा-प्यारी ।
‘हित ध्रुव’ निरखि जाइ बलिहारी ।।181।।
दोहा
नवल लाल नव लाड़िली, नवल केलि सुख-रासि ।
नवल प्रीति नव-नव बढ़ी, करत मंद मृदु हासि ।।182।।
चौपाई
वचन-रचन सुख कह्यौ न जाई ।
बाढ़यौ प्रेम-सिंधु अधिकाई ।।183।।
मैन-रंग कीने पिय-प्यारी ।
मन-मन सुख बाढ्यौ अति भारी ।।184।।
प्रेम-पगी ललितादिक आईं ।
अति आनंद न अंग समाई ।।185।।
सोभित सिथिल दुहुँनि के अंगा ।
निरखतिं सहचरि प्रेम-अभंगा ।।186।।
श्रमित जानि तब पवन डुलावै ।
अति आसक्त नैंन भरि आवै ।।187।।
दोहा
कुँवरि कुँवर दोऊ रसिक वर, सब सखियनि के प्रान ।
दंपति सुख सुख जिनहु के, नाहिंन गति कछु आन ।।188।।
चौपाई
सखियनि जुत तब मतौ कराहीं ।
नित्य मिलैं हम वा बन माँहीं ।।189।।
यह मत जब मन में धरि लीनौ ।
निज सखियनि कौं अति सुख दीनौं ।।190।।
तब तें खेलैं वा वन माहीं ।
सुंदर सुभग सरोवर पाहीं ।।191।।
यह लीला ‘ध्रुव’ जो नित गावै ।
प्रेम-भक्ति सो दृढ़ करि पावै ।।192।।
दोहा
प्रथम नेह ऐसै भयौ, बिना जतन अनियास ।
यह रस गावत सुनत ‘ध्रुव’, होत जु प्रेम प्रकास ।।193।।
।।जै जै श्री व्रज लीला की जै जै श्री हित हरिवंश।।
चौपाई
एक समै विहरत बन माँही ।
कियौ मतौ विवि द्रुम की छाँही ।।1।।
यह निजु-रस कीजै विस्तारा ।
रसिक जननिं कौ अति ही प्यारा ।।2।।
नंदलाल वृषभान-किशोरी ।
रसिकनि हित प्रगटी यह जोरी ।।3।।
नित्य-केलि दिन ऐसे करहीं ।
अति आनंद प्रेम-रस ढरहीं ।।4।।
रस-निधि लीला ब्रज प्रगटाई ।
रसिक जननिं कौ अति सुखदाई ।।5।।
प्रथम-मिलन विधि जो उर आई ।
जथा-बुद्धि जैसी कछु गाई ।।6।।
रस-विहीन के मन नहिं भावै ।
पाहन चित्तहि को समुझावै ।।7।।
नवल नेह रस अद्भुत आही ।
रसिकनि बिन को समुझे ताही ।।8।।
दोहा
रसिकनि हित विवि कुँवर वर, भये प्रगट ब्रज आँनि ।
प्रथम-मिलन सुख कहत हौं, जहँ लगि बुद्धि प्रमाँनि ।।9।।
चौपाई
वैस किसोर भये मन-मोहन ।
अंग-अंग सुंदर अति सोहन ।।10।।
छवि-तरंग कछु कहे न जाहीं ।
मदन कोटि लुटै चरननि माहीं ।।11।।
इहि दिसि श्री वृषभाँन दुलारी ।
वैस किशोर भई सुकुँवारी ।।12।।
अद्भुत रूप कुँवरि कौ माई ।
सखी एक पिय पै कह्यौ जाई ।।13।।
अति सुकुँवारि नवीन किशोरी ।
जुवतिन के मन लेत है चोरी ।।14।।
अंग-अंग वानिक कही न जाई ।
जित चितवत वरषत छवि माई ।।15।।
रति कमला देवांगना नारी ।
पद-नख की दुति ऊपर वारी ।।16।।
याकौ रूप जु देखै आई ।
सोऊ रूपवंत ह्वै जाई ।।17।।
वट संकेत अनूप विराजै ।
ताके निकट सरोवर राजै ।।18।।
सुंदर ठौर सघन बन आही ।
फूलि रही वहु जूही जाही ।।19।।
कबहुँ-कबहुँ तहाँ खेलन आवै ।
खेलत-खेल जोई मन भावै ।।20।।
दोहा
कुँवरि रूप की बात सुनि, परम रसिक-सिरमौर ।
अंग-अंग सब सिथल भये, चित्त रह्यौ नहिं ठौर ।।21।।
चौपाई
सुनत चौंप प्रिय मन भई भारी ।
किहि विधि देखियै नवलकुँवारी ।।22।।
ताही तक अब लागे रहही ।
काहू सौं यह बात न कहही ।।23।।
नित उठि बरसाने तन जाँही ।
जित संकेत सघन वन माँहीं ।।24।।
सघन कुंज इक हुती सुहाई ।
बैठे लाल तहाँ अरगाई ।।25।।
उत देख्यौ इक कौतिक भारी ।
सुंदर सर अंबुज छबि न्यारी ।।26।।
तहाँ देखे जुवतिन के वृन्द ।
मानौं कोटि उदित भये चंद ।।27।।
तिनमें नवल किशोरी सोहै ।
मोहन मन लाये छबि जोहै ।।28।।
पहिरैं नील बरन तन सारी ।
मोतिन माँग बनाइ सँवारी ।।29।।
अति विशाल लोइन अनियारे ।
उज्वल अरुन सहज कजरारे ।।30।।
फगुवा सुभग सुरंग विराजै ।
तापर मृगमद बैंदी राजै ।।31।।
झलकि रह्यौ बेसरि कौ मोती ।
फीके भये धरैं जे जोती ।।32।।
ईषद हाँस दसन अति झलकैं ।
छुटि रही कहुँ-कहुँ मुख पर अलकै ।।33।।
चंचल चितवनि परम सुहाई ।
मुख-पानिप कछु कही न जाई ।।34।।
सहज नवेली अति अलबेली ।
तैसीय सोभित संग सहेली ।।35।।
सखियनि खेल रच्यौ सुखकारी ।
एक ते एक रहैं दुरि न्यारी ।।36।।
चली दुरन तिहि ठाँ सुकुँवारी ।
बैठे हे जहाँ कुंज-विहारी ।।37।।
दोहा
अद्भुत कौतुक अधिक इक, बढ्यौ सहज सुख पुंज ।
चली दुरनि तहाँ लाड़ली, हुते लाल जेहि कुंज ।।38।।
चौपाई
कुँवरि तहाँ अनजानत आई ।
जहाँ लाल ह्वै रहे लुभाई ।।39।।
चारौं नैंन एक भये ऐसे ।
विछुरे खंजन मिलत है जैसे ।।40।।
सकुचि कुँवरि पुनि घूँघट कीनौ ।
नवल लाल तिनके रँग भीनौ ।।41।।
पिय-मन मीन-पर्यो छबि-जाला ।
व्याकुल देह सनेह विशाला ।।42।।
नैंकहि चितवत रूप रसाला ।
मूर्छा आइ गई तेहि काला ।।43।।
तबही लाल गिरे घर माई ।
सो ठाँ मनौं प्रेम की छाई ।।44।।
दोहा
रूप-सिंधु में मन पर्यौ, ढरत नैंन दोउ नीर ।
डगमगाइ धरनी परे, रही न सुधि जु सरीर ।।45।।
चौपाई
पिय कौ मन आपुन हरि लीनौ ।
अपनौ चित प्रीतम कौं दीनौ ।।46।।
मन रह्यौ उही कुँवरि फिरि आई ।
और न कछुवै बात सुहाई ।।47।।
नैंननिं छाई पिय की सोभा ।
सुधि तन न रहि फिरै उह लोभा ।।48।।
दोहा
देखि बात आश्चर्ज की, भूलि रही सुकुवाँरि ।
सहजहि बाढ्यौ प्रेम रस, ह्वै गई नई चिन्हारि ।।49।।
चौपाई
भूल्यौ खेल कुँवरि कौं तबही ।
नवल नेह रस उपज्यौ जबही ।।50।।
यह सहचरि किनहूँ नहिं लेखी ।
कुँवरि-कुँवर की देखा-देखी ।।51।।
दोहा
चलीं सखी मिलि भवन कौं, लीनी कुँवरि सँभारि ।
येई सबके प्रान हैं, अलबेली सुकँवारि ।।52।।
चौपाई
पिय की गति सुनि अब मो पाहीं ।
नैंननिं नौंक चुभी मन माँहीं ।।53।।
भूली सुधि-बुधि मूर्छा आई ।
छवि अनूप नैंननिं उर छाई ।।54।।
घरी चारि सुख माँहि बितानी ।
पुनि चित चेत सुरति उर आनी ।।55।।
कहाँ देखौ जिनि दई दिखाई ।
हरि लिये प्राँन देह अकुलाई ।।56।।
वह सहचरि मन में अति मानी।
जिनि यह छबि मोपै जु बखानी ।।57।।
दोहा
जो कछु रूप कह्यौ हुतौ, ताते सतगुन आहि ।
बार-बार तेहि सखी कौं, लालन उठत सराहि ।।58।।
चौपाई
तबतें मोहन रहत उदासा ।
प्रेम-खटक तें भरैं उसाँसा ।।59।।
रूप-छटा करकै हिय माँहिं ।
छिन छिन माँहि विकल ह्वै जाँहीं ।।60।।
तन की गति ऐसी भइ माई ।
ज्यौं जल बिन वारिज कुमिलाई ।।61।।
भोजन-पान कछू न सुहाई ।
हृदै ध्यान नव-प्रिया रहाई ।।62।।
अति ही छीन जु भयौ सरीरा ।
दिनहिं नैंन भरि आवै नीरा ।।63।।
दोहा
नैंन सरोवर से भरे, नवल नेह के नीर ।
ढरि-ढरि मुक्ता से परत, रहे भीज तन-चीर ।।64।।
चौपाई
सीस चंद्रिका धरी न भावै ।
सौरभ परसत अति दुख पावै ।।65।।
रुचै न उर बैजंती-माला ।
मारुत भई पावक सम ज्वाला ।।66।।
पीत वसन बंसी बिसराई ।
बाढ्यौ प्रेम कह्यौ नहिं जाई ।।67।।
बरसाने तन चितवत रहहीं ।
मौन धरैं कछुवे नहिं कहहीं ।।68।।
उहि दिसि ते जु पवन सखि आवै ।
सो रज अधिक लाल मन भावै ।।69।।
मन अरु नैन कुँवरि के पासा ।
देह रहे मिलिवे की आसा ।।70।।
कल न परत तन व्याकुल भारी ।
जब ते श्यामा, श्याम निहारी ।।71।।
प्रेम की बात निपट अटपटी ।
सोई जानै जेहि लगै चटपटी ।।72।।
दोहा
प्रीति-रीति अति कठिन है, कहै न समझै कोइ ।
प्रेम-बान जेहि उर लगै, निसि-दिन जानै सोइ ।।73।।
चौपाई
इतहि अनमनी रहै किशोरी ।
चित्त पर्यो पिय-प्रेम की डोरी ।।74।।
छुटि गई नैंननिं तें चपलाई ।
उपजी अंग-अंग शिथिलाई ।।75।।
चितै रहै अवनी तन ठाढ़ी ।
नेह-बेलि उर-अंतर बाढ़ी ।।76।।
जे सखि साथ की खेलन-हारी ।
तेउन मनतैं सबै बिसारी ।।77।।
दोहा
