Bayalis Leela

बयालीस लीला

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बयालीस लीला

बयालीस लीला
1. जीव-दशा लीला
चौपाई
जीव दशा कछु इक सुनि भाई ।
हरि-जस अमृत तजि विष खाई ॥1।।
छिन भंगुर यह देह न जानी ।
उलटी समुझि अमर ही मानी ॥2।।
घर घरनी के रंग यौं राच्यौ ।
छिन-छिन में कपि नट लौं नाच्यौ ॥3।।
करी ना कबहूँ भजन सँभारी ।
ऐसे मगन रह्यौ व्यौहारी ॥4।।
बय गई बीति जात नहिं जानी ।
ज्यौं सावन-सरिता कौ पानी ॥5।।
द्वै स्वांसा या घट में चलैं ।
जो बिछुरैं तो फेरि न मिलैं ॥6।।
माया सुख में यौं लपटानौं ।
विषै स्वाद सर्वस ही जानौ ॥7।।
कृष्ण भक्ति सौं कबहुँ न राँच्यौ ।
महा मूढ़ बड़े सुख ते बाँच्यौ ॥8।।
काल समै जब आइ तुलानी ।
तन मन की सुधि सबै भुलानी ॥9।।
रसना थकी न बोल्यौ जाई ।
बार-बार मन में पछिताई ॥10।।
जम-किंकर जब दई दिखाई ।
महा भयानक अति दुखदाई ॥11।।
रञ्च न स्याम-भक्ति उर आई ।
या दुख में अब कौन सहाई ॥12।।
रोम-रोम पीड़ा दुख पाई ।
हरि केहरि बिनु कौन छुड़ाई ॥13।।
ताकौ नाम न लियौ अभागे ।
कबहूँ सोवत सुपन न जागे ॥14।।
अब मुख नहिं निसरत हरिबानी ।
पित्त-वायु कफ घेर्यौ आनी ॥15।।
एक नाम त्रैलोकहि तारै ।
जो न लेहि सो जनमहिं हारै ॥16।।
दोहा
कैसैंहूँ हरि नाम लै, खेलत हँसत अजान ।
एसे हूँ कौ देत हैं, उत्तम गति भगवान ॥17।।
जो कोउ साँची प्रीति सौं, हरि-हरि कहत लड़ाइ ।
तिनकौं 'ध्रुव' कहा दैंहिगे, यह जानी नहिं जाइ ॥18।।
सब धर्मनि पर जगमगै, कृष्ण नाम सिरताज ।
जैसैं वन के मृगनि में, गाजत है मृगराज ॥19।।
चौपाई
पापी एक अजामिल भयौ ।
अधम बीज तिन तरु निर्मयौ ॥20।।
सुत मिस नाम नरायन लयौ ।
सो पापी बैकुंठहिं गयौ ॥21।।
ऐसे बहुत पातकी तरे ।
हरि हरि कहत पाप सब जरे ॥22।।
दोहा
कृष्ण नाम लीन्हौं न जिनि, कीन्हौं बड़ौ अकाज ।
धर्म - मृगनि पाछैं लग्यौ, छाँड़ि नाम मृगराज ॥23।।
दान पुन्य नृग नृप बड़ कियौ ।
सो लै अंध-कूप में दियौ ॥24।।
धर्मनि में अरुझाइ भुलाने ।
विधि परपंच सबै जग जाने ॥25।।
दोहा
कोटि धर्म व्रत निगम रटि, विधि सौ करै बनाइ ।
एक नाम बिनु कृष्ण के, सबै अविधि है जाइ ॥26।।
चौपाई
कोटि धर्म जो कोउ करि आवै ।
कृष्ण नाम बिनु गति नहिं पावै ॥27।।
नामहिं सौ जिनि बाँध्यौ नातौ ।
जग के सुख तें सो भयौ हाँतौ ॥28।।
दोहा
मिथ्या लालच जगत सुख, सबहिं दुःख कौ धाम ।
इक रस नित आनन्दमय, सत्य श्याम कौ नाम ।।29।।


2. वैद्यक ज्ञान लीला

चौपाई
वैद्य एक पंडित अति भारी ।
ठाढ़ौ सब सौं कहत पुकारी ॥1॥

जैसौ रोग होइ है जाकौं ।
तैसी औषध देहौं ताकौ ॥2॥

यह सुनि एक गयौ तेहि नेरें ।
ऐसौ बल औषधि को तेरें ॥3॥

मेरें विथा बढ़ी अति भारी ।
कहि मोसौं कछु सोच विचारी ॥4॥

तेरें रोग कहा है भाई ।
ताकी औषधि देउँ बताई ॥5॥

पापहि-कर्म अधिक मैं कीनैं ।
महा दुखी तिहि रोग के लीनैं ॥6॥

विषै विषम विषतन रह्यौ छाई ।
भव-भुवंग तें लेहु छुडाई ॥7॥

धरि यह देह कछु नहिं कीन्हौं ।
कृष्न चरण चित कबहुँ न दीन्हौं ॥8॥

विषै स्वाद में रह्यौ लुभाई ।
झूठे सुख में आयु गंमाई ॥9॥

दुख पायौ जहँ-जहँ चित दीयौ ।
अब हौं पावत अपनौ कियौ ॥10॥

ऐसे मोह जाल में पर्यौ ।
यह माया नें सर्बस हर्यौ ॥11॥

जिनकौं हौं समुझत हौं अपने ।
ते तौ भये रैंनि के सपने ॥12॥

गज तुरंग सेवक सुत नाती ।
जागि परे तें दिया न बाती ॥13॥

दोहा
एते पर समुझाय रह्यौ, समुझत नहिं मन मोर ।
देखि-देखि नाचत मुदित, विषै बादरनि ओर ॥14॥

बूड़त मोह सिंधु की धारा ।
काढि दया करि करि मोहिं पारा ॥15॥

हौं अति दीन महा दुख पावत।
लोग कुटुम्ब कोऊ न मुँह लावत ॥16॥

चौपाई
जे जे मुख जोवत हे मेरौ ।
तिनमें कोऊ न आवत नेरौ ॥17॥

मेरी बात सुहाति न काहू ।
तातें उपजत है उर-दाहू ॥18॥

चौपाई
भयौ बलहीन बुद्धि हू नाठी ।
तहाँ सहाइ भई कछु लाठी ॥19॥

झूँठे कुटुम्बहि में रंग भीनौं ।
साँचे प्रभु सौं चित नहिं दीनौं ॥20॥

कहँ लगि कहौं मूढ़ता अपनी ।
ढ़ाँपि लियौ माया की चपनी ॥21॥

दोहा
नैंन गये अरु श्रवन हूँ, और गये मुख दंत ।
बुद्धि घटी तन गति लटी, तृष्णा कौ नहिं अंत ॥22॥

टूटी खाट न छाँड़ी भावै ।
सुत के सुत नातीनु खिलावे ॥23॥

यहै रुचै मुख नाम न आवै ।
जैवो जमके घरही भावै ॥24॥

दोहा
मन लाग्यौ अति झूँठ सौं,
तजि साँचहि सुख-मूल ।

छाँड़ि सुधा के सुख फलहिं,
जाइ गही विष-शूल ॥25॥

चौपाई
ज्यौं-ज्यौं तन अति जीरन भयौ ।
त्यौं-त्यौं लोभ रोग बढ़ि गयौ ॥26॥

अब तुम जतन करौ चित लाई।
तातें कछु इक हियौ सिराई ॥27॥

तबहिं वैद तासौं यौं कही।
करौं जतन दुख जैहै सही ॥28॥

इन्द्री निग्रह जो पथ करई ।
तिय इमली ते मन परिहरई ॥29॥

लोभ खटाई मोह मिठाई ।
दही क्रोध के निकट न जाई ॥30॥

इतनी कहि जु अनुग्रह कीन्हौं ।
ताकौ कर आपुन गहि लीन्हौं ॥31॥

नारी देखत सीस डुलायौ ।
रह्यौ अपथ्य कियौ मन भायौ ॥32॥

रंग-मनोरथ करन विचार्यौ ।
हरि सौ मीत न कबहुँ सँभार्यौ ॥33॥

दोहा
विषै जूप खेलत रह्यौ, कबहुँ न मानी हारि ।
पियौ जु मदिरा मोह की, सब सुधि दई विसारि ॥34॥

मत्त भयौ अप-वपु न सँभारत ।
छिन-छिन विषै धूरि सिर डारत ॥35॥

त्रिगुण मोह की लगी तोहिं बाता ।
तातें उपज्यौ है सनिपाता ॥36॥

तिनमें दोइ अधिक बढ़े तन में ।
तम-रज बसत निरंतर मन में ॥37॥

तिनको और जतन नहिं कोई।
श्री शुकदेव कह्यौ है सोई ॥38॥

करि विश्वास वचन सुनि मेरौ ।
रोग रहै तौ गुनही तेरौ ॥39॥

तब रोगी बोल्यौ सुनि भाई।
तैं तौ मेरी वेदन पाई ॥40॥

अब मैं शरन गही है तेरी ।
तोहिं लाज सब बात की मेरी ॥41॥

तुम अति गुनी दुनी सब जानै ।
करि उपाइ जोई मन मानें ॥42॥

दोहा
पंडित सोचि-विचारि कै, करनि लग्यौ उपचार ।
जैसे वेगहिं जाइ तरि, भव दुस्तर संसार ॥43॥

चौपाई
जड़ वैराग वृक्ष की लावहु ।
सौंठ संतोषहि आनि मिलावहु ॥44॥

मिरचि तितीच्छ्न करुना चीता ।
निस्पृह पीपर मिलवहु मीता ॥45॥

कोमलता सब सौंज गिलोई ।
मधुबानी सौं लेहु समोई ॥46॥

हरर आमरे शुचि अरु दाया ।
तातें निर्मल ह्वै है काया ॥47॥

असगँध आसन दृढ़ कै करौ ।
चिंतामनि चिंता परिहरौ ॥48॥

मुसलि सौंफ अजवाइन जीरा ।
ग्यान-ध्यान-जप-जोग में धीरा ॥49॥

सांत मृगांग बिना सुख नाहीं ।
साँच लौंग मिलवहु ता माही ॥50॥

भगवत धर्म धातु सब लीजै ।
नाम सुधा रस की पुट दीजै ॥51॥

ये औषधि सब आनि मिलावौ ।
ग्यान ओखली माँहि कुटावौ ॥52॥

हिय हाँड़ी में आनि चढ़ावौ ।
चेतन वह्नी करि औटावौ ॥53॥

निर्मत्सर चपनी ढँकि लैयै ।
श्रृद्धा करछी फेरत जैयै ॥54॥

हस्त-क्रिया जबही बनि आवै ।
जौ कबहूँ सत् संगति पावै ॥55॥

पुनि लै प्रेम चषक में करै ।
भूमि गरीबी में लै धरै ॥56॥

प्रात कृपा बल जल सौं पीवै ।
रोग जाइ अरु जुग-जुग जीवै ॥57॥

दोहा
नारदादि प्रह्लाद ध्रुव, कीनौ यहै विचार ।
या जुग में या रोग कौ, सिद्ध यहै उपचार ॥58॥

अब तरिहैं केतेक तरे, याही औषधि खाइ ।
ताते बिलम्ब न कीजिये, बेगहि करौ उपाइ ॥59॥

मन के समुझन को कह्यौ, अद्भुत वैद्यक ग्यान ।
जन मनि के सब रोग,'ध्रुव' सुनतहि करैं पयान ॥60॥

जै जै श्री वैद्यक ज्ञान लीला की जै जै श्री हित हरिवंश


3. मन शिक्षा लीला

दोहा
रे मन श्री हित हरिवंश भजु, जो चाहत विश्राम ।
जिहिं रस बस व्रज सुंदरिन, छाँड़ि दिये सुख-धाम ॥1॥

निगम नीर मिलि एक भयौ, भजन- दूध सम सेत ।
श्री हरिवंश हंस न्यारौ कियौ, प्रकट जगत के हेत ॥2॥

एक सोच मन में रह्यौ, अरु आवत जिय लाज ।
अद्भुत मानुष देह धरि, कियौ न कछुवै काज ॥3॥

रे मन चंचल तजि विषै, ढरौ भजन की ओर ।
छाँड़ि कुमति अब सुमति गहि, भजि लै नवल किशोर ॥4॥

अब लगि मन कीन्हौ सोई, जो जो कह्यौ तैं मोहि ।
अब तू मेरौ कह्यौ करि, युगल चरन छबि जोहि ॥5॥

मन गज तजि कै विषै मग, चलहु भजन रस माहिं ।
श्री राधावल्लभ लाल बिनु, तेरौ कोऊ नाहिं ॥6॥

रे मन अरु अब छाँडि कै, जो अटकै इक ठौर ।
वृन्दावन घन कुंज में, जहाँ रसिक शिरमौर ॥7॥

रे मन अलि सुनि छुवै जिन, विषय सुमन शठ मंद ।
युगल चरन अरविंद कौ, करहि पान मकरंद ॥8॥

मन पंछी अब परैहि जिन, जगत मोह के जाल ।
तब तोकौं ह्वै है कठिन, बढ़िहै दुःख विशाल ॥9॥

विषै चुगा जिन चुगै मन, चुगत कछुक सुख होइ ।
फिरि फाँसी ऐसी परै, तिहिं सम दुःख न कोइ ॥10॥

रे मन कबहुँ जाइ जिन, भूलि विषै मन रंग ।
मनमथ ठग मारत तहाँ, लिये बहुत ठग संग ॥11॥

जब लगि मन छाँड़त नहीं, सब बातनि कौ लोभ ।
तब लगि हिय उपजति नहीं, युगल प्रेम की गोभ ॥12॥

सब पापनि कौ छत्र यह, लोभ तें मनहिं घटाइ ।
निस्प्रेही संतोष करि, रहै भजन चित लाइ ॥13॥

मन तौ चंचल सबनि तें, कीजै कौन उपाइ ।
साधन को हरि भजन है, कै सतसंग सहाइ ॥14॥

काम-कामना-वासना, मन तें करि सब दूरि ।
श्री राधावल्लभ लाल भजि, रसिकनि जीवन मूरि ॥15॥

रस बल छुटै न जो विषै, सुख नहिं पावै कोई ।
तन छाँडै मन गहि रहै, दूनौ दुख तहँ होइ ॥16॥

रस बल छूटै जौ विषै, तबहिं लहै सुख मूल ।
जैसैं आतप कौ तप्यौ, पावै सरिता कूल ॥17॥

विषै करत वय बीत गई, तृपित भयौ तउ नाहि ।
नैन अछत द्वै दीप धरि, परत कूप तम माहिं ॥18॥

जद्यपि तन जीरन भयौ, छुटी न मन की रीति ।
बिखरि पर्यौ सिमटत नहीं, इन्द्रिन लीन्हौं जीति ॥19॥

परनिंदा के किये ते, आवत नहिं कछु हाथ ।
मूरख पर्वत पाप कौ लै चल्यौ अपने साथ ॥20॥

भक्तनि निंदा अति बुरी, भूलि करौ जिनि कोइ ।
किये सुकृत सब जनम के, छिन में डारत खोइ ॥21॥

मत्सर-क्रोध भर्यौ रहै, अरु सहाइ अभिमान ।
बिनु पावक जरिबौ करै, महा-मूढ अग्यान ॥22॥

अब सुनि भजन की रीति कछु, होइ महादृढ धीर ।
कोऊ थाह न पावही, जहाँ नीर गंभीर ॥23॥

जाकौ जैसौ भाव है, मन में धरि विश्वास ।
कर्म-धर्म अरु लोक कुल, तोरै सब की आस ॥24॥

भक्त आहिं बहु भाँति के, तिनमें बहुतक भेद ।
बिनु विवेक मिलिबौ तहाँ, मन पावै अति खेद ॥25॥

सब ठाँ मिलिबौ एक सौ, ग्यानी की यह रीति ।
भजनी सोइ विवेक सों, करै समुझि कै प्रीति ॥26॥

खान पान तौ कीजिये, रसिक मंडली माहिं ।
जिनिकैं और उपासना, तहाँ उचित ध्रुव नांहि ॥27॥

रसिक रँगे जे युगल रंग, तिनकी जूँठन खाइ ।
जहाँ तहाँ के पावने, भजन तेज घटि जाइ ॥28॥

इष्ट मिलै अरु मन मिलै, मिलै भजन रस रीति ।
मिलिये तहाँ निसंक ह्वै, कीजै तिनसौं प्रीति ॥29॥

युगल प्रेम रस मगन जे, तेई अपनें जानि ।
सब बिधि अंतर खोलि कै, तिनिही सौं रूचि मानि ॥30॥

यह रस परस्यौ नाहिं जिनि, तू जिनि परसै ताहि ।
तासौं नातौ नाहिं कछु, यह रस रुचै न जाहि ॥31॥

संग सोई जाके मिले, भूलै गृह त्यौहार ।
तिहिं छिन आवै हिये में, अद्भुत युगल बिहार ॥32॥

जिनके देखै पुलक तन, रोमांचित ह्वै जाइ ।
सुनत मधुर तिनके बचन, नैंन भरे जल आइ ॥33॥

जिनकौ सहज सुभाव पर्यौ युगल रंग की बात ।
निशि दिन बीतैं भजन में, और न कछू सुहात ॥34॥

