बयालीस लीला
200+
बयालीस लीला
बयालीस लीला
1. जीव-दशा लीला
चौपाई
जीव दशा कछु इक सुनि भाई ।
हरि-जस अमृत तजि विष खाई ॥1।।
छिन भंगुर यह देह न जानी ।
उलटी समुझि अमर ही मानी ॥2।।
घर घरनी के रंग यौं राच्यौ ।
छिन-छिन में कपि नट लौं नाच्यौ ॥3।।
करी ना कबहूँ भजन सँभारी ।
ऐसे मगन रह्यौ व्यौहारी ॥4।।
बय गई बीति जात नहिं जानी ।
ज्यौं सावन-सरिता कौ पानी ॥5।।
द्वै स्वांसा या घट में चलैं ।
जो बिछुरैं तो फेरि न मिलैं ॥6।।
माया सुख में यौं लपटानौं ।
विषै स्वाद सर्वस ही जानौ ॥7।।
कृष्ण भक्ति सौं कबहुँ न राँच्यौ ।
महा मूढ़ बड़े सुख ते बाँच्यौ ॥8।।
काल समै जब आइ तुलानी ।
तन मन की सुधि सबै भुलानी ॥9।।
रसना थकी न बोल्यौ जाई ।
बार-बार मन में पछिताई ॥10।।
जम-किंकर जब दई दिखाई ।
महा भयानक अति दुखदाई ॥11।।
रञ्च न स्याम-भक्ति उर आई ।
या दुख में अब कौन सहाई ॥12।।
रोम-रोम पीड़ा दुख पाई ।
हरि केहरि बिनु कौन छुड़ाई ॥13।।
ताकौ नाम न लियौ अभागे ।
कबहूँ सोवत सुपन न जागे ॥14।।
अब मुख नहिं निसरत हरिबानी ।
पित्त-वायु कफ घेर्यौ आनी ॥15।।
एक नाम त्रैलोकहि तारै ।
जो न लेहि सो जनमहिं हारै ॥16।।
दोहा
कैसैंहूँ हरि नाम लै, खेलत हँसत अजान ।
एसे हूँ कौ देत हैं, उत्तम गति भगवान ॥17।।
जो कोउ साँची प्रीति सौं, हरि-हरि कहत लड़ाइ ।
तिनकौं 'ध्रुव' कहा दैंहिगे, यह जानी नहिं जाइ ॥18।।
सब धर्मनि पर जगमगै, कृष्ण नाम सिरताज ।
जैसैं वन के मृगनि में, गाजत है मृगराज ॥19।।
चौपाई
पापी एक अजामिल भयौ ।
अधम बीज तिन तरु निर्मयौ ॥20।।
सुत मिस नाम नरायन लयौ ।
सो पापी बैकुंठहिं गयौ ॥21।।
ऐसे बहुत पातकी तरे ।
हरि हरि कहत पाप सब जरे ॥22।।
दोहा
कृष्ण नाम लीन्हौं न जिनि, कीन्हौं बड़ौ अकाज ।
धर्म - मृगनि पाछैं लग्यौ, छाँड़ि नाम मृगराज ॥23।।
दान पुन्य नृग नृप बड़ कियौ ।
सो लै अंध-कूप में दियौ ॥24।।
धर्मनि में अरुझाइ भुलाने ।
विधि परपंच सबै जग जाने ॥25।।
दोहा
कोटि धर्म व्रत निगम रटि, विधि सौ करै बनाइ ।
एक नाम बिनु कृष्ण के, सबै अविधि है जाइ ॥26।।
चौपाई
कोटि धर्म जो कोउ करि आवै ।
कृष्ण नाम बिनु गति नहिं पावै ॥27।।
नामहिं सौ जिनि बाँध्यौ नातौ ।
जग के सुख तें सो भयौ हाँतौ ॥28।।
दोहा
मिथ्या लालच जगत सुख, सबहिं दुःख कौ धाम ।
इक रस नित आनन्दमय, सत्य श्याम कौ नाम ।।29।।