भूल्यौ हँसिबौ खेलिबौ, भूल्यौ अंग-सिंगार ।
निसि-दिन रहैं या सोच में, रुचत नाहिं उर-हार ।।78।।
चौपाई
हित की सखी अधिक अकुलानी ।
देखी कुँवरि कछुक कुँभिलानी ।।79।।
गद-गद कंठ नेह-रस सानी ।
बोली तहाँ कछुक मृदु बानी ।।80।।
चलहुँ लाड़िली प्रिया नवेली ।
जाँहिं सरोवर कहैं सहेली ।।81।।
नाक सँकोर स्वाँस अति लेही ।
सहचरि कौ उत्तर को देही ।।82।।
प्रेम-विवस कछुवै न सुहाई ।
मोहन-मूरति हृदै बसाई ।।83।।
बढ़ि गई प्रीति कहत नहिं आवै ।
विसरत नहिं जेतिक बिसरावै ।।84।।
मन पर्यो प्रेम पेच में जाई ।
बल कियैं कैसैं निकसत माई ।।85।।
ठाढ़ी नखनि अवनि कौं खनैं ।
फिरत न कैहूँ फेरत मनैं ।।86।।
नैंना अति ही सजल रहाहीं ।
प्रीतम-प्रेम जानि मन माहीं ।।87।।
दोहा
अति विशाल लोइन सुरंग, सहज रसीले आहि ।
प्रेम-लाज जल सौं भरे, रही अवनि तन चाहि ।।88।।
चौपाई
और सखी ढिंग ते जब आई ।
आठौ रहीं कुँवरि मन भाई ।।89।।
ललिता कहै श्री राधा प्यारी ।
मोसौं बात कहौ सुकुँवारी ।।90।।
मैं हूँ तौ मन की कछु पाई ।
सो तुम मोहि कहौ समुझाई ।।91।।
अपने सौं दुराव नहिं कीजै ।
दिन-दिन देखत देही छीजै ।।92।।
जानी प्रिया सखी सुखदाई ।
तब मन में की बात चलाई ।।93।।
एक द्यौस खेलत बन माहीं ।
सखियन-संग सरोवर पाहीं ।।94।।
अतिही सघन कुंज है जहाँ ।
नवल कुँवर इक देख्यौ तहाँ ।।95।।
साँवल बरन पीत उपरैना ।
बड्ड़े आहि सलौने नैंना ।।96।।
अरुन अधर मुसिकनि छबि राजै ।
मोर-चंद्रिका सीस बिराजै ।।97।।
नासा बनि रह्यौ जलज सुढारा ।
कंचन दुलरी मोतिनु हारा ।।98।।
मुख पर पानिप झलक सुहाई ।
नेह रूप मनौं प्रगट चुचाई ।।99।।
मो तन चितें गिरे मुरझाई ।
वह खसि परन न बिसरत माई ।।100।।
तेहि छिन तें जु गयौ मन मेरौ ।
को सुधि कहै न कीयौ फेरौ ।।101।।
हौं नहिं बोली लाज की लई ।
तेहि पाछैं धौं कौंन गति भई ।।102।।
वहै करक तब तें मन माँहीं ।
खटकति पल-पल निकसति नाँहीं ।।103।।
इतनौ कहत हियौ भरि लीनौं ।
बहुरि न कछुवै उत्तर दीनौं ।।104।।
दोहा
प्रेम-सुरति पिय की हियै, तेहि छिन करकी आइ ।
मुख निरसत नहिं बैन कछु, रही कुँवरि सिर नाइ ।।105।।
चौपाई
यह गति देखत सखी भुलानी ।
भरि आये दोऊ लोइन पानी ।।106।।
पुनि धरि धीर विचारनि लागी ।
नवल कुँवरि के हित अनुरागी ।।107।।
करौं जतन नँद-लालहिं लाऊँ ।
पिय-प्यारी में रंग बढ़ाऊँ ।।108।।
मिलहिं दोऊ रस बाढ़ै भारी ।
बिरह-बिथा विचते होइ न्यारी ।।109।।
दोहा
सहचरि मन आनँद बढ्यौ, सुनत बचन अति सार ।
प्रेम-मगन आनँद भयौ, मिलवन नंद-कुमार ।।110।।
चौपाई
नन्दगाम तेही छिन आई ।
मनमोहन कौ सैंन जनाई ।।111।।
सैंन बूझ लालन उठि आये ।
ललिता देखि कछुक मुसिकाये ।।112।।
बूझत सखी चतुर तब बाता ।
काहे मोहन हौ कृस गाता ।।113।।
तब मोहन मन की सब कही ।
जो जो पाछैं ही गति भई ।।114।।
ललिता एक किशोरी देखी ।
मानौं रूप की सीवाँ पेखी ।।115।।
कौन भाँति मुख की छबि कहियै ।
चितवत सखी चित्र ह्वै रहियै ।।116।।
कहा कहौं अंग-अंग निकाई ।
छिनक माँहिं लियौ चित्त चुराई ।।117।।
मनौं मोहनी और ठगोरी ।
तीन लोक की करि इक ठौरी ।।118।।
नव-किशोरता कछुक भुराई ।
लाज भरी अँखियनि मुसिकाई ।।119।।
रूपहि कहत विवस भयौ प्यारौ ।
प्रेम-नीर नैंननि तें ढारौ ।।120।।
दोहा
नख-सिख तें अति सोहनी, नाँहिन कछु समतूल ।
रूप-लता लागे मनौं, चितवनि-मुसिकनि फूल ।।121।।
चौपाई
अब तो जतन करौ वर नारी ।
मिलै मोहि वृषभानु-दुलारी ।।122।।
तिनकी छबि उर नैंननिं छाई ।
अटपटी भाँति चटपटी लाई ।।123।।
तेहि छवि-पावक-प्रीति जरावै ।
चतुर सोई जो प्रिया मिलावै ।।124।।
दोहा
मैं तो यह जानी सखी, हितू न तोहि समान ।
यह गुन तेरौ मानि हौं, जब लगि घट में प्रान ।।125।।
चौपाई
जा दिन तें मोहि दई दिखाई ।
चकित चित्त कछुवै न सुहाई ।।126।।
अब लगि तौ दिन बितये ऐसैं ।
अब धौं प्रान रहैंगे कैसैं ।।127।।
दोहा
गहवर आई सहचरी, सुनत लाल की बात ।
प्रेम दुहुँनि कौ समुझि मन, रीझि-रीझि बलिजात ।।128।।
चौपाई
ललिता कहै सुनौ नँदलाला ।
मिलऊँ आज तुमैं नव बाला ।।129।।
इतनी सुनत सरस है आये ।
विछुरे प्रान फेरि मनौं पाये ।।130।।
सुनत बचन आनँद न समाई ।
पग ललिता के सिर धरयौ जाई ।।131।।
दोहा
रसिक-सिरोमनि रसिक पिय, जानत रस की रीति ।
प्रभुता राखी दूरि कै, भये दीन बस-प्रीति ।।132।।
चौपाई
सखि मोहन सौं जब बदि लई ।
तब भीतर जसुदा पै गई ।।133।।
पकरि चरन बैठी ढिंग जाई ।
घरी इक पाछै बात चलाई ।।134।।
कीरति जू पाइ लागन कहियाँ ।
कुँवरहिं न्यौंतन पठईं मईयाँ ।।135।।
पुनि मन में कछु आहि विचारी ।
देख्यौ चाहत कुँवर विहारी ।।136।।
भूषन बसन बनाइ सबेरैं ।
अबही संग देहु तुम मेरैं ।।137।।
दोहा
मुदित महरि अति चाव सौं, भूषन वसन सुरंग ।
नवल लाल अति बानि कै, दयौ सहचरी संग ।।138।।
चौपाई
अति आनंद बढ्यौ मन माहीं ।
बैठे जाइ निकुंजनि छाँहीं ।।139।।
सहचरि तब मन करत बिचारा ।
सोच-नदी तहाँ बढ़ी अपारा ।।140।।
अब किहि विधि बरसाने जैयै ।
जो न लखै सोई जु बनैयै ।।141।।
गुरुजन-भीर तहाँ अति भारी ।
सब के प्रान वहै सुकुँवारी ।।142।।
फनि मनि ज्यौं लिये रहैं सँवारी ।
जीवत हैं सब ताहि निहारी ।।143।।
ऐसी कठिन ठौर सुनि प्यारे ।
तेहि ठाँ लागे नैंन तिहारे ।।144।।
सुनत सखी की बानी मानी ।
प्यासौ माँगै पानी-पानी ।।145।।
सब विधि मोहि भरोसौ तेरौ ।
पूरन करौ मनोरथ मेरौ ।।146।।
एक बार कैसैहूँ दिखावौ ।
तौ ललिता मोहि जीव जिवावौ ।।147।।
नासा अग्र प्रान रहे आई ।
बुधिबल करि कछु बेगि उपाई ।।148।।
ऐसैं वचन सुनत गहवरी ।
सहचरि सोच-कूप में परी ।।149।।
धीरज धरहु जाउँ बलिहारी ।
तुमतें मोहि अधिक दुख भारी ।।150।।
बचन करौं तुम सौं दै तारी ।
मिलऊँगी बलि प्रान-पियारी ।।151।।
तजि कैं लोक-वेद की लाज ।
देहौं प्रान तिहारे काज ।।152।।
दोहा
नैंन भरैं धीरज धरैं, मन में थापि विचारि ।
पलटि वेष लै जाइयै, जहाँ कुँवरि सुकुँवारि ।।153।।
चौपाई
तब ललिता इक मतौ विचारयौ ।
पिय कौं तिय कौ वेष सिंगारयौ।।।।154।।
भये चाव सौं सखी विहारी ।
देखन हित श्री राधा-प्यारी ।।155।।
पहिरी लाल कसूँभी सारी ।
गुहि वेनी कल माँग सँवारी ।।156।।
लाल-भाल पर बैंदी फबी ।
त्रिभुवन की सोभा सब दबी ।।157।।
नासा बेसरि अतिहि सोहनी ।
प्रान हरन कौं मनौं मोहनी ।।158।।
नैंननि अंजन दियौ बनाई ।
चिबुक बिंदु अतिही सुखदाई ।।159।।
कंचन-मोतिन की गर दुलरी ।
तेहि छबि की कोउ नाहिंन तुलरी ।।160।।
कंचुकि उरज बनाइ सँवारे ।
मानौं श्रीफल नौतन धारे ।।161।।
जेहि विधि के भूषन शुभ गाये ।
सुमिलि सुदेस सोइ पहिराये ।।162।।
साजि लिये जब सब सिंगारा ।
निरखि रूप सुख भयौ अपारा ।।163।।
नवल सखी नव अधिक विराजै ।
जुवतिनि-वृंद देखि सब लाजै ।।164।।
दोहा
स्याम अंग पर अति बनी, सारि कसुँभी सुरंग ।
नख-सिख भूषन तियनि के, भूषित मोतिनु-मंग ।।165।।
चौपाई
तब ललिता बरसाने आई ।
सखी संग लै परम सुहाई ।।166।।
जब प्रवेस रावल में कीनौं ।
सकुच सहित मुख अंचल दीनौ ।।167।।
बूझतिं सकल जुवति जन हेरैं ।
यह को आई सखि सँग-तेरैं ।।168।।
ललिता परम चतुर अति स्यानी ।
उत्तर दियौ बेगि मृदु बानी ।।169।।
यह उपनंद गोप की बेटी ।