ऐसे भक्तनि के मिले, हिय अरु नैंन सिरात ।
मन दै नीकें समुझि कैं, सुनिये तिन की बात ॥35॥

जिनके युगल बिहार की बात चलै दिन रैंन ।
तिनहीं सौं सँग कीजिये, छाँडि और सब गैन ॥36॥

बहुत मिलै सो संग नहिं, न्यारी न्यारी भाँति ।
युगल प्रेम रस मगन जे, तेई अपनी पाँति ॥37॥

बहुत भाँति के मत जहाँ, तिनहिं न समुझौ संग ।
नव किशोरता माधुरी, बिना न अपनौ रंग ॥38॥

सोरठा
देखौ प्रेम बिलास, वृन्दावन घन कुंज मै ।
जिनकै यहै उपास, ऐसौ सङ्ग जु कीजियै ॥39॥

दोहा
नव किसोर सुकुँवार तन, रंगे प्रेम के रंग ।
जिनकै हिय में बसत ध्रुव, तिन सों करि ध्रुव संग ॥40॥

कठिन है रसिक अनन्यता, रहत न मन इक ठौर ।
राई के सम चलत ही, होत और की और ॥41॥

भजन न होई संग बिनु, भजन बिना नहिं प्रेम ।
छिनहूँ भजन न छाँडिये, धरिये ध्रुव ये नेम ॥42॥

महा मधुर रस प्रेम कौ, जिनकै लाग्यौ रंग ।
ऐसे रसिक अनन्य जे, कीजै तिनकौ संग ॥43॥

और भाव जिनकै नहीं, युगल विहार उपास ।
सुनि ध्रुव मन-वच-कर्म कै, ह्वै रहू तिनकौ दास ॥44॥

धर्मी ऐसौ चाहिये, जैसैं सूर रन माहिं ।
खंड खंड ह्वै जाइ तन, फिरि कै चितवत नाहिं ॥45॥

कबहूँ तौ थोरौ भजन, कबहूँ होत विशाल ।
मन कौ धीरज छुटै नहिं, गहै न दूजी चाल ॥46॥

कहा अचार अपरस कहा, कहा संजम व्रत नेम ।
कहा भजन विधि सौं विंध्यौ, जो नहिं परस्यौ प्रेम ॥47॥

भजन न करै निमित्त लै, परै सहज रस ढार ।
जैसे रोकी रुकत नहिं, प्रबल नदी की धार ॥48॥

भक्त न ऐसौ चाहिये, मन धीरज छुटि जाइ ।
सुख पाये फूलै अधिक, दुख पाये विललाइ ॥49॥

रहै धीर रस भजन में, व्यापै नहिं कछु और ।
होत पवन झकझोर बहु, गिरि नहिं छाड़ै ठौर ॥50॥

सूर सोइ रन भूमि कौं, तजै न जब लगि प्रान ।
भजनी ऐसौ चाहिये, उर नहिं आनै आन ॥51॥

महा मधुर रस प्रेम बिनु, परसै नहिं कछु और ।
ऐसे रसिक अनन्य जे, तेई मम सिरमौर ॥52॥

कहा न होइ सतसंग तें, देखौ तिल अरु तेल ।
मोल तोल सब फिरि गयौ, पायौ नाम फुलेल ॥53॥

और धरम साधन भजन, फीके बिनु अनुराग ।
जैसे बागौ बनत नहिं, जो न होइ सिर पाग ॥54॥

प्रेम बिना जो कछु करै, सो नहिं लागत नीक ।
विविध भाँति व्यंजन करौ, लौन बिना सब फीक ॥55॥

नवल किशोरी कुँवरि की, सहजहि ऐसी बानि ।
ताकौ संग न छाँड़हीं, नैकु सरन गहै आनि ॥56॥

प्रीतम हू कें प्रण यहै, प्रीति के बस ह्वै जाहिं ।
कोटि धर्म किन करौ कोऊ, तिन तन चितवत नाहिं ॥57॥

एक प्रान मन दोइ तन, अँखियनि की-सी प्रीति ।
यद्यपि न्यारी रहत हैं, देखति एकहि रीति ॥58॥

बाहाँ जोरी चलत दोऊ, रसिक लाड़िती लाल ।
देखौ ऐसी भाँति छबि, चितवनि नैन विशाल ॥59॥

औगुन करै समुद्र सम, गनत न अपनौ जान ।
राई के सम भजन कौं, मानत मेरु समान ॥60॥

ऐसे प्रभु त्रैलोक मनि, जिन न भजे चितलाइ ।
पशु पंछी ताकौं सबै, मानत अपनौ राइ ॥61॥

तिय सुत नाती नातिनी, तिनहीं तन चित दीय ।
श्री राधावल्लभलाल जू, नेकु न आने हीय ॥62॥

परयौ विषै के स्वाद में, ऐसौ रह्यौ लुभाई ।
तिहिं रस में वय बीति गई. गह्यौ काल तब आइ ॥63॥

अद्भुत युगल बिहार कौ, जिनके हिये विचार ।
सुनि ध्रुव तिनकी चरण रज, लै लै सिर पर धार ॥64॥

मन शिक्षा के कहे 'ध्रुव' दोहा साठ अरु चारि ।
जुगल चरन अरविंद रस, पलु पलु प्रतिहिं सँभारि ॥65॥

मन शिक्षा के सुनत ही, ढरयौ न नैननि नीर ।
पाठ भजन सब यौं भयौ, जैसे पढत है कीर ॥66॥

॥ जै जै श्री मन शिक्षा लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश ॥


4. श्री वृंदावन शत लीला

दोहा
प्रथम नाम हरिवंश हित, रटि रसना दिन रैन ।
प्रीति रीति तब पाइये, अरु वृन्दावन ऐन ।।1।।

चरन शरन हरिवंश की, जब लगि आयौ नाहिं ।
नवनिकुंज निजु माधुरी, क्यौं परसै मन माहिं ।।2।।

वृन्दावन सत करन कौं, कीन्हौं मन उत्साह ।
नवल राधिका कृपा बिनु, कैसैं होत निबाह ।।3।।

यह आशा धरि चित्त में, कहत यथा-मति मोर ।
वृन्दावन सुख रंग कौ, काहु न पायौ ओर ।।4।।

दुर्लभ दुर्घट सबनि तैं, वृन्दावन निजु भौन ।
नवल राधिका कृपा बिनु, कहि धौं पावै कौन ।।5।।

सबें अंग गुनहीन हों, ताकौ जतन न कोइ ।
एक किशोरी कृपा तें, जो कछु होइ सु होइ ।।6।।

सोऊ कृपा अति सुगम नहिं, ताकौ कौन उपाव ।
चरन शरन हरिवंश की, सहजहिं बन्यौ बनाव ।।7।।

हरिवंश चरन उर धरनि धरि, मन वच कै विश्वास ।
कुँवरि कृपा ह्वै है तबहिं, अरु वृन्दावन वास ।।8।।

प्रिया चरन बल जांनि कें, बाढ़्यौ हियैं हुलास ।
तेई उर में आनि हैं, वृन्दाविपिन प्रकास ।।9।।

कुँवरि किशोरी लाड़िली, करुणानिधि सुकुवारि ।
बरनौ वृन्दाविपिन कौं, तिनके चरन सँभारि ।।10।।

हेममयी अवनी सहज, रतन खचित बहु रंग ।
चित्रित चित्र विचित्र गति, छबि की उठति तरंग ।।11।।

वृन्दावन झलकनि झमक, फूले नेंन निहारि ।
रवि शशि दुतिधर जहाँ लगि, ते सब डारे वारि ।।12।।

वृन्दावन दुति पत्र की, उपमा कौं कछु नांहिं ।
कोटि-कोटि बैकुण्ठ हू, तेहिं सम कहे न जाहिं ।।13।।

लता-लता सब कल्पतरु, पारिजात सब फूल ।
सहज एक रस रहत हैं, झलकत यमुना कूल ।।14।।

कुंज-कुंज अति प्रेम सौं, कोटि-कोटि रति मैन ।
दिनहिं संवारत रहत हैं, श्री वृन्दावन ऐंन ।।15।।

विपिन राज राजत दिनहिं, बरसत आनंद पुंज ।
लुब्ध सुगन्ध पराग रस, मधुप करत मधु गुंज ।।16।।

अरुन नील सित कमल कुल, रहे फूलि बहुरंग ।
वृन्दावन पहिरैं मनौं बहुविधि बसन सुरंग ।।17।।

हित सौं त्रिविधि समीर बहै, जैसी रुचि जिहिं काल ।
मधुर-मधुर कल कोकिला, कूजत मोर मराल ।।18।।

मण्डित यमुना वारि यौं, राजति परम रसाल ।
अति सुदेस सोभित मनौं, नील मनिन की माल ।।19।।

विपिन धाम आनंद कौ, चतुरई चित्रित ताहि ।
मदन केलि सम्पति सदा, तेहि करि पूरन आहि ।।20।।

देवी वृंदा-विपिन की, वृंदा सखी सरूप ।
जेहि विधि रुचि होइ दुहुँनि की, तेहिं विधि करति अनूप ।।21।।

छिन-छिन बन की छबि नई, नवल युगल के हेत ।
समुझि बात सब जीय की, सखि वृंदा सुख देत ।।22।।

गावत वृंदा-विपिन गुन, नवल लाड़िली-लाल ।
सुखद लता फल फूल द्रुम, अद्भुत परम रसाल ।।23।।

उपमा वृंदा विपिन की, कहि धौं दीजै काहि ।
अति अभूत अद्भुत सरस, श्रीमुख बरनत ताहि ।।24।।

आदि अंत जाकौ नहीं, नित्य सुखद बन आहि ।
माया त्रिगुन प्रपंच की, पवन न परसत ताहि ।।25।।

वृंदा विपिन सुहावनौं, रहत एक रस नित्त ।
प्रेम सुरंग रंगै तहाँ, एक प्रान द्वै मित्त ।।26।।

अति सरूप सुकुँमार तन, नव किशोर सुखरासि ।
हरत प्रान सब सखिनि के, करत मंद मृदु हासि ।।27।।

न्यारौ है सब लोक तें, वृन्दावन निज गेह ।
खेलत लाड़िली लाल जहँ भींजे सरस सनेह ।।28।।

गौर-श्याम तन मन रंगे, प्रेम स्वाद रस सार ।
निकसत नहिं तिहिं ऐन तें, अटके सरस विहार ।।29।।

बन है बाग सुहाग कौ, राख्यौ रस में पागि ।
रूप रंग के फूल दो, प्रीति लता रहे लागि ।।30।।

मदन सुधा के रस भरे, फूलि रहे दिन रैन ।
चहुँदिशि भ्रमत न तजत छिन, भृंग सखिनि के नैंन ।।31।।

कानन में रहै झलकि कैं, आनन विवि विधु काँति ।
सहज चकोरी सखिनि की, अखियाँ निरखि सिराँति ।।32।।

ऐसे रस में दिन मगन, नहिं जानत निशि भोर ।
वृन्दावन में प्रेम की, नदी बहै चहुँ ओर ।।33।।

महिमा वृन्दाविपिन की, कैसैं कै कहि जाइ ।
ऐसे रसिक किशोर दोऊ, जामें रहे लुभाइ ।।34।।

विपिन अलौकिक लोक में, अति अभूत रसकंद ।
नव किशोर इक वैस द्रुम, फूले रहत स्वछंद ।।35।।

पत्र-फूल-फल-लता प्रति, रहत रसिक पिय चाहि ।
नवल कुँवरि दृग छटा जल, तिहि करि सींचे आहि ।।36।।

कुँवरि चरन अंकित धरनि, देखत जेहि-जेहि ठौर ।
प्रिया चरन रज जांनि कैं, लुठत रसिक सिरमौर ।।37।।

वृन्दावन प्यारौ अधिक, यातें प्रेम अपार ।
जामें खेलति लाड़िली, सर्वसु प्रान अधार ।।38।।

सबै सखी सब सौंज लै, रँगी युगल ध्रुव रंग ।
समै-समै की जानि रुचि, लियै रहति हैं संग ।।39।।

वृन्दावन वैभव जितौ, तितौ कह्यौ नहिं जात ।
देखत संपति विपिन की, कमला हू ललचात ।।40।।

वृन्दावन की लता सम, कोटि कल्पतरु नाहिं ।
रज की तुल बैकुंठ नहिं, और लोक किहिं माहिं ।।41।।

श्रीपति श्रीमुख सौ कह्यौं, नारद सौं समुझाइ ।
वृन्दावन रस सबनि तें, राख्यौ दूरि दुराइ ।।42।।

अंशकला अवतार जे, ते सेवत हैं ताहि ।
ऐसे वृन्दाविपिन कौं, मन-वच कै अवगाहि ।।43।।

शिव बिधि उद्धव सबनि के, यह आसा है चित्त ।
गुल्म लता ह्वै सिर धरैं, वृन्दावन रज नित्त ।।44।।

चतुरानन देख्यौ कछुक, वृन्दाविपिन प्रभाव ।
द्रुम-द्रुम प्रति अरु लता प्रति, औरै बन्यौ बनाव ।।45।।

आप सहित सब पचुर्भुज, सब ठाँ रह्यौ निहारि ।
प्रभुता अपनी भूलि गयौ, तन मन कै रह्यौ हारि ।।46।।

लोक चतुर्दश ठकुरई, संपत्ति सकल समेत ।
सब तजि बसि वृन्दाविपिन, रसिकन कौ रस खेत ।।47।।

सकहि तौ वृन्दाविपिन बसि, छिन-छिन आयु बिहात ।
ऐसौ समै न पाइये, भली बनी है बात ।।48।।

छाँड़ि स्वाद सुख देह के और जगत की लाज ।
मनहिं मारि तन हारि कै, वृन्दावन में गाज ।।49।।

वृन्दावन के बसत ही, अंतर जो करै आनि ।
तिहि सम शत्रु न और कोऊ, मन वच कै यह जानि ।।50।।

वृन्दावन के वास कौ, जिनकैं नाहिं हुलास ।
माता मित्र सुतादि तीय, तजि ध्रुव तिनकौ पास ।।51।।

और देश के बसत ही, अधिक भजन जों होइ ।
इहि सम नहिं पूजत तऊ, वृन्दावन रहै सोइ ।।52।।

वृन्दावन में जो कबहुँ, भजन कछू नहिं होय ।
रज तौ उड़ि लागै तनहिं, पीवै यमुना तोय ।।53।।

वृन्दाविपिन प्रभाव सुनि, अपनौ ही गुन देत ।
जैसैं बालक मलिन कौं, मातु गोद भरि लेत ।।54।।

और ठौर जो जतन करै, होत भजन तऊ नाहिं ।
ह्याँ फिरै स्वारथ आपनैं, भजन गहैं फिरै बाँहिं ।।55।।

और देश के बसत ही, घटत भजन की बात ।
वृन्दावन में स्वारथौ, उलटि भजन ह्वै जात ।।56।।

यद्यपि सब औगुन भर्यौ, तदपि करत तुव ईठ ।
हितमय वृन्दाविपिन कौं, कैसैं दीजै पीठ ।।57।।

वृन्दावन तें अनत ही, जेतिक द्यौस विहात ।
ते दिन लेखे जिनि लिखौ, वृथा अकारथ जात ।।58।।

भजन रसमयी विपिन घर, समुझि बसै जो कोइ ।
प्रेम-बीज तिहिं खेत तें, तब ही अंकुर होइ ।।59।।

यद्यपि धावत विषै कौं, भजन गहत बिच पानि ।
ऐसे वृंदाविपिन की, सरन गही ध्रुव आनि ।।60।।

बसिबौ वृदाविपिन कौ, जिहिं तिहिं विधि दृढ़ होइ ।
नहिं चूकै ऐसौ समौ, जतन कीजियै सोइ ।।61।।

कहँ तू कहँ वृदाविपिन, आनि बन्यौ भल बान ।
यहै बात जिय समुझि कै, अपनौ छाँड़ि सयान ।।62।।

छिन भंगुर तन जात है, छाँड़हि विषै अलोल ।
कौड़ी बदले लेहिं तू, अद्भुत रतन अमोल ।।63।।

कोटि-कोटि हीरा रतन, अरू मनि विविध अनेक ।
मिथ्या लालच छाँड़ि कै, गहि वृन्दावन एक ।।64।।

नहिं सो माता पिता नहिं, मित्र पुत्र कोऊ नाहिं ।
इनमें जो अंतर करै, बसत वृन्दावन माँहि ।।65।।

नाते जेते जगत के, ते सब मिथ्या मानि ।
सत्य नित्य आनंदमय, वृन्दावन पहिचानि ।।66।।

बसि कै वृंदाविपिन में, ऐसी मन में राख ।
प्रान तजौं बन ना तजौं, कहौ बात कोऊ लाख ।।67।।

चलत फिरत सुनियत यहै, (श्री) राधावल्लभ लाल ।
ऐसे वृन्दाविपिन में, बसत रहौ सब काल ।।68।।

बसिबौं वृंदाविपिन कौ, यह मन में धरि लेहु ।
कीजै ऐसौ नैंम दृढ़, या रज में परै देहु ।।69।।

खंड-खंड ह्वै जाइ तन, अंग-अंग सत टूक ।
वृन्दावन नहिं छाँड़िये, छाँड़िबौ है बड़ि चूक ।।70।।