1. जीव-दशा लीला
चौपाई
जीव दशा कछु इक सुनि भाई ।
हरि-जस अमृत तजि विष खाई ॥1।।
छिन भंगुर यह देह न जानी ।
उलटी समुझि अमर ही मानी ॥2।।
घर घरनी के रंग यौं राच्यौ ।
छिन-छिन में कपि नट लौं नाच्यौ ॥3।।
करी ना कबहूँ भजन सँभारी ।
ऐसे मगन रह्यौ व्यौहारी ॥4।।
बय गई बीति जात नहिं जानी ।
ज्यौं सावन-सरिता कौ पानी ॥5।।
द्वै स्वांसा या घट में चलैं ।
जो बिछुरैं तो फेरि न मिलैं ॥6।।
माया सुख में यौं लपटानौं ।
विषै स्वाद सर्वस ही जानौ ॥7।।
कृष्ण भक्ति सौं कबहुँ न राँच्यौ ।
महा मूढ़ बड़े सुख ते बाँच्यौ ॥8।।
काल समै जब आइ तुलानी ।
तन मन की सुधि सबै भुलानी ॥9।।
रसना थकी न बोल्यौ जाई ।
बार-बार मन में पछिताई ॥10।।
जम-किंकर जब दई दिखाई ।
महा भयानक अति दुखदाई ॥11।।
रञ्च न स्याम-भक्ति उर आई ।
या दुख में अब कौन सहाई ॥12।।
रोम-रोम पीड़ा दुख पाई ।
हरि केहरि बिनु कौन छुड़ाई ॥13।।
ताकौ नाम न लियौ अभागे ।
कबहूँ सोवत सुपन न जागे ॥14।।
अब मुख नहिं निसरत हरिबानी ।
पित्त-वायु कफ घेर्यौ आनी ॥15।।
एक नाम त्रैलोकहि तारै ।
जो न लेहि सो जनमहिं हारै ॥16।।
दोहा
कैसैंहूँ हरि नाम लै, खेलत हँसत अजान ।
एसे हूँ कौ देत हैं, उत्तम गति भगवान ॥17।।
जो कोउ साँची प्रीति सौं, हरि-हरि कहत लड़ाइ ।
तिनकौं 'ध्रुव' कहा दैंहिगे, यह जानी नहिं जाइ ॥18।।
सब धर्मनि पर जगमगै, कृष्ण नाम सिरताज ।
जैसैं वन के मृगनि में, गाजत है मृगराज ॥19।।
चौपाई
पापी एक अजामिल भयौ ।
अधम बीज तिन तरु निर्मयौ ॥20।।
सुत मिस नाम नरायन लयौ ।
सो पापी बैकुंठहिं गयौ ॥21।।
ऐसे बहुत पातकी तरे ।
हरि हरि कहत पाप सब जरे ॥22।।
दोहा
कृष्ण नाम लीन्हौं न जिनि, कीन्हौं बड़ौ अकाज ।
धर्म - मृगनि पाछैं लग्यौ, छाँड़ि नाम मृगराज ॥23।।
दान पुन्य नृग नृप बड़ कियौ ।
सो लै अंध-कूप में दियौ ॥24।।
धर्मनि में अरुझाइ भुलाने ।
विधि परपंच सबै जग जाने ॥25।।
दोहा
कोटि धर्म व्रत निगम रटि, विधि सौ करै बनाइ ।
एक नाम बिनु कृष्ण के, सबै अविधि है जाइ ॥26।।
चौपाई
कोटि धर्म जो कोउ करि आवै ।
कृष्ण नाम बिनु गति नहिं पावै ॥27।।
नामहिं सौ जिनि बाँध्यौ नातौ ।
जग के सुख तें सो भयौ हाँतौ ॥28।।
दोहा
मिथ्या लालच जगत सुख, सबहिं दुःख कौ धाम ।
इक रस नित आनन्दमय, सत्य श्याम कौ नाम ।।29।।