मोकौं खोरि साँकरी भेटी ।।170।।
जान अवार संग लै आई ।
कहिकै वचन ताहि समुझाई ।।171।।
गई लिवाइ तहाँ कर जोरैं ।
राजति जहाँ कुँवरि तन गोरैं ।।172।।
ललिता देखि कुँवरि मुसिकानी ।
सखी चतुरई मन में जानी ।।173।।
निरखि परस्पर आनँद भारी ।
विरह विथा बिचतें भई न्यारी ।।174।।
सखी दोइ आईं सँग लागी ।
अटक्यौ चित्त रूप अनुरागी ।।175।।
कछुक ब्याज ललिता तब कीनौ ।
नवल प्रिया-प्रीतम सुख दीनौ ।।176।।
उठी बेगि जानै नहिं कोई ।
लीनी संग सहचरी दोई ।।177।।
कहति है तिन सौं बचन बनाये ।
करहु न टहल आज मन भाये ।।178।।
माला सुमन सुरंग बनावौ ।
चित्र विचित्र गूंथि लै आवौ ।।179।।
ऐसी चतुर चतुराई कीनी ।
टहल ब्याज सबही कौं दीनी ।।180।।
मिले मोहन श्री राधा-प्यारी ।
‘हित ध्रुव’ निरखि जाइ बलिहारी ।।181।।
दोहा
नवल लाल नव लाड़िली, नवल केलि सुख-रासि ।
नवल प्रीति नव-नव बढ़ी, करत मंद मृदु हासि ।।182।।
चौपाई
वचन-रचन सुख कह्यौ न जाई ।
बाढ़यौ प्रेम-सिंधु अधिकाई ।।183।।
मैन-रंग कीने पिय-प्यारी ।
मन-मन सुख बाढ्यौ अति भारी ।।184।।
प्रेम-पगी ललितादिक आईं ।
अति आनंद न अंग समाई ।।185।।
सोभित सिथिल दुहुँनि के अंगा ।
निरखतिं सहचरि प्रेम-अभंगा ।।186।।
श्रमित जानि तब पवन डुलावै ।
अति आसक्त नैंन भरि आवै ।।187।।
दोहा
कुँवरि कुँवर दोऊ रसिक वर, सब सखियनि के प्रान ।
दंपति सुख सुख जिनहु के, नाहिंन गति कछु आन ।।188।।
चौपाई
सखियनि जुत तब मतौ कराहीं ।
नित्य मिलैं हम वा बन माँहीं ।।189।।
यह मत जब मन में धरि लीनौ ।
निज सखियनि कौं अति सुख दीनौं ।।190।।
तब तें खेलैं वा वन माहीं ।
सुंदर सुभग सरोवर पाहीं ।।191।।
यह लीला ‘ध्रुव’ जो नित गावै ।
प्रेम-भक्ति सो दृढ़ करि पावै ।।192।।
दोहा
प्रथम नेह ऐसै भयौ, बिना जतन अनियास ।
यह रस गावत सुनत ‘ध्रुव’, होत जु प्रेम प्रकास ।।193।।
।।जै जै श्री व्रज लीला की जै जै श्री हित हरिवंश।।
41. युगल ध्यान लीला
दोहा
(श्री) प्रिया वदन-छबि चंद मनौं, प्रीतम-नैंन चकोर ।
प्रेम-सुधा रस-माधुरी, पान करत निसि-भोर ।।1।।
अंगनि की छबि कहा कहौं, मन में रहत विचार ।
भूषन भये भूषननि कौ, अति सरूप सुकुमार ।।2।।
सुरंग माँग मोतिनु सहित, सीस-फूल सुख-मूल ।
मोर-चंद्रिका मोहनी, देखत भूली भूल ।।3।।
श्याम-लाल बैंदी बनी, सोभा बढ़ी अपार ।
प्रगट विराजत ससिन पर, मनौं अनुराग सिंगार ।।4।।
कुंडल कल ताटंक चल, रहे अधिक झलकाइ ।
मनौ छबि के ससि-भानु जुग, छबि कमलनि मिले आइ ।।5।।
नासा बेसरि-नथ बनी, सोहत चंचल नैंन ।
देखत भाँति सुहावनी, मोहे कोटिक मैंन ।।6।।
सुन्दर चिबुक कपोल मृदु, अधर सुरंग सुदेस ।
मुसिकनि बरषत फूल सुख, कहि न सकत छबि-लेस ।।7।।
अंगन भूषन झलकि रहे, अरु अंजन रंग पान ।
नव-सत सरवर तें मनौ, निकसे करि स्नान ।।8।।
कहि न सकत अंगनि-प्रभा, कुंज-भवन रह्यौ छाइ ।
मानौं बागे रूप के, पहिरे दुहुँनि बनाइ ।।9।।
रतनांगद पहुँची बनी, वलया-वलय सुढार ।
अँगुरिनु मुंदरीं फब रहीं, अरु मेंहदी रंग-सार ।।10।।
चंद्रहार मुक्तावली, राजत दुलरी-पोति ।
पानि पदिक उर जगमगै, प्रतिबिंबित अंग-जोति ।।11।।
मनिमय किंकिनि-जाल छबि, कहौं जोइ सोइ थोर ।
मनौ रूप दीपावली, झलमलात चहुँ ओर ।।12।।
जेहरि सुमिलि अनूप बनी, नूपुर अनवट चारि ।
और छाँड़ि कै या छबिहि, हिय के नैंन निहारि ।।13।।
बिछुवनि की छबि कहा कहौं, उपजत रव रुचि-दैन ।
मनौ सावक कल हंस के, बोलत अति मृदु बैंन ।।14।।
नख-पल्लव सुठि सोहने, सोभा बढ़ी सुभाइ ।
मानौं छबि चंद्रावली, कंज-दलन लगी आइ ।।15।।
गौर वरन सांवल चरन, रचि मेंहदी के रंग ।
तिन तरुवनि तर लुठत रहैं, रति-जुत कोटि अनंग ।।16।।
अति सुकुमारी लाड़िली, पिय किसोर सुकुमार ।
इक छत प्रेम छके रहैं, अद्भुत प्रेम बिहार ।।17।।
अनुपम स्यामल-गौर छबि, सदा बसौ मम चित्त ।
जैसे घन अरु दामिनी, एक संग रहै नित्त ।।18।।
बरने दोहा अष्ट-दस, जुगल-ध्यान रसखान ।
जो चाहत विश्राम ‘ध्रुव’, यह छबि उर में आन ।।19।।
पलकनि के जैसे अधिक, पुतरिन सौं अति प्यार ।
ऐसैहि लाड़िली-लाल के, छिन छिन चरन सँभार ।।20।।
।।जै जै श्रीयुगलध्यान लीला की जै जै श्रीहरिवंश।।
दोहा
(श्री) प्रिया वदन-छबि चंद मनौं, प्रीतम-नैंन चकोर ।
प्रेम-सुधा रस-माधुरी, पान करत निसि-भोर ।।1।।
अंगनि की छबि कहा कहौं, मन में रहत विचार ।
भूषन भये भूषननि कौ, अति सरूप सुकुमार ।।2।।
सुरंग माँग मोतिनु सहित, सीस-फूल सुख-मूल ।
मोर-चंद्रिका मोहनी, देखत भूली भूल ।।3।।
श्याम-लाल बैंदी बनी, सोभा बढ़ी अपार ।
प्रगट विराजत ससिन पर, मनौं अनुराग सिंगार ।।4।।
कुंडल कल ताटंक चल, रहे अधिक झलकाइ ।
मनौ छबि के ससि-भानु जुग, छबि कमलनि मिले आइ ।।5।।
नासा बेसरि-नथ बनी, सोहत चंचल नैंन ।
देखत भाँति सुहावनी, मोहे कोटिक मैंन ।।6।।
सुन्दर चिबुक कपोल मृदु, अधर सुरंग सुदेस ।
मुसिकनि बरषत फूल सुख, कहि न सकत छबि-लेस ।।7।।
अंगन भूषन झलकि रहे, अरु अंजन रंग पान ।
नव-सत सरवर तें मनौ, निकसे करि स्नान ।।8।।
कहि न सकत अंगनि-प्रभा, कुंज-भवन रह्यौ छाइ ।
मानौं बागे रूप के, पहिरे दुहुँनि बनाइ ।।9।।
रतनांगद पहुँची बनी, वलया-वलय सुढार ।
अँगुरिनु मुंदरीं फब रहीं, अरु मेंहदी रंग-सार ।।10।।
चंद्रहार मुक्तावली, राजत दुलरी-पोति ।
पानि पदिक उर जगमगै, प्रतिबिंबित अंग-जोति ।।11।।
मनिमय किंकिनि-जाल छबि, कहौं जोइ सोइ थोर ।
मनौ रूप दीपावली, झलमलात चहुँ ओर ।।12।।
जेहरि सुमिलि अनूप बनी, नूपुर अनवट चारि ।
और छाँड़ि कै या छबिहि, हिय के नैंन निहारि ।।13।।
बिछुवनि की छबि कहा कहौं, उपजत रव रुचि-दैन ।
मनौ सावक कल हंस के, बोलत अति मृदु बैंन ।।14।।
नख-पल्लव सुठि सोहने, सोभा बढ़ी सुभाइ ।
मानौं छबि चंद्रावली, कंज-दलन लगी आइ ।।15।।
गौर वरन सांवल चरन, रचि मेंहदी के रंग ।
तिन तरुवनि तर लुठत रहैं, रति-जुत कोटि अनंग ।।16।।
अति सुकुमारी लाड़िली, पिय किसोर सुकुमार ।
इक छत प्रेम छके रहैं, अद्भुत प्रेम बिहार ।।17।।
अनुपम स्यामल-गौर छबि, सदा बसौ मम चित्त ।
जैसे घन अरु दामिनी, एक संग रहै नित्त ।।18।।
बरने दोहा अष्ट-दस, जुगल-ध्यान रसखान ।
जो चाहत विश्राम ‘ध्रुव’, यह छबि उर में आन ।।19।।
पलकनि के जैसे अधिक, पुतरिन सौं अति प्यार ।
ऐसैहि लाड़िली-लाल के, छिन छिन चरन सँभार ।।20।।
।।जै जै श्रीयुगलध्यान लीला की जै जै श्रीहरिवंश।।
42. नृत्य विलास लीला,
,
चौपाई ,
एक समै नागरि नव नागर । ,
प्रेम रूप गुन के दोऊ सागर ।।1।। ,
,
परम प्रवीन सखी संग रहहीं । ,
छिन छिन प्रति नव-नव सुख लहहीं ।।2।। ,
,
मंडल जोरि चहूँ दिसि ठाढ़ी । ,
प्रेम चितेरे चित्र सी काढ़ी ।।3।। ,
,
राजत मान सरोवर तीरा । ,
आवत परम सुगंध समीरा ।।4।। ,
,
सारस हंस चकोर चकोरी । ,
निर्त्तत फिरत बरहि संग मोरी ।।5।। ,
,
देखि मुदित भई नवल-किशोरी । ,
आनंद में झलकत छबि गोरी ।।6।। ,
,
उपजी बात एक मन माहीं । ,
सकुचत हैं पिय कहि न सकाहीं ।।7।। ,
,
कबहूँ नूपुर धाइ बनावैं । ,
याही मिसि चरननि छ्वै आवैं ।।8।। ,
,
कबहूँ सुंदर बीन बजावैं । ,
नवल प्रिया मन रुचि उपजावैं ।।9।। ,
,
निरखत मुख कहि सकत न प्यारौ । ,