पटतर वृंदाविपिन की, कहि धौं दीजै काहि ।
जेहि वन की ध्रुव रैंनु में, मरिबौउ मंगल आहि ।।71।।

वृन्दावन के गुननि सुनि, हित सौं रज में लोटि ।
जेहि सुख कौं पूजत नहीं, मुक्ति आदि सत कोटि ।।72।।

सुरपति-पशुपति प्रजापति, रहे भूलि तेहिं ठौर ।
वृन्दावन वैभव कहौ, कौन जानि है और ।।73।।

यद्यपि राजत अवनि पर, सब तें ऊँचै आहि ।
ताकी सम कहियै कहा, श्रीपति बंदत ताहि ।।74।।

वृन्दावन वृंदाविपिन, वृंदा-कानन ऐन ।
छिन-छिन रसना रट्यौ करि, वृन्दावन सुख दैन ।।75।।

वृन्दावन आनंद-घन, तो तन नश्वर आहि ।
पशु ज्यौं खोवत विषै रस, काहि न चिंतत ताहि ।।76।।

वृन्दावन वृंदा कहत, दुरित वृंद दुरि जाहिं ।
नेह बेलि रस भजन की, तब उपजै मन माहिं ।।77।।

वृन्दावन श्रवननि सुनहिं, वृन्दावन कौ गान ।
मन बच कै अति हेत सौं, वृंदावन उर आन ।।78।।

वृन्दावन कौ नाम रटि, वृन्दावन कौं देखि ।
वृन्दावन सौं प्रीति करि, वृन्दावन उर लेखि ।।79।।

वृंदाविपिन प्रनाम करि, वृन्दावन सुख खानि ।
जो चाहत विश्राम ध्रुव, वृन्दावन पहिचानि ।।80।।

तजि कैं वृंदाविपिन कौं, और तीर्थ जे जात ।
छाँड़ि विमल चिंतामणी, कौड़ी कौं ललचात ।।81।।

पाइ रतन चीन्ह्यौ नहीं, दीन्हौं कर तैं डारि ।
यह माया श्री कृष्ण की, मोह्यौ सब संसार ।।82।।

प्रगट जगत में जगमगै, वृंदाविपिन अनूप ।
नैन अछत दीसत नहीं, यह माया कौ रूप ।।83।।

वृन्दावन कौ जस अमल, जिहि पुरान में नाहिं ।
ताकी बानी परौ जिनि, कबहूँ श्रवननि माँहि ।।84।।

वृन्दावन कौ जस सुनत, जिनकैं नाहिं हुलास ।
तिनकौ परस न कीजिये, तजि ध्रुव तिनकौ पास ।।85।।

भुवन चतुर्दश आदि दै, ह्वै है सब कौ नास ।
इकछत वृंदाविपिन घन, सुख कौ सहज निवास ।।86।।

वृंदावन इहि विधि बसै, तजि कैं सब अभिमान ।
तृण तैं नीचै आपकौं, जानै सोई जान ।।87।।

कोमल चित सब सौं मिलै, कबहुँ कठोर न होइ ।
निस्प्रेही निरवैरता, ताकौ शत्रु न कोइ ।।88।।

दूजै तीजै जो जुरै, साक-पत्र कछु आय ।
ताही सौं संतोष करि, रहै अधिक सुख पाय ।।89।।

देह स्वाद छुटि जाहिं सब, कछु होइ छीन शरीर ।
प्रेम रंग उर में बढ़ै, बिहरै जमुना तीर ।।90।।

युगल रूप की झलक उर, झलकै नैननि बारि ।
ऐसे सुख के रंग में, राखै मनहि रँगाइ ।।91।।

आवै छबि की झलक उर, झलकै नैननि बारि ।
चिंतत स्यामल-गौर तन, सकहि न तनहिं सँभारि ।।92।।

जीरन पट अति दीन लट, हिये सरस अनुराग ।
विबस सघन वन में फिरै, गावत युगल सुहाग ।।93।।

रसमय देखत फिरै बन, नैननि बन रहै आइ ।
कहुँ-कहुँ आनँद रंग भरि, परै धरनि थहराइ ।।94।।

ऐसी गति ह्वै है कबहुँ, मुख निसरत नहिं बैन ।
देखि-देखि वृंदाविपिन, भरि-भरि ढारै नैन ।।95।।

वृन्दावन तरु-तरु तरे, ढरै नैन सुख नीर ।
चिंतत फिरै आवेस बस, स्यामल-गौर सरीर ।।96।।

परम सच्चिदानंद घन, वृंदाविपिन सुदेश ।
जामें कबहूं होत नहिं, माया काल प्रवेश ।।97।।

शारद जो सत कोटि मिलि, कलपन करैं विचार ।
वृन्दावन सुख रंग कौ, कबहुँ न पावैं पार ।।98।।

वृन्दावन आनंद घन, सब तें उत्तम आहि ।
मो ते नीच न और कोऊ, कैसे पैहों ताहि ।।99।।

इत बौना आकाश फल, चाहत है मन माहिं ।
ताकौ एक कृपा बिना, और जतन कछु नाहिं ।।100।।

कुँवरि किशोरी नाम सौं, उपज्यौ दृढ़ विस्वास ।
करुनानिधि मृदु चित्त अति, तातैं बढ़ी जिय आस ।।101।।

जिनकौ वृन्दाविपिन है, कृपा तिनहिं की होइ ।
वृन्दावन में तबहि तौ, रहन पाइ है सोइ ।।102।।

वृन्दावन सत रतन की, माला गुही बनाइ ।
भाल भाग जाके लिखी, सोई पहिरै आइ ।।103।।

वृन्दावन सुख रंग की, आशा जो चित होइ ।
निशि दिन कंठ धरे रहै, छिन नहिं टारै सोइ ।।104।।

वृन्दावन सत जो कहै, सुनि है नीकी भाँति ।
निसि दिन तिहिं उर जगमगै, वृन्दावन की काँति ।।105।।

वृन्दावन कौ चिंतबन, यहै दीप उर बारि ।
कोटि जन्म के तम अघहिं, काटि करै उजियारि ।।106।।

बसि कै वृंदाविपिन में, इतनौ बड़ौ सयान ।
युगल चरण के भजन बिन, निमिष न दीजै जान ।।107।।

सहज विराजत एक रस, वृन्दावन निज धाम ।
ललितादिक सखियन सहित, क्रीड़त श्यामा श्याम ।।108।।

प्रेम सिंधु वृंदाविपिन, जाकौ अन्त न आदि ।
जहाँ कलोलत रहत नित, युगल किशोर अनादि ।।109।।

न्यारो चौदह लोक तें, वृन्दावन निजु भौन ।
तहाँ न कबहुँ लगत है, महाप्रलय की पौन ।।110।।

महिमा वृंदाविपिन की, कहि न सकत मम जीह ।
जाके रसना द्वै सहस, तिन हूँ काढ़ी लीह ।।111।।

एती मति मोपै कहाँ, शौभा निधि वनराज ।
ढीठौ कै कछु कहत हौं, आवत नहिं जिय लाज ।।112।।

मति प्रमान चाहत कह्यौ,सोऊ कहत लजात ।
सिन्धु अगम जेहिं पार नहिं, कैसैं सीप समात ।।113।।

या मन के अबलंब हित, कीन्हौ आहि उपाय ।
वृन्दावन रस कहन में, मति कबहूँ उरझाय ।।114।।

सोलह सै ध्रुव छ्यासिया, पून्यौ अगहन मास ।
यह प्रबन्ध पूरन भयौ, सुनत होत अघ नास ।।115।।

वृंदाविपिन के, इकसत षोड़स आहि ।
जो चाहत रस रीति फल, छिन-छिन ध्रुव अवगाहि ।।116।।

॥ जै जै श्री वृंदावनशत लीला की जैजै श्रीहित हरिवंश ॥


5. ख्याल हुल्लास लीला

दोहा
दोहा ख्याल हुलास मन, कछु इक कीनें आहि ।
प्रेम छटा जिहिं उर चढ़ी, सो 'ध्रुव' समुझे ताहि ॥1॥

प्रीति समान न और सुख, दुखहू होत अपार ।
मिलिबौ सुख दुख बिछुरिबौ, यह कीनौं निरधार ॥2॥

बिनु देखैं तलफत रहै, क्यौं पावै चित चैन ।
वदन रूप जलपान कौं, प्यासे हैं दोउ नैंन ॥3॥

अब सुनि इक इक घरी तौ, कलपन की सम होत ।
तिहिं दुख लिखिबे कौं कहूँ, नहिं कागद नहिं दोत ॥4॥

कठिन पीर पिय विरह की, लगे प्रेम के बान ।
अब तौ चाहत है चल्यौ, रहि न सकत इहि प्रान ॥5॥

महा प्रेम निजु मधुर अति, सब तें न्यारौ आहि ।
तहाँ न मिलिबौ बिछुरिबौ, जीवत रूपहिं चाहि ॥6॥

यह रस नित्य-विहार बिनु, सुन्यौ न देख्यौ नैंन।
एक प्रीति वय रूप दोऊ, बिलसत इक रस मैन ॥7॥

नैंना तौ अटके जहाँ, तहाँ न बिछुरन होइ।
इक रस अद्भुत प्रेम के, सुखहि लहै दिन सोइ ॥8॥

नवल बिमल रस प्रेम कौ, जिनकैं सहजहिं ढार ।
तिनके हियमें चलत रहै, सुख प्रवाह की धार ॥9॥

दोहा
युगल प्रेम रसमाधुरी, तहाँ न अटकै चित्त ।
चखत फिरै माया फलनि, तहाँ रहै दुःख नित्त ॥10॥

जहाँ-जहाँ चित लागि है, तहाँ-तहाँ दुख राशि।
जब लगि मन परि है नहीं, युगल प्रेम की पाशि ॥11॥

युगल रूप तन विपिन जहँ, तहाँ न अटकै जाइ ।
देखि विषै विष छिनक सुख, तिहि ठाँ रह्यौ लुभाइ ॥12॥

मूरख मन समुझत नहीं, नवल रूप निधि पाय ।
फीकौ छिल्लर विषै कौ, तहाँ धँसत है धाय ॥13॥

सोऊ कर आवत नहीं, बनत न एकौ बात।
बिचहीं दुख पावत फिरत, दुहूँ ओर तें जात ॥14॥

जहाँ-जहाँ चित्त दीजिये, तहाँ-तहाँ दुख मूल ।
तहाँ न अरुझै जाइ कै, सदा रहै सुख फूल ॥15॥

अनत अटक नाहिंन भली, यह समुझै सब कोइ ।
लहै न मन कौं जो रुचै, फिरि-फिरि दुख ही होइ ॥16॥

और विषै रस पाइये, सोऊ दुख करि जानि ।
तहाँ न दीजै चित्त 'ध्रुव', यह कह्यौ मेरौ मानि ॥17॥

दोहा
अब तौ ऐसी चित्त धरि, जुगल चरन रँग राँचि ।
महामाधुरी केलि गुन, छिन छिन गाय अरु नाचि ॥18॥

सुनि 'ध्रुव' ऐसी चाहियै, छाँड़ि जगत की रीति ।
युगल चरन कोमल सुरँग, तिनहीं सौं करि प्रीति ॥19॥

अब तौ आहि यहै भली, सबतैं मोह मिटाय।
रसिक अनन्यन संग गहि, श्यामा-श्याम लड़ाय ॥20॥

अब तौ करनौ है यहै, वृंदावन करि बास ।
युगल चरन छबि रंग रँगि, सब तें होइ उदास ॥21॥

तन मन कै बन सेइये, या पर नहिं मत और ।
विहरत जहाँ सुकुमार दोऊ, अद्भुत श्यामल गौर ॥22॥

सोरठा
सुनि लै मेरी बात, युगल चरन चित लाइयै ।
जौ चूक्यौ यह घात, फिरि पाछैं पछिताइहै ॥23॥

अब तै वय सब बीति गई, अरु जु रही सोऊ जाति।
द्यौस न कछुवै करि सक्यौ, अब जिनि खोवै राति ॥24॥

पंगु होइ सब ओर तें, अटकै विवि छबि माँहि ।
तबही तौ पावै सुखहिं, और विषै छुटि जाहिं ॥25॥

अब की देही मनुज की, पाई है किहुँ भाग ।
युगल चंद पद कमल सौं, कीजै 'ध्रुव' अनुराग ॥26॥

समुझत नहिं देखत सुनत, घटति नाहिं ललचानि ।
जैसे खोटे तुरँग की, मिटत न मन की बानि ॥27॥

सुख तौ सोई जानिबौ, इक रस रहै दिन साथ।
सो सुख दुख सम जानिये, जो होइ पराये हाथ ॥28॥

नख - शिख लौं भूषन जिते, अंगनि छबिहि निहारि ।
सुख सीवाँ माधुर्य रस, छिन छिन यहै विचारि ॥29॥

जाकै यह संपति सदा, सोई धनी जग माहिं।
ताकै माया काल की, पवनहुँ परसत नाहिं ॥30॥

कुंज भवन रचना रुचिर, सेज सुरंग अनूप ।
ता पर बैठे देखि 'ध्रुव' अद्भुत सहज सरूप ॥31॥

दोहा
जाके नैंननि झलकि रहे, गौर-श्याम अभिराम ।
तिनहीं 'ध्रुव' यह देह धरि, पायौ है विश्राम ॥32॥

दोहा
रूप सिंधु में पैठि 'ध्रुव', जो मन सकहि सँभारि ।
प्रेम रतन तब कर परै, विषया-विष दै डारि ॥33॥

ग्यान भजन जो करहु बहु, कौन करै बकवाद ।
विविध भाँति विंजन करौ, लौन बिना नहिं स्वाद ॥34॥

प्यार बिना नहिं सोहई, करौ भजन बहु ग्यान ।
दीपक बहु इकठौर है, होत न भान समान ॥35॥

बहुत भाँति लै चतुरई, करौ भजन की बात।
रंच प्रेम की छटा बिनु, सब नीरस ह्वै जात ॥36॥

पानिप मोती की यथा, ऐसौ भजन सनेह ।
जाके उर झलकत रहै, तिनहिं धरी 'ध्रुव' देह ॥37॥

करत भजन विधि सौं बिंध्यौ, अरु अचार बहुतेर ।
प्रेम छटा की झलक बिनु, होत है सब अंधेर ॥38॥

प्रेम छटा रंचक नहीं, विधि कौ भजन अपार ।
स्वादी स्वाद न पावही, घृत बिनु ज्यौं ज्यौनार ॥39॥

प्रेम आँच के लगत ही, ढरकि चलत मन मैन।
हियौ छकै तन पुलकि ह्वै, भरि-भरि ढारै नैन ॥40॥

अपरस ग्यान समान जम, भजन धर्म आचार ।
पाहन कबहुँ न होइ मृदु, पर्यौ रहै जलधार ॥41॥

बहु रँग माया विपिन घन, तहाँ फिरै सुख मानि ।
ऐंचि खँचि या मन मृगहि, गहि सतसंगहि आनि ॥42॥

मन तें चंचल नाहिं कछु, नैंकु न कहुँ ठहरात ।
तब ही तौ 'ध्रुव' होत बस, परै प्रेम की घात ॥43॥

बिचल्यौ फिरै भली नहीं, प्रेम गली छुटि जाइ ।
रहै एक ही ठौर लगि, युगल चरन चित लाइ ॥44॥

प्रेम रंग सौं रँगे जे, नहिं आनत उर आन।
अद्भुत युगल विहार रस, तेई करिहैं पान ॥45॥

घाइल कबहूँ नहिं भयौ, नवल नेह के तीर ।
अटक बिना ध्रुव खटक नहिं, कहा जानै पर पीर ॥46॥

दोहा
चढ़ि कै मैन तुरंग पर, चलिबौ पावक माँहि
प्रेम-पंथ ऐसौ कठिन, सब कोउ निबहत नाहिं ॥47॥

पर्यौ न रूप प्रवाह में, परस्यौ नहिं उर नेह ।
सुनि 'ध्रुव' तिनि या जगत में, धरी बाद ही देह ॥48॥

प्रेम प्रकार अनेक विधि, तिनमें उत्तम भाँति ।
अद्भुत चरित दुहूँनि के, जिनके उर झलकाँति ॥49॥

प्रेम भानु के उदय तें, मिटत है भ्रम सब केर ।
खंड-खंड ह्वै जाइ 'ध्रुव', माया-मोह अँधेर ॥50॥

जहाँ प्रीतम तिहिं देश की, प्यारी लागत पौन ।
प्रेम छटा जाने बिना, यह सुख समुझे कौन ॥51॥

नव किशोरता माधुरी, दंपति रूप निहारि ।
तेहिं सुख के 'ध्रुव' निमिष पर, ज्ञान मुक्ति सब वारि ॥52॥

दोहा
जाकौ हीयौ सरस नहिं, क्यौं समुझै रस रीति ।
बिनु अनुभव जानैं कहा, कैसी होति है प्रीति ॥53॥

मन न मिल्यौ तन निकट ह्वै, तहाँ कहा सुख होइ।
बिनु गुन मन-मनियाँ कहौ, कैसें लीजै पोइ ॥54॥

ग्यान बिना पशु हू कछू, समुझत प्रीति कौ रंग ।
मोह बँध्यौ पाछै फिरै, तजै न कबहूँ संग ॥55॥

ग्यान सहित नर देह वर, भरत खंड में होइ ।
जो नहिं समुझ्यौ प्रेम रस, ताकौं रहियै रोइ ॥56॥

प्रेमी मलिन न होइ 'ध्रुव' जाकौ उज्वल हीय ।
इक रस जाके उर बसै, रसिक लाड़िली -पीय ॥57॥

दोहा
अब ध्रुव ऐसी चाहिये, सबही तें मन फेरि ।
कै रसिकन कौ संग गहि, युगल चन्द छबि हेरि ॥58॥

दोहा ख्याल हुलास के, तहाँ प्रबन्ध कछु नाहिं ।
आगैं पाछें हैं भये, जो आये उर माँहिं ॥59॥

उलटौ पंथ है प्रेम कौ, तहाँ रह्यौ मन हारि ।
यशहू सुनि लागत बुरौ, मीठी लागति गारि ॥60॥

॥जै जै श्री ख्याल हुल्लास लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश ॥


6. भक्त नामावली

दोहा
(श्री) हरिवंश नाम ध्रुव कहत ही बाढ़ै आनँद-बेलि ।
प्रेम-रंग उर जगमगै, युगल नवल रस-केलि ॥01॥

निगम ब्रह्म परसत नहीं, जो रस सब तें दूरि ।
कियौ प्रकट हरिवंश जू, रसिकनि जीवन-मूरि ॥02॥

(श्री) वनचंद्र चरन अबुंज भजहि, मन क्रम बचन प्रतीति ।
वृंदावन निज प्रेम की, तब पावै रस-रीति ॥03॥

(श्री) कृष्णचंद के कहत ही, मन को भ्रम मिटि जाइ ।
विमल भजन सुख सिंधु में, रहै चित्त ठहराइ ॥04॥

(श्री) गोपीनाथ पद उर धरैं, महा गोप्य रस- सार ।
बिनु विलम्ब आवै हियें, अद्भुत युगल-विहार ॥05॥

पति, कुटुम्ब देखत सबै, घूँघट-पट दिये डारि ।
देह-गेह बिसर्यौ तिनहिं, (श्री) मोहन रूप निहार ॥06॥

धीर गंभीर समुद्र सम, सील सुभाव अनूप ।
सब अँग सुन्दर हँसत मुख, अद्भुत सुखद सरूप ॥07॥

दोहा
शुक, नारद, उद्धव, जनक, प्रह्लादिक, सनकादि ।
ज्यौं हरि आपुन नित्य हैं, त्यौं ये भक्त अनादि ॥08॥

प्रकट भयौ जयदेव मुख, अद्भुत गीत गोविंद ।
कयौ महा सिंगार रस, सहित प्रेम-मकरंद ॥09॥

अरिल्ल
पद्मावति जयदेव, प्रेम, बस कीने मोहन ।
अष्टपदी जो कहै, सुनत फिरैं ताके गोहन ॥10॥

दोहा
श्रीधर स्वामी तौ मनौं, श्रीधर प्रकटे आनि ।
तिलक भागवत कियौ रचि, सब तिलकनि परमानि ॥11॥

रसिक अनन्य हरिदास जू, गायौ नित्य विहार ।
सेवा हू में दूरि किए, विधि-निषेध जंजार ॥12॥

सघन निकुंजनि रहत दिन, बाढ्यौ अधिक सनेह ।
एक बिहारी हेत लगि छाँड़ि दिये सुख-गेह ॥13॥

रंक छत्र-पति काहु की, धरी न मन परवाह ।
रहे भींजि रस भजन में, लीने कर करुवाह ॥14॥

बल्लभ-सुत विठ्ठल भये, अति प्रसिद्ध संसार ।
सेवा विधि जिहिं समय की, कीनी तिहि व्यौहार ॥15॥

राग-भोग अद्भुत विविध, जो चहियै जिहि काल ।
दिनहिं लड़ाये हेत सौं गिरधर श्री गोपाल ॥16॥

गौड़ देस सब उद्धर्यौ, प्रकट कृष्ण चैतन्य ।
तैसेहि नित्यानंदहू, रस में भये अनन्य ॥17॥

पावत ही तिनकौ दरस, उपजै भजनानन्द ।
बिनु ही श्रम छुटि जाहिं सब, जे माया के फन्द ॥18॥

रूप- सनातन मन बढ्यौ, राधा-कृष्ण अनुराग ।
जानि विश्व नश्वर सबै, तब उपज्यौ बैराग ॥19॥

विष समान तजि विषै-सुख, देश सहित परिवार ।
वृन्दावन कौं यौं चले, ज्यौं सावन जल-धार ॥20॥

तृन तैं नीचौ आपकौं, जानि बसे बन माहिं ।
मोह छाँड़ि ऐसैं रहे, मनौ चिन्हारिहु नाहिं ॥21॥

अरिल्ल
रघुनन्दन सारंग जीव, तिन पाछैं आये ।
कृष्ण कृपा करि सबै, आनि निज धाम बसाये ॥22॥

दोहा
भजन रसिक रघुनाथजी, राधा-कुण्ड स्थान ।
लौंन तक्र ब्रज को लियौ, परस्यौ नहिं कछु आन ॥23॥

वंदन करिकै चिंतवन, गौर-श्याम अभिराम ।
सोवतहू रसना रटै, राधा-कृष्ण सुनाम ॥24॥

श्री बिलास, ब्रजनाथ अरु, श्री चंद, मुकुंद प्रवीन ।
मदन मोहन पद कमल सौं, अधिक प्रीति तिन कीन ॥25॥

महा पुरुष नन्दन भये, करि तन सकल सिंगार ।
सखी-रूप चिंतत फिरैं, गौर-श्याम सुकुमार ॥26॥

नैंन सजल तिहिं रंग में, चित पायौ विश्राम।
विबस वेग ह्वै जात सुनि, लाल-लाड़िली नाम ॥27॥

श्री कृष्णदास हुते जंगली, तेऊ तैसी भाँति ।
तिनके उर झलकत रहे, हेम नील-मनि काँति ॥28॥

युगल प्रेम-रस अवधि में, परयौ प्रबोध मन जाइ।
वृंदावन रस माधुरी, गाई अधिक लड़ाइ ॥29॥

अति विरक्त संसार ते, बसे विपिन तजि भौन।
प्रीति सहित गोपाल भट, सेये राधा-रौन ॥30॥

घमंडी रस में घमड़ि रह्यौ, वृंदावन निज धाम ।
बंशीवट-तट वास किय, गाये श्यामा-श्याम ॥31॥

भट्ट नरायन अति सरस, ब्रज मंडल सौं हेत ।
ठौर-ठौर रचना करी, प्रकट कियौ संकेत ॥32॥

अरिल्ल
वर्द्धमान श्रीभट्ट अरु गंगल ब्रज वृंदावन गायौ ।
करि प्रतीति सर्वोपरि जान्यौ, तातें चित्त लगायौ ॥33॥

भट्ट गदाधर नाथ भट्ट, बिद्या-भजन प्रवीन ।
सरस कथा बानी मधुर, सुनि रुचि होत नवीन ॥34॥

गोविंद स्वामी गंग अरु, बिष्नु विचित्र बनाइ ।
पिय-प्यारी कौ जस कह्यौ, राग रंग सौं छाइ ॥35॥

मन-मोहन सेवा अधिक कीनी है रघुनाथ ।
न्यारीयै रस-भजन की, बात परी तेहि हाथ ॥36॥

गिरिधर स्वामी पर कृपा, बहुत भई दई कुंज ।
रसिक-रसिकनी कौ सुजस, गायौ तिहि सुख पुंज ॥37॥

विठ्ठल बिपुल बिनोद रस, गाई अद्भुत केलि ।
बिलसत लाड़िली-लाल सुख, अंसनि पर भुज मेलि ॥38॥

बिहारीदास निजु एक रस, ज्यौं स्वामी की रीति ।
निर्वाही पाछैं भली तोरी सब सौं प्रीति ॥39॥

मत्त भयौ रस रंग में, करी न दूजी बात ।
बिनु बिहार निजु एक रस, और न कछू सुहात ॥40॥

भर किशोर दोउ लाड़िले, नवल-प्रिया नव-पीय ।
प्रकट देखियत जगमगे, रसिक व्यास के हीय ॥41॥

कहनी-करनी करि गयौ, एक व्यास इहि काल ।
लोक वेद तजि कै भजे, (श्री) राधाबल्लभ लाल ॥42॥

प्रेम मगन नहि गन्यौ कछु, बरनाबरन बिचार ।
सबनिं मध्य पायौ प्रगट, लै प्रसाद रस सार ॥43॥

सेवक की सर को करै, भजन सरोवर हंस ।
मन बच कै धरि एक व्रत, गाये श्रीहरिवंश ॥44॥

वंश बिना हरिनाम हूँ, लियौ न जाकैं टेक ।
पावै सोई वस्तु कौं, जाकैं है व्रत एक ॥45॥

कहा कहौं नहिं कहि सकत, नरवाहन को भाग ।
श्री मुख जाकौ नाम धर्यौ, निजु बानी अनुराग ॥46॥

अति अनन्य निजु धर्म में, नाइक रसिक मुकुंद ।
बसे विपिन रस भजन कै, छाँड़ि जगत दुख-द्वंद ॥47॥

परम भागवत अति भये, भजन माँहि दृढ़ धीर ।
चतुर्भुज वैष्णवदास की, बानी अति गंभीर ॥48॥

सकल देश पावन कियौ, भगवत-जसहिं बढ़ाइ ।
जहाँ-तहाँ निजु एक रस, गाई भक्ति लड़ाइ ॥49॥

परमानन्द किशोर दोऊ, संत मनोहर खेम ।
निर्वाह्यौ नीकैं सबनि, सुंदर भजन कौ नेम ॥50॥

छाँड़ि मोह, अभिमान सब, भक्तन सौं अति दीन।
वृन्दावन बसिकै तिनहिं, फिरि मन अनत न कीन ॥51॥

लालदास स्वामी सरस, जाकैं भजन अनूप ।
बरन्यौ अति दृढ़ अक्षरनि, लाल-लाड़िली रूप ॥52॥

अधिक प्यार है भजन सों, और न कछू सुहात ।
कहत सुनत भगवत् जसहि, निसि दिन जाहि बिहात ॥53॥

बालकृष्ण गति कहा कहौं, कैसेहुँ कहत बनै न।
रूप लाड़ली-लाल कौ, झलमलात तेहि नैंन ॥54॥

अति प्रवीन पंडित अधिक, लेश गर्व कौ नाहिं ।
कीनी सेवा मानसी, निसि-दिन मन तेहि माहिं ॥55॥

ग्यानू नाहरमल्ल की, देखी अद्भुत रीति ।
हरिवंश चंद पद कमल सौं, बाढ़ी दिन-दिन प्रीति ॥56॥

कहा कहौं मोहनदास-रति, ताकी गति भई आन।
व्यासनन्द अन्तर सुनत, तजे तिही छिन प्रान ॥57॥

बिट्ठलदास मुरली धरनि, चरण सेये सब काल ।
तैसेहि लाल गोपाल जी, गाये ललना लाल ॥58॥

सुन्दर मन्दिर की टहल, कीनी अति रुचि मानि।
सफल करी संपति सकल, लगी ठिकाने आनि ॥59॥

अंगीकृत ताकौं कियौ, परम रसिक सिरमौर ।
करुणा निधि बहु कृपा करि, दीनी सनमुख ठौर ॥60॥

बड़ौ उपासक गौड़िया, नाम गोसाईं दास ।
एक चरन बनचन्द बिनु, जाकैं और न आस ॥61॥

नेही नागरीदास अति, जानत नेह की रीति ।
दिन दुलराई लाड़िली, लाल रँगीली प्रीति ॥62॥

व्यासनन्द पद कमल सौं, जाकै दृढ़ विश्वास ।
जेहि प्रताप यह रस कह्यौ, अरु बृन्दावन बास ॥63॥

भली भाँति सेयौ विपिन, तजि बन्धुनि सौं हेत ।
सूर भजन में एक-रस, छाँड्यौ नाहिंन खेत ॥64॥

बिहारी दास दम्पति जुगल, माधौ परमानन्द ।
वृंदावन नीके रहे, काटि लाज कौ फन्द ॥65॥

नीकी भाँति मुकन्द की, कैसेहुँ कहत बनै न।
बात लाड़िली-लाल की, सुनि भरि आवै नैंन ॥66॥

मन-बच करि विश्वास धरि, मारि हिये के काम ।
मात, पिता, तिय छाँड़ि कै, बस्यौ वृन्दावन धाम ॥67॥

अन्तकाल गति कह कहौं, कैसेहुँ कही न जाति ।
चतुरदास वृन्दाबिपिन, पायौ आछी भाँति ॥68॥

चिंतामनि बातनि सरस, सेवा माहिं प्रवीन ।
कहत सुनत भगवत जसहि, छिन छिन उपज नवीन ॥69॥

नागर अरु हरिदास मिलि, सेये नित हरि-दास ।
वृन्दावन पायौ दुहुँनि, पूजी मन की आस ॥70॥

नवल कल्यानी सखिनु के, मन मे अति अनुराग ।
लाल-लड़ैती कुँवरि कौ, गायौ भाग-सुहाग ॥71॥

भली भाँति वृन्दा-अली, अति कोमल सु-सुभाव ।
कृपा लड़ैंती कुँवरि की, उपज्यौ अद्भुत चाव ॥72॥

कीने रास विलास बहु, सुख बरसत संकेत ।
रचना रची कल्यान रुचि, मंडनी दास समेत ॥73॥

सेवा राधारमन की, भक्तनि कौ सनमान ।
साँते बास यमुना कियौ, तिहि सम नहिं कोउ आन ॥74॥

हुते उपासक अधिक ही, या रस में हरिदास ।
निसिदिन बीतै भजन में, राधाकुण्ड निवास ॥75॥

बरसाने गिरिधर सुहृद, जाकै ऐसौ हेत।
भोजन हूँ भक्तनि बिना, धर्यौ रहत नहिं लेत ॥76॥

नंददास जो कछु कह्यौ, राग रंग सौं पागि ।
अच्छर सरस सनेहमय, सुनत स्रवन उठै जागि ॥77॥

रमनदास अद्भुत हुते, करत कवित्त सुढार ।
बात प्रेम की सुनत ही, छुटत नैन जलधार ॥78॥

बावरो सो रस में फिरै, खोजत नेह की बात ।
आछे रस के बचन सुनि, बेगि बिवस ह्वै जात ॥79॥

कहा कहौं मृदुल सुभाव अति, सरस नागरी दास ।
बिहारी-बिहारिन कौ सुजस, गायौ हरषि हुलास ॥80॥

परमानन्द माधौ मुदित, नव-किशोर कल केलि ।
कही रसीली भाँति सौं, तिहि रस में रह्यौ झेलि ॥81॥

सेयौ नीकी भाँति सौं, श्री संकेत स्थान ।
रह्यौ बड़ाई छाँडिकै, सूरज द्विज कल्यान ॥82॥

खरगसेन के प्रेम की, बात कही नहिं जात।
लिखत ललित लीला करत, गये प्राण तजि गात ॥83॥

तैसेहि राघौदास की, बात सुनी यह कान ।
गावत करत धमारि हरि, गये छूटि तन प्रान ॥84॥

इहि बरन भक्त अद्भुत भयौ, और न कछू सुहात ।
अंगनि की छवि माधुरी, चिंतत जाहि बिहात ॥85॥

रोमांचित तन पुलकि ह्वै, नैंन रहे जल पूरि।
जाके आसा एक ही, (श्री) वृन्दावन की धूरि ॥86॥

कह कहौं महिमा भाग की, भई कृपा सब अंग ।
वृन्दावन दासी गह्यौ, जाइ सखिनु कौ संग ॥87॥

लाज छाँड़ि गिरिधर भजी, करी न कछु कुल कान।
सोई मीरा जग विदित, प्रगट भक्ति की खान ॥88॥

ललितहु लाई बोलि कै, तासौं हौ अति हेत ।
आनँद सौं निरखत फिरै, वृन्दावन रस-खेत ॥89॥

निर्तति नूपुर बाँधि कै, गावति लै करतार ।
बिमल हियौ भक्तनि मिली, तृन सम गनि संसार ॥90॥

बंधुनि विष ताकौं दियौ, करि विचार चित आन ।
सो विष फिरि अमृत भयौ, तब लागे पछितान ॥91॥

गंगा जमुना तियनि में, परम भागवत जानि ।
तिनकी बानी सुनत ही, बढ़े भक्ति उर आनि ॥92॥

कुंभन कृष्णदास गिरिधरनि सौं, कीनी साँची प्रीति ।
कर्म-धर्म पथ छाँड़िकै, गाई निजु रस रीति ॥93॥

पूरनमल जसवंत जी, भूपति गोविंद दास ।
हरीदास इनि सबनि मिलि, सेये नित हरि दास ॥94॥

परमानन्द अरु सूर मिलि, गाई सब ब्रज-रीति ।
भूलि जात बिधि भजन की, सुनि गोपिनु की प्रीति ॥95॥

माधौ रामदास बरसानियाँ, ब्रज-विहार के केलि ।
गाये नीकी भाँति सौं, तेहि रस में रहे झेलि ॥96॥