हेत लाल कौ प्रिया बिचारौ ।।10।। ,
,
परम प्रवीन मुकट-मनि प्यारी । ,
निर्तकला गुन की बिस्तारी ।।11।। ,
,
तिरप बाँधि कमलन पर चली । ,
निरखत थकित रहीं ह्वै अली ।।12।।,
,
अद्भुत कमल मध्य सर माहीं । ,
ताके सिर पर निर्त्त कराहीं ।।13।। ,
,
दोहा ,
निर्त्त बिलासहि देखि सखि, रही सोच बिस्माइ । ,
निर्त्त जू मूरतिवंत ही, ठाढ़ी लेति बलाइ ।।14।। ,
,
चौपाई ,
हुड़क रबाब गजक बहु बाजे । ,
सखियनि अति आनँद सौं साजे ।।15।। ,
,
किन्नर मुरज मृदंग बजावैं । ,
गति में गति नव-नव उपजावैं ।।16।। ,
,
अति सुकुँवारि निर्त्त रंग भीनी । ,
भाइ भेद गति लेति नवीनी ।।17।।,
,
जो गति सुनी न देखी कबहीं । ,
नौतन प्रकट करीं ते अबहीं ।।18।।,
,
अलग लाग हुरमई जु लीनी । ,
प्रगट कला निज गुन की कीनी ।।19।।,
,
परत आइ मान जेहि दल पर । ,
बैसेई रहत चरन के तरहर ।।20।। ,
,
लाघवता सौं पग रहे ऐसें । ,
परस न होत दूसरे जैसें ।।21।। ,
,
सुलप अनूप चारु चल ग्रीवाँ । ,
सहज सुधंग विलास की सीवाँ ।।22।। ,
,
थेइ थेइ कहत मोहनी बानी । ,
सखियनि नैंन चले ह्वै पानी ।।23।। ,
,
मुसिकनि मधुर चित्त को हरही । ,
चितवनि पासि दूसरी परही ।।24।। ,
,
दोहा ,
निर्त्त-सुधंग कला जिती, कही प्रगट परमाँन । ,
छुई न तिन में एक ही, उपजी आनही-आँन ।।25।।,
,
चौपाई ,
पुनि केशरि पर लसत रंगीली । ,
झलकत वेशर परम छबीली ।।26।। ,
,
कछुक अलाप मधुर धुनि कीनी। ,
मति बुधि सबही की हरि लीनी।।27।। ,
,
कबहुँ सुनी न राग धुनि ऐसी । ,
कीनी अबहि कुँवरि सखि जैसी ।।28।। ,
,
राग-रागिनी जूथ लजाए । ,
खोजि रहे ते सुर नहिं पाए ।।29।। ,
,
भृंगी मृगी सुनत मृदु बानी । ,
थक्यौ पवन अरु चलत न पानी ।।30।। ,
,
श्रवत द्रुमनि तें रस की धारा । ,
आनँद प्रेम कियौ विस्तारा ।।31।। ,
,
राग पुंज बरसत बरसा सी । ,
‘हित ध्रुव’ गुन सीवाँ सुख-रासी ।।32।।,
,
दोहा,
सुनत राग-अनुराग धुनि, मोहे नागर लाल । ,
सक्यौ न धीरज धरि सखी, मरम लग्यौ सर बाल ।।33।। ,
,
कुंडलिया,
लाल विवस सहचरि सबै, मोरी मृगी बिहंग । ,
गावति रस में नागरी, नव-नव तान तरंग ।। ,
नव-नव तान तरंग, सप्त सुर सौं मन ढ़रही । ,
ऐसी को सखि आहि, सुनत जो धीरज धरही ।। ,
नव-नव गुन की सींव सब, अति प्रवीन वर बाल । ,
नागर-कुल-मनि तैसेई, स्रोता सुदंर लाल ।।34।।,
,
चौपाई ,
अति विह्वल है गये विहारी । ,
भूषन पट सुधि देह बिसारी ।।35।।,
,
रही सँभारि सखी हितकारी । ,
नैंननिं होत प्रेम बरसा री ।।36।। ,
,
प्रिया-प्रिया र व मुख ते निसरै । ,
नाम रूप गुन कबहुँ न बिसरै ।।37।। ,
,
यह गति देखि लाल की प्यारी । ,
नेह रंगमगी अति सुकुँवारी ।।38।। ,
,
महा प्रेम समुझत उर घूँमी । ,
तेहि छिन आइ लाल पर झूँमी ।।39।। ,
,
देखत बिबस भुजनि भरि लीनौ । ,
चितै बदन नैंना भरि दीनौं ।।40।। ,
,
महाप्रेम सौं उर लपटानी । ,
तिनकी प्रीति न जात बखानी ।।41।।,
,
भरि अनुराग लाल उर लायौ । ,
अधर सुधा जीवन रस प्यायौ ।।42।। ,
,
खुलि गये नैंन प्रान घट आये । ,
प्रिया प्रेम झकझोरि जगाये ।।43।। ,
,
ललित लाल डोलत संग लागे । ,
प्रिया प्रेम नख-सिख लौ पागे ।।44।। ,
,
दोहा ,
नख-सिख लौं सखि पगि रहे, प्रीतम प्रेम सुरंग । ,
तेही भाँति पुनि लाड़िली, रँगी लाल के रंग ।।45।। ,
,
कुंडलिया,
नागरि-निर्त्त-विलास जस, जे अवगाहत नित्त । ,
‘हित ध्रुव’ अद्भुत प्रेम सौं, सरस रहै दिन चित्त ।।,
सरस रहै दिन चित्त, और कछु सुन्यौ न भावै । ,
बिन विहार-रस-प्रेम, और उर में नहिं आवै ।। ,
अद्भुत सुख की सीव, सकल अंगनि गुन आगर । ,
प्रीतम मन हरि लेत सहज रस में नव नागरि ।।46।।,
,
दोहा,
युगल-प्रेम रस-सार सर, रसिक-हंस अवगाहि । ,
जगत काक-बक बिमुख जे, पलकहुँ पहुँचत नाँहिं ।।47।।,
,
।।जै जै श्री नृत्यविलास लीला की जै जै श्रीहरिवंश।।,
,
,
चौपाई ,
एक समै नागरि नव नागर । ,
प्रेम रूप गुन के दोऊ सागर ।।1।। ,
,
परम प्रवीन सखी संग रहहीं । ,
छिन छिन प्रति नव-नव सुख लहहीं ।।2।। ,
,
मंडल जोरि चहूँ दिसि ठाढ़ी । ,
प्रेम चितेरे चित्र सी काढ़ी ।।3।। ,
,
राजत मान सरोवर तीरा । ,
आवत परम सुगंध समीरा ।।4।। ,
,
सारस हंस चकोर चकोरी । ,
निर्त्तत फिरत बरहि संग मोरी ।।5।। ,
,
देखि मुदित भई नवल-किशोरी । ,
आनंद में झलकत छबि गोरी ।।6।। ,
,
उपजी बात एक मन माहीं । ,
सकुचत हैं पिय कहि न सकाहीं ।।7।। ,
,
कबहूँ नूपुर धाइ बनावैं । ,
याही मिसि चरननि छ्वै आवैं ।।8।। ,
,
कबहूँ सुंदर बीन बजावैं । ,
नवल प्रिया मन रुचि उपजावैं ।।9।। ,
,
निरखत मुख कहि सकत न प्यारौ । ,
हेत लाल कौ प्रिया बिचारौ ।।10।। ,
,
परम प्रवीन मुकट-मनि प्यारी । ,
निर्तकला गुन की बिस्तारी ।।11।। ,
,
तिरप बाँधि कमलन पर चली । ,
निरखत थकित रहीं ह्वै अली ।।12।।,
,
अद्भुत कमल मध्य सर माहीं । ,
ताके सिर पर निर्त्त कराहीं ।।13।। ,
,
दोहा ,
निर्त्त बिलासहि देखि सखि, रही सोच बिस्माइ । ,
निर्त्त जू मूरतिवंत ही, ठाढ़ी लेति बलाइ ।।14।। ,
,
चौपाई ,
हुड़क रबाब गजक बहु बाजे । ,
सखियनि अति आनँद सौं साजे ।।15।। ,
,
किन्नर मुरज मृदंग बजावैं । ,
गति में गति नव-नव उपजावैं ।।16।। ,
,
अति सुकुँवारि निर्त्त रंग भीनी । ,
भाइ भेद गति लेति नवीनी ।।17।।,
,
जो गति सुनी न देखी कबहीं । ,
नौतन प्रकट करीं ते अबहीं ।।18।।,
,
अलग लाग हुरमई जु लीनी । ,
प्रगट कला निज गुन की कीनी ।।19।।,
,
परत आइ मान जेहि दल पर । ,
बैसेई रहत चरन के तरहर ।।20।। ,
,
लाघवता सौं पग रहे ऐसें । ,
परस न होत दूसरे जैसें ।।21।। ,
,
सुलप अनूप चारु चल ग्रीवाँ । ,
सहज सुधंग विलास की सीवाँ ।।22।। ,
,
थेइ थेइ कहत मोहनी बानी । ,
सखियनि नैंन चले ह्वै पानी ।।23।। ,
,
मुसिकनि मधुर चित्त को हरही । ,
चितवनि पासि दूसरी परही ।।24।। ,
,
दोहा ,
निर्त्त-सुधंग कला जिती, कही प्रगट परमाँन । ,
छुई न तिन में एक ही, उपजी आनही-आँन ।।25।।,
,
चौपाई ,
पुनि केशरि पर लसत रंगीली । ,
झलकत वेशर परम छबीली ।।26।। ,
,
कछुक अलाप मधुर धुनि कीनी। ,
मति बुधि सबही की हरि लीनी।।27।। ,
,
कबहुँ सुनी न राग धुनि ऐसी । ,
कीनी अबहि कुँवरि सखि जैसी ।।28।। ,
,
राग-रागिनी जूथ लजाए । ,
खोजि रहे ते सुर नहिं पाए ।।29।। ,
,
भृंगी मृगी सुनत मृदु बानी । ,
थक्यौ पवन अरु चलत न पानी ।।30।। ,
,
श्रवत द्रुमनि तें रस की धारा । ,
आनँद प्रेम कियौ विस्तारा ।।31।। ,
,
राग पुंज बरसत बरसा सी । ,
‘हित ध्रुव’ गुन सीवाँ सुख-रासी ।।32।।,
,
दोहा,
सुनत राग-अनुराग धुनि, मोहे नागर लाल । ,
सक्यौ न धीरज धरि सखी, मरम लग्यौ सर बाल ।।33।। ,
,
कुंडलिया,
लाल विवस सहचरि सबै, मोरी मृगी बिहंग । ,
गावति रस में नागरी, नव-नव तान तरंग ।। ,
नव-नव तान तरंग, सप्त सुर सौं मन ढ़रही । ,
ऐसी को सखि आहि, सुनत जो धीरज धरही ।। ,
नव-नव गुन की सींव सब, अति प्रवीन वर बाल । ,
नागर-कुल-मनि तैसेई, स्रोता सुदंर लाल ।।34।।,
,
चौपाई ,
अति विह्वल है गये विहारी । ,
भूषन पट सुधि देह बिसारी ।।35।।,
,
रही सँभारि सखी हितकारी । ,
नैंननिं होत प्रेम बरसा री ।।36।। ,
,
प्रिया-प्रिया र व मुख ते निसरै । ,