सूरदास अति प्रीति सौं, कवित रीति भलि कीन ।
मदन-मोहन अपनाइ कैं, अंगीकृत करि लीन ॥97॥

जिन-जिन भक्तन प्रीति किय, ताके बस भये आन।
सेन हेत नृप टहल किय, नामा की छाई छाँन ॥98॥

जगत बिदित पीपा धना, अरु रैदास कबीर ।
महा धीर दृढ़ एक रस, भरे भक्ति गंभीर ॥99॥

जगन्नाथ वत्सल भगत, कीनौं जस बिस्तार ।
माधौ भूखौ जानि कैं, लाये भोजन थार ॥100॥

एक समै निसि सीत सौं, काँपन लाग्यौ गात।
आनि उढ़ाई तेहि समै, अपनैं कर सकलात ॥101॥

बिलु-मंगल जब अंध भयौ, आपनु कर गहे आइ ।
भक्तनि पाछें यौं फिरत, ज्यौं बछरा सँग गाइ ॥102॥

रामानँद अंगद सोभू, हरीव्यास अरु छीत।
एक-एक के नाम सौं, सब जग होत पुनीत ॥103॥

रँका बँका भक्त द्वै, महा भजन - रस लीन ।
इन्द्रासन कें सुखनि कौं, मानत तृन सों हीन ॥104॥

नरसी हू अति सरस हिय, कहा देऊँ समतूल ।
कह्यौ महा सिंगार रस, जानि सुखनि कौ मूल ॥105॥

दीनी ताकौं रीझि कैं, माला नन्द-कुमार ।
राखि लियौ अपनी सरन, विमुखनि मुख दै छार ॥106॥

जहाँ जहाँ भक्तनि कौं कछू, परत है संकट आनि ।
तहाँ तहाँ आपुन बीच ह्वै, धरत अभै कौ पानि ॥107॥

भक्त नरायन भक्त सब, धरैं हियैं दृढ़ प्रीति ।
बरनी आछी भाँति सौं, जैसी जाकी रीति ॥108॥

रसिक भक्त भूतल घने, लघुमति क्यौं कहे जाहिं ।
बुधि प्रमान गाये कछू, जो आये उर माहिं ॥109॥

हरि कौं निजु जस तें अधिक भक्तनि-जस पर प्यार ।
तातैं यह माला रची, करि 'ध्रुव' कंठ-सिंगार ॥110॥

भक्तनि की नामावली, जो सुनि है चित लाइ ।
ताके भक्ति बढ़ै घनी, अरु हरि होइ सहाइ ॥111॥

एक बार जिनि नाम लिये, हित सौं ह्वै अति दीन ।
ताकौ संग न छाँड़िहीं, 'ध्रुव' अपनौ करि लीन ॥112॥

ऐसे प्रभु जिन नहिं भजे, सोई अति मति हीन ।
देखि समुझि या जगत में, बुरौ आपुनौं कीन ॥113॥

अजहूँ सोचि बिचारि कैं, गहि भक्तनि पद ओट।
हरि कृपालु सब पाछिली, छमि हैं तेरी खोट ॥114॥

।। जै जै श्री भक्त-नामावली लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश ।।


7. वृहद् वामन पुराण की भाषा

दोहा
बामन बृहद् पुरान की, कछु इक कथा बनाइ ।
भक्तनि हित भाषा करी, जैसैं समुझी जाइ ॥01॥

एक समै भृगु पिता सौं, प्रश्न करी यह आनि ।
करि प्रनाम ठाढ़ौ भयौ, आगैं जोरे पानि ॥02॥

एक असंका उर बढ़ी, चित्त रह्यौ बिस्माइ ।
सर्वोपरि सर्वग्य तुम, हमहिं देहु समुझाइ ॥03॥

नारदादि शुक से जिते, किये भक्त सब गौन।
जाँची रज ब्रज-तियनि की, यह धौं कारन कौन ॥04॥

सुनहु पुत्र समुझी न तैं, रह्यौ भूलि ब्रह्म-ग्यान ।
सर्वोपरि ये हरि-प्रिया, इनकी कौन समान ॥05॥

बहुत बरष हम तप कियौ, इनकी पद-रज हेत ।
सो रज दुर्लभ सबनि कौं, हम हूँ बनी न लेत ॥06॥

और तियनि में गनहु जिनि, ये श्रुति-कन्या आहिं ।
कियौ अधीन पिय साँवरौ, प्रेम चितबनी चाहिं ॥07॥

अब लगि तैं समुझ्यौ नहीं, ब्रज कौ रंग रसाल ।
जो दिन बीते रस बिना, बदि गयौ सब काल ॥08॥

ब्रह्म-ग्यान में रह्यौ भ्रमि, और न कछू सुहात ।
छाँड़ि रसमयी अमृत फल, जाँचत सूखे पात ॥09॥

ग्यानी खोजत ग्यान में, भजनी भजन अपार ।
ते हरि ठाढ़े रहत हैं, ब्रज-देविनु के द्वार ॥10॥

एक भक्त वंदन करत, नहिं चितवत तिनि ओर।
ब्रज बनितनि के पगनि सौं, लावत मुकुट किशोर ॥11॥

निगमनि अस्तुति रुचति नहिं, करत हैं तत्त्व-बिचारि ।
जैसें भावत हेत सौं, ब्रजदेविन की गारि ॥12॥

अजहूँ खोजत लहत नहिं, रिषि मुनि-जन की पाँति ।
द्वार-द्वार ब्रज सुन्दरिनु , फिरत चक्र की भाँति ॥13॥

सब भक्तनि के सिरनि पर, हरि ईश्वर नँदलाल ।
ब्रज में सेवक ह्वै रहे, अद्भुत प्रेम की चाल ॥14॥

एक भजन विधि सौं करत, नीके मानत नाहिं।
जैसे ब्रज जुवती तिनहिं ठेलि पगनि सौं जाहिं ॥15॥

फिरत किशोर चकोर ज्यौं , बरसाने की ओर।
घर-घर प्यारौ लगत है, परे प्रेम की डोर ॥16॥

चित्र-सारी चितवत रहत, जैसैं घन तन मोर।
चहूँ ओर ग्रीवा फिरति, ज्यौं प्रति चन्द्र चकोर ॥17॥

जबहिं द्वार वृषभानु के, आए नंद-कुमार ।
तिहिं छिन गति औरे भई, रही न देह सँभार ॥18॥

हाय-हाय सब कोउ करैं, अद्भुत रूप निहारि ।
कहा भयौ या कुँवर कौं, देत प्रान सब वारि ॥19॥

तनक-भनक श्रवननि परी, रहि न सकी अकुलाइ ।
झाँकी सखियनि संग तजि, कुँवरि झरोखा आइ ॥20॥

लाज छाँड़ि अति प्यार सौं, चितई कछु मुसकाइ ।
सैननि में अति चतुर पिय, रहे चरन सिर नाइ ॥21॥

अंग अंग प्रति फूल भई, आनँद उर न समाइ ।
भाग मानि पहिचानि करि, चले लाल सिर नाइ ॥22॥

सर्वोपरि राधा कुँवरि, पिय प्राननि के प्रान ।
ललितादिक सेवत तिनहिं, अति प्रवीन रस जानि ॥23॥

पहिली पैरी प्रेम की, कीन्ही ब्रज विस्तार ।
भक्तनि हित लीला धरी, करूना निधि सुकुँवार ॥24॥

रच्यौ रास कोऊ बची नहिं, आइ मिलीं ब्रजनारि ।
प्रेम फाग खेलीं तहाँ, सब संकोच निबारि ॥25॥

रिषि-मुनि-जोगिनु के लिये, कबहुँ न लसे ब्रज-चन्द ।
गहि लीन्हें ब्रज-सुन्दरिन, डारि प्रेम कौ फंद ॥26॥

जोइ जोइ ब्रज वनिता कहैं, सोइ सोइ लेत हैं मानि ।
नाचत ज्यौं कठपूतरी, तिनके आगैं आनि ॥27॥

बहुत भाँति लीला चरित, तैसेई भक्त अपार ।
अपनी-अपनी रुचि लिए, करत भक्ति-विस्तार ॥28॥

और चरित बहु भाँति के, कीन्हे हैं जग केत ।
दूजौ कारन नाहिं कछु, ते सब भक्तनि हेत ॥29॥

अर्जुन पूछ्यौ कृष्ण सौं, मेरे एक सँदेहु ।
कौन भक्त प्यारौ तुम्हैं, यह मोसौं कहि देहु ॥30॥

भक्त जगत में बहुत हैं, तिनकौं नाहिं प्रमान ।
हौं गोपिन के हिय बसौं, गोपी मेरे प्रान ॥31॥

बैकुंठहु ते अधिक है, मथुरा मण्डल जान ।
तामें ताहू ते अधिक, ब्रज मण्डल सुख खान ॥32॥

अति सुदेस माया रहित, इकइस जोजन भूमि ।
जहाँ सहाइ ब्रजबास की, रहत कृष्ण दिन झूमि ॥33॥

मधि राजत ज्यौं मुकुट मणि, वृन्दावन रसकन्द ।
रसमय सुखमय तेजमय, झलकत कोटिक चन्द ॥34॥

एक रंग रुचि एक रस, अद्भुत नित्य-बिहार ।
जहाँ किशोरी लाड़िली, करी लाल उर-हार ॥35॥

निसदिन तो पहिरे रहैं, रूप की मनि उजियार ।
रस में लटकि छके रहैं, अधर सुधा आहार ॥36॥

अंग-अंग मन-मन मिले, नैननि-नैन विशाल ।
रूप-बेलि प्यारी बनी, छबि के लाल तमाल ॥37॥

जोरी दूलहु-दुलहिनी, मोहन-मोहिनी आहि ।
परम न अंतर निमिष कौ, जीवत रूपहि चाहि ॥38॥

महा मधुर रस-माधुरी, नव-नव वैस किशोर ।
अद्भुत रस में मगन रहि, नहिं जानत निशि भोर ॥39॥

नव किशोरता-माधुरी, सब गुन लीन्हें संग ।
युगल चरन सेवत रहैं, रँगी प्रेम के रंग ॥40॥

नित्य लाड़िली लाल दोऊ, नित वृन्दावन धाम ।
नित्य सखी ललितादि निजु, सेवत श्यामा-श्याम ॥41॥

ब्रज में जो लीला चरित, भये जु बहुत प्रकार ।
सबकौ सार बिहार है, रसिकनि कियौ निरधार ॥42॥

वृन्दावन-महिमा कछुक, कहत हौं सो सुनि लेहु ।
द्रुम-द्रुम प्रति अरु लता प्रति, लपट्यौ सहज सनेहु ॥43॥

महा प्रलय जबही भयौ, रह्यौ न कछुवै आँन ।
गिरि, वन, व्यौम न भूमि रही, नहिं नक्षत्र शशि भाँन ॥44॥

सर सरिता सागर मिले, अमित मेघ की धार ।
तीन लोक जल चढ़ि गयौ, बूढ्यौ सब संसार ॥45॥

कोटि-कोटि उतपति प्रलय, होति रहति इहि भाँति ।
जैसैं अरहट की घरी, भरि-भरि, ढरि-ढरि जाति ॥46॥

लोक पाल लीला-रचित, अब कछु दीसति नाँहि ।
निगम रिचा भूली भ्रमत, तरत फिरैं तिन माँहिं ॥47॥

सहज बिराजत एक रस, वृन्दावन निज भौंन ।
माया-जल परसत नहीं, अरु माया की पौंन ॥48॥

न्यारौ चौदह लोक तें, वृन्दावन निज धाम ।
इक रस बिलसत रहत नित, सहजहिं श्यामा-श्याम ॥49॥

चहूँ ओर वृंदा विपिन, सेवत सब औतार ।
विहारी विहारिनि करत तहँ, आनँद रंग-विहार ॥50॥

निगमनि सोच-विचारि कैं, यह ठहराई चित्त ।
भजन ताहि कौ कीजियै, इक-रस रहै जु नित्त ॥51॥

तव लागे अस्तुति करन, बाढ्यौ उर आनंद ।
जाने पूरन सबनि पर, श्री वृन्दावन-चन्द ॥52॥

एकै पुरुष किशोर वर, दूजौ नाहिंन कोइ ।
जाकी इच्छा सहज ही, यह कौतुक सब होइ ॥53॥

गावत जाकौ सुजस रस, आनँद बढ्यौ अपार ।
देखि कछू छवि की छटा, वृन्दा विपिन बिहार ॥54॥

रूप-माधुरी देखि कछु, विवस भये मुरिझाइ ।
बाढ़ी रुचि की चाह अति, रहे ललचाइ-लुभाइ ॥55॥

काम-कामना बढ़ी उर, यह उपजी अति आइ ।
खेलैं ऐसे रूप सँग, वनिता कौ तन पाइ ॥56॥

तिनि प्रति तव बानी भई, यह प्रभु लीन्ही मानि ।
प्रगट होहु व्रज जाइ तुम, हमहूँ प्रगटैं आनि ॥57॥

तहाँ सबै सुख पाइहौ, जो-जो करी मन-आस ।
हम तुम एकहि संग मिलि, करिहैं रास-विलास ॥58॥

जाकी बानी भई ही, सो सखि प्रगटी आइ ।
वेदनि के आनँद भयौ, अद्भुत दरसन पाइ ॥59॥

एक असंका बढ़ी उर, चित्त रह्यौ विस्माइ ।
कछु इक नित्य-बिहार रस, हमहिं देहु समुझाइ ॥60॥

प्रभु आज्ञा इक भई है, सो पहिलैं करि लेहुँ ।
ता पाछैं जो पूछि हौ, ताकौ उत्तर देहुँ ॥61॥

सखी कियौ जब चिंतवन, श्रीपति प्रगटे आइ ।
प्रभु आज्ञा तिन सौं भई, सृष्टि रचावहु जाइ ॥62॥

ऐसें ही अवतार सब, लीन्हे तहाँ बुलाइ ।
अपनौं-अपनौं काज तुम, कीजौं समयौ पाइ ॥63॥

धर्मराज सौं कही तहाँ, मेरौ वचन सुनि लेहु ।
जाकें रंचक भक्ति है, ताहि कष्ट जिनि देहु ॥64॥

भक्तनि छाँड़े अरु सबनि कौं, तेरे आगैं न्याउ ।
हरि भक्तन तैं विमुख जे, तिनकौं तू समुझाउ ॥65॥

पुनि फिरि वेदन सों कही, जो पूछ्यौ सुनि लेहु ।
नित ही नित्य बिहार करैं, यामें कछु न संदेहु ॥66॥

नित्य सहज वृंदा विपिन, नित्य सखी ललितादि ।
नित ही विलसत एक रस, युगल किशोर अनादि ॥67॥

नवल प्रेम सौं रँगे दोऊ, नित ही नवल किशोर ।
होत रहत उत्पति प्रलय, नहि जानत निशि भोर ॥68॥

वेदहु जानैं अंश सब, मिट्यौ भरम तिहिंकाल ।
समुझे पूरन सबनि पर, नित्य बिहारी लाल ॥69॥

अपनैं-अपनैं सदन कौं, कीन्हौं सबनि पयान ।
ता पाछैं सोई सखी, भई जु अन्तरध्यान ॥70॥

श्रीपति चितयौ आपु ही , प्रकृति पुरुष की कोद ।
तेही छिन उपजी हियैं, कीजै जगत विनोद ॥71॥

प्रथमहिं माया ते भये महत्तत्त्व अहँकार ।
अहंकार त्रै रूप भयौ, तातें जग विस्तार ॥72॥

प्रथमहिं प्रकटे तीन गुन, ब्रह्मा बिष्णु महेश ।
ता पाछें सुर असुर नर, लोक-पाल सर्वेश ॥73॥

दोइ मुहूरत में रचे, चौदह लोक बनाइ ।
बाढी प्रभुता पुरुषता, कापै बरनी जाय ॥74॥

बहुत भाँति लीला चरित, तिनकौ नाहिन पार ।
सोई भूल्यौ भ्रम्यौ फिरै, कियौ चहै निरधार ॥75॥

सब तजि युगल किशोर भजि, जो चाहत विश्राम।
हित ध्रुव' मन बच हेत सौं, सेवहु श्यामा-श्याम ॥76॥

।। जै जै श्री वृहद् वामन पुराण लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश ।।



8. सिद्धान्त-विचार

।। बचनिका ।।
प्रेम की बात कुछ इक लाड़िली लालजू जैसी उर में उपजाई, तैसी कही। रसिक भक्तनि सौं यह विनती है, जो कछु घटि बढ़ि भूलि कही गई होइ, तौ कृपा करि समुझाइ दैनी।

जेहि प्रेम माधुरी श्री युगलचंद, आनंदकंद, नित्यानंद, उन्नत नित्य किशोर श्री वृंदावन निकुंज बिहार रसमत्त विलास करत हैं, यथामति किंचित् ढीठ्यौ कै कही। जैसें सिंधु तैं सीप भरि लीजै।

प्रेम-नेम के लक्षन कहा। कहा प्रेम, कहा नेम ।

प्रेम कौ निज रूप चाह, चटपटी, अधीनता, उज्वलता, कोमलता, स्निग्धता, सरसता, नूतनता, सदा एकरस, रुचि-तरंग बढ़त रहै, सहज स्वच्छंद, मधुरता, मादिकता, जाकौ आदि अन्त नाहीं, छिन-छिन नूतन स्वाद ।

अरु नेम अनेक भाँति हैं। कछु इक कहैं; देखिबौ, हँसिबौ, बोलिबौ, मान, निकुंजांतर किंवा निकट होइ और कोक के विलासादिक सब प्रेम के नेम हैं। जाकौ आदि-अन्त होइ सो सब नेम जानिबौ।

जहाँ संयोग में देखत-देखत बिरह रहे तहाँ स्थूल विरह की समाई नाहीं। सब रस, सब सिंगार, सब प्रेम, सब नेम, मूर्ति धरै श्री किशोरी-किशोरजू कौं सर्वदा सेवत रहत हैं। जिन भक्तनि जैसौ भाव धरि भजे, तिनकौं तहाँ पूरन सुख देत हैं।

प्रेम नेम के रूप अनेक हैं, कहाँ ताई कहे जाहिं। प्रेम मई रस को सार ब्यौरौ कियौ। श्री किशोरी-किशोरजू के प्रेम ही को नेम है और कछू रुचत नाहिं । ताही रस में मन दीजै सदा, कै उनके रसिक उपासिकनि सौं चित्त लावै, सदा संग करै।

ते रसिक भक्त कैसे हैं ? छाँडि रसिक रसिकिनी जू के प्रेम रस-विहार बिना और बात कछु रुचत नाहिं । तिनि की दृष्टि में और रस कछु न आवै, तिहिं रस के बल सब तें बेपरवाह रहत हैं। और जहाँ ताई अवतार लीला तहाँ तैसीये भाँति के भक्त हैं। एक भक्त ऐसे हैं, सब औतार लीला गावत हैं कछु भेद नाहीं, ये ऐश्वर्य महातम ज्ञान लिये हैं। एकनि के इष्ट धर्म है, ये उनतें सरस कहिये। काहे ते जु इहाँ सनेह पाइयतु हैं। इष्ट कहिये सनेही सौं तातें सनेही कौं छाँड़ि दूसरी ठौर मन न चलै, जो चलै तौ सनेही नाहीं । अनन्यता याकौं कहियै छाँडि अपनौ इष्ट और न जानै, न मन चलै। जो चलै तौ अनन्यता नाही। रसिक तासौं कहिये, जो रस कौ सार गहै।

और जहाँ ताई भक्त उद्धव, जनक, सनकादिक अरु लीला, द्वारिका, मथुरा आदि तिन सबनि पर अति गरिष्ट सर्वोपरि ब्रजदेविनु कौ प्रेम है। ब्रह्मादिक जिनकी पदरज बांछत हैं। तिनके रस पर महारस, अति दुर्लभ, श्री वृन्दावनेश्वरी, श्री वृन्दावनचन्द आनंदघन उन्नत नित्य किशोर सबके चूड़ामणि तिनके प्रेममयी निकुंज माधुरी विलास ललिता विसाखा आदि। इन सखियनि के प्रान अधार अहार यहै हैं। इनि सखियनि कौ प्रेम सर्वोपरि जानियै। या पर न और सुख न और रस। श्री रसिकानंद किशोर प्रेम की सीवाँ ललिता बिसाखादि सखियन कौ प्रेम बिना सीवाँ, जु कह्यौ न जाइ । सदा नौतन तें नौतन एकरस रहै। इनकौ प्रेम समुझनौ अति कठिन है। जिनि पर उनकी कृपा होइ तब ही उर में आवै। सखियनि कौ प्रेम सर्वोपरि विराजमान है, काहे तैं जु लाड़िली लालजू के मननि कौ कोई एक सुख है, तासौं आसक्त अवलम्बि रही है। इनकौ भाव धरि याही रस की उपासना में कपट छाँडि, भ्रम छाँडि निशिदिन मन दै इहै विचार में रहै। अनन्य होइ ताकौ भाग कहिबे कौं कोऊ समर्थ नाहीं, इति।

एक में कही कि जब प्रेम उपजै तब नेम रहै कि जाइ ? जे नेम, प्रेम तें न्यारे हैं ते जाँइ, अरु जे नेम, प्रेम सौं जंत्रित हैं ते कैसे जाँइ ? नौधा भक्ति हूँ नेम है, जब प्रेम-लक्षना उपजै ताही प्रेम में लीन ह्वै रहै। ताकौ दृष्टांत-जैसे स्वेत वस्त्र लाल रँग्यौ, तब वह लाल भयौ, वस्त्र कहूँ नाहीं गयौ, अरु जैसे भरिया पात्र कौ आकार नेम, पात्र प्रेम। जो करिये अरु निबरै सो सब नेम। अरु सदा एक रस रहे सो प्रेम | अ‌द्भुत प्रेम की गति ऐसी है, जो देह के सुख जहाँ ताई हैं ते सब भूलि जाहिं । एक जासौं प्रेम है ताही रंग में रँगै। अरु ताके अंग-संग की जेती बातें हैं, ते सब प्यारी लागें--- ताके नातें। अरु ताकौं भावै सोइ याकौं रुचै।

एक ने कही प्रेम में अरु काम में कहा भेद है सो कहौ, समुझाइ देउ ? तातें जैसी यथामति उपजी तैसी कही। और जहाँ ताई सुख हैं तिन पर काम-रस अधिक है या पर और नाहिं। तहाँ व्यास जू ने कही, उहाँ के सुख की निशानी। पद में-“काम रति सुख की निशानी।“ या प्रेम के सुख रस आगे सो काम लज्जित होइ रहै। तातें सबनि काम-सुख नेंम में राखे। या पर प्रेम कौ सुख निमित्त रहित सदा एक रस है। ताते प्रेम-नेम के लक्षन ऊपर कहि आये हैं। जाकौ आदि-अंत होइ सो सब नेम जानिबौ। जाकौ अंत नाहीं सो प्रेम सर्वदा एक रस रहे सो अद्भुत प्रेम है। युगल किशोर जू कौ रूप जानिबौ जा प्रेम नें ये बस किये हैं, सो प्रेम महा अद्भुत है। ता प्रेम के एक निमेष पर और सुख कोटि कलपनि के वारि डारिये। स्वाद विशेष के लिये भयौ शुद्ध प्रेम है। जैसे खाँड़ अरु जल एकत्र कियौ तब खाँड़ न जल शरबत भयौ । खाँड़ जल हू वाही में है। ऐसे महामधुर रस स्वाद कौं शुद्ध प्रेम है प्रगट कियौ।

जहाँ नायक-नाइका बरनन कियौ है।नाइक अपनौ सुख चाहै नायका अपनौ रस चाहै । सो यह प्रेम न होइ, साधारण सुखभोग है। जब ताई अपनौं-अपनौं सुख चाहियै तब ताई प्रेम कहाँ पाइयै ? दोइ सुख, दोइ मन, दोइ रुचि जब ताई प्रेम कहाँ पाइये है। दोइ सुख, दोइ मन, दोइ रुचि जब ताई एक न हौंइ तब ताई प्रेम कहाँ ? कामादिक सुख जहाँ स्वारथ भये हैं तौ और सुखनि की कौन चलावै, निमित्त रहित, नित्य प्रेम सहज एकरस श्री किशोरी-किशोर जू के है और कहूँ नाहीं।

जो कोऊ कहै कि काम नेम में कहि आये तौ उनहूँ कौ काम-केलि तौ गाई है। सो यह काम प्राकृत न होइ प्रेममई जानिवौ, निज प्रेम है। नेम, रस-सिंगार पोषक के लिये न्यारे कै कहे हैं। जो बात प्रिया जू के अंग-संग ते उपजै सोई प्रीतम कौं प्यारी लागै। यह अप्राकृत प्रेम है। श्री कृष्ण काम के बस नाहीं। जिनको रूप देखत कोटि-कोटि मनोज रति सहित मूर्छित हौंहिं। ऐसे नवल किशोर श्रीवृन्दावन चन्द जू मदन सहित सबके मन मोहि राखें । तेई यहाँ श्रीवृन्दावनेश्वरी जू के प्रेममई अनंग चितवनि, रसमई भौंहनि तें तरंग उपजै, तिन प्रेममई अनंग में सहज ही ऐसे मनमोहन मोहि राखे। अपनें बस किये, सो साक्षात् प्रेम है। श्रीप्रियाजू जित चाहें, जित चलैं, जासौं बोलें, जु पहिरें, जु हाँथ करि छुवैं ते सब बात प्रीतम के प्रान ह्वै जाहिं । यहाँ कौ नेम ऐसौ है जु प्रेम शोभा पावै। एकरस समुझनो। जैसें ताना-बाना दोऊ मिलि एक पट भयौ। स्वाद के लिये नेम न्यारे कै कहे हैं। नेम प्रेम को साधन सो एकै जानिबो। प्रिया जू को अंग-संग छाँड़ि और ठौर मन न चलै, प्रीति ऐसी है। तहाँ श्रीजी की बानी, “प्रीति की रीति रंगीलोई जानै”।

यह बात प्रेम की, बिना श्रीवृन्दावनचन्द को जानै, को समुझे ? जो बात प्रिया जू कौं भावै सोई इनकौं भावै। तहाँ श्रीजी की बानी- “जोई-जोई प्यारौ करै सोई मोहिं भावै, भावै मोहि जोई सोई-सोई करें प्यारे।‘ सहज प्रेम के रस में दोऊ मत्त रहत हैं। एकरस सनेह की रीति ऐसी है जो सनेही कौ सुख चाहै अपनी चाह कछु नाँही। श्री प्रियाजू जु बिलास करें सो सब लालजू के हेत अरु लालजू जामैं लाड़िलीजू सुख पावैं सोई करें, अपनी चाह कछू नाँही। तहाँ भर केलि महामदन के सुख रस में लाल जू के वचन, तहाँ श्रीजी की बानी “विरमि-विरमि नाथ बदत वर विहार री”। तातें सनेही के सुख सौं आसक्त होइ सो सनेही कहिये। जैसे सखियनि की रीति, दोउन के प्रेम रस सौं अवलम्बि रही हैं और निमित्त बीच कछू नाहीं।

श्री गुसाँई श्रीहरिवंशचन्द्रजू प्रगट भये युगल केलि रस माधुरी प्रगट करिबे कौं। और सबनि मिश्रित गाई, प्रेम की आसक्तता श्रीगुसाँईजू ने गाई।

आसक्त कहा ? सक्ति रहित आसक्त । जब ताईं मन की गति भँवर की सी चंचल फिरै तब ताईं आसक्त नाहीं। जब सब ठौर ते चंचलता छुटै तब आसक्ति के रस में अटकै। तहाँ श्रीजू की बानी-

“कहा कहौं इन नैननि की बात।
ये अलि प्रिया बदन अम्बुज रस अटके अनत न जात” ।।
अरु “चंचल रसिक मधुप मोहन मन राखे कनक कमल कुच कोरी” इत्यादि।
ऐसै रसिक लाड़िली लाल जू जिनकौ मूरतिवन्त आसक्तता सेवत रहे है।
पद-बिहारीदासजी - "आसक्त उपासक दम्पति कौ सुख।"
दोहा पुरातन - फँद सरकावत फिरत दिन, चित चंचल जु कहंत।
फँद्यौ जु कुंतल विकट लट टक-टक मुख जोवंत।।

श्री लाड़िली-लाल जू प्रेम रसमई मूरतिवंत हैं। इनतें उपजै सो सब प्रेम है विलासमई। तातें दोइ नाम रस स्वाद के निमित्य परे। प्रेम, नेम। जैसे तंतु कौ तानौ-बानौ, न्यारौ कोई नाहीं। और सोना है तातें भूषन कर्यौ सो नेम भयौ । सोना एक रस है सो प्रेम है ।

।। कुण्डलिया ।।
प्रेम मदन के सिंधु द्वै, बहत रहत दिन हीय।
कबहुँ बिबस चेतत कबहुँ, छिन छिन प्यारी-पीय ।।
छिन-छिन प्यारी पीय, मधुर रस बिलसत ऐसैं।
सूक्षम प्रेम की बात, कहौ कोउ बरने कैसें ।।
यह सुख सखियनि बाँट पर्यौ, भूले 'ध्रुव' सब नेम।
इक रस फूली फिरति सँग, पाइ माधुरी प्रेम ।।

प्रेम मदन के सिंधु द्वै लाड़िली लालजू के हिये बहत रहत हैं। जब प्रेम रूपी सिन्धु के तंरग छावैं तब बिवस होहिं। जब मदन रूपी सिंधु के तरंग छावै तब चैतन्य होंहिं। विलास-रंग में परे ऐसैं प्रेम-नेम ओत-प्रोत हैं। प्रेम की क्रिया बिवसता। नेम की क्रिया सावधानता । यातें एक कहिये स्वाद कौं दोइ। कबहूँ खिलारी खेल बस और कबहूँ खिलारी बस खेल ।। ऐसी भाँति कौ विहार निसि-दिन करत हैं। या रस की अधिकारिनी सखी हैं कै जिन रसिक भक्तनि कैं सखियनि कौ भाव है । धन्य तेई भक्त रसिक।

श्री वृन्दावन निकुंज धाम में श्री वृन्दावनचन्द उन्नत नित्य किशोर प्रेममई बिलास करत हैं। तामें प्रेम ही कौ नेम नित्य है एक रस है कबहूँ न छूटै। तहाँ की आसंका कोऊ जिनि करौ। निमित्य रहित बिहार में दोऊ मगन रहत हैं, यहाँ प्रेम-नेम में कछु भेद नाहीं, स्वाद विशेष के लिए कहे हैं। जैसे रसमई फल। बिनु गुठली बिनु बकला होइ। तातें इनके रस-बिहार में दोइ रस नाहीं एक प्रेम सौं आसक्त हैं। निश्चै मन क्रम वचन कै जानिबौ ।

ऐश्वर्यता, ज्ञान, महातम विषय या रसमाधुरी के आवरन हैं। इनतें चित्त काढ़ि माधुर्य रस में दैनौं। तन-मन की वृत्ति जब प्रेम रस में थकै तब आसक्त कहिये| तहाँ श्रीजी की बानी "बिंध्यौ मोहन-मृग सकत चलि न री।"

अद्भुत प्रेम की आसक्तता समुझनी अति कठिन है। जिनके मन अति सरस हौंहि तिनके उर आवै। जा प्रेम रस में मान हूँ नेम है। दुहुँनि के तन-मन सहज प्रेम रस भरे हैं। नेम कहाँ रहे ठौर नाहीं।। श्रीप्रिया जू कौ सहज स्वभाव, प्रेम, रस, रूप, जोबन रस की गरूरता देखि लाल जी व्याकुल ह्वै जात हैं। यह अवस्था देखि लाड़िलीजू अपनों सुभाव भूलि जात हैं। महा प्यार सौं अंक भरि लैहिं। जो कबहूँ प्रिया जू अपने रस में लालजी तन न चितवें, नैंकहु न बोलें तौ उनकी गति मीन-जल की-सी होइ है। जहाँ मान सहज कौ यह है।

जो कोऊ कहै कि मान तौ रस कौ पोषक है अरु रुचि बढ़ावै, सो यह प्रेम साधारण जानिबौ । इहाँ यौं नाहीं। नित्य छिन ही छिन प्रीति-रस सिंधु तें तंरग रुचि के उठत रहत हैं नये-नये, तहाँ श्री स्वामी जी कौ पद-
जब जब देखौं प्यारी तेरो मुख, तब-तब नयौ-नयौ लागत

अरु श्रीजी की बानी “करत पान रसमत्त परस्पर लोचन तृषित चकोर' तातें प्रेम, बिरह अनेक भाँति के हैं। जैसौ जहाँ प्रेम तैसौ तहाँ बिरह है। जहाँ स्थूल प्रेम, तहाँ स्थूल विरह। जहाँ सूक्षम प्रेम तहाँ सूक्षम विरह।

जो कोऊ कहै कि स्थूल कहा सूक्षम कहा ? सूक्षम प्रेम याही कहियै जो एक सेज पर रूप देखत चंद-चकोर ज्यों नैनांचल ओट भये महा कठिन दशा होइ । अरु देह हूँ अपनी न्यारी नाँहीं सहि सकत यह भी विरह मानत हैं, तहाँ की बात गुसाईजू गाई। तहाँ श्रीजी की बानी “श्रुति पर कंज दृगंजन कुच बिच मृगमद है न समात। (जैश्री) हित हरिवंश नाभि सर जलचर जाँचत साँवल गात।“ अरु श्री स्वामी जी कौ पद “ऐसी जिय होत जो जिय सौं जिय मिलै तन सौं तन समाइ लैऊँ तौ देखौं कहा हो प्यारी।“

यह प्रेम अति तीव्र है, जा पर श्रीजू के रसिक भक्तनि की कृपा होइ तब उर में आवै। ऐसे अद्भुत प्रेम में और भाँति को विरह न संभवै। जो फूलनि की माला देखे कुम्हिलाइ ताकौं असिवर कौ दिखाइबौ अनीत है। भ्रमहूँ को बिरह कहत डर आवै। या प्रेम में न स्थूल प्रेम की समाई न स्थूल विरह की समाई न मान की। एकरस यह प्रेम ही विरह रूप है। या रस की जिनकै उपासना है तिनके हिये ठहराई।