नाम रूप गुन कबहुँ न बिसरै ।।37।। ,
,
यह गति देखि लाल की प्यारी । ,
नेह रंगमगी अति सुकुँवारी ।।38।। ,
,
महा प्रेम समुझत उर घूँमी । ,
तेहि छिन आइ लाल पर झूँमी ।।39।। ,
,
देखत बिबस भुजनि भरि लीनौ । ,
चितै बदन नैंना भरि दीनौं ।।40।। ,
,
महाप्रेम सौं उर लपटानी । ,
तिनकी प्रीति न जात बखानी ।।41।।,
,
भरि अनुराग लाल उर लायौ । ,
अधर सुधा जीवन रस प्यायौ ।।42।। ,
,
खुलि गये नैंन प्रान घट आये । ,
प्रिया प्रेम झकझोरि जगाये ।।43।। ,
,
ललित लाल डोलत संग लागे । ,
प्रिया प्रेम नख-सिख लौ पागे ।।44।। ,
,
दोहा ,
नख-सिख लौं सखि पगि रहे, प्रीतम प्रेम सुरंग । ,
तेही भाँति पुनि लाड़िली, रँगी लाल के रंग ।।45।। ,
,
कुंडलिया,
नागरि-निर्त्त-विलास जस, जे अवगाहत नित्त । ,
‘हित ध्रुव’ अद्भुत प्रेम सौं, सरस रहै दिन चित्त ।।,
सरस रहै दिन चित्त, और कछु सुन्यौ न भावै । ,
बिन विहार-रस-प्रेम, और उर में नहिं आवै ।। ,
अद्भुत सुख की सीव, सकल अंगनि गुन आगर । ,
प्रीतम मन हरि लेत सहज रस में नव नागरि ।।46।।,
,
दोहा,
युगल-प्रेम रस-सार सर, रसिक-हंस अवगाहि । ,
जगत काक-बक बिमुख जे, पलकहुँ पहुँचत नाँहिं ।।47।।,
,
।।जै जै श्री नृत्यविलास लीला की जै जै श्रीहरिवंश।।,
,
43. मान लीला
दोहा
रची कुंज मनिमय मुकुर, झलकत परम रसाल ।
राजत हैं दोऊ रंग में, ह्वै गयौ बिच इक ख्याल ।।1।।
देखि प्रिया प्रतिबिंब छबि, चकित ह्वै रही लुभाइ ।
तेहि छिन बैठी लाड़िली, मान-कुंज में जाइ ।।2।।
रहे सोच बिस्माइ तब, तन की गति भई आँन ।
लेत स्वाँस दीरघ बचन, कहत कहाँ प्रिया-प्रॉन ।।3।।
कौन चूक मोतें परी, गई कहाँ दुख पाइ ।
हे सखि मैं समुझी नहीं, इतनी सुधि लै आइ ।।4।।
बार-बार सोचत यहै, मैं तो कह्यौ कछु नाँहिं ।
मन दै नीके समुझि तू, कहा आई, जिय माँहिं ।।5।।
कहा कहौं अब प्रान ये, नैंननिं में रहे आइ ।
जो गति देखी जाति है, तैसी जाइ सुनाइ ।।6।।
सोरठा
को समुझै यह बात, कहा कहौं हिय-चटपटी ।
प्रान चले ये जात, रहि न सकत हैं प्रिया बिनु ।।7।।
दोहा
सुनत बचन पिय के सखी, भरि आये दृग नीर ।
रहि न सकी व्याकुल भई, चली प्रिया के तीर ।।8।।
आवत देखी सखी जब, मुरि बैठी सुकुँवारि ।
भौंह रुखाई मौन धरि, नीचे रही निहारि ।।9।।
मान-कुंज अद्भुत बनी, माननी-मान अनूप ।
रस में कछु रिस नैंन भरि, बाढ्यौ सतगुन रूप ।।10।।
चतुर सखी परि चरन में, रुचि लै करत है बात ।
देखैं पिय की गति प्रिया, हीयौ दरक्यौ जात ।।11।।
लुठत धरनि अँसुवनि भरनि, बाढ़ी नदी अपार ।
गहि रहे गुन इक नेह कौ, राधा नाम अधार ।।12।।
मुकट कहूँ वंसी कहूँ, भूषन कहुँ पट-पीत ।
मैंन-सैंन लिये घेरि कै, तातें भये अति भीत ।।13।।
सेज कुंज भूषन बसन, अरु फूलनि के हार ।
देखि सबै अनखात हैं, पावक कैसी झार ।।14।।
चंदन चंद समीर बन, कंज कपूर समेत ।
सब दिन तौ यह सुखद हे, तुम बिनु अब दुख देत ।।15।।
नेह-रीति समुझत सबै, तुम तैं कौन प्रवीन ।
जल तें न्यारौ होइ जौ, कैसै जीवै मीन ।।16।।
तुम मग जोवत छिनहि-छिन, और न कछू सुहाइ ।
पत्र पवन खरकत जबहि, उठि धावत अकुलाइ ।।17।।
जहाँ लगि तुम मग लाड़िली, राखे नैंन बिछाइ ।
ऐसे नेही नवल पिय, लीजै कंठ लगाइ ।।18।।
राधा-राधा रट लगी, धरि धारा इक ध्यान ।
तदाकार तुव-रूप भये, अब जिनि करहु निदान ।।19।।
अरिल्ल
कहत हिये की बात सुनौ जौ कान दै ।
बढ़यौ सरस अनुराग प्रान-प्रिय दान दै ।।
इती समुझि कै बात विलंब न कीजियै ।
(पुनि हाँ) हँसि कै प्यारौ लाल भुजनि भरि लीजियै ।।20।।
जब जान्यौ कछु मन भयौ, चतुर चित्त की पाइ ।
ल्यावन प्यारे लाल कौं, तेहि छिन आई धाइ ।।21।।
सुनहुँ लाल नव बाल बलि, बैठी अति हठ ठाँन ।
मौंन धरै नैंना भरैं, दै कपोल तर पाँन ।।22।।
दोहा
पाइन परि तृन दंत धरि, कीने जतन अनेक ।
लाल तिहारी लाड़िली, छाँड़त नहिं हठ टेक ।।23।।
बहुत जतन बिनती करी, बातें अधिक बनाइ ।
चलिये अब पिय प्रिया कौं, लीजै बेगि मनाइ ।।24।।
मन तौ कछु कोमल भयौ, बातें लगीं सुहान ।
मान छूटि है जातहीं, यह पायौ उनमान ।।25।।
आइ लाल ठाढ़े भये, आगे दोऊ कर जोर ।
सुनि-सुनि प्यारे बचन मृदु, रही कुँवरि मुख मोर ।।26।।
सुहृद अली अति हेत सौं, बातें कहत निहोर ।
रसिक लाल बलि प्रेम सौं, बँधे तिहारी डोर ।।27।।
कैतव स्याम सनेह में, समुझावत सखि तोहि ।
अंतर सित वाहिर सुरंग, हिय के नैंननि जोहि ।।28।।
जाके उर कछु प्रीति है, कहत न अधिक बनाइ ।
जैसे लहरि समुद्र की, फिरि-फिरि तहीं समाइ ।।29।।
रति – लंपट रस हेत ही, अति अधीन ह्वै जाइ ।
मधुर बचन सब कपट के, कहत बनाइ बनाइ ।।30।।
अब तौ कीनौ नेम यह, चलौं न तिनकी गैन ।
कैसौ हँसिबो बोलिबौ, सनमुख करौं न नैंन ।।31।।
तुम प्रवीन सब अंग में, ऐसी जिय न विचार ।
तासौं ऐसी चाहिये, तन-मन जो रह्यौ हार ।।32।।
कैसैं कै सहि जात है, नैंकु रुखाई भौंह ।
यातैं नाहिन और दुख, प्यारी तेरी सौंह ।।33।।
जौ जानत अपराध कछु, दीजै दंड विचारि ।
भुजन बाँधि रद अधर धरि, नख-छद करि सुकुँवारि ।।34।।
तुम जीवन भूषन प्रिये, तुम ही हौ निज प्राँन ।
और करहु जो रुचै सब, बिचि जिनि आनौ माँन ।।35।।
सोरठा
मेरे है गति एक, तुम पद-पंकज की प्रिये ।
अपने हठ की टेक, छाँड़ि कृपा करि लाड़िली ।।36।।
दोहा
मोहन के मोहन वचन, सुनि मोहनी मुसिकाइ ।
प्यारौ प्यारी प्यार सौं, ढरकि लियौ उर लाइ ।।37
जब देखे खेलत हँसत, रस में दोउ सुकुँवार ।
‘हित ध्रुव’ तेहि छिन सखी सब, करतिं प्रान बलिहार ।।38।।
।।जै जै श्री मान लीला की जै जै श्री हित हरिवंश।।
दोहा
रची कुंज मनिमय मुकुर, झलकत परम रसाल ।
राजत हैं दोऊ रंग में, ह्वै गयौ बिच इक ख्याल ।।1।।
देखि प्रिया प्रतिबिंब छबि, चकित ह्वै रही लुभाइ ।
तेहि छिन बैठी लाड़िली, मान-कुंज में जाइ ।।2।।
रहे सोच बिस्माइ तब, तन की गति भई आँन ।
लेत स्वाँस दीरघ बचन, कहत कहाँ प्रिया-प्रॉन ।।3।।
कौन चूक मोतें परी, गई कहाँ दुख पाइ ।
हे सखि मैं समुझी नहीं, इतनी सुधि लै आइ ।।4।।
बार-बार सोचत यहै, मैं तो कह्यौ कछु नाँहिं ।
मन दै नीके समुझि तू, कहा आई, जिय माँहिं ।।5।।
कहा कहौं अब प्रान ये, नैंननिं में रहे आइ ।
जो गति देखी जाति है, तैसी जाइ सुनाइ ।।6।।
सोरठा
को समुझै यह बात, कहा कहौं हिय-चटपटी ।
प्रान चले ये जात, रहि न सकत हैं प्रिया बिनु ।।7।।
दोहा
सुनत बचन पिय के सखी, भरि आये दृग नीर ।
रहि न सकी व्याकुल भई, चली प्रिया के तीर ।।8।।
आवत देखी सखी जब, मुरि बैठी सुकुँवारि ।
भौंह रुखाई मौन धरि, नीचे रही निहारि ।।9।।
मान-कुंज अद्भुत बनी, माननी-मान अनूप ।
रस में कछु रिस नैंन भरि, बाढ्यौ सतगुन रूप ।।10।।
चतुर सखी परि चरन में, रुचि लै करत है बात ।
देखैं पिय की गति प्रिया, हीयौ दरक्यौ जात ।।11।।
लुठत धरनि अँसुवनि भरनि, बाढ़ी नदी अपार ।
गहि रहे गुन इक नेह कौ, राधा नाम अधार ।।12।।
मुकट कहूँ वंसी कहूँ, भूषन कहुँ पट-पीत ।
मैंन-सैंन लिये घेरि कै, तातें भये अति भीत ।।13।।
सेज कुंज भूषन बसन, अरु फूलनि के हार ।
देखि सबै अनखात हैं, पावक कैसी झार ।।14।।
चंदन चंद समीर बन, कंज कपूर समेत ।
सब दिन तौ यह सुखद हे, तुम बिनु अब दुख देत ।।15।।
नेह-रीति समुझत सबै, तुम तैं कौन प्रवीन ।
जल तें न्यारौ होइ जौ, कैसै जीवै मीन ।।16।।
तुम मग जोवत छिनहि-छिन, और न कछू सुहाइ ।
पत्र पवन खरकत जबहि, उठि धावत अकुलाइ ।।17।।
जहाँ लगि तुम मग लाड़िली, राखे नैंन बिछाइ ।
ऐसे नेही नवल पिय, लीजै कंठ लगाइ ।।18।।
राधा-राधा रट लगी, धरि धारा इक ध्यान ।
तदाकार तुव-रूप भये, अब जिनि करहु निदान ।।19।।
अरिल्ल
कहत हिये की बात सुनौ जौ कान दै ।
बढ़यौ सरस अनुराग प्रान-प्रिय दान दै ।।
इती समुझि कै बात विलंब न कीजियै ।
(पुनि हाँ) हँसि कै प्यारौ लाल भुजनि भरि लीजियै ।।20।।
जब जान्यौ कछु मन भयौ, चतुर चित्त की पाइ ।
ल्यावन प्यारे लाल कौं, तेहि छिन आई धाइ ।।21।।
सुनहुँ लाल नव बाल बलि, बैठी अति हठ ठाँन ।
मौंन धरै नैंना भरैं, दै कपोल तर पाँन ।।22।।
दोहा
पाइन परि तृन दंत धरि, कीने जतन अनेक ।
लाल तिहारी लाड़िली, छाँड़त नहिं हठ टेक ।।23।।
बहुत जतन बिनती करी, बातें अधिक बनाइ ।
चलिये अब पिय प्रिया कौं, लीजै बेगि मनाइ ।।24।।
मन तौ कछु कोमल भयौ, बातें लगीं सुहान ।
मान छूटि है जातहीं, यह पायौ उनमान ।।25।।
आइ लाल ठाढ़े भये, आगे दोऊ कर जोर ।
सुनि-सुनि प्यारे बचन मृदु, रही कुँवरि मुख मोर ।।26।।
सुहृद अली अति हेत सौं, बातें कहत निहोर ।
रसिक लाल बलि प्रेम सौं, बँधे तिहारी डोर ।।27।।
कैतव स्याम सनेह में, समुझावत सखि तोहि ।
अंतर सित वाहिर सुरंग, हिय के नैंननि जोहि ।।28।।
जाके उर कछु प्रीति है, कहत न अधिक बनाइ ।
जैसे लहरि समुद्र की, फिरि-फिरि तहीं समाइ ।।29।।
रति – लंपट रस हेत ही, अति अधीन ह्वै जाइ ।
मधुर बचन सब कपट के, कहत बनाइ बनाइ ।।30।।
अब तौ कीनौ नेम यह, चलौं न तिनकी गैन ।
कैसौ हँसिबो बोलिबौ, सनमुख करौं न नैंन ।।31।।
तुम प्रवीन सब अंग में, ऐसी जिय न विचार ।
तासौं ऐसी चाहिये, तन-मन जो रह्यौ हार ।।32।।
कैसैं कै सहि जात है, नैंकु रुखाई भौंह ।
यातैं नाहिन और दुख, प्यारी तेरी सौंह ।।33।।
जौ जानत अपराध कछु, दीजै दंड विचारि ।
भुजन बाँधि रद अधर धरि, नख-छद करि सुकुँवारि ।।34।।
तुम जीवन भूषन प्रिये, तुम ही हौ निज प्राँन ।
और करहु जो रुचै सब, बिचि जिनि आनौ माँन ।।35।।
सोरठा
मेरे है गति एक, तुम पद-पंकज की प्रिये ।
अपने हठ की टेक, छाँड़ि कृपा करि लाड़िली ।।36।।
दोहा
मोहन के मोहन वचन, सुनि मोहनी मुसिकाइ ।
प्यारौ प्यारी प्यार सौं, ढरकि लियौ उर लाइ ।।37
जब देखे खेलत हँसत, रस में दोउ सुकुँवार ।
‘हित ध्रुव’ तेहि छिन सखी सब, करतिं प्रान बलिहार ।।38।।
।।जै जै श्री मान लीला की जै जै श्री हित हरिवंश।।
44. दान लीला
दोहा
एक समै उर सखिन कैं, बाढ्यौ आनँद-मोद ।
देखैं लाड़िली-लाल की, लीला दान-विनोद ।।1।।
वंसीवट तट हंसजा, सघन कुंज की खोर ।
दानी ह्वै ठाढ़े भये, नागर नवल किशोर ।।2।।
भाँति रँगीली सखिनु जुत, नवल छबीली बाल ।
आइ गई तेहि छिन तहाँ, मत्त गयंदनि चाल ।।3।।
सरकि लाल ठाढ़े भये, ललिता लई बुलाइ ।
दान हमारौ लगत कछु, कहौ प्रिया सौं जाइ ।।4।।
ललिता ललित प्रवीन अति, बीचहि उत्तर दीन ।
नई रीति कब तें गही, यह सिखवनि किन दीन ।।5।।
कहौ दान कबही भयौ, कहत न आवत लाज।
यह बन राधा कुँवरि कौ, इक-छत राजत-राज ।।6।।
उलटी कैसैं होत है, छाँड़हु अधिक सयान ।
ठकुराइत जिनकी तहाँ, तिन पै माँगत दान ।।7।।
दान-दान तुम कहत हौ, सुन्यौ न कबहूँ कान ।
इहि ठाँ बिन कुंजेश्वरी, नहिं काहू की आन ।।8।।
बहुत मोल की सौंज लै, इहि मग आवत जात ।
यह तौ हम साँची कहीं, तुम काहे अनखात ।।9।।
ललिता तुम मानत नहीं, जे हम कहत जु बैंन ।
नवल किशोरी रूप के, दिनही दानी नैंन ।।10।।
इक इक मुक्ता माँग के, झलकत विमल अमोल ।
नासा पर वेसरि लसै, कुंडल तरल कपोल ।।11।।
हीरा हार हमेल वर, मुक्तनि माल रसाल ।
अंगद पहुँची मुद्रिका, कटि-तट किंकिनि-जाल ।।12।।
जेहरि पायल अति बनी, बिछिया अनवट नीक ।
झलकि रही नख चंद्रिका, ह्वै गये बिधु-सत फीक ।।13।।
नैंन-सिखा नासा स्रवन, लै आये दिन दान ।
अब तू बिच ह्वै द्याइ सखि, राखि हमारौ मान ।।14।।
तब ललिता हँसि कै कह्यौ, सुनहु रसिक-मनि जाँन ।
यह रस तौ तब पाइयै, जो हारौ निज प्रॉन ।।15।।
चरन गहौ विनती करौ, आगैं दोऊ कर जोरि ।
अति भोरी है लाड़ली, लेहु तेहि मन ढोरि ।।16।।
पिय प्रवीन रस प्रेम में, कह्यौ सहचरि कौ कीन ।
दान-मान बल छाँड़ि कै, सीस पगनि तर दीन ।।17।।
लये अंक भरि लाड़िली, मृदु भुज ग्रीवा मेलि ।
फूले कुंज निकुंज में, करत रँगीली-केलि ।।18।।
विविध भाँति रति-दान दै, पोषे पिय के प्रान ।
अति उदार मुसिकाइ कै, देति अधर-रस पान ।।19।।
जुरि मुरि कै उर सौं घुरी, सोभित सहज सिंगार ।
मानौं पिय पहिर्यौ हियैं, रति-विलास कौ हार ।।20।।
जो रस उपजत दुहुँनि में, प्रेम रंग सुकुँवार ।
प्रेम रँगी निज सहचरी, निरखत प्रेम-विहार ।।21।।
नित उठि जो गावै सुनै, यह लीला रस-रूप ।
‘हित ध्रुव’ ताके हिय-कमल, उपजै प्रेम अनूप ।।22।।
।।जै जै श्री दानलीला की जै जै श्री हित हरिवंश।।
दोहा
एक समै उर सखिन कैं, बाढ्यौ आनँद-मोद ।
देखैं लाड़िली-लाल की, लीला दान-विनोद ।।1।।
वंसीवट तट हंसजा, सघन कुंज की खोर ।
दानी ह्वै ठाढ़े भये, नागर नवल किशोर ।।2।।
भाँति रँगीली सखिनु जुत, नवल छबीली बाल ।
आइ गई तेहि छिन तहाँ, मत्त गयंदनि चाल ।।3।।
सरकि लाल ठाढ़े भये, ललिता लई बुलाइ ।
दान हमारौ लगत कछु, कहौ प्रिया सौं जाइ ।।4।।
ललिता ललित प्रवीन अति, बीचहि उत्तर दीन ।
नई रीति कब तें गही, यह सिखवनि किन दीन ।।5।।
कहौ दान कबही भयौ, कहत न आवत लाज।
यह बन राधा कुँवरि कौ, इक-छत राजत-राज ।।6।।
उलटी कैसैं होत है, छाँड़हु अधिक सयान ।
ठकुराइत जिनकी तहाँ, तिन पै माँगत दान ।।7।।
दान-दान तुम कहत हौ, सुन्यौ न कबहूँ कान ।
इहि ठाँ बिन कुंजेश्वरी, नहिं काहू की आन ।।8।।
बहुत मोल की सौंज लै, इहि मग आवत जात ।
यह तौ हम साँची कहीं, तुम काहे अनखात ।।9।।
ललिता तुम मानत नहीं, जे हम कहत जु बैंन ।
नवल किशोरी रूप के, दिनही दानी नैंन ।।10।।
इक इक मुक्ता माँग के, झलकत विमल अमोल ।
नासा पर वेसरि लसै, कुंडल तरल कपोल ।।11।।
हीरा हार हमेल वर, मुक्तनि माल रसाल ।
अंगद पहुँची मुद्रिका, कटि-तट किंकिनि-जाल ।।12।।
जेहरि पायल अति बनी, बिछिया अनवट नीक ।
झलकि रही नख चंद्रिका, ह्वै गये बिधु-सत फीक ।।13।।
नैंन-सिखा नासा स्रवन, लै आये दिन दान ।
अब तू बिच ह्वै द्याइ सखि, राखि हमारौ मान ।।14।।
तब ललिता हँसि कै कह्यौ, सुनहु रसिक-मनि जाँन ।
यह रस तौ तब पाइयै, जो हारौ निज प्रॉन ।।15।।
चरन गहौ विनती करौ, आगैं दोऊ कर जोरि ।
अति भोरी है लाड़ली, लेहु तेहि मन ढोरि ।।16।।
पिय प्रवीन रस प्रेम में, कह्यौ सहचरि कौ कीन ।
दान-मान बल छाँड़ि कै, सीस पगनि तर दीन ।।17।।
लये अंक भरि लाड़िली, मृदु भुज ग्रीवा मेलि ।
फूले कुंज निकुंज में, करत रँगीली-केलि ।।18।।
विविध भाँति रति-दान दै, पोषे पिय के प्रान ।
अति उदार मुसिकाइ कै, देति अधर-रस पान ।।19।।
जुरि मुरि कै उर सौं घुरी, सोभित सहज सिंगार ।
मानौं पिय पहिर्यौ हियैं, रति-विलास कौ हार ।।20।।
जो रस उपजत दुहुँनि में, प्रेम रंग सुकुँवार ।
प्रेम रँगी निज सहचरी, निरखत प्रेम-विहार ।।21।।
नित उठि जो गावै सुनै, यह लीला रस-रूप ।
‘हित ध्रुव’ ताके हिय-कमल, उपजै प्रेम अनूप ।।22।।
।।जै जै श्री दानलीला की जै जै श्री हित हरिवंश।।
लीलानुक्रमणिका
जीवदसा गाय सब जीवन की अविद्या ढाय,
वैद्यक सुनाय भव-रोग सो नसाये हैं ।
पुष्टता दैं मनशिक्षा,
भाषी है भाषा बृहद-बावन पुरान नित्य वस्तु परसाये हैं ।।
सिद्धान्त विचार भक्तनामावलि हियै धारि,
प्रीति चौवनी अष्टक जुगल लखाये हैं ।
भजन कुंडलिया त्यौं भजन सतहूँ तैसैं,
वृंदावन सत हित ख्याल हुलसाये हैं ।।
सिंगार-सत हित-सिंगार मणि-सिंगार,
आनंद दसा रसानंद रंग हुलसायौ है ।
रसमुक्तावली रसरत्नावली प्रेमावली,
रसहीरावली सभामंडल रचायौ है ।।
निर्त्त-विलास रहसिमंजरी, रति नेह मंजरी,
यौं मंजरी सुख बढ़ायौ है ।
रंग विनोद रंगविहार त्यौं बन बिहार,
रस विहार जुगल ध्यान मन भायौ है ।।
आनंदलता रहस्यलता अनुरागलता प्रेमलता,
प्रियाजू के नामन की माला है ।
दानलीला मानलीला व्रजलीला ऐसैं मिलि,
बयालीस लीला पद्यावलि हूँ रसाला है ।।
टीका हितवानी की सुवानी ध्रुवदास जू की,
वृंदावन बसिबे कौ बानक बिशाला है ।
करत निहाला सद प्रीति की प्रनाला हद,
परम कृपाला सब जग प्रतिपाला है ।।
जीवदसा गाय सब जीवन की अविद्या ढाय,
वैद्यक सुनाय भव-रोग सो नसाये हैं ।
पुष्टता दैं मनशिक्षा,
भाषी है भाषा बृहद-बावन पुरान नित्य वस्तु परसाये हैं ।।
सिद्धान्त विचार भक्तनामावलि हियै धारि,
प्रीति चौवनी अष्टक जुगल लखाये हैं ।
भजन कुंडलिया त्यौं भजन सतहूँ तैसैं,
वृंदावन सत हित ख्याल हुलसाये हैं ।।
सिंगार-सत हित-सिंगार मणि-सिंगार,
आनंद दसा रसानंद रंग हुलसायौ है ।
रसमुक्तावली रसरत्नावली प्रेमावली,
रसहीरावली सभामंडल रचायौ है ।।
निर्त्त-विलास रहसिमंजरी, रति नेह मंजरी,
यौं मंजरी सुख बढ़ायौ है ।
रंग विनोद रंगविहार त्यौं बन बिहार,
रस विहार जुगल ध्यान मन भायौ है ।।
आनंदलता रहस्यलता अनुरागलता प्रेमलता,
प्रियाजू के नामन की माला है ।
दानलीला मानलीला व्रजलीला ऐसैं मिलि,
बयालीस लीला पद्यावलि हूँ रसाला है ।।
टीका हितवानी की सुवानी ध्रुवदास जू की,
वृंदावन बसिबे कौ बानक बिशाला है ।
करत निहाला सद प्रीति की प्रनाला हद,
परम कृपाला सब जग प्रतिपाला है ।।
वाणी प्रसंशा
धन्य-धन्य ध्रुवदास धन्य ते यह रस गायौ ।
रसिक अनन्य समाज रसासव पान करायौ ।।
नव निकुञ्ज के रहस देश-देशन में छाये ।
वृन्दावन सत सुनत बहुत वृन्दावन आये ।।
कहत-सुनत औ गुनत मन परत रूप रस चहल में ।
या वानी की बानि यह लै पहुँचावै महल में ।।
- गो. श्री चंद्रलाल जीकके पुत्र श्री वृंदावनदास जी
प्रथम सुमिर हित नाम धाम-धामी जु बखाने ।
रसिक जनन के हेत जुगल परिकर गुन गाने ।।
बरनी लीला कवित रूप-रज गति-मति पागी ।
सुनि-सुनि गिरा गंभीर बहुत भये वन अनुरागी ।।
महा गौप्य रस निगम जो गुरु प्रसाद-बल बिस्तरयौ ।
बलि जाउँ देश कुल धाम की जहँ ध्रुवदास-सौ औतरयौ ।।
- चाचा वृन्दावनदास जी
परम पुरातन धर्म मर्म आरज हित गाये ।
ताही मग रस ढरे धाम वृन्दावन आये ।।
हित-मण्डल अभिराम श्याम-श्यामा जहँ राजैं ।
तिन मुख आयसु पाइ भने बहु ग्रन्थ-समाजैं ।।
उमर बरस दस हृदय में बाढ्यौ प्रेम प्रकाश की ।
कलि सुगम सेतु भव-तरनकौं गाथ विमल ध्रुवदास की ।।
- श्री गोविंद अली
धन्य-धन्य ध्रुवदास धन्य ते यह रस गायौ ।
रसिक अनन्य समाज रसासव पान करायौ ।।
नव निकुञ्ज के रहस देश-देशन में छाये ।
वृन्दावन सत सुनत बहुत वृन्दावन आये ।।
कहत-सुनत औ गुनत मन परत रूप रस चहल में ।
या वानी की बानि यह लै पहुँचावै महल में ।।
- गो. श्री चंद्रलाल जीकके पुत्र श्री वृंदावनदास जी
प्रथम सुमिर हित नाम धाम-धामी जु बखाने ।
रसिक जनन के हेत जुगल परिकर गुन गाने ।।
बरनी लीला कवित रूप-रज गति-मति पागी ।
सुनि-सुनि गिरा गंभीर बहुत भये वन अनुरागी ।।
महा गौप्य रस निगम जो गुरु प्रसाद-बल बिस्तरयौ ।
बलि जाउँ देश कुल धाम की जहँ ध्रुवदास-सौ औतरयौ ।।
- चाचा वृन्दावनदास जी
परम पुरातन धर्म मर्म आरज हित गाये ।
ताही मग रस ढरे धाम वृन्दावन आये ।।
हित-मण्डल अभिराम श्याम-श्यामा जहँ राजैं ।
तिन मुख आयसु पाइ भने बहु ग्रन्थ-समाजैं ।।
उमर बरस दस हृदय में बाढ्यौ प्रेम प्रकाश की ।
कलि सुगम सेतु भव-तरनकौं गाथ विमल ध्रुवदास की ।।
- श्री गोविंद अली
रसिक नामावली
प्रेमानन्दोत्पुलकित गात्रौ विद्युद्धाराधर सम कांती ।
राधाकृष्णौ मनसि दधानं वन्देऽहं श्रीहित हरिवंशम् ।।
नमो नमो जय श्री हरिवंश ।
रसिक अनन्य वेणु कुल मंडन लीला मान सरोवर हंस ।।
नमो जयति श्रीवृन्दावन सहज माधुरी रास-विलास प्रसंस ।
आगम निगम अगोचर राधे चरण सरोज व्यास अवतंस ।।
श्री नरवाहन के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री नाहरमल के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री बीठलदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री मोहनदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री छबीलेदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री स्वामीजी के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री नवलदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री व्यासदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री परमानंद के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री प्रयोधानंद के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री गंगा जमुना के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री कर्मठीबाई के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री हरिवंशदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री हरिदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री तुलाधार के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री सेवक जू के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री चत्रभुज स्वामी के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री वैष्णवदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री खरगसैन के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री जैमलजी के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री जसवंत जी के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री सुंदरदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री पूरनदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री लालस्वामी के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री दामोदर स्वामी के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री रसिकदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री हितध्रुवदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री नागरीदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री भागमती के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री कल्याण पुजारी