जो कोऊ कहै कि मान-विरह तौ महापुरुषन हू गायौ है। सो सदाचार के लिये गायौ है। औरनि के समुझाइबे कौं कह्यौ है। पहिले स्थूल प्रेम समुझे तब आगे चलै। जैसे श्रीभागवत की बानी, पहिलै नवधा- भक्ति करै तब प्रेम लक्षना आवै। अरु महापुरुषन अनेक भाँति के रस कहे हैं। ए पर इतनौ समुझनौ कै उनको हियौ कहाँ ठहरानौ है, सोई गहनौं | तहाँ श्री बिहारिनदासजी कौ पद- “तहाँ कछू न श्रम, तम न गम, विरह, भ्रम, मान लवलेश न प्रवेश न प्रशंगी”

और सब प्रेम-नेम या नित्य महाप्रेम रस के आगे साधन हैं, यह निर्धार जानिबौ। नित्य अखंडित एक रस सहज निमित्य रहित महामाधुरी निकुंज-केलि अद्भुत रसिकानंद दोऊ विलसत हैं या पर न और सुख, न और प्रेम। तहाँ कौ जु रससार है, तामें सखी ललिता- विसाखादिक आसक्त हैं। सार कौ सार प्रेम सुख यह अद्भुत महारस प्रेम की उपासना श्रीजू प्रकट करि दई है, निहसंक ह्वै सबके कल्याणार्थ। जो उर में आवै ठहराय।

या प्रेम की सूक्षम गति है, खाइ और तृपित होइ और । तहाँ श्रीजी की बानी “(जै श्री) हित- हरिवंश लाल ललना मिलि हियौ सिरावत मोर।“ यह सार कौ सार। बिरलौ कोइ इक जानै, समुझे। साधारन प्रेम, साधारन विरह सब के मन में आवै, भगवत-भजन की विधि-महातम और जहाँ ताईं ऐश्वर्य लीला तिनमें समाई है। यहाँ श्रीजी जो रस प्रगट कह्यौ ता रस-उपासना में कछु न मिले। अद्भुत उपासना सबनि ते न्यारी गति ताकी है।

यह महामाधुरी रस जाके उर न आवै, ताकौं संग न करिये। तिनकौ संग करनौ बड़ी अज्ञानता है। और सब भजन में गोष्ठी है, सनेह में गोष्ठी कहा ? समस्त भागवत धर्मनि ऊपर यह निकुंज माधुरी श्रीयुगल चन्दजू विलास करत हैं; जिनि यह रस समुझ्यौ नाहीं, तासौं रस की बात करनी उचित नाहीं। जो कहै तौ आपतें जाइ, अंतर परै निःसंदेह । तातें मौन होइ रहनौ बहुत भलौ है। विजाती सौं मिलिबौ भलौ नाहीं। बिनु सजाती सौं मिले बात न चलावै ।

अनेक भाँति भजन भक्ति के भेद तैसेई भक्त हैं ! जैसौ जाकौ भाव है तैसौ सिद्धि होय। तातें औरनि सौं प्रयोजन नाहीं। तहाँ बखानौ है- “तोहि बिरानी कहा परी तू अपनी निरबेर”। आपकों यौं चाहिये औरनि सौं मत्सरता छाँड़ि अपुनौ रस लिये रहे और याही रस के उपासिकनि सौं अंतर खोलि संग करै।

श्री व्यासजी के वचन-
“व्यास विवेकी भगत सों, दृढ़ कर कीजै प्रीति । अविवेकी कौ संग तजि, इहै भक्ति की रीति”।।
तो विवेकी कहा ? विवेकी तासौं कहियै जो भली गहै बुरी छाँडै। अविवेकी भली बुरी कछु न समुझे सब गहै सब छाँडै। तातें सजाती सौं मिलि बात युगल बिहार की करै, बिचारै। तिनकी जूँठन खाइ चरनोदक पीवै। बिजाती कौ परस हू न करै। और वृन्दावन-चन्द एक प्रीति ही मानै हैं कोटि भाँति भावै अपरस रहौ, भावै सपरस रहौ, अनेक आचार करौ, उनको एक प्रीति की सचाई सौं काम है।

तब एक ने कही आचार न करै ? थोरौ बहुत करै सदाचार के लिये। जब श्री जी की सेवा पाक करै तहाँ आचार करै, जैसौ संभवै। अपने प्रसाद पाइबे कौं आचार बहुत न करै। प्रसाद ही कोटि आचार कौ स्वरूप रूप है। भोग लागे पाछें बहुत आचार उचित नाहीं। शास्त्र हू में कही है, अति आचार अनाचार समान है। राँधे अन्न विषै कछू न मानै। जो भोग श्रीजी कौ लाग्यौ, तौ सब बराबर, कहा काचौ, कहा पाकौ। वैष्णव सदाचार के लिये आचार करै। मन में विश्वास न धरै कि याही तें कारज सिद्ध होइगौ। शुद्धता के लिये करै। श्रीजी की टहल कोटि कोटि आचार कौ स्वरूप है। बहुत आचार तें हियौ अति कठोर होइ जाइ है। यह भजन अति कोमल है, कोमल कठोर एक संग न बनै।

जे सनेही भजनीक हैं, तिनकी घटि-बढ़ि क्रिया में मन न देइ। आपको बड़ी हानि है, बड़ौ अपराध है। कोटि-कोटि आचार उनके एक निमेष के रस भजन के ऊपर वारि डारियै। ब्रह्मादिक, सनकादिक या बात में भूले हैं। औरनि की कौन चलावै । जो यह बात मन में न आवै तिन सब अनाचार किये। जे सनेही भक्त हैं, तिनकी पदरज कोटि आचार है, साधन-सिद्ध तीरथ है।
श्री गुसाँई कृष्णदास जी कौ पद-
“साधु-चरन-रज सब सुख साधन, यहै मेरै मत काज सुधी कौ”।
श्री व्यासजी कौ पद-
“साधु चरन रज माँझ व्यास से, कोटिक पतित समात” इत्यादि ।

अनंत लीला अवतार अनेक, तिनकी ऐश्वर्यता कौ पारावार नाहीं। ऐसे ही नाना प्रकार के भक्त हैं। श्री कृष्ण-लीला तीन प्रकार की, तिनहूँ में भेद-भक्त बहुत हैं। जहाँ-जहाँ जाकौ मन लाग्यौ ते सब नीके हैं, घटि कोऊ नाहीं। आपकौं यौं चाहिये औरनि की घटि-बढि कछु कहै नाहीं। अपने रस में जैसी उपासना है, तहाँ मन दिये रहे। जे रसिक अनन्य श्री वृंदावन की उपासना में श्री किशोरी-किशोर जू की किशोरताई की छबि अरु निकुंज माधुरी रस जिनकें हिये बसत है, नैननि में झलकति है, तिनकी चरन-रज सीस पर धारियै उनकौ संग निशिदिन करियै, जूठन पाइयै, अंतर न राखियै।

जो ऐसे भक्तनि सौं कछु आचार निमित्त गिलानि आनै तो तिन सब अनाचार कियौ। यह बड़ौ अतंराय है। तातें या रस पाइबै कौं कछू और जतन नाही—बिनु भक्तनि की पद-रज। जो कबहूँ यह बात काहू के मन न आवै, और कहै कि कहाँ कही है ताकी साखी श्रीमद्भागवत श्लोक-
व्रतानियज्ञ छन्दांसि तीर्थानि नियमायमाः |
यथाSवरून्धेत् सत्संगः सर्वसङ्गापहो हि माम् ||

अरु श्री मुख कही कि- “हौं भक्तनि के पाछे फिरत हौं” जो एकांती भक्त हैं, तिनकी चरन रज निमित्य । और भी महापुरुषन यह सिद्धांत करि राख्यौ। तहाँ श्रीजू की बानी –
“जै श्रीहित हरिवंश प्रपंच बंच सब, काल व्याल कौ खायौ।
‘यह जिय जानि स्याम-स्यामा-पद, कमल-संगी सिर नायौ”।

अपने रस की उपासना में सावधान रहिये। भक्तनि के अपराधनि सौं डरपत रहिये। छिन छिन भजन ही सँभार्यौ करै, जैसे पुतरीन कौं पलकें।
पलकनि के जैसें अधिक, पुतरिनु सौं अति प्यार।
ऐसें लाड़िली-लाल के, छिन-छिन चरन सँभार।।

एक नें कही कि यह लाड़िली-लाल जू कौ अद्भुत निकुंज माधुरी कौ रस, सबतें दुर्लभ दुर्घट है; तासौं प्रेम कैसें उपजै ? कौन उपाइ, कौन साधन ?

मूल तौ कृपा रसिक भक्तनि की, जिनसौं संग मन-वच-क्रम करि करै, निशिदिन। अरु रसमई भजन के अभ्यास में रहे। और कठिन कलेश साधन सौं न बनै। यह रस अति कोमल है, माखन सौं माखन मिलै कठोरता न चाहिये। कठिन साधन सौं शुद्ध भक्ति हू न पाइये, तो यह महा-माधुर्य-रस कैसे पावै ? सर्वोपरि साधन यह है जो रसिक भक्त हैं, तिनकी चरन-रज बंदै, तिनसौं मिलि निशि-दिन किशोरी-किशोरजू के रस की बात कहै अरु सुनै निशिदिन, अरु पल-पल उनकी रूप-माधुरी विचारत रहै।

यह अभ्यास छाँड़े नहीं, आलस न करै, तो रसिक भक्तन कौ संग ऐसौ है, अवश्य प्रेम कौ अंकुर उर में उपजै। जो कुसंग पशु तें बच्चै। जब ताई अंकुर रहै- तब ताई भजन जल सौं सींच्यौ करै बारंबार। अरु सत्संग की बाड़ दृढ़ के करै तौ प्रेम की बेलि हिये में बढ़े, फूलै, जड़ नीके गहै तौ चिंता कछु नाहीं, यह ही यतन है | संग तैं कृपा, कृपा तैं संग, तब भक्ति होइ | या सिद्धांत पर और कछु नाँही। यह बात अबहूँ काहू के मन न आवै तौ तासौं कछू बसात नाहीं, अपनी वह जानै।

या रस कौ विचार अपनैं मन समुझाइबे कौं, कैं जिनकौ मन या रस में होइ तिनके हेत कह्यौ । जो या विचार में रहे तौ काल वृथा न जाइ । जिन कौं यह रस रुचै नाहीं तिनके पास न बैठे, न यह प्रसंग चलावै। जो बिजाती सौं गोष्ठी करै तौ या रस में अंतर परै, चित्त कठोर ह्वै जाइ जैसे महा रंक धन कौं छिपाये फिरै, तैसें महा प्यार सौं उर में राखै यह भजन । अरु अभिमान छाँड़े। मान-अपमान उर में न आनै, दीन होइ। जहाँ रसिक भक्तनि की मंडली सुनै, तहाँ जाइ, तिनकी चरन-रज सिर पर धरै, अरु उनसों मिलि काल बितीत करै।

निमित्य रहित भजन स्वाद लिये होइ। जैसे विषई कौ अपनों-अपनौं रस रुचै। ऐसें भजनी होइ, तब विषय-नेम कौं भस्म करै, तब प्रेम बढै। जब ताईं मन भ्रम्यौ फिरै, कबहूँ महातम, कबहूँ ज्ञान, कबहूँ विरक्तता तिनकौ या रस माधुरी सौं बहुत अंतराय है। जो निस्प्रेही भयौ ताकौं जैसी कौड़ी तैसौ रतन। और सब रस या माधुर्य रस के आवरण हैं, अन्तराय बनाये हैं। सो यह बात रसिकनि की कृपा तें मन में आवै। श्री किशोरी-किशोर जू की प्रेमरस माधुरी तबहीं उर में आवै जाकें सांगोपांग उपासना सहजकी होइ।

सांग कहा ? गुरु, इष्ट, मंत्र, रसिकनि कौ संग, जब या रस माधुर्य के जुरें तब उपासना सिद्ध होइ, ते उपासिक कहिये। जो मन नेकहूँ और धर्म में चलै तौ उपासना भंग होइ। और वृन्दावन में जो कोई निमित्य, तिथि, विधि मानें सो भली नाहीं। श्री लाड़िली-लालजू जहाँ नित्य-विहार करत हैं, ऐसौ श्री वृंदावन है, ताकौ निमित्य धर्मनि में सानै, यह बड़ी चूक है। चंद्रमनिहि लै ज्यों काँच के मनियनि में पोवै तो शोभा न पावई। जा वृंदावन की तुल्य को वैकुण्ठ हू, नाहीं, ताकौ तुच्छ धर्मनि में मिलावै यह बड़ी अज्ञानता है। रसिक अनन्य ऐसौ चाहियै धीर, सुभट कहूँ मन कबहूँ न चले या बात की समान।

।। चौपाई ।।
यह प्रबोध (ध्रुव) जो मन धरै । सोई भलौ आपनौ करै।।
यह सिद्धांत सार है जानौ । और कछू जिय जिनि उर आनौं।।
छिन-छिन काल वृथा चल्यौ जाई । लाड़िली-लालहिं लेहु लड़ाई।।
छाँडि कपट मन, वच, चित दीजै। अलि ज्यौं चरन कमल रस पीजै ।।
जिनिकै मन निश्चै यह आई । रस सुख की निधि तिनहीं पाई ।।
तिनही देह धरी या जग में । जाकौ मन लाग्यौ या रंग में।।

दोहा-
यह सिद्धान्त बिचार तें, चारु बुद्धि (ध्रुव) होइ।
तन मन के सब भरम मल, पल में डारै धोइ।।

।। जै जै श्री सिद्धान्त-विचार लीला की जै जै श्रीहित हरिवंश ।।


9. प्रीति चौवनी लीला

दोहा
नवल रँगीले लाल बिनु, को समुझै निजु-रीति ।
सब तजि बस आपुन भये, रँगे रँगीली प्रीति ।।1।।

चूड़ामनि सब लोक के, लये प्रेम-रस मोहि ।
जद्यपि रूप निधान पिय, प्रिया-बदन रहे जोहि ।।2।।

बरनौं ऐसे प्रेम कौं, जिहि बस कीने लाल ।
शुद्ध स्वरूप अनूप ध्रुव, अद्भुत परम रसाल ।।3।।

आदि अन्त जाकौ नहीं, रहत एक रस रूप ।
रुचि तरंग पल-पल बढ़ैं, सहजहि सुखद अनूप ।।4।।

नित्य नवल मृदु मधुर वर, भीने रंग सुहाग ।
जामें नाहिं निमित्त कछु, सो अभंग अनुराग ।।5।।

प्रेम नेम व्योरौ कियौ, जो आयौ उर माहिं ।
याते न्यारे दुहुँनि के, लक्षण जानैं जाहिं ।।6।।

जेहि तन बन गरजत रहै, अद्भुत केहरि प्रेम ।
तामैं पावैं रहन क्यौं, गज, बिहंग, मृग, नेम ।।7।।

रहन न पावत और रस, जहाँ प्रेम कौ राज ।
सकल सुखनि कौं दलमलै, ज्यौं पंछिनु कौं बाज ।।8।।

मन पंछी तब लगि उड़े, विषय-वासना माहिं ।
प्रेम बाज की झपट में, जब लगि आयौ नाहिं ।।9।।

जहँ लगि लालच विषयै कौ, सो न होइ 'ध्रुव' प्रेम ।
तासौं कहा बसाइ 'ध्रुव', पीतर सौं कहै हेम ।।10।।

पलटि परत ताकी दशा, जो सनेह रँग रात।
और अंग मिटि कै सबै, नैना ही ह्वै जात ।।11।।

रहन देत नहिं और रस, यहै प्रेम की टेक ।
याकौ सहज सुभाव यह, करत दोइ तें एक ।।12।।

भूल्यौ नहिं अपनौ विषय, मिट्यौ न मन तें नेम ।
तासौं 'ध्रुव' कैसे कहे, जानि बूझि कै प्रेम ।।13।।

तन-विलास जे विषय के, जौ न प्रेम ते जाहिं ।
भानु उदै जो तम रहै, तौ वह भानुहि नाहिं ।।14।।

जामैं नाहिंन प्रीति कछु, जो जाकौ आहार ।
हिम रितु ग्रीषमता रुचै, ग्रीषम माहिं तुषार ।।15।।

अलि, पतंग, मृग, मीन, गज, चातक, चकइ, चकोर ।
ये सब झूठे नेह में, बँधे विषय की डोर ।।16।।

जब लगि द्वै मन बीच कछु, स्वारथ कौ हित होइ ।
शुद्ध सुधा कैसे रहै, परै जो तामें तोइ ।।17।।

आदि अन्त जाकौ भयौ, सो सब प्रेम न रूप ।
आवत जात न जानिये, जैसे छांहऽरु धूप ।।18।।

जब बिछुरत तब होत दुख, मिलतहि हियौ सिराइ ।
याही में रस द्वै भये, प्रेम कयौ क्यौं जाइ ।।19।।

तन मन कै बिछुरे नहीं, चाह बढ़ै दिन-रैन ।
कबहुँ सँजोग न मानहीं, देखत भरि-भरि नैंन ।।20।।

ऐसौ प्रेम न कहूँ 'ध्रुव', है वृंदावन माहिं ।
तिन बिच अंतर निमिष कौ, होत जु कबहूँ नाहिं ।।21।।

प्रेम-रूप वय घटत नहिं, मिटत न कबहुँ संजोग ।
आदि-अंत नाहिन जहाँ, सहज प्रेम कौ भोग ।।22।।

अंग अंग मिलि रहे सब, मन सौं मन अरुझात।
देखौ अटपटि प्रेम गति, चित्त न कबहुँ अघात ।।23।।

प्रेम चाल बाँकी चलनि, मन पग नहि ठहराइ ।
नख - शिख अरुझे नेम तें, ते कैसै तहँ जाँइ ।।24।।

प्रेम-बात हूँ बात तें, सूक्षम कही न जाइ ।
तन तरवर कौं छाँड़ि कै, मनहि झुलावै आइ ।।25।।

प्रेम प्रकार अनेक विधि, तिनमें उत्तम भाँति ।
अद्भुत प्रीति दुहुँनि की, जिनके उर झलकाँति ।।26।।

नेह निवाहन कठिन है, फिर्यौ जगत सब जोइ ।
विमल प्रीति नहिं देखियै, स्वारथ लग सब कोइ ।।27।।

प्रीति प्रीति सब कोऊ कहै, कठिन तासु की रीति ।
आदि अंत निबहै नहीं, बारू की सी भीति ।।28।।

प्रीति आरसी बिमल है, जौ कोऊ राखै जानि ।
कपट मोरचा लगत ही, होति दरस की हानि ।।29।।

जाके हिय में जगमगै, रूप-दीप उजियार ।
परसे ताके जाइ नसि, दुख सुख सब अँधियार ।।30।।

वृंदावन रसके रसिक, ये तौ पइयत थोर ।
जिनके हिय में बसत रहैं, रसमय मधुर किशोर ।।31।।

जौ कोऊ खोजत फिरै, आवै जग अवगाहि ।
नेही दुर्लभ पावनौ, और सुलभ सब आहि ।।32।।

बंकट घाटी नेह की, अतिहि दुहेली आहि ।
नैन पगनि चलिबौ तहाँ, जो 'ध्रुव' बनै तौ जाहि ।।33।।

चढ़िकै मैंन-तुरंग पर, चलिबौं पावक माहिं ।
प्रेम-पंथ ऐसौ कठिन, सब कोऊ निबहत नाहिं ।।34।।

लोक-वेद संकल सुदृढ़, मन-गज डारी तोरि ।
देखौ प्रेम-चरित्र यह, बँध्यौ फिरै बिनु डोरी ।।35।।

मन-मतंग मद रस मत्यौ, धँस्यौ प्रेम रन धाइ ।
लोक-वेद कुल कानि की, दई फौज बिचलाइ ।।36।।

जेहि उर उपज्यौ प्रेम-रस, सो नित रहत उदास ।
भूल्यौ हँसिबौ, खेलिबौ, खान-पान सुख-बास ।।37।।

रूप छटा अद्भुत निरखि, थकित भये मुख बैंन ।
प्रान तहाँ पहिले गये, रोवत छाँड़े नैंन ।।38।।

रूप-धसक हिय धँसि गयौ, सिथिल भये सब अंग ।
मुख पियराई फिरि गई, बदलि परयौ तन-रंग ।।39।।

प्रेम-बेलि जेहि पर चढ़ी, गई सबै सुधि भूलि ।
एक कमल 'ध्रुव' चाह कौ, ताके उर रह्यौ फूलि ।।40।।

मोह्यौ नहिं सुनि राग-धुनि, बिंध्यौ न उर छबि-बान ।
तिनकौं ऐसौ समुझ तू, पाहन चित्र- समान ।।41।।

पर्यौ न रूप-तंरग में, अर्यौ न मृदु मुसिक्यान ।
रम्यौ न भौंहनि भाइ-रस, नीरस तरु सम जान ।।42।।

प्रेम रंग तन मन रँगे, कहँ समाइ सुख और ।
रोम-रोम पिय रम रह्यौ, बची नाहिं कहुँ ठौर ।।43।।

कुंडलियाँ
नैननि पिय मूरति बसै, तेहि रस रहे समाइ ।
ये लच्छन सुनि प्रेम के, और न कछू सुहाइ ।।
और न कछू सुहाइ, फिरै अपनैं मदमातौ ।
कुटुँब देह सौं जाइ टूटि, सबही विधि नातौ ।।
जहँ-जहँ पिय की बात सुनैं, खोजत तिन गैंननि ।
छिन-छिन प्रति 'ध्रुव' लेत, प्रेम-जल भरि भरि नैननि ।।44।।

दोहा
कहा कहौं गति प्रेम की, बढ़ी चाह की पीर ।
लोचन भूखे रूप के, भरि भरि ढारत नीर ।।45।।

को आवै बुलवैब को, कोब कहै उठि जाहि ।
प्रेम चटपटी जासु उर, गृह-बन भूल्यौ ताहि ।।46।।

भाव बढ्यौ तब जानियै, यह गति होइ अनूप ।
भूलै भूखSरु सैन-सुख, नैंन भरे रहें रूप ।।47।।

चित्त रहै द्रविभूत नित, अति कोमल रस-प्रेम ।
हिय में झलकत रहैं यौं, जैसे चाँदी-हेम ।।48।।

वृंदावन नित सहजही, आनँद कौ निजु धाम ।
बिलसत है जहँ प्रेम-रस, इकछत स्यामा - स्याम ।।49।।

नवल किसोरी नव कुँवर, सहज प्रेम की रासि ।
भीने दोउ आनंद रस, करत मंद मृदु हाँसि ।।50।।

रूप परस्पर चितैबौ, जीवनि दुहुँनि की आहि ।
यह सुख समुझति हैं सखी, रहत निरंतर पाहि ।।51।।

या रस में चित दीजिये, छाँड़ि और सब आस ।
धन्य-धन्य तेई जू नर, जिनकै यह उपास ।।52।।

हित सौं जाहि चिन्हार नहिं, तासौं करि न चिन्हारि ।
बिनु 'ध्रुव' नेही भाजनहिं, रंग न दीजै डारि ।।53।।

प्रीति चौवनी जो सुनै, उपजैगी निजु प्रीति ।
ताही तें 'ध्रुव' समुझि है, वृंदावन-रस-रीति ।।54।।

हित सौं हियै धरे रहौ, यह माला रस-प्रेम।
हित ध्रुव' ताके झलमलै, हिये केलि रस-क्षेम ।।55।।

जै जै श्री प्रीति चौवनी लीला की जै जै श्री हित हरिवंश


10. आनन्दाष्टक

दोहा
सखी सबै उडगन मनौं, एक बार आनंद ।
पिय चकोर 'ध्रुव' छकि रहे, निरखि कुँवरि मुखचंद ।।1।।

ऐसी अद्भुत सभा बनी, इक छत सुख की रासि ।
फूले फूल आनंद के, सहज परस्पर हाँसि ।।2।।

देखि लाल के लालचहि, लालच हू ललचाइ ।
नवल कटाक्ष तरंग रस, पीवतहू न अघाइ ।।3।।

एकहि वय गुन प्रेम रस, रूपऽरु सील सुभाव ।
अद्भुत जोरी बनी ध्रुव, देखि बढ़त चित चाव ।।4।।

या रस के जे रसिकजन, तिनकी कौन समान ।
बिना मधुर रस-माधुरी, परसत नहिं कछु आन ।।5।।

रसिक तबहिं पहिचानियै जाकैं यह रस-रीति ।
छिन छिन हिय में झलकि रहै, लाल-लाड़िली प्रीति ।।6।।

यह रस जिन समुझ्यौ नहीं, ताके ढिंग जिनि जाहु ।
तजि सतसंग सुधा रसहि, सिंधु-सुतहि जिनि खाहु ।।7।।

वृन्दावन-रस अति सरस कैसैं करौं बखान ।
जिहि आगैं बैकुंठ कौ, फीकौ लगतु पयान ।।8।।

यह अष्टक 'ध्रुव' पढ़ै जौ, संध्या और सबार ।
ताके हियैं प्रकाश रहै, मिटै त्रिगुन -अँधियार ।।9।।

जै जै श्री आनंदाष्टक लीला की जै जै श्री हित हरिवंश


11. भजनाष्टक

दोहा
ग्यान, शांत रस ते अधिक, अद्भुत पदवी दास ।
सखा भाव तिनतें अधिक, जिनकैं प्रीति प्रकास ।।1।।

अद्भुत बाल चरित्र कौ, जो जसुदा सुख लेत ।
तातैं अधिक किशोर-रस, व्रज-बनितनि के हेत ।।2।।

सर्वोपरि है मधुर रस, जुगल किशोर विलास ।
ललितादिक सेवतिं तिनहिं, मिटत न कबहुँ हुलास ।।3।।

यापर नाहिंन भजन कछु, नाहिंन है सुख और ।
प्रेम मगन बिलसत दोऊ, परम रसिक सिरमौर ।।4।।

वृन्दावन नित सहज ही, नित्य सखी चहुँ ओर ।
मध्य विराजत एक रस, रसमय मधुर किशोर ।।5।।

छैल छबीली लाड़िली, छैल-छबीलौ लाल ।
छैल-छबीली सहचरी, मनौ प्रेम की माल ।।6।।

पंच बान जेहि पानि हैं, देखि गयौ इहि रंग ।
तेई बान तेहि फिरि लगे, जरजर भये सब अंग ।।7।।

बिवस भयौ सुधि रही न कछु, मोह्यौ महा अनंग ।
लज्जित ह्वै रहयौ नमित अति, करत न सीस उतंग ।।8।।

यह अष्टक 'ध्रुव' पढ़ै जो, जुगल चंद संजोग ।
ताके हियैं प्रकास रहै, मिटै तिमिर हृदि रोग ।।9।।

जै जै श्री भजनाष्टक लीला की जै श्री हित हरिवंश


12. भजन कुंडलिया

कुंडलिया
हंस सुता तट बिहरिबौ, करि वृंदाबन बास ।
कुंज-केलि मृदु मधुर रस, प्रेम विलास उपास ।।
प्रेम-विलास उपास, रहै इक-रस मन माही ।
तिहि सुख कौ सुख कहा कहौं, मेरी मति नाही ।।
हित ध्रुव' यह रस अति सरस, रसिकनि कियौ प्रसंस।
मुकतनि छाँड़े चुगत नहिं, मान-सरोवर हंस ।।1।।

दोहा
रस भींज्यौ रस में फिरै, रसनिधि जमुना तीर ।
चिंतत रस में सने दोऊ, स्यामल-गौर सरीर ।।2।।

कुंडलिया
नवल रँगीले लाल दोऊ, करत विलास-अनंग ।
चितवनि-मुसकनि-छुवनि कच, परसनि उरज-उतंग ।।
परसनि उरज उतंग, चाह रुचि अति ही बाढ़ी ।
भई फूल अंग-अंग, भुजनि की कसकनि गाढ़ी ।।
यह सुख देखत सखिनु के, रहे फूलि लोइन कमल ।
हित ध्रुव' कोक कलानि में, अति प्रवीन नागर नवल ।।3।।

दोहा
प्रेम-तृषा की बेलि कौ, केलि अदन-रस आहि ।
परम रसिक नागर-नवल, पीवत जीवत ताहि ।।4।।

कुंडलिया
मदन केलि कौ खेल है, सकल सुखन कौ सार ।
तेहि विहार रस मगन रहैं, और न कछू सँभार ।।
और न कछू सँभार, हारि, करि प्रान पियारी ।
राखति उर पर लाल, नेकहूँ करति न न्यारी ।।
याही रस कौ भजन तौ, नित्य रहौ 'ध्रुव' हिय-सदन ।
कुंज-कुंज सुख-पुंज में करत केलि लीला-मदन ।।5।।

दोहा
केलि-बेलि फूली रहति, चितवनि, मुसकनि, फूल ।
तेहि लागे छबि-फल उरज, ढाँपे प्यार- दुकूल ।।6।।

कुंडलिया
प्रेमहि शील सुभाव नित, सहजहि कोमल बैंन ।
ऐसी तिय पिय-हीय में, बसति रहौ दिन-रैंन ।।
बसति रहौ दिन रैन, नैन सुख पावत अति ही ।
प्रिया प्रेम-रस भरी, लाल तन चितवति जब ही ।।
देखो यह रस अति सरस, बिसरावत सब नेम ही ।
"हित ध्रुव' रस की रासि दोउ, दिन बिलसत रहैं प्रेम ही ।।7।। दोहा एकै सहज सुभाव बन्यौ, एकै विधि सब भाँति । एक रंग-रुचि एक रस, एकै बात सुहाति ।।8।। कुंडलिया सीस-फूल झलकान छबि, चंद्रिका की फहरानि । 'ध्रुव' के हिय में बसत रहौ, बिबि चितवनि मुसकानि ।। बिबि चितवनि मुसकानि, रहौ यौं उर में छाई । तिहिं रस के बल मनहिं, और कछुवै न सुहाई ।। या शोभा पर वारियै, कोटि-कोटि रति-ईस । रीझि-रीझि नख-चंद्रकनि, जब लावत पिय सीस ।।9।। दोहा सीस फूल सिखि चंद्रिका, सदा बसौ मन मोर । अरु जब चितवति लाड़िली, पिय तन नैंननि कोर ।।10।। कुंडलिया ऐसैं हिय में बसत रहौ, नव-किशोर रस-रासि । चितवनि अति अनुराग की, करत मंद मृदु हाँसि ।। करत मंद मृदु हाँसि दोऊ, होत जु प्रेम प्रकास । छके रहत मदमत्त गति, आनँद मदन बिलास ।। 'हित ध्रुव' छबि सौं कुंज में, दै अंसनि-भुज वैसे । मेरी मति इति नाहिं, कहौं उपमा दै ऐसे ।।11।। दोहा नव-किशोर चितचोर दोऊ, परम-रसिक सिर मौर । ऐसैं हिय में मिलि रहौ, बचै नहीं कहुँ ठौर ।।12।। कुंडलिया (श्री) राधाबल्लभ लाल की, बिमल धुजा फहरंत । भगवत धर्महुँ जीति कैं, निजु प्रेमा ठहरंत ।। निजु प्रेमा ठहरंत, नेम कछु परसत नाहीं । अलक लड़े दोउ लाल, मुदित हँसि-हँसि लपटाहीं ।। 'हित ध्रुव' यह रस मधुर, सार कौ सार अगाधा । आवै तबहीं हीय में, कृपा करैं वल्लभ राधा ।।13।। दोहा महामाधुरी प्रेम रस, आवै जिहि उर माहिं । नवधा हूँ तिहि रुचै नहिं, नेम सबै मिटि जाहिं ।।14।। कुंडलिया श्रीराधा बल्लभ-लाड़िली, अति उदार सुकुमारि । ध्रुव'"" तौ भूल्यौ और ते, तुम जिनि देहु बिसारि ।।
" तुम जिनि देहु बिसारि, ठौर मोकौं कहुँ नाहीं ।
पिय रँग-भरी कटाक्ष, नेकु चितवौ मो माहीं ।।
बढ़ै प्रीति की रीति, बीच कछु होइ न बाधा ।
तुम हौ परम प्रवीन, प्राण-बल्लभ श्रीराधा ।।15।।

दोहा
अतिहि मृदुल नागर-नवल, करुणासिंधु अपार ।
ऐसे शील सुभाव पर, "धुव" कीन्हौं बलिहार ।।16।।

कुंडलिया
वृन्दाविपिन निमित्त गहि, तिथि बिधि मानैं आन ।
भजन तहाँ कैसे रहै, खोयौ अपनै पान ।।
खोयौ अपनै पान, मूढ़ कछु समुझत नाहीं ।
चन्द्रमणिहिं लै गुहै, काँच के मनियनि माहीं ।।
जमुना- पुलिन निकुंज-घन, अद्भुत है सुख कौ सदन ।
खेलत लाड़िली-लाल जहँ, ऐसौ है वृन्दाविपिन ।।17।।

दोहा
ह्वै अनन्य इक-रस गहै, वृन्दावन रस-रीति ।
विधि-निषेध मानै न कछु, करै भजनसौं प्रीति ।।18।।

कुंडलिया
बार-बार तो बनत नहिं, यह संजोग अनूप ।
मानुष तन, वृन्दाविपिन, रसिकनि-संग, बिबिरूप ।।
रसिकनि-संग बिबि रूप, भजन सर्वोपरि आही ।
मन दै "धुव" यह रंग, लेहु पल-पल अवगाही ।।
जो छिनु जात सो फिरत नहिं, करहु उपाइ अपार ।
सकल सयानप छाँड़ि भजु, दुर्लभ है यह बार ।।19।।

दोहा
भजन-रंग सतसंग मिलि, वृन्दावन सौ खेत ।
एक कृपा तें जुरै "ध्रुव" याके चहियै हेत ।।20।।

दस दोहा, दस कुण्डलिया, कुण्डल भजन कौ आहि ।
बाहर पाँव न दीजियै, छिनु-छिनु यह अवगाहि ।।21।।

भजन कुण्डलिया में रहौ, पग बाहिर जिनि देहु ।
एकै जुगल-किशोर सौं करि 'ध्रुव' सहज सनेहु ।।22।।

जै जै श्री भजन कुण्डलिया की जै जै श्री हित हरिवंश