के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री गोविंददास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री पुहकरदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री हरेकृष्ण के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री द्वारिकादास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री हरिदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री रंगा मेदा के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री कृष्णदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री गोसाईंदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री मोहनदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री माधुरीदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री स्याम साह के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री सहचरि सुख के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री अनन्त भट्ट के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री अनन्य अली के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री भोरी सखी के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री हितदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री प्रेमदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री हरिलाल व्यास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री प्रियादास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री सर्वसुखदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री रतनदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री वृन्दावन चाचा के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री केलिदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
सब रसिकन के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
जै जै राधावल्लभ श्री हरिवंश, श्री वृन्दावन श्रीवनचन्द ।।
अरिल्ल
मानुष कौ तन पाय भजौ ब्रजनाथ कौं ।
दर्बी लैकैं मूढ़ जरावत हाथ कौं ।।
जय श्रीहित हरिवंश प्रपंच विषय रस मोह के ।
हरि हां बिन कंचन क्यौं चलैं पचीसा लोह के ।।
प्रेमानन्दोत्पुलकित गात्रौ विद्युद्धाराधर सम कांती ।
राधाकृष्णौ मनसि दधानं वन्देऽहं श्रीहित हरिवंशम् ।।
नमो नमो जय श्री हरिवंश ।
रसिक अनन्य वेणु कुल मंडन लीला मान सरोवर हंस ।।
नमो जयति श्रीवृन्दावन सहज माधुरी रास-विलास प्रसंस ।
आगम निगम अगोचर राधे चरण सरोज व्यास अवतंस ।।
श्री नरवाहन के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री नाहरमल के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री बीठलदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री मोहनदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री छबीलेदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री स्वामीजी के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री नवलदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री व्यासदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री परमानंद के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री प्रयोधानंद के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री गंगा जमुना के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री कर्मठीबाई के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री हरिवंशदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री हरिदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री तुलाधार के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री सेवक जू के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री चत्रभुज स्वामी के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री वैष्णवदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री खरगसैन के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री जैमलजी के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री जसवंत जी के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री सुंदरदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री पूरनदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री लालस्वामी के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री दामोदर स्वामी के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री रसिकदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री हितध्रुवदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री नागरीदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री भागमती के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री कल्याण पुजारी के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री गोविंददास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री पुहकरदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री हरेकृष्ण के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री द्वारिकादास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री हरिदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री रंगा मेदा के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
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श्री गोसाईंदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री मोहनदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री माधुरीदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री स्याम साह के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री सहचरि सुख के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री अनन्त भट्ट के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री अनन्य अली के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री भोरी सखी के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री हितदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री प्रेमदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री हरिलाल व्यास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री प्रियादास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री सर्वसुखदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री रतनदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री वृन्दावन चाचा के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
श्री केलिदास के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
सब रसिकन के प्रान जीवन धन श्री हरिवंश ।।
जै जै राधावल्लभ श्री हरिवंश, श्री वृन्दावन श्रीवनचन्द ।।
अरिल्ल
मानुष कौ तन पाय भजौ ब्रजनाथ कौं ।
दर्बी लैकैं मूढ़ जरावत हाथ कौं ।।
जय श्रीहित हरिवंश प्रपंच विषय रस मोह के ।
हरि हां बिन कंचन क्यौं चलैं पचीसा लोह के